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बड़साइत पावनि जेठ मासक अमावस्या कें बनाओल जाइत अछि

19 भ्यूज

लेख विचार
प्रेषित: माला झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :-  बरसाइत पाबनि : मिथिलाक संस्कृति आ वटसावित्री  व्रतक महत्व

“बरसाइत” पाबनि सुहागिन स्त्री सभक लेल एकटा अत्यंत पवित्र आ महत्वपूर्ण पाबनि अछि। ई व्रत मुख्य रूप सँ ज्येष्ठ मासक अमावस्या तिथि में मनाओल जाइत अछि। ई पाबनि पति-पत्नीक अटूट प्रेम, निष्ठा आ पतिव्रता धर्मक प्रतीक अछि। एहि दिन स्त्री सभ अपन पतिक दीर्घायु, सुखी वैवाहिक जीवन आ परिवारक सुख-समृद्धि हेतु व्रत राखैत छथि आ वट (बरगद) वृक्षक पूजा करैत छथि। ई पाबैन मात्र कर्म काण्ड नहि,बल्कि स्त्रीक ओहि शक्तिक उत्सव अछी, जे असंभव के संभव बना सकैत अछी,सुख शान्तिक मानल जाइत अछी । वट सावित्री व्रतक महत्व अखंड सौभाग्य: एहि व्रत कें मुख्य उद्देश्य पति कें लंबी आयु प्रदान करनाय अछि। मान्यता अछि जे एहि दिन पूजा कइला सँ पति पर आबय वाला हर संकट टरि जाइत अछि।वट वृक्ष मे त्रिदेव: बरगदक गाछ मे ब्रह्मा, विष्णु आ महेशक वास मानल जाइत अछि। वट वृक्ष कें अमरताक प्रतीक सेहो मानल जाइत अछि, ताहि लेल एहि वृक्ष कें पूजा सँ सुहाग अमर रहैत अछि। सावित्री-सत्यवान कथा: पौराणिक कथाक अनुसार, सावित्री अपन मृत पति सत्यवान कें यमराज सँ अपन तप आ बुद्धिमत्ताक बल पर वापस लए आनने छलथि। ई कथा स्त्री सभ कें धैर्य आ शक्ति प्रदान करैत अछि।मिथिला मे परंपरा: मिथिला मे नवविवाहिता सभक लेल इ व्रत विशेष होइत अछि। एहि दिन स्त्री सभ कच्चा सूत सँ बरगदक गाछ मे ५,७, वा ११ बेर परिक्रमा कयल जाइत अछि। वट सावित्री व्रत कथा कथाक अनुसार, मद्र देशक राजा अश्वपतिका पुत्री सावित्री, सत्यवान सँ विवाह कयलनि, जे घुमत्सेन नामक अंधा राजाक पुत्र छलथि। नारद मुनि सावित्री कें बतौने छलाह जे सत्यवानक आयु बहुत कम अछि, मुदा सावित्री विवाह कयलनि।विवाहक एक वर्ष बाद, जखन सत्यवान जंगल मे काठ काटैत सांझक बेला मे बेहोश भऽ कऽ खसि पड़लाह, तखन यमराज ओकर प्राण लैबय अयलाह। सावित्री यमराजक पाछु-पाछु चलि पड़लीह। सावित्रीक पतिव्रता धर्म आ ज्ञान सँ प्रसन्न भऽ यमराज सत्यवानक प्राण छोड़ि देलनि। सावित्री अपन बुद्धि सँ अपन ससुरक गमाओल राज्य, आँखि आ  पिताक संतान सुख सेहो माँगलनि। पूजा विधि स्त्री सभ दिनभरि उपवास राखैत छथि। वट वृक्ष कें जल सँ सींचि, रोली, मौली, फूल आ कच्चा सूत सँ पूजा करैत छथि। भीजल मूंग , चना, फल आ बाँसक बियेन (पंखा) सँ पूजा कयल जाइत अछि। वट सावित्री व्रत कथा सुनय सँ पुण्य फल भेटैत अछि। पहिने गौरिक पूजा तखन, बिसहराक पूजा , तखन सती सावित्री के पूजा आ बड़क गाछक। पूजाक उपरांत आम आर जल लए बरक गाछक प्रदक्षिणा करैछ आ कच्चा सूत सँ गाछ के बनहै छैक। बांसक बिऐन डोलाकए आँचर सँ शीतल हवा होंकल जाइत अछि । तकर बाद बड़क गाछ सँ गला मिलल जाइत अछि । पहिल बेर वा पांच साल तक, तेल – सिंदूर , ओंकरी आ सुपारी बिलहल जाए छैक । अहिबाती सभ नूनक परित्याग करैत अछी । नव विवाहित एकभूत करैत अछि । बड़क गाछ प्रकृति के अनुपम वरदान हमरा लोकनिक लेल अछि । ई पाबैन मिथिलाक घर- घर मे हर्षौल्लासक संग मनाओल जाईत अछि । एही व्रत के पौराणिक , सामाजिक आ पर्यावरणीय महत्व एतेक गहिंर अछि जे वर्तमान समय मे सेहो प्रासंगिक बनल अछि ।पूजाक बाद श्रेष्ठ सभक चरण स्पर्श कऽ आशीर्वाद लैत छथि। बट सावित्री व्रत केवल एकटा परंपरा नहि, बल्कि ई नारी शक्ति आ निष्ठाक प्रतीक अछि। ई पर्व समाज कें सेहो संदेश दैत अछि जे अटूट प्रेम आ विश्वास सँ मृत्यु कें सेहो हरायल जा सकैत अछि। एहि दिन स्त्री सभ “जन्म-जन्म सावित्री होय” कें कामना क’ कऽ अखंड सुहागक वरदान माँगैत छथि । स्त्री लोकनी अपन पति के दीर्घायु आ सुखद दाम्पत्य जीवनक लेल ई व्रत करैत छथि । जय मिथिला जय मैथिली।

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