गीताक तेरहम अध्यायक प्रवीण व्याख्या
– प्रवीण नारायण चौधरी
ॐ श्री परमात्मने नमः !! प्रवीण व्याख्या लेखनक तेरहम पड़ाव पर पहुँचि गेल छी । बारहम अध्याय मे भगवान कृष्ण द्वारा वर्णित सगुण ओ निर्गुण भगवद्भक्तिक व्याख्या उपरान्त तेरहम अध्यायक आरम्भ २०२६ ईस्वीक दशहरा पाबनि आ तदोपरान्त नित्य-नियमित बाबाधामक पैदल कामर यात्रा उपरान्त लगभग १५ दिन केर अन्तरालोपरान्त भ’ रहल अछि । तेँ फेर पूर्व अध्यायक सिलसिलेवार विश्लेषण पुनर्स्मरण करबाक पहिल अनुरोध करैत छी । आउ, देखी तेरहम अध्याय मे पुनः अर्जुन कि जिज्ञासा करैत छथि आ कृष्ण कोना समाधान करैत छथि ।
अर्जुन उवाच ।
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ॥
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥१३-०॥*
अर्जुन कहलनि:
प्रकृति आर पुरुष, क्षेत्र आर क्षेत्रक ज्ञाता, ज्ञान, जे जनबाक चाही – से सब बात, हे केशव, हम जानय चाहैत छी ।
*ई श्लोक कतेको एडिशन मे हंटा देला गेल छैक ।
जेना कहल गेल अछि, ई श्लोक कतेको गीता सँ हंटा देल गेल अछि मुदा स्वामी स्वरूपानन्द जी द्वारा अनुवादित गीता जेकर आधार पर हम स्वाध्याय विगत २७ वर्ष सँ निरन्तरता मे रखैत आबि रहल छी ताहि मे एकरा समेटल गेल अछि । आर एहि अध्यायक आरम्भ श्री कृष्ण द्वारा क्षेत्र आ क्षेत्रज्ञक वर्णन सँ होयबा सँ पहिने अर्जुन द्वारा एहि सन्दर्भक जिज्ञासा रखबाक तथ्य प्राप्त होइत अछि । सगुण उपासना – भगवानक विभिन्न विभूतिक समेकित रूप मे मानसपटल मे राखिकय परमात्माक ध्यान करब, हुनकहि प्रति समर्पित समस्त कर्म करब, कर्मक सब फल हुनकहि वास्ते त्याग करबाक अभ्यास करब आदि भक्तिक विभिन्न तौर-तरीकाक वर्णन उपरान्त हम मानव केँ मानवीय संरचना मे परमात्माक परिकल्पना क्षेत्र ओ क्षेत्रज्ञक रूप मे वर्णन होमय जा रहल अछि । देखू भगवान कृष्णक उत्तर –
श्रीभगवानुवाच ।
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ॥
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥१३-१॥
भगवान कहलनि:
हे कुंतीपुत्र, एहि शरीर केँ क्षेत्र कहैत छैक, आर जे ई जनैत अछि, ओकरा (क्षेत्र आ क्षेत्रज्ञ केँ) जानयवला लोक क्षेत्रज्ञ कहैत छथि ।
क्षेत्र: मतलब, खेत: शरीर केँ एना एहि लेल कहल जाइत छैक कियैक तँ कर्म सभक फल खेतहि जेकाँ अहु मे भेटैत छैक ।
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥१३-२॥
हे भरतवंशी, अहाँ हमरहु सब क्षेत्र मे क्षेत्रज्ञे जानू । क्षेत्र आ क्षेत्रज्ञ केर ज्ञानहि टा हमरा द्वारा ज्ञान मानल गेल अछि ।
हम मानव जाहि शरीर मे निवास कय रहल छी तेकरा क्षेत्र (खेत) मानल गेल अछि । आर एहि बातक ज्ञान राखयवला केँ क्षेत्रज्ञ – खेतक वास्तविक मालिक कहल गेल अछि । तहिना एहि सम्पूर्ण क्षेत्रक एकमात्र मालिक भगवान कृष्ण – अर्थात् परमात्मा स्वयं थिकाह सेहो स्पष्ट कयल गेल अछि । एकटा शरीर मे ‘आत्मा’ क्षेत्रज्ञ भेल, आर सम्पूर्ण सृष्टिक समस्त सृजनरूपी क्षेत्रक क्षेत्रज्ञ भगवान स्वयं थिकाह से बुझायल गेल अछि । हमरा बुझने आत्मसाक्षात्कारक एकटा सशक्त दर्शन एहि अध्याय मे अभरि रहल अछि । क्षेत्र आ क्षेत्रज्ञक आधार पर आत्मा-परमात्माक वर्णन सँ सेहो हम-अहाँ अपन आ भगवानक बीच अनन्य सम्बन्ध केँ नीक सँ बुझि सकब से अभीष्ट अछि । आगाँक श्लोक मे एहि दर्शनक विस्तार पर गौर करूः
