गीताक सोलहम अध्यायक प्रवीण व्याख्या
– प्रवीण नारायण चौधरी
आब अपने सब आबि गेल छी गीताक उत्तरार्ध भागक सोलहमा पड़ाव पर । फेर मोन पाड़ि दी जे पन्द्रहमा पड़ाव मे ‘उपर जैड़, नीचाँ मुंहे गाछ’ केर विम्ब पर भगवान कृष्ण एक परमात्मा सँ सकल ब्रह्माण्ड – अनादि-अनन्त-सनातन ब्रह्माण्ड ओ हम मानव व विभिन्न जीवरूपक पृथ्वीवासी आत्माधारी जीव बीचक सम्बन्ध केँ बड़ा विलक्षण ढंग सँ वर्णन कयलनि । हमरा त बस एक्कहि टा बात बेर-बेर बुझा रहल अछि, जेना भगवान कृष्ण केँ अपन असल पहिचान आ विहित कर्म प्रति साकांक्ष कय रहल छथि, जाहि तरहें अध्याय एक मे अर्जुनक मोन मे महाभारत युद्ध आरम्भ होइ सँ पूर्वहि अनेकों शोक-चिन्ता सब घेरलकनि, ठीक तहिना हम मानव एहि जीवनरूपी “महाभारत” मे स्वयं “अर्जुन” समान केना उद्वेलित रहैत छी तथा अशान्ति व तनावग्रस्त-चिन्ताग्रस्त जीवन मे ओझरायल रहैत छी; तेहेन स्थिति मे अर्जुन केँ कहल गेल एक-एक बात हमरो सब लेल ओहिना अनुकरणीय, चिन्तनीय, मननीय आ सोचनीय अछि । बिल्कुल अर्जुन समान शरणागत भक्त रूप मे परमात्मा-प्रतिनिधि सगुण भगवान् कृष्णक संग गीता ज्ञानोपदेशक प्रवाह मे क्रमबद्ध ढंग सँ बढ़ैत रही ।
अपन विश्वरूप केर दर्शनोपरान्त अध्याय १२ सँ भगवान कृष्ण भिन्न-भिन्न दृष्टि सँ परमात्मा एवं हुनक विभिन्न दृश्य-अदृश्य उपाधि सँ हम देहधारी जीव केँ केना जुड़ल राखि अपन कर्तव्यपथ पर सदिखन चलैत रही, तेकर सुन्दर व्याख्याक संग वर्णन कय रहल छथि । अध्याय १२ मे परमात्माक भक्ति, अध्याय १३ मे क्षेत्र ओ क्षेत्रज्ञक विम्ब पर, अध्याय १४ मे त्रिगुणात्मक सिद्धान्त पर मानव जीवनक व्यवहारिक स्वरूप सँ परमात्माक संग अनन्य ओ अव्यभिचारिणी भक्ति, फेर अध्याय १५ मे अश्वत्थ गाछक जैड़ केँ उपर आ बाकी डार्हि-पात व मनुष्यक लोक सँ नीचाँ धरि पसरल ओकर जैड़ केर विम्ब पर परमात्माक स्वरूपक व्याख्या – सब अध्याय मे हमरा लोकनि केना आत्मसाक्षात्कार करैत परमात्मा सँ एक भ’ सकब तेकर वर्णन आ दिशानिर्देश देल गेल अछि । सोलहम अध्याय सेहो पूर्ववर्णित अध्याय सब जेकाँ भगवानहि केर उक्ति सँ आरम्भ होइछ –
श्रीभगवानुवाच ।
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ॥
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥१६-१॥
भगवान कहलनि:
निडरता, हृदय केर पवित्रता, ज्ञान आर योग मे दृढ़ता (पक्का इरादा); दान, इंद्रिय सबपर नियंत्रण, यज्ञ, शास्त्र पढ़नाय (स्वाध्याय कयनाय), तपस्या, ईमानदारी;
योग: एहि मे शास्त्र एवं आचार्य लोकनि सँ सिखल बात सभक ध्यान कयनाय आ स्वयं पर नियंत्रण (काबू) कय केँ सीधे अपन समझ (परसेप्सन) केर चीज बनेनाय शामिल अछि ।
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ॥
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥१६-२॥
अहिंसा (चोट नहि पहुँचेनाय), सत्य, क्रोध नहि एनाय, त्याग, शान्ति, निन्दा नहि केनाय, प्राणी सब पर दया कयनाय, लोभ (लालच) नहि कयनाय, नम्रता, शील, चंचलता (चपलता, लुच-लुच) नहि देखेनाय;
लोभ (लालच) नहि कयनाय: इंद्रिय सभक अपन विषय सभक सम्पर्क मे अयलो पर अप्रभावित रहनाय ।
चंचलता (चपलता, लुचलुच) नहि देखेनाय: बेकारक काज सब सँ बचनाय – “श्रीधर” ।
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ॥
