गीताक सत्रहम अध्यायक प्रवीण व्याख्या
– प्रवीण नारायण चौधरी
विदिते अछि जे १२मा अध्याय सँ १६मा अध्याय धरि प्रत्येक अध्याय मे भगवान कृष्ण द्वारा आत्म-साक्षात्कारक भिन्न-भिन्न दृष्टि सँ स्वाध्यायी एवं अध्ययन अनुरूप आचरण करब पसिन कयनिहार वास्ते कयल गेल अछि । आजुक सत्रहमा पड़ाव पर पुनः अर्जुनक एहि जिज्ञासा सँ आरम्भ होइछ, जे जिज्ञासा हम-अहाँ बहुतायत लोकक मन मे रहैछ । जेना पिछला अध्याय मे शास्त्रविहित कर्म करय पर जोर देल गेल छल । क्रोध, मोह आ लोभ केँ अन्धकारक दरबाजा कहि ओकर दुष्परिणाम नरक केर भोग सँ बचबाक, संसार मे भटकाव सँ अपना केँ बचबैत आत्मसाक्षात्कारक उपाय निर्दिष्ट छल । आब देखू –
अर्जुन उवाच ।
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ॥
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥१७-१॥
अर्जुन कहलनि:
हे कृष्ण, जे लोक शास्त्र केर नियम केँ छोड़िकय श्रद्धाक संग यज्ञ करैत अछि, ओकर कि अबस्था छैक, (कि ओ) सत्व, रजस या तमस थिक ?
शास्त्र केर नियम छोड़िकय श्रद्धाक संग: एहेन नहि छैक जे ओ शास्त्रक नियम केँ झूठ मानैत अछि, बल्कि आलस्यक कारण सँ या ओहि (नियम) सब केँ सख्ती सँ मानय मे दिक्कत रहबाक कारण सँ, ओ एहि नियम सब केँ छोड़ि दैत अछि, आर श्रद्धा सँ भरिकय देवता सभक पूजा करैत अछि ।
श्रीभगवानुवाच ।
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ॥
सात्त्विको राजसी चैव तामसी चेति ता शृणु ॥१७-२॥
भगवान कहलनि:
शरीरधारी केर श्रद्धा तीन तरहक होइत छैक, जे जन्मजात ओकर स्वभाव मे रहैत छैक – सात्विक, राजसिक आर तामसिक । एकरहु बारे मे सुनू ।
जन्मजात ओकर स्वभाव: ओकर पैछला संस्कार सब सँ जन्म भेल (स्वभाव) ।
एकरहु बारे: तीन तरह केर श्रद्धाक बारे ।
शरीरधारीः यानि मनुष्य (जीव) – ओ शरीर जाहि मे आत्माक निवास अछि ।
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ॥
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥१७-३॥
हे भरतवंशी, हर व्यक्तिक श्रद्धा ओकर स्वाभाविक (प्राकृतिक) स्वभाव (प्रकृति) मुताबिक होइत छैक । मनुष्य अपन श्रद्धा सँ मात्र बनैत अछि; ओ वास्तव मे वैह अछि जे ओकर श्रद्धा छैक ।
स्वाभाविक स्वभाव: संस्कार सभक खास प्रवृत्ति सब ।
अर्जुनक जिज्ञासा सामान्य मानव भावना अनुरूप बुझाइत अछि । कारण शास्त्रक नियम-अनुशासन सभक स्वभाव अनुसार सहज नहि होइत छैक वास्तव मे । लेकिन श्रद्धा सँ समर्पण करबाक – परमात्मचिन्तन मे सब अपन-अपन स्वभाव अनुसार लगैत अछि तथा शास्त्रक कठोरता केँ उल्टे कियो-कियो आलोचना सेहो करैत देखाइछ । बुझले होयत जे ‘कर्मकांड’ (वैदिक सिद्धान्त अनुरूप पूजा-पद्धति – भगवानक पूजा आ चिन्तन आदिक निर्देशित उपाय) केँ कतेको लोक ब्राह्मणवाद – एक जाति विशेषक सुविधा व अनुकूलता मुताबिक बनायल गेल अनावश्यक नियम-कायदा कहिकय विरोध पर्यन्त करैत अछि । परञ्च, पिछला अध्याय मे हम मनुष्य लेल आत्मसाक्षात्कारक उपाय