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गीताक दसम अध्यायक प्रवीण व्याख्या

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गीताक दसम अध्यायक प्रवीण व्याख्या

– प्रवीण नारायण चौधरी

भगवद्भक्तिक अद्भुत महिमाक वर्णन उपरान्त आब दसम पड़ाव पर आबि गेल छी । भगवद्भक्तिक महिमा कहय सँ पहिने भगवान कृष्ण अर्जुन सँ बात-बात मे टोक लगेबाक आदति नहि हेबाक आ श्री कृष्ण द्वारा वर्णित गूढ़ सैद्धान्तिक बात सब केँ खुब नीक सँ मनन करबाक स्थितिक प्रशंसा करैत ‘राजविद्या’ बतेलनि । संकेत ई अछि जे मन कतबो उद्विग्न हो, गीता जेहेन गूढ़ सिद्धान्त केँ ‘अन्तिम सत्य’ बुझि बिना कोनो हिचकिचाहट हम सब स्वीकार करबाक मुद्रा मे बनल रही । आ जँ कोनो तरहक जिज्ञासा उत्पन्न हो त जगद्गुरु श्री कृष्णक शरण मे स्वयं केँ सौंपिकय अर्जुनवत् समाधान ताकी आ बूझी । आब देखू पुनः भगवान कृष्णहि केर उक्ति सँ एहि अध्याय केर शुरुआत भेल अछि –

श्रीभगवानुवाच ।

भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः ॥
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥१०-१॥

भगवान कहलनि:

फेर सँ, हे महाबाहु, हमर सबसँ पैघ बात (परम वचन केँ) सुनू, जे हम, अहाँक कल्याण हो ताहि इच्छा सँ, अहाँ केँ कहब जे (हमरा सुनिकय) आनन्दित छी ।

सबसँ पैघ बात: जे सबसँ अलग सच केँ देखबैत अछि ।

अर्जुन द्वारा भगवानक कथन सब सुनिकय आनन्दित अबस्था आ तदनुसार आर सत्य आ सुन्दर रहस्य सब स्वतःस्फूर्त भाव सँ बतेबाक इच्छा सँ श्री कृष्ण हुनका फेर कल्याणकारी वचन कहब आरम्भ कयलनि अछि ।

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ॥
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥१०-२॥

नहि तँ देवता लोकनि, नहिये महान ऋषि लोकनि, हमर मूल (हमर उत्पत्ति, प्रभवं) केँ जनैत छथि, कियैक तँ हर तरीका सँ हमहीं देवता लोकनिक एवं महान ऋषि लोकनिक स्रोत छी । 

प्रभवं: उच्च उत्पत्ति (जन्म) – यद्यपि जन्महीन छथि, तैयो शक्ति केर अनेकों प्राकट्य रूप (व्यक्त रूप) लय रहल छथि । या एकर अर्थ ई भ’ सकैत अछि, महान प्रभुतापूर्ण शक्ति (प्रभाव आदि) ।

हर तरीका सँ: नहि केवल हुनका लोकनिक निर्माताक रूप मे, बल्कि हुनक कुशल कारण आर हुनक बुद्धि केर मार्गदर्शक आदि केर रूप मे सेहो ।

भगवान के छथि – केना रहैत छथि – कि करैत छथि; ई सब बात अध्याय ९ मे हम सब देखि चुकल छी । आब भगवान अपन ‘प्रभवं’ – अपन महान प्रभुतापूर्ण शक्ति (प्रभाव) केर वर्णन करय जा रहल छथि । यैह समस्त ज्ञानी – ऋषि-मुनि सभक ज्ञानक मूल स्रोत रहल अछि । एतय स्वामी स्वरूपानन्द जी द्वारा देल गेल टिप्पणी सेहो यथावत् राखि देने छी, जाहि मे भगवानक कथन मे प्रयुक्त शब्द सभक भावार्थ केँ बुझायल गेल अछि । प्रभवं केर अर्थ ‘उच्च उत्पत्ति’ आ फेर जन्महीन रहितो विभिन्न व्यक्त रूप (अवतार, प्रकट रूप) द्वारा देखायल गेल प्रभुता आ हरेक तरीका सँ भगवाने मूल स्रोत कोना रहल छथि, तेकरा सुलझाकय बुझायल गेल अछि । कहल गेल अछि जे ‘नहि केवल महान ऋषि लोकनिक निर्माताक रूप मे, बल्कि हुनक कुशल कारण आ हुनका सभक बुद्धिक मार्गदर्शक रूप मे सेहो वैह टा मूल स्रोत रहल छथि ।

