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गीता नवम अध्याय – अंग्रेजी, हिन्दी आ मैथिली अनुवाद

331 भ्यूज

ॐ श्री परमात्मने नमः !!

॥नवमोऽध्यायः॥

श्रीभगवानुवाच ।

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ॥
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥९-१॥

The Blessed Lord said:

To thee, who dost not carp, verily shall I now declare this, the most profound knowledge, united with realisation, having known which, thou shalt be free from evil (samsara).

भगवान ने कहा:

तुम्हें, जो किसी बात में शिकायत नहीं करते, मैं अब सच में यह बताता हूँ, जो सबसे गहरा ज्ञान है, जो अनुभूति से जुड़ा है, जिसे जानकर, तुम बुराई (संसार) से मुक्त हो जाओगे ।

भगवान कहलनि:

अहाँ केँ, जे बात-बात मे टोकल (शिकायत) नहि करैत छी, हम आब सच मे ई बतबैत छी, जे सबसँ गहींर ज्ञान थिक, जे अनुभूति सँ जुड़ल अछि, जे जानिकय, अहाँ खराबी (सांसारिकता) सब सँ मुक्त भ’ जायब । 

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ॥
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुव्ययम् ॥९-२॥

Of sciences, the highest; of profundities, the deepest; of purifiers, the supreme, is this; realisable by direct perception, endowed with (immense) merit, very easy to perform, and of an imperishable nature.

My Note: For all my dear children – do take serious note of this initiative of Lord Shri Krishna – being so much careful for each and every aspect of ‘the most profound knowledge’ which relate with several necessary things explained in Sloka 2 of this chapter. Keep a close watch on every Sloka to come in serial.

विज्ञान में सबसे ऊँचा; गहराई में सबसे गहरा; पवित्र करने वालों में सबसे ऊपर, यह है; सीधे अनुभव से महसूस होने वाला, (बहुत) पुण्य वाला, करने में बहुत आसान, और कभी न खत्म होने वाला (यह राजविद्या) है ।

मेरा नोट: मेरे सभी प्यारे बच्चों के लिए – भगवान श्री कृष्ण की इस पहल पर गंभीरता से ध्यान दें – ‘सबसे गहरे ज्ञान’ के हर पहलू का इतना ध्यान रखें, जो इस अध्याय के श्लोक २ में बताई गई कई ज़रूरी बातों से जुड़ा है । आने वाले हर श्लोक पर एक के बाद एक पर कड़ी नज़र रखें ।

विज्ञान मे सबसँ ऊँच; गहिराइ मे सबसँ गहींर; पवित्र करयवला मे सबसँ उपर, ई अछि; सीधे अनुभव सँ बुझायवला (अनुभूति होयवला), (बहुते) पुण्यवला, करय मे बहुते आसान, आर कहियो नहि खत्म होयवला (ई राजविद्या) अछि ।

हमर नोट: हमर सब प्यारा बच्चा सभक लेल – भगवान श्री कृष्ण केर एहि पहल पर गंभीरता सँ ध्यान दी – ‘सबसँ गहींर ज्ञान’ केर हरे चरण (पहलू) केर एतेक बेसी ध्यान राखब, जे एहि अध्याय केर श्लोक २ मे कहल गेल कतेको जरूरी बात सब सँ जुड़ल अछि । आबयवला हर श्लोक पर एक केर बाद एक पर कड़ा नजरि राखब ।

अश्रद्धानाः पुरुषाः धर्मस्यास्य परन्तप ॥
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥९-३॥

Persons without Sraddha for this Dharma, return, O scorcher of foes, without attaining Me, to the path of rebirth fraught with death.

Without Sraddha….. Dharma: who have no faith in this knowledge of the Self, regarding the physical body itself as the Self.

हे शत्रुओं को जलाने वाले, जो लोग इस धर्म के प्रति श्रद्धा नहीं रखते, वे मुझे पाए बिना, मृत्यु के खतरे से भरा हुआ पुनर्जन्म के मार्ग पर लौट जाते हैं ।

धर्म में बिना श्रद्धा ….. : जिन्हें स्वयं (आत्मा) के इस ज्ञान पर विश्वास नहीं है, वे भौतिक शरीर को ही आत्मा मानते हैं ।

हे शत्रु सब केँ जरौनिहार! जे लोक एहि धर्म केर प्रति श्रद्धा नहि राखैत अछि, ओ हमरा प्राप्त कएने बिना, मृत्यु केर जोखिम सँ भरल पुनर्जन्मक मार्ग पर घुरि अबैत अछि । 

धर्म के प्रति बिना श्रद्धा: जेकरा स्वयं (आत्मा) केर एहि ज्ञान पर विश्वास नहि छैक, ओ भौतिक शरीर टा केँ आत्मा मानैत अछि ।

मय ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ॥
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥९-४॥

All this world is pervaded by Me in My unmanifested forms; all beings exist in Me, but I do not dwell in them.

Unmanifested: being invisible to the senses.

Exist in Me: have an individual existence through Me, the Self, underlying them all.

Do not dwell in them: like corporeal things – to contact with them, or contained as though in a receptacle.

यह सारी दुनिया मेरे अव्यक्त (बिना दिखे) रूपों में मुझसे व्याप्त (भरी हुई) है; सभी जीव मुझमें मौजूद हैं, लेकिन मैं उनमें नहीं रहता ।

बिना दिखे: इंद्रियों के लिए अदृश्य होना ।

मुझमें मौजूद होना: मुझ आत्मा के ज़रिए, उन सबके अंदर एक अलग अस्तित्व होना ।

उनमें न रहना: भौतिक चीज़ों की तरह – उनसे संपर्क में आना, या किसी बर्तन में बंद होना ।

ई सम्पूर्ण संसार हमर बिना देखल (अव्यक्त) रूप सँ हमरहि सँ व्याप्त (भरल) अछि; सब जीव हमरा मे मौजूद अछि, लेकिन हम ओहि सब मे नहि रहैत छी । 

बिना देखल: इंद्रिय सभक लेल अदृश्य होयब ।

हमरा मे मौजूद होयब: हम आत्मा रूप मे, ओकरा सभक भीतर एकटा अलग अस्तित्व रूप मे छी ।

ओकरा मे नहि रहब: भौतिक चीज सब जेकाँ – ओकरा सभक सम्पर्क मे एनाय, या कोनो बर्तन मे बन्द भेनाय जेकाँ ।

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ॥
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥९-५॥

Nor do beings exist in Me (in reality), behold My Divine Yoga! Bringing forth and supporting the beings, My Self does not dwell in them.

Vide 7-12.

