Search

स्त्री अपन सीमाक परिभाषा स्वयं लिखी चान धरि पहुँचल छथि

31 भ्यूज

लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- चौकठिक सीमा सँ चाँदक असीमता धरि “स्त्री-अस्तित्वक उजासमय यात्रा”

मानव जीवनक आधार स्त्री छथि। ओ सृष्टिक स्रोत, संस्कारक वाहक आऽ प्रेमक मूर्त रूप छथि। युग-युग सँ स्त्री अपन बहुआयामी भूमिका निभबैत समाजक निर्माण मे महत्वपूर्ण योगदान दैत आबि रहल छथि। मुदा विडम्बना ई रहल जे कतेको काल धरि ओकर अस्तित्व “चौकठि” तक सीमित कए देल गेल ओ चौकठि जे एक दिस सुरक्षा आऽ संस्कारक प्रतीक छल, तँ दोसर दिस सीमाबद्धता आऽ बंधनक संकेत सेहो।
आधुनिक युग मे शिक्षा, चेतना आऽ आत्मविश्वासक जागरण संग स्त्री अपन सीमाक परिभाषा स्वयं लिखय लागल छथि। एखन स्त्री केवल चौकठिक भीतर नहि, बल्कि चाँद धरि अपन पहुँच स्थापित कए रहल छथि। एहि संदर्भ मे “स्त्री चौकठि सँ चाँद धरि” विषय स्त्रीक संघर्ष, प्रगति आऽ आत्मसाक्षात्कारक सजीव गाथा प्रस्तुत करैत अछि।
परंपरागत समाज मे स्त्रीक जीवन गृहक चौकठि सँ आरंभ भ’ ओही तक सीमित मानल जाइत छल। ओ अपन कर्तव्य, त्याग आऽ ममता सँ परिवार के सहेजैत रहली, मुदा हुनकर प्रतिभा आऽ आकांक्षा प्रायः अनदेखल रहि जाइत छल। चौकठि ओहि समय मे एक सीमा बनि गेल छल, जत’ सँ बाहर निकलनाय स्त्री लेल सरल नहि छल।
मुदा समयक संग-संग परिवर्तन अवश्यंभावी अछि। शिक्षा आऽ सामाजिक जागरूकता स्त्री के आत्मचेतना प्रदान कएलक। ओ बुझलथि जे ओ केवल “कर्तव्यनिष्ठ गृहिणी” नहि, बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व छथि, जकर अपन सपना, विचार आऽ लक्ष्य अछि। ई जागरणे स्त्री के चौकठि पार करबाक प्रेरणा देलक।
आइ स्त्री विज्ञान, साहित्य, राजनीति, खेल, कला आऽ प्रशासन सभ क्षेत्र मे अपन परचम फहरा रहल छथि। ओ अंतरिक्ष धरि पहुँच कए “चाँद” के सेहो अपन उपलब्धिक प्रतीक बना देलथि। एतय “चाँद” केवल भौतिक उपलब्धि नहि, बल्कि ओहि उच्चतम शिखरक प्रतीक अछि जत’ स्त्री अपन पूर्ण सामर्थ्यक संग स्थापित होइत छथि।
एहि यात्रा मे बाधा सेहो कम नहि रहल सामाजिक पूर्वाग्रह, लैंगिक असमानता, रूढ़िवादिता आऽ अनेक प्रकारक चुनौती सभ। मुदा स्त्री अपन धैर्य, संघर्षशीलता आऽ आत्मबल सँ एहि बाधा के पार कएलक। ओ सिद्ध कएलथि जे जँ अवसर भेटय, तँ ओ ककरो सँ कम नहि छथि।
स्त्रीक ई प्रगति केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहि, बल्कि समाजक विकासक सूचक अछि। जखन स्त्री सशक्त होइत छथि, तँ परिवार, समाज आऽ राष्ट्र सभ मजबूत बनैत अछि। ओ नव पीढ़ी के शिक्षित, संस्कारित आऽ प्रेरित करैत छथि, जाहि सँ समग्र उन्नति संभव होइत अछि।
अतः “स्त्री चौकठि सँ चाँद धरि” एक प्रेरणादायक यात्रा अछि बंधन सँ मुक्ति तक, सीमितता सँ असीमता तक, आऽ मौन सँ मुखरता तक। ई यात्रा केवल स्त्रीक नहि, बल्कि सम्पूर्ण समाजक प्रगतिक द्योतक अछि।
आवश्यकता एहि बातक अछि जे हम स्त्री के केवल चौकठि तक सीमित नहि राखी, बल्कि ओकर सपना के चाँद धरि पहुँचय दियौ। जखन स्त्री अपन पूर्णता प्राप्त करत, तखन समाज सेहो पूर्ण आऽ समृद्ध बनत।
निःसंदेह, स्त्री केवल चौकठिक मर्यादा नहि, बल्कि चाँदक उजास सेहो छथि ओहि उजास सँ पूरा संसार आलोकित भ’ सकैत अछि।

 

Related Articles