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् ॥
स च यो यत्प्रभाव तत्समासेन मे शृणु ॥१३-३॥
क्षेत्र कि थिक, ओकर गुण कि थिक, ओकर रूप केर परिवर्तन कि थिक, कोन कारण सँ कि प्रभाव उत्पन्न होइत छैक, आर ओ के थिक तथा ओकर शक्ति कि सब छैक, से सबटा हमरा सँ संछेप मे सुनू ।
से सबटा: एहि सब खास पक्ष (विन्दु) मे क्षेत्र आर क्षेत्रज्ञ केर असली स्वभाव (प्रकृति) ।
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ॥
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥१३-४॥
(एहि सत्य केँ) ऋषि लोकनि कतेको प्रकार सँ, अलग-अलग मंत्र मे, ब्रह्म सँ जुड़ल भाग मे, तर्क सँ भरल आ विश्वास दियाबयवला भाग मे गओलनि अछि ।
हमर नोट: ई चैप्टर हमरा सब केँ ई बुझय लेल एकटा बहुते आसान फिलॉसफी समझाबैत अछि जे हम सब के छी आ परमात्मा किनका कहैत छी । सबटा श्लोक पर खास ध्यान राखू ।
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ॥
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥१३-५॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ॥
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥१३-६॥
महान तत्व, अहंकार, बुद्धि, संगहि अव्यक्त (मूल प्रकृति), दस इंद्रिय आर एकटा (मन), आर इंद्रिय केर पांच विषय; इच्छा, घृणा, सुख, दुःख, सङ्घाता (समग्रता), बुद्धि, धैर्य – एहि तरहें क्षेत्र केँ ओकर बदलैत रूप केर संग संक्षेप मे कहल गेल अछि ।
सांख्य (दर्शन) केर ज्ञाता लोकनि पांचम श्लोक मे कहल गेल तत्व सब केँ चौबीस तत्व या सिद्धांत कहैत छथि ।
महान तत्व: महाभूत – समस्त विकार मे व्याप्त, यानी पदार्थ केर परिवर्तित रूप मे ।
कुल योग: सङ्घाता – शरीर आर इंद्रिय सभक सम्मिलन सँ प्राप्त योगफल । (सब किछु संयुक्त रूप मे – एग्रीगेट) ।
इच्छा तथा अन्य गुण जेकरा वैशेषिक (दर्शन) केर ज्ञाता लोकनि आत्माक भितरिया गुण कहैत छथि, तेकरा छठम श्लोक मे केवल क्षेत्र केर गुण कहल गेल अछि, नहि कि क्षेत्रज्ञ केर । एतय कहल गेल इच्छा तथा अन्य गुण, अंतःकर्ण या अंदरूनी ज्ञानेन्द्रिय केर समस्त गुण सब केँ देखबैत अछि – खाली मानसिक अबस्था सभक रूप मे । ताहि मे सँ हरेक चीज जनबा योग्य हेबाक कारण क्षेत्र थिक ।
क्षेत्र, जेकर अलग-अलग रूप सब केँ समग्र रूप सँ पहिलुक श्लोक मे “ई शरीर” कहल गेल छैक, एतय ओकर सबटा अलग-अलग रूप पर बात कयल गेल अछि, “महान तत्व” सँ लय केँ “धैर्य” तक मे ।
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ॥
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥१३-७॥
विनम्रता, सादापन, केकरो चोट नहि पहुँचेनाय (अहिंसा), सहनशीलता, ईमानदारिता, गुरुक सेवा, पवित्रता, स्थिरता, स्वयं पर नियंत्रण;
गुरु (आचार्य): ओ छथि जे मोक्ष पेबाक तरीका सिखबैत छथि ।