अपन मानवीय गुण-धर्म अनुसार परमात्माक परिचिति पबैत कयल जेबाक अनुशंसा मे निष्कर्षक विन्दु पर शास्त्र अनुसार आचरण-व्यवहार करबाक निर्णय देलनि । तदनुसार अर्जुन हमर-अहाँक सामान्य मानसिकताक प्रतिनिधित्व करैत ई जिज्ञासा रखलनि जे शास्त्र आ श्रद्धा अनुसार सेहो विश्लेषण करथि भगवान । आर, एहि महत्वपूर्ण जिज्ञासाक उत्तर दैत भगवान कहलनि जे सभक अपन स्वभाव छैक, सभक अपन श्रद्धा स्वभाव अनुसारक छैक । आर एहि मे चौदहम अध्याय मे वर्णित त्रिगुणात्मक स्वभाव पर आर विशद् व्याख्या होबय जा रहल अछि ।
एहि अध्याय केर उपयोग सेहो हमरा सब लेल आत्मसाक्षात्कार – परमात्मा संग सम्मिलन मे बहुत पैघ सहयोग करत आ मन मे रहल विभिन्न आशंका, दुविधा किंवा द्वन्द्व आदिक समाधान करत एना हमरा विश्वास भ’ रहल अछि ।
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ॥
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥१७-४॥
सात्विक पुरुष देवता लोकनिक, राजसिक, यक्ष सभक तथा पुनः राक्षस सभक पूजा करैत अछि; दोसर दिश – तामसिक पुरुष – भूत आ प्रेत सभक टोलीक पूजा करैत अछि ।
जेना कि चौदहम अध्याय मे मानव प्रकृति निर्माण लेल जिम्मेदार तीन गुण सत्त्व, रजस ओ तमस केर वर्णन कयल गेल छल, एतय फेर सँ भगवान स्पष्ट कयलनि अछि जे एहि तीन गुणक आधिक्यताक परिणामस्वरूप क्रमशः ओहेन स्वभावक लोक केकर पूजा करैत अछि । सात्विक पुरुष देवता प्रति श्रद्धा-सम्मानक भाव सँ पूजा-अर्चना करैत छथि । तहिना राजसिक लोक यक्ष एवं राक्षस सभक पूजा करैत अपन सत्ता-स्वार्थ लेल एहि शक्तिस्रोत सभक प्रति आकर्षित रहैत ओकरहि पूजा करैछ । तहिना तामसिक पुरुष सेहो अपन स्वभावक अनुकूल भूत-प्रेत जेहेन नकारात्मकता सँ भरल लेकिन अस्तित्व मे शक्तिक एकटा निश्चित स्रोत हेबाक कारण पूज्य बनैछ । स्पष्ट अछि, जेकर जेहेन स्वभाव, ओकर ओहेन श्रद्धा ।
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ॥
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥१७-५॥
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ॥
मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥१७-६॥
जे लोक शास्त्र सभक बिना कठोर तपस्या करैत अछि, देखाबा आ अहंकार मे डूबल रहैत अछि, वासना आ आसक्तिक शक्ति (ताकत) सँ ग्रस्त (भरल) रहैत अछि, शरीरक समस्त अंग केँ, चाहे ओ कतबो बेमतलबक हो, आ शरीरक अन्दर रहयवला (अन्तर्यामी) हमरा, तकलीफ दैत अछि; ओकरा आसुरिक संकल्पवला जानू ।
तपस्या: जे (जाहि सँ) स्वयं केँ आ दोसर जीव केँ दर्द दयवला होइत छैक ।
वासना आ आसक्तिक शक्ति (ताकत) सँ ग्रस्त: एकर मतलब इहो भ’ सकैत छैक, “वासना, आसक्ति आर शक्ति (ताकत) सँ ग्रस्त” ।
शरीरक समस्त अंग: शरीर केँ बनाबयवला सम्पूर्ण तत्व सभक समग्र रूप (एग्रीगेट) ।
