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विद्या अध्यन आर अध्यापन, समाज हित लेल यज्ञ – हवन ब्राम्हणक संस्कार थिक

18 भ्यूज

लेख विचार
प्रेषित: ममता झा मेधा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- ब्राह्मण एवं हुनक संस्कार


ब्राह्मण समाज भारतीय सनातन परंपरा के एकटा महत्वपूर्ण स्तंभ छथि। ‘ब्राह्मण’ शब्द ‘ब्रह्म’ सँ बनल अछि, जेकर अर्थ होइत अछि – ब्रह्म केँ जननिहार, ज्ञान केँ धारण करनिहार। प्राचीन काल सँ ब्राह्मण केँ समाज मे ज्ञान, शिक्षा, धर्म आ संस्कार केँ वाहक मानल गेल अछि।

*ब्राह्मण केँ मूल कर्तव्य*
मनुस्मृति मे कहल गेल अछि –
_“अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा।_
_दानं प्रतिग्रहश्चैव ब्राह्मणानामकल्पयत्॥”_

अर्थात् ब्राह्मण केँ छह कर्म निर्धारित छैक:
1. *पढ़ब* – वेद-शास्त्र केँ अध्ययन करब
2. *पढ़ाएब* – दोसर केँ ज्ञान देब
3. *यज्ञ करब* – स्वयं पूजा-पाठ करब
4. *यज्ञ कराएब* – लोक केँ धर्म-कर्म सँ जोड़ब
5. *दान लेब* – जीविका हेतु शुद्ध दान ग्रहण करब
6. *दान देब* – ज्ञान आ अन्न केँ दान करब

*सोलह संस्कार आ ब्राह्मण*
ब्राह्मण जीवन सोलह संस्कार सँ बान्हल रहैत अछि। जन्म सँ ल’ क’ मृत्यु धरि हर अवस्था मे संस्कार केँ महत्व अछि।

– *उपनयन संस्कार*: ब्राह्मण बालक केँ 8 वर्ष मे जनेऊ देल जाइत अछि। ई दोसर जन्म मानल जाइत अछि – ‘द्विज’ कहबैत छथि। जनेऊ तीन सूत केँ होइत अछि – जे देव ऋण, ऋषि ऋण आ पितृ ऋण केँ प्रतीक छी।
– *वेदाध्ययन*: उपनयन केँ बाद गुरुकुल मे वेद, पुराण, ज्योतिष, कर्मकांड केँ शिक्षा लेल जाइत अछि।
– *संध्या-वंदन*: दिन मे तीन बेर गायत्री मंत्र सँ संध्या करब ब्राह्मण केँ नित्य कर्म छी।
– *शुचिता*: खान-पान, रहन-सहन मे पवित्रता पर विशेष ध्यान देल जाइत अछि। ‘मन चंगा त कठौती मे गंगा’ वाली बात।

*ब्राह्मण आ समाज*
प्राचीन समय मे ब्राह्मण राजा केँ सलाहकार, गुरु, वैद्य, ज्योतिषी आ पुरोहित केँ रूप मे समाज केँ दिशा दैत छलाह। ओ अपन जीविका लेल खेती, भिक्षा या दान पर निर्भर रहैत छलाह, मुदा लोभ सँ दूर रहबाक शिक्षा देल जाइत छल।

विद्यापति कहने छथि –
_“जाति न पूछू साधु के, पूछ लीजिए ज्ञान।_
_मोल करो तरवार के, पड़ा रहन दो म्यान॥”_

अर्थात् ब्राह्मण केँ पहचान ओकर जाति सँ नहि, ओकर ज्ञान, आचरण आ संस्कार सँ होइत छैक।

*वर्तमान संदर्भ*
आजुक युग मे ब्राह्मण समुदाय सेहो बदैल रहल अछि। शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, प्रशासन – सब क्षेत्र मे ब्राह्मण आगाँ बढ़ि रहल छथि। मुदा मूल संस्कार – सत्य बोलब, परोपकार करब, विद्या दान देब, संध्या-पूजा करब – ई सब अखनो परिवार सब मे जीवित अछि।

*निष्कर्ष*
ब्राह्मण केबल एकटा जाति नहि, एकटा विचारधारा छी। जे ब्रह्म केँ जनैत अछि, ज्ञान केँ बाँटैत अछि, आ समाज केँ संस्कार सँ जोड़ैत अछि – से ब्राह्मण छथि।

_“न ब्राह्मणो वेदपाठी, न ब्राह्मणो याज्ञिकः।_
_ब्राह्मणः स तु विज्ञेयः, यस्तु पापात् प्रमुच्यते॥”_

अर्थात् खाली वेद पढ़ला सँ या यज्ञ कएला सँ ब्राह्मण नहि होइत छथि, जे पाप सँ मुक्त अछि, सदाचारी अछि, से असली ब्राह्मण छथि।

* । संस्कार रहत त समाज रहत ।*

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