ब्रह्म सूत्र
हम पहिने कहने रही जे हरेक दर्शन सिद्धांत मे तीन गोट संयुक्त तत्त्व (विश्लेषण) होइत छैक, अर्थात् सूत्र, भाष्य आ वार्तिक । अपन देश मे शंकर, रामानुज, माधव, श्रीकांत (शैव सिद्धांत आचार्य) आर अन्य द्वारा प्रतिपादित विभिन्न सिद्धांत सब केँ वेदांत मत या वेदांतिक धर्म केर सामान्य नाम सँ जानल जाइत अछि । एहि मे सँ प्रत्येक आचार्य ई सिद्ध करबाक लेल तर्क प्रस्तुत करैत छथि जे खाली हुनकहि द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त टा उपनिषद मे प्रतिपादित अछि । दस प्रमुख उपनिषद सब पर भाष्य या टीका हुनका लोकनि द्वारा लिखल गेल अछि । एहि लेल, वेदान्तिक धर्म वास्ते, उपनिषद सूत्रक भूमिका निभबैत अछि ।
ई खाली कहबाक टा लेल अछि । वास्तव मे, उपनिषद सूत्र नहि छी आ नहिये ओकर समाने अछि ।
सूत्र केहेन हेबाक चाही ? सूत्र सूक्ति सब थिक जाहि मे विचार सब केँ प्रक्षेपति (उत्पन्न) करबाक लेल शब्दक न्यूनतम प्रयोग रहैत छैक । यैह लेल, एहि परिभाषाक मुताबिक, उपनिषद केँ सूत्र नहि कहल जा सकैत छैक । हालाँकि, सूत्र केर रूप मे एकटा मूल ग्रन्थ विद्यमान अछि जाहि मे उपनिषद सब द्वारा प्रतिपादित बात सब समाहित अछि ।
ई ब्रह्म सूत्र थिक जेकर रचना ऋषि बादरायण कएने रहथि, जिनका ऋषि वेद व्यास केर नाम सँ सेहो जानल जाइत छन्हि । बादरायण केँ ई नाम एहि लेल देल गेलनि कियैक तँ ओ किछु समय बदरी गाछक नीचाँ निवास कएने रहथि । ब्रह्म सूत्र सब पर कतेको भाष्य अछि, जे भाष्यकार लोकनिक दर्शनशास्त्र पर निर्भर करैत अछि । जीव कि थिक ? (आत्मा) ? जगत (ब्रह्माण्ड) कि थिक जाहि मे ओ रहैत अछि ? ओ मूल तत्त्व कि अछि जे एकरा सभक मूल कारण थिक ? ई तीन गोट महत्वपूर्ण विषय अछि जेकरा ब्रह्म सूत्र मे वर्णन कयल गेल अछि, जे वेदान्तिक सिद्धान्त सँ सम्बन्धित सब विषय सभक सन्दर्भ ग्रन्थ अछि ।
लेकिन एकर तात्पर्य व्यास केर अपन व्याख्या दय सँ नहि अछि । ओ एकरा पहिनहिं सँ विद्यमान उपनिषद सभक ज्ञान केर आधार पर लिखने छलथि । चूँकि उपनिषद वेद केर उत्तरार्द्ध थिक, तेँ एकरा मीमांसा कहल जाइत छैक आ ब्रह्म सूत्र सेहो उत्तर मीमांसेक हिस्सा थिक ।
एहि पुस्तक मे लगभग ५०० (५५५) सूत्र अछि, जे चार अध्याय मे विभाजित अछि । प्रत्येक अध्याय केर चारि टा भाग छैक । कुल मिलाकय, एहि मे १९२ अधिकरण या खंड अछि ।
चूँकि ब्रह्म सूत्र संन्यासी लोकनिक लक्ष्य सँ निर्णायक रूप सँ सम्बन्धित अछि, तेँ एकरा भिक्षु सूत्र सेहो कहल जाइत छैक । (भिक्षु = एक तपस्वी भिक्षु) । चूँकि ओ शरीर केर भीतर आत्माक खोज छी, तेँ एकरा शरीरिका मीमांसा सेहो कहल जाइछ ।
सूत्र शब्दक अर्थ डोरी सेहो होइत छैक । मंगल सूत्र (शुभ धागा जे एकटा विवाहित महिला अपन गला मे पहिरैत छथि) केर नाम ओहि मे प्रयुक्त डोरीक कारण पड़ल छैक । एहि कल्पना केँ ध्यान मे रखैत आदि शंकराचार्य अपन भाष्य मे एक स्थान पर कहैत छथि:
“वेदान्त वाक्य कुसुमाग्रथनत्वात्”
वेद वृक्ष सँ खसल वेदान्तक पुष्प केर माला केँ कियो केना धारण कय सकैछ, जाबत धरि ओ माला मे गूँथल नहि जाय ? तेँ, ब्रह्म सूत्रे ओ सूत्र थिक जे ओकरा एक सूत्र मे बन्हैत अछि, एना आचार्य कहैत छथि । यदि आइ ब्रह्म सूत्र हिंदू धर्म सँ जुड़ल सब परंपरा आ सिद्धान्त सभक प्रमाण थिक, तँ ब्रह्म सूत्र केर पाछूक प्रमाण उपनिषद थिक ।
एहि द्वारे वैदिक धर्म केर सब सम्प्रदायक औपनिषदिक धर्म, अर्थात् उपनिषद केर धर्म, कहल जाय लागल अछि ।
चूँकि उपनिषद वेदक सबसे महत्वपूर्ण भाग थिक, तेँ एकरा “श्रुति शिरस” या वेदक शीर्ष सेहो कहल जाइत छैक, कियैक तँ शीर्ष शरीर केर सबसँ महत्वपूर्ण अंग थिक ।
हरिः हरः!!
