जानकी कि सुर्पणखा ?
– विचार (प्रवीण नारायण चौधरी)
हुनका जानकी केर प्रतिरूप कहने रहियनि । तहिया बड नीक रही । एक दिन किछु बात बुझेलियनि, हम ब्लौक कय देल गेलहुँ ।
ई संसार एहने छैक, जाबत अहाँ किनको मुंह पर प्रशंसा करैत रहब, ताबत ओ अहाँ केँ नीक बुझती/ता । जहाँ कोनो बात अपन मतानुसार हुनकर ‘आत्मगौरव’ केँ चोटिल करतनि, अहाँ शत्रु बनि जेबनि/जायब ।
जी, बात गोटेक वर्ष पहिलुके छी । एकटा समाजक चर्चित महिला रहथि । मिथिला-मैथिली गतिविधि सब मे काफी बढ़ि-चढ़िकय भाग लेल करथि । ताहि जमाना मे महिला लोकनिक मंचीय उपस्थित – सभा मे उपस्थिति – ई सब बड कम होइक । बेर-बेर मंच सँ आह्वान कयल जाइक, पुरुष सब केँ ललकारल जाइन्ह जे कम सँ कम घरोवाली केँ त सहभागी बनाकय ई महिलाविहीन सभा केँ लैंगिक समावेशी बनाबय जाउ ।
परञ्च, स्थिति सचमुच दुरुह रहैक । बस गानल-चुनल महिला सब आगू आबथि आ सामान्य धारणा अनुरूप समाज मे उल्टा हुनका सब केँ लोकक भ्रमित-मोहित प्रतिक्रिया सब सेहो झेलय पड़न्हि । तेहेन स्थिति मे जँ ओ आगू आयल रहथि त मैथिली-मिथिला लेल समर्पित लोक सब हुनका माथ पर बैसौलक, सम्मान देलक ।
हम लगभग २००९-१० सँ मैथिली-मिथिला मे सक्रिय छी । सिद्धान्त छोट मुदा पैघ सेहो अछि । मुंह सँ बाजू त ओ कर्म-आचरण मे सेहो उतारू । खाली गप मारिकय ‘यूँ मारा – त्यूँ पछाड़ा’ ई बच्चे सँ ततेक देखलियैक जे मोन टूटि गेल छल । त बाजू कम करू बेसी – आ पहिने स्वयं किछु कय केँ उदाहरण ठाढ़ करू, जँ अनुकरणीय भेल त स्वतः आर लोक ओकर अनुकरण करत । अहाँक छोट काज धीरे-धीरे समूचा समाज मे पसैर जायत । अहाँक अभिप्राय पूर्ण भ’ जायत ।
मैथिलीभाषी समाज दुइ देश मे बँटल अछि । नेपाल आ भारत । मुदा दुनू देशक सीमा खुजल रहबाक कारण एक-दोसर सँ सामीप्यता ओतबे छैक, रहबाको चाही । जहिया से नहि रहत, त शायद नेपाल आ भारत दुनू नहि रहत, मात्र आ मात्र मिथिला रहत से आइये नोट कय लेल जाउ । मिथिला सदा-सनातन रहत । कारण ई वेद-पुराण वर्णित पहिचान थिक । – ई हमर आन्तरिक मन केर बात छी । कहबे कयलहुँ, अगबे बात स नहि काज मे सेहो उतारू । एहि क्रम मे बहुते लोक सब भेंट भेलथि । आइयो भ’ए रहल छथि । हम नाम जँ लिखय लागब त बहुते बेसी भ’ जायत, कनिटा मे कहि दैत छी – जतेक मैथिली-मिथिला आन्दोलन आ पुरोधागण सभक नाम अपने सब सुनैत छी, लगभग एहि १६-१७ साल केर निरन्तर कार्य मे ओ सब भेटल छथि, परिचित छथि । तेँ, ओ जिनका हम ‘जानकीक प्रतिरूप’ कहलियनि सेहो रहथि ।
जहिया-कहियो आसुरिक शक्ति हमरा सब पर हावी भ’ जाइछ, अपन नाम आ अहंकारक नशा मे चूर भ’ जाइत छी – फेर सहज-सुमति बर्बाद कय लैत छी आ जानकीक बदला सुर्पणखा बनि जाइत छी । अपने सँ अपन सारा गुण-धर्म केँ क्रोधक वेग मे लात मारिकय किनार लगा दैत छियैक आ विवेकक बाट सँ बहुत दूर चलि जाइत छी । एहि तरहें निरपेक्षता सँ जे कियो प्रशंसा करैत छल, ओकरो ब्लौक करय पड़ि जाइछ । सारा संसार अहाँ लेल, अहाँ संसारक लेल बदलि जाइत छी । ई पूर्णता व सिद्धिक विरूद्ध चलि जाइत अछि । बुझू ।
हरिः हरः!!
