आध्यात्म-दर्शन
– प्रवीण नारायण चौधरी
शबरीमायक नवधा भक्ति
शबरीमायक कथा रामभक्त केँ त अवश्य बुझल होयत । परसू विराटनगर मे आयोजित एक सत्संग कार्यक्रम मे एहि पर आधारित एकटा चर्चा मे भाग लेला उपरान्त एक बेर फेर अपन पाठक-अनुगामी सभक संग शबरीमाय केर चर्चा आ हुनका मे नवधा भक्ति होयबाक श्री रामचन्द्रजीक वचन मोन पाड़य चाहब ।
शबरीमायक छोट परिचय
ओ भील समुदायक बेटी रहथि । बाल्यकाल मे विवाहक समय सामुदायिक रीति-रिबाज मे पशुबलि परम्परा सँ दुःखी भ’ ओ विरक्त भ’ गेलिह आ तदोपरान्त घर छोड़िकय वन मे जाय मतंग ऋषिक आश्रम मे सेविका बनि रहली । भगवानक कार्य कयनिहारक सेवा करब – बस यैह एकमात्र निष्ठा पर केंद्रित रहिकय सेवादान करैत रहली । आर बहुते बात सब अछि हिनक कथा मे – परञ्च एखन एतबी बुझू जे ओ कोनो हाल मे अपन कर्तव्य सँ, कतेको रास निरादर, कपट, छल आदिक सामना करितो – अपन सेवा मार्ग सँ किन्नहुं नहि डिगली । गुरु मतंग हुनकर सेवाभावना आ सरल बुद्धि सँ जीवन जिबैत देखि बहुत प्रभावित भेलाह आ कहि देलखिन्ह जे अहाँ केँ भगवान् स्वयं भेंट देताह । आ से भेलैक । भगवान राम भाइ लक्ष्मण सहित हुनका भेंट देलथिन्ह ।
( विस्तार सँ पढ़बाक हो त – रामचरितमानस मोती मे हिनकर प्रसंग एहि लिंक पर पढ़ीः https://maithilijindabaad.com/?p=20397 )
भगवान संग भेंट आ नवधा भक्तिक उपदेश-प्रसंग
रामचन्द्रजी सीताक खोज करैत वन-वन मे घुमैत समय शबरीक आश्रम पर पहुँचि शोध-खोज कयलनि । ताहि क्रम मे शबरी दुनू भाइ केर दर्शन पाबि कृत्-कृत्य होइत अपन विनम्रताक परिचय देलनि । भगवान राम एतबा प्रसन्न भेलाह जे शबरी सँ हुनका मे रहल नवधा भक्तिक पूर्ण वृत्तान्त वर्णन कयलनि । शबरी कहलथिन जे हम अधमहुं सँ अधम जाति केर एकटा मन्दबुद्धि स्त्री छी । हम अहाँक स्तुति केना करू ? ताहि पर भगवान राम जे जबाब देने छथिन से तुलसीदास केर शब्दभावक भावानुवाद देखू –
“हे भामिनि! हमर बात सुनू! हम त केवल एक भक्ति मात्र केर सम्बन्ध मानैत छी । जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाइ, धन, बल, कुटुम्ब, गुण व चतुरता – एहि सब केँ भेलोपर भक्ति सँ रहित मनुष्य केहेन लगैत अछि, जेना जलहीन बादल (शोभाहीन) देखाइत हो ।
हम अहाँ सँ अपन नवधा भक्ति कहैत छी । अहाँ सावधान भ’कय सुनू आ मोन मे धारण करू ।
पहिल भक्ति अछि सन्त लोकनिक संग ।
दोसर भक्ति अछि हमर कथा-प्रसंग मे प्रेम ।
तेसर भक्ति अछि अभिमानरहित भ’ गुरुक चरणकमलक सेवा ।
चारिम भक्ति अछि कपट छोड़िकय हमर गुणसमूह केर गान ।
पाँचम भक्ति अछि (राम) मंत्र केर जाप आर ताहि मे दृढ़ विश्वास – जे वेद मे प्रसिद्ध अछि ।
छठम भक्ति अछि इन्द्रिय सभक निग्रह, शील (नीक स्वभाव आ चरित्र), बहुतो काज सब सँ वैराग्य आ निरन्तर सन्त पुरुष लोकनिक धर्म (आचरण) मे लागल रहब ।
सातम भक्ति अछि जगत भरि केँ समभाव सँ भगवान (राम) मे ओतप्रोत (राममय) देखब आर सन्त लोकनि केँ ताहू सँ बेसी उपर मानब ।
आठम भक्ति अछि जे किछु भेटि जाय, ताहि मे सन्तोष करब आ सपनहुँ मे दोसरक दोष नहि देखब ।
नवम भक्ति अछि सरलता आर सभक संग कपटरहित बर्ताव करब, हृदय मे भगवान (राम) केर भरोसा राखब आर कोनो अबस्था मे हर्ष आ दैन्य (विषाद) नहि होयब ।
एहि नौ गोट मे सँ जेकरा एकहु टा होइत अछि, से स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कियो हो – हे भामिनि ! हमरा वैह अत्यन्त प्रिय अछि । फेर अहाँ मे सब प्रकारक भक्ति दृढ़ अछि ।
अतएव जे गति योगीजन लेल पर्यन्त दुर्लभ अछि, वैह आइ अहाँ लेल सुलभ भ’ गेल अछि । हमर दर्शन केर परम अनुपम फल यैह अछि जे जीव अपन सहज स्वरूप केँ प्राप्त भ’ जाइत अछि ।
हे भामिनि ! आब यदि अहाँ गजगामिनी जानकी जीक किछु खबैर जनैत छी त बताउ ।”
– भगवान राम
उपरोक्त रामवचन सँ अमृतोपदेश केँ हम सब प्राप्त करी । सभक जीवन सफल आ सुखद हो । आत्मनिरीक्षण करब जे हमर भक्ति कोन तरहक अछि । विचार करब जे शबरी जेहेन भोली स्त्री केना एतेक पैघ फल (परमपद) – भगवद्दर्शन प्राप्त कयलनि ।
एक लाइन आर कहब –
शबरी केँ गुरु मतंग केर आश्रम सँ बाहर निकालबाक कुचक्र रचनिहार हजारों कपटी-छली आ पोंगापन्थी कथित महात्मा आ उपासक-साधक सब केँ ई फल नहि प्राप्त भेलनि । ई कथा कोनो आर दिन कहब । मतंग ऋषि बहुत व्यथित भेल रहथि, धरि शबरीक सेवा सँ ओ एतबा प्रसन्न रहथि जे अपन अन्तिम वाक्य मे हुनका रामदर्शनक आशीर्वाद दय देने रहथि ।
निष्कर्षः
गुरुक महत्व, सन्त-महात्माक महत्व, मंत्रक महत्व, आचार-विचार आ शील-अनुशासनक महत्व, इन्द्रिय आ मन पर नियंत्रणक महत्व, इत्यादि अनेकों बात एहि कथोपदेश मे आयल अछि । से सब किछु हम सब नीक सँ मनन करी ।
हरिः हरः!!
