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वेद – समग्र परिचयः कांचीपीठ शंकराचार्य चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती द्वारा लिखल पुस्तक मैथिली मे अनुवाद

623 भ्यूज

वेद

मूल पुस्तक – द वेदाज, मूल लेखकः चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती, मूल प्रकाशकः भारतीय विद्या भवन मुम्बई, भारत 

मैथिली आ हिन्दी अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी, विराटनगर, नेपाल । सम्पर्क ईमेलः [email protected] Whatsapp: +9779801722981

वेदः एक परिचय

वेद केर कोनो आरम्भ नहि अछि । ई सामान्य ज्ञान (कॉमनसेंस) केर विरूद्ध बात भ’ सकैत छैक । हमरा लोकनिक आधुनिक वैज्ञानिक दिमाग हमेशा कोनो ऐतिहासिक घटनाक एकटा स्रोत, एकटा कारण आ एकटा कालखंड ताकैत अछि । आर वेद जेहेन काज केँ एकत्रित करबाक जरूर कोनो आरम्भविन्दु रहल होयत । सदा-सनातन, अनादि, अनन्त जेहेन परिकल्पना कोनो वैज्ञानिक अध्ययन वास्ते बिल्कुल मना छैक । कियैक तँ ओकर आगूक विकास आर अध्ययन लेल गणित (मैथमेटिक्स) केर प्रयोगक अनुमति नहि दैत अछि । हालांकि, सच त ई छैक जे ब्रह्माण्ड (यूनिवर्स), अभूतपूर्व (फेनोमेनल) आर अलौकिक (नूमेनल) दुनू, ‘स्थान’ (‘स्पेस’) आर समय (‘टाइम’) सँ बहुत आगाँ धरि विस्तृत पसरल अछि, ई दुइ आधारभूत उपकरण आ औजार थिक जेकर उपयोग हम सब कोनो घटना केँ मापन लेल करैत छी । एहि ब्रह्माण्ड केर केवल गोटेक रूप मात्र स्थान आ समय भीतर पड़ैत अछि तथा हमरा लोकनिक अनुकूलित एवं सीमित चेतना (कंडीशन्ड आ लिमिटेड कॉन्शसनेस) द्वारा भौतिक ब्रह्माण्ड (फिजिकल यूनिवर्स) केर रूप टा बुझल जा पबैत अछि । हम सब (पानिक मछरी वला कहावत जेकाँ) असीमित (अनलिमिटेड) समुद्र केँ नहि देखि सकैत छी, बल्कि ओकर मात्र लहर, लहरक अग्रभाग (वेव-फ्रंट) आर फेन (झाग, फ्रोथ) टा देखि पबैत छी । अगर ब्रह्माण्ड (यूनिवर्स) असलियत (रियलिटी) केर रूप छी, त धर्म या  ब्रह्माण्डीय व्यवस्था (कॉस्मिक ऑर्डर) ओकर मर्जी (विल) या आकार (डिज़ाइन) छी तथा सत्य व ऋत (‘बाजल गेल सच’ व ‘जेहेन अछि तेहेन सच’) ओकर असली स्वभाव छी ।

जखन ई कहल जाइत अछि जे वेद ब्रह्मा (सृजनकर्त्ता) केर सांस सँ निकलल अछि, त ई बुझबाक चाही जे वेद आवश्यक (इशेन्सियल) तथा बनाकय राखल जायवला (सस्टेनिंग) ज्ञान (नाउलेज) थिक, जे जीवनल लेल साँसे जतेक जरूरी अछि ।

चारि टा वेद, ऋग, यजुर, साम आ अथर्व, जे सब अन्तरिक्ष (रिक्त-स्थान, स्पेस) मे कम्पन (स्पन्दन, वाइब्रेशन) मानल जाइत अछि तथा जेकरा ५,००० वर्ष पहिने कलियुग केर शुरुआत मे भगवान वेद व्यास बनेने रहथि (संश्लेषित कयने रहथि), ताहि मे १,१३१ शाखा (रिसेन्सन्स) सब छल, ऋग मे २१, यजुर मे १०१, साम मे १,००० आर अथर्व मे ९ टा । ई सब ऋषि लोकनिक परम्परा मे, जेना पैल, वैशम्पायन, जैमिनी आ सुमंतु, पिता सँ पुत्र केँ आर गुरु सँ शिष्य केँ मौखिक परंपराक जरिए सुरक्षित राखल गेल छल । हालहि मे, ई सोच जे वैदिक पढ़ाइ केर अलावे दोसरे पढ़ाइ टा कयला सँ गुजारा चलत, एहि कारण सँ कतेको लोक धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) पढ़ाइ करय लागल अछि, जेकरा चलते आइ कतेको रास वैदिक शाखा सब उपलब्ध नहि अछि । गोटेके लोक, जे लोक स्मृति सँ जाप (वेदपाठ) कय सकैत छथि, हुनका बस आंगुर टा पर गानल जा सकैत छन्हि ।