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ॥
असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१०-३॥
जे हम आजन्मल, अनादि आ समस्त लोक केर (अनन्त ब्रह्माण्ड केर) महान् ईश्वर केँ जनैत छथि, से मनुष्य सब मे भ्रमरहित छथि, ओ सब पाप सँ मुक्त छथि । 

सब पापः सज्ञानता अथवा अज्ञानता कोनो प्रकार सँ कयल गेल पाप ।

आर, एहि तेसर श्लोक मे भगवान केँ चिन्हनिहार लोकक अबस्था पापरहित कहल गेल अछि । ज्ञान शुचिताक सर्वश्रेष्ठ स्रोत थिक आ सर्वश्रेष्ठ हितकारी सेहो थिक । जँ कोनो वचन ई कहय जे हम पापरहित छी, त एहि सँ पैघ कोनो बात भइये नहि सकैत छैक । आर से कथन कहि रहल अछि ई श्लोक । ‘जे हम आजन्मल, अनादि आ समस्त लोक केर महान् ईश्वर केँ जनैत छथि’ – से मनुष्य सब मे भ्रमरहित छथि, सब पाप सँ मुक्त छथि । एहि सँ पैघ वचन किछु नहि भ’ सकैछ ।

बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः समः ॥
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥१०-४॥
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ॥
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥१०-५॥

बुद्धि, ज्ञान, भ्रम नहि भेनाय, सहनशीलता, सत्य, बाहरी इंद्रिय सब पर काबू, हृदय केर शान्ति, खुशी, दुःख, जन्म, मृत्यु, डर, संगहि निडरता, केकरो चोट नहि पहुँचेनाय (अहिंसा), एकसमान रहनाय (समता), संतोष, तपस्या, भलाइ, नीक नाम (सुनाम), (संगहि) बदनामी – ई जीव सभक अलग-अलग गुण मात्र हमरहि सँ जन्म लैत अछि ।

जन्म लैत अछि, आदिः अपन-अपन कर्म केर अनुसार जन्म लैत अछि ।

हम सब जीव छी । हमरा सब मे एतबा गुण सभक पूर्ण प्रभाव अछि । आर से सबटा भगवानहि सँ लेकिन हम जीवक अपन-अपन कर्म अनुसार प्राप्त होइछ । कम या बेसी या ठीक-ठीक – से जीव केर निज कर्मक परिणाम थिक । मुदा स्रोत केवल भगवान छथि । जेना कि श्लोक दुइ मे देवता, महर्षि आदि समस्त श्रेष्ठ शक्तिशाली स्रोतक उल्लेख करैत मूल-स्रोत भगवान छथि स्पष्ट कयल गेल अछि, तहिना हम जीव मे निहित शक्तिक मूल स्रोत पुनः सर्वोच्च सत्तावान् भगवान थिकाह से स्पष्ट भेल अछि ।

महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ॥
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥१०-६॥

सात महान ऋषि आर चारि पुरान (प्राचीन) मनु, जे हमरहि जेकाँ शक्ति (प्रभाव) वला रहथि (चूँकि हुनका लोकनिक विचार हमरा उपर टिकल छलन्हि, स्थिर छलन्हि), (हमर) मन सँ उत्पन्न भेल रहथि; हुनके लोकनि सँ दुनिया (संसार) मे ई जीव सब भेल अछि । 

चारि पुरान मनु: पैछला युग केर चारि गोट मनु जिनका सावर्ण कहल जाइत छलन्हि ।

युगों-युगों सँ चलि रहल ब्रह्माण्डक विद्यमान युग मे सप्तर्षि आ चारि टा मनु – चारि सावर्णकाल केर चारि मनु केँ भगवानक बाद प्रमुख स्रोत कहल गेल अछि । ओ सब भगवानहि समान प्रभावशाली भेलथि । ओ सब भगवानक मन सँ उत्पन्न भेल रहथि । हुनकहि सब सँ सारा मनुष्य व जीव केर उत्पत्ति क्रमिक रूप सँ भेल अछि । स्मरण करय मे सेहो सहज होयत । भगवान पछाति केना क्रम आगू बढ़ल आ केना भगवानक शक्ति क्रमिक रूप सँ विकेन्द्रीकृत् होइत अछि, सेहो बुझय मे आओत ।