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥१६-३॥
साहस (तेज), क्षमा, धैर्य, पवित्रता (शुचिता), घृणा नहि भेनाय, घमंड नहि भेनाय; ई सबटा दिव्य अवस्थाक लेल जन्म लेने व्यक्ति केर थिक, हे भरतवंशी ।
ई सब दिव्य सम्पदा थिक जे श्लोक १ सँ ३ धरि मे वर्णन कयल गेल अछि ।
जेना कि पैछला अध्याय मे परमात्मारूपी अश्वत्थक जैड़ नीचाँ मनुष्यक लोक सँ आर नीचाँ धरि जेबाक बात कहल गेल छल, तहिना एहि सोलहम अध्यायक आरम्भ करैत भगवान कृष्ण मनुष्यक लोकक दिव्यताक विवरण उपरोक्त प्रथम तीन श्लोक मे रखलनि अछि । हमरा सब व्यवहार मे ई नीक (उचित) आ ई बेजा (अनुचित) कहिते टा छी । हालांकि द्वन्द्व सँ मुक्त रहब, द्वन्द्वक ओझराहट मे नहि पड़बाक उपदेश अनेकों बेर देल गेल अछि, तथापि इन्द्रियनिग्रह एवं मनोनिग्रह वास्ते विवेकपूर्ण होयब, उचित-अनुचित बीच एकटा अन्तर आ विपरीत ध्रुव पर स्थिति केँ बुझब त जरूरी अछिये । तेँ, एहि मनुष्यलोक मे व्यवहारिकताक आधार पर कि सब दिव्य अछि तेकर वर्णन कयलनि अछि । ई समस्त लक्षण वास्ते हमरा लोकनि एकटा नियमित-अनुशासित आ सुशिक्षित-सुसंस्कृत जीवन जिबय लेल विभिन्न यत्न-अभ्यास आदि करैत छी । ध्यान दी एक-एक लक्षण (दिव्यता) पर । आगू आर देखी –
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ॥
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥१६-४॥
हे पार्थ, देखाबा, दर्प, अभिमान, तामस, कठोरता आर अज्ञानता, ई सब ओहि व्यक्ति केर थिक जे असुरिका अबस्थाक लेल जन्म लेने अछि ।
असुरिका: राक्षसी ।
प्रथम ३ श्लोक मे दिव्यता आ एहि चारिम श्लोक मे आसुरिकता (राक्षसी सम्पदा-गुण) केर चर्चा करैत फरिछा देलनि अछि जे देखाबा, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोरता (जिद्द) एवं अज्ञानता – ई सब सेहो मनुष्यक लोक मे देखल जाइछ । धरि जेकरा मे ई सब गुण-धर्म रहैछ ओ आसुरिक (राक्षसकोटि) केर मानल जाइछ ।
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ॥
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥१६-५॥
दिव्य अबस्था मुक्तिक लेल आर आसुरिका अबस्था बन्धन केर लेल मानल गेल अछि; हे पांडव, दुःखी जुनि होउ, अहाँ दिव्य अवस्थाक लेल जन्म लेने छी ।
हम सब प्रकृतिक माया, प्रकृतिक गुण, गुणप्रेरित कर्म, इन्द्रियादिक विषय, विषय-सन्दर्भित कर्म, कर्म सँ बन्धन, बन्धन सँ मुक्तिक उपाय – एहि सब मूल आ केन्द्रीय सन्दर्भ पर समस्त गीताक लगभग सब अध्याय मे चर्चा देखैत आबि रहल छी । एकरे पुनरावृत्ति फेर एहिठाम भेल अछि । जँ दिव्यगुण रहत त मुक्ति भेटत । आसुरिक गुण सँ बन्धन सुनिश्चित अछि । ज्ञान आ अज्ञान, बौद्धिकता आ मूढ़ता – एहि दुनू मे प्रथमपक्ष श्रेष्ठ अछि । सुरत्व आ असुरत्व मे सेहो तहिना विवेकसम्पन्न ज्ञान राखी ।
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च ॥
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥१६-६॥
एहि संसार मे दुइ प्रकारक जीव अछि, दैवीय आ आसुरिक । दैवीय जीव सभक बारे मे विस्तार सँ कहल गेल अछि; हे पार्थ, आसुरिक जीव सभक बारे मे हमरा सँ सुनू ।
श्लोक चारि सँ आगू आसुरिक जीव पर आर बेसी प्रकाश देबाक आवश्यकता बुझि श्री कृष्ण एकर वर्णन करबाक बात कयलनि अछि ।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ॥
न शौचंनापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥१६-७॥
आसुरिक स्वभावक लोक नहि तँ ई जनैत अछि जे कि करी आ कोन चीज सँ बची’ नहिये ओहि सब (कर्म) मे भेटयवला पवित्रता, न नीक व्यवहार, न सत्यता (आदिक बारे मे ओ जनैत अछि) ।
कि करी… कोन चीज सँ बची: (एहेन लोक सब ई नहि जनैत अछि जे) मनुष्यक उद्देश्य पूरा करबाक लेल ओकरा कोन-कोन काज करबाक चाही, आर नहिये ई जनैत अछि जे खराबी सब सँ बचबाक लेल ओकरा कोन काज सब सँ दूर रहबाक चाही ।
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ॥
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥१६-८॥
ओ सब कहैत अछि, “ब्रह्माण्ड बिना सत्य केर, बिना (नैतिक) आधार केर, बिना ईश्वर केर, आपसी मिलन सँ, अपन कारण केर लालसा सँ उत्पन्न भेल अछि; आर की ?”
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ॥
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥१६-९॥
एहि दृष्टि सँ, तुच्छ (छोट) बुद्धि आर खराब कर्मवला ई बर्बाद आत्मा सब, दुनिया केँ खत्म करबाक लेल शत्रु बनिकय ठाढ़ भ’ जाइत अछि ।
छोट बुद्धि: कियैक तँ ई सिर्फ इंद्रिय सभक चीज सब सँ मतलब रखैत अछि आर उपर नहि उठि सकैत अछि ।
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ॥
मोहाद्गृहीत्वाऽसद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥१६-१०॥
ओ लोकनि अतृप्त इच्छा सब सँ भरल, पाखंड, मान आ अज्ञानता (मद) सँ भरल, भ्रम (मोह) केर चलते खराब विचार रखैत, अशुद्ध संकल्प सँ कर्म करैत अछि ।
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ॥
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥१६-११॥
बहुते रास चिन्ता सब सँ घेरायल, जेकर अन्त मात्र मृत्यु होइत छैक, वासनाक सन्तुष्टि केँ सब सँ पैघ मननाय, आर ई निस्तुकी (पक्का) मानि लेनाय जे बस यैह सब किछु छी;
चिन्ता: इच्छा केर अनगिनती चीज सब केँ पेनाय आ ओकरा संजोनाय (बचाकय रखनाय) केर तरीका सभक बारे मे (सोचैत रहनाय, चिन्ता करैत रहनाय, एहि सब बात मे ध्यान देनाय, आदि) ।
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ॥
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥१६-१२॥
आशा (उम्मीद) केर सैकड़ों बन्धन सँ बाँधल, वासना आ क्रोध केर हवाला भेल (फाँस मे फँसल), ओ लोक सब गलत बाट (तरीका) सँ सौख-मजा (ऐशो-आराम) केर वास्ते बहुते रास पैसा (धन) जमा करबाक कोशिश करैत अछि ।
इदमद्य मया लब्धमिदं प्राप्स्ये मनोरथम् ॥
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥१६-१३॥
“ई आइ हमरा भेटि गेल अछि; (बाकी) ई इच्छा हमरा बाद मे भेटि जायत; ई हमर छी, आर ई धन सेहो भविष्य मे हमरहि होयत ।”
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ॥
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥१६-१४॥
“ओहि शत्रु केँ हम मारि देलहुँ, आर दोसरो सब केँ हम मारि देबैक । हम भगवान छी, हम आनन्द लैत छी, हम सफल, शक्तिशाली आ प्रसन्न छी ।”
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ॥
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥१६-१५॥
“हम धनिक आर नीक खानदानक लोक छी । हमरा जेहेन आर के अछि ? हम त्याग करब, हम देबैक, हम खुशी मनायब ।” एहि तरहें अज्ञानता सँ भ्रमित भ’ कय,
