लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- श्रृंगार : मिथिलाक नारीजीवनमे सौभाग्य आऽ संस्कृतिक सनातन प्रतीक
मिथिलाक संस्कृति मे नारीक श्रृंगार केवल बाह्य सौन्दर्यकेँ अभिव्यक्त करबाक साधन नहि, अपितु ओकर अन्तःकरण, संस्कार, मर्यादा आऽ जीवन-दर्शनक प्रतीक मानल गेल अछि। मिथिलाक सांस्कृतिक जीवनमे तँ श्रृंगारक प्रत्येक सामग्रीक अपन-अपन आध्यात्मिक, सामाजिक आऽ सांस्कृतिक महत्त्व रहल अछि। सिन्दूरक रक्तिम रेखा, मांगक टीका, शंख-पोला, चूड़ी, पायल, बिछिया, नथ, मांगटीका, काजर, महावर, मेहँदी आऽ साड़ी ई सभ केवल अलंकार नहि, वरन सौभाग्य, प्रेम, समर्पण, विश्वास आऽ दाम्पत्य जीवनक मधुर प्रतीक थिक।
मिथिलाक लोकजीवनमे विवाह केवल दू व्यक्तिक मिलन नहि, अपितु दू कुल, दू परम्परा आऽ दू संस्कृतिक पवित्र संगम मानल जाइत अछि। एहि कारणेँ विवाहोपरान्त नारीक श्रृंगारमे सौन्दर्यसँ बेसी सौभाग्यक भावना समाहित रहैत अछि। लोकगीत, विद्यापतिक पदावली, कोबर-गीत, समदाउन, सोहर आऽ मिथिला चित्रकलामे श्रृंगारक एही सांस्कृतिक गरिमा सहज रूपेँ अभिव्यक्त होइत अछि।
‘श्रृंगार’ शब्द सुनिते मनमे रूप-सौन्दर्यक बिम्ब उभरैत अछि, मुदा मिथिलाक सांस्कृतिक दृष्टिमे श्रृंगार आत्मसम्मान, शील, मर्यादा आऽ जीवनक मंगलकामनाक प्रतीक अछि। ई नारीकेँ केवल सुन्दर नहि बनबैत, अपितु ओकर सामाजिक उत्तरदायित्वक सेहो स्मरण करबैत अछि।
मिथिलाक नवविवाहिता जखन सिन्दूर, चूड़ी, बिछिया आऽ पायलसँ अलंकृत होइत छथि, तखन ओ केवल अपन रूप नहि सँवारैत छथि, बल्कि अपन नव जीवनक उत्तरदायित्व, प्रेम आऽ विश्वासक संकल्प सेहो धारण करैत छथि।
मिथिलामे सिन्दूरक स्थान सर्वोपरि अछि। विवाहक क्षणमे वर जखन वधूक सीथमे सिन्दूर भरैत छथि, तखन ई केवल एकटा वैवाहिक संस्कार नहि, बल्कि आजीवन संग निभेबाक प्रतिज्ञा होइत अछि। एहि लेल मैथिल लोकगीतमे कहल गेल अछि..
“मांग भरल सिन्दूर सँ, जीवन भेल उजियार।
सात जन्मक नेहक बन्धन, बनल अमर आधार॥”
सिन्दूर मिथिलाक विवाहित नारीक गौरव, सम्मान आऽ अखण्ड सौभाग्यक सर्वाधिक पवित्र प्रतीक मानल जाइत अछि।
हाथक चूड़ी केवल काँचक खनखनाहट नहि, अपितु गृहस्थ जीवनक मधुर संगीत अछि। बिछिया दाम्पत्यक मर्यादाक प्रतीक मानल जाइत अछि, तँ पायलक रुनझुन घर-आँगनमे मंगलध्वनिक अनुभव करबैत अछि। मिथिलाक लोकविश्वास अनुसार विवाहित स्त्रीक पायलक ध्वनि घरमे सुख-समृद्धि आऽ शुभताक संदेश लबैत अछि।
मेहँदी प्रेमक हरित आभा अछि। विवाहपूर्व हाथमे रचल मेहँदी नवजीवनक मधुर स्वप्नक प्रतीक मानल जाइत अछि। महावर चरणकेँ शुभता प्रदान करैत अछि, तँ काजर केवल नेत्र-सौन्दर्य नहि, दृष्टिदोषसँ रक्षा करबाक लोकविश्वासक प्रतीक सेहो अछि।
मिथिला चित्रकलामे सीता, राधा, पार्वती, गौरी, लक्ष्मी आदिक चित्रण सदैव श्रृंगारयुक्त रूपमे देखल जाइत अछि। कोबर-घरक भित्तिचित्रमे नवदम्पतिक संग कमल, बाँस, माछ, सूर्य, चन्द्र आऽ श्रृंगारक विविध प्रतीक अंकित कएल जाइत अछि, जे उर्वरता, समृद्धि आऽ मंगलमय दाम्पत्य जीवनक कामना व्यक्त करैत अछि।
विद्यापतिक पदावलीमे राधिकाक श्रृंगार केवल रूप-वर्णन नहि, अपितु प्रेमक आध्यात्मिक उत्कर्षक अभिव्यक्ति अछि। ओतए श्रृंगार भक्ति बनि जाइत अछि।
वर्तमान समयमे जीवनशैलीक परिवर्तन, पाश्चात्य प्रभाव आऽ व्यावसायिक व्यस्तताक कारण परम्परागत श्रृंगारक स्वरूपमे परिवर्तन अवश्य आयल अछि। अनेक युवतीसभ दैनिक जीवनमे सम्पूर्ण पारम्परिक श्रृंगार नहि करैत छथि। तथापि, विवाह, व्रत, पर्व-त्योहार आऽ पारिवारिक संस्कारमे मिथिलाक श्रृंगारक परम्परा एखनहुँ आदरपूर्वक जीवित अछि।
वास्तवमे श्रृंगारक वास्तविक मूल्य ओकर बाह्य प्रदर्शनमे नहि, बल्कि ओहि भावनामे निहित अछि जाहिमे प्रेम, सम्मान, विश्वास, मर्यादा आऽ सांस्कृतिक चेतना समाहित होइ।
श्रृंगार मिथिलाक नारीक केवल रूप-विभूषण नहि, अपितु सौभाग्य, संस्कृति, प्रेम, मर्यादा आऽ पारिवारिक जीवनक जीवित प्रतीक अछि। ई पीढ़ीसँ पीढ़ी धरि चलि आबि रहल सांस्कृतिक धरोहर अछि, जाहिमे लोकविश्वास, आध्यात्मिक चिन्तन आऽ सामाजिक उत्तरदायित्वक अद्भुत समन्वय देखबाक अवसर भेटैत अछि।
आधुनिकताक वेगमे यदि श्रृंगारकेँ केवल फैशनक वस्तु बना देल जाए, तँ ओकर सांस्कृतिक आत्मा क्षीण भ’ जाएत। आवश्यक अछि जे मिथिलाक नवपीढ़ी श्रृंगारक बाह्य रूपसँ बेसी ओकर सांस्कृतिक अर्थ, सौभाग्यक भावना आऽ मानवीय मूल्यकेँ आत्मसात करय। तखने श्रृंगार वास्तवमे नारीक गौरव, दाम्पत्यक मधुरता आऽ मिथिलाक सनातन सांस्कृतिक अस्मिताक अमिट प्रतीक बनल रहत।