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ॥
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥१०-७॥

जे असल मे हमर अस्तित्व (हेबाक) एहि अलग-अलग प्राकट्य (व्यक्त रूप सब) आर हमर एहि योग शक्ति केँ जनैत छथि, से अटल योग मे स्थापित भ’ जाइत छथि; एहि मे कोनो सन्देह नहि अछि । 

योग शक्ति: यानि, ई बात जे महान ऋषि लोकनि तथा मनु लोकनि अपन शक्ति आ ज्ञान, भगवान केर अनन्त शक्ति आर ज्ञान केर एकटा बहुत छोट सन हिस्साक रूप मे पओलनि ।

अटल योग: समाधि, सही अनुभूति मे दृढ़ता (दृढ़ स्थिरता) केर स्थिति ।

ई समस्त विभूति योग आ भगवानक विभिन्न प्राकट्य रूप संगहि भगवानक योग शक्ति केँ जननाय-बुझनाय ‘अटल योग’ मे स्थापित होयब कहल गेल अछि । आर एहि मे सन्देहक कोनो गुंजाइश नहि बचैछ तेहेन दृढ़तापूर्वक उद्घोषण भेल अछि ।

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ॥
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥१०-८॥

हमहीं सभक मूल छी, हमरहि सँ सब किछु बनल (विकसित) भेल अछि – एना सोचिकय, ज्ञानीजन (बुद्धिमान) सब स्नेहिल (प्रेम भरल) चेतना सँ हमर पूजा करैत अछि ।

स्नेहिल चेतना: सब मे एकमात्र परमात्मा केर (चेतना) ।

भगवानक पूजा – भगवानक भजन-सुमिरन – नाम-स्मरण – जप-तप-यज्ञादिक जे किछु अवधारणा एहि संसार मे बनल अछि; ओ एहि विभूति योग केर देन छी । एतबी बात बुझिकय भगवद्भक्ति मे लीन होयब पूर्णताक द्योतक होयत ।

मच्चिता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ॥
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥१०-९॥

हुनका लोकनिक (उपरका श्लोक मे चर्चित ज्ञानीजन सभक) मन पूरापूरी हमरा मे लागल रहैत छन्हि, हुनक इंद्रिय हमरा मे लागल रहैत छन्हि, ओ सब एक-दोसर केँ ज्ञान दैत रहैत छथि, आर हमेशा हमरा बारे मे बात करैत रहैत छथि, ओ सन्तुष्ट आ आनन्दित रहैत छथि । 

सन्तुष्ट: जखन सारा प्यास मेटा जाइत छैक । (यानि, कोनो चीजक इच्छा, ई भेटितय, एना होइतय, आदि नहि रहि जाइत छैक ।)

पुराण कहैत अछि: दुनिया मे इंद्रिय सभक समस्त सुख, आर दिव्य (दैविक) लोक सब मे समस्त महान सुख, समस्त इच्छा सभक खत्म भेला सँ भेटयवला सुख केर सोलहमो भाग केर बराबर नहि होइछ ।

अर्जुनक उद्वेलित मन केँ गीता-ज्ञानोपदेश ग्रहण करबाक निमित्त भगवान कृष्ण ई सारा उदाहरण दैत छथि । सत्यक प्रारम्भिक स्वरूप आ इतिहास मे घटित प्रकरण सब सुनाकय उद्वेलित चित्त केँ अनुकूल करबाक उपक्रम थिक ई । हम सब जखन-जखन उद्वेलित-विचलित होइ, बस एहि सब अनुकूलताक श्रेष्ठ साधन केँ पढ़ी आ मनन करी । एतबा नहि, जेना पूर्व मे होइत रहल, तहिना हमहूँ सब अपन मन आ इंद्रिय केँ भगवान मे लगाकय एक-दोसरक भलाइ मे लागल रही, सन्तुष्ट आ आनन्दित रही । एहि सँ बेसी किछु नहि !