Nor do, etc.: Because of the Self being unattached to or unconnected with any object, “Devoid of attachment, He is never attached.” – Brh. Upa. 3. 9. 26.

न ही जीव मुझमें (असल में) मौजूद हैं । मेरे दिव्य योग को देखो! जीवों को पैदा करने और उन्हें सहारा देने वाला मेरा स्व (आत्मा) उनमें नहीं रहता ।

देखें ७-१२.

न ही, वगैरह: क्योंकि स्व किसी भी चीज से बन्धा हुआ या उससे जुड़ा हुआ नहीं है, “लगाव से रहित, वह कभी जुड़ा नहीं रहता ।” – बृहदोपनिषद् ३. ९. २६.

नहिये जीव हमरा मे (वास्तव मे) मौजूद अछि । हमर दिव्य योग केँ देखू ! जीव सब केँ उत्पन्न कयनाय आ ओकरा सब केँ सहारा दयवला (पालन करयवला) हमर ‘स्व’ ओकरा सब मे नहि रहैत अछि ।

देखू ७-१२.

नहिये, आदि: कियैक तँ स्व कोनो भी चीज सँ बान्हल या ओकरा सँ जुड़ल नहि रहैछ, “लगाव सँ रहित, ओ कखनहुँ जुड़ल नहि रहैत अछि ।” – बृहत् उपनिषद् – ३. ९. २६.

यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ॥
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥९-६॥

As the mighty wind, moving always everywhere, rests ever in the Akasa, know thou, that even so do all beings rest in Me.

Rests ever in Akasa: without being attached to it.

The idea is that beings rest in the Lord without contact with, and so without producing any effect on Him.

जैसे तेज हवा, जो हमेशा हर जगह चलती रहती है, हमेशा आकाश में रहती है, वैसे ही जान लो कि सभी जीव मुझमें रहते हैं ।

हमेशा आकाश में रहते हैं: उससे जुड़े बिना ।

मतलब यह है कि जीव भगवान के संपर्क में आए बिना, और उन पर कोई असर डाले बिना, उनमें रहते हैं ।

जेना तेज हवा, जे हमेशा हर जगह चलैत रहैत अछि, हमेशा आकाश मे रहैत अछि, तहिना जानि लिय’ जे सबटा जीव हमरा मे रहैत अछि । 

हमेशा आकाश मे रहैत अछि: ओकरा सँ जुड़ने बिना ।

मतलब ई भेल जे जीव भगवान केर सम्पर्क मे एने बिना, आर हुनका उपर कोनो असर डालने बिना, हुनका मे रहैत अछि ।

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ॥
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥९-७॥

At the end of a Kalpa, O son of Kunti, all beings go back to My Prakriti; at the beginning of (another) Kalpa, I send them forth again.

Prakriti: The inferior one composed of the three Gunas.

Kalpa: a period of cosmic manifestation.

कल्प के अंत में, हे कुंती के पुत्र, सभी प्राणी मेरी प्रकृति में वापस चले जाते हैं; (दूसरे) कल्प की शुरुआत में, मैं उन्हें फिर से भेजता हूं ।

प्रकृति: तीन गुणों से बनी निम्नतर प्रकृति ।

कल्प: ब्रह्मांडीय सृष्टि की अवधि ।

कल्प केर अन्त मे, हे कुंतीपुत्र, सब प्राणी हमर प्रकृति मे वापस चलि जाइत अछि; (दोसर) कल्प केर आरम्भ मे, हम ओकरा फेर सँ पठबैत छी ।

प्रकृति: तीन गुण सँ बनल निम्नतर प्रकृति ।

कल्प: ब्रह्मांडीय सृष्टि केर अवधि ।

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ॥
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥९-८॥

Animating My Prakriti, I project again and again this whole multitude of beings, helpless under the sway of Prakriti.

Animating My Prakriti: invigorating and fertilising the Prakriti dependent on Him, which had gone to sleep at the universal dissolution, at the end of the Kalpa.

अपनी प्रकृति को जीवंत करते हुए, मैं बार-बार इन सभी जीवों को प्रस्तुत करता हूँ (सृष्टि रचता हूँ), जो प्रकृति के प्रभाव में बेवश रहते हैं ।

अपनी प्रकृति को जीवंत करना: उनपर निर्भर प्रकृति को मजबूत करना और उपजाऊ बनाना, जो कल्प के अंत में, दुनिया के खत्म होने पर सो गई थी ।

अपन प्रकृति केँ जिवन्त करैत, हम बेर-बेर एहि समस्त जीव सब केँ सोझाँ (सृष्टि मे) अनैत छी, जे सब प्रकृतिक प्रभाव मे विवश रहैत अछि । 

अपन प्रकृति केँ जिवन्त करब: ओकरा सब पर निर्भर प्रकृति केँ मजबूत करब आर उपजाउ बनायब, जे कल्पक अन्त मे, दुनियाक खत्म भेलापर सुति रहल छल ।

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥९-९॥

These acts do not bind Me, sitting as one neutral, unattached to them, O Dhananjaya.

These acts: which involve the unequal creation and dissolution of the universe.

As in the case of Isvara, so in the case of others also, the absence of the egoistic feelings of agency and attachment for results, is the cause of freedom (from Dharma and Adharma).

हे धनंजय, ये काम मुझे बांधते नहीं हैं, क्योंकि मैं उनसे उदासीन (न्यूट्रल) और अनासक्त रहता हूँ ।

ये काम: जिनमें ब्रह्मांड का असमान रूप से बनना और खत्म होना शामिल है ।

जैसे ईश्वर के मामले में, वैसे ही दूसरों के मामले में भी, कर्तापन की अहंकारी भावनाओं और परिणामों (फलों) के प्रति आसक्ति (राग) का न होना, (धर्म और अधर्म से) मुक्ति का कारण है ।

हे धनंजय, ई कर्म हमरा बाँधैत नहि अछि, कियैक तँ हम ओहि सँ उदासीन (न्यूट्रल) आर अनासक्त रहैत छी ।

ई कर्म: जाहि मे ब्रह्मांड केर असमान रूप सँ बननाय आर खत्म भेनाय शामिल अछि ।

जेना ईश्वर केर मामिला मे, तहिना दोसरहु सभक मामिला मे, कर्तापन केर अहंकारी भावना सब तथा परिणाम (फल) केर प्रति आसक्ति (राग) केर नहि होयब, (धर्म आ अधर्म सँ) मुक्ति केर कारण थिक ।

मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ॥
हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥९-१०॥

By reason of My proximity, Prakriti produces all this, the moving and unmoving; the world wheels round and round, O son of Kunti, because of this.