शास्त्रक नियम केर अवहेलना करैत निजमति-निजस्वभावक वश मे रहिकय मनमानी ढंग सँ तपस्या मे लागल, देखाबा आ अहंकार मे डूबल, वासना व आसक्ति केर शक्ति सँ भरल, शरीरक विभिन्न विभाग केँ बिना मतलबो केँ उपासनाक कोनो विशेष प्रकार सँ जोड़िकय रखैछ, ओकरा कष्ट दैछ, साधैत अछि, से शरीर भीतर रहनिहार ‘अन्तर्यामी’ (परमात्माक अंश) केँ पर्यन्त तकलीफ दैछ । ओहेन लोक केँ ‘आसुरिक संकल्प’ वला कहलनि अछि भगवान कृष्ण ।
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ॥
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥१७-७॥
ओहि मे सँ हरेक केँ जे भोजन पसिन छैक, ओहो तीन प्रकारक होइत छैक, जेना यज्ञ, तपस्या आ दान सेहो तीन प्रकारक होइत छैक । अहाँ ई सुनू, ओकरा सभक बीच केर अन्तर सेहो सुनू ।
एतय ‘ओहि मे सँ’ कहबाक अर्थ फेर हम मानव जेकर अपन स्वभाव आ तदनुसार अपन श्रद्धाक बात सँ भगवान आरम्भ कएने रहथि, तेकरे सम्बन्ध बनैत अछि । अर्थात् हमरा-अहाँ सब जे अपन स्वभावक मुताबिक अलग-अलग श्रद्धा राखिकय स्वयं केँ परमात्म-चिन्तन, जीवनचर्या, कर्म निष्पादन आदिक संग मानव जीवन जिबैत रहैत छी, हमरा सब केँ जे भोजन पसिन पड़ैछ सेहो तीन प्रकारक अछि से कहल गेल अछि । ‘जेहेन खायब अन्न, ओहेन होयत मन’ से कहावत यथार्थ अछि । तहिना यज्ञ, तपस्या आ दान – ई तीनू चीज ‘तीन प्रकार’ केर होइछ । भगवान कहि रहल छथि जे आब से सुनू आ ओकरा सभक बीच केर अन्तर सेहो सुनू । आहार-विहार सँ मानव जीवन केँ दिशा भेटयवला बात आ तेँ कि खेबाक चाही, कि नहि खेबाक चाही ताहि सब पर शास्त्रक विवेचना अत्यन्त ध्येय एवं अनुकरणीय अछि ।
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ॥
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः ॥१७-८॥
जे भोजन जीवन शक्ति, ऊर्जा, मजबूती, सेहत (स्वास्थ्य), प्रसन्नता आर रुचि (भूख बढ़बैत) अछि, जे नमकीन आर चिक्कण (तैल्यगुणयुक्त), पौष्टिक आर स्वादिष्ट होइत अछि, से सात्विक लोक केँ पसिन अबैत छैक ।
भोजनक परिकार आ प्रकार पर व्याख्या करबाक आवश्यकता नहि । प्रत्येक व्यक्तिक रुचि ओकर अपन स्वाद मुताबिक अछि से सर्वविदिते अछि । मैथिली भाषा मे एकटा बड नीक कहावत छैक – “आपरुचि भोजन, पररुचि श्रृंगार” । माने जे अपना जे रुचय से खाय, दोसर केँ जे रुचय तेना स्वयं केर श्रृंगार करी । एहि अनेकों तरहक उपलब्ध भोजन मे जीवन शक्ति, ऊर्जा, ताकत, स्वास्थ्य संग खेला पर मन-मिजाजक प्रसन्नता आर जे जल्दी पचि जाय आ फेर भूख सेहो लगाबय – जे नमकीन आ तैल्यगुणयुक्त (चिक्कण), पौष्टिक ओ स्वादिष्ट होइछ – एहेन भोजन “सात्विक लोक” केँ पसिन पड़बाक बात स्पष्ट कयलनि अछि ।
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहितः ॥
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥१७-९॥
जे भोजन कड़ू, खट्टा, नुनगर, बहुते बेसी गर्म, तीख, सुखायल आ जलन दयवला होइछ, से राजसिक लोक केँ पसिन पड़ैत छैक आर ओहि सँ दर्द, दुःख तथा रोग (बीमारी) होइत छैक ।
बहुत बेसी: एहि शब्द केर मतलब सातो मे सँ हरेक संग लगायल जेबाक चाही, जेना बहुत बेसी कड़ू, बहुत बेसी खट्टा, आदि ।