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ॥
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥१६-१६॥
कतेको प्रकारक काल्पनिक सपना-सोच (कल्पना) सब मे ओझरायल, भ्रम केर जाल मे फँसल, वासनाक सन्तुष्टिक आदी (आदती) बनिकय, ओ एकटा गन्दा नरक मे खसि पड़ैत अछि ।
श्लोक ७ सँ १६ धरिक कुल दसो श्लोक मे आसुरिक प्रवृत्तिक लोकक लक्षण आ लोकव्यवहार मे ओकर प्रस्तुतिक वर्णन कयलनि अछि श्री कृष्ण आ अन्त मे ओकर दुष्परिणाम जे ओ वासनाक सन्तुष्टिक आदती बनिकय एकटा गन्दा नरक मे खसि पड़ैत अछि । अर्थात् ओ एहि संसारे मे तेना ओझरा जाइत अछि जे फेर ओकरा ओहि फाँस सँ निकलनाइयो कठिन भ’ जाइत छैक । ओ एहि मर्त्यभूमि मे त बर्बाद होइत अछि, आगुओ ओकर गति तेहेन नारकीय होइत छैक । आगू आर देखू –
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ॥
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥१६-१७॥
अभिमानी, बदमाश, धनक घमंड आर नशा मे चूर ओ नियम केर अवहेलना कयकेँ देखाबाक खातिर नाम (प्रतिष्ठा) वास्ते यज्ञ करैत अछि;
एहेन लोक सेहो धर्मक नाम पर पाखंड करबाक बात जोड़ि देलनि अछि भगवान । भगवानहु केर नाम पर नौटंकी आ दिखाबा करब ओहेन आसुरिक लोकक लक्षण मे शामिल कहलनि अछि । आजुक समय मे एहि श्लोकक प्रासंगिकता जहाँ-तहाँ सुस्पष्टे नजरि पड़ि जायत ।
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ॥
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥१६-१८॥
अहंकार, ताकत, घमंड, वासना आर क्रोध (आवेश) सँ भरल ई खराब लोक सब स्वयं (अपना) आ आन लोक (दोसर लोक) सभक शरीर सब मे (अन्दर आत्मा रूप मे रहयवला) हमरा सँ (हम अन्तर्यामी सँ) घृणा करैत अछि ।
ओहेन लोकक वास्तविकता ई छैक जे ओ अन्तर्यामी परमात्मा सँ घृणा करैत अछि, मुदा समाजक लोक केँ ठकबाक आ अपना केँ नीक देखेबाक चक्कर मे यज्ञक ढोंग करैछ । धरि अपन अहंकार, ताकत, घमंड, वासना आ क्रोध (आवेश) सँ भरल ई खराब लोक स्वयं आ आन लोक केर भीतर रहनिहार भगवान सँ घृणा करैत अछि । ई स्पष्ट सत्य केँ हम सब नीक सँ बुझी ।
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ॥
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥१६-१९॥
एहि बुड़ल (द्विषतः – दूषित लोक) आर क्रूर (अत्यन्त) खराब कर्म करयवला केँ, जे सब सँ अधम लोक (नीच मनुख) अछि, हम हमेशा एहि संसार सब मे केवल असुर सभक गर्भ मे डालैत छी ।
असुर सभक गर्भ: सबसँ क्रूर जीव सभक गर्भ, जेना बाघ, साँप, वगैरह ।
संसार सब: संसार केर रास्ता जे कतेको नरक सब सँ भ’ कय गुजरैत अछि ।
एहि बुड़ल (दूषित लोक) सभक अन्तिम हविर्गति यैह होइछ । भगवानक कथनानुरूप ओ असुर-योनिक गति पाबि क्रूर जीव केर गर्भ मे पड़ि जाइछ । उदाहरण स्वामी स्वरूपानन्द जी बाघ, साँप, आदिक देलनि अछि ।
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ॥
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥१६-२०॥
हे कुंतीपुत्र! ओ आसुरिक योनि सब केँ प्राप्त कयकेँ, जन्म-जन्मान्तर धरि भ्रम मे रहैत, हमरा प्राप्त नहि कयकेँ, एहि प्रकारे आरो निम्न अबस्था मे (नीचाँ) खसैत अछि ।