Brahma Sutra
I said earlier that every philosophy doctrine contains three conjuncts, viz., Sutra, Bhaashya and Vaartika. The various doctrine propounded by Sankara, Ramanuja, Madhava, Srikanta (Saiva Siddhaanta Acharya) and others in our country are called by the generic name of Vedanta Mata or – Vedaantic religion. Each of these Acharyas adduces arguments to prove that only the doctrine he propounds alone is enunciated in the Upanishads. Bhaashyas or commentaries on the ten principal Upanishad have been written by them. Therefore, for the Vedaantic religion, the Upanishads play the role of Sutras.
It is only so in a manner of speaking. In actual fact, the Upanishads are not and are not like Sutras (Aphorisms).
How should a Sutra be? Sutras are aphorisms with minimal use of words to project a thought. That is why, according to this definition, Upanishads cannot be called Sutras. However, there exists in the form of aphorisms a basic text containing all that the Upanishads propound.
These are the Brahma Sutras composed by Sage Baadaraayana, also known as Sage Veda Vyasa. Baadaraayana was so called as lived for some time under a Badari tree. There are several commentaries on the Brahma Sutras depending upon the school of philosophy followed by the commentator. What is Jiva? (Soul)? What is Jagat (Universe) in which it lives? What is the basic material (Tatvam) that is the root cause of all this? These are the three important matters which are dealt with in Brahma Sutras which is the book of reference in all matters pertaining to Vedantic doctrine.
But even this does not purport to give Vyasa’s own interpretation. He wrote it on the basis of the knowledge of the Upanishads already existing. Since the Upanishads form the latter part of the Vedas, they are called Mimaamsa and the Brahma Sutras also, therefore, form part of Uttara Mimaamsaa.
There are about 500-odd (555) Sutras in the book which is divided into four chapters. Each chapter has four parts. Altogether, there are 192 adhikaranas or sections.
Since the Brahma Sutra deals conclusively with the goal of Sanyaasis, it is called Bikshu Sutra also. (Bikshu = an ascetic mendicant). Since it is an enquiry into the Atma (Soul) within the Sareera (body), it is also called Sareerika Mimaamsaa.
The word Sutra means also a string. The Managala Sutra (auspicious thread) which a married lady wears on her neck) derives its name from the string used in it. Keeping the imagery in view, Adi Sankara, in his Bhaashya, says in some place:
“Vedaanta Vaakya Kusumagrthanatwaat”
How can one wear the garland of loose Vedantic flowers which the Vedic tree has shed, unless they are strung into a garland? Therefore, the Brahma Sutra is the string which holds them together, so says the Acharya. If today Brahma Sutra is the authority for all the traditions and doctrines attributed to what is known as the Hindu religion, then the authority behind the Brahma Sutra is the Upanishads.
That is why all denominations of Vedic religion have come to be called Oupanishadic religion, meaning religion of the Upanishad.
Since the Upanishads are the most important part of the Vedas they are also called “Sruti Siras” or the head of Vedas, since the head is the most important part of a body.