पवित्रता: बाहरी आ अन्दरूनी । पहिल (बाहरी) पवित्रता मे पानि आदि सँ शरीरक गन्दगी केँ धोयब शामिल अछि, आर दोसर मे – मन केर पवित्रता – एहि मे इंद्रिय सभक विषय (सम्बन्धित) चीज सब मे खराबी केँ बुझनाय, आसक्ति व आन-आन इच्छा सभक गन्दगी केँ हंटेनाय शामिल अछि ।
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ॥
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥१३-८॥
इंद्रिय सभक चीज केर त्याग, आर अहंकार केर नहि होयब; जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, बीमारी आ दर्द केर खराबी सब पर विचार करब (सोचब);
इंद्रिय सभक चीज: जेना देखल या बिनु देखल सुख दयवाली आवाज, स्पर्श आदि ।
दर्द: चाहे आध्यात्मिक हो, यानी स्वयं उत्पन्न होयवला हो; या आधिभौतिक हो, यानि बाहरी चीज सब सँ उत्पन्न होयवला हो, या आधिदैविक हो, यानि अलौकिक शक्ति सब सँ उत्पन्न होयवला हो ।
जन्म, मृत्यु… दर्द केर खराबी सब पर विचार करब (सोचब): या एहि वाक्यांशक अर्थ ई निकालल जा सकैत अछि – जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा आर बीमारी केर खराबी व दुःखादि पर विचार कयनाय । जन्म आदि सबटा दुःख छी, एहि लेल नहि जे ओ स्वयं मे दुःख छी, बल्कि एहि लेल जे ओ दुःख उत्पन्न करैत अछि । एना सोचला सँ इंद्रिय सँ जुड़ल सुख सभक प्रति विरक्ति (वैराग्य) उत्पन्न होइत अछि, तथा इंद्रिय सब ज्ञान प्राप्तिक लेल अन्तरतम आत्मा दिश मुड़ि जाइत अछि (रुख करैत अछि) ।
नोट: कृपया एहि श्लोक सभक महत्व केँ बहुत ध्यान सँ बुझू आर ताहि अनुसार अपन जीवन जीबू ।
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ॥
नित्य च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥१३-९॥
अनासक्ति, बेटा, पत्नी, घर व बाकी चीज सब सँ स्वयं केँ नहि जोड़नाय (चिन्हनाय), आर नीक व बेजा चीज सभक रहलोपर सदिखन एक जेकाँ सोचनाय;
स्वयं केँ चिन्हनाय (आत्म-पहिचान, आत्मज्ञान): जेना कोनो लोक जेकरा संग जुड़ल अछि, तेकर खुशी या दुःखी भेलोपर स्वयं केँ खुश या दुःखी अनुभव करैत अछि, आर जे अपना कोनो खास लोकक जिन्दा आ मरि गेलापर स्वयं केँ जिन्दा या मृत भेल अनुभव करैत अछि ।
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ॥
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥१३-१०॥
अनन्य योग (अपरिग्रह – अलग नहि होयवला भाव) द्वारा हमरा प्रति अविचल (अव्यभिचारिणी) भक्ति, पृथक स्थान सभक आश्रय, मानव समाज केर प्रति अरुचि;
पृथक स्थान सभक आश्रय: मन केर समता (समत्व भाव) वास्ते अनुकूल, जाहि सँ अपना आप (स्वयं केर आत्मा) पर निर्बाध ध्यान, आदि संभव भ’ सकय । (एकान्त आ शान्त – निर्जन क्षेत्र आदि ।)
मानव समाज: अज्ञानी आर अनुशासनहीन लोक केर, शुद्ध आर पवित्र लोक केर नहि, कियैक तँ बादवला (यानि शुद्ध आ पवित्र लोक सभक) संग संगति ज्ञान दिश लय जाइत अछि ।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ॥
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥१३-११॥