In verses 7-10 the Lord defines His position, following the Arundhati Nyaya. When a bride is brought to her husband’s house for the first time, he shows her a very tiny star, called Arundhati. To do this, he has to direct her gaze the right way, which he does by asking her to look at something near and something big, in the direction of the star, e.g., a branch of a tree. Next, he draws her attention to a large bright star observed beyond this branch, and so on, till by several steps, he succeeds in leading her eyes to the right thing. This method of leading to a subtle object through easy step, is called Arundhati-Nyaya. The Lord begins by stating that He projects all beings at the beginning of evolution; Prakriti is only that act, since He sits by, as one neutral, perfectly unattached. Lastly, He leads up to the final truth that really He does nothing, that it is Prakriti, who animated by His proximity produces all that is. It is His Light that lights up Prakriti, and makes her live and act. That is all the relation between Him and her.

मेरे साथ निकटता (सामीप्यता) होने की वजह से, प्रकृति यह सब बनाती है, चलती-फिरती और अचल सभी कुछ; दुनिया इसी वजह से गोल-गोल घूमती रहती है, हे कुंतीपुत्र ।

श्लोक ७ – १० में भगवान अरुंधति न्याय के हिसाब से अपने स्थान (काम) को परिभाषित करते हैं । जब एक दुल्हन को पहली बार उसके पति के घर लाया जाता है, तो वह उसे एक बहुत छोटा तारा दिखाता है, जिसे अरुंधति कहते हैं । ऐसा करने के लिए, उसे उसकी नज़र को सही दिशा में लगानी होती है, जो वह उसे तारे की दिशा में किसी पास और किसी बड़ी चीज़ को देखने के लिए कहकर करता है, जैसे, पेड़ की एक डाली । इसके बाद, वह उसका ध्यान उस डाली के पार के किसी बड़े चमकीले तारे की ओ खींचता है, और इसी तरह, और कई चरणों में, वह उसकी आँखों को सही चीज (यानि अरुंधति तारे) की ओर ले जाने में कामयाब हो जाता है । आसान कदम से किसी सूक्ष्म चीज की ओर ले जाने का इस तरीके को अरुंधति-न्याय कहते हैं । भगवान यह कहकर शुरू करते हैं कि वह सभी जीवों को सृष्टि-विकास के आरम्भ में प्रस्तुत करते हैं; प्रकृति मात्र का वह काम है, क्योंकि वे (भगवान्) केवल पास में, एक उदासीन, पूरी तरह से अनासक्त के रूप में बैठे हुए हैं । आखिर में, वह इस आखिरी सच तक ले जाते हैं कि असल में वह कुछ नहीं करते, यह प्रकृति है, जो उनके पास (समीप) होने से जिवन्तता प्राप्त कर सब कुछ बनाती है । यह उनकी रोशनी है जो प्रकृति को रोशन करती है, और उसे जिंदा और काम करने लायक बनाती है । उनके और प्रकृति के बीच बस यही रिश्ता है ।

हमरा संग नजदीकी (सामीप्यता) हेबाक कारण सँ, प्रकृति ई सब बनबैत अछि, चलैत-फिरैत आ अचल सब किछु; दुनिया एहि कारण सँ गोल-गोल घुमैत रहैत अछि, हे कुंतीपुत्र ।

श्लोक ७ सँ १० मे भगवान अरुंधति न्याय केर हिसाब सँ अपन स्थान (भूमिका) केँ परिभाषित करैत छथि । जखन एकटा दुल्हिन केँ पहिल बेर हुनकर पतिक घर आनल जाइत छन्हि, त पति हुनका एकटा बहुते छोट सन तारा देखबैत छथि, जेकरा अरुंधति कहल जाइत छैक । एना करबाक लेल, हुनका (पति केँ) हुनकर (पत्नीक) नजरि केँ सही दिशा मे लगेबाक (आँखि सँ तकबाक) रहैत छन्हि, जे ओ ओहि ताराक दिशा मे कोनो लग-पासक चीज आ कनेक पैघ आकारक चीज केँ देखबाक लेल कहिकय कयल जाइछ, जेना, कोनो गाछक ठाढ़ि । तेकरा बाद, पति हुनकर ध्यान ओहि ठाढ़िक पार केर कोनो पैघ चमकैत तारा दिश खिंचैत छथि, आर एहि तरहें, आरो कतेको चरण मे, ओ (पति) हुनकर आँखि केँ सही चीज दिश लय जेबा मे सफल भ’ जाइत छथि । सहज डेग (चरण) सँ कोनो सूक्ष्म चीज दिश लय जेबाक एहि तरीका केँ अरुंधति-न्याय कहल जाइत छैक । भगवान ई कहिकय शुरू करैत छथि जे ओ सब जीव केँ सृष्टि-विकास केर आरम्भ मे प्रस्तुत करैत छथि; प्रकृति मात्र केर ओ काज थिकैक, कियैक तँ ओ (भगवान्) मात्र लग मे, एकटा उदासीन, पूरा तरह सँ अनासक्त केर रूप मे बैसल छथि । अन्त मे, ओ (भगवान) एहि अन्तिम सत्य धरि लय जाइत छथि जे असल मे ओ किछु नहि करैत छथि, ई प्रकृति थिक, जे हुनकर लग (समीप) भेला सँ जिवन्तता प्राप्त कय सब किछु बनबैत (सृजन करैत) अछि । ई हुनकर इजोत (रोशनी) छी जे प्रकृति केँ प्रकाशित (रोशन) करैत अछि, आर ओकरा जिन्दा आ काज करय लायक बनबैत अछि । हुनका आ प्रकृति केर बीच बस यैह सम्बन्ध अछि ।

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ॥
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥९-१३॥

But the great-souled ones, O son of Prtha, possessed of the Divine Prakriti, knowing Me to be the origin of beings and immutable, worship Me with a single mind.

लेकिन हे पृथा के पुत्र, जो महान आत्मा वाले (महापुरुष), दिव्य प्रकृति वाले हैं, वे मुझे प्राणियों का मूल और अपरिवर्तनीय जानकर एक मन (अनन्य चित्त) से मेरी पूजा करते हैं ।

मुदा हे पृथाक पुत्र, जे महान आत्मा वला (महापुरुष), दिव्य प्रकृतिवला छथि, से हमरा समस्त भूतादि प्राणी सभक मूल अव्यय आर अपरिवर्तनीय जानिकय एक मन (अनन्य चित्त) सँ हमर पूजा करैत छथि ।

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ॥
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥९-१४॥

Glorifying Me always and striving with firm resolve, bowing down to Me in devotion, always steadfast, they worship Me.

