गीताक पन्द्रहम अध्यायक प्रवीण व्याख्या
– प्रवीण नारायण चौधरी
चौदहम अध्याय मे गुणक आधार पर प्रकृति ओ पुरुष सँ सृजित-स्थित-पालित सृष्टि मे हम देहधारी मनुष्य केना आत्मसाक्षात्कार करब, केना सदिखन स्वयं केँ सनातन परमात्माक अंशरूप मे अपन भूमिका करब, सत्त्व-रजस-तमस केर तीन गुण आ ओकर लक्षण व्यवहारिक जीवन मे केना अपन काज करैत अछि ताहि सभक विशद् विश्लेषण-वर्णन उपरान्त आजुक पन्द्रहम पड़ाव मे फेर श्री कृष्ण स्वयं एकटा आर नव दृष्टि आ मीमांसापूर्वक जीवनोपयोगी दर्शन राखि रहल छथि । फेर भगवानहि केर उक्ति सँ आरम्भ होइछ ई नव अध्याय, ध्यान दी ।
श्रीभगवानुवाच ।
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ॥
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१५-१॥
भगवान कहलखिन:
ओ (ऋषि-मुनि, ज्ञानीजन) लोकनि एकटा हमेशा रहयवला (सनातन) अश्वत्थ (गाछ) केर बात करैत छथि जेकर जैड़ उपर अछि आ डार्हि (शाखा) सब नीचाँ मे अछि, जेकर पात सब वेद थिक; जे ई जनैत छथि, से वेद जानयवला थिकाह ।
अश्वत्थ: मतलब, ओ जे काल्हि तक नहि टिकतः (अर्थात्) संसार, हमेशा बदलैत रहयवला, इन्द्रियग्राह्य (असाधारण) संसार ।
ब्रह्म केँ हुनक अव्यक्त (बिना देखाय दयवला) ऊर्जा, माया, केँ एकमात्र “उपर” कहल जाइत छन्हि, कियैक तँ ओ सब चीज सँ उपर छथि; उपर वला एहि संसारक गाछ केर जैड़ छथि, तेँ कहल जाइछ जे एकर जैड़ उपर अछि । महत्, अहंकार, तन्मात्रा, आदि, एकर (एहि गाछ केर) शाखा (डार्हि) सब छी जे आर पैघ सँ पैघ होइत रहैत अछि – एहि द्वारे एकरा ‘नीचाँ’ शाखा सब कहल जाइत छैक । जेना पत्ता गाछक रक्षा करैत अछि, तहिना वेद संसार केर गाछक रक्षा करैत अछि, जेना धर्म आ अधर्म केँ ओकर कारण व परिणाम (फल) केर संग बुझबैत अछि ।
शाश्वत: कियैक तँ संसारक गाछ बिना आरम्भ आ अन्त केँ जन्म लेबाक सतत श्रेणी (निरन्तर चलि रहल श्रृंखला) पर टिकल अछि, आर एकरा ‘हम ब्रह्म छी” एहि ज्ञानक बिना काटल नहि जा सकैत अछि ।
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखाः गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ॥
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥१५-२॥
नीचाँ आ उपर एकर डार्हि सब पसरल अछि, जेकरा गुण सब सँ पोषण भेटैत छैक, इंद्रिय सब एकर कली थिकैक; आर नीचाँ मनुष्यक संसार सँ आगाँ धरि जैड़ पसरल छैक, जे कर्म सभक उद्भव (जन्म दैत, आरम्भ करैत) अछि ।
नीचाँ: मनुष्य सँ नीचाँ दिश ।
उपर: ब्रह्म तक ।
जैड़: सबसँ उपरी जैड़ “उपर” केर भगवान थिकाह; दोसर जैड़ संस्कार, आसक्ति, द्वेष, आदि थिक । यैह सब अछि, जे निरन्तर नीक आ बेजा कर्म सभक कारण आ परिणाम बनैत अछि, आर मनुष्य केँ कर्म – धर्म आ अधर्म – सँ बाँधैत अछि ।
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न स सम्प्रतिष्ठा ॥
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥१५-३॥
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ॥
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥१५-४॥