आध्यात्मिक ज्ञान पर लगातार ध्यान देनाय, सत्य ज्ञान केर लक्ष्य केँ बुझनाय; एकरा ज्ञान कहल गेल अछि, आर जे एकर विपरीत अछि ओ अज्ञान थिक ।
“विनम्रता” सँ लय केँ “सत्य ज्ञान केर लक्ष्य केँ बुझनाय” धरिक ई समस्त गुण केँ ज्ञान कहल गेल अछि, कियैक तँ यैह ज्ञान तक पहुँचबाक माध्यम थिक ।
ई समस्त विवरण क्षेत्र सँ सम्बन्धित अछि । जेना एकटा खेतक माटि, उर्वरता, आर्द्रता आदिक गुण अनुसार खेत मे फसल उपजैत अछि, ठीक तहिना हम मानवक शरीर मे सेहो अनेकों गुण-धर्म अनुसार कयल गेल कर्म सँ फलरूपी फसल उपजैत अछि । मानवशरीररूपी खेतक प्रकृति केँ उपरोक्त समस्त श्लोक मे वर्णन कयल गेल अछि । आगाँक श्लोक मे क्षेत्रज्ञ पर वर्णित गम्भीर आ गूढ़ दर्शन केँ आत्मसात करू –
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ॥
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥१३-१२॥
हम ओकर वर्णन करब जेकरा जानबाक रहैत अछि, जेकरा जनला सँ अमरता आ अनादि परम ब्रह्म प्राप्त होइत छथि । जिनका नहि त सत् आ न असत् कहल जाइत छन्हि ।
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ॥
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥१३-१३॥
हरेक जगह हाथ आ पैर, हरेक जगह आँखि, सिर आ मुंह, ब्रह्मांड मे हर जगह कान – ओ सब मे व्याप्त छथि ।
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ॥
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥१३-१४॥
समस्त इंद्रिय केर कार्य सँ झलकयवला (अभरयवला, चमकयवला), तथापि इंद्रिय बिना; निरपेक्ष, तथापि सब केँ सम्हारनिहार (पालन-पोषण कयनिहार); गुणरहित, तथापि गुणक अनुभव करयवला (ओ ब्रह्म छथि) ।
बहिरन्तश्च भूतानामचर चरमेव च ॥
सूक्षमत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥१३-१५॥
(समस्त) प्राणीक संग आर ओकर भीतर; अचल (गतिहीन) आ चल (गतिशील) सेहो; अपन सूक्ष्मताक कारण समझ सँ दूर; ओ दूरो छथि आ लगो छथि ।
समझ सँ दूर: अज्ञानी लोक लेल, हालाँकि अपने आप मे जानय योग्य छथि ।
दूर: जखन अज्ञात छथि ।
लग: ज्ञानी लोक लेल, कियैक तँ ई हुनकर अपनहि स्वरूप छथि ।
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ॥
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥१३-१६॥
अविभाज्य, तैयो प्राणी सब मे बंटल छथि; हिनका प्राणी (जीव) सभक पालन-पोषण कयनिहारक रूप मे जानल जाइत छन्हि; आर ओकरा सब केँ भक्षण करयवला (खा जायवला, ग्रास बनबयवला) तथा संगहि-संग उत्पन्न करयवला रूप मे सेहो जानल जाइत छन्हि ।
भक्षण: प्रलय केर समय (सब प्राणी केँ अपन ग्रास बनबयवला, भक्षण करयवला) ।
उत्पन्न: उत्पत्ति या ब्रह्मांड केर उत्पत्तिक समय (सब प्राणी सभक उत्पन्न करयवला) ।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ॥
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य धिष्ठितम् ॥१३-१७॥
प्रकाशहु केर प्रकाश, जिनका अन्धकार सँ उपर कहल जाइत छन्हि; ज्ञान, आ जानय योग्य एकमात्र चीज, समस्त ज्ञान केर अन्तिम लक्ष्य, जे सभक हृदय मे रहैत छथि ।
