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गीताक चौदहम अध्यायक प्रवीण व्याख्या

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गीताक चौदहम अध्यायक प्रवीण व्याख्या

– प्रवीण नारायण चौधरी

पैछला अध्याय मे गीता ज्ञानोपदेशक विशद विश्लेषणात्मक अध्याय सब अभरि रहल बुझाइछ । जेना दसम अध्याय मे भगवान (परमात्मा) हम मानव समुदाय लेल भगवानक विभिन्न विभूतिक वर्णन छल, तहिना एगारहम अध्याय मे भगवानक विश्वरूप आ तेकर दर्शनोपरान्त गदगद अर्जुन द्वारा स्तुतिगान, पुनः बारहम अध्याय मे भक्ति-विज्ञानक विशद व्याख्या भेटल, तेरहम अध्याय मे मानव शरीर आ शरीरी केँ क्षेत्र ओ क्षेत्रज्ञक विम्बानुसार हमरा सब केँ ‘आत्मसाक्षात्कार’ करबाक सहज सूत्र भेटल । आर आब चौदहम अध्यायक आरम्भ होइछ, जे सीधे भगवान कृष्णक वचन सँ आरम्भ होइछ । देखू –

श्रीभगवानुवाच ।

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ॥
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमतो गताः ॥१४-१॥

भगवान कहलनि:

हम अहाँ केँ फेर सँ ओ परम ज्ञान कहब जे सब ज्ञान सँ उपर अछि, जे जानिकय समस्त मुनिगण एहि जीवनक बाद उच्च पूर्णता केँ प्राप्त कय चुकल छथि । 

एहि जीवनक बाद: शरीर केर एहि बंधन सँ मुक्त भेलाक बाद ।

आध्यात्मिकता नहि केवल एहि जीवनकाल केर बात करैत अछि, बल्कि पुनः वर्तमान जीवनोपरान्तक बात आ अनन्त-सनातन जीवन-सिद्धान्त मे हम आत्मारूप जीव केँ कि सब मनन करबाक चाही, कि सब ध्यानपूर्वक स्मरण रखबाक चाही – ताहि सभक बारे मे चर्चा करैत अछि । एक-एक तत्त्व, गुण आ धर्मक सन्दर्भ मे नीक सँ चिन्तन-मनन कय सकी, तेकरा भिन्न-भिन्न दृष्टि सँ फरिछायल गेलाक बादे मनक आतुरता शान्त होयब सम्भव अछि । हालांकि मनक आतुरता एकटा विचित्र सवाल थिक, एकरा कतबो बुझायल जाय, कम्मे होयत । परञ्च गीता जाहि तरहें ७०० श्लोक आ १८ टा अध्याय मे पूर्ण विश्लेषण कएने अछि, तेकरा अपूर्ण कहनाय साफ गलत होयत आ हम किन्नहुं एहेन दुस्साहस नहि कय सकैत छी । भगवान कृष्ण फेर सँ एकटा फराक दृष्टि अनुसार परम ज्ञान केर विश्लेषण समर्पित आ शरणागत भक्त अर्जुन सँ कहबाक बात कयलनि अछि एहि अध्यायक आरम्भ मे । जे ज्ञान जानिकय मुनिगण सब जीवनक बाद उच्च पूर्णता केँ प्राप्त कय चुकल छथि – ई एहि ज्ञानक खासियत अछि ।

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ॥
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥१४-२॥

जे लोक एहि ज्ञान मे स्वयं केँ समर्पित कयकेँ हमर स्वरूप केँ पाबि लैत छथि, ओ नहि तँ सृष्टिक समय जन्म लैत छथि आ नहिये प्रलय केर समय दिक्कत मे पड़ैत छथि । 