एतय एकर रूप केँ नहि बुझल जा सकैछ जेना कि, नहि तँ एकर अन्त छैक, नहिये एकर आरम्भ छैक, नहिये एकर अस्तित्वे छैक । एहि मजबूत जैड़ वला अश्वत्थ केँ वैराग्यक मजबूत कुरहैर सँ काटिकय – फेर ओहि लक्ष्य केँ तकबाक (खोजबाक) रहैछ, जेतय पहुँचिकय ओ (ज्ञानीजन) लोकनि फेर सँ वापस नहि अबैत छथि । हम ताहि “आदिपुरुष” केर शरण लैत छी जाहिठाम सँ शाश्वत कर्मक प्रवाह (धारा) निकलल अछि ।
जेना कि (एकर रूप): एकर उपस्थित होयब (अस्तित्व मे रहब) नहि कहल जा सकैत छैक, कियैक तँ ई हरेक दोसर क्षण मे अबैत अछि आ फेर गायब (लुप्त) होइत रहैत अछि । कमेंट्री ११.१६ देखी ।
तत् : ओ – शंकर आ आनंदगिरी “ततः” पढ़ैत छथि, आर एकरा अश्वत्थ, संसारक गाछ सँ परे (दूर) या उपर बतबैत छथि ।
शाश्वत क्रिया: प्रक्षेपण (प्रोजेक्शन) केर ई हमेशा चलयवला कर्म, विकास (जीव व जीवन केर विकास) केर ई हमेशा बहयवला धारा (प्रवाह), घटना घटैत रहयवाली संसार ।
एहि ऊर्ध्वमुख अश्वत्थ केर गाछक उपमा पर भगवान कृष्ण हमरा सब केँ पुनः ब्रह्मलोक सँ मर्त्यलोक धरिक सम्बन्ध केँ बुझा रहल छथि । उपर परमात्मारूपी जैड़ सँ नीचाँ संसार आ मानव धरि ओहि अश्वत्थ गाछक विभिन्न डार्हि (शाखा) आदिक संग वेदरूपी पत्ता तथा गुणरूपी पोषण संग इन्द्रीयरूपी कली केर चर्चा करैत हमरा सब केँ अपन यथास्थिति बुझबाक उपदेश भेल अछि । पुनः भगवानक कहब छन्हि जे एतेक रास उपमा-उपमेय हेबाक बादो हम आत्मारूपी जीव केँ स्वयं भगवान कृष्णक कहल शब्द जे ‘हम ताहि “आदिपुरुष” केर शरण लैत छी जाहिठाम सँ शाश्वत कर्मक प्रवाह निकलल अछि’, एहि अबस्था धरि पहुँचबाक लेल ‘वैराग्य’ सहारा लेबाक सन्देश देलनि अछि ।
अश्वत्थ गाछक उपमाक संग ओकर जैड़ उपर यानि ब्रह्मलोक आ फेर मनुष्यक लोक धरि जैड़क विस्तारक बात कहैत ‘वेदरूपी पात’ – अर्थात् जीवन लेल जरूरी-गैरजरूरी कतेको रास बात सभक निरूपणक दृष्टान्त देलनि अछि । आर फेर कहलनि अछि जे ‘हमरा सब केँ एहि सम्पूर्ण तामझामक मूल यानि परमात्माक शरण मे पहुँचबाक अछि’ । एकरा आर बेसी आगाँक श्लोक सब मे फरिछायल गेल अछि, ध्यान दी ।
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ॥
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥१५-५॥
अहंकार व मोह (भ्रम) सँ मुक्त, आसक्ति केर खराबी पर जीत हासिल कयकेँ, सदिखन अपना आप (स्वयं) मे रहयवला लोक, समस्त इच्छा (आकांक्षा) केँ दूर कयकेँ (हंटाकय), सुख आ दुःख जेहेन द्वन्द्व (विपरीत जोड़ा) सँ मुक्त, बिना मोह (भ्रम) वला लोक ओहि “शाश्वत लक्ष्य” धरि पहुँचैत अछि ।
परमात्मा (ब्रह्म) धरि पहुँच तखनहिं भ’ पबैत छैक जखन ई सब लक्षण स्पष्ट भ’ जाय । अहंकार व मोह सँ मुक्ति, आसक्ति (जुड़ाव) केर खराबी पर जीत हासिल होयब, हमेशा अपना-आप (अपन आत्मा) मे लिप्त रहयवला लोक, समस्त इच्छा केँ दूर कय केँ, सुख-दुःख आदि अनेकों द्वंद्व सँ मुक्त, बिना कोनो तरहक सन्देह वला लोक ताहि “शाश्वत लक्ष्य” धरि पहुँचैत अछि – श्लोक ५ सँ हमरा सब लेल आत्मनिरीक्षण हेतु लक्षण सब स्पष्ट कय देलनि अछि ।