प्रकाशहु केर प्रकाश: सम्पूर्ण प्रकाश दयवाली चीज, जेना सूरज आदि, आर बुद्धि आदि केँ प्रकाशित करयवला (प्रकाशहु केर प्रकाश) । असल मे, ई बादवला (प्रकाशपुंज) सब तखनहि प्रकाशित होइछ जखन स्वयं केर चेतना (ब्रह्मचेतनाक) प्रकाश सँ प्रकाशित होइत अछि ।
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ॥
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥१३-१८॥
एहि प्रकार सँ क्षेत्र, ज्ञान आर जे जनबा योग्य (ज्ञेय) छथि, से सबटा संक्षेप मे कहल गेल अछि । ई सबटा बुझिकय (जानिकय), हमर भक्त हमर स्थितिक योग्य भ’ जाइत छथि ।
जेना कि भगवान स्वयं कहलनि, उपर वर्णित सम्पूर्ण विवरण क्षेत्र आ क्षेत्रज्ञ सँ जुड़ल अछि । आगू देखी –
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ॥
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥१३-१९॥
ई जानि लिय’ जे प्रकृति आर पुरुष दुनू अनादि छथि; आर इहो जानि लिय’ जे समस्त परिवर्तन तथा गुण प्रकृति मात्र सँ उत्पन्न होइत अछि ।
परिवर्तन: विकार – बुद्धि सँ लयकेँ नीचाँ शरीर धरिक (विभिन्न रूप परिवर्तन सभक सन्दर्भ) ।
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ॥
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥१३-२०॥
शरीर आर इंद्रिय सभक निर्माण (बनय) मे प्रकृति केँ कारण कहल गेल अछि; सुख आर दुःख केर अनुभव मे पुरुष केँ करण कहल गेल अछि ।
इंद्रिय: किछो बुझबाक लेल पांच इंद्रिय, पांच कर्म करयवाली इंद्रिय, मन, बुद्धि आ अहंकार ।
पुरुष: एतय जीव (आत्मा) केर अर्थ मे अछि ।
कार्य: प्रभाव, भौतिक शरीर ।
करण: इंद्रिय । किछु लोक लोक कारण पढ़ैत छथि, आर “कार्य व करण” केँ “प्रभाव आर कारण” केर रूप मे बुझबैत छथि ।
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ॥
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥१३-२१॥
प्रकृति मे बैसल पुरुष, प्रकृति सँ उत्पन्न भेल गुण सब केँ अनुभव करैत छथि; नीक आ खराब गर्भ मे हुनकर जन्म केर कारण गुण सब सँ हुनक जुड़ाव छन्हि ।
मे बैसल: स्वयं केँ जेकरा संग चिन्हैत छथि ।
गुण: स्वयं केँ सुख, दुःख आ भ्रम केर रूप मे व्यक्त करैत अछि ।
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ॥
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥१३-२२॥
आर एहि शरीर मे जे परम पुरुष छथि, हुनका देखयवला, स्वीकृति दयवला, सहारा दयवला, अनुभव करयवला, महान भगवान आर सबसँ ऊँच ‘स्व’ (परमात्मा) सेहो कहल जाइत छन्हि ।
देखयवला, स्वीकृति दयवला: ओ स्वयं शरीर केर अंग सब मे, मन आ बुद्धि केर काज सब मे भाग नहि लैत छथि, ओहि सँ बिल्कुल अलग हेबाक बादो, ओहि सब मे लागल बुझाइत छथि । आर देखयवला हेबाक नाते, ओ शरीर मे देखायवला प्रकृति केर काज सभक रास्ता मे कखनहुँ नहि अबैत छथि । वास्तव मे, जीवनक काज सब मे देखायवला सम्पूर्ण चेतना या बुद्धि, बस ओहि सर्वव्यापी, निरपेक्ष आ सम्पूर्ण बुद्धि – परमात्मे केर प्रतिविम्ब (झलक) थिक ।
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ॥
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥१३-२३॥