वे हमेशा मेरी बड़ाई (कीर्तन) करते हुए, दृढ़ इरादे से कोशिश करते हुए, भक्ति से मुझे नमन करते हुए, हमेशा दृढ़ होकर मेरी पूजा करते हैं ।

ओ लोकनि हमेशा हमर बड़ाइ (कीर्तन) करैत छथि, दृढ़ मनसाय सँ कोशिश करैत, भक्ति सँ हमरा नमन (प्रणाम) करैत, हमेशा दृढ़ बनिकय हमर पूजा करैत छथि ।

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ॥
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥९-१५॥

Others, too, sacrificing by the Yajna of knowledge (i.e., seeing the Self in all), worship Me the All-Formed, as one, as distinct, as manifold.

All-Formed: He who has assumed all the manifold forms in the universe.

As one: identifying himself with the All-Formed – the Advaita view.

As distinct: making a distinction in essence between the Lord and himself – the Dualistic view.

As manifold: as the various divinities, Brahma, Rudra, etc.

अन्य लोग भी, ज्ञान के यज्ञ में (यानी कि, सभी में परमात्मा को देखते हुए) आहुति देकर, मुझ सर्वरूप को, एक समझकर, अलग समझकर, और अनेक रूपों में पूजा करते हैं ।

सर्वरूप: वह जिसने ब्रह्मांड में सभी प्रकार के अनेकों रूप धारण किए हैं ।

एक: खुद को सर्वरूप के साथ पहचानना – अद्वैत नजरिया । (सब में एक को ही देखना ।)

अलग: भगवान और खुद के बीच असल में फर्क करना – द्वैत नजरिया ।

अनेक: अलग-अलग देवताओं, ब्रह्मा, रुद्र, आदि की तरह ।

आनो लोक सब, ज्ञान केर यज्ञ में (यानि कि सब मे परमात्मा केँ देखैत) आहुति दय केँ, हम सर्वरूप केँ, एक (रूप मे) बुझैत, अलग (रूप मे) बुझैत, अनेक रूप मे (बुझैत) पूजा करैत छथि ।

सर्वरूप: ओ जे ब्रह्मांड मे सब तरहक अनेकों रूप धारण कयलनि अछि ।

एक: स्वयं केँ सर्वरूपक संग चिन्हनाय – अद्वैत नजरिया । (सब मे एकमात्र परमात्मा केँ देखनाय, अपन आत्माक संगहि सभक आत्मा केँ एकमात्र परमात्माक अंश रूप मे देखनाय ।)

अलग: भगवान आर स्वयं केर बीच असल मे फर्क कयनाय – द्वैत नजरिया ।

अनेक: अलग-अलग देवता लोकनि, ब्रह्मा, रुद्र, आदिक जेकाँ ।

अहं ऋतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ॥
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥९-१६॥

I am the Kratu, I the Yajna, I the Svadha, I the Ausadha, I the Mantra, I the Ajya, I the fire, and I the oblation.

Kratu: is a particular Vedic rite.

Yajna: The worship enjoined in the Smriti.

Svadha: food offered to the manes (Pitrs)

Ausadha: all vegetable food and medicinal herbs.

Mantra: the chant with which oblation is offered.

Ajya: articles of oblation.

The fire: into which the offering is poured.

मैं क्रतु हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं स्वधा हूँ, मैं औषध हूँ, मैं मंत्र हूँ, मैं अज्या हूँ, मैं अग्नि हूँ, और मैं आहुति हूँ ।

क्रतु: एक खास वैदिक रस्म है ।

यज्ञ: स्मृति में बताई गई पूजा ।

स्वधा: पितरों को चढ़ाया जाने वाला हविष्य (खाना, भोजन) ।

औषध: सभी शाकाहारी भोजन और दवा वाली जड़ी-बूटियाँ ।

मंत्र: वह जाप जिससे आहुति दी जाती है ।

अज्या: आहुति की चीज़ें ।

अग्नि: जिसमें आहुति डाली जाती है ।

हम क्रतु छी, हम यज्ञ छी, हम स्वधा छी, हम औषध छी, हम मंत्र छी, हम अज्या छी, हम अग्नि छी, आर हम आहुति छी ।

क्रतु: एकटा खास वैदिक विध थिक ।

यज्ञ: स्मृति मे कहल गेल पूजा ।

स्वधा: पितर सब केँ अर्पित (चढ़ायल जायवला) हविष्य (खाना, भोजन) ।

औषध: समस्त शाकाहारी भोजन और दवाइ वला जड़ी-बूटी सब ।

मंत्र: ओ जाप जाहि सँ आहुति देल जाइत अछि ।

अज्या: आहुति केर वस्तु (हविष्य) ।

अग्नि: जाहि मे आहुति देल जाइत अछि ।

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ॥
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक् साम यजुरेव च ॥९-१७॥
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ॥
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥९-१८॥

I am the Father of this world – the Mother, the Sustainer, the Grandfather, the Purifier, the (one) thing to be known, (the syllable) Om, and also the Rk , Samam, and Yajus. The Goal, the Supporter, the Lord, the Witness, the Abode, the Refuge, the Friend, the Origin, the Dissolution, the Substratum, the Storehouse, the Seed immutable.

Sustainer: by dispensing fruit of action

Seed: cause of the origin of all things.

Immutable: because it endures so long as the Samsara endures.

मैं इस दुनिया का पिता हूँ – माँ, पालने वाला, दादा, पवित्र करने वाला, जानने लायक (एक) चीज़, (अक्षर) ॐ, और ऋक्, समं, और यजुस् भी हूँ । प्राप्य लक्ष्य, सहारा देने वाला, भगवान, साक्षी, निवास (रहने की जगह), शरण (आश्रय), मित्र, आरम्भ (आदि), अंत, आधार (नींव), भंडार और कभी नहीं बदलनेवाला बीज; 

पालने वाला: कर्म का फल देकर ।

बीज: सभी चीज़ों की शुरुआत का कारण ।

बदलता नहीं: क्योंकि यह तब तक रहता है जब तक संसार रहता है ।

हम एहि दुनिया केर पिता छी – माता, पालनहार, पितामह, पवित्र करयवला, जानय योग्य (एकमात्र श्रेष्ठतम्) चीज, (अक्षर) ॐ, तथा ऋक्, समं, आ यजुस् सेहो छी । प्राप्य लक्ष्य, सहारा देनिहार, भगवान्, (समस्त कार्यक-घटना आदिक) साक्षी, निवास (रहबा योग्य स्थान), शरण (आश्रय), मित्र, आरम्भ (आदि), अन्त, आधार (नींव), भंडार तथा कहियो नहि बदलयवला बीज (अपरिवर्तनशील);

पालनहार: कर्म केर फल दय केँ ।

बीज: सब चीजक आरम्भ केर कारण ।

बदलैत नहि अछि: कियैक तँ ई ताबत धरि रहैत अछि जाबत धरि संसार रहैत छैक ।

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ॥
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥९-१९॥

(As sun) I give heat; I withhold and send forth rain; I am immortality and also death; being and non-being am I, O Arjuna !