आब देखियौक – राजसिक लोकक रुचि कोन तरहक भोजन मे होइत छैक । छैक न रोचक बात ! हम-अहाँ सेहो अपन पसिन अनुसार ई बुझि सकैत छी जे कतय छी । सात्विक पर या राजसिक पर ? अथवा ऐगला श्लोक मे आबि रहल ‘तामसिक’ पर ? यैह लाभ छैक स्वाध्याय केर । ई पंक्ति सब जखन पढ़ैत रहब, गुनैत रहब आ आत्मचिन्तन मे लागल रहब त अपन स्थिति स्पष्ट भ’ जायत आ तदनुसार रुचि जँ कोनो निकृष्ट व निम्नतर वस्तु मे होयत, त ज्ञानी-विवेकी रूप मे अपन ओहि खराब चीज केँ बदलबाक कोशिश अवश्य करब ।
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ॥
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥१७-१०॥
जे बसिया, बेस्वाद, गन्धयुक्त, रातिक पकायल गेल, आंइठ-कुंइठ आ अशुद्ध हो, से तामसिक लोक केँ पसिन अबैत छैक ।
बासी: यतायामं – मतलब, तीन घंटा पहिने पकायल गेल भोजन ।
आंइठ-कुंइठ: खेलाक बाद थारी मे बचि गेल भोजन ।
शास्त्र सेहो एहि कारण छूत-अछूत आ बासी-तिबासी सब सँ परहेज करबाक नियम निर्देशन कएने अछि । शास्त्र उपरोक्त तीनू स्थिति मे श्रेष्ठक वकालत कएने अछि । तेँ शास्त्र बिना जे काज करब ओ निश्चय हमर-अहाँक स्वभाव आ कर्मक दिशा-दशा बिगाड़ि देत आ नरकगामी मार्ग पर अग्रसर कय देत । बान्हि देत । परतंत्र बना देत । मुक्ति असम्भव भ’ जायत । जन्म-मृत्युक चक्र मे बौआइत रहब ।
जहिना भोजनक विम्ब केँ एहि तीन गुणक तीन प्रकार केर व्याख्या भेल अछि, ठीक तहिना यज्ञ, तपस्या आ दान केर सेहो यैह तीन गुणात्मक स्वरूप पर आगामी श्लोक मे भगवान कृष्णक उक्ति पर ध्यान दीः
अफलाकांक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ॥
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥१७-११॥
ओ यज्ञ सात्विक अछि जाहि मे मनुष्य बिना फल केर इच्छा कें, नियम अनुसार, केवल यज्ञ मे मन लगाकय, ओहि (यज्ञक) लेल करैत अछि ।
यज्ञ करबाक चाही । यज्ञ मानव जीवनक अभीष्ट थिक । एकर फल केर इच्छा नहि करबाक अछि । केवल नियम मुताबिक यज्ञ मे मन लगाकय यज्ञ मात्र लेल करैत अछि – ई सात्विक भेल ।
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ॥
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥१७-१२॥
हे भरतश्रेष्ठ, जे फल आर दम्भार्थ (देखाबा करबाक लेल) कयल जाइत अछि, तेकरा राजसिक यज्ञ जानू ।
आजुक समय एहेन यज्ञ पहिने सँ सोचल लक्ष्य (जे एहेन यज्ञ करब त एहेन परिणाम निकलत तेहेन धारणा) सँ बेसी कयल जाइछ । दोसरक नकल करैत, फल्लाँ एना कयलक त एहेन फल भेटलैक, तेना विचारिकय यज्ञ करब निस्सन्देह कृष्ण-वचनक सद्यः प्रमाण थिक ।
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ॥
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥१७-१३॥
जे यज्ञ बिना नियम केर कयल जाइत अछि, जाहि मे अन्न (भोजन) नहि बाँटल जाइत अछि, जाहि मे मंत्र, दान आ श्रद्धा नहि रहैत अछि, ओकरा तामसिक कहल जाइछ ।
