गीताक नवम अध्यायक प्रवीण व्याख्या
– प्रवीण नारायण चौधरी
आइ नवम अध्यायक व्याख्या सँ पूर्व फेर एक बेर अध्याय १ सँ ८ धरिक महत्वपूर्ण विन्दु सब केँ क्रमिक रूपें स्मरण मे आनैत छी । सर्वप्रथम अर्जुनक विषाद – युद्ध मे अपन पितामह आ गुरु केँ विपक्ष मे ठाढ़ देखि घबराहट होयब जे युद्ध मे हुनका सब पर हथियार कोना चलायब, ताहि अबस्था सँ श्री कृष्ण द्वारा देल जा रहल सन्देश – सर्वप्रथम अपन परिचय मे आत्मस्वरूपक बात, आत्मा सदा-सनातन हेबाक परञ्च जन्म आ मृत्युक चक्र कतेको बेर चलैत रहबाक, आत्मसाक्षात्कार कएने स्थिरबुद्धिक लोक द्वारा कर्म निष्पादनक बात, कर्मक फल प्रति अस्पृहता – यानि कर्म मात्र करबाक अधिकार होयब आ फलक चिन्ता सँ दूर रहबाक बात, कर्म सिद्धान्तक विशेष निरूपण आर ज्ञानी लोकक उदाहरण आदिक बात, फेर कर्म सँ संन्यास या कर्म करैत रहब मे कोन श्रेष्ठ पर सविस्तार वर्णन, कर्मयोगी एवं ध्यान योग पर सविस्तार बुझेबाक बात, ज्ञानहु मे विशेष ज्ञानक रहस्योद्घाटन, यज्ञ रूप मे कर्म करबाक विधान आ अविनाशी ब्रह्मक निरूपण – एतय धरि हम सब आठ अध्यायक यात्रा कयला उपरान्त आइ राजसिक ज्ञान आ एकर रहस्य पर श्री कृष्ण द्वारा वर्णन पर ध्यान दी ।
श्रीभगवानुवाच ।
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ॥
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥९-१॥
भगवान कहलनि:
अहाँ केँ, जे बात-बात मे टोकल (शिकायत) नहि करैत छी, हम आब सच मे ई बतबैत छी, जे सबसँ गहींर ज्ञान थिक, जे अनुभूति सँ जुड़ल अछि, जे जानिकय, अहाँ खराबी (सांसारिकता) सब सँ मुक्त भ’ जायब ।
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ॥
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुव्ययम् ॥९-२॥
विज्ञान मे सबसँ ऊँच; गहिराइ मे सबसँ गहींर; पवित्र करयवला मे सबसँ उपर, ई अछि; सीधे अनुभव सँ बुझायवला (अनुभूति होयवला), (बहुते) पुण्यवला, करय मे बहुते आसान, आर कहियो नहि खत्म होयवला (ई राजविद्या) अछि ।
भगवान श्री कृष्ण केर एहि पहल पर गंभीरता सँ ध्यान दी – ‘सबसँ गहींर ज्ञान’ केर हरेक चरण (पहलू) केर एतेक बेसी ध्यान राखब, जे एहि अध्याय केर श्लोक २ मे कहल गेल कतेको जरूरी बात सब सँ जुड़ल अछि । आबयवला हर श्लोक पर एक केर बाद एक पर कड़ा नजरि राखब ।
अश्रद्धानाः पुरुषाः धर्मस्यास्य परन्तप ॥
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥९-३॥
हे परन्तप ! जे लोक एहि धर्म केर प्रति श्रद्धा नहि राखैत अछि, ओ हमरा प्राप्त कएने बिना, मृत्यु केर जोखिम सँ भरल पुनर्जन्मक मार्ग पर घुरि अबैत अछि ।
धर्म के प्रति बिना श्रद्धा: जेकरा आत्मा केर एहि ज्ञान पर विश्वास नहि छैक, ओ भौतिक शरीर टा केँ आत्मा मानैत अछि ।
पैछला अध्याय मे सेहो भगवान कृष्ण अपन भक्त हुनकहि लग पहुँचबाक आ ओकर पुनः जन्म-मृत्युक चक्र मे नहि पड़बाक बात कहने रहथि । आइ जखन राजविद्याक गूढ़ रहस्य कहि रहल छथि तखन फेर एहि सत्य केँ उजागर कय रहल छथि । श्रद्धा आ भक्तिक महत्व केँ किन्नहुं नकारल नहि जा सकैछ ।
मय ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ॥
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥९-४॥
ई सम्पूर्ण संसार हमर बिनु-देखल (अव्यक्त) रूप सँ हमरहि सँ व्याप्त अछि; सब जीव हमरा मे मौजूद अछि, लेकिन हम ओहि सब मे नहि रहैत छी ।
बिनु-देखल: इंद्रिय सभक लेल अदृश्य होयब ।
हमरा मे मौजूद होयब: हम आत्मा रूप मे, ओकरा सभक भीतर एकटा अलग अस्तित्व रूप मे छी ।
ओकरा मे नहि रहब: भौतिक चीज सब जेकाँ – ओकरा सभक सम्पर्क मे एनाय, या कोनो बर्तन मे बन्द भेनाय जेकाँ ।
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ॥
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥९-५॥
हमर योग आ ऐश्वर्य केँ देखू, नहि तँ जीव सच मे हमरा मे रहैत अछि; आ न जीव सब केँ उत्पन्न करयवला आ ओकरा सब केँ सहारा दयवला (पालन करयवला) हमर ‘स्व’ ओकरा सब मे रहैत अछि ।
देखू ७-१२.