एखन, मात्र १० टा शाखा (रिसेन्सन्स) उपलब्ध अछि, आर परमपूज्य स्वामी (शंकराचार्य चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती) कम सँ कम एकरा सुरक्षित रखबाक आर प्रसार करबाक इच्छुक छथि ।

हमर नोटः (मैथिली अनुवादक – प्रवीण नारायण चौधरीक अन्तर्भाव)

हम जखन ई पोथी – मूलपाठ अंग्रेजी मे कयल, बहुत बात हमर समझ मे नहि अयला उपरान्त एकरा विधिवत् हिन्दी मे, मैथिली मे अनुवाद करैत बुझबाक यत्न करबाक जरूरत बुझायल । पिछला साल २०२४ केर अन्तिम समय दिसम्बर माहक अन्त मे बिड़ला मन्दिर हैदराबाद परिसर मे किछु पुस्तक किनबाक क्रम मे ई पुस्तक किनने रही, कारण हृदयक कोण मे कतहु ई बात बहुते दिन सँ छल जे संस्कृत शिक्षा सँ वंचित रहितो बीच-बीच मे संस्कृतहि केर श्लोक आ सूत्र सब सँ जीवन लेल आवश्यक समाधान आ मार्गदर्शन भेटैत अछि, त वास्तव मे वेद केहेन आ कतेक बेसी महत्वपूर्ण होयत ! बस यैह जिज्ञासा जीवनक ५२ वर्षक उमेर धरि मात्र अन्दर मनहि टा मे रहल आ अन्ततोगत्वा पुस्तक किनला उपरान्त स्वाध्यायक हिस्सा बनेलहुँ आ फेर अपन जेठ सुपुत्री अम्बिका केँ किछु विशेष उपहार देबाक लेल एकर एक-एक पाठ केँ अनुवाद रूप मे सेहो राखब आरम्भ कयलहुँ ।

आइ जखन ई कार्य पूर्ण भ’ गेल अछि, हम अपन मोन मे ई निर्णय कय लेलहुँ अछि जे एकर मैथिली रूप प्रकाशित करेबाक काज करी, त परमपूज्य स्वामी – कांचीपीठ शंकराचार्य – चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वतीक इच्छा पूरा हेतनि, हमरो आशीर्वाद भेटत तथा हमर मिथिलाक लोक जिनकर जीवनपरम्परा वेदानुसार कहल गेल अछि, ओहो सब ई पढ़िकय अनुभव करताह जे हमरा लोकनिक पुरखाजन, राजा विदेह जनक व अनेकानेक ऋषि-महर्षि लोकनि कतेक कुशाग्र आ परमात्माक अप्पन लोक रहल छलथि जे वेद, पुराण आदि मे पूर्ण महारत हासिल कएने रहथि आ ओ सब मंत्रद्रष्टा बनिकय समस्त मानव संसार लेल अनेकों महत्वपूर्ण कार्य कयलनि, जेकर अनुसरण करय मे हम सब कतहु न कतहु पाछाँ छुटि रहल छी, से नहि छूटी ।

ॐ तत्सत् !!

आशा नहि विश्वास अछि जे ‘वेद’ केर मैथिली रूप पढ़ला सँ समाज मे पैघ परिवर्तन आ मूल-मौलिकताक रक्षार्थ फेर सँ मैथिलजन संकल्पित हेताह । प्रणाम !!

हरिः हरः !!

