गंगेश मिश्रोपाध्याय बारे भ्रमक खेती
सामाजिक संजाल मे ‘तत्त्वचिन्तामणि’ केर रचयिता गंगेश मिश्रोपाध्याय जे मिथिलाक्षेत्रक अद्भुत विद्वान् – नव्य न्याय ओ मीमांसाक सुपरिचित विद्वान् – जिनकर सृजन ‘तत्त्वचिन्तामणि’ विश्व-समुदाय लेल उच्च-सन्दर्भित विवेचनाक रूप मे गण्य अछि, तिनका बारे कुत्सित कथ्य-तथ्य सब परोसल जा रहल अछि ।
निन्दनीय काज जुनि करू कियो
हम एहेन खेदपूर्ण सृजनक घोर निन्दा करैत छी । ई कुत्सित काज पुनः गजेन्द्र ठाकुर नाम्ना महापाखंडी विद्वान् कयलनि जिनकर कुकृत्य महाकवि विद्यापति तक केँ घेंट दबेबा सँ नहि चूकल छल । ई महान् छद्मविद्वान् मैथिल ब्राह्मणक पंजी प्रथा पर गोटेक ५००० पृष्ठक एकटा पोथी केँ कम्प्यूटर टेक्नोलौजीक उपयोग सँ प्रकाशित कयलनि, आर तहिया सँ स्वयंघोषित ‘पंजीप्रथा आ विज्ञानक द्रष्टारूप’ मे महापुरुष लोकनिक गला-घेंट दबेबाक उपद्रवी कुकार्य करय लगला ।
२०११-१२ मे हिनकर एहने कुकर्मक कारण मिथिला समाज मे ब्राह्मण-सोलकन आ कि-कहाँदन भेल, ‘सगर राति दीप जरय’ जेहेन प्रतिष्ठित साहित्यिक उपक्रम दुइ भाग मे विभाजनक दुष्परिणाम सेहो निकलल जे आइ तक कायमे अछि ।
गंगेश उपाध्याय समान सर्वत्र पूज्य विद्वानक सन्दर्भ गजेन्द्र ठाकुर आ आशीष अन्चिन्हारक कुत्सित दुष्प्रचार अत्यन्त चिन्ताजनक लागल । एहि कुकर्म मे एक गोट फुद्दूवाचार्य (रामानन्द मंडल) जे गोटेक वर्ष सँ एहने सामाजिक विभाजन आ साहित्यिक कित्ताकाट मे ‘मैथिली’ केँ ओझरेबाक दुष्प्रयत्न मे लागल छथि, ओहो दुष्प्रचार मे देखेलाह ।
कुतर्कक पराकाष्ठा जुनि नांघू – बेसिरपैरक बात एकदम नहि करू
“मिथिला मे गंगेश मिश्रोपाध्याय पूज्य नहि छथि, हुनकर तत्तचिन्तामणि एतय अगण्य अछि, आदि वीभत्स दावी करब, हुनक जन्म पिताक मृत्योपरान्त होयबाक कुतथ्य, पिता गैर-ब्राह्मण होयबाक कुतर्क, आदि भ्रमपूर्ण अन्वेषण आ दावीक संकेत करैत एक बेर फेर उपद्रवी – विषवमनकारी विध्वंसक रूप मे सोझाँ अयलाह अछि ई गजेन्द्र ठाकुर ।”
– ई हम बेमन लेकिन जरूरी बुझि लिखय लेल बाध्य भेल छी । हमर समाज एहि तरहक कुतर्की सब सँ सचेत रहय ।
ई दोसर बेर थिक जखन ई उपद्रवी दुर्जन मैथिली साहित्य मे रद्द-दस्त कयलनि वा करबाक कुचेष्टा कयलनि अछि । एहि सन्दर्भित कोनो ज्ञात दावा मे एहेन कुतथ्य आइ धरि पढ़य लेल नहि भेटल ।
महान् गंगेशो मिश्रोपाध्याय बारे दक्षिणक विद्वान् आ शंकराचार्यक मत
हालहि शंकराचार्य चन्द्रशेखरेन्द्र द्वारा लिखल गेल ‘वेद’ केर मैथिली अनुवादक क्रम मे ज्ञात भेल छल जे ई ब्राह्मण जातिक अत्यन्त उच्चकुलीन परिवार मे जन्म लेने रहथि । हिनक पिता व समस्त पुरखाजन वेद आ दर्शनक महान् विद्वान् सब रहथि ।
विदित हो जे ‘मिश्र’ उपाधिक एहि परिवारक गणना मिथिलाक अपभ्रंश संज्ञा ‘बिकाउ ब्राह्मण’ मे होइत छल । पंडित वाचस्पति मिश्र केर परम्परा केँ आगू बढ़ेबाक श्रेय गंगेश मिश्र (उपाध्याय) केँ जाइत छन्हि ।