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ॥
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥१०-१०॥

ओ लोकनि, जे हमेशा दृढ़ इच्छाशक्ति रखनिहार (सततयुक्त) आ प्रेम सँ हमर सेवा करैत रहैत छथि, हुनका हम ओ बुद्धि-योग दैत छी जाहि सँ ओ लोकनि हमरा लग मे अबैत छथि । 

बुद्धि-योग: ध्यान केर माध्यम सँ सही ज्ञान केर भक्ति, हमर असली स्वभाव केर, जे समस्त सीमा सब सँ रहित अछि । २-३९ देखू ।

भगवानक आश्वासन थिक ई । यैह जे लोक विश्वास कय लैछ, फेर ओ कहियो नहि हारैछ । एहि आश्वासनक पूर्ण मीमांसा पर आगूक श्लोक पर ध्यान दियौकः

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ॥
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥१०-११॥

मात्र हुनका लोकनि पर दया कयकेँ, हम हुनका सभक हृदय मे रहिकय, ज्ञान केर चमकैत दीपक सँ अज्ञानता सँ उत्पन्न भेल अन्हार (अंधकार) केँ नाश करैत छी (खत्म करैत छी) । 

ज्ञान केर चमकैत दीपक: जाहि मे समझदारी हो; भक्ति सँ भेटल सन्तोष केर तेल सँ भरल हो; हमरा उपर ध्यान लगेबाक हवा सँ होंकल (हवा लगायल) हो; ब्रह्मचर्य आर आन-आन पवित्र गुण सभक निरन्तर (लगातार) साधना सँ बनल शुद्ध चेतना केर बाती सँ भरल हो; दुनियादारी सँ दूर हृदय केर कोष (हृदयरूपी सागर) मे राखल हो; मन केर हवा सँ सुरक्षित कोनो कोण मे राखल हो, इंद्रिय सभक चीज सब सँ दूर हो, आर राग (लगाव) एवं द्वेष सँ बेदाग (अनछुबल) हो; लगातार ध्यान लगेबाक अभ्यास सँ उत्पन्न भेल सही ज्ञान केर प्रकाश (इजोत) सँ चमकैत हो । – आदि शंकराचार्य ।

आश्वासनक पाछाँ भगवान अपन स्थिति निरन्तर स्मरणकर्ताक हृदय मे रहब आ ज्ञान केर चमकैत दीपक सँ अज्ञानतारूप अन्धकार केँ दूर करब कहल गेल अछि । जँ हमरा सभक ज्ञानज्योति प्रदीप्त रहत त कोनो चूक या गलती या पापकर्म किन्नहुं नहि होयत आ एहि तरहें भगवान सदा-सदा कल्याण करैत रहता । भेलैक न बात पूरा !!

अर्जुन उवाच ।

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ॥
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥१०-१२॥
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिनारदस्तथा ॥
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥१०-१३॥

अर्जुन कहलनि:

परम ब्रह्म, परम धाम, परम पवित्र करयवला, अपनहिं छी । सब ऋषि लोकनि, देव-ऋषि नारद केर संग-संग असित, देवल आ व्यास अपने केँ शाश्वत, स्वयं-प्रकाशित पुरुष, पहिल देव, आजन्मल तथा सर्वव्यापी घोषित कयलनि अछि । अपने स्वयं सेहो हमरा सँ यैह सब कहैत छी । 

सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ॥
न हि ते भगवन् व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥१०-१४॥

हे केशव, अपने जेहो किछु हमरा सँ कहैत छी, हम ओकरा सत्य मानैत छी । सच मे, हे भगवान ! नहि तँ देवता आ नहिये दानव अपनेक रूप केँ जनैत छथि । 

भगवान: ओ छथि जिनका मे हमेशा हुनकर पूर्णता, पूर्ण शक्ति, सम्पूर्ण धर्म, समस्त वैभव, सबटा सफलता, सबटा त्याग आ सम्पूर्ण स्वतंत्रता मौजूद छन्हि । संगहि, जे सब जीव केर उत्पत्ति आ विनाश, संग-संग ज्ञान आ अज्ञान केँ जनैत छथि, हुनका भगवान कहल जाइत छन्हि ।

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ॥
भूतभावन भुतेश देवदेव जगत्पते ॥१०-१५॥

वास्तव मे, हे परम पुरुष, हे प्राणी सभक स्रोत, हे प्राणी सभक स्वामी, हे देवहु लोकनिक देव, हे विश्व केर शासक, अपने स्वयं अपन स्वत्व केँ स्वयं द्वारा मात्र जनैत छी ।

वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ॥
याभर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥१०-१६॥

अपने केँ वास्तव मे, बिना किछु बचेने (नुकेने), अपन ओहि दिव्य गुण सभक बारे मे बजबाक चाही जेकरा द्वारा ई समस्त संसार भरल अछि, अपने अस्तित्व मे छी । 