नहि तँ जीव सच मे हमरा मे रहैत अछि, आदि: कियैक तँ ‘स्व’ (आत्मा) कोनो भी चीज सँ बान्हल या ओकरा सँ जुड़ल नहि रहैछ, “लगाव सँ रहित, ओ कखनहुँ जुड़ल नहि रहैत अछि ।” – बृहत् उपनिषद् – ३. ९. २६.
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ॥
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥९-६॥
जेना हमेशा आकाश मे स्थित हवा हर जगह चलैत (बहैत) रहैत अछि, तहिना जानि लिय’ जे सबटा जीव हमरहि मे स्थित भ’ हमेशा चलैत रहैत अछि ।
हमेशा आकाश मे रहैत अछि: ओकरा सँ जुड़ने बिना ।
मतलब ई भेल जे जीव भगवान केर सम्पर्क मे एने बिना, आर हुनका उपर कोनो प्रभाव डालने बिना, हुनकहि मे रहैत अछि ।
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ॥
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥९-७॥
कल्प केर अन्त मे, हे कुंतीपुत्र, सब प्राणी हमर प्रकृति मे वापस चलि जाइत अछि; (दोसर) कल्प केर आरम्भ मे, हम ओकरा फेर सँ पठबैत छी ।
प्रकृति: तीन गुण सँ बनल निम्नतर प्रकृति ।
कल्प: ब्रह्मांडीय सृष्टि केर अवधि ।
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ॥
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥९-८॥
अपन प्रकृति केँ जिवन्त करैत, हम बेर-बेर एहि समस्त जीव सब केँ सोझाँ (सृष्टि मे) अनैत छी, जे सब प्रकृतिक प्रभाव मे विवश रहैत अछि ।
अपन प्रकृति केँ जिवन्त करब: ओकरा सब पर निर्भर प्रकृति केँ मजबूत करब आर उपजाउ बनायब, जे कल्पक अन्त मे, दुनियाक खत्म भेलापर सुति रहल छल ।
‘हम भगवान के थिकहुँ, ई सम्पूर्ण सृष्टि आ जीव केर स्थिति हमरा सँ केना सम्बन्धित अछि’ एहि सत्य आ गूढ़ रहस्य केँ भगवान कृष्ण सहज उदाहरण आकाश आ वायु केर उपमा दैत श्लोक ४ सँ ८ धरि मे बुझेलनि अछि । एहि सँ पहिनहिं ओ अश्रद्धावान् जेकरा मे आत्मा केर ज्ञान छहिये नहि, ओकर स्थिति स्पष्ट करैत तेकर दुष्परिणाम सेहो वर्णन कय देने छलथि । आब बुझनिहार लोक आ श्रद्धावान् एवं ज्ञानी लोक केँ अपन स्वविवेक सँ भगवानक वास्तविकता फरिछाकय कहलनि अछि ।
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥९-९॥
हे धनंजय, ई कर्म हमरा बाँधैत नहि अछि, कियैक तँ हम ओहि सँ उदासीन (न्यूट्रल) आर अनासक्त रहैत छी ।
ई कर्म: जाहि मे ब्रह्मांड केर असमान रूप सँ बननाय आर खत्म भेनाय शामिल अछि ।
जेना ईश्वर केर मामिला मे, तहिना दोसरहु सभक मामिला मे, कर्तापन केर अहंकारी भावना सब तथा परिणाम (फल) केर प्रति आसक्ति (राग) केर नहि होयब, (धर्म आ अधर्म सँ) मुक्ति केर कारण थिक ।
पूर्वक अध्याय सब मे भगवान मनुष्य लेल सेहो एहिना अनासक्त रहबाक उपदेश देने छथि । आर आब अपन उदासीनता – एतेक पैघ कर्म सृष्टि आ स्थितिक पालन करितो भगवान स्वयं नहि बन्हेबाक तर्क देलनि अछि । ई हमरहु सब लेल प्रेरणा छी आ सदैव अनुकरणीय अछि । ॐ तत्सत् !!
मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ॥
हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥९-१०॥
हमरा संग नजदीकीक (सामीप्यताक) कारण सँ, चलैत-फिरैत तथा अचल सब किछु प्रकृति बनबैत अछि; दुनिया एहि कारण सँ गोल-गोल घुमैत रहैत अछि, हे कुंतीपुत्र ।
श्लोक ७ सँ १० मे भगवान अरुंधति न्याय केर हिसाब सँ अपन स्थान (भूमिका) केँ परिभाषित करैत छथि । जखन एकटा दुल्हिन केँ पहिल बेर हुनकर पतिक घर आनल जाइत छन्हि, त पति हुनका एकटा बहुते छोट सन तारा देखबैत छथि, जेकरा अरुंधति कहल जाइत छैक । एना करबाक लेल, हुनका (पति केँ) हुनकर (पत्नीक) नजरि केँ सही दिशा मे लगेबाक (आँखि सँ तकबाक) रहैत छन्हि, जे ओ ओहि ताराक दिशा मे कोनो लग-पासक चीज आ कनेक पैघ आकारक चीज केँ देखबाक लेल कहिकय कयल जाइछ, जेना, कोनो गाछक ठाढ़ि देखाकय । तेकरा बाद, पति हुनकर ध्यान ओहि ठाढ़िक पार केर कोनो पैघ चमकैत तारा दिश खिंचैत छथि, आर एहि तरहें, आरो कतेको चरण मे, ओ (पति) हुनकर आँखि केँ सही चीज दिश लय जेबा मे सफल भ’ जाइत छथि । सहज डेग (चरण) सँ कोनो सूक्ष्म चीज दिश लय जेबाक एहि तरीका केँ अरुंधति-न्याय कहल जाइत छैक । भगवान ई कहिकय शुरू करैत छथि जे ओ सब जीव केँ सृष्टि-विकास केर आरम्भ मे प्रस्तुत करैत छथि; प्रकृति मात्र केर ओ काज थिकैक, कियैक तँ भगवान् मात्र लग मे, एकटा उदासीन, पूरे अनासक्त रूप मे बैसल छथि । अन्त मे, भगवान एहि अन्तिम सत्य धरि लय जाइत छथि जे असल मे ओ किछु नहि करैत छथि, ई प्रकृति थिक, जे हुनकर लग रहला सँ जिवन्तता प्राप्त कय सब किछु बनबैत (सृजन करैत) अछि । ई हुनकर ज्योति (इजोत, प्रकाश) छी जे प्रकृति केँ प्रकाशित करैत अछि, आर ओकरा जिवन्त आ काज करय लायक बनबैत अछि । भगवान् आर प्रकृतिक बीच बस यैह सम्बन्ध अछि ।
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ॥
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥९-१३॥
मुदा हे पृथापुत्र ! जे महान आत्मावला (महापुरुष), दिव्य प्रकृति मे आश्रित छथि, से हमरा समस्त भूतादि प्राणी सभक मूल अव्यय आर अपरिवर्तनीय जानिकय अनन्य चित्त सँ हमर भजन (पूजा) करैत छथि ।
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ॥
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥९-१४॥
ओ लोकनि हमेशा हमर बड़ाइ (कीर्तन) करैत छथि, दृढ़ मनसाय सँ कोशिश करैत, भक्ति सँ हमरा नमन (प्रणाम) करैत, हमेशा दृढ़ बनिकय हमर पूजा करैत छथि ।
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ॥
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥९-१५॥
आनो लोक सब, ज्ञान केर यज्ञ में (यानि कि सब मे परमात्मा केँ देखैत) आहुति दय केँ, हम सर्वरूप केँ, एक (रूप मे) बुझैत, अलग (रूप मे) बुझैत, अनेक रूप मे (बुझैत) यजन (पूजा-अर्चना) करैत छथि ।
सर्वरूप: ओ जे ब्रह्मांड मे सब तरहक अनेकों रूप धारण कयलनि अछि ।