एहि परमज्ञानक माहात्म्य सेहो शुरुए मे भगवान कृष्ण कहि देलनि । एकर लाभक वर्णन कयलनि मुदा शर्त सेहो लगा देने छथि । “एहि ज्ञान मे स्वयं केँ समर्पित कयकेँ हमर स्वरूप केँ जे पाबि लैत छथि से सृष्टिक आरम्भ या अन्त मे पर्यन्त कोनो तरहें विचलित नहि होइत छथि, हुनका कोनो दिक्कत नहि होइत छन्हि ।” कारण तत्त्वक मर्म बुझि गेला सँ कोनो बातक अनिश्चितता नहि बचि जाइछ । लोक आश्वस्त रहैछ । हम सब एहि दुइ श्लोकक वर्णन सँ स्वयं केँ तैयार कय ली “परमज्ञान” प्राप्तिक लेल जे जीवनक बाद सँ लैत सृष्टिक आरम्भ ओ अन्त धरिक समय मे काज देत ।

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ॥
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥१४-३॥

हमर गर्भ (योनि) महान् प्रकृति (महद्ब्रह्म) थिक; ओहि मे हम बीज राखैत छी; एतहि सँ, हे भरत केर वंशज, समस्त प्राणी सभक जन्म भेल अछि ।

ब्रह्म: ई शब्द ब्रिम्ह सँ लेल गेल अछि, जेकर अर्थ अछि “विस्तार करब”, आर एतय एकर अर्थ अछि वृहत् (विशाल) बीज अथवा गर्भ (प्रकृति) जाहि सँ ब्रह्माण्ड विकसित या विस्तारित भेल अछि ।

हम बीज राखैत छी: हम अपन तेज (बुद्धिमत्ता) केर झलक (प्रतिबिंब) डालैत छी, आर संसेचन (गर्भाधान – गर्भ धारण) केर ई कार्य ब्रह्माण्डक विकास केर कारण थिक ।

सृष्टिक आरम्भ – प्रकृति मे पुरुषरूपी परमात्मा द्वारा बीजदान आ तदनुसार सृष्टिक रचना आ आरम्भ केर सूत्रक व्याख्या कयलनि अछि । परमपिता परमेश्वर यैह कारण कहाइत छथि भगवान ।

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ॥
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥१४-४॥

हे कुंतीपुत्र, समस्त गर्भ सब मे जेहो रूप सब उत्पन्न होइत अछि, महान प्रकृति ओकर गर्भ थिक, आर हम बीज दयवला पिता छी ।

गर्भक प्रकृति अनन्त अछि । ताहि गर्भ सब सँ भिन्न-भिन्न वस्तुक सृजन होइछ । विभिन्न गर्भानुरूप वीर्यप्रदाता पिताक रूप सेहो भिन्न-भिन्न अछि; परञ्च अन्तिम सत्य यैह टा अछि जे एहि स्थावर-जङ्गम ब्रह्माण्डक पिता एकमात्र परमात्मा थिकाह जे बीजप्रदाता छथि । प्रकृति सृष्टिक मातृस्वरूपा छथि । गर्भधारणक कार्य हुनका द्वारा होइछ । आब परमात्मा अनेकों आत्मारूप मे वीर्यदाता पिता भेलाह, तहिना परमात्माक प्रकृति मातृस्वरूपा गर्भधारण करयवाली सभक माता भेलिह । एहि तरहें माता-पिता आ स्वयं केर सम्बन्ध स्थापित करैत आगाँक श्लोक पर ध्यान देल जाउ ।

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ॥
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥१४-५॥

हे महाबाहु, प्रकृति सँ उत्पन्न भेल ई गुण, सत्व, रजस आर तमस, शरीर मे अविनाशी शरीरधारी (आत्मा) केँ बड़ा जोर (मजबूती) सँ बाँधैत अछि ।

ई गुण: प्रकृति केर मुख्य हिस्सा थिक आर सब चीजक आधार थिक; तेँ ई सब चीजक विरूद्ध चीज मे मौजूद गुण अथवा खूबी नहि कहल जा सकैत अछि ।

शरीरधारी: ओ जे शरीर मे एना रहैत अछि जेना ओहि सँ जुड़ल रहल हो । (अर्थात् वैह शरीर सँ ओकर पहिचान कयल जाइत हो ।)