चूँकि एना कियो आर नहि कय सकैत अछि ।

हमर नोटः अहाँक सिवा अहाँ केँ जननिहार दोसर कियो नहि अछि, तेँ हमरा बुझाकय अपन समस्त दिव्यताक सम्बन्ध मे कहि रहल छी, आरो कहू । खुलिकय कहू । बिना किछु बचेने कहू । हमरा सँ किछु नहि नुकाउ । – अर्जुनक एहेन भाव स्पष्ट भ’ रहल अछि ।  

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ॥
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥१०-१७॥

हे योगी, हम अपने केँ जनबाक लेल सदिखन केना ध्यान कय सकब ? हे भगवान, हमरा अपनेक ध्यान कोनो वस्तु मे केना करबाक चाही ? 

कोनो वस्तु मे, आदि: जाहि सँ ई मन बाहरी वस्तु सभक बारे मे सोचितो, ओहि सब मे अपनेक खास रूप मे अपनहिं केर ध्यान कय सकय ।

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ॥
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥१०-१८॥

हे जनार्दन, अपन योग-शक्ति आ गुण सभक बारे मे हमरा फेर सँ विस्तार सँ बताउ; कियैक तँ हम (अपनेक वाणी केर) अमृत रस केँ सुनिकय कखनहुँ सन्तुष्ट नहि होइत छी ।

जनार्दन: जिनका सँ सब खुशहाली आर मोक्ष केर प्रार्थना करैत अछि ।

भगवानक सर्वश्रेष्ठ आश्वासन सँ आश्वस्त भ’ भक्तिभाव सँ ओतप्रोत भ’ अर्जुन स्वाभाविक रूप सँ अपन ज्येष्ठ-श्रेष्ठ लोकनिक कथन सब केँ मन पाड़ैत भगवान श्री कृष्णक स्तुतिगान करय लगलाह । हमरो-अहाँक स्वभाव एहने अछि । जखन-जखन चित्त मे चेतनाक संग मन मे विश्वास भ’ जाइछ जे यैह टा सत्य छैक, बस, मन स्वतः गीत गेनाय शुरू करैछ । एतय श्लोक १२ सँ १८ धरि अर्जुन भगवानक वचन सँ परम आनन्दित भ’ कय ‘हँ-हँ भगवान, अपनेक विषय मे श्रेष्ठ लोकनि द्वारा कहल गेल सब बात अपने हमरा कहल से सच अछि । हम अपने केँ सदिखन ध्यान मे स्थापित राखि सकी ताहि लेल ई सम्पूर्ण योगशक्ति व गुण सभक सविस्तार वर्णन करू । हम अपनेक अमृत रस सँ भरल वाणी सुनिकय कखनहुँ सन्तुष्ट नहि होइत छी, मतलब अघाइत नहि छी । आर कही – कहिते रही – हम सुनिते रही । ई भाव अछि ।

श्रीभगवानुवाच ।

हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ॥
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥१०-१९॥

भगवान कहलनि:

हे कौरव मे श्रेष्ठ, आब हम अहाँ सँ अपन दिव्य गुण सभक बारे मे ओकर विशिष्टता (खासियत) केर अनुसार बात करब; हमर प्रकट होयबाक विवरण (वर्णन) केर कोनो अन्त नहि अछि ।

ओकर विशिष्टता अनुसार: यानि, मात्र ओतहि जेतय ओ सब अलग-अलग ढंग सँ सबसँ बेसी विशिष्ट अछि ।

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ॥
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥१०-२०॥

हे गुडाकेश, हमहीं आत्मा छी, जे सब प्राणी केर हृदय मे विद्यमान छी; हमहीं सब प्राणीक आरम्भ, मध्य आर अन्त सेहो छी ।

गुडाकेश: निन्द केँ जितयवला (अर्जुन) ।

आरम्भ, मध्य, आदि: यानि सब प्राणीक जन्म, जीवन आ मृत्यु ।

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिसां रविरंशुमान् ॥
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥१०-२१॥

आदित्य सब मे हम विष्णु छी; प्रकाशमान सब मे हम तेज सूर्य छी; पवन सब मे हम मरीचि छी; नक्षत्र सब मे हम चंद्रमा छी ।

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ॥
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥१०-२२॥