एक: स्वयं केँ सर्वरूपक संग चिन्हनाय – अद्वैत दृष्टि । (सब मे एकमात्र परमात्मा केँ देखनाय, अपन आत्माक संगहि सभक आत्मा केँ एकमात्र परमात्माक अंश रूप मे देखनाय ।)
अलग: भगवान आर स्वयं केर बीच असल मे फर्क कयनाय – द्वैत दृष्टि ।
अनेक: अलग-अलग देवता लोकनि, ब्रह्मा, रुद्र, आदिक जेकाँ ।
यैह भक्ति थिक । भगवानक एहि उक्ति मे महात्मा लोकनिक उदाहरण दैत ई बुझायल गेल अछि जे अनन्य उपासना मे केना लागि जाय हम सब । मन मे भिन्न-भिन्न धारणा आनि बेचैन होइ सँ नीक अछि सदैव एकरूप मे भगवन्नाम केर जप करब, भजन-कीर्तन करब आ हर तरहें भगवानहि केर सुमिरन करैत जीवनयापन करैत रहब ।
अहं ऋतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ॥
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥९-१६॥
हम क्रतु छी, हम यज्ञ छी, हम स्वधा छी, हम औषध छी, हम मंत्र छी, हम अज्या छी, हम अग्नि छी, आर हम आहुति छी ।
क्रतु: एकटा खास वैदिक विध थिक ।
यज्ञ: स्मृति मे कहल गेल पूजा ।
स्वधा: पितर सब केँ अर्पित (चढ़ायल जायवला) हविष्य (खाना, भोजन) ।
औषध: समस्त शाकाहारी भोजन और दवाइ वला जड़ी-बूटी सब ।
मंत्र: ओ जाप जाहि सँ आहुति देल जाइत अछि ।
अज्या: आहुति केर वस्तु (हविष्य) ।
अग्नि: जाहि मे आहुति देल जाइत अछि ।
एहि जीवन मे जे-जे आवश्यक अछि, ताहि सभक रूप-स्वरूप मे पर्यन्त भगवान अपन उपाधि देलनि अछि । एहि तरहें हम-सब हरेक दृष्टि सँ भगवानहि मात्र मे डूबल रही ।
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ॥
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक् साम यजुरेव च ॥९-१७॥
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ॥
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥९-१८॥
हम एहि दुनिया केर पिता छी – माता, पालनहार, पितामह, पवित्र करयवला, जानय योग्य (एकमात्र श्रेष्ठतम्) चीज, (अक्षर) ॐ, तथा ऋक्, समं, आ यजुस् सेहो छी । प्राप्य लक्ष्य, सहारा देनिहार, भगवान्, (समस्त कार्यक-घटना आदिक) साक्षी, निवास (रहबा योग्य स्थान), शरण (आश्रय), मित्र, आरम्भ (आदि), अन्त, आधार (नींव), भंडार तथा कहियो नहि बदलयवला बीज (अपरिवर्तनशील);
पालनहार: कर्म केर फल दय केँ ।
बीज: सब चीजक आरम्भ केर कारण ।
बदलैत नहि अछि: कियैक तँ ई ताबत धरि रहैत अछि जाबत धरि संसार रहैत छैक ।
इहो उपाधि सब हमरा सब सँ जुड़ल अछि । एहि संसार मे सेहो भगवानक रूप मे जे सब छथि, मान्य छथि, तिनकहु बात तथा जीवनक आधार बुद्धि-ज्ञान केर मूल रूप ‘वेद’ केर विभिन्न विभाग सेहो भगवाने थिकाह । लक्ष्य, सहारा, साक्षी, शरण, निवासस्थान, मित्र, आरम्भ, अन्त – सब किछु एकमात्र भगवान् थिकाह । एकटा भक्त लेल भगवानक सिवाय आर किछु नहि होइछ ।
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ॥
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥९-१९॥
(सूरज केर रूप मे) हम गर्मी दैत छी; हम वर्षा केँ रोकैत आर पठबैत छी; हम अमरता सेहो छी आर मृत्यु सेहो छी; हे अर्जुन, सत् आर असत् हमहीं छी !
