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श्रीमद्भागवद्गीता – प्रथम अध्याय (अंग्रेजी-हिन्दी-मैथिली)

51 भ्यूज

स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वतीक अंग्रेजी अनुवाद ओ भाष्य केर मैथिली अनुवाद

ॐ श्री परमात्मने नमः !!

ŚRĪMAD-BHAGAVAD-GĪTĀ

॥प्रथमोऽध्यायः॥

धृतराष्ट्र उवाच ।

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ॥
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥१॥

Dhṛtarāstra said:

Tell me, O Sañjaya! Assembled on Kuruksetra, the centre of religious activity, desirous to fight, what indeed did my people and the Pandavas do?

True it is that the two parties were gathered together for battle, but was the influence of Kurukşetra, the sacred centre of religious and spiritual activity from of old, barren of any result?

Did not the spiritual influence of the spot affect any of the leaders in a way unfavourable to the occurrence of the battle? is the purport of Dhrtarāştra’s question.

धृतराष्ट्र ने कहा:

हे संजय, मुझे बताओ! धार्मिक गतिविधियों के केन्द्र कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्रित हुए मेरे लोगों और पांडवों ने असल में क्या किया ?

यह सच है कि दोनों पक्ष युद्ध के लिए एकत्रित हुए थे, लेकिन क्या कुरुक्षेत्र, जो कि पुराने समय से धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यों के लिये पावन केन्द्र रहा था, इसका प्रभाव से कोई नतीजा नहीं निकला ?

क्या उस जगह का आध्यात्मिक प्रभाव ने किसी भी नेतृत्वकर्ताओं पर इस तरह असर नहीं डाला जिससे युद्ध होने में मददगार न हो ? धृतराष्ट्र के सवाल का यही मतलब है ।

धृतराष्ट्र कहलनि:

हे संजय, हमरा बताउ ! धार्मिक कार्यक केन्द्र कुरुक्षेत्र मे युद्धक इच्छा सँ जमा भेल हमर आ पांडव केर लोक कि कयलक ? 

ई सच अछि जे दुनू पक्ष युद्धक लेल जमा भेल छल, मुदा कि कुरुक्षेत्र, जे कि प्राचीन समय सँ धार्मिक आ आध्यात्मिक कार्यक लेल पवित्र केन्द्र रहल छल, तेकर प्रभाव सँ कोनो परिणाम नहि निकलल की ? 

कि ओहि स्थानक आध्यात्मिक प्रभाव कोनो नेतृत्वकर्ता लोकनि पर एहि तरह केर प्रभाव नहि देलक जाहि सँ युद्ध होयबा मे मदति नहि करय ? धृतराष्ट्र केर सवालक यैह मतलब अछि ।

सञ्जय उवाच ।

दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ॥
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥२॥

Sañjaya said:

But then King Duryodhana, having seen the Pandava forces in battle-array, approached his teacher Droņa, and spoke these words:

Sañjaya’s reply beginning with “But then” and describing Duryodhana’s action is a plain hint to the old king that his son was afraid. For he went to his teacher (regarded as father) instead of to the commander-in-chief, as a child in fright would run to its parents in preference to others.

संजय ने कहा:

लेकिन तभी राजा दुर्योधन ने पांडव सेना को युद्ध की तैयारी में देखकर अपने गुरु द्रोण के पास जाकर ये शब्द कहे:

संजय का जवाब “लेकिन फिर” से शुरू होता है और दुर्योधन की हरकत के बारे में बताता है, यह बूढ़े राजा को साफ इशारा है कि उनका बेटा डर गया था । क्योंकि वह सेनापति के बजाय अपने गुरु (जिन्हें पिता माना जाता है) के पास गया, जैसे डरे हुए बच्चे दूसरों के बजाय अपने माता-पिता के पास भागते हैं ।

संजय कहलनि:

मुदा तखन राजा दुर्योधन पांडव सेनाक युद्ध लेल सजल पाँति (तैयारी अबस्था) मे देखिकय अपन गुरु द्रोण लग जाकय ई शब्द बजलाह:

संजय केर जवाब “मुदा तखन” सँ शुरू होइत अछि आर दुर्योधन केर किरदानीक सम्बन्ध मे कहैत छथि, ई वृद्ध राजा केँ स्पष्ट संकेत रहनि जे हुनकर बेटा डरा गेल रहय । कियैक तँ ओ सेनापतिक बदला अपन गुरु (जिनका पिता मानल जाइत अछि) लग गेलाह, जेना डरायल धियापुता (बच्चा) दोसरक बदला अपन माय-बाप लग भागैत अछि । 

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ॥
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥३॥

“Behold, O Teacher! this mighty army of the sons of Pandu, arrayed by the son of Drupada, thy gifted pupil.

As a scorpion would sting even him whose protection is sought to be free from fear, so did the wicked Duryodhana insult his teacher. His meaning in plain words comes to this: thus think of your stupidity in teaching the science of fight to the son of Drupada and to those of Pandu. They are now arrayed to kill you!

“देखें, हे गुरुदेव ! पांडु के पुत्रों की यह बड़ी सेना, आपके प्रतिभाशाली शिष्य ‘द्रुपद के बेटे’ के साथ खड़ी है ।

जैसे बिच्छू उसको भी डंक मार देता है जिसकी सुरक्षा उसको भय से मुक्त बनानेवाली होती है, वैसे ही दुष्ट दुर्योधन ने अपने गुरु का अपमान किया है । साफ शब्दों में उसका कहना यह है: आप इस तरह सोचिये कि आपने द्रुपद के बेटे और पांडु के बेटों को युद्ध की विद्या सिखाकर कितनी बेवकूफी की । वे अब आपको मारने के लिए (युद्ध में) तैयार हैं !

“देखल जाउ, हे गुरुदेव ! पांडुक पुत्र सभक ई बड़का सेना, अपनेहिक प्रतिभाशाली शिष्य ‘द्रुपद केर पुत्र’ केर संग ठाढ़ अछि ।

जेना बिच्छू ओकरो डंक मारि दैत छैक जेकर सुरक्षा ओकरा भय सँ मुक्त करयवला रहैत छैक, तहिना दुष्ट दुर्योधन अपन गुरुक अपमान कयलनि । स्पष्ट शब्द मे ओकर कहबाक मतलब ई छैक: अपने एना सोचू जे अहाँ द्रुपद केर बेटा आर पांडुक बेटा सब केँ युद्धक विद्या सिखाकय कतेक बेवकूफी कयलहुँ । ओ सब आब अहाँ केँ मारबाक लेल तैयार अछि !