ब्रह्म सूत्र
मैंने पहले कहा था कि प्रत्येक दर्शन सिद्धांत में तीन संयुक्त तत्त्व होते हैं, अर्थात् सूत्र, भाष्य और वार्तिक । हमारे देश में शंकर, रामानुज, माधव, श्रीकांत (शैव सिद्धांत आचार्य) और अन्य द्वारा प्रतिपादित विभिन्न सिद्धांतों को वेदांत मत या वेदांतिक धर्म के सामान्य नाम से जाना जाता है । इनमें से प्रत्येक आचार्य यह सिद्ध करने के लिए तर्क प्रस्तुत करते हैं कि केवल उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत ही उपनिषदों में प्रतिपादित है । दस प्रमुख उपनिषदों पर भाष्य या टीकाएँ उनके द्वारा लिखी गई हैं । इसलिए, वेदांतिक धर्म के लिए, उपनिषद सूत्रों की भूमिका निभाते हैं ।
यह केवल कहने के लिए ही है । वास्तव में, उपनिषद सूत्र नहीं हैं और न ही उनके समान हैं ।
सूत्र कैसा होना चाहिए ? सूत्र सूक्तियाँ हैं जिनमें विचारों को प्रक्षेपित करने के लिए शब्दों का न्यूनतम प्रयोग होता है । इसीलिए, इस परिभाषा के अनुसार, उपनिषदों को सूत्र नहीं कहा जा सकता । हालाँकि, सूत्रों के रूप में एक मूल ग्रंथ विद्यमान है जिसमें उपनिषदों द्वारा प्रतिपादित सभी बातें समाहित हैं ।
ये ब्रह्म सूत्र हैं जिनकी रचना ऋषि बादरायण ने की थी, जिन्हें ऋषि वेद व्यास के नाम से भी जाना जाता है । बादरायण को यह नाम इसलिए दिया गया क्योंकि उन्होंने कुछ समय बदरी वृक्ष के नीचे निवास किया था । ब्रह्म सूत्रों पर कई भाष्य हैं, जो भाष्यकार के दर्शनशास्त्र पर निर्भर करते हैं । जीव क्या है ? (आत्मा) ? जगत (ब्रह्मांड) क्या है जिसमें वह रहता है ? वह मूल तत्व (तत्वम्) क्या है जो इन सबका मूल कारण है ? ये तीन महत्वपूर्ण विषय हैं जिनका ब्रह्म सूत्रों में वर्णन है, जो वेदान्तिक सिद्धांत से संबंधित सभी विषयों का संदर्भ ग्रंथ है ।
लेकिन इसका तात्पर्य व्यास की अपनी व्याख्या देने से नहीं है । उन्होंने इसे पहले से विद्यमान उपनिषदों के ज्ञान के आधार पर लिखा था । चूँकि उपनिषद वेदों का उत्तरार्द्ध हैं, इसलिए इन्हें मीमांसा कहा जाता है और ब्रह्म सूत्र भी उत्तर मीमांसा का ही हिस्सा हैं ।
इस पुस्तक में लगभग ५०० (५५५) सूत्र हैं, जो चार अध्यायों में विभाजित हैं । प्रत्येक अध्याय के चार भाग हैं । कुल मिलाकर, इसमें १९२ अधिकरण या खंड हैं ।
चूँकि ब्रह्म सूत्र संन्यासियों के लक्ष्य से निर्णायक रूप से संबंधित है, इसलिए इसे भिक्षु सूत्र भी कहा जाता है । (भिक्षु = एक तपस्वी भिक्षु) । चूँकि यह शरीर के भीतर आत्मा की खोज है, इसलिए इसे शरीरिका मीमांसा भी कहा जाता है ।
सूत्र शब्द का अर्थ डोरी भी होता है । मंगल सूत्र (शुभ धागा जिसे एक विवाहित महिला अपने गले में पहनती है) का नाम उसमें प्रयुक्त डोरी के कारण पड़ा है । इस कल्पना को ध्यान में रखते हुए, आदि शंकराचार्य अपने भाष्य में एक स्थान पर कहते हैं:
“वेदान्त वाक्य कुसुमाग्रथनत्वात्”
वेद वृक्ष से गिरे हुए वेदान्त के पुष्पों की माला को कोई कैसे धारण कर सकता है, जब तक कि उन्हें एक माला में पिरोया न जाए ? इसलिए, ब्रह्म सूत्र ही वह सूत्र है जो उन्हें एक सूत्र में बाँधता है, ऐसा आचार्य कहते हैं । यदि आज ब्रह्म सूत्र हिंदू धर्म से जुड़ी सभी परंपराओं और सिद्धांतों का प्रमाण है, तो ब्रह्म सूत्र के पीछे का प्रमाण उपनिषद हैं ।
इसीलिए वैदिक धर्म के सभी संप्रदायों को औपनिषदिक धर्म, अर्थात् उपनिषद का धर्म, कहा जाने लगा है ।
चूँकि उपनिषद वेदों का सबसे महत्वपूर्ण भाग हैं, इसलिए इन्हें “श्रुति शिरस” या वेदों का शीर्ष भी कहा जाता है, क्योंकि शीर्ष शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है ।
हरिः हरः!!

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Bahut sundar varnan kel gel chhai. Vaidik darmak jate sampraday chhai okar sabsampradayak upnisad k dharma kahal jay lagal chhai.
“वेदान्त वाक्य कुसुमाग्रथनत्वात्”