Being: The manifested world of effects.

Non-being: means, the cause which is unmanifested only and not non-existence, otherwise we have to conceive existence coming out of non-existence, which is absurd. The Sruti says, “How can existence come out of non-existence?” – Chandogya Upanishad VI. ii. 2.

(सूरज के रूप में) मैं गर्मी देता हूं; मैं वर्षा को रोकता और भेजता हूं; मैं अमरता भी हूँ और मृत्यु भी हूं; हे अर्जुन, सत् और असत् मैं ही हूं !

अस्तित्व: प्रभावों की प्रकट दुनिया ।

गैर-अस्तित्व: का अर्थ है, वह कारण जो केवल अव्यक्त है और गैर-अस्तित्व नहीं है, अन्यथा हमें अस्तित्व को गैर-अस्तित्व से उत्पन्न होने की कल्पना करनी होगी, जो बेतुका होगी । श्रुति कहती है, “गैर-अस्तित्व से अस्तित्व कैसे निकल सकता है?” – छांदोग्य उपनिषद VI. द्वितीय. २.

(सूरज केर रूप मे) हम गर्मी दैत छी; हम वर्षा केँ रोकैत आर पठबैत छी; हम अमरता सेहो छी आर मृत्यु सेहो छी; हे अर्जुन, सत् आर असत् हमहीं छी !

अस्तित्व: प्रभाव सभक प्रकट (व्यक्त) संसार ।

गैर-अस्तित्व: केर अर्थ अछि, ओ कारण जे केवल अव्यक्त (अप्रकट) अछि आर गैर-अस्तित्व नहि अछि, अन्यथा हमरा सब केँ अस्तित्व केर गैर-अस्तित्व सँ उत्पन्न हेबाक कल्पना करय पड़त, जे बेतुका होयत । श्रुति कहैत अछि, “गैर-अस्तित्व सँ अस्तित्व केना निकलि सकैछ ?” – छांदोग्य उपनिषद VI. द्वितीय. २.

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ॥
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥९-२०॥

The knowers of the three Vedas, worshipping Me by Yajna, drinking the Soma, and (thus) being purified from sin, pray for passage to heaven; reaching the holy world of the Lord of the Devas, they enjoy in heaven the divine pleasures of the Devas.

Lord of the Devas: Indra, who is called Satakratu, because he had performed a hundred sacrifices.

तीनों वेदों के जानकार, यज्ञ से मेरी पूजा करते हैं, सोम पीते हैं, और (इस तरह) पाप से शुद्ध होकर, स्वर्ग जाने के लिए प्रार्थना करते हैं; देवों के स्वामी की पवित्र दुनिया में पहुँचकर, वे स्वर्ग में देवताओं के दिव्य सुखों का आनंद लेते हैं ।

देवों के स्वामी: इंद्र, जिन्हें शतक्रतु कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने सौ यज्ञ किए थे ।

तीनू वेद केर जानकार, यज्ञ सँ हमर पूजा करैत छथि, सोम पिबैत छथि, आर (एहि तरहें) पाप सँ शुद्ध भ’ कय, स्वर्ग जेबाक लेल प्रार्थना करैत छथि; देवता लोकनिक स्वामी (इन्द्र) केर पवित्र दुनिया मे पहुँचिकय, ओ सब स्वर्ग मे देवता लोकनिक दिव्य सुख सभक आनन्द लैत छथि ।

देवता लोकनिक स्वामी: इन्द्र, जिनका शतक्रतु कहल जाइत छन्हि, कियैक तँ ओ सौ गोट यज्ञ कएने रहथि ।

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ॥
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥९-२१॥

Having enjoyed the vast Svarga-world, they enter the mortal world, on the exhaustion of their merit. Thus, abiding by the injunctions of the three (Vedas), desiring desires, they (constantly) come and go.

Injunctions: Ritualistic, the Karma-Kanda.

विशाल स्वर्ग-लोक का आनंद लेने के बाद, वे अपने पुण्य के खत्म होने पर नश्वर लोक में प्रवेश करते हैं । इस प्रकार, तीनों (वेदों) के आदेशों का पालन करते हुए, इच्छाओं की कामना करते हुए, वे (लगातार) आते-जाते रहते हैं ।

आदेश: पारम्परिक विधान, कर्म-कांड ।

विशाल स्वर्ग-लोक केर आनन्द लेलाक बाद, ओ लोकनि अपन पुण्य केर खत्म भेलापर नश्वर लोक मे प्रवेश करैत छथि । एहि प्रकारे, तीनू (वेद) केर आदेश सभक पालन करैत, इच्छा सभक कामना करैत, ओ लोकनि (लगातार) अबैत-जाइत रहैत छथि ।

आदेश: पारम्परिक विधान, कर्म-कांड ।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ॥
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥९-२२॥

Persons who, meditating on Me as non-separate, worship Me in all beings, to them thus ever zealously engaged, I carry what they lack and preserve what they already have.

Ananyah: as non-separate, i.e., looking upon the Supreme Being as not separate from their own self. Or Ananya may mean, without any other (thought). Then the translation of the Sloka should be – persons who worship Me in all beings, never harbouring any other thought, the them, etc.

I carry, etc.: Because while other devotees work for their own gain and safety, those who do not see anything as separate from themselves, do not do so; they even do not cherish a desire for life; so the Lord assures to them gain and safety.