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ॥
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥४॥
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ॥
पुरुजित् कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥५॥
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ॥
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥६॥

“Here (are) heroes, mighty archers, the equals in battle of Bhima and Arjuna the great warriors Yuyudhāna, Virāța, Drupada; the valiant Dhrstaketu, Cekitāna, and king of Kāśī;, the best of men, Purujit, Kuntibhoja, and Saibya; the powerful Yudhāmanyu, and the brave Uttamaujas, the son of Subhadra and the sons of Draupadi – all of whom are lords of great chariots.

Maharathah (महारथ): great-charioted: one who is well-versed in the science of war and commands eleven thousand bowmen.

“यहाँ वीर, शक्तिशाली धनुर्धर, युद्ध में भीम और अर्जुन के बराबर, महान योद्धा युयुधान, विराट, द्रुपद; बहादुर धृष्टकेतु, चेकितान, और काशी के राजा; पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ, पुरुजित, कुंतीभोज, और शैब्य; शक्तिशाली युधामन्यु, और बहादुर उत्तमौजा, सुभद्रा के बेटे और द्रौपदी के बेटे – ये सभी बड़े रथों के स्वामी हैं ।

महारथ: महान रथ वाला: वह जो युद्ध की विद्या में पारंगत हो और ग्यारह हज़ार धनुर्धारियों का नेतृत्व करता हो ।

“एतय वीर, शक्तिशाली धनुर्धर, युद्ध मे भीम आ अर्जुनक बराबर, महान योद्धा लोकनि युयुधान, विराट, द्रुपद; बहादुर धृष्टकेतु, चेकितान, आर काशीक राजा; पुरुष लोकनि मे सर्वश्रेष्ठ, पुरुजित, कुंतीभोज, आर शैब्य; शक्तिशाली युधामन्यु, आर बहादुर उत्तमौजा, सुभद्राक बेटा आ द्रौपदीक बेटा – ई सब महान रथ केर स्वामी सब छथि ।

महारथ: महान रथवला: ओ जे युद्ध केर विद्या मे पारंगत होइथ तथा एगारह हजार धनुर्धारी लोकनिक नेतृत्व करैत होइथ ।

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ॥
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥७॥

“Hear, also, O Best of the twice-born! the names of those who (are) distinguished amongst ourselves, the leaders of my army. These I relate (to you) for your information.

However well-versed in the science of war you might be, you are after all a Brahmaņa (best of the twice-born), a lover of peace, that is to say, a coward. It is therefore natural for you to be afraid of the Pandava force. But take heart, we too have great warriors in our ranks – is the veiled meaning of Duryodhana’s words.

“हे द्विजों में श्रेष्ठ ! उनलोगों के नाम भी सुनें जो हमलोगों के बीच में गणमान्य (प्रतिष्ठित लोग) हैं, मेरी सेना के नेतृत्वकर्ता लोग हैं । ये मैं आपकी जानकारी के लिए आपको बता रहा हूं ।

आप युद्ध विज्ञान में कितने भी पारंगत क्यों न हों, आखिरकार आप एक ब्राह्मण (द्विजों में सर्वश्रेष्ठ), शांति प्रेमी, कहने का तात्पर्य, एक कायर हैं । अत: पांडव सेना से आपका भयभीत होना स्वाभाविक है । लेकिन हिम्मत रखो, हमारी सेना में भी महान योद्धा हैं – दुर्योधन के शब्दों का परोक्ष अर्थ यही है ।

“हे द्विज लोकनि मे श्रेष्ठजन ! हुनका लोकनिक नाम सेहो सुनू जे हमरा सभक बीच मे गणमान्य (प्रतिष्ठित लोक सब) छथि, हमर सेनाक नेतृत्वकर्ता सब जे छथि । ई हम अपनेक जानकारी वास्ते अपने केँ कहि रहल छी ।

अपने युद्ध विज्ञान मे कतबो पारंगत कियैक नहि होइ, आखिरकार अपने एकटा ब्राह्मण (द्विज मे सर्वश्रेष्ठ), शान्ति प्रेमी, कहबाक तात्पर्य जे, एक डरपोक लोक छी । तेँ पांडव सेना सँ अपनेक भयभीत होयब स्वाभाविक अछि । मुदा हिम्मत राखू, हमर सेना मे सेहो महान योद्धा सब छथि – दुर्योधनक शब्द केर परोक्ष अर्थ यैह छन्हि ।

भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः ॥
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिर्जयद्रथः ॥८॥

“Yourself and Bhīşma and Karņa and Krpa, the victorious in war. Aşvatthāmā and Vikarņa and Jayadratha, the son of Somadatta.

Afraid lest he had said too much, Duryodhana is flattering Droņa, by mentioning the latter before even Bhişma and qualifying Drona’s brother-in-law with the phrase “victorious in war”, a move likely to touch the heart of mortals.

“आप स्वयं और भीष्म और कर्ण और कृपा, युद्ध में हमेशा विजयी । अश्वत्थामा और विकर्ण और सोमदत्त का बेटा जयद्रथ ।

डर है कि कहीं उसने ज़्यादा न कह दिया हो, इसलिए दुर्योधन द्रोण की चापलूसी कर रहा है, भीष्म से भी पहले द्रोण का ज़िक्र करके और द्रोण के साले को “युद्ध में विजयी” कहकर, यह बातें जो इंसानों के दिल को छू सकती है ।

“अपने स्वयं आर भीष्म आर कर्ण आर कृपा, युद्ध मे जितनिहार । अश्वत्थामा आर विकर्ण आर सोमदत्तक बेटा जयद्रथ ।

डर भेलनि जे कहीं बेसी नहि कहि देने होइयनि, तेँ दुर्योधन द्रोणक खुशामद कय रहल छथि, भीष्महु सँ पहिने द्रोणक जिकिर कयकेँ आ द्रोणक सार (कृपाचार्य) केँ “युद्ध मे जितनिहार” कहिकय, एहेन बात सब जे लोकक हृदय केँ छुबि सकैत अछि । 

अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ॥
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥९॥

“And many other heroes also, well-skilled in fight, and armed with many kinds of weapons, are here, determined to lay down their lives for my sake.