अस्तित्व: प्रभाव सभक प्रकट (व्यक्त) संसार ।
गैर-अस्तित्व: केर अर्थ अछि, ओ कारण जे केवल अव्यक्त (अप्रकट) अछि आर गैर-अस्तित्व नहि अछि, अन्यथा हमरा सब केँ अस्तित्व केर गैर-अस्तित्व सँ उत्पन्न हेबाक कल्पना करय पड़त, जे बेतुका होयत । श्रुति कहैत अछि, “गैर-अस्तित्व सँ अस्तित्व केना निकलि सकैछ ?” – छांदोग्य उपनिषद VI. द्वितीय. २.
व्यक्त-अव्यक्त शक्तिक स्रोत – जीवन लेल जरूरी ऊर्जाक स्रोत आदि सब किछु मे भगवानहि केर दर्शन भ’ रहल अछि ।
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ॥
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥९-२०॥
तीनू वेद केर जानकार, यज्ञ सँ हमर पूजा करैत छथि, सोम पिबैत छथि, आर (एहि तरहें) पाप सँ शुद्ध भ’ कय, स्वर्ग जेबाक लेल प्रार्थना करैत छथि; देवता लोकनिक स्वामी (इन्द्र) केर पवित्र दुनिया मे पहुँचिकय, ओ सब स्वर्ग मे देवता लोकनिक दिव्य सुख सभक आनन्द लैत छथि ।
देवता लोकनिक स्वामी: इन्द्र, जिनका शतक्रतु कहल जाइत छन्हि, कियैक तँ ओ सौ गोट यज्ञ कएने रहथि ।
वेदविद् लोकनिक भगवानक प्रति जे भाव छन्हि, जे सब स्वर्गक आकांक्षा मे विभिन्न कर्मकांड ओ यज्ञ-उपासना आदि अनुष्ठान सँ त्राण (रक्षा) ओ मुक्ति (मोक्ष) केर कल्पना करैत जिबैत छथि; तिनकहु लोकनिक भक्ति भगवान प्रति अछि । श्रेष्ठ आचरणक अनुगामी हम सब सेहो बनल करैत छी । ई शाश्वत् सत्य थिकैक ।
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ॥
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥९-२१॥
विशाल स्वर्ग-लोक केर आनन्द लेलाक बाद, ओ लोकनि अपन पुण्य केर खत्म भेलापर नश्वर लोक मे प्रवेश करैत छथि । एहि प्रकारे, तीनू (वेद) केर आदेश सभक पालन करैत, इच्छा सभक कामना करैत, ओ लोकनि (लगातार) अबैत-जाइत रहैत छथि ।
आदेश: पारम्परिक विधान, कर्म-कांड ।
वेदविद् लोकनिक कर्म ओ परिणाम पर ई एक पंक्ति बहुत महत्वपूर्ण अछि । ई सृष्टिक निरन्तरता मे हुनका लोकनिक बेर-बेर आयब-जायब केर वृत्तान्त कहि रहल अछि । ज्ञानी आ विवेकी बेर-बेर नहि अओता त अराजक समाज बनि जायत । तेँ हम एहि पंक्ति केँ बहुत सकारात्मक आ भगवान् द्वारा जरूरी व्यवस्थापनक क्रम मे मानैत छी ।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ॥
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥९-२२॥
जे लोक हमरा अपना सँ अलग नहि मानिकय ध्यान करैत अछि, सब प्राणी मे हमर पूजा करैत अछि, जे लोक एहि तरहें हमेशा उत्साह (जोश) सँ लागल रहैत अछि, हम ओकर सबटा कमी केँ पूरा (वहन) करैत छी आर जे ओकरा लग पहिनहिं सँ छैक तेकरा सुरक्षित रखैत छी ।
अनन्य: अलग नहि मानिकय, यानि भगवान केँ स्वयं सँ अलग नहि मननाय । या अनन्य केर मतलब भ’ सकैछ, बिना कोनो दोसर (विचार) केर । त श्लोक केर मतलब हेबाक चाही – जे लोक सब प्राणी सब मे हमर पूजा करैत अछि, कखनहुँ कोनो दोसर विचार नहि रखैत अछि, ओ सब, आदि ।
हम पूरा (वहन) करैत छी, आदि: चूँकि जेतय दोसर भक्त सब अपन लाभ आ सुरक्षा लेल काज करैत अछि, ओतहि जे लोक स्वयं सँ अलग किछु नहि देखैछ, ओ सब एना नहि करैत अछि; ओ सब जीवन केर इच्छा सेहो नहि रखैत अछि; तेँ भगवान ओकरा सब केँ लाभ एवं सुरक्षाक भरोसा दैत छथि ।
एहि सँ अधिक आश्वासन हमरा सब केँ कि चाही ? हम त कहब जे एकरे अपन चेतना मे बैसा ली सब गोटे आ सब किछु मे भगवानहि केँ देखैत सम्पूर्ण योग आ क्षेम लेल पूर्ण निर्भरता हुनकहि पर छोड़िकय अलमस्त जीवन जिबैत रही । ॐ तत्सत् !!