हम वेद सब मे सामवेद छी, आर देवता सब मे वासव (इंद्र) छी; इंद्रिय सब मे हम मन छी आर जीव सब मे बुद्धि हम छी ।

रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ॥
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥१०-२३॥

आर रुद्र सब मे हम शंकर छी; यक्ष एवं राक्षस सब मे धन केर स्वामी (कुबेर) छी; वसु सब मे हम पावक छी; आर पहाड़ सब मे हम मेरु छी ।

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ॥
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥१०-२४॥

आर हे पृथापुत्र, पुरहित (पुजारी) सब मे हमरा प्रधान, यानि बृहस्पति जानू; सेनापति सब मे हम स्कन्द छी; जलराशि सब मे हम सागर छी । 

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ॥
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥१०-२५॥

महान ऋषि लोकनि मे हम भृगु छी; शब्द सब मे हम एक अक्षर “ॐ” छी; यज्ञ सब मे हम जप (शांत भ’ कय दोहराबैत रहयवला नाम-मंत्र आदि) केर यज्ञ छी; अचल चीज सब मे हम हिमालय छी ।

जप यज्ञ: चूँकि एहि मे कोनो तरहक चोट या केकरो जान केर हानि नहि होइत छैक, तेँ ई सब यज्ञ मे सबसँ नीक होइछ ।

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ॥
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥१०-२६॥

वृक्ष सब मे हम अश्वत्थ (बरगद) छी, देव ऋषि सब मे नारद छी, गंधर्व सब मे चित्ररथ छी, आर सिद्ध सब मे मुनि कपिल छी ।

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ॥
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥१०-२७॥

घोड़ा सब मे हमरा उच्चैःश्रवा जे अमृत सँ जन्म लेने अछि, राजसी हाथी सब मे ऐरावत आर मनुष्य सब मे राजाक रूप मे जानू ।

अमृत सँ जन्मल: जखन अमृत केर वास्ते समुद्र मंथन कयल गेल छल, तहिये सँ उत्पन्न भेल (अश्व उच्चैःश्रवा) ।

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ॥
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥१०-२८॥

हथियार सब मे हम वज्र छी, गाय सब मे हम कामधुक छी; संतान उत्पत्तिक कारण ‘कन्दर्प’ हम छी; साँप सब मे हम वासुकि छी ।

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ॥
पितृृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥१०-२९॥

हम नाग (साँप) मे अनन्त छी, हम जल-जीव सब मे वरुण छी; आर पितर सब मे अर्यमन छी, हम नियंत्रण करयवला मे यम छी ।

प्रह्लादश्चचास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ॥
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥१०-३०॥

आर हम दिति केर सन्तान प्रह्लाद छी, नापयवला मे हम काल (समय) छी; आर जानवर सब मे हम जानवर सभक राजा ‘मृगेन्द्र’ (बाघ) छी; आर पक्षी सब मे गरुड़ छी ।

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ॥
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥१०-३१॥

पवित्र करयवला मे हम वायु छी, योद्धा सब मे हम राम छी; मछरी मे हम शार्क (मकर) छी, नदी सब मे हम जाह्नवी (गंगा) हूँ ।

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ॥
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥१०-३२॥

हम प्रकट चीज (सृष्टि) केर आरम्भ, मध्य तथा अन्त सेहो छी; समस्त ज्ञान सब मे हम आत्माक ज्ञान (आध्यात्म ज्ञान) छी, आर विवाद करयवला (बहस करयवला) केर वाद हम छी ।

वाद: विमर्श केँ तीन भाग मे बाँटल गेल अछिः १. वाद; २. वितंडा; ३. जलपा ।

पहिल मे, उद्देश्य सत्य तक पहुँचब होइछ; दोसर मे, सवालक दोसर पक्ष साबित करबाक कोशिश कएने बिना, दोसरक तर्क केँ अनेरक खोट निकालनाय होइछ; आर तेसर मे, अपन विचार केँ राखब होइत अछि, आर जोरदार जबाब या बहसपूर्ण जबाब दय केँ विरोधीक राय केँ गलत साबित करबाक कोशिश करब होइछ ।

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ॥
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥१०-३३॥

अक्षर सब मे ‘अ’ अक्षर हम छी, आर समस्त समास (यौगिक अथवा संयुक्त शब्द सब) मे ‘द्वंद’ हम छी; हमहीं कखनहुँ नहि खत्म होयवला काल (समय) सेहो छी, हमहीं (कर्मक फल दय केँ) सब किछु सम्हारनिहार ‘धाता’ (सभक पालनहार) छी । 