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ॥
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥१५-६॥
जेतय सूरज नहि चमकैत अछि, नहिये चाँद, न आगि; वैह हमर सर्वोत्तम स्थान थिक, जेतय जाकय लोक वापस नहि अबैछ ।
चूँकि भगवान कृष्ण सगुण रूप मे ब्रह्म केर प्रतिनिधित्व कय रहल छथि, हुनकहि माध्यम सँ ई सर्वोच्च ज्ञानक प्राप्ति सेहो भ’ रहल अछि, आर ओ बेर-बेर उपमा-उपमेय द्वारा एहि स्थिति केँ स्पष्ट करैत जा रहल छथि – एहि श्लोक ६ मे फेर एक नव दृष्टि रखलनि जे अनकों तेजोमय चीज जेकर चमक सँ हमरा सब परिचित छी, ताहू सँ ‘उपर’ अपन सर्वोत्तम स्थानक परिचय दैत कहलनि अछि जे एतय धरि जँ हमरा सभक पहुँच भ’ जाय त फेर वापसी नहि होयत, अर्थात् जन्म-मृत्युक चक्र मे नहि पिसायब ।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ॥
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥१५-७॥
हमर एकटा शाश्वत हिस्सा जीवनक दुनिया मे एकटा जीवित आत्मा बनिकय, स्वयं केँ पाँच इन्द्रिय सहित छठम इन्द्रीक रूप मे मन दिश खिंचाइत अछि, तथा प्रकृति मे रहैत अछि ।
जीव या व्यक्तिगत आत्मा परमात्माक ओ स्वरूप अछि जे हरेक जीव मे कर्ता आर भोक्ताक रूप मे प्रकट होइत अछि, अविद्या द्वारा बनायल गेल उपाधि सब द्वारा सीमित रहैत अछि; मुदा वास्तव मे, दुनू एक्के थिक । ई कोनो घैल मे आकाश (स्पेस) जेकाँ अछि, जे अनन्त आकाश केर एकटा हिस्सा होइत छैक, आर घैलाक नष्ट भेला पर, जे (घैला) सीमितताक कारण थिक, आकाश केर संग एक भ’ जाइत अछि ।
(अर्थात् घैला मे समेटल आकाश केँ जीव मे समेटल आत्मा सँ तुलना कयल गेल अछि, घैला खत्म त वैह घैला मे समेटल अनन्त आकाशक छोट हिस्सा पुनः आकाश मे मिलि जाइछ, ठीक तहिना जीव मे समेटल परमात्माक शाश्वत हिस्सा जीवक कारण उपाधि सब सँ सीमित होइतो जीव केर घैलारूपी शरीरक अन्त भेला पर आकाशरूपी आत्मा पुनः अपन मूल यानि परमात्मा मे मिलि जाइछ ।)
श्लोक ७ मे भगवान कृष्ण आर स्पष्ट कय देलनि जे ओ परमात्माक रूप आ हमरा सब समस्त सृष्टिलोकक जीव मे हुनकहि शाश्वत हिस्सा ‘जीवित आत्मा’ बनिकय पाँच इन्द्रिय सहित छठम इन्दिय मन दिश खिंचाइत अछि, प्रकृति मे रहैत अछि । स्वामी स्वरूपानन्दक देल गेल कमेन्ट्री मे घैला मे समेटल आकाश आ स्वच्छन्द अबस्थित मुक्त ओ अनन्त आकाश केर उदाहरण दैत पुनः आत्मा आ परमात्मा केर दर्शन केँ स्पष्ट कयल गेल अछि ।
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ॥
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥१५-८॥
जखन भगवान शरीर ग्रहण करैत छथि आर जखन ओकरा छोड़ैत छथि, त ओ एकरा सब केँ लय कय चलि जाइत छथि जेना हवा सुगन्ध (खुशबू) केँ ओकर निवास (रहबाक ठेकाना, फूल आदि) सँ लय कय चलि जाइत अछि ।
भगवान: ओ जीव, जेकर जिकिर पैछला श्लोक मे कयल गेल अछि ।
जखन जीव शरीर छोड़ैत अछि, त ओ इंद्रिय आर मन केँ अपन चारू दिश खिंचि लैत अछि । जखन ओ दोसर शरीर मे जाइत अछि, त ओ एकरा सब केँ फेर सँ अपना संग लय जाइत अछि, यानि ओ एकरा सभक संग फेर सँ जन्म लैत अछि ।