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ॥
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥९-२३॥
हे कुंतीपुत्र, जे भक्त श्रद्धा सँ भरल अन्य देवता (दोसर विभिन्न देवी-देवता) सभक पूजा करैत छथि, ओहो सब मात्र हमरहि पूजा करैत छथि, मुदा गलत तरीका सँ ।
गलत तरीका: अनजान मे (अज्ञानतावश), ओहि तरीका सँ नहि जाहि सँ हुनका सब केँ मोक्ष भेटि सकैत छन्हि ।
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ॥
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥९-२४॥
चूँकि हमहीं सब यज्ञक भोगी (भोग प्राप्तकर्ता) आर स्वामी (मालिक) छी; लेकिन चूँकि ओ सब (अन्यान्य देवताक यज्ञकर्ता लोकनि) हमरा असल मे नहि जनैत छथि, तेँ ओ सब (मृत्युलोक) मे घुरि अबैत छथि । (पुनर्जन्म लेबए पड़ैत छन्हि ।)
ओ सब घुरि अबैत छथि – दोसर देवता सभक पूजा कयकेँ ओ सब बिना सन्देह अपन कयल गेल त्याग-बलिदान (यज्ञ, पुण्य) केर परिधि (लोक सब) मे पहुँचैत छथि, मुदा एहि पुण्य केर खत्म भेलाक बाद, ओ सब ओहि लोक सँ खसि पड़ैत छथि आर मृत्युलोक मे घुरि अबैत छथि ।
उपर देखने रही, वेदविद् लोकनिक स्वर्गप्राप्ति आ पुनः हुनका लोकनिक पुण्यक प्रभाव कम भ’ गेला उपरान्त स्वर्गलोक सँ मर्त्यलोक मे आयब-जायब लागल रहबाक बात कहल गेल छल । ठीक तहिना विभिन्न देवी-देवताक वास्ते निरूपित अनेकों पूजा-अर्चना आदिक परिणाम क्षणिक सुख आ पुनः मर्त्यभूमिक विभिन्न सुख-दुःख व द्वंद्वक सामना करबाक बात कहल गेल अछि । ई सब हमर-अहाँक मन-मस्तिष्क केँ अनुकूलन लेल आ राजविद्या – भक्तियोग प्रति अटल निष्ठा वास्ते कहल गेल अछि ।
यान्ति देवव्रता देवान् पितृन्यान्ति पितृव्रताः ॥
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥९-२५॥
देवता लोकनिक समर्थक देवता लोकनि लग जाइत छथि; पितर सब लग, हुनकर उपासक जाइत छथि; भूत सब लग, भूत पूजक सब जाइत छथि; हमर उपासक-समर्थक हमरा लग अबैत छथि ।
भूत: देवता सब सँ नीचाँ, मुदा मनुष्य सब सँ ऊँचा प्राणी ।
हम: अविनाशी (परमात्मा) ।
देवत्व जिनका सब मे छन्हि, तिनकर पूजक भेल करैछ । देवता होइथ, पितर होइथ, भूत-प्रेतादि अनेकों शक्तिक अवधारणा सँ भरल अछि ई संसार । अव्यक्त शक्तिक अनेकों स्रोत हेबाक मान्यता स्थापित अछि हमरा लोकनिक मानव समाज मे । तेँ कियो जिसस पूजथि, मोहम्मद पूजथि, अनेकों सन्त-सिद्ध केँ पूजथि – शक्तिस्रोतक अन्त नहि अछि । मुदा अन्तिम सत्य एकमात्र परमात्मा थिकाह, जे ई सब बात हमरा लोकनि केँ बुझा रहल छथि । बुझी ।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ॥
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥९-२६॥
जे कियो लोक भक्ति सँ हमरा एकटा पत्ता, एकटा फूल, एकटा फल, या जले अर्पित करैत अछि, हम तेकरा स्वीकार करैत छी – शुद्ध मनवला लोकक भक्तिपूर्ण दान (केँ हम स्वीकार करैत छी) ।
परमात्माक प्रति एकनिष्ठ भक्ति नहि केवल अविनाशी फल दैत अछि, बल्कि एकरा कयनाय सेहो बहुते आसान आ सरल छैक – कृष्ण एहि श्लोक मे यैह कहैत छथि ।
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ॥
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥९-२७॥
हे कुंतीपुत्र, अहाँ जेहो किछु करैत छी, जेहो किछु खाइत छी, जेहो किछु दान करैत छी, जेहो तपस्या करैत छी, से सबटा एना करू जेना हमरा अर्पण कय रहल छी ।
स्पष्ट अछि । आर बेसी कि चाही केकरो ? जे करू, हुनकहि लेल करू । सिम्पल आ बेस्ट !! छैक न इन्टरेस्टिंग !!