बिना नियम, बिना अन्नादिक वितरण, बिना मंत्र, बिना दान आ बिना श्रद्धाक कयल गेल यज्ञ ‘तामसिक’ यज्ञ थिक । अनेकों पंथ आ सम्प्रदाय द्वारा एहि तरहक यज्ञ अनुशंसा सेहो देखाइछ एहि संसार मे । आब विचार ई करबाक अछि जे हम कोन यज्ञ कय रहल छी आ हमर यज्ञक प्रकृति कोन वर्ग मे पड़ैछ । यज्ञक एहि त्रिगुणात्मक स्वरूप उपरान्त आगाँ तप ओ दान केर त्रिगुनात्मक रूप पर ध्यान दीः
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ॥
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥१७-१४॥
देव लोकनि, द्विज लोकनि, गुरु लोकनि आ बुद्धिमान लोकनिक पूजा; पवित्रता (शुचिता), सरलता, संयम आर केकरहु चोट नहि पहुँचेनाय (अहिंसा), ई शरीर (तन) केर तपस्या कहाइत अछि ।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ॥
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥१७-१५॥
एहेन वाणी जाहि सँ कोनो दिक्कत नहि हो, आर सत्य हो, संगहि सहमति योग्य (नीक) आ लाभदायक हो तथा वेदक निरन्तर अध्ययन (स्वाध्यायक अभ्यास) हो – ई वाणीक तपस्या कहल जाइत अछि ।
वाणीक तपस्या हेबाक लेल, श्लोक मे कहल गेल चारू गुणक सुनिश्चित मेल (संयोग) रहबाक चाही; अगर एहिमे ओहि (चारि) मे सँ कोनो एकटाक कमी रहत, त ओ वाणीक तपस्या नहि रहि जायत ।
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ॥
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥१७-१६॥
मनक शान्ति, दया, मौन (चुप्पी), स्वयं पर संयम (आत्मनियंत्रण), मनसाय (इरादा) केर इमानदारिता – एकरा मानसिक तपस्या कहैत छैक ।
मौन: चुप्पी – ई वाणी केर सम्बन्ध मे विचार सब पर नियंत्रण केर परिणाम थिक । या एकर मतलब मुनि केर स्थिति, यानी ध्यानक अभ्यास भ’ सकैत अछि ।
उपरोक्त तीन श्लोक मे तन, वाणी आ मन केर तपस्या केना होइछ, ताहि तथ्य केँ परिभाषित कयल गेल अछि । तपस्याक तीन प्रकार थिक ई । आब आगू देखू, त्रिगुणात्मक विम्ब पर तपस्याक तीन वर्ग –
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ॥
अफलाकांक्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥१७-१७॥
ई तीन प्रकारक तपस्या (तन, मन आ वाणी) जे दृढ़-प्रतिज्ञ लोक (पक्का मनसाय/इरादा वला लोक) पैघ श्रद्धाक संग, बिना कोनो फल केर आकांक्षा (अपेक्षा) केँ करैत अछि, सात्विक कहल जाइत अछि ।
गौर करू – जेना यज्ञ केवल यज्ञ करबाक कर्तव्यरूप मे बिना कोन फलक स्पृहा सँ कयल गेनाय सात्विक छल, तहिना तन-मन-वाणी सँ कयल जायवला तपस्या जँ बिना कोनो फल केर आकांक्षाक कयल जाइछ त ओ सात्विक कहाइछ ।
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ॥
क्रियते तदिहं प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥१७-१८॥
जे तपस्या स्वागत, सम्मान आर (अपन) पूजा (प्रतिष्ठा) पाबय लेल आ देखाबाक संग कयल जाइत अछि, ओकरा एतय राजसिक, अस्थिर आ क्षणिक (किछेक समय टिकयवला) कहल गेल अछि ।
देखाबाक संग: मात्र देखाबाक लेल, पाखण्डक संग, बिना कोनो सत्य विश्वास केर ।
