लेख विचार
प्रेषित: सुष्मिता झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
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विषय :-श्रृंगार—सेहन्ता वा सौभाग्यक प्रतीक !!!
श्रृंगार—शौख नहि, सौभाग्यक पावन प्रतीक
समय परिवर्तनशील अछि। समयक संग जीवनशैली बदलैत अछि, विचार बदलैत अछि, परम्पराक स्वरूप बदलैत अछि। मुदा किछु मूल्य एहन होइत अछि, जे युग बदलला पर सेहो अपन गरिमा नहि छोड़ैत अछि। श्रृंगार सेहो ताहिमे सँ एक अछि। दुर्भाग्यवश, आइ केर समयमे श्रृंगारक अर्थ बहुत ठाम खाली फैशन, प्रदर्शन आ आकर्षण धरि सीमित भऽ गेल अछि। जे श्रृंगार कहियो सौभाग्य, संस्कार, समर्पण आ दाम्पत्य जीवनक पावन अभिव्यक्ति छल, ओ आइ धीरे-धीरे शौख सेहन्ता केर वस्तु बनैत जा रहल अछि।
वास्तवमे श्रृंगार कदापि केवल रूप-सज्जा नहि अछि। ई नारी के अन्तर्मनक पवित्रता, प्रेम, श्रद्धा, मर्यादा आ जीवन-मूल्यक साकार रूप अछि। श्रृंगार नारीक देहकेँ मात्र नहि, ओकर व्यक्तित्वकेँ अलंकृत करैत अछि। एकर चमक सोनाक गहनामे नहि, बल्कि नारीक संस्कार, विनम्रता आ आत्मसम्मानमे झलकि उठैत अछि।
भारतीय संस्कृति, विशेषतः मिथिलाक लोकजीवनमे श्रृंगारकेँ सदैव आध्यात्मिक आ सांस्कृतिक गरिमाक संग जोड़ल गेल अछि। माँगक सिन्दूर केवल लाल रेखा नहि, पति-पत्नीक बीच अटूट विश्वासक प्रतीक अछि। चूड़ीक मधुर झंकार गृहस्थ जीवनक मंगलगान अछि। मेहँदीक गाढ़ रंग प्रेमक गहराइकेँ व्यक्त करैत अछि। आलतासँ रँगल चरण घर-आँगनमे शुभता आ समृद्धिक पदचिह्न अंकित करैत अछि। बिन्दी, पायल, बिछिया, नथ, मांगटीका—ई सभ केवल आभूषण नहि, बल्कि नारीक सौभाग्य, गरिमा आ सांस्कृतिक अस्मिताक अमूल्य प्रतीक छथि।
मिथिलाक नारी सदिखन अपन श्रृंगारमे केवल सौन्दर्य नहि, बल्कि संस्कार धारण करैत छथि। हुनकर श्रृंगार प्रदर्शनक विषय नहि, बल्कि परिवारक मंगल, दाम्पत्यक मधुरता आ जीवनक पवित्रताक मौन प्रार्थना होइत अछि। एतय श्रृंगार बाह्य आडम्बर नहि, अन्तरात्माक उज्ज्वल आभा अछि।
आधुनिकता अवश्य अपन स्थान रखैत अछि, मुदा आधुनिक होएबाक अर्थ अपन जड़िसँ कटि जाएब नहि। जँ श्रृंगारसँ जुड़ल भाव, श्रद्धा आ मर्यादा हराइ जाए, तँ ओकर वास्तविक अर्थ सेहो समाप्त भऽ जाइत अछि। श्रृंगारक सुन्दरता केवल देखबामे नहि, बल्कि ओकरा धारण करबाक भावना आ उद्देश्य मे निहित अछि।
आइ आवश्यकता एहि बातक अछि जे नव पीढ़ी श्रृंगारकेँ केवल फैशनक दृष्टिसँ नहि, बल्कि अपन संस्कृति, परम्परा आ जीवन-मूल्यक गौरवशाली प्रतीकक रूपमे बुझय। कारण, श्रृंगार नारीकेँ केवल सुन्दर नहि बनबैत अछि, बल्कि हुनकर व्यक्तित्वमे गरिमा, आत्मविश्वास, ममता, समर्पण आ सौभाग्यक दिव्य आभा भरि दैत अछि।
श्रृंगार ओ दीपशिखा अछि, जे प्रेमसँ प्रज्वलित होइत अछि; संस्कारसँ आलोकित रहैत अछि; आ सौभाग्यक अखण्ड ज्योति बनि जीवनकेँ प्रकाशित करैत रहैत अछि। एहि लेल श्रृंगार कदापि शौख नहि—अपितु नारीक सम्मान, संस्कार, प्रेम आ अखण्ड सौभाग्यक पावन प्रतीक अछि।