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ॥
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥९-२८॥
एहि तरहें अहाँ नीक आ बेजा परिणाम (फल) भोगयवला कर्म सभक बन्धन सँ मुक्त भ’ जायब; संन्यास (त्याग) केर योग मे हृदय केँ दृढ़ कयकेँ, आर मुक्त भ’ कय अहाँ हमरा लग आबि जायब ।
संन्यास (त्याग) केर योग: भगवान केँ सब किछु अर्पण कयकेँ हृदय केँ साफ करबाक ई तरीका ।
मुक्त, आदि: अहाँ शरीर मे रहिते स्वतंत्र भ’ जायब, आर एकर मरलाक बाद, अहाँ ‘हम’ बनि जायब । (हमर रूप बनि जायब ।)
ई भगवानक प्रतिबद्धता थिकन्हि । हम सब हुनका लग चलि जायब । बस, भावना मजबूत बनेने रहू ।
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ॥
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥९-२९॥
हम सब जीव सभक वास्ते एक समान छी; हमरा लेल कियो घृणा करयवला या प्रिय नहि अछि । मुदा जे लोक भक्ति सँ हमर पूजा करैत अछि, ओ हमरा मे अछि, आर हम ओकरा मे छी ।
हम आगि जेकाँ छी । जेना आगि अपना लग अयनिहार केँ गर्मी दैत अछि, आर दूर गेनिहार केँ नहि, तहिना हमहुँ करैत छी । हमर कृपा हमर भक्त सब पर होइत अछि, मुदा हमरा तरफ सँ कोनो राग (लगाव) केर कारण सँ नहि । जेना सूर्यक प्रकाश, सब जगह पसरल रहलाक बादहु, एकटा साफ आइना (शीशा) मे झलकैत अछि, तहिना हम, परम भगवान, जे हर जगह मौजूद छी, मात्र वैह लोक मे व्यक्त (प्रकटरूप) देखाइत छी, जेकर मन सँ भक्ति सँ अज्ञानक सबटा गन्दगी दूर भ’ गेल छैक ।
अपि चेत सुदुराचारो भजते माननन्यभाक् ॥
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥९-३०॥
अगर कियो बहुते खराब लोक सेहो हमर पूजा करैत अछि, तथा कियो आर केर भक्ति नहि करैछ, त ओकरा नीक मानल जेबाक चाही, कियैक तँ ओ सही निर्णय लेलक अछि ।
ओ सही निर्णय लेलक अछि: ओ (खराब लोक) ओ छी जे अपन जीवनक खराब रास्ता केँ छोड़बाक पवित्र निर्णय कय लेलक अछि ।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ॥
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥९-३१॥
हे कुंतीपुत्र, ओ (सही निर्णय करयवला खराब लोक) जल्दिये धर्मी (धर्मानुसार चलयवला) बनि जाइत अछि आर शाश्वत शान्ति (कहियो खत्म नहि होयवला शान्ति) पबैत अछि; अहाँ हिम्मत सँ (खुलिकय) दावी (घोषणा) कय सकैत छी जे हमर भक्त कहियो खत्म (बर्बाद, नाश) नहि होइत अछि ।
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ॥
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥९-३२॥
हे पृथाक पुत्र, हमर शरण मे अयला सँ, चाहे ओ निम्न जन्म (पापयोनि) केर हो, चाहे स्त्री हो, वैश्य हो, या शूद्र हो – ओहो सब परमगति केँ प्राप्त करैत अछि ।
निम्न जन्म केर…. शूद्र: कियैक तँ जन्म सँ वैश्य केवल खेती वगैरह मे लागल रहैत अछि, और स्त्री एवं शूद्र वेद सब पढ़इ सँ वंचित रहैत अछि ।
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ॥
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥९-३३॥
पवित्र ब्राह्मण लोकनि आर भक्त राजर्षि लोकनिक त चर्चे करबाक कोन जरूरत अछि ! एहि पल भरि केर, आनन्दविहीन (बिना प्रसन्नतावाली) संसार केँ पाबिकय, बस हमर पूजा करू ।
राजर्षि: ओ राजा जे संत बनि गेलाह अछि (ऋषित्व प्राप्त राजा लोकनि) ।
हिनका लोकनिक चर्चा करबाक जरूरत: त फेर पवित्र ब्राह्मण आर भक्त राज ऋषि लोकनि केँ ओहि लक्ष्य (परमात्मा) केँ कतेक आसानी सँ पाबि लैत छथि !