“और भी बहुत से नायक हैं, जो लड़ाई में माहिर हैं, और कई तरह के हथियारों से लैस हैं, और मेरे लिए अपनी जान देने का पक्का इरादा कर चुके हैं ।

“आरो बहुते रास नायक सब छथि, जे लड़ाइ मे माहिर छथि, आर कतेको प्रकारक हथियार सब सँ लैस छथि, आर हमरा लेल अपन जान तक दय देबाक पकिया नेत बना चुकल छथि ।

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ॥
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥१०॥

“This our army defended by Bhīşma (is) impossible to be counted, but that army of theirs, defended by Bhīma (is) easy to number.

In ancient Indian warfare, one commanding a force had for his mainstay a defender about him, whose position was no less important. Here are given the names of the chief defenders, and not of the chief commanders.

The verse is often interpreted to mean that Duryodhana considers his army inefficient and that of the enemy efficient. But this view seems inapposite to the context.

“हमारी यह सेना, जिसका बचाव भीष्म ने किया है, उसकी गिनती करना नामुमकिन है, लेकिन उनकी वह सेना, जिसका बचाव भीम ने किया है, उसकी गिनती करना आसान है ।

पुराने भारतीय युद्ध में, सेना की कमान संभालने वाले का मुख्य आधार उसके आस-पास एक रक्षक होता था, जिसकी स्थिति भी कम महत्वपूर्ण नहीं थी । यहाँ मुख्य रक्षकों के नाम दिए गए हैं, मुख्य सेनापतियों के नहीं ।

इस श्लोक का अक्सर यह मतलब निकाला जाता है कि दुर्योधन अपनी सेना को नाकाबिल और दुश्मन की सेना को काबिल समझता है । लेकिन यह बात संदर्भ के हिसाब से सही नहीं लगती ।

“हमरा लोकनिक ई सेना, जेकर बचाव भीष्म द्वारा भेल अछि, तेकर गिनती करब असम्भव अछि, मुदा ओकरा लोकनिक सेना, जेकर बचाव भीम द्वारा भेल अछि, तेकर गिनती करब आसान अछि ।

पहिलुका भारतीय युद्ध सब मे, सेनाक कमान सम्हारनिहारक मुख्य आधार ओकर आस-पास एकटा रक्षक होइत छलैक, जेकर स्थिति सेहो कम महत्वपूर्ण नहि रहैक । एतय मुख्य रक्षक सभक नाम देल गेल अछि, मुख्य सेनापति सभक नहि । 

एहि श्लोक केँ अक्सर यैह मतलब निकालल जाइत अछि जे दुर्योधन अपन सेना केँ अपर्याप्त (नाकाबिल) आर दुश्मन केर सेना केँ पर्याप्त (काबिल) बुझैत छथि । मुदा ई बात सन्दर्भक हिसाब सँ सही नहि लगैत अछि । 

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ॥
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥११॥

“(Now) do, being stationed in your proper places in the divisions of the army, support Bhīşma alone.”

Since I cannot expect from you any initiative, do what you are told to do seems to be Duryodhana’s intention.

“(अब) सेना की टुकड़ियों में अपने उचित स्थानों पर तैनात रहकर अकेले भीष्म का सहयोग करें ।”

चूँकि मैं आपसे किसी पहल की उम्मीद नहीं कर सकता, इसलिए वही करें जो आपसे करने को कहा गया है, ऐसा लगता है कि दुर्योधन का यही इरादा है ।

“(आब) सेनाक टुकड़ी सब मे अपन उचित स्थान पर तैनात रहिकय केवल भीष्म केँ सहयोग करू ।”

चूँकि हम अहाँ सँ कोनो डेग केर उम्मीद नहि कय सकैत छी, तेँ वैह करू जे अहाँ सँ करबाक लेल कहल गेल अछि, एना लगैछ जे दुर्योधनक यैह इच्छा छन्हि । 

तस्य संजनयन्हर्ष कुरुवृद्धः पितामहः ॥
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्ख दध्मौ प्रतापवान् ॥१२॥

That powerful, oldest of the Kurus, Bhisma the grandsire, in order to cheer Duryodhana, now sounded aloud a lion-roar and blew his conch.

All eyes were turned upon Duryodhana and the penetrating intelligence of Bhīşma detected his fear; and since Droņa took no notice of Duryodhana’s words, knowing his grandson as he did, he had no difficulty in understanding that the latter had spoken to his teacher in a way which called forth Drona’s coldness instead of his enthusiasm. The grandsire’s heart was moved with pity and hence the action on his part described in the above verse. It should here be noted that this action, amounting to a challenge, really began the fight. It was the Kaurava side again which took the aggressor’s part.

कौरवों में सबसे ताकतवर, सबसे बूढ़े, भीष्म पितामह ने दुर्योधन को उत्साहित (खुश) करने के लिए अब जोर से सिंह-दहाड़ लगाई और अपना शंख बजाया ।

सबकी नज़रें दुर्योधन पर टिक गईं और भीष्म की तेज़ समझ ने उसके डर को पहचान लिया; और क्योंकि द्रोण ने दुर्योधन की बातों पर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि वे अपने पोते को जानते थे, इसलिए उन्हें यह समझने में कोई मुश्किल नहीं हुई कि दुर्योधन ने अपने गुरु से इस तरह बात की थी जिससे द्रोण में जोश नहीं बल्कि रूखापन आ गया था । पितामह का दिल दया से भर गया और इसलिए उन्होंने ऊपर दिए गए श्लोक में वर्णित की गई कार्यों को किया । यहाँ यह ध्यान देना चाहिए कि यह एक चुनौती जैसा काम था, जिसने असल में लड़ाई शुरू की । यह फिर से कौरवों की तरफ से था जिसने हमलावर का पक्ष लिया ।

कौरव पक्ष मे सब सँ बेसी ताकतवर, सब सँ बेसी बूढ़ (उमेरगर), भीष्म पितामह दुर्योधन केँ उत्साहित (खुश) करबाक लेल आब खुब जोर सँ सिंह-दहाड़ लगौलनि तथा अपन शंख बजौलनि ।

सभक नजरि दुर्योधन पर टिक गेल छल आ भीष्मक तेज समझ ओकर डर केँ चिन्हि लेलक; आर चूँकि द्रोण दुर्योधनक बात पर ध्यान नहि देलनि, कियैक तँ ओ अपन पोता केँ जनैत रहथि, तेँ हुनका ई बुझय मे कनिकबो दिक्कत नहि भेलनि जे दुर्योधन अपन गुरु सँ एहि तरहक कातय कएने छलथि जाहि सँ द्रोण मे जोश नहि बल्कि हतोत्साह उत्पन्न भ’ गेल छलन्हि । पितामह केर हृदय मे दया भरि गेलनि आर तेँ ओ उपर देल गेल श्लोक मे वर्णित क्रिया केँ कयलनि । एतय ई ध्यान देबाक चाही जे ई एकटा चुनौती वला काज छल, जे वास्तव मे युद्ध केँ शुरुआत कयलक । आर ई फेरो कौरवहि सभक दिश सँ भेल जे हमलावर केर पक्ष लेलक ।

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ॥
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥१३॥

Then following Bhisma, conchs, and kettle-drums, tabors, trumpets, and cow-horns blared forth suddenly from the Kaurava side, and the noise was tremendous.

