लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- ममताक तपस्या : जितियामे जीवन, त्याग आ मंगलक दर्शन
मिथिलाक पर्व-परम्परा केवल तिथि, व्रत आ कर्मकाण्डक अनुक्रम नहि थिक, ई लोकजीवनक अनुभव, पारिवारिक संस्कार, आध्यात्मिक आस्था आ जीवन-दर्शनक सजीव अभिव्यक्ति थिक। एहि परम्परामे जितिया पाबनि मातृत्वक ममता, संतानक दीर्घायु-कामना, आत्मसंयम आ त्यागक अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करैत अछि। ई एहन पर्व थिक जाहिमे मायक प्रेम केवल भाव बनि कऽ नहि रहैत अछि, बल्कि तप, अनुशासन आ संकल्पक रूप धारण करैत अछि।
जितिया अर्थात जीवित्पुत्रिका व्रत, मुख्यतः माय द्वारा अपन संतानक दीर्घायु, आरोग्य, सुख-समृद्धि आ मंगलमय जीवनक लेल कएल जाइत अछि। मुदा एहि व्रतक आध्यात्मिक अर्थ केवल संतानक आयु बढ़ेबाक प्रार्थनामे सीमित नहि अछि। एकर मूलमे निहित अछि ‘अपन सुखसँ ऊपर दोसरक जीवनक मंगलकेँ स्थान देब।’ एहि अर्थमे जितिया ममताक तपस्या आ निःस्वार्थ प्रेमक एकटा उज्ज्वल प्रतीक थिक।
जितियाक कठिन उपवास शरीरक कष्ट मात्र नहि, बल्कि इन्द्रियनिग्रह आ आत्मसंयमक साधना सेहो थिक। अन्न-जलसँ दूरी बनबैत व्रती महिला अपन भीतरक इच्छाशक्ति, धैर्य आ संकल्पकेँ जागृत करैत छथि। शरीरक भूखक ऊपर मनक संकल्पक विजय एहि व्रतक एकटा महत्वपूर्ण आध्यात्मिक संकेत थिक।
व्रतक केन्द्रमे ‘जीवन’ अछि अपन संतानक जीवन, ओकर रक्षा आ ओकर मंगल। एहि कारणेँ जितिया मनुष्यकेँ ई बोध करबैत अछि जे जीवन केवल अपन लेल नहि, बल्कि दायित्व, प्रेम आ परोपकारक लेल सेहो अछि।
व्रतक कथा-परम्परामे आयल जीमूतवाहनक प्रसंग त्याग आ परोपकारक आदर्श प्रस्तुत करैत अछि। अपन जीवनक चिन्ता नहि कऽ दोसरक जीवनक रक्षा लेल अपनाकेँ समर्पित करबाक भाव एहि कथामे निहित अछि। एहि दृष्टिएँ जितिया केवल ‘संतानक दीर्घायु’क व्रत नहि, बल्कि त्याग, करुणा आ जीवन-रक्षक चेतनाक सांस्कृतिक स्मृति सेहो थिक।
जितियाक सभसँ गहिर भाव मातृत्वमे भेटैत अछि। माय लेल संतान केवल ओकर शरीरक अंश नहि, बल्कि ओकर आशा, ओकर भविष्य आ ओकर आत्मीय संसार थिक। संतानक सुखमे अपन सुख आ संतानक पीड़ामे अपन पीड़ा अनुभव करबाक जे सहज क्षमता मातृत्वमे अछि, जितिया तकर एकटा सार्वजनिक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति थिक।
एहि व्रतमे मायक मौन प्रार्थना जेना कहैत अछि “हे जीवनक शक्ति! हमर संतानक जीवन दीर्घ हो, ओकर पथ मंगलमय हो, ओकर माथ पर संकट नहि, आशीषक छाँह रहय।”
एहि प्रार्थनामे व्यक्तिगत आकांक्षासँ अधिक मंगलक सार्वभौमिक कामना अछि।
मिथिलामे पर्व कहियो मात्र पूजा-पद्धति नहि रहल। प्रत्येक पर्व परिवारकेँ जोड़ैत, पीढ़ीकेँ परम्परासँ परिचित करबैत आ लोकस्मृतिकेँ जीवित रखैत आयल अछि। जितिया सेहो एहि सांस्कृतिक निरन्तरताक महत्वपूर्ण कड़ी थिक।
गामक आँगन, व्रती महिलाक सामूहिक उपस्थिति, कथा-श्रवण, लोकगीत, पूजा-विधि आ पारिवारिक सहभागिता ई सभ मिलि जितियाकेँ केवल व्यक्तिगत व्रत नहि, बल्कि सामुदायिक सांस्कृतिक अनुभव बना दैत अछि।
विशेष रूपसँ ई पाबनि मिथिलाक नारी-चेतनाक एकटा महत्वपूर्ण पक्ष सेहो उजागर करैत अछि। नारी केवल परिवारक पालनकर्त्री नहि, बल्कि परम्पराक संवाहिका, संस्कारक संरक्षिका आ अगिला पीढ़ीक जीवन-मूल्यक प्रथम शिक्षिका सेहो छथि। जितियाक माध्यमसँ एक पीढ़ीक ममता आ आस्था दोसर पीढ़ी धरि पहुँचैत अछि।
तथापि, प्रत्येक परम्पराक मूल भावकेँ बुझनाइ आवश्यक अछि। व्रतक आध्यात्मिक मूल्य त्याग, प्रेम, आत्मसंयम आ मंगलकामनामे अछि। एकरा केवल बाहरी कर्मकाण्ड, भय अथवा सामाजिक दबाव धरि सीमित कऽ देब उचित नहि।
परम्परा तखने जीवित रहैत अछि जखन ओकर आत्मा समयक संग संवाद करैत रहय। जितियाक सार ई नहि जे कष्ट भोगब अनिवार्य अछि बल्कि ई अछि जे प्रेमकेँ त्याग, अनुशासन आ उत्तरदायित्वक माध्यमसँ अभिव्यक्त कएल जा सकैत अछि। अतः परम्पराक सम्मानक संग विवेक, स्वास्थ्य-बोध आ मानवीय संवेदनाक सेहो स्थान रहबाक चाही।
जितिया पाबनि मिथिलाक माटिमे अंकुरित ओहि मातृभावक उत्सव थिक, जतय ममता प्रार्थना बनैत अछि, प्रार्थना तप बनैत अछि आ तप संतानक मंगल-कामनामे परिणत होइत अछि। एकर आध्यात्मिक संदेश आत्मसंयममे, दार्शनिक संदेश त्याग आ परोपकारमे तथा सांस्कृतिक संदेश परिवार, लोकपरम्परा आ पीढ़ी-दर-पीढ़ी संस्कारक संरक्षणमे निहित अछि।
समय बदलि रहल अछि, जीवन-पद्धति बदलि रहल अछि, मुदा मायक हृदयमे संतानक मंगलक जे अनन्त दीप जरैत अछि, से कालातीत अछि। जितिया ओहि दीपक लोकपर्व थिक ममताक, तपस्याक, त्यागक आ जीवनक प्रति गहिर आस्थाक।
अन्ततः जितिया हमरा सभकेँ ई शाश्वत बोध दैत अछि जतय प्रेम निःस्वार्थ होइत अछि, ततय त्याग तपस्या बनि जाइत अछि,
आ जतय त्यागमे दोसरक जीवनक मंगल निहित होइत अछि, ततय साधारण जीवन सेहो साधनामय भऽ जाइत अछि।
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✍️ दिलीप झा “ललित”
