लेख विचार
प्रेषित: नीलम ठाकुर
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- दहेजक दंश
“मिथिलानी लेल दहेजक दंश आखिर कहिया तक”
दहेज समाजक ओ अभिशाप अछि जे आजुओ असंख्य बेटी सभक जीवन बर्बाद कऽ रहल अछि। मिथिला, जे ज्ञान, संस्कार आ सभ्यताक भूमि कहल जाइत अछि, ओतहु दहेज प्रथा धीरे-धीरे एकटा गंभीर सामाजिक समस्या बनि गेल अछि। “मिथिलानी लेल दहेजक दंश आखिर कहिया तक” ई प्रश्न प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति केँ सोचबाक लेल मजबूर करैत अछि।
मिथिला मे बेटी केँ लक्ष्मी मानल जाइत अछि। कन्यादान केँ पवित्र काज कहल जाइत अछि, मुदा आजुक समय मे विवाह एक प्रकारक व्यापार बनैत जा रहल अछि। लड़काक शिक्षा, नौकरी आ परिवारक प्रतिष्ठाक आधार पर दहेजक माँग होइत अछि। गरीब परिवार बेटी विवाह लेल कर्ज मे डूबि जाइत छथि। कतेको पिता अपन जमीन-जायदाद बेचि दैत छथि, तखनो बेटी सुखी नहि रहि पाबैत अछि।
दहेज केवल आर्थिक बोझ नहि, बल्कि मानसिक आ सामाजिक पीड़ा सेहो अछि। विवाहक बाद यदि दहेज कम भेटल, तँ बहू केँ ताना, अपमान, मारपीट आ अत्याचार सहय पड़ैत अछि। अनेक मिथिलानी एहि पीड़ा सँ गुजरैत छथि, मुदा समाजक डर सँ आवाज नहि उठा पाबैत छथि। कतेको बेटी आत्महत्या करय लेल मजबूर भऽ जाइत छथि। ई स्थिति अत्यंत दुखद अछि।
सब सँ दुःखद बात ई अछि जे शिक्षित समाज सेहो एहि कुप्रथा केँ बढ़ावा दैत अछि। जँ पढ़ल-लिखल लोक दहेज माँगता, तँ समाज केँ सही दिशा कोन देत? विवाह प्रेम, विश्वास आ सम्मानक बंधन होबाक चाही, नहि कि धन-दौलतक सौदा।
दहेज प्रथा समाप्त करबाक लेल समाज केँ एकजुट होमय पड़त। माता-पिता केँ बेटी केँ बोझ नहि, बल्कि आत्मनिर्भर बनाबय पड़त। लड़का पक्ष केँ सेहो शपथ लेबाक चाही जे ओ दहेज नहि लेत। युवा पीढ़ी जँ ठानि लेत जे बिना दहेज विवाह करब, तँ समाज बदलि सकैत अछि। सरकारक कानून सेहो कठोर अछि, मुदा केवल कानून सँ नहि, मानसिकता बदलला सँ परिवर्तन आएत।
मिथिलानी सभ सदिखन संस्कार, त्याग आ सम्मानक प्रतीक रहल छथि। आब समय आबि गेल अछि जे हुनका दहेजक दंश सँ मुक्त कयल जाए। बेटी सम्मान छी, बोझ नहि। जतेक जल्दी समाज ई बात बुझत, ओतेक जल्दी दहेज नामक अभिशाप समाप्त होएत।
अंत मे, हम सब केँ अपन मन सँ पूछबाक आवश्यकता अछि — “आखिर मिथिलानी दहेजक पीड़ा कहिया तक सहत?” आब समय विरोध करबाक अछि, ताकि आबै वाली पीढ़ी सुरक्षित आ सम्मानजनक जीवन जी सकए।