जन्म दयवाली माता “प्रकृति” सँ “त्रिगुणात्मक तत्त्व” केर प्रवेश शरीरधारी अविनाशी आत्मा केँ बड़ा मजबूती सँ बान्हने रहैछ ।

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम ॥
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥१४-६॥

एहि मे सँ सत्त्व अपन निर्मलता, प्रकाशमानता तथा खराबी सँ मुक्त होयबाक कारण, हे पापरहित (अर्जुन), सुख केर आसक्ति सँ तथा ज्ञान केर आसक्ति सँ बाँधैत अछि । 

सुखक प्रति लगाव सँ बाँधैत अछि, आदि: “हम प्रसन्न (सुखी) छी”, “हम बुद्धिमान छी” केर आकार मे सुख आर ज्ञान केर चेतना सँ स्वयं केँ बाँधैत अछि, जे (सुख आ ज्ञान) समुचित ढंग सँ ‘क्षेत्र’ (शरीर) सँ सम्बन्धित अछि, लेकिन जे अविद्या केर माध्यम सँ स्वयं (आत्मा) सँ जुड़ल अछि जे (आत्मा) पूर्ण बुद्धिमान् एवं आनंदरूप होइछ ।

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ॥
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥१४-७॥

राजस केँ लगड़पन (रागात्मक) स्वभाव वला जानू, जे तृष्णा (प्यास) आ आसक्ति (लगाव) केँ उत्पन्न करयवला होइछ; हे कुन्तीपुत्र! हे देहधारी! ई कर्म केर प्राप्ति द्वारा शीघ्रहि बाँधि दैत अछि ।

ई बाँधि दैत अछि, इत्यादि: यद्यपि आत्मा कर्ता नहि छी, तैयो राजस ओकरा सँ ई विचार कय केँ कर्म करबाबैत अछि जे “हम कर्ता छी” ।

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ॥
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥१४-७॥

आर तमस केँ अज्ञान सँ उत्पन्न भेल जानि लिय’, जे समस्त शरीरधारी प्राणी केँ मोहित कय दैत अछि; हे भरतवंशी, ई गलत समझ, आलस्य आ नींद सँ शीघ्रतापूर्वक बाँधि दैत अछि ।

मोहित करब: भ्रमित करब या विवेक नहि होयब (सही-गलत केर समझ नहि होयब) ।

बन्धनक प्रकार तीनू गुण द्वारा हमरा सब मे केना होइछ से ध्येय अछि ५, ६ आ ७ श्लोक मे ।

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ॥
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥१४-९॥

हे भरतवंशी, सत्व गुण सुख सँ आर रजस गुण कर्म सँ जुड़ाव उत्पन्न करैछ; जखन कि तमस गुण, सचमुच, विवेक केँ झाँपिकय, गलत समझ सँ जुड़ाव उत्पन्न करैत अछि ।

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ॥
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥१४-१०॥

हे भरतवंशी, सत्व गुण रजस आ तमस पर हावी भ’ कय उत्पन्न होइत अछि; तेनाही रजस सत्व आ तमस पर हावी होइत अछि; एनाही तमस सत्व आ रजस पर हावी होइत अछि ।

जखन कोनो एकटा गुण बाकी दुइ पर हावी भ’ जाइत अछि, त ओ अपन असर देखबैत अछि, सत्व ज्ञान आर खुशी उत्पन्न करैत अछि; रजस, कर्म; तमस, विवेक पर पर्दा झाँपैत अछि, आदि ।

एहि दुइ श्लोक मे तीनू गुणक आपसी सम्बन्ध आ एक-दोसर सँ जुड़ाव केर व्याख्या भेल अछि ।

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ॥
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्वमित्युत ॥१४-११॥

जखन एहि शरीर केर हरेक इंद्रिय सँ बुद्धि केर प्रकाश चमकैत अछि, तखन ई जनबाक चाही जे सत्व प्रबल अछि ।

हर इंद्रिय: मतलब, सबटा द्वार । सबटा इंद्रिय सब आत्माक लेल (सब बात) बुझयवला द्वार थिकैक ।