प्रवीण नारायण चौधरी

प्रगति सुन्दर टोल, प्रगति पथ, विराटनगर

नेपाल । 

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किछु महत्वपूर्ण कथ्य –

अनन्ता वै वेदाः । – वेद

Infinite are the Vedas. – The Vedas

प्रमाणं वेदाश्च । – आपस्तम्ब

The Vedas are the proof of all Dharma. – Apasthamba

वेदैश्च सर्वै अहमेव वेद्यो । – गीता

I am known through all the Vedas. – Gita

वेदो नित्यं अधीयतां । तद् उदितं कर्म स्वनुष्ठीयतां । – आदि शंकराचार्य

Practice the Veda daily. Practice well their prescriptions. – Adi Sankara

यस्य निश्वसितं वेदा । – विद्यारण्य

He whose breath are the Vedas. – Vidyaranya

वेदोखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥
– मनुस्मृति

The entire corpus of the Veda, Smriti or the secondary remembered texts and the virtuous acts of the knowers of the Veda, the actions of holy men and what produces contentment to oneself are all rooted in dharma. – Manusmriti

Prayer to Veda Vyasa:

व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे ॥
नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥

I hail Thee, Vyasa, again and again,
Thou, God in human frame,
Thou, scion of Vasistha’s ancient race,
It is from Thee that all knowledge springs.

Prayer to Adi Sankaracharya

श्रुति स्मृति पुराणानाम् आलयं करुणालयम् ॥
नमामि भगवत्पादम् शंकरं लोकशंकरम् ॥

“I Salute the sacred feet of Sri Sankara, the abode of Srutis, Smritis, Puranas and of compassion, and who ever accomplishes the good of the world.”

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The Vedas

The Vedas are without a beginning. This might militate against commonsense. Our modern scientific mind always looks for a source, a cause and a date for any historical event. And the compilation of a work like Vedas must definitely have had a beginning. Concepts like eternity, begininglessness, limitlessness are simply taboo for any scientific study, as these do not permit of the application of mathematics for their further development and study. However, the fact remains that the Universe, both the Phenomenal and the Noumenal, extends far beyond ‘Space’ and ‘Time’, the two basic devices and tools used by us to measure any phenomenon. Only some modes of this Universe fall within space and time and are apprehended as physical universe by our conditioned and limited consciousness. We (like the proverbial fish in water) do not and cannot see the limitless ocean, but can see only the waves, wave-fronts and frot in it. If the Universe is the manifestation of the Reality, the Dharma or the cosmic order is Its will or design and Satya and Rita (‘Spoken Truth’ and ‘Truth as it is’) are its very nature.

When it is said that the Vedas are the emanations of the breath of Brahma (the creator), it is to be understood that the Vedas constitute both essential and sustaining knowledge, as vital as the breath for life.

The four Vedas, Rig, Yajur, Sama and Atharva, which are believed to be vibrations in space and synthesised 5,000 years ago at the beginning of Kali Yuga, by Bhagwan Veda Vyasa, consisted of 1,131 sakhas (recensions), 21 in Rik, 101 in Yajus, 1000 in Sama and 9 in Atharva. They were preserved in the Parampara (line) of Rishis (seers), viz., Paila, Vaishampayana, Jaimini and Sumanthu, by oral tradition, from father to son and guru (teacher) to sishya (disciple). Of late, the notion that education other than Vedic studies alone would ensure a livelihood, has led to many in the line taking to secular studies, resulting in many Vedic sakhas not being available today. In some, those who can chant from memory could be counted on one’s fingers.

At present, only 10 recensions are available, and His Holiness is keen on preserving and propagating at least these.

Some great lines of great impressions – influences on our mind and heart about the Vedas are:

अनन्ता वै वेदाः । – वेद

Infinite are the Vedas. – The Vedas

प्रमाणं वेदाश्च । – आपस्तम्ब

The Vedas are the proof of all Dharma. – Apasthamba

वेदैश्च सर्वै अहमेव वेद्यो । – गीता

I am known through all the Vedas. – Gita

वेदो नित्यं अधीयतां । तद् उदितं कर्म स्वनुष्ठीयतां । – आदि शंकराचार्य

Practice the Veda daily. Practice well their prescriptions. – Adi Sankara

यस्य निश्वसितं वेदा । – विद्यारण्य

He whose breath are the Vedas. – Vidyaranya

वेदोखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥
– मनुस्मृति

The entire corpus of the Veda, Smriti or the secondary remembered texts and the virtuous acts of the knowers of the Veda, the actions of holy men and what produces contentment to oneself are all rooted in dharma. – Manusmriti

Prayer to Veda Vyasa:

व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे ॥
नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥

I hail Thee, Vyasa, again and again,
Thou, God in human frame,
Thou, scion of Vasistha’s ancient race,
It is from Thee that all knowledge springs.