हिनकर योगदानक चर्चा पूरे विश्व मे होइत अछि । गजेन्द्र ठाकुर जँ ई अन्ट-बन्ट दावी नहि करितथि, तँ ‘तत्त्वचिन्तामणि’ केर मैथिली अनुवादकक रूप मे नाम अमर भ’ जयतन्हि, परन्तु मनुष्य मे जखनहिं अहंकार आबि जाइछ, ओ भगवानक भोजन बनि गेल करैछ । हम अनुवादकार्यक मुक्तकंठ प्रशंसा करैत बाकी बात लेल हुनका सँ फेर क्रोधित भ’ ई लेख प्रस्तुत कय रहल छी ।
गंगेश – गंगा सँ गंगेश मिश्र बनल छलाह । (रोचक कथा वर्णन)
गंगेश एहेन सन्तान भेलाह जे मन्दमति जेकाँ बाल्यकाल बितौलनि । बाल्यकाल मे हिनका गंगा नाम सँ पुकारल जाइत छलन्हि । बिकाउ ब्राह्मण परिवारक उच्च-कुलीनता सँ अन्य छोट-कुलमूलक ब्राह्मण लोकनि बहुविवाह तक करबथि । हुनका बेश जमीन-जथा दय केँ अपन गामहि मे बसायल सेहो करथि । गंगाक जाहि घर विवाह भेलनि, ओतहि घरजमैया बनि गेलाह ।
हिनक मन्दमति आ आलसी हेबाक दुर्गुण गमिकय सासुर मे सेहो लोक बड अपमान करनि । सासुर (घर) मे माछ बनैन त आर लोक सब गुदगर वला अपने खा लियए, आ ई बड़ीकाले खायल करथि त हिनका काँटवला भाग (जेना पुच्छर, मुड़ा, आदि) खाय लेल देल करन्हि ।
अत्यन्त अपमान केँ पर्यन्त ई घोंटिकय रहैत-रहैत एक दिन भोरे-भोर नित्यकर्म लेल बाहर निकललाह त सीधे काशी धरिक यात्रा कयलनि । ओतय किछु वर्ष ततेक मनोयोग सँ विद्यार्जन कयलनि आ पूर्ण विद्वान् ‘मिश्र’ – अर्थात् मिश्रित वेदक बेहतरीन ज्ञाता बनिकय घुरलाह । नाम अनुसारक उपलब्धि हासिल करब मानवक सर्वोपरि गुण मानल जाइछ ।
सासुर मे फेर हिनका काँटवला माछ परसल गेलनि त कहलखिन जे “आब हम गंगा नहि गंगेश मिश्र छी’ । अर्थात् हम वेदविद् गंगेश मिश्र पूर्ण नाम अनुरूप विद्वान् लोक छी, आब गंगा जेकाँ मन्दमति आ उपेक्षाक पात्र बुझि हमरा संग विभेद उचित नहि होयत । – सासुरक लोक काफी सजग भेल आ तदोपरान्त हिनका प्रति सभक श्रद्धाभाव आ विश्वास मे परिवर्तन भेल ।
गंगेश मिश्रोपाध्यायक पुत्र सेहो अत्यन्त प्रसिद्ध द्रष्टा आ स्रष्टा भेलाह । सम्भवतः हिनकहि कुलक एक आर कुलदीपक मदनोपाध्यायक नाम सेहो अपने सब अवश्य सुनने होयब । कहल जाइछ, माता कामाख्या हिनकर सिद्धि आ भक्ति लेल हवा मे धोती सुखा देल करथि । अर्थात् माँ कामाख्याक ओ एतबे प्रियपात्र रहथि, से अपन सिद्धि सँ । पंडित भवनाथ मिश्र कहैत छथि,
“गजेन्द्र ठाकुरक विद्वता एहि बात सँ पता चलैत अछि जे १७म शताब्दी मे जन्म लेनिहार मदन उपाध्याय केँ ओ १३म शताब्दीक अत्यन्त आरम्भवि, किंवा १२म शताब्दीक आखिरी समय मे भेलाह गंगेशोपाध्यायक पुत्र कहलनि अछि, आब एहि सँ अधिक हास्यास्पद आर कि भ’ सकैछ । हुनक इतिहासक ज्ञान मादे एहि दावी सँ सब किछु स्पष्ट भ’ जाइछ ।”
अन्त मे – फेर सभक सुचेतना लेल अनुरोध सहित
एहेन नित्यस्मरणीय विद्वानक प्रति घोर निन्दनीय तथ्य-कथ्य परोसब बहुत खराब लागल, तेँ ई निन्दाक लेख लिखि समाज केँ एहि तरहक उपद्रवी आ कुटिल सोचक विद्वान् सब सँ बचबाक आह्वान करैत छी ।
प्रणाम – आ बेर बेर प्रणाम हे महात्मा गंगेश मिश्रोपाध्याय एवं समस्त मिथिलावासी विद्वान् समाज ! ध्यान देब, ई उपद्रवी सभक उपद्रव सँ समाज पर खराब प्रभाव एकदम नहि पड़य ।
हरिः हरः!!