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ॥
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥१४-१२॥

लोभ, प्रवृत्ति (कर्म करबाक वृत्ति), विभिन्न कार्य सब केँ करबाक सोच बनेनाय, बेचैनी, चाहत (स्पृहा) – ई सब तखन होइत छैक जखन रजस हावी (प्रबल) होइत छैक, हे भरतवंशी अर्षभ ।

बेचैनी: कोनो कार्य केँ करबाक पाछाँ केर प्रसन्नता (खुशी) आ लगाव (राग) आदि बेचैन भेनाय भेल ।

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ॥
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥१४-१३॥

अंधकार (अप्रकाश), जड़ता (अप्रवृत्ति), गलत समझ (प्रमाद) आर भ्रम (मोह) – ई सब तखन उत्पन्न होइत अछि जखन तमस प्रबल होइत अछि, हे कुरुक वंशज ।

अंधकार, जड़ता: (सही-गलत समझ मे) अन्तर केर अभाव, आर एकर परिणाम, जेना, जड़ता (मूर्खता), आदि ।

पुनः श्लोक ११, १२ आ १३ मे क्रमिक रूप सँ सत्त्व, रजस ओ तामस केर बढ़ोत्तरी सँ कि-कि लक्षण प्रकट होइछ तेकर व्याख्या भेल अछि ।

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ॥
तदोत्तमविदां लोकानलान्प्रतिपद्यते ॥१४‍-१४॥

अगर शरीरधारीक मृत्यु तखन होइत छैक जखन सत्व गुण बेसी (हावी, प्रबल) रहैत छैक, त ओ सब सँ उच्च भगवानक उपासक लोकनिक बेदाग (दागरहित, कलंकरहित) लोक केँ पबैत अछि । 

बेदाग लोक: ब्रह्म-लोक आर एहि तरह केर लोक ।

सब सँ उच्च भगवानक लोक: हिरण्यगर्भ जेहेन देवताक लोक ।

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ॥
तथा प्रलीनस्तमसि मूढ़योनिषु जायते ॥१४-१५॥

रजस मे मृत्यु केँ प्राप्त कय ओ कर्म मे आसक्त लोक सभक बीच जन्म लैत अछि; तेनाही तमस मे मरिकय, ओ अविवेकी सभक योनि मे जन्म लैत अछि ।

रजस में मृत्यु… : यदि ओ तखन मरि जाय जखन ओकरा मे रजस प्रबल होइक ।

जेना कि शुरुए मे कहल गेल छल जे एहि “परमज्ञान” सँ एहि जीवनक बाद केर स्थिति पर सेहो आत्मा जानकारी पाबि ज्ञानी बनि स्वतंत्र भ’ जाइछ, तेकरे निरूपण क्रमशः १४ आ १५ श्लोक मे भेल अछि । यदि सत्त्वक स्थिति मे मृत्यु होयत त आत्माक ऐगला लोक उच्च श्रेणीक लोक होयत, जँ रजस ओ तमस मे मृत्यु प्राप्त करत त ताहि अनुरूपक लोक केर प्राप्तिक दृश्य देखाओल गेल अछि ।

एहि सम्पूर्ण स्थितिक प्रत्यक्ष उदाहरण सब नित्यहु देखय मे भेटैछ । बस गहींर दृष्टि सँ समाज आ लोकक जीवनगति पर नजरि देबाक जरूरत पड़ैछ । देखि सकैत छी ई सब बात ।

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ॥
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥१४-१६॥

ओ (ज्ञानीजन) सब कहैत छथि जे नीक काजक फल सात्विक आर शुद्ध होइत छैक; असल मे, रजस केर फल दुःख अछि, आर अज्ञानता तमस केर फल थिक ।

रजस: केर मतलब अछि राजसिक काज, आर तमस, तामसिक काज, जेना कि एहि भाग मे कर्म केर बारे मे कहल गेल अछि ।