एहि ८वाँ श्लोक मे भगवानक शरीर ग्रहण करब, अर्थात् हुनक शाश्वत हिस्सा केर जीवित आत्मा बनिकय जन्म लेब आ फेर ताहि शरीर केँ छोड़ब, छोड़बाक समय उपरोक्त सम्पूर्ण इन्द्रिय-मन आदि केँ समेटिकय ओहिना अपना संगहि लय केँ चलि जाइछ जेना हवा सुगन्धक निवासस्थल (फूल आदि) सँ सुगन्ध लय केँ चलि जाइछ – मृत्योपरान्त मनुष्यहु केर शरीर निढाल आ निष्प्राण भेला उपरान्त जेना बेकाजक भ’ जाइछ, ओहि मे न कोनो इन्द्रिय-भाव, न मनोभाव, न कोनो सुगन्ध, न कोनो सक्रियता – मानू सब किछु प्राणक संगहि चलि जाइछ; एकर दर्शन करौलनि अछि ।
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ॥
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥१५-९॥
कान, आँखि, स्पर्श, स्वाद आ गन्ध, तथा मन पर राज करैत (हुक्म चलबैत, अध्यक्षता करैत), ओ चीज सभक अनुभव करैत अछि ।
आत्मा जा धरि शरीर मे निवास करैछ, ई सारा इन्द्रिय सन्दर्भित विषय सब पर ओकरहि अध्यक्षता – हुकूमत चलैत छैक ।
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ॥
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥१५-१०॥
(एक शरीर सँ दोसर शरीर मे) प्रवेश करैत समय, या (ओहि मे – पहिनुके मे) निवास करैत समय, या अनुभव करैत समय, या गुण सभक संग संयुक्त भेला पर – भ्रमित लोक ओकरा नहि देखैत अछि; मुदा जेकरा लग बुद्धिक आँखि छैक से ओकरा देखैत अछि ।
यद्यपि आत्मा सब सँ बेसी लग अछि आर विभिन्न कार्य सब मे लोकक चेतनाक सीमा भीतर सबसँ सहजतापूर्वक अबैत अछि, तैयो इन्द्रिय-विषय सभक प्रति पूर्ण अधीनताक कारण, सब गोटे ओकरा (आत्मा केँ) नहि देखि पबैत अछि ।
एहि श्लोक मे ‘आत्मा’ केर अनुभूति केकरा होइछ से स्पष्ट कयल गेल अछि । ‘आत्मा’ केर उपरोक्त व्याख्या आ ओकर अनुभूतिक मादे अन्तर्दृष्टि सँ देखबाक-बुझबाक अनुशंसा भेल अछि । आ, जे मूढ़चित्त होयत, ओकरा एहि सब सँ कोनो लेना-देना आ बुझना या चिन्तन करना सँ नहि रहि जाइछ ।
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ॥
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥१५-११॥
जे योगी (पूर्णताक प्राप्ति वास्ते) कोशिश करैत छथि, से ओकरा (यानि आत्मा केँ) अपनहि भीतर निवास करैत (रहैत) देखैत छथि; मुदा जे नासमझ आ मूर्ख अछि, कोशिश कयलो उपरान्त ओकरा नहि देखि पबैत अछि ।
नासमझ: जेकर मन तपस्या आर इन्द्रिय सब केँ वश मे कयकेँ नव नहि भेल छैक, जेकर मन शुद्ध नहि भेल छैक ।
एहि श्लोक मे ‘योगी’ आ ‘मूढ़’ – दुनू केना अपन जीवन मे आत्मसाक्षात्कार प्रति सजग या बेपरवाह रहैछ से स्पष्ट कय देल गेल अछि । योगी पूर्णता प्राप्तिक प्रयत्न करैत छथि । अपना भीतर ओ आत्माक दर्शन करैत परमात्माक दर्शन करैत छथि । जे नासमझ आ मूढ़चित्त छथि, ओ कोशिशो करैत छथि तँ मोहवश हुनकर पहुँच आत्मा धरि नहि भ’ पबैछ ।
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ॥
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजौ विद्धि मामकम् ॥१५-१२॥