जो लोग मुझे अलग न मानकर ध्यान करते हैं, सभी प्राणियों में मेरी पूजा करते हैं, जो लोग इस तरह हमेशा उत्साह (जोश) से लगे रहते हैं, मैं उनकी कमी पूरी (वहन) करता हूँ और जो उनके पास पहले से है उसे सुरक्षित रखता हूँ ।

अनन्य: अलग न मानकर, यानी भगवान को खुद से अलग न मानना । या अनन्य का मतलब हो सकता है, बिना किसी दूसरे (विचार) के । तो श्लोक का मतलब होना चाहिए – जो लोग सभी प्राणियों में मेरी पूजा करते हैं, कभी कोई दूसरा विचार नहीं रखते, वे लोग, इत्यादि ।

मैं पूरी (वहन) करता हूँ, आदि: क्योंकि जहाँ दूसरे भक्त अपने फायदे और सुरक्षा के लिए काम करते हैं, वहीं जो लोग खुद से अलग कुछ नहीं देखते, वे ऐसा नहीं करते; वे जीवन की इच्छा भी नहीं रखते; इसलिए भगवान उन्हें लाभ और सुरक्षा का भरोसा देते हैं ।

जे लोक हमरा अलग नहि मानिकय ध्यान करैत अछि, सब प्राणी सब मे हमर पूजा करैत अछि, जे लोक एहि तरहें हमेशा उत्साह (जोश) सँ लागल रहैत अछि, हम ओकर सबटा कमी केँ पूरा (वहन) करैत छी आर जे ओकरा लग पहिनहिं सँ छैक तेकरा सुरक्षित रखैत छी ।

अनन्य: अलग नहि मानिकय, यानि भगवान केँ स्वयं सँ अलग नहि मननाय । या अनन्य केर मतलब भ’ सकैछ, बिना कोनो दोसर (विचार) केर । त श्लोक केर मतलब हेबाक चाही – जे लोक सब प्राणी सब मे हमर पूजा करैत अछि, कखनहुँ कोनो दोसर विचार नहि रखैत अछि, ओ सब, आदि । 

हम पूरा (वहन) करैत छी, आदि: चूँकि जेतय दोसर भक्त सब अपन लाभ आ सुरक्षा लेल काज करैत अछि, ओतहि जे लोक स्वयं सँ अलग किछु नहि देखैछ, ओ सब एना नहि करैत अछि; ओ सब जीवन केर इच्छा सेहो नहि रखैत अछि; तेँ भगवान ओकरा सब केँ लाभ एवं सुरक्षाक भरोसा दैत छथि ।

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ॥
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥९-२३॥

Even those devotees, who endued with Sraddha, worship other gods, they too worship Me alone, O son of Kunti, (but) by the wrong method.

Wrong method: ignorantly, not in the way by which they can get Moksa.

हे कुंतीपुत्र, जो भक्त श्रद्धा से भरे हुए दूसरे देवताओं की पूजा करते हैं, वे भी सिर्फ मेरी ही पूजा करते हैं, (लेकिन) गलत तरीके से ।

गलत तरीका: अनजाने में, उस तरीके से नहीं जिससे उन्हें मोक्ष मिल सकता है ।

हे कुंतीपुत्र, जे भक्त श्रद्धा सँ भरल अन्य (दोसर) देवता सभक पूजा करैत छथि, ओहो सब मात्र हमरहि पूजा करैत छथि, मुदा गलत तरीका सँ । 

गलत तरीका: अनजान मे (अज्ञानतावश), ओहि तरीका सँ नहि जाहि सँ हुनका सब केँ मोक्ष भेटि सकैत छन्हि । 

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ॥
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥९-२४॥

For I alone am the Enjoyer, and Lord of all Yajnas; but because they do not know Me in reality, they return (to the mortal world).

They return – by worshipping other gods they attain no doubt to the spheres of their sacrifice, but after the exhaustion of this merit, they fall from those spheres and return to the mortal world.

क्योंकि मैं ही सभी यज्ञों का भोगी और स्वामी हूँ; लेकिन क्योंकि वे मुझे असल में नहीं जानते, इसलिए वे (मृत्युलोक में) लौट जाते हैं ।

वे लौटते हैं – दूसरे देवताओं की पूजा करके वे बेशक अपने यज्ञ के लोकों में पहुँचते हैं, लेकिन इस पुण्य के खत्म होने के बाद, वे उन लोकों से गिर जाते हैं और मृत्युलोक में लौट जाते हैं ।

चूँकि हमहीं सब यज्ञक भोगी (भोग प्राप्तकर्ता) आर स्वामी (मालिक) छी; लेकिन चूँकि ओ सब (अन्यान्य देवताक यज्ञकर्ता लोकनि) हमरा असल मे नहि जनैत छथि, तेँ ओ सब (मृत्युलोक) मे घुरि अबैत छथि । (पुनर्जन्म लियए पड़ैत छन्हि ।)

ओ सब घुरि अबैत छथि – दोसर देवता सभक पूजा कयकेँ ओ सब बिना सन्देह अपन कयल गेल त्याग-बलिदान (यज्ञ, पुण्य) केर परिधि (लोक सब) मे पहुँचैत छथि, मुदा एहि पुण्य केर खत्म भेलाक बाद, ओ सब ओहि लोक सँ खसि पड़ैत छथि आर मृत्युलोक मे घुरि अबैत छथि । 

यान्ति देवव्रता देवान् पितृन्यान्ति पितृव्रताः ॥
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥९-२५॥

Votaries of the Devas go to the Devas; to the Pitrs, go their votaries; to the Bhutas, go the Bhuta worshippers; My votaries too come unto Me.

Bhutas: beings lower than the Devas, but higher than human beings.

Me: The Imperishable.

देवताओं के समर्थक देवताओं के पास जाते हैं; पितरों के पास, उनके उपासक जाते हैं; भूतों के पास, भूत पूजक लोग जाते हैं; मेरे समर्थक भी मेरे पास आते हैं ।

भूत: देवों से निम्नतर, लेकिन मनुष्यों से ऊँचे प्राणी ।

मैं: अविनाशी (परमात्मा) ।

देवता लोकनिक समर्थक देवता लोकनि लग जाइत छथि; पितर सब लग, हुनकर उपासक जाइत छथि; भूत सब लग, भूत पूजक सब जाइत छथि; हमर उपासक-समर्थक हमरा लग अबैत छथि ।

भूत: देवता सब सँ नीचाँ, मुदा मनुष्य सब सँ ऊँचा प्राणी ।

हम: अविनाशी (परमात्मा) ।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ॥
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥९-२६॥

Whoever with devotion offers Me a leaf, a flower, a fruit, or water, that I accept – the devout gift of the pure-minded.

Not only does the single-minded devotion to the Supreme lead to imperishable result, but it is also so easy and simple to perform – says Krishna in this Sloka.