कर्मक फल – नीक करबह, नीक पेबह । अधलाहक फल सदैव अधलाहे भेटतह । त्रिगुणात्मक तत्त्वक अनुसार कयल गेल कर्मक फल केर वर्णन स्पष्ट अछि एहि १६मा श्लोक मे ।

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ॥
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥१४-१७॥

सत्व सँ ज्ञान उत्पन्न होइत अछि, रजस सँ लालच (लोभ); तमस सँ गलत समझ (प्रमाद), भ्रम (मोह) आर अज्ञानता उत्पन्न होइत अछि ।

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्या मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ॥
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥१४-१८॥

सत्वगुण मे रहयवला लोक उपर (लोक सब मे, उच्चतर संसार सब मे) जाइत छथि; राजसिक लोक बीच (मध्य लोक सब मे, उच्च आ नीच केर बीचवला लोक सब) मे रहैत छथि; आर तामसिक लोक, जे सबसँ निचला गुण केर काज मे रहैत छथि, निचाँ (निम्नतर लोक सब मे) जाइत छथि ।

एक बेर फेरो १७ आ १८ मे तीनू गुणधारी लोकक उपलब्धि ओ प्राप्तिक सम्बन्ध मे स्पष्ट कयल गेल अछि ।

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ॥
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥१४-१९॥

जखन देखयवला (द्रष्टा) गुण सभक अलावा कोनो आर कारक (अभिकर्ता) केँ नहि देखैत छथि आर हुनका जनैत छथि जे गुण सब सँ उपर छथि, त ओ हमर अस्तित्व (हमर लोक) केँ पाबि लैत छथि । 

गुण: जे हुनका (ओहेन द्रष्टा) सब केँ शरीर, इंद्रिय आ इंद्रिय सभक विषय (वस्तु) मे बदैल दैत अछि, आर जे अपन सब रूप मे सब कर्मक कारक (अभिकर्ता) बनैत अछि ।

गुण सब सँ उपर केँ जनैत छथि: हुनका देखैत छथि जे गुण सब सँ अलग छथि, जे गुण आ ओकर काजक गवाह छथि ।

श्लोक १९ सँ परमज्ञानक परमवचन आरम्भ भेल स्पष्ट अछि । माता प्रकृति, पिता परमात्मा – माता सँ गुणक प्राप्ति आ पुनः अपन-अपन बुद्धि-आचरण अनुरूपक गुणक आधिक्य, गुण अनुरूपक लक्षण आ व्यवहार आ तेकर फलादेश – एहि सब पर विशद दृष्टि देलाक बाद भगवान एहि श्लोक सँ गुणातीत परमात्माक बनायल सृजन-सिद्धान्त मे स्वयं केर स्थान आ गुणादि पर विचार करैत परमात्माक स्वरूप केँ जनबाक अबस्था बतेलनि अछि । ई बुझय कहलनि अछि जे जाहि व्यक्ति मे जेहेन गुण तेहेन कर्म, तेहने फल, तेहने जीवनगति, जीवनक संग या जीवनक बाद होइछ । त, निरपेक्ष द्रष्टा बनिकय गुण सब सँ उपर परमात्माक चिन्तन करब त परमात्मा अवश्य प्राप्त हेताह से सन्देश देल गेल अछि ।

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ॥
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥१४-२०॥

जे शरीरधारी व्यक्ति एहि तीनू गुण सब सँ उपर चलि जाइत छथि, जाहि सँ शरीर बनल अछि, ओ जन्म, मृत्यु, क्षय आ दर्द सँ मुक्त भ’ जाइत छथि तथा अमरत्व केँ प्राप्त करैत छथि । 

आर, मुक्तिक सिद्धान्त यैह भेल जे अहाँ एहि तीनू गुणक मायाजाल मे जुनि ओझराउ । ओ सब अपन-अपन काज मे अछि । अहाँ (आत्मारूपमे) परमपिता परमात्मा जे गुणातीत छथि, तिनकर चिन्तन मे पड़ू । मुक्ति सुनिश्चित अछि ।

अर्जुन उवाच ।

कैर्लिंङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ॥
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥१४-२१॥

अर्जुन कहलनि:

हे प्रभु, ओ लोकनि कोन चिह्न (निशानी, लक्षण) सब सँ जानल जाइत छथि जे एहि तीनू गुण सब सँ उपर चलि गेल छथि ? हुनकर आचरण केहेन छन्हि, आर ओ सब एहि तीनू गुण सब सँ केना पार पहुँचि जाइत छथि ? 