फिर भीष्म के पीछे-पीछे कौरवों की तरफ से अचानक शंख, ढोल, नगाड़े, तुरहियां और गाय के सींग बजने लगे, और उनका शोर बहुत ज़्यादा था ।

पुनः भीष्मक पाछाँ-पाछाँ कौरव लोकनिक दिश सँ अचानक शंख, ढोल, नगाड़ा, तुरहि आर गायक सींग बाजय लागल, आर ओकर शोर बहुते बेसी छल ।

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ॥
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥१४॥

Then, also, Madhava and Pandava, stationed in their magnificent chariot yoked with white horses, blew their divine conchs with a furious noise.

फिर, माधव और पांडव, जो सफेद घोड़ों से जुड़े अपने शानदार रथ पर बैठे थे, उन्होंने ज़ोरदार आवाज़ के साथ अपने दिव्य शंख बजाए ।

पुनः, माधव व पांडव, जे उज्जर घोड़ा सब सँ  जुड़ल अपन शानदार रथ पर बैसल रहथि, ओहो लोकनि जोरदार आवाजक संग अपन दिव्य शंख बजौलनि ।

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ॥
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्ख भीमकर्मा वृकोदरः ॥१५॥

Hrsīkesa blew the Pancajanya, Dhananjaya, the Devadatta, and Vrkodara, the doer of terrific deeds, his large conch Paundra.

हृषिकेश ने पांचजन्य, धनंजय, देवदत्त और भयानक कर्म करने वाले वृकोदर ने अपना विशाल शंख पौंड्र बजाया ।

हृषिकेश पांचजन्य, धनंजय, देवदत्त आर भयानक कर्म करयवला वृकोदर अपन विशाल शंख पौंड्र बजौलनि ।

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥१६॥

King Yudhisthira, son of Kunti, blew the conch named Anantavijaya, and Nakula and Sahadeva, their Sughosa and Maņipuspaka.

कुंती के बेटे राजा युधिष्ठिर ने अनंतविजय नाम का शंख बजाया, और नकुल और सहदेव ने अपने सुघोष और मणिपुष्पक नाम का शंख बजाया ।

कुन्तीक पुत्र राजा युधिष्ठिर अनन्तविजय नामक शंख बजौलनि, आर नकुल ओ सहदेव अपन सुघोष ओ मणिपुष्पक नाम केर शंख बजौलनि ।

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ॥
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥१७॥

The expert bowman, king of Kāsi, and the great warrior Sikhandi, Dhrstadyumna, and Virāța, and the unconquered Sātyaki;

कुशल धनुर्धर, काशी के राजा, और महान योद्धा शिखंडी, धृष्टद्युम्न, और विराट, और अजेय सात्यकि;

कुशल धनुर्धर, काशीक राजा, आ महान योद्धा शिखंडी, धृष्टद्युम्न, आर विराट, आर अजेय सात्यकि;

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ॥
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक् पृथक् ॥१८॥

O Lord of Earth! Drupada and the sons of Draupadi, and the mighty-armed son of Subhadrā, all, also blew each his own conch.

हे पृथ्वी के स्वामी ! द्रुपद, द्रौपदी के पुत्रों और सुभद्रा के महाबाहु पुत्र, सभी ने अपना-अपना शंख बजाया ।

हे पृथ्वीक स्वामी ! द्रुपद, द्रौपदीक पुत्र लोकनि आर सुभद्राक महाबाहु पुत्र, सब गोटे अपन-अपन शंख बजौलनि ।

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ॥
नभश्च पृथिवीञ्चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन् ॥१९॥

And the terrific noise resounding throughout heaven and earth rent the hearts of Dhṛtarāstra’s party.

Verses 14-19 are full of hints about the superiority of the Pandava party and the consequent sure defeat of Dhrtarastra. The figure to which Sanjaya draws the old king’s attention at first taking up Bhisma’s challenge, is described by him as the Lord of Fortune and the Pandava – the best of the Pandu princes. Note also the details in which the chariot, horses, and conchs of the Pandava party are described; and finally, though the army of the Kauravas was more than a third as much again as that of the Pandavas, the noise made by the former was only tremendous, whereas that of the latter was not only tremendous but filled the earth and sky with reverberation and rent the hearts of the former.

और आसमान और धरती में गूंजने वाले भयानक शोर ने धृतराष्ट्र की सेना के दिलों को चीर दिया ।

श्लोक १४-१९ पांडव सेना की बेहतरी और परिणामस्वरूप धृतराष्ट्र की पक्की हार के बारे में संकेतों से भरे हुए हैं । संजय ने बूढ़े राजा का ध्यान सबसे पहले जिनलोगों के तरफ भीष्म की चुनौती को स्वीकार करते दिलाते हैं, वे सभी सौभाग्य के स्वामी और पांडव – पांडु राजकुमारों का सर्वश्रेष्ठ रूप में उसके द्वारा वर्णन किया गया है । उन विवरणों पर भी ध्यान दें जिसमें पांडव सेना के रथ, घोड़ों और शंखों के बारे में बताया गया है; और अन्ततः, हालांकि कौरवों की सेना पांडवों की सेना से एक तिहाई से भी अधिक संख्या में थी, परन्तु कौरवों का शोर सिर्फ बहुत अधिक था, जबकि पांडवों का शोर न सिर्फ बहुत अधिक था बल्कि उन्होंने धरती और आसमान को गूंज से भर दिया और कौरवों के दिलों को चीर दिया ।

आर आसमान व धरती मे गूंजयवला भयानक शोर धृतराष्ट्रक सेना लोकनिक हृदय केँ विदीर्ण कय देलक ।