Prayer to Adi Sankaracharya

श्रुति स्मृति पुराणानाम् आलयं करुणालयम् ॥
नमामि भगवत्पादम् शंकरं लोकशंकरम् ॥

“I Salute the sacred feet of Sri Sankara, the abode of Srutis, Smritis, Puranas and of compassion, and who ever accomplishes the good of the world.”

वेद

वेदों की कोई शुरुआत नहीं है । यह सामान्य ज्ञान (कॉमनसेंस) के खिलाफ हो सकता है । हमारा आधुनिक वैज्ञानिक (मॉडर्न साइंटिफिक) दिमाग हमेशा किसी भी ऐतिहासिक घटना के लिए एक स्रोत (सोर्स), एक कारण (काउज) और एक तारीख (कालखंड) ढूंढता है । और वेद जैसे काम को इकट्ठा करने की ज़रूर कोई शुरुआत रही होगी । सदा-सनातन (एटर्निटी), अनादि (बिगिनिंगलेसनेस), असीमित-अनन्त (लिमिटलेसनेस) जैसे परिकल्पना (कॉन्सेप्ट) किसी भी वैज्ञानिक अध्ययन (साइंटिफिक स्टडी) के लिए बिल्कुल मना हैं, क्योंकि ये उनके आगे के विकास (डेवलपमेंट) और अध्ययन (स्टडी) के लिए गणित (मैथमेटिक्स) के इस्तेमाल की इजाज़त नहीं देते हैं । हालांकि, सच तो यह है कि ब्रह्माण्ड (यूनिवर्स), अभूतपूर्व (फेनोमेनल) और अलौकिक (नूमेनल) दोनों, ‘स्थान’ (‘स्पेस’) और समय (‘टाइम’) से बहुत आगे तक फैला हुआ है, ये दो आधारभूत उपकरण और औजार (बेसिक डिवाइस एन्ड टूल) हैं जिनका इस्तेमाल हम किसी भी घटना को मापने के लिए करते हैं । इस ब्रह्माण्ड के केवल कुछ तरीके ही स्थान और समय के अंदर आते हैं और हमारी अनुकूलित एवं सीमित चेतना (कंडीशन्ड और लिमिटेड कॉन्शसनेस) द्वारा भौतिक ब्रह्माण्ड (फिजिकल यूनिवर्स) के रूप में समझे जाते हैं । हम (पानी में कहावत वाली मछली की तरह) असीमित (अनलिमिटेड) समुद्र को नहीं देख सकते हैं, बल्कि उसमें केवल लहरें, तरंगों के अगले हिस्से (वेव-फ्रंट) और झाग (फ्रोथ) देख सकते हैं । अगर ब्रह्माण्ड (यूनिवर्स) असलियत (रियलिटी) का रूप है, तो धर्म या  ब्रह्माण्डीय व्यवस्था (कॉस्मिक ऑर्डर) उसकी मर्ज़ी (विल) या आकार (डिज़ाइन) है और सत्य और ऋत (‘बोला गया सच’ और ‘जैसा है वैसा सच’) उसका असली स्वभाव है ।

जब यह कहा जाता है कि वेद ब्रह्मा (सृजन करनेवाले – सृष्टि रचनेवाले) की सांस से निकले हैं, तो यह समझना चाहिए कि वेद आवश्यक (इशेन्सियल) और बनाए रखने वाला (सस्टेनिंग) ज्ञान (नाउलेज) हैं, जो ज़िंदगी के लिए सांस जितना ही ज़रूरी है ।

चार वेद, ऋग, यजुर, साम और अथर्व, जिन्हें अन्तरिक्ष (रिक्त-स्थानों, स्पेस) में कम्पन (स्पन्दन, वाइब्रेशन) माना जाता है और जिन्हें 5,000 साल पहले कलियुग की शुरुआत में भगवान वेद व्यास ने बनाया था (संश्लेषित किया था), उनमें 1,131 शाखाएं (रिसेन्सन्स) थे, ऋग में 21, यजुर में 101, साम में 1000 और अथर्व में 9 । इन्हें ऋषियों की परंपरा में, जैसे पैल, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमंथु, पिता से बेटे को और गुरु से शिष्य को मौखिक परंपरा के ज़रिए सुरक्षित रखा गया था । हाल ही में, यह सोच कि वैदिक पढ़ाई के अलावा दूसरी पढ़ाई से ही गुज़ारा हो जाएगा, इस वजह से कई लोग धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) पढ़ाई करने लगे हैं, जिसके कारण आज कई वैदिक शाखाएँ मौजूद नहीं हैं । कुछ में, जो लोग स्मृति से जाप (वेदपाठ) कर सकते हैं, उन्हें बस उंगलियों पर ही गिना जा सकता है ।