जो कोई भी भक्ति से मुझे एक पत्ता, एक फूल, एक फल, या पानी देता है, मैं उसे स्वीकार करता हूँ – शुद्ध मन वाले का भक्तिपूर्ण दान (को मैं स्वीकार करता हूँ) ।

परमात्मा के प्रति एकनिष्ठ भक्ति न केवल अविनाशी फल देती है, बल्कि इसे करना भी बहुत आसान और सरल है – कृष्ण इस श्लोक में कहते हैं ।

जे कियो लोक भक्ति सँ हमरा एकटा पत्ता, एकटा फूल, एकटा फल, या जले अर्पित करैत अछि, हम तेकरा स्वीकार करैत छी – शुद्ध मनवला लोकक भक्तिपूर्ण दान (केँ हम स्वीकार करैत छी) ।

परमात्माक प्रति एकनिष्ठ भक्ति नहि केवल अविनाशी फल दैत अछि, बल्कि एकरा कयनाय सेहो बहुते आसान आ सरल छैक – कृष्ण एहि श्लोक मे यैह कहैत छथि ।

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ॥
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥९-२७॥

Whatever thou doest, whatever thou eatest, whatever thou givest away, whatever austerity thou practisest, O son of Kunti, do that as an offering unto Me.

हे कुंतीपुत्र, तुम जो कुछ भी करते हो, जो कुछ भी खाते हो, जो कुछ भी दान करते हो, जो भी तपस्या करते हो, वह सभी ऐसे करो जैसे मुझे अर्पण कर रहे हो ।

हे कुंतीपुत्र, अहाँ जेहो किछु करैत छी, जेहो किछु खाइत छी, जेहो किछु दान करैत छी, जेहो तपस्या करैत छी, से सबटा एना करू जेना हमरा अर्पण कय रहल छी । 

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ॥
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥९-२८॥

Thus shalt thou be freed from the bondages of sections, bearing good and evil results; with the heart steadfast in the Yoga of renunciation, and liberated thou shalt come unto Me.

The Yoga of renunciation: This way of purification of the heart by offering everything to the Lord.

Liberated, etc.: thou shalt be liberated while in the body, and as its death, become Me.

इस तरह तुम अच्छे और बुरे परिणाम भुगतने वाले कर्मों के बंधनों से मुक्त हो जाओगे; संन्यास (त्याग) के योग में हृदय को दृढ़ करके, और मुक्त होकर तुम मेरे पास आओगे ।

संन्यास (त्याग) का योग: भगवान को सब कुछ अर्पण करके दिल को साफ करने का यह तरीका ।

मुक्त, वगैरह: तुम शरीर में रहते हुए स्वतंत्र हो जाओगे, और इसकी मौत के बाद, तुम ‘मैं’ बन जाओगे । (मेरा रूप बन जाओगे ।)

एहि तरहें अहाँ नीक आ बेजा परिणाम (फल) भोगयवला कर्म सभक बन्धन सँ मुक्त भ’ जायब; संन्यास (त्याग) केर योग मे हृदय केँ दृढ़ कयकेँ, आर मुक्त भ’ कय अहाँ हमरा लग आबि जायब । 

संन्यास (त्याग) केर योग: भगवान केँ सब किछु अर्पण कयकेँ हृदय केँ साफ करबाक ई तरीका ।

मुक्त, आदि: अहाँ शरीर मे रहिते स्वतंत्र भ’ जायब, आर एकर मरलाक बाद, अहाँ ‘हम’ बनि जायब । (हमर रूप बनि जायब ।)

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ॥
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥९-२९॥

I am the same to all beings; to Me there is none hateful or dear. But those who worship Me with devotion, are in Me, and I too am in them.

I am like fire. As fire gives heat to those who draw near to it, and not to those who move away from it, even so do I. My grace falls upon My devotees, but not owing to any attachment on My part. As the sun’s light, though pervading everywhere, is reflected in a clean mirror, so also I, the Supreme Lord, present as a matter of course everywhere, manifest Myself in these persons only, from whose minds all the dirt of ignorance has been removed by devotion.

मैं सभी जीवों के लिए एक जैसा हूँ; मेरे लिए कोई घृणा करने वाला या प्यारा नहीं है । लेकिन जो लोग भक्ति से मेरी पूजा करते हैं, वे मुझमें हैं, और मैं भी उनमें हूँ ।

मैं आग की तरह हूँ । जैसे आग अपने पास आने वालों को गर्मी देती है, और दूर जाने वालों को नहीं, वैसे ही मैं भी करता हूँ । मेरी कृपा मेरे भक्तों पर होती है, लेकिन मेरी तरफ से किसी लगाव की वजह से नहीं । जैसे सूरज की रोशनी, हर जगह फैली होने के बावजूद, एक साफ शीशे में दिखाई देती है, वैसे ही मैं, परम भगवान, जो हर जगह मौजूद हूँ, सिर्फ उन्हीं लोगों में खुद को दिखाता हूँ, जिनके मन से भक्ति से अज्ञान की सारी गंदगी दूर हो गई है ।

हम सब जीव सभक वास्ते एक समान छी; हमरा लेल कियो घृणा करयवला या प्रिय नहि अछि । मुदा जे लोक भक्ति सँ हमर पूजा करैत अछि, ओ हमरा मे अछि, आर हम ओकरा मे छी । 

हम आगि जेकाँ छी । जेना आगि अपना लग अयनिहार केँ गर्मी दैत अछि, आर दूर गेनिहार केँ नहि, तहिना हमहुँ करैत छी । हमर कृपा हमर भक्त सब पर होइत अछि, मुदा हमरा तरफ सँ कोनो राग (लगाव) केर कारण सँ नहि । जेना सूर्यक प्रकाश, सब जगह पसरल रहलाक बादहु, एकटा साफ आइना (शीशा) मे झलकैत अछि, तहिना हम, परम भगवान, जे हर जगह मौजूद छी, मात्र वैह लोक मे व्यक्त (प्रकटरूप) देखाइत छी, जेकर मन सँ भक्ति सँ अज्ञानक सबटा गन्दगी दूर भ’ गेल छैक । 

अपि चेत सुदुराचारो भजते माननन्यभाक् ॥
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्‌व्यवसितो हि सः ॥९-३०॥

If even a very wicked person worships Me, with devotion to none else, he should be regarded as good, for he has rightly resolved.

He has rightly resolved: He is one who has formed a holy resolution, to abandon the evil ways of his life.

अगर कोई बहुत बुरा इंसान भी मेरी पूजा करता है, तथा किसी और की भक्ति नहीं करता, तो उसे अच्छा माना जाना चाहिए, क्योंकि उसने सही निर्णय लिया है ।

उसने सही निर्णय लिया है: वह वह है जिसने अपने जीवन के बुरे रास्तों को छोड़ने का पवित्र फैसला किया है ।

अगर कियो बहुते खराब लोक सेहो हमर पूजा करैत अछि, तथा कियो आर केर भक्ति नहि करैछ, त ओकरा नीक मानल जेबाक चाही, कियैक तँ ओ सही निर्णय लेलक अछि । 

ओ सही निर्णय लेलक अछि: ओ ओ छी जे अपन जीवनक खराब रास्ता केँ छोड़बाक पवित्र निर्णय कयलक अछि ।

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ॥
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥९-३१॥

Soon does he become righteous, and attain eternal Peace, O son of Kunti; boldly canst thou proclaim, that My devotee is never destroyed.