श्लोक १४-१९ पांडव सेनाक बेहतर हेबाक आ परिणामस्वरूप धृतराष्ट्र सेनाक पक्का हारि केर बारे मे संकेत सँ भरल अछि । संजय वृद्ध राजाक ध्यान सब सँ पहिने जिनका सभक दिश भीष्म केर चुनौती केँ स्वीकार करैत दियाओल गेल अछि, से सबटा सौभाग्यक देवता आर पांडव – पांडू राजकुमार सभक सर्वश्रेष्ठ रूप मे हुनका द्वारा वर्णन कयल गेल अछि । ओहि विवरण सब पर ध्यान दियौक जाहि मे पांडव सेनाक रथ, घोड़ा आ शंख सभक बारे मे कहल गेल अछि; आर अन्ततोगत्वा, जखन कि कौरवक सेना पांडवक सेना सँ एक तिहाइयो सँ बेसी संख्या मे छल, मुदा कौरव सभक शोर टा बहुत अधिक छल, जखन कि पांडवक शोर नहि केवल बहुत अधिक छल बल्कि ओहि सँ धरती आ आसमान गुंजित भ’ उठल छल आर जे कौरव सभक हृदय केँ विदीर्ण कय देलक ।

अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ॥
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ॥१-२०॥

Then, O Lord of Earth, seeing Dhartrastra’s party standing marshalled and the shooting about to begin, the Pandava, whose ensign was the monkey, raising his bow, said the following words Krishna:

In view of the sudden change of feeling that is to come over Arjuna it should be noted how full of the war-spirit we find him in this verse.

फिर, हे पृथ्वी के स्वामी, धृतराष्ट्र की सेना को तैयार खड़ा और निशाना लगाना आरम्भ होनेवाला देखकर, पांडव, जिनके झंडा के ऊपर बंदर का निशानी था, उन्होंने अपना धनुष उठाकर कृष्ण से ये शब्द कहे:

अर्जुन में अचानक आने वाले बदलाव को देखते हुए, यह ध्यान देना चाहिए कि इस श्लोक में हम उसे युद्ध की भावना से कितना भरा हुआ पाते हैं ।

पुनः, हे पृथ्वीपति, धृतराष्ट्रक सेना केँ युद्ध लेल (तैयार भेल) ठाढ़ आर निशाना लगेनाय शुरू होयबला (स्थिति) देखिकय, पांडव, जिनकर (रथ उपर लागल) झंडा मे बानरक निशानी छल, ओ अपन धनुष उठाकय कृष्ण सँ ई शब्द कहलनिः 

अर्जुन मे आयल अचानक परिवर्तनक भाव केँ देखैत, हमरा सब केँ एहि श्लोक मे इहो ध्यान देबाक चाही जे युद्धक भावना हुनका मे कतेक भरल छल ।

अर्जुन उवाच ।

सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥२१॥
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ॥
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥२२॥

Arjuna said:

Place my chariot, O Acyuta! between the two armies that I may see those who stand here prepared for war. On this eve of battle (let me know) with whom I have to fight.

अर्जुन ने कहा:

हे अच्युत ! मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा करें ताकि मैं उन लोगों को देख सकूँ जो यहाँ युद्ध के लिए तैयार खड़े हैं । इस युद्ध के पूर्व-सन्ध्या में (मुझे जानना है) कि मुझे किनलोगों के साथ लड़ना है ।

अर्जुन कहलनि:

हे अच्युत ! हमर रथ दुनू सेनाक मध्य मे ठाढ़ करू जाहि सँ हम ओहि लोक सब केँ देखि सकी जे एतय युद्धक लेल तैयार ठाढ़ अछि । एहि युद्धक पूर्व-सन्ध्या मे (हमरा देखबाक/जनबाक अछि) जे हमरा केकरा संग लड़बाक अछि । 

संजय उवाच ।

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ॥
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥२३॥

Sañjaya said:

O Bharata, commanded thus by Gudākeśa, Hrşikeśa drove that grandest of chariots to a place between the two hosts, facing Bhisma, Droņa, and all the rulers of the earth, and then spoke thus, “Behold, O Partha, all the Kurus gathered together!”

संजय ने कहा:

हे भरत, गुडाकेश के कहने पर, हृषीकेश ने उस सबसे बड़े रथ को दोनों सेनाओं के बीच एक जगह पर ले जाकर खड़ा किया, जहाँ भीष्म, द्रोण और धरती के सभी राजा मौजूद थे, और फिर कहा, “हे पार्थ, देखो, सभी कौरव एक साथ इकट्ठा हो गए हैं !”

संजय कहलनि:

हे भरत, गुडाकेश केर कहलापर, हृषीकेश ओहि सबसँ पैघ रथ केँ दुनू सेना सभक बीच एक स्थान पर ल’ जाकय ठाढ़ कयलनि, जेतय भीष्म, द्रोण आ धरतीक सबटा राजा मौजूद रहथि, आर फेर ओ कहलनि, “हे पार्थ, देखू, सब कौरव एक संग एकत्रित भ’ गेल अछि !”

तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄनथ पितामहान् ॥
आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा ॥
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ॥२६॥

Then saw Partha stationed there in both the armies, grandfathers, fathers-in-law, and uncles, brothers and cousins, his own and their sons and grandsons, and comrades, teachers, and other friends as well.

फिर पार्थ वहाँ तैनात दोनों सेनाओं में, दादा, ससुर, चाचा, भाई, चचेरे-फुफेरे-ममेरे भाई लोगों, उनका अपना और उनलोगों के बेटे-पोते, साथी, शिक्षक (गुरु लोग) एवं अन्य मित्रों को देखा ।

फेर पार्थ ओहिठाम तैनात दुनू सेना मे, दादा, ससुर, चाचा, भाए, चचेरा-फुफेरा-ममेरा भाइ सब, हुनकर अपन आ आर लोकक बेटा-पोता, संगी, गुरुजन एवं आरो मित्र सब केँ देखलनि ।

तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ॥२७॥

Then he, the son of Kuntī, seeing all those kinsmen stationed in their ranks, spoke thus sorrowfully, filled with deep compassion.