कखनहुँ खत्म नहि होयवला समय: यानि, सनातनता (सततता) । पहिने जाहि काल केर बात कयल गेल अछि, ओ सीमित समय थिक ।

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ॥
कीर्तिः श्रीर्वाक् च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥१०-३४॥

आर हम सब किछु हरण करयवला मृत्यु छी, आर जे लोक समृद्ध (कामयाब) होयवला अछि तेकर समृद्धि (खुशहाली) छी; नारी सभक गुण मे (हम) श्री (कीर्ति), खुशहाली (समृद्धि या सुंदरता), प्रेरणा, याददाश्त, बुद्धिमत्ता, स्थिरता आर सहनशक्ति छी ।

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ॥
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥१०-३५॥

समासहु मे हम बृहत-समास छी, छंद मे गायत्री छी; महीना मे हम मार्गशीर्ष (अगहन, मंसिर) छी, ऋतु सब मे फूल केर मौसम हम छी ।

मार्गशीर्ष: महीना जाहि मे नवंबर आर दिसंबर केर किछु हिस्सा शामिल अछि ।

फूल केर मौसम: बसंत ।

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥१०-३६॥

हम छल मे द्यूत (जुआ) छी, हम ताकतवर (शक्तिशाली) सभक ताकत (शक्ति) छी; हम जीत छी, हम कोशिश छी, हम सात्विक सभक सत्व छी ।

हम जीत छी, हम कोशिश छी: हम जितयवलाक जीत छी, हम कोशिश करयवलाक कोशिश छी ।

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ॥
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥१०-३७॥

वृष्णि सब मे हम वासुदेव छी; पांडव सब मे धनंजय; आर मुनि सब मे हम व्यास छी; ऋषि सब मे उष्ण ऋषि छी ।

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ॥
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥१०-३८॥

दंड दयवलाक लेल हम राजदंड छी, ओ जे जीत हासिल करय चाहैत अछि, ओकरा सब मे हम राज करबाक कला छी; आर गोपनीयता (जे बात रहस्य आ नुकायल अछि) ताहि मे हम मौन (चुप्पी) छी, ज्ञानी सब (जानकार लोक सब) मे ज्ञान सेहो हमहीं छी । 

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ॥
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥१०-३९॥

आर जेहो किछु समस्त प्राणी सभक बीज अछि, सेहो हमहीं छी, हे अर्जुन । कोनो प्राणी, चाहे ओ चलायमान हो या अचल, हमरा बिना नहि रहि सकैछ । (ओकर अस्तित्व हमरा बिना नहि सकैत छैक ।) 

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ॥
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥१०-४०॥

हे शत्रु सब केँ जरौनिहार, हमर दिव्य गुण सभक कोनो अन्त नहि अछि; लेकिन ई हमर दिव्य गुणक बारे मे हमर एकटा छोट सन व्योरा (बखान) थिक ।

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ॥
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥१०-४१॥

जे कोनो महान, समृद्ध या शक्तिशाली प्राणी अछि, से अहाँ जानि लियह जे हमर तेज केर बस एकटा अंश छी ।

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ॥
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥१०-४२॥

हे अर्जुन, ई अलग-अलग तरह केर संसार केँ जनला सँ अहाँ केँ कि लाभ भेटत ! (ई जानि लियह जे) हमहीं छी (हमरहि अस्तित्व अछि), जे अपन एकटा अंश सँ एहि पूरे संसार केँ चला रहल अछि ।

आर एहि तरहें १९ सँ ४२मा श्लोक धरि भिन्न-भिन्न श्रेष्ठतम् स्वरूप मे भगवान कृष्ण ‘हम भगवान के छी’ से व्यक्त कयलनि अछि, एहि तरहें प्रत्येक स्वरूप मे श्रेष्ठताक सर्वोच्च रूप केर दर्शन करैत हम सब भगवान केँ सदिखन अपन हृदय मे, आत्मा मे, ताकत मे, बुद्धि मे, कोशिश मे – हर बात मे हुनकहि देखी आ सदैव अर्जुनवत् भगवानक शरण मे समर्पित रही । अस्तु ! विभूतियोग नामक एहि अध्याय मे वर्णित भगवानक सम्पूर्ण विभूति प्रति विस्मृति किन्नहुं नहि हो, यैह कामना करी ।

हरिः हरः!!

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