एतय: एकरा “एहि दुनिया केर” केर अर्थ मे सेहो बुझायल गेल अछि, यानि, मात्र एहि दुनिया टा मे फल दयवला (हिसाब सँ) ।
राजसिक तपक चित्रण मे पुनः स्वार्थपूर्ण लिप्साक संयोग सुस्पष्ट कयल गेल अछि ।
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ॥
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥१७-१९॥
जे तपस्या मूर्खता भरल सोच सँ, अपना केँ तकलीफ देबाक लेल या कियो दोसर केँ बर्बाद करबाक उद्देश्य सँ कयल जाइत अछि, ओकरा तामसिक कहल जाइत छैक ।
तहिना तामसिक तपस्चर्या मे अपना केँ तकलीफ देनाय, दोसरक अहित कयनाय आदि नकारात्मकता भरल उद्देश्य सँ कयल जाइछ ।
आब आगू दान केर तीन रूप पर गौर करू –
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ॥
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥१७-२०॥
“देनाय सही अछि” – एहि सोचक संग देल गेल उपहार, ओकरा जे कि एकर बदला मे कोनो सेवा (प्रत्युपकार) नहि करत, सही (उचित-उपयुक्त) स्थान पर आ योग्य व्यक्ति केँ देल गेल उपहार (दान) सात्विक मानल जाइत अछि ।
जे कि एकर बदला मे कोनो सेवा (प्रत्युपकार) नहि करत (किछुओ नहि घुरायत): जे नेकी (देल गेल दान/उपहार) वापस नहि कय सकैछ, अथवा जे सक्षम होइतहु नेकी (कयल गेल नीक यानि देल गेल उपहार) केँ लौटेबाक आशा (अपेक्षा) नहि रखैछ ।
पुनः सात्विक दान केवल दान देबाक कर्तव्यक पूर्ति लेल कयल गेनाय सात्विक भेल । एहि मे फेरो दानक फल सँ कोनो स्पृहा (अपेक्षा) नहि राखब अनिवार्य अछि । दान करब सही छैक, एहि अन्तर्भान सँ सुपात्र केँ (जेकरा कोनो वस्तुक आवश्यकता छैक, ओकरा पास उपलब्ध नहि छैक, हम ओकरा ई प्रदान कय दी, केवल एहि भाव मे रहिकय) दान देबाक चाही ।
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ॥
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥१७-२१॥
आर जे (दान/उपहार केर) बदला मे वापस किछु प्राप्त करबाक दृष्टि सँ, या फल केर आशा सँ, या फेर अनिच्छा सँ देल जाइत अछि, से उपहार राजसिक मानल जाइत अछि ।
राजसिक दान मे फेर स्वार्थलिप्सा आबि गेल । ई देबैक त हमर नाम लेत, वाहवाही करत, आदि ।
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ॥
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥१७-२२॥
जे दान गलत स्थान या समय पर, अयोग्य लोक केँ, बिना कोनो सम्मान केँ या तिरस्कार सँ (अनादरपूर्वक) देल जाइत अछि, ओकरा तामसिक कहल जाइत छैक ।
तामसिक दान केर लक्षण – गलत स्तान पर, अयोग्य लोक केँ, बिना कोनो सम्मान केँ अथवा अनादरपूर्वक देल गेल दान, ई सब तामसिक कहाइछ ।
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ॥
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥१७-२३॥
“ॐ, तत्, सत्”: एकरा ब्रह्म केर त्रिगुण पदनाम घोषित कयल गेल अछि । एहि सँ प्राचीनकाल मे ब्राह्मण, वेद आर यज्ञ बनल ।