आनन्दविहीन दुनिया: एहि मुश्किल सँ भेटयवला मानुषिक शरीर मे जन्म लय केँ, मनुष्य केँ तुरन्त पूर्णता प्राप्तिक लेल मेहनत करबाक चाही, भविष्य पर निर्भर भेने बिना, कियैक तँ एहि दुनिया मे सब किछु पलहि भरिक अछि, आर प्रसन्नता (खुशी) केर खोज कएने बिना, कियैक तँ ई दुनिया बिना खुशी केर अछि ।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ॥
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥९-३४॥
अपन मन केँ हमरा सँ भरि लिय’, हमर भक्त बनि जाउ, हमरा उपर बलिदान भ’ जाउ, हमरा प्रणाम करू; एहि तरहें अपन हृदय मे हमरा दृढ़तापूर्वक लगाकय, हमरा अपन सब सँ पैघ लक्ष्य मानिकय, अहाँ हमरा लग आबि जायब ।
एहि अन्तिम गोटेक श्लोक मे खराबो लोक केँ भगवद्भक्ति सँ मुक्तिक गाथा कहैत नीक लोक बनि जेबाक बात कहैत नीक लोक केँ नीके परिणाम भेटबाक वचनबद्धता वर्णित अछि । एतय एकठाम निम्न जन्म संगहि स्त्री, वैश्य ओ शूद्र लोकनिक बात कहल गेल अछि । कतेको कुतर्की लोक कखनहुँ एहि श्लोक केँ उठाकय पटकि देल करैछ आ सवाल पर सवाल पुछैत गीता जेहेन गूढ़तम् ज्ञानक स्रोत केँ सेहो कलंकक टीका लगाबय लगैछ । अरे एना नहि छैक ! कोनो बातक पूर्ण सार सम्पूर्ण सन्दर्भ मे बुझल करू । स्त्री केँ वेद पढ़बाक अधिकार नहि होयब कहल गेल अछि, कारण हुनका मे मातृत्व धारण करबाक श्रेष्ठ गुण छन्हि आ ओ पुरुषक संसर्ग मे रहिकय संस्कार आ शिक्षा स्वतःस्फूर्त ढंग सँ प्राप्त कय सकैत छथि, कतेको उदाहरण अछि एकर । तहिना वैश्य होइथ या शूद्र – हुनका लोकनि केँ सेहो वेद जेहेन गूढ़ विषय मे मस्तिष्क खपेबाक बदले कृषिकर्म आ सेवाकर्म जेहेन सहज मुक्तिमार्ग कहल गेल अछि । एकटा ब्राह्मण लेल वेदपाठी होयब अनिवार्य अछि, पूजा-यज्ञ कर्म व कर्मकांडीय अनुष्ठानादिक जिम्मेदारी निर्वहन करबाक अपरिहार्यता सेहो व्याख्यायित अछि, मुदा एहि गम्भीर आ जटिल प्रक्रिया सँ आजीविका लेल जरूरी कर्म कयनिहार केँ मुक्त राखि हुनका सब केँ केवल अपन जातीय कर्म निष्पादन सँ मुक्ति ओ श्रेष्ठ परिणाम – लोकादिक प्राप्तिक वचनबद्धता देल गेल अछि । आर हम सब समग्र मे देखि सकैत छी जे एकटा खराबो लोक – पापी लेल भगवद्मार्ग मुक्तिगामी कहल गेल अछि । नीक लोकक नीक चर्याक बाते कि कयल जाय – सेहो स्पष्ट कयल गेल अछि । तेँ श्लोक २९ सँ ३४ केँ एहि ‘राजविद्याक रहस्यक’ उपसंहार जेकाँ बुझब आ सब गोटे अपन जीवन लेल सुधार एवं मुक्तिक वास्ते भक्तिमार्गक अनुसरण करब । ॐ तत्सत् !!
हरिः हरः!!