जे प्रकाश (तेज) सूर्य मे छैक, जे कि पूरा दुनिया केँ प्रकाशित करैत अछि, जे चाँद एवं आगि मे छैक – ताहि प्रकाश (तेज) केँ हमरे जानू (मानू) ।
प्रकाश: एकर मतलब चेतना केर प्रकाश सेहो भ’ सकैत अछि ।
श्लोक १२ मे फेर परमात्मारूपी कृष्ण अपन सहज परिचय दैत सूर्य, चन्द्रमा आ अग्नि मे रहल तेज केँ परमात्मारूप मे जनबाक लेल कहलनि अछि । हम सब गौर करब त बुझय मे आबि जायत जे हरेक उपमा-उपमेय मार्फत भगवान आत्मा-परमात्मा बीच तादात्म्य बैसबैत वांछित कर्म आत्मसाक्षात्कारक अनुशंसा करैत छथि ।
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ॥
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥१३॥
अपन ऊर्जाक संग धरती पर आबिकय हम समस्त जीव केँ सहारा दैत छी, आर सोम (जलीय रस सँ भरल चाँद) बनिकय समस्त पुष्प-औषधि (गाछ-वृक्ष, जड़ी-बूटी, अनाज, फल आदि दयवला स्रोत सब) केँ पोषण प्रदान करैत छी ।
ऊर्जा: ओजस – ईश्वर केर ऊर्जा, जाहि सँ विशाल स्वर्ग आर धरती मजबूती सँ टिकल अछि ।
पोषण: ओहि सब मे रस भरिकय ।
जलीय रस सँ भरल चाँद: सोम, चाँद केँ सम्पूर्ण तरल पदार्थ (रस) केर भंडार या रूप मानल जाइछ ।
पुनः परमात्मारूपी कृष्ण अपन अलग छटा देखबैत कहलनि जे ओ अपन ऊर्जा सँ धरती पर आबिकय सब जीव केँ सहारा दैत छथि । सोम (चन्द्रमाक प्रकाश मे निहित जलकण) बनिकय पुष्प-औषधि केँ पोषण प्रदान करैत छी । आर यैह विश्वम्भर केर भंडार सँ हुनक सृजित शाश्वत संसार लेल पोषण-सिद्धान्त कार्य करैत अछि ।
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ॥
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥१५-१४॥
जीव केर शरीर मे वैश्वानर (अग्नि) केर रूप मे रहिकय, हम प्राण आ अपानक संग मिलिकय, चारि प्रकारक भोजन केँ पचबैत छी ।
देखू ४-२९ ।
वैश्वानर: पेट (आमाशय) मे रहयवला आगि ।
चारि तरह केर भोजन: ओ भोजन जेकरा (१) चिबाकय (चर्ब्य), (२) चूसिकय (चोष्य), (३) चाटिकय (लेह्य), आर (४) घोंटिकय (पेय) खेबाक रहैत छैक ।
परमात्मारूपी कृष्ण हम जीव केर शरीर मे ‘वैश्वानर (अग्नि)’ रूप मे रहि चारि प्रकारक भोजन केर पाचन ओ पोषणक स्पष्ट उदाहरण देलनि अछि ।
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ॥
वेदैश्च सर्वेरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥१४-१५॥
हम सभक हृदय मे केंद्रित (अवस्थित) छी; स्मृति आ धारणा आ संगहि एकर हानि (विस्मृति या समझशक्ति केर हरा गेनाय) हमरहि सँ अबैत अछि । समस्त वेद केँ जनबाक योग्य हमहीं छी, वेदान्तक रचयिता सेहो हमहीं छी आ वेदक ज्ञाता सेहो हमहीं छी ।
स्मृति: पैछला जन्म सब मे जे अनुभव कयल गेल अछि; आर ज्ञान – अंतरिक्ष, समय ओ दृश्य प्रकृतिक सामान्य सीमा सब केँ पार करयवला चीजक ज्ञान – आनंदगिरि (आचार्य) ।
हमरहि सँ अबैत अछि: ओकर नीक या बेजा कर्म सभक परिणामस्वरूप ।
वेदांत केर रचयिता: ई हमहीं छी जे वेदान्त ज्ञान केर शिक्षक छी, आर एकरा नियमित ऐगला पीढ़ीक उत्तराधिकार लोकनि केँ सौंपबाक (हस्तान्तरित कयल जेबाक) कारण बनैत छी ।
