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मिथिलाक व्यंजन शुद्ध,सात्विक आर सुपाच्य भोजनक विन्यास थिक

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लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :-

मिथिलाक व्यंजन परम्परा : —

माटि, लोकजीवन आऽ आत्मीय संस्कृतिक स्वाद

मिथिला केवल विद्या, दर्शन, तर्कशास्त्र आऽ लोकसंस्कृतिक भूमि मात्र नहि अछि, बल्कि इ अपन विशिष्ट खान-पान आऽ व्यंजन परम्पराक लेल सेहो सम्पूर्ण भारतमे आदरक संग स्मरण कयल जाइत अछि। एहि भूमिक भोजन केवल पेट भरबाक साधन नहि, बल्कि लोकजीवनक संस्कार, आत्मीयता, प्रकृतिक संग सहअस्तित्व आऽ सामाजिक समरसताक प्रतीक रहल अछि। मिथिलाक व्यंजनमे गामक माटिक सुगन्ध, खेतक हरियरपन, पोखरिक शीतलता आऽ गृहिणीक स्नेह सहजहि अनुभव कयल जा सकैत अछि।
मिथिलामे भोजनक अर्थ केवल स्वाद नहि, अपितु इ जीवन-पद्धतिक एकटा महत्वपूर्ण अंग अछि। विवाह हो वा पर्व-त्योहार, अतिथि-सत्कार हो वा पारिवारिक उत्सव प्रत्येक अवसर पर व्यंजन अपन अलग सांस्कृतिक महत्त्व रखैत अछि। एहि व्यंजन परम्परामे सादगी, सात्त्विकता आऽ पोषणक अद्भुत समन्वय दृष्टिगोचर होइत अछि।
मिथिलाक लोकजीवन सदिखन कृषि आधारित रहल अछि। एतयक भोजन प्रकृतिक अनुरूप विकसित भेल अछि। मौसमक अनुसार व्यंजन बदलैत रहैत अछि। गर्मीमे दही-चूड़ा, सत्तू, आमक पन्ना आऽ तरुआ शरीरकेँ शीतलता प्रदान करैत अछि, तँ जाड़मे तिलकोर, खिचरि, घी, दही आऽ पुआ-पकवान शरीरमे ऊर्जा भरैत अछि।
मिथिलाक भोजनमे शुद्धता आऽ सात्त्विकता पर विशेष बल देल जाइत अछि। एतय लहसुन-प्याजक प्रयोग पारम्परिक रूपेँ सीमित रहल अछि। भोजनकेँ प्रसादक भाव सँ ग्रहण करबाक परम्परा मिथिलाक आध्यात्मिक चेतनाक परिचायक अछि।
दही-चूड़ा मिथिलाक आत्मा कहल जाइत अछि। विशेषतः मकर संक्रान्तिक अवसर पर दही-चूड़ाक महत्त्व अत्यधिक बढ़ि जाइत अछि। नव धान सँ बनल चूड़ा, गामक शुद्ध दही, गुड़ आऽ केरा संग परसबाक परम्परा लोकजीवनमे आनन्द भरि दैत अछि। ई व्यंजन केवल स्वादिष्ट नहि, बल्कि अत्यन्त पौष्टिक सेहो होइत अछि।
मिथिलाक भोजन परम्परामे माछ-भातक विशिष्ट स्थान अछि। कमला, कोसी, बागमती आऽ गंडक जकाँ नदीसभ सँ प्राप्त ताजा माछ लोकजीवनक अभिन्न अंग रहल अछि। सरिसोंक मसालामे बनल माछक झोर आऽ भातक संग मिथिलाक स्वादक अद्भुत अनुभव भेटैत अछि।
तरुआ मिथिलाक अत्यन्त लोकप्रिय व्यंजन अछि। आलू, भांटा, ओल, परोड़, खम्हाउर, कचनारक फूल, तिलकोर आदिकेँ बेसन वा चाउरक पीठारमे लपेटि कऽ तेलमे करकैल जाइत अछि। विवाह, भोज आऽ पर्व-त्योहारमे तरुआ बिना भोजन अधूरा मानल जाइत अछि।

मिथिलाक मिठाइसभमे पिड़ुकिया विशेष प्रसिद्ध अछि। खोआ, नारिकेर आऽ गुड़क मिश्रण भरि कऽ बनाओल गेल ई व्यंजन स्वादक अनुपम उदाहरण अछि। तहिना ठेकुआ छठि पर्वक प्रमुख प्रसाद अछि, जाहिमे श्रद्धा आऽ भक्ति संग स्वादक अद्भुत मेल भेटैत अछि।
गर्मीमे सत्तू मिथिलावासीक जीवनक अमृत मानल जाइत अछि। चना वा जौक सत्तूमे नून, जीरा, नेबो आऽ हरियर मिरचाइ मिला कऽ बनाओल पेय शरीरकेँ शीतलता प्रदान करैत अछि। ग्रामीण जीवनमे सत्तू श्रमिक वर्गक प्रमुख आहार रहल अछि।
मिथिलामे प्रत्येक पर्वक अपन विशेष व्यंजन होइत अछि। सामा-चकेवामे पुआ-पकवान, छठि मे ठेकुआ, मधुश्रावणीमे विशेष पकवान, होलीमे मालपुआ आऽ अनरसा, तथा विवाहमे कढ़ी-बड़ी, तरुआ, माछ आऽ मिठाइक विविध रूप सांस्कृतिक समृद्धिक परिचायक अछि।
एहि व्यंजनसभक माध्यम सँ केवल स्वादक आनन्द नहि, बल्कि पारिवारिक एकता, सामूहिकता आऽ सामाजिक प्रेम सेहो अभिव्यक्त होइत अछि।
मिथिलाक पारम्परिक भोजन पूर्णतः प्राकृतिक आऽ स्वास्थ्यवर्धक रहल अछि। एतय मोट अनाज, दही, साग-सब्जी, दालि आऽ मौसमी फल पर आधारित भोजन शरीरकेँ संतुलित पोषण प्रदान करैत अछि। आधुनिक फास्ट-फूड संस्कृतिक प्रभावक बावजूद मिथिलाक पारम्परिक व्यंजन आईओ स्वास्थ्यक दृष्टिसँ अत्यन्त उपयोगी मानल जाइत अछि।
मिथिलाक व्यंजन केवल खान-पान नहि, बल्कि एतऽ के सभ्यता, संस्कृति आऽ आत्मीय जीवन-दर्शनक जीवित अभिव्यक्ति अछि। एहि व्यंजनसभमे मायक ममता, गृहिणीक स्नेह, खेतिहरक परिश्रम आऽ लोकजीवनक सहजता समाहित अछि। बदलैत समय आऽ आधुनिकताक प्रभावमे जँ हम अपन पारम्परिक भोजन संस्कृतिकेँ बिसरब, तँ ई केवल स्वादक हानि नहि, बल्कि अपन सांस्कृतिक पहचानक क्षय सेहो होयत।
अतः आवश्यक अछि जे नव पीढ़ी मिथिलाक व्यंजन परम्पराकेँ अपन गर्वक विषय मानि एकरा संरक्षित करए। कारण, जतेक समृद्ध मिथिलाक साहित्य आऽ संस्कृति अछि, ओतवहि समृद्ध ओकर भोजन परम्परा सेहो अछि। मिथिलाक व्यंजन वास्तवमे माटि, लोक आऽ प्रेमक मधुर संगम अछि।

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