हमरा-अहाँक सुविधा लेल अर्जुन भगवान कृष्ण सँ आर अधिक फरिछाबय लेल ई प्रश्न कयलनि अछि ।

श्रीभगवानुवाच ।

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ॥
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि कांक्षति ॥१४-२२॥

भगवान कहलनि:

हे पांडव, जे (अपना मन मे) प्रकाश (सत्व केर असर), प्रवृत्ति (रजस केर असर), तथा भ्रम (तमस केर असर) सँ घृणा नहि करैछ, आर नहिये ई सब नहि रहला पर ओकर चाहते रखैछ; 

ई अर्जुन केर पहिल सवाल केर जवाब थिक । सही ज्ञान वला आदमी तीनू गुण सभक असर सँ घृणा नहि करैत छथि, जाबत धरि ओ चेतना केर विषय समान स्पष्ट रूप सँ स्वयं केँ प्रस्तुत करैत छथि; नहिये ओ ताहि चीज सभक चाहत रखैत छथि जे लुप्त भ’ (हरा) गेल छन्हि ।

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ॥
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥१४-२३॥

जे व्यक्ति निश्चिन्त भ’ कय बैसल रहैत अछि आर गुण सब सँ विचलित नहि होइत अछि, जे ई जनैत अछि जे गुण सब कार्य करैत अछि, ओ आत्मकेन्द्रित रहैत अछि आर विचलित नहि होइत अछि; 

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥१४-२४॥

सुख आ दुःख मे एक जेकाँ, स्वयं पर टिकल रहयवला, माटिक ढेप, पाथर आ सोना केँ एक जेकाँ मानैत अछि; नीक आ बेजा चीज सभक लेल एक जेकाँ, मजबूत, निन्दा आ प्रशंसा मे एक जेकाँ;

स्वयं पर टिकल रहयवला: ओ अपन असली रूप मे रहैत अछि ।

मानपमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ॥
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥१४-२५॥

मान-अपमान मे एक जेकाँ, मित्र ओ शत्रु लेल एक जेकाँ, सबटा कर्म सब त्यागिकय (छोड़िकय) – कहल जाइछ जे ओ सबटा गुण सब सँ पार पहुँचि जाइत अछि । 

दुइ मे सँ कोनो एक तरफ झुकने बिना, ओ दृढ़तापूर्वक आत्म-ज्ञान केर बाट पर चलैत अछि, आर गुण सब सँ उपर उठि जाइत अछि ।

ई तीनू श्लोक (२३, २४ आ २५) अर्जुन केर दोसर सवाल केर जवाब थिक ।

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ॥
स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥१४-२६॥

आर जेहो कियो दृढ़ (अटल) भक्तियोग सँ हमर सेवा करैत छथि, ओ गुण सब सँ पार जाकय ब्रह्म बनबाक योग्य छथि ।

एहि सँ अर्जुन केर तेसर सवाल केर जवाब भेटैत अछि ।

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ॥
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥१४-२७॥

कियैक तँ हम, अमर आ अपरिवर्तनीय, सदा-सनातन आ परमानन्द, ब्रह्म केर निवास (धाम) छी ।

हम: प्रत्यगत्मन, सत्य अन्तरात्मा ।

अर्जुनक प्रश्न उत्तर मे गुणातीत भगवान मे लीन मुक्तजीव केर आचरण, लक्षण, व्यवहार आदिक चर्चा भेल अछि । हमरा सब लेल यैह स्थिति मे पहुँचबाक अभिप्राय एहि जीवनक मूल उद्देश्य हेबाक चाही । बस ।

हरिः हरः!!

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