तब कुंतीपुत्र ने उन सभी रिश्तेदारों को अपनी-अपनी कतार में खड़ा देखकर, गहरी दया से भरकर, दुःखी होकर ऐसा कहा ।

फेर कुन्तीपुत्र ओहि समस्त सम्बन्धी लोकनि केँ अपन-अपन ओहदा मे तैनात देखिकय, गहींर दयालुता सँ भरिकय, दुःखी भ’ कय एना कहलनि ।

अर्जुन उवाच ।

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ॥२८॥
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥
गाण्डीवं संसते हस्तात्त्वक् चैव परिदह्यते ॥२९॥

Arjuna said:

Seeing, O Krsna, these my kinsmen gathered here eager for fight, my limbs fail me, and my mouth is parched up. I shiver all over, and my hair stands on end. The bow Gandīva slips from my hand, and my skin burns.

Compassion overpowered him. Not that it was due to discrimination, but rather to the lack of this. He lost self-control – the first step into the abyss of ignorance.

अर्जुन ने कहा:

हे कृष्ण, यहाँ एकत्रित हुए मेरे इन रिश्तेदारों को लड़ाई के लिए उत्सुक देखकर, मेरे हाथ-पैर काम करना बंद कर रहे हैं, और मेरा मुँह सूख गया है । मैं पूरा काँप रहा हूँ, और मेरे रोंगटे खड़े हो गए हैं । गांडीव धनुष मेरे हाथ से फिसलता है, और मेरी त्वचाएँ जल रही हैं ।

करुणा ने उन पर काबू पा लिया । ऐसा नहीं कि यह समझदारी की वजह से था, बल्कि इसकी कमी की वजह से था । उन्होंने खुद पर काबू खो दिया – अज्ञानता की खाई में पहला कदम कहें ।

अर्जुन कहलनि:

हे कृष्ण, एतय एकत्रित भेल हमर एहि सम्बन्धी लोकनि केँ लड़ाइ लेल उत्सुक देखिकय, हमर हाथ-पैर काज कयनाय छोड़ि रहल अछि, आर हमर मुँह सुखा गेल अछि । हम पूरा शरीर काँपि रहल अछि, आर रोइयाँ सेहो ठाढ़ भ’ गेल अछि । गांडीव धनुष हमरा हाथ सँ छुटैत (फिसलैत) अछि, आर हमर त्वचा सब जरि रहल अछि । 

करुणा हुनका उपर काबू पाबि गेल । एहेन नहि जे ई समझदारी केर कारण सँ भेल, बल्कि एकर कमीक कारण सँ भेल । ओ अपना उपर नियंत्रण हरा लेलनि – अज्ञानताक खद्धा मे पहिल डेग कहू । 

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ॥३०॥

Neither, O Keśava, can I stand upright. My mind is in a whirl. And I see adverse omens.

हे केशव, न ही मैं सीधा खड़ा रह सकता हूँ । मेरा दिमाग घूम रहा है । और मुझे बुरे शकुन दिख रहे हैं ।

हे केशव, नहिये हम सीधा ठाढ़े रहि सकैत छी । हमर माथा घुमि रहल अछि । आर हमरा खराब शकुन देखा रहल अछि ।

न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥
न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ॥३१॥

Neither, O Krşņa, do I see any good in killing these my own people in battle. I desire neither victory nor empire, nor yet pleasure.

हे कृष्ण, न ही मुझे युद्ध में इन अपने ही लोगों को मारने में कोई फ़ायदा दिखता है । मुझे न तो जीत चाहिए, न राज, और न ही खुशी चाहिए ।

हे कृष्ण, नहिये हमरा युद्ध मे एहि अपनहि लोक सब केँ मारय मे कोनो फायदा देखाइत अछि । हमरा नहिये जीत चाही, न राज चाही, आ न खुशिये चाही । 

किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥
येषामर्थे कांक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ॥३२॥
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ॥३३॥
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबन्धिनस्तथा ॥३४॥

Of what avail is dominion to us, of what avail are pleasures and even life, if these, O Govinda! for whose sake it is desired that empire, enjoyment, and pleasure should be ours, themselves stand here in battle, having renounced life and wealth – teachers, uncles, sons, and also grandfathers, maternal uncles, fathers-in-law, grandsons, brothers-in-law, besides other kinsmen.

हे गोविन्द ! यदि ये लोग, जिनके वास्ते यह इच्छित है कि राज्य, आनन्द और सुख हमारी होने चाहिये, हमारे गुरु, चाचा, बेटे, दादा, मामा, ससुर, पोते, साले, और अन्य सम्बन्धी भी; अगर ये सभी लोग अपनी जान (जीवन) और दौलत (धन-सम्पत्ति) को छोड़कर यहाँ युद्ध में खड़े हैं – ऐसा राज्य हमारा कौन सा काम में आएगा, ऐसा सुख या फिर जीवन से हमें क्या ही मिलेगा ।  

हे गोविन्द ! जँ ई लोकनि, जिनका वास्ते ई सब इच्छित अछि जे राज्य, आनन्द आर सुख हमर हेबाक चाही, अपन गुरु, चाचा, बेटा, दादा, मामा, ससुर, पोता, साला, आर आनो सम्बन्धी लोकनि; अगर ई सब लोक अपन जान (जीवन) आ धन (सम्पत्ति) केँ छोड़िकय एतय युद्ध मे ठाढ़ छथि – तखन एहेन राज्य हमर कोन काज मे आओत, एहेन सुख या फेर जीवने सँ हमरा कि भेटत । 

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ॥
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ ३५॥

Even though these were to kill me, O slayer of Madhu, I could not wish to kill them – not even for the sake of dominion over the three worlds, how much less for the sake of the earth!

हे मधु के वध करनेवाले (मधुसूदन) ! यद्यपि ये सभी मुझको मारने के लिए ही क्यों न हों, तो भी मैं इन्हें मारने के लिये चाह भी नहीं सकता हूँ – तीनों लोकों पर राज्य करने के लिए भी नहीं, फिर पृथ्वी के लिए तो और कितना कम (मारना चाहूँगा) !

हे मधु केँ वध करयवला (मधुसूदन) ! यद्यपि ई सब हमरा मारहे वास्ते कियैक न होइथ, तैयो हम हिनका सब केँ मारय लेल चाहियो तक नहि सकैत छी – तीनू लोक पर राज्य करबाक लेल सेहो नहि, फेर पृथ्वीक लेल त आर कतेक कम (मारय चाहब) !

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ॥
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानात तायिनः ॥३६॥

What pleasure indeed could be ours, O Janārdana, from killing these sons of Dhṛtarāstra? Sin only could take hold of us by the slaying of these felons.

