लेख विचार
प्रेषित: माला झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- सोशल मीडिया केर जीवन पर प्रभाव
श्रृंगार कए मैथिली संस्कृति आ मिथिलाक परंपरा मे केवल एकटा शारीरिक साज-सज्जा मात्र नहि, बल्कि एकरा नारीक गरिमा, संस्कार आ सौभाग्यक सभ सँ पावन प्रतीक मानल गेल अछि। मिथिला मे कहल जाइत अछि जे श्रृंगार सँ नारीक रूप तँ निखरितहि अछि, संगहि ई परिवारक सुख-समृद्धि आ मांगलिकताक सूचक सेहो थिक। वर्तमान समय मे किछु लोक एकरा मात्र एकटा ‘शौख’ या फैशनक रूप मे देखैत छथि, मुदा गम्भीरता सँ देखल जाए तँ मिथिलाक परिप्रेक्ष्य मे श्रृंगार शौख सँ कतेको ऊपर ‘सौभाग्यक प्रतीक’ अछि।
श्रृंगार : शौक या शौभाग्यक प्रतीक? “सौभाग्य आ सांस्कृतिक प्रतीकक रूप मे श्रृंगार ” केर बड्ड महत्वपूर्ण मानल जाइत अछि।
मिथिला मे श्रृंगार सेहन्ता सँ बेसी सौभाग्य आ सुहागक प्रतीक मानल गेल अछि। ब्याहक बाद एकटा मैथिल कनियाँक लेल श्रृंगारिक बस्तु सभ, जहिना—सिन्दूर, लाहक चूड़ी (लहठी), बिछिया, कण्ठहार आ अलता—सिर्फ सजावटक चीज नहि रहि जाइत अछि। ई सभ पति-पत्नीक अटूट संबंध आ पतिक दीर्घायुक कामना सँ जुड़ल पवित्र प्रतीक थिक। आधुनिक दौर
मे श्रृंगार के शौक या व्यक्तिगत रुचिक रूप मे देखल जाइत अछी । प्रत्येक कालखंड मे नारी अपन सौंदर्य कए निखारबाक विभिन्न साधनक उपयोग करैत आबि रहल छथि। मैथिली साहित्य आ लोक गीत मे सेहो श्रृंगार के बहुत सुंदर वर्णन कएल गेल अछि। माहाकवि विद्यापतिक पदावली मे राधाक श्रृंगार आ सौंदर्यक जे वर्णन अछि,ओ दर्शाबैत अछी जे श्रृंगार कते मनमोहक आ कलात्मक भए सकैत अछि । ई ककरो व्यक्तित्व मे आत्मविश्वास भरबाक एकटा सशक्त माध्यम थिक । मिथिलाक संस्कृति आ परम्परा मे लहठी, आलता, सिंदूर आ टिकुली कए केवल श्रृंगारिक वस्तु नहि बल्कि शौभाग्य, संस्कार आ मांगलिकताक परम पावन प्रतीक मानल गेल अछि। ई चारी सामग्री मिथिलाक” अहिबाती” नारीक पहचान थिक।
मिथिलाक सभ सँ पैघ पावनि ‘मधुश्रावणी’ मे श्रृंगार कए विशेष महत्व अछि। नवविवाहिता कनियाँ पूरा सोलह श्रृंगार कऽ कए पूजा करैत छथि, जाहि मे पतिक दीर्घायु क’ लेल प्रार्थना कएल जाइत अछि। एतय सिन्दूर लगेबाक परंपरा कें सभ सँ पवित्र मानल गेल अछि। मैथिल समाज मे विधवा महिला क’ श्रृंगार सँ दूर राखल जाइत अछि, जे ई सिद्ध करैत अछि जे श्रृंगारिक सीधा संबंध सौभाग्य (सुहाग) सँ अछि, नहि कि केवल शौख सँ।
अंततः इ कहल जा सकैत अछि जे श्रृंगार मे शौक आ सौभाग्य दुनूक समावेश अछि। शौकिया तौर पर इ नारी क’ आत्मसंतुष्टि आ रूप-सौंदर्य दैत अछि, मुदा सांस्कृतिक आ आध्यात्मिक रूप सँ ई मिथिलाक पावन परंपरा क’ जीवंत रखैत अछि। श्रृंगार नारीक मर्यादा, ओकर सुहाग आ मैथिल संस्कृतिक ओ गौरव थिक जे ओकरा समाज मे एकटा प्रतिष्ठित आ पूजनीय स्थान दैत अछि।