ओहि बुड़ल लोकक हाल जन्म-जन्म धरि एहने बनल रहैत छैक । तेँ समय पर स्वयं केँ सम्हारनाय बेस महत्वपूर्ण मानल जाइछ । कम सँ कम ई मनुष्य शरीर केँ प्राप्त करब सब सँ दुर्लभ आ परम सौभाग्यक विषय मानल जाइछ । तेँ एकरा आसुरिकता मे किन्नहुं नहि लगेबाक चाही । अन्यथा फेर अवसर कहिया भेटत, अकल्पनीय अछि से कहब ।
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ॥
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयंत्यजेत् ॥१६-२१॥
नरक केर ई दरबाजा तीन तरह केर अछि, जे स्वयं केँ खत्म करैत अछि – काम (हवस), क्रोध (तामस) आर लोभ (लालच); ताहि हेतु मनुष्य केँ एहि तीनू केँ छोड़ि देबाक चाही ।
स्वयं केँ खत्म करयवला: स्वयं केँ कोनो भी मानुषिक उद्देश्यक लायक नहि बनेनाय ।
श्लोक २१ मे भगवान ‘निचोड़’ रूप मे ३ टा बात – काम (हवस), क्रोध (तामस) एवं लोभ (लालच) केँ नरक केर तीन दरबाजा कहिकय निर्णय देलनि अछि । एहि अध्यायक उपसंहार – ज्ञानोपदेशक स्वरूप मे निष्कर्ष पर ध्यान केन्द्रित करी हम सब । आगूक श्लोक सब पर सेहो तहिना ध्यान दैत भगवानक देल मार्गदर्शन अनुसार अपन जीवन केँ आगू बढ़ाबी ।
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ॥
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥१६-२२॥
हे कुंती केर पुत्र, जे आदमी अन्हार (अन्धकार) केर एहि तीन दरबाजा (द्वार) सब केँ पार कय गेल अछि, ओ अपना लेल नीक काज करैत अछि, आर एहि तरहें ओ सबसँ ऊँच लक्ष्य धरि पहुँचैत अछि ।
अन्धकार केर दरबाजा: जे नरक दिश लय जाइत छैक आर दर्द एवं भ्रम सँ भरल रहैत छैक ।
निस्सन्देह, उपरोक्त ३ टा नरक केर दरबाजा – जेकरा ‘तमोद्वारै’ यानि अन्धकारक मार्ग कहिकय बुझौलनि अछि कृष्ण, तेकरा पार करब हमरा सभक लक्ष्य कहल गेल अछि । जँ एना करैत छी, त नीक काज करैत छी तथा एहि तरहें ऊँच लक्ष्य तक पहुँचैत छी ।
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ॥
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥१६-२३॥
जे शास्त्र केर नियम केँ छोड़िकय, इच्छा केर आवेग मे काज करैत अछि, ओकरा नहि तँ पूर्णता भेटैत छैक, नहिये प्रसन्नता (खुशी), नहिये सर्वोच्च लक्ष्य ।
पूर्णता: मनुष्य केर अन्त (मोक्ष केर लक्ष्य) पेबाक योग्यता ।
शास्त्रक नियम अनुसार चलनाय कियैक श्रेष्ठ अछि सेहो ध्येय अछि । अपन मनमौजी करब उचित नहि मानल गेल अछि । एना अपन इच्छा केर आवेग मे काज करब न त मंजिल दिश लय जायत, आ प्रसन्नता या सन्तुष्टिये प्रदान करत । तेँ सावधान !
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ॥
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥१६-२४॥
अतः कि करबाक चाही आ कि नहि करबाक चाही, से सुनिश्चित करबाक लेल शास्त्र केँ अपन प्राधिकारी (निर्णेता) बनाउ । शास्त्र केर विधान मे जे कहल गेल अछि, तेकरे जानिकय अहाँ केँ एतय (अपन) कर्म (कार्य) करबाक चाही ।
एतय: एहि संसार मे । (अर्जुन वास्ते एखन युद्ध केर मैदान कुरुक्षेत्र केँ सेहो बुझनाय उचित लगैत अछि हमरा ।)
अतः कि करबाक चाही, कि नहि करबाक चाही, ताहि लेल शास्त्र केँ अपन प्राधिकारी (निर्णयकर्ता) बनाउ । विधानक समुचित वर्णन कयनिहार शास्त्रज्ञ केँ प्राधिकृत मानू । जीवन मे कल्याण सुनिश्चित होयत । अस्तु ! आशा करैत छी जे मानव जीवन मे व्यवहारिकताक विभिन्न विम्ब पर आधारित एहि सोलहम अध्याय केँ बुझय-गुनय मे ई व्याख्या सहयोगी होयत । अपन प्रतिक्रिया जरूर लिखय जाउ ।
हरिः हरः!!