Felons: Atatāyin, one who sets fire to the house of, administers poison to, falls upon with a sword on, steals the wealth, land, and wife of, another person. Duryodhana did all these to the Pandava brothers. According to the Artha-Sastra, no sin is incurred by killing an Atatayin even if he be thoroughly versed in Vedänta. But Arjuna seems to argue, “True, there may not be incurred the particular sin of slaying one’s own kith and kin by killing the sons of Dhrtarăştra inasmuch as they are Atatayins, but then the general sin of killing is sure to take hold of us, for the Dharma-Sastra which is more authoritative than the Artha-Sastra enjoins non-killing.”

हे जनार्दन, धृतराष्ट्र के इन बेटों को मारने से हमें क्या खुशी मिल सकती है ? इन अपराधियों को मारने से हमें केवल पाप ही लग सकता है ।

अपराधी: आततायी, वह जो किसी के घर में आग लगाता है, (किसी को) जहर देता है, (किसी के ऊपर) तलवार से हमला करता है, किसी दूसरे व्यक्ति का धन, जमीन और पत्नी चुराता है । दुर्योधन ने ये सब कुछ पांडव भाइयों के साथ किया था । अर्थशास्त्र के अनुसार, आततायी को मारने से कोई पाप नहीं लगता, भले ही वह वेदांत का पूरा जानकार क्यों न हो । लेकिन अर्जुन यह तर्क देते हुए ऐसा लगता है, “सच है, धृतराष्ट्र के बेटों को मारने से अपने ही रिश्तेदारों को मारने का खास पाप नहीं लगेगा, क्योंकि वे आततायी हैं, लेकिन तब हत्या का आम पाप तो हमें लग ही जाएगा, क्योंकि धर्म-शास्त्र, जो अर्थ-शास्त्र से ज़्यादा भरोसेमंद है, हत्या न करने का हुक्म देता है ।”

हे जनार्दन, धृतराष्ट्रक एहि बेटा सब केँ मारय सँ हमरा कि खुशी भेटि सकैत अछि ? एहि अपराधी सब केँ मारय सँ हमरा खाली पापे टा लागि सकैत अछि ।

अपराधी: आततायी, ओ जे केकरहु घर मे आगि लगबैत अछि, (केकरहु) जहर खुअबैत अछि, (केकरो उपर) तलवार सँ आक्रमण करैत अछि, कोनो दोसर व्यक्तिक धन, जमीन आर पत्नी चोरबैत अछि । दुर्योधन ई सब किछु पांडव भाइ सभक संग कएने छल । अर्थशास्त्र केर अनुसार, आततायी केँ मारय सँ कोनो पाप नहि लगैछ, भले ओ वेदान्तक पूरा जानकारे कियैक न हो । लेकिन अर्जुन ई तर्क दैत एना लगैत छथि, “सच छैक, धृतराष्ट्रक बेटा सब केँ मारय सँ अपन कोनो निकट-सम्बन्धी केँ मारबाक खास पाप नहि लागत, कियैक तँ ओ सब आततायी अछि, मुदा तखन हत्याक आम पाप तँ हमरा लागिये टा जायत, कियैक तँ धर्म-शास्त्र, जे अर्थ-शास्त्र सँ बेसी भरोसवला (विश्वसनीय) अछि, से हत्या नहि करबाक आज्ञा दैत अछि ।”

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ॥
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥३७॥

Therefore we ought not to kill our kindred, the sons of Dhṛtarāstra. For how could we, O Madhava, gain happiness by the slaying of our own kinsmen?

इसलिए हमें अपने रिश्तेदारों, धृतराष्ट्र के बेटों को नहीं मारना चाहिए । हे माधव, अपने ही रिश्तेदारों को मारकर हमें खुशी कैसे मिल सकती है ?

तेँ हमरा अपन सम्बन्धी सब केँ, धृतराष्ट्रक बेटा सब केँ नहि मारबाक चाही । हे माधव, अपनहिं सम्बन्धी सब केँ मारिकय हमरा खुशी केना भेटि सकैत अछि ? 

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ॥
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥३८॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निर्वाततुम् ॥
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥३९॥

Though these, with understanding overpowered by greed, see no evil due to decay of families, and no sin in hostility to friends, why should we, O Janārdana, who see clearly the evil due to the decay of families, not turn away from this sin?

हालांकि ये लोग, लालच से दबी हुई समझ के साथ, कुल में क्षय (परिवारों के टूटने) से होने वाली बुराई को नहीं देखते, और मित्रों से दुश्मनी में कोई पाप नहीं देखते, तो हे जनार्दन, हम जो कुल में क्षय होने से आनेवाली बुराइयों को साफ-साफ देखते हैं, इस पाप से क्यों न मुंह मोड़ें ?

जखन कि ई सब, लालच सँ दबि गेल समझ केर संग, कुल मे क्षय (परिवारक टुटला) सँ होयवला खराबी केँ नहि देखैछ, आर मित्र सभक संग दुश्मनी मे कोनो पाप नहि देखैछ, तखन हे जनार्दन, हम जे कुलक्षय सँ होयवला खराबी केँ साफ-साफ देखैत छी, एहि पाप सँ कियैक न मुख फेड़ी ?

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ॥
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥

On the decay of a family the immemorial religious rites of that family die out. On the destruction of spirituality, impiety further overwhelms the whole of the family.

कुल में क्षय होने पर उस कुल (परिवार) के पुराने धार्मिक रीति-रिवाज खत्म हो जाते हैं । आध्यात्मिकता (धर्म) के खत्म होने पर, पूरे कुल (परिवार) पर अधर्म हावी हो जाता है ।

कुल मे क्षय भेकापर ओहि कुल (परिवार) केर पुरान धार्मिक रीति-रेबाज खत्म भ’ जाइत छैक । आध्यात्मिकता (धर्म) केर खत्म भेला पर, पूरा कुल (परिवार) पर अधर्म हावी भ’ जाइत छैक ।

अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ॥
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥४१॥

On the prevalence of impiety, O Krsna, the women of the family become corrupt; and women being corrupted, there arises, O Vārsņeya, intermingling of castes.

हे कृष्ण, अधर्म के बढ़ने पर घर की औरतें बिगड़ जाती हैं; और औरतों के बिगड़ जाने पर, हे वार्ष्णेय, जातियों में मेल-मिलाप हो जाता है । (वर्णसङ्कर की उत्पत्ति हो जाती है ।)

हे कृष्ण, अधर्म केर बढ़ि गेलापर घरक स्त्री बिगैड़ जाइत अछि; आर स्त्री सभक बिगैड़ गेलापर, हे वार्ष्णेय, जाति मे मिश्रण भ’ जाइत अछि । (वर्णसङ्करक उत्पत्ति भ’ जाइत अछि ।)

सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ॥
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥४२॥

Admixture of castes, indeed, is for the hell of the family and the destroyers of the family; their ancestors fall deprived of the offerings of rice-ball and water.