ॐ, तत्, सत्: ॐ भगवान केर प्रमुख नाम थिक, कियैक तँ एकर अर्थ अछि ओ सब किछु जे प्रकट अछि आ परे (अप्रकट) अछि । एकर अर्थ “हाँ” सेहो छैक । तत् केर अर्थ अछि “ओ”; अनिश्चित, जेकरा केवल अप्रत्यक्ष रूप सँ “ओ जे” केर रूप मे वर्णन कयल जा सकैत अछि । सत् केर अर्थ अछि “वास्तविकता”; जे अस्तित्व केर एक रूप मे सदैव स्थायी रहैत अछि ।
‘ॐ तत् सत्’ – ब्रह्म केर सेहो तीन गोट पदनाम रूप मे वर्णन कयलनि अछि श्री कृष्ण । एहि तीन सँ ब्राह्मण, वेद आ यज्ञ केर निर्माणक रहस्योद्घाटन कयलनि अछि ।
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ॥
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥१७-२४॥
अतः, “ॐ” केर उच्चारण कयनाय, यज्ञ, दान आर तपस्याक कार्य थिक, जेना कि (शास्त्रीय) नियम सब मे कहल गेल अछि, आर वेद सब केँ मानयवला हमेशा एहि सँ आरम्भ करैत छथि ।
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ॥
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकांक्षिभिः ॥१७-२५॥
फल केर इच्छा कएने बिना “तत्” कहनाय, मोक्ष चाहयवला लोक सब द्वारा कयल जायवला यज्ञ, तपस्या आ दान केर विभिन्न कार्य थिक ।
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ॥
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥१७-२६॥
“सत्” शब्द केर प्रयोग वास्तविकता आ नीकक अर्थ मे कयल जाइत अछि; आर एहि तरहें, हे पार्थ, “सत्” शब्दक प्रयोग शुभ कर्मक अर्थ मे सेहो कयल जाइत अछि ।
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ॥
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥१७-२७॥
यज्ञ, तपस्या आर दान मे स्थिरता केँ सेहो “सत्” कहल जाइत अछि; आर एहि मे जुड़ल कर्म (या भगवान केर वास्ते कयल जायवला कर्म) केँ सेहो “सत्” कहल जाइत अछि ।
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ॥
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥१७-२८॥
हे पार्थ, जेहो कोनो त्याग (बलिदान, हविष्य) तथा जेहो कोनो तपस्या बिना श्रद्धा केर कयल जाइछ, ओकरा असत् कहैत छैक; ओ नहि तँ एतय (कोनो काजक) अछि, न परलोक मे (कोनो काजक) होइछ ।
ओ नहि तँ एतय (कोनो काजक) अछि, न परलोक मे (कोनो काजक) होइछ: भले ओहि सँ काफी तरहक दिक्कत झेलय पड़ैक, मुदा तेकर एतय (एहि संसार मे) कोनो उपयोग नहि अछि कियैक तँ बुद्धिमान लोक केँ ओ स्वीकार नहि छन्हि, आर नहिये ओ परलोक मे कोनो प्रभाव दय सकैत अछि । (बिनु श्रद्धाक दान-तपस्या आदि प्रभावहीन होइछ ।)
श्लोक २३ सँ श्लोक २८ धरि एहि सत्रहमा अध्यायक निष्कर्ष सहित अति विशिष्ट मार्गनिर्देशन थिक जे ‘ॐ, तत् आ सत्’ एहि तीन केर विम्ब पर आधारित अछि । एहि तीनू केर मूल अर्थ केर व्याख्या करैत यज्ञ, दान आ तप मे एकर उपयोग कोन भाव सँ करबाक चाही जाहि सँ ई सात्विक होयत, बस एतबी हम सब अपन आचरण मे अपना ली । भ’ गेल । एहि छबो श्लोक केँ अपन जीवन लेल पाथेय मानिकय हम सब गोटे अपन-अपन हृदयतल ओ मानसपटल मे एकटा जमा कय ली ।
हरिः हरः!!
