Search

पठन-पाठनक महत्वः नहि पढ़ब त महीँस बनब

1 भ्यूज

मनुख सेहो महीँस बनैत छैक की ?

(कथा – प्रवीण नारायण चौधरी, समाज मे विद्यमान सत्यताक विम्ब पर आधारित सत्यकथाक समीपकथा)

अहूँ सब केँ याद होयत – ओ दिन जखन शिक्षा व्यवस्था मे सहजता सँ लोक पास कय जाय, से आइ-काल्हिक नेताजी सब अपन लोकप्रियता आ वोट हासिल करय लेल परीक्षा मे चोरी करबाक दुर्व्यवस्था लागू करा देलनि । कतेको ठाम ‘होम सेन्टर’ आ ‘चोरी करबाक छूट’ लागू भ’ गेलैक । याद अछि न ? आइयो धरि देखब, एहि कुव्यवस्थाक झमार सँ लाखों विद्यार्थीक भविष्य अन्धकारमय भ’ रहल छैक । चोरी सँ परीक्षा पास कय लेब, एहि सोचक संग जे बढ़ल से बर्बाद भेल । ई तय बुझू । उदाहरण अनेकों अछि, समाज मे चारूकात पसरल देखाइछ, देखि सकैत छी ।

हमरा मोन पड़ैछ – ताहि समय मास्टरसाहेब कहथिन, “हे रौ हरासंख, रौ चोरियो करय लेल बुद्धि चाही । मानि ले जे चोरी करबाक वास्ते किताब खोलिकय लिखय कहतौक, त पहिने सँ बुझल रहतौक जे एहि प्रश्नक जबाब फल्लाँ ठाम छैक तखने न किताबक पन्ना उलटाकय लिखबिहिन उत्तर । आ खचरहबा, जँ पढ़नहिये नहि रहबिहिन, बुझले नै रहतौक त चोरी केना करबिहिन रे हरासंख ?”

चारूकात आँखि पसारिकय देख लियौक । बिना पढ़ल-लिखल आ बुझनुक-होशियारक जीवन केहेन छैक । एकटा रील मे देखलियैक जे त्रिकोणमितिक फर्मूला सब याद करय बेर जे थीटा-थीटाक प्रयोग आबैक, ताहि समय केकरो ऊबाहट एलैक आ माथ नोचिकय थीटा-थीटा नहि कयलक त आब ओ मजदूर बनिकय ईंटा-ईंटा कय रहल अछि ।

हालसालक बात कहैत छी । एकटा बड अबन्ड लेकिन दिमाग सँ तेज छौंड़ा मोहना ट्यूशन पढ़य लेल आयल । ओकरा मास्टरसाहेब कहलथिन, “हे एना नहि बुझय मे आबय छौक त पहिने मैथिली मे बुझि लेल कर । याद रहतौक तखन ।”

मोहना कहलकैक, “एह ततेक रास बात लिखल छैक जे एतेक के पढ़त ? रील सब मे ठीक छैक, छोट-छोट रहैत छैक, मोबाइल स्क्रीन पर स्क्रौल डाउन करैत ओहि मे जे सब कहइ य से सब बुझैत समय बिता लैत छी । के जाइ य’ पढ़य ल’ ! तहू मे मैथिली ? कि हेतैक पढ़िकय ।”

मास्टरसाहेब कहलथिन – “हौ बापक बूड़ल सन्तान ! नाम हँसेभुन फल्लाँ भाइ केर । हौ, एखन पढ़य ल’ कहय छिय’ त भारी बुझाइत छह । बाद मे जखन ‘बौआ भाइ’ जेकाँ महीँस बनि जेबह त बुझिहक ।

आब कहब जे बौआ भाइ महीँस केना बनि गेलखिन ? जी, केना बनलखिन सेहो सुनिये लिय’ –

माय-बाबूक प्रेशर पर स्कूल जाथिन बौआ भाइ, मुदा पढ़ाइ मे मन कम लागैन । ओम्हर मास्टरसाहेब पढ़ा रहल छलथिन, ई एम्हर लुच-लुच आ खुच-खुच करैत नौटंकी मे लागल रहल करथि क्लास मे । एक दिन मास्टरसाहेब देख लेलखिन । कहलखिन – “अरे बौआ भाइ ! तुम ये सब क्या करते रहता है क्लास में ? पढ़ाते समय बातें करोगे तो क्या होगा जानते हो ? यू बफेलो ! योर एक्टिविटी बिकेम लाइक बफेलो । योर ब्रेन बिकेम लाइक बफेलो । योर स्किन लाइक बफेलो । यू ओनली सीन एट होम इंगेज्ड विथ बफेलो । यू हैव बिकम टोटली लाइक बफेलो ।”

मास्टरसाहेबक डाँट सुनि हुनका क्लास सँ बाहर गेलाक बाद बौआ भाइ लोक सब सँ पुछलक जे ई मस्टरबा कि कहैत रहय रौ अंग्रेजी मे ? त छौंड़ा सब बुझेलकैक जे तोरा घर पर हमेशा महीँस चरबैत देखलखुन, क्लास मे बदमाशी केलहिन त तोरा महीँस बनि गेलें से कहलखुन । बौआ भाइ केँ ततेक तामस उठलैक जे ओही दिन राति मे मास्टरसाहेबक ५ कठबा खेत मे गम्हरायल धान केँ काटिकय भोरे अपन महीँसक बथान पर चारा रूप मे कुट्टी-काटिकय नाइद मे सानी संग मिलाकय खुआ देलक ।

एहि बातक पता मास्टरसाहेब केँ बाद मे लागि गेलनि आ ओ श्राप देलखिन जे बौआ भाइ भरि जीवन महीँसे जेकाँ रहत । आ से सही मे बौआ भाइ आजीवन महीँसवत् जिबय लेल बाध्य भेलाह । कारण पढाइ मे मोन नहि लगलनि । महीँसे केँ अपन जीवन मानि मूढ़ता स्वीकार कयलनि । लुलुथुथु होइत रहलनि, भरि जीवन महीँसक संग बितलनि । समाज मे कतहु मोजर नहि भेटलनि ।

त, पढ़ाइ करबाक समय मे जे कियो पढ़ाइ नहि करैछ से भरि जीवन पश्चातापक आइग मे जरैत रहैछ । अनमोल मानव जीवन ओकर गँवार आ अभाव मे जिबय लेल बाध्य होइछ । बौआ भाइक कथा एकर गबाही दैछ से बात हम सब नीक सँ बुझी ।

हरिः हरः!!

Related Articles