Verily, confusion of family is the hell of destroyers of family. (For then do) Their own ancestors fall, deprived etc. This refers to the well-known Sraddha ceremony of the Hindus, the main principle of which consists in sending helpful thoughts to the dead relations as well as to all the occupants of Pitr-loka (a temporary abode, immediately after death) accompanied with (to make the thoughts more forcible) concrete offerings. The poor are also fed to secure their good wishes.

जातियों का सम्मिश्रण, सच में, कुल के लिए नरक और कुल का नाश करने वाला है; उनके पुरखे चावल के पिण्ड और पानी के प्रसाद तक से वंचित रह जाते हैं ।

सच में, कुल (परिवार) की उलझन कुल (परिवार) को खत्म करने वालों का नरक है । (क्योंकि तब) उनके अपने पुरखे गिरते हैं, वंचित रह जाते हैं, वगैरह । यह हिंदुओं के जाने-माने श्राद्ध समारोह के बारे में है, जिसका मुख्य सिद्धांत मरे हुए रिश्तेदारों के साथ-साथ पितृ-लोक (मृत्यु के तुरंत बाद एक अस्थायी निवास) में रहने वाले सभी लोगों के लिए सहयोग का विचार भेजना है, साथ ही (विचारों को और ज़्यादा असरदार बनाने के लिए) ठोस प्रसाद भी देना है । गरीबों को भी उनकी अच्छी इच्छाओं को पूरा करने के लिए खाना खिलाया जाता है ।

कुल केर सम्मिश्रण, सच मे, कुलक वास्ते नरक आर कुल केँ नाश करयवला होइछ; ओहेन लोकक पुरखा चाउरक पिण्ड आ जल (पानि) केर प्रसाद तक सँ वंचित रहि जाइत छथि । 

सच में, कुल (परिवार) केर उलझन कुल (परिवार) केँ खत्म करयवलाक नरक छी । (कियैक तँ तखन) ओकर अपन पुरखा सब खसि पड़ैत छथि, वंचित रहि जाइत छथि, आदि । ई हिन्दू लोकनिक जानल-मानल श्राद्ध समारोहक बारे मे अछि, जेकर मुख्य सिद्धान्त मृत भेल सम्बन्धी संग-संग पितृ-लोक (मृत्युक तुरन्त बादक एकटा अस्थायी निवास) मे रहयवला सब लोकक लेल सहयोग केर विचार पठायब अछि, संगहि (विचार सब केँ आर बेसी प्रभावी बनेबाक लेल) ठोस प्रसाद सेहो देनाय अछि । गरीब सब केँ सेहो ओकर नीक-नीक इच्छा सब केँ पूरा करबाक लेल खाना खुआयल जाइत अछि । 

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ॥
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥४३॥

By these misdeeds of the destroyers of the family, bringing about confusion of castes, are the immemorial religious rites of the caste and the family destroyed.

कुल को तोड़ने वालों के इन गलत कामों से, जातियों में गड़बड़ी पैदा करके (वर्णसङ्कर की उत्पत्ति होने से), जाति और कुल के पुराने धार्मिक रीति-रिवाज नष्ट हो जाते हैं ।

कुल केँ तोड़यवलाक एहि गलत काज सब सँ, जाति मे गड़बड़ी पैदा कयकेँ (वर्णसङ्करक उत्पत्ति भेला सँ), जाति ओ कुल केर पुरान धार्मिक रीति-रेबाज नष्ट भ’ जाइछ ।

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ॥
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥४४॥

We have heard, O Janardana, that dwelling in hell is inevitable for those men in whose families religious practices have been destroyed.

हे जनार्दन, हमने सुना है कि जिन लोगों के कुल में धार्मिक रीति-रिवाज नष्ट हो गए हैं, उनके लिए नरक में रहना अनिवार्य है ।

हे जनार्दन, हम सुनलहुँ अछि जे जाहि लोकक कुल (परिवार) मे धार्मिक रीति-रेबाज नष्ट भ’ गेल अछि, ओकरा लेल नरक मे रहनाय अनिवार्य छैक । 

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ॥
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ ४५ ॥

Alas, we are involved in a great sin, in that we are prepared to slay our kinsmen, out of greed for the pleasures for a kingdom!

अफसोस, हम बहुत बड़े पाप में शामिल हो गए हैं, क्योंकि हम राज्य के सुख के लालच में अपने ही रिश्तेदारों को मारने के लिए तैयार हैं !

अफसोस, हम बड पैघ पाप मे शामिल भ’ गेलहुँ अछि, कियैक तँ हम राज्यक सुख केर लालच मे अपनहि सम्बन्धी सब केँ मारबाक लेल तैयार भ’ गेल छी । 

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ॥
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६ ॥

Verily, if the sons of Dhṛtarāstra, weapons in hand, were to slay me, unresisting and unarmed, in the battle, that would be better for me.

सच में, अगर धृतराष्ट्र के बेटे, हाथ में हथियार लेकर, युद्ध में बिना विरोध किए और बिना हथियार के मुझे मार डालें, तो यह मेरे लिए बेहतर होगा ।

सच मे, अगर धृतराष्ट्रक बेटा, हाथ मे हथियार लय केँ, युद्ध मे बिना विरोध कएने आर बिना हथियार केँ हमरा मारि दिअए, त ई हमरा लेल नीक होयत । 

सञ्जय उवाच ।

एवमुक्त्त्वाऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ॥
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ ४७ ॥

Sañjaya said:

Speaking thus in the midst of the battle-field, Arjuna, casting away his bow and arrows, sank down on the seat of his chariot, with his mind distressed with sorrow.

संजय ने कहा:

युद्ध के मैदान में ऐसा कहकर, अर्जुन अपना धनुष-बाण फेंककर, दुःख से व्याकुल होकर, अपने रथ के स्थान पर बैठ गए ।

संजय कहलनि:

युद्ध केर मैदान मे एना कहिकय, अर्जुन अपन धनुष-बाण फेकिकय, दुःख सँ व्याकुल भ’ कय, अपन रथ केर स्थान पर बैसि गेलाह ।

इति अर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः

The end of chapter first, designated, The Grief of Arjuna.

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