जे एहि तरहें पुरुष आर प्रकृति केर गुण सभक संग जनैत अछि, चाहे ओकर जीवन केहनो हो, ओ दोबारा जन्म नहि लैत अछि ।
चाहे ओकर जीवन केहनो हो, आदि: चाहे ओ तय अथवा मना कयल गेल कर्म सब मे लागल हो, ओ दोबारा जन्म नहि लैछ । कियैक तँ, सत्य केँ जानयवलाक कर्म, यानि दोबारा जन्म लयवला बीज, ज्ञान केर अग्नि सँ जरि जाइत छैक, आर तेँ ओ जन्म दयवला प्रभावी कारण नहि बनि सकैछ । ओकर मामिला मे ओ सिर्फ कर्मक झलक छी; उदाहरण लेल, एकटा जरि गेल कपड़ा, कपड़ाक काज नहि कय सकैत अछि ।
क्षेत्र आ क्षेत्रज्ञक परस्पर सम्बन्ध आ संयुक्त कार्यविधि केँ प्रकृति आ पुरुष केर विम्ब पर सेहो वर्णन कयलनि अछि भगवान कृष्ण । ई दुनू अनादि छथि । हिनकहि लोकनि द्वारा सारा सृष्टि निर्मित अछि, स्थित अछि आ यैह सनातन थिक । एकर आदि ओ अन्तक परिकल्पना व्यर्थ होयत । हम सब मनन करी आ एहि तरहें सेहो अपन वास्तविकता केँ बुझी । हमरा हिसाब सँ एहि अध्यायक मूल अभीष्ट यैह थिक । आत्मसाक्षात्कार मे एहि सिद्धान्तक सहारा लय सकैत छी । आगाँक श्लोक मे ई आर स्पष्ट होयत, देखूः
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ॥
अन्ये सांख्ये योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥१३-२४॥
किछु लोक ध्यान सँ, शुद्ध हृदय सँ अपन बुद्धि मे आत्मा केँ देखैत अछि, किछु ज्ञान केर मार्ग सँ, आर किछु लोक फेर कर्म-योग सँ (देखैत अछि) ।
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ॥
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥१३-२५॥
आन लोक सब एना नहियो जानैत, कियो आर लोक (दोसर लोक) सँ सुनल गेल बात मुताबिक पूजा (योग-साधना) करैत छथि । ई सब जेहो किछु सुनने रहैत छथि, तेकरे सर्वोच्च आश्रय (शरण) मानिकय मृत्युक (भवसागर) केर पार उतरि जाइत छथि ।
एना नहियो जानैत: उपर कहल गेल कतेको तरीका सब मे कोनो एकहु टा सँ स्वयं (अपन आत्मा) केँ नहि जानि पेनाय ।
कियो आर (दोसर लोक) सँ: आचार्य या आध्यात्मिक गुरु लोकनि सँ सुनिकय ।
मानिकयः श्रद्धाक संग अनुसरण कयकेँ ।
जेहो किछु ओ सुनने छथि: यानि, ओ पूर्णरूप सँ दोसरक निर्देश सब पर निर्भर रहैत छथि ।
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥१३-२६॥
हे भरतर्षभ, जेहो जीव उत्पन्न भेल अछि, चाहे ओ चल हो या अचल हो, ओकरा क्षेत्र आर क्षेत्रज्ञ केर मिलन मात्र सँ (उत्पन्न भेल) जानि लियह ।
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञक मिलन: क्षेत्र आर क्षेत्रज्ञ, वस्तु आ विषय केर मिलन, आपसी अध्यास (भ्रम) जेकाँ होइत छैक, जाहि मे ओकर असली रूप मे अन्तर नहि हेबाक कारण ओ आर ओकर गुण एक-दोसराक संग मिश्रित (मिझरा) जाइत छैक । ई गलत ज्ञान (मिथ्या ज्ञान, अध्यास) तखन खत्म भ’ जाइत छैक जखन कियो क्षेत्र केँ क्षेत्रज्ञ सँ अलग कय पबैत अछि ।
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ॥
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥१३-२७॥
वैह देखैत अछि जे परमप्रभु केँ देखैत अछि, जे समस्त प्राणी सब मे समान रूप सँ विद्यमान छथि, मरइयोवला मे अमर छथि ।
समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ॥
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥१३-२८॥
कियैक तँ ओ भगवान केँ हरेक जगह समान रूप सँ देखैत अछि, ताहि सँ ओ स्वयं (आत्मा) सँ स्वयं (परमात्मा) केँ नोकसानी नहि पहुँचाबैछ, आर एहि तरहें सबसँ ऊँच लक्ष्य (परमब्रह्म – परमपिता परमेश्वर) धरि पहुँचि जाइत अछि ।
ओ स्वयं सँ…. केँ नोकसानी नहि पहुँचाबैत अछि: जेना अन्जान आदमी या तँ दोसर लोक मे स्वयं (आत्मा) केँ नजरअंदाज कयकेँ (अविद्या या अज्ञानता), या गैर-आत्मा (भौतिक शरीर, आदि) केँ आत्मा मानिकय (मिथ्या-ज्ञान या झूठक ज्ञान) – एहि दुइ गोट पर्दा सँ आत्मा (स्वयं) केर सत्य रूप केँ नुका दैत अछि ।
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ॥
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥१३-२९॥
वैह देखैत अछि, जे ई देखैछ जे सबटा काज मात्र प्रकृति टा करैत अछि आर परमात्मा बिना काज केँ रहैत छथि ।
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ॥
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥१३-३०॥
जखन ओ एक (परमात्मा) मे निहित समस्त प्राणीक अलग-अलग अस्तित्व केँ देखैत अछि, आर असगर वैह (एक) सँ समस्त प्राणीक विस्तार भेल देखैत अछि, फेर ओ ब्रह्म बनि जाइत अछि ।
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ॥
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥१३-३१॥
हे कुंतीक पुत्र, ई परमात्मा, जे बिना आरम्भ आर गुण सभक छथि, शरीर मे भेलाक बादो नहि तँ काज करैत छथि आ नहिये हुनका उपर असर (प्रभाव) पड़ैत छन्हि ।
आरम्भ होयब: जिनकर कोनो कारण नहि अछि ।
नहि तँ काज करैत छथि, नहिये हुनका पर असर (प्रभाव) पड़ैत छन्हि: चूँकि आत्मा कर्ता नहि छथि, ताहि द्वारे हुनका कर्मक फल सँ कोनो फर्क नहि पड़ैत छन्हि ।
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ॥
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥१३-३२॥
जेना हरेक जगह मौजूद आकाश अपन सूक्ष्मताक कारण दूषित नहि होइछ, तेनाही शरीर मे हर जगह मौजूद आत्मा सेहो दूषित नहि होइछ ।
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ॥
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥१३-३३॥
जेना एक्के टा सूर्य एहि सम्पूर्ण जगत केँ प्रकाशित करैत अछि, तहिना ओ जे एहि क्षेत्र मे रहैत छथि, हे भरत केर वंशज, पूरे क्षेत्र केँ प्रकाशित करैत छथि ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ॥
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यन्ति ते परम् ॥१३-३४॥
जे लोक एहि तरहें ज्ञानक आँखि सँ क्षेत्र आ क्षेत्रज्ञक बीच केर अन्तर बुझि लैत अछि, आर जीव सभक प्रकृति सँ मुक्ति सेहो पाबि लैत अछि, ओ परमात्मा लग जाइत अछि ।
जीवक प्रकृति: अविद्याक कारण जीव केर भ्रम (मोह) या भौतिक स्वभाव ।
श्लोक २४ सँ ३४ धरिक वर्णन आत्मसाक्षात्कारक उपाय बतबैत परमात्मा आ आत्माक अनन्य रूप केँ सेहो वर्णन कय रहल अछि ।
हरिः हरः!!
