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ब्राह्मणः’ अर्थात जे ब्रह्म (ज्ञान, सत्य आ ईश्वर) केँ जनैत अछि ओ ब्राह्मण अछि

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#लेख विचार
प्रेषित: आभा झा अद्विका
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- ब्राह्मण एवं हुनक संस्कार

ब्राह्मण आ ओकर संस्कार: समाजक पथ-प्रदर्शक आ सांस्कृतिक धरोहर

मैथिली संस्कृति आ सनातन धर्म मे ‘ब्राह्मण’ आ ‘संस्कार’क संबंध अतीव गहिंर आ अटूट अछि। ब्राह्मण केवल कोनो जाति विशेषक नाम नहि, बल्कि इ एकटा जीवन पद्धति, ज्ञानक साधना आ परोपकारक संकल्प अछि। ‘ब्रह्म जानाति इति ब्राह्मणः’ अर्थात जे ब्रह्म (ज्ञान, सत्य आ ईश्वर) केँ जनैत अछि, ओ ब्राह्मण अछि। मैथिल ब्राह्मण अपन विद्वता, सरलता आ सांस्कृतिक निष्ठाक लेल संपूर्ण विश्व मे विख्यात छथि।

ब्राह्मणक मूल स्वरूप आ कर्तव्य –
प्राचीन काल सँ ब्राह्मणक कतर्व्य समाज केँ ज्ञान देब, धर्मक रक्षा करब आ लोकक कल्याणक लेल मार्ग प्रशस्त करब रहल अछि। ब्राह्मणक जीवन मुख्य रूप सँ छहटा कर्म (षटकर्म) पर आधारित होइत अछि –

अध्ययन (विद्या ग्रहण करब)

अध्यापन (विद्या दान करब)

यजन (स्वयं यज्ञ-पूजा करब)

याजन (दोसरक लेल यज्ञ-अनुष्ठान करेनाइ)

दान (पवित्र मन सँ दान देब)

प्रतिग्रह (सात्विक रूप सँ दान स्वीकार करब)

वर्तमान परिप्रेक्ष्य मे ब्राह्मणक अर्थ केवल पूजा-पाठ धरि सीमित नहि अछि, बल्कि समाज मे नैतिक मूल्यक स्थापना आ कुरीति सभक विरोध करब सेहो हुनक परम कर्तव्य अछि।

संस्कारक महत्व आ मैथिल परंपरा –

संस्कारक अर्थ अछि परिमार्जन वा शुद्धिकरण। जेना लोहा केँ तपा कऽ अस्त्र बनाओल जाइत अछि, तहिना मानव मन आ शरीर केँ संस्कारक माध्यम सँ श्रेष्ठ बनाओल जाइत अछि। सनातन धर्म में १६ टा मुख्य संस्कारक वर्णन अछि, जाहि में मैथिल ब्राह्मणक घर में किछु संस्कारक विशेष धूमधाम आ शास्त्रीय महत्व अछि-

उपनयन संस्कार (बड़ुआ)- ई ब्राह्मण बालकक लेल ‘दूर्वा’ (दोसर जन्म) सन अछि। एहि में बालक केँ यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण कराओल जाइत अछि आ ओ गायत्री मंत्रक दीक्षा लैत अछि। ई संस्कार बालक केँ अनुशासन, ब्रह्मचर्य आ विद्या अध्ययनक प्रति संकल्पित करैत अछि।

विवाह संस्कार- मिथिलाक विवाह केवल दू व्यक्तिक मिलन नहि, बल्कि दू परिवारक सांस्कृतिक आ आध्यात्मिक मिलन अछि। सिद्धांत, मड़बा, समदाउन आ नैना-जोगिनक गीत एहि संस्कार केँ अद्वितीय बनबैत अछि।

अन्त्येष्टि संस्कार- जीवनक अंतिम सत्य केँ स्वीकार करैत आत्माक सद्गतिक लेल ई संस्कार पूर्ण पवित्रता सँ कएल जाइत अछि।

वर्तमान समय मे संस्कारक संदेश आ प्रासंगिकता –
आजुक आधुनिक युग में पाश्चात्य संस्कृतिक प्रभाव आ भागदौड़ वला जिंदगी कें कारण हमर प्राचीन संस्कार कतहु ने कतहु पाछां छूटि रहल अछि। एहन स्थिति मे ब्राह्मण समाजक जिम्मेदारी आओर बेसी बढ़ि जाइत अछि।

संदेश: संस्कार विहीन मानव बिना पतवारक नाव सन होइत अछि, जे कखनो कतहु भटकि सकैत अछि। संस्कार हमरा सभ केँ अपन माटि सँ जोड़ने रखैत अछि।

ब्राह्मण समाज कें ई संदेश देब आवश्यक अछि जे-

ज्ञानक आदर करी- केवल जन्म सँ नहि, बल्कि अपन आचरण, शिक्षा आ सद्व्यवहार सँ ब्राह्मणत्व केँ जीवित राखी।

कुरीति सभक त्याग- विवाह आदि संस्कार मे दहेज़ रूपी दानव आ आडंबरक कड़ाई सँ विरोध कएल जाए।

युवा पीढ़ी केँ जोड़ब- अपन संतानों कें मैथिली भाषा, पाँजि-प्रथा, आ अपन मूल संस्कारक गौरव समझायब आवश्यक अछि ताकि ओ आधुनिकता कें संग-संग अपन जड़ि कें सेहो सुरक्षित रखि सकथि।

ब्राह्मण आ ओकर संस्कार मिथिलाक आत्मा अछि। जखन धरि हमर घर में शंखध्वनि, गायत्री मंत्रक जाप आ अतिथि सत्कार सन संस्कार जीवित अछि, तखन धरि मिथिलाक ई पावन भूमि अपन गौरव सँ जगमगाइत रहत।आउ, हम सभ मिलि कऽ अपन लोक-संस्कृतिक रक्षा करी, अंधविश्वास सँ दूर रही आ एकटा ज्ञानयुक्त, समतामूलक आ सुसंस्कृत समाजक निर्माण करी। यैह एहि लेखक सच्चा संदेश अछि। जय मिथिला, जय मैथिली।

 

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