श्लोक १२ आ तदोपरान्त भगवान कृष्ण परमात्माक दर्शन आत्मारूपी जीव लेल केना सम्भव अछि, कोन तरहें मनन करैत रहब, तेकर विभिन्न उदाहरण सब – विभिन्न रूप सब राखैत बुझा रहल छथि । एहि श्लोक मे सभक हृदय मे स्थित, स्मृति ओ धारणा संगहि एकर हेरेबाक स्थिति – सब किछु हुनकहि सँ अबैत अछि कहैत सम्पूर्ण वेदक लक्ष्य जे केवल परमात्मा केँ जानू सेहो कहलनि अछि । वेदान्त (अन्तिम ज्ञान) केर रचयिता वैह थिकाह । वेदक ज्ञाता सेहो वैह छथि ।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ॥
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥१५-१६॥
दुनिया मे दुइ पुरुष छथि – नाशवान (क्षर) आ अविनाशी (अक्षर) । समस्त जीव नाशवान अछि, आर कूटस्थ केँ अविनाशी कहल जाइत छन्हि ।
दुइ पुरुष: दुइ वर्ग – जीव सब केँ दुइ अलग-अलग समूह मे वर्गीकृत कयल गेल अछि – जेकरा “पुरुष” कहल जाइत छैक, कियैक तँ ओ पुरुष केर उपाधि सब थिक ।
अविनाशी: भगवान केर माया-शक्ति, ओ बीज जाहि सँ नाशवान जीव सब उत्पन्न होइत अछि ।
कूटस्थ: ओ जे स्वयं केँ अलग-अलग तरह केर भ्रम आ छल (बदलल रूप सब) मे देखबैत छथि । हिनका अविनाशी कहल जाइत छन्हि, कियैक तँ संसारक बीज कहियो नहि खत्म होयवला होइछ – से एहि अर्थ मे जे ई ब्रह्म-ज्ञान केर अभाव (अनुपस्थिति) मे सेहो खत्म नहि होइत अछि ।
आर फेर एहि श्लोक मे क्षर (नाशवान) आ अक्षर (अविनाशी) रूप मे आत्मा आ परमात्माक सन्दर्भ स्पष्ट कयलनि अछि । हमरा सब मे कोनो तरहें दुविधा शेष नहि रहय, मूढ़चित्त नहि बनल रही, तेँ भगवान कृष्ण ई सारा सुलझल आ रोचक दृष्टान्त एवं उदाहरणक संग ज्ञानक बात बता रहल छथि । मनन करी आ तदनुसार अपन जीवनचर्या मे साकांक्ष भ’ परमात्माक चिन्तन आत्माक चिन्तन सँ आरम्भ करैत सदिखन करैत रही ।
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ॥
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥१५-१९॥
हे भरतवंशी, जे भ्रम सँ मुक्त भ’ कय हम परमात्मा केँ एहि प्रकार सँ जनैत अछि, ओ सब किछु जानिकय, पूरा मन सँ हमर पूजा करैत अछि ।
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ॥
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥१५-२०॥
एहि प्रकारे, हे निष्पाप अर्जुन ! ई सबसँ गहींर शिक्षा हम देलहुँ अछि । एकरा जनला सँ लोक केँ सर्वोत्तम बुद्धि भेटैत छैक आर हे भरतवंशी, ओ (बुद्धिमान) अपन सबटा कर्तव्य केँ (निश्चिते टा) पूरा कय लेत ।
सर्वोत्तम बुद्धि: जे ब्रह्म केँ जानि पबैत अछि ।
सबटा कर्तव्य केँ (निश्चिते टा) पूरा कय लेत: जिनगी मे जेहो किछु काज करबाक छैक, ओ सबटा काज तखन भ’ जाइत छैक, जखन ब्रह्म केँ बुझि लेल जाइत छैक । (ब्रह्म केँ आत्मसात कय लेल जाइछ ।)
स्पष्टे अछि जे आत्मा आ परमात्माक सुस्पष्ट व्याख्या उपरान्त कोनो ज्ञानी जीव सदिखन भगवानहि केर भजन करैत रहत, शुद्ध-स्वच्छ आ स्वस्थ जीवन जिबैत रहत । आर निश्चय एहि ज्ञान सँ उपर दोसर कोनो ज्ञान भ’ए नहि सकैछ । अस्तु ! आत्मचिन्तनक संसार मे ई सारा स्वाध्याय हमरा-अहाँ लेल सदिखन शुभ हो, हम तेकर शुभकामना दय रहल छी ।
हरिः हरः!!