अभी, सिर्फ़ 10 शाखा (रिसेन्सन्स) मौजूद हैं, और परमपूज्य स्वामी (शंकराचार्य चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती) कम से कम इन्हें सुरक्षित रखने और फैलाने के इच्छुक हैं ।

अनन्ता वै वेदाः । – वेद

Infinite are the Vedas. – The Vedas

प्रमाणं वेदाश्च । – आपस्तम्ब

The Vedas are the proof of all Dharma. – Apasthamba

वेदैश्च सर्वै अहमेव वेद्यो । – गीता

I am known through all the Vedas. – Gita

वेदो नित्यं अधीयतां । तद् उदितं कर्म स्वनुष्ठीयतां । – आदि शंकराचार्य

Practice the Veda daily. Practice well their prescriptions. – Adi Sankara

यस्य निश्वसितं वेदा । – विद्यारण्य

He whose breath are the Vedas. – Vidyaranya

वेदोखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥
– मनुस्मृति

The entire corpus of the Veda, Smriti or the secondary remembered texts and the virtuous acts of the knowers of the Veda, the actions of holy men and what produces contentment to oneself are all rooted in dharma. – Manusmriti

Prayer to Veda Vyasa:

व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे ॥
नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥

I hail Thee, Vyasa, again and again,
Thou, God in human frame,
Thou, scion of Vasistha’s ancient race,
It is from Thee that all knowledge springs.

Prayer to Adi Sankaracharya

श्रुति स्मृति पुराणानाम् आलयं करुणालयम् ॥
नमामि भगवत्पादम् शंकरं लोकशंकरम् ॥

“I Salute the sacred feet of Sri Sankara, the abode of Srutis, Smritis, Puranas and of compassion, and who ever accomplishes the good of the world.”

विषय सूचीः

१. भूमिका

२. वेदिक धर्म ओ प्रामाणिक ग्रन्थ

३. ध्वनि आ सृजन – सृष्टि एवं वेद केर वैज्ञानिक प्रमाण

४. वेद पर शोध – विडम्बना ई जे अधिकतर पश्चिमी देशक विद्वान् वेद पर शोध कयलनि (रोचक तथ्य)

५. जप केर त्रुटिरहित विधि – शुद्ध उच्चारण एवं आवाजक सुन्दर महिमाक वर्णन

६. वेद अनन्त अछि – ज्ञानक अन्त नहि (अत्यन्त मननीय पाठ)

७. यज्ञ – परमात्मा धरि पहुँचबाक समुचित रीति – यज्ञक अनिवार्यता आ औचित्य पर प्रकाश

८. चारि वेद – अनन्त वेदक मुख्य शाखा एवं उपशाखा पर संछिप्त विश्लेषण

९. उपनिषद – वेदक अन्तिम फल – सुयोग्य लेल मात्र रहस्योद्घाटन करैछ – वेदान्त बनबैछ

१०. ब्रह्मसूत्र 

११. कि वेद आ वेदान्त मे टकराव अछि ?

१२. दस उपनिषद

१३. वेदक उद्देश्य आ तात्पर्य 

१४. उपनिषदक सन्देश केर सारांश

१५. वेद शाखा

१६. वेदांगः शिक्षा – वेदक नाक आ फेफड़ा

१७. वेदांगः व्याकरण – वेदक मुँह

१८. वेदांगः छन्द – वेदक पैर

१९. वेदांगः निरुक्तम् – वेदक कान

२०. वेदांगः ज्योतिष – वेदक आँखि

२१. वेदांगः कल्प – वेदक हाथ

२२. वेदक उपांग – मीमांसा

२३. वेदक उपांग – न्याय

२४. वेदक उपांग – पुराणः वेद केर आवर्धक काँच (मैग्नीफाइंग ग्लास)

२५. वेदक उपांगः धर्म शास्त्र – पौराणिक लक्ष्य केँ प्राप्त करबाक मार्ग

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