हे कुंतीपुत्र, वह जल्द ही धर्मी बन जाता है और शाश्वत शांति पाता है; तुम हिम्मत से कह सकते हो कि मेरा भक्त कभी खत्म नहीं होता ।

हे कुंतीपुत्र, ओ (सही निर्णय करयवला खराब लोक) जल्दिये धर्मी (धर्मानुसार चलयवला) बनि जाइत अछि आर शाश्वत शान्ति (कहियो खत्म नहि होयवला शान्ति) पबैत अछि; अहाँ हिम्मत सँ (खुलिकय) दावी (घोषणा) कय सकैत छी जे हमर भक्त कहियो खत्म (बर्बाद, नाश) नहि होइत अछि । 

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ॥
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥९-३२॥

For taking refuge in Me, they also, O son of Pritha, who might be of inferior birth, women, Vaisyas, as well as Sudras – even they attain to the Supreme Goal.

Of inferior birth…. Sudras: Because by birth, the Vaisyas are engaged only in agriculture, etc., and the women and Sudras are debarred from the study of the Vedas.

हे पृथा के पुत्र, मेरी शरण में आने से, चाहे वे नीच जन्म के हों, चाहे स्त्री, वैश्य, और शूद्र – वे भी परम गति को प्राप्त करते हैं ।

नीच जन्म के…. शूद्र: क्योंकि जन्म से वैश्य केवल खेती वगैरह में लगे होते हैं, और स्त्री और शूद्र वेदों की पढ़ाई से वंचित होते हैं ।

हे पृथाक पुत्र, हमर शरण मे अयला सँ, चाहे ओ नीच जन्म (पापयोनि) केर हो, चाहे स्त्री हो, वैश्य हो, आ शूद्र हो – ओहो सब परमगति केँ प्राप्त करैत अछि ।

नीच जन्म केर…. शूद्र: कियैक तँ जन्म सँ वैश्य केवल खेती वगैरह मे लागल रहैत अछि, और स्त्री एवं शूद्र वेद सब पढ़इ सँ वंचित रहैत अछि ।

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ॥
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥९-३३॥

What need to mention holy Brahmanas, and devoted Rajarsis ! Having obtained this transient, joyless world, worship thou Me.

Rajarsis: Kings who have attained to sainthood (Risihood).

What need, etc.: How much more easily then do the holy Brahmanas and the devoted royal saint attain that Goal!

Having… world: Being born in this human body which is hard to get, one should exert oneself immediately for perfection, without depending on the future, as everything in this world is transient, and without seeking for happiness, as this world is joyless.

पवित्र ब्राह्मणों और भक्त राजर्षियों का जिक्र करने की क्या जरूरत है ! इस पल भर की, आनन्दविहीन (बिना खुशी वाली) संसार को पाकर, मेरी पूजा करो ।

राजर्षि: वे राजा जो संत बन गए हैं (ऋषित्व प्राप्त राजा) ।

इनलोगों की चर्चा करने की जरूरत: तो फिर पवित्र ब्राह्मण और भक्त राज ऋषि लोगो उस लक्ष्य (परमात्मा) को कितनी आसानी से पा लेते हैं ! (इनलोगों की तो कहना ही क्या, ये तो जन्म से ही पवित्रता और अच्छी संस्कार, वेद आदि का स्वाध्याय, सन्तचर्चा, सत्संग आदि में लगे रहते हैं ।)

आनन्दविहीन दुनिया: इस मुश्किल से मिलने वाले इंसानी शरीर में जन्म लेकर, इंसान को तुरंत पूर्णता के लिए मेहनत करनी चाहिए, भविष्य पर निर्भर हुए बिना, क्योंकि इस दुनिया में सब कुछ पल भर का है, और खुशी की तलाश किए बिना, क्योंकि यह दुनिया बिना खुशी की है ।

पवित्र ब्राह्मण लोकनि आर भक्त राजर्षि लोकनिक त चर्चे करबाक कोन जरूरत अछि ! एहि पल भरि केर, आनन्दविहीन (बिना प्रसन्नतावाली) संसार केँ पाबिकय, बस हमर पूजा करू ।

राजर्षि: ओ राजा जे संत बनि गेलाह अछि (ऋषित्व प्राप्त राजा लोकनि) ।

हिनका लोकनिक चर्चा करबाक जरूरत: त फेर पवित्र ब्राह्मण आर भक्त राज ऋषि लोकनि केँ ओहि लक्ष्य (परमात्मा) केँ कतेक आसानी सँ पाबि लैत छथि !

आनन्दविहीन दुनिया: एहि मुश्किल सँ भेटयवला मानुषिक शरीर मे जन्म लय केँ, मनुष्य केँ तुरन्त पूर्णता प्राप्तिक लेल मेहनत करबाक चाही, भविष्य पर निर्भर भेने बिना, कियैक तँ एहि दुनिया मे सब किछु पलहि भरिक अछि, आर प्रसन्नता (खुशी) केर खोज कएने बिना, कियैक तँ ई दुनिया बिना खुशी केर अछि । 

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ॥
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥९-३४॥

Fill thy mind with Me, be My devotee, sacrifice unto Me, bow down to Me; thus having made thy heart steadfast in Me, taking Me as the Supreme Goal, thou shalt come to Me.

अपने मन को मुझसे भर लो, मेरे भक्त बनो, मुझ पर कुर्बान हो जाओ, मुझे प्रणाम करो; इस तरह अपना दिल मुझमें पक्का करके, मुझे अपना सबसे बड़ा लक्ष्य मानकर, तुम मेरे पास आ जाओगे ।

अपन मन केँ हमरा सँ भरि लिय’, हमर भक्त बनि जाउ, हमरा उपर बलिदान भ’ जाउ, हमरा प्रणाम करू; एहि तरहें अपन हृदय मे हमरा दृढ़तापूर्वक लगाकय, हमरा अपन सब सँ पैघ लक्ष्य मानिकय, अहाँ हमरा लग आबि जायब । 

इति राजविद्यागुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः !!

The end of the ninth chapter, designated “The Way of the Kingly Knowledge and the Kingly Secret”. 

हरिः हरः!!

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