लेख विचार
प्रेषित: कीर्ति नारायण झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- जितिया केर महत्व है
मिथिलाक पावनि-तिहार मात्र कर्मकांड नहि, बल्कि भावना, संस्कार आ परस्पर संबंधक जीवंत ताना-बाना थिक। अहि सांस्कृतिक परंपरामे ‘जीतिया’ मात्र एकटा उपवास नहि, बल्कि माएक अपन धिया-पूताक प्रति असीम प्रेम, अटूट समर्पण आ आत्म-त्यागक सभसँ पावन आ संवेदनशील अभिव्यक्ति अछि।
आश्विन मासक कृष्ण पक्षक अष्टमी तिथिकेँ मनाओल जाए बला ई पर्व कठिनताक पराकाष्ठा छी। २४ घंटा सँ बेसी समय धरि बिना अन्न आ पानि ग्रहण कए—’निर्जला’ रहि कए माता लोकनि ई व्रत करैत छथि।
भूख-पियासक कष्ट माएक हृदयमे अपन संतानक दीघार्यु, निरोग काया आ मंगलमय भविष्यक कामना आगाँ बहुत छोट भऽ जाइत अछि। कंठ सुखाएल रहितो ओठ पर संतानक लेल आशीषक अविरल धारा बहैत रहैत अछि। माएक अहि कठोर तपस्यामे ई विश्वास समाहित रहैत अछि जे हुनक साधना हुनक संतानक हर संकट, विपत्ति आ रोग-व्याधि सँ ढाल बनि कए रक्षा करत।
जीतियाक तैयारी सप्तमीक राति सँ शुरू भऽ जाइत अछि:
ओठगन (नहा-खा): अष्टमीक भोरमे सूर्योदय सँ पहिने ‘ओठगन’ करबाक विधान अछि, जाहिमे मड़ुआक रोटी, नोनीक साग आ माछ वा अन्य पारंपरिक व्यंजनक विशेष महत्व होइत अछि। ओठगनक समय परिवारक सभ लोकक बीच जे आत्मीय भाव देखबा लेल भेटैत अछि, से मिथिलाक पारिवारिक एकताक प्रतीक छी।
चील्ह आ सियारिनीक कथा: पूजाक समय जीमूतवाहन देवताक संगहि चील्ह आ सियारिनीक मार्मिक कथा सुनल जाइत अछि। ई कथा माएक धर्म, नियम-निष्ठा आ संतानक प्रति कर्तव्य-बोधक बोध करबैत अछि। कथा सुनैत माएक आँखिमे अपन संतानक सुखी भविष्यक सपना तैरैत रहैत अछि।
पारन आ असीस: नवमीक प्रात काल पूजा-अर्चनाक बाद जब माए पारन करैत छथि, तखन सभसँ पहिने अपन संतानकेँ ‘जीतिया’ (लाल ताग में गुंथल जिमूतवाहनक प्रतीक पहिरावैत छथि आ माथ पर अक्षत-चंदन दऽ कए आशीर्वाद दैत छथि—”दीर्घायु होउ, जुग-जुग जीबू , हर संकट सँ भगवान रक्षा करथु।”
जीतिया केवल व्यक्तिगत व्रत नहि, बल्कि पूरे परिवारक रक्षा-कवच थिक। जाहि घरमे माए जीतिया पावैन करैत छथि, ओहि घरक वातावरणमे एकटा अलौकिक शांति आ पवित्रता पसरि जाइत अछि।
गामक दलान, पोखरिक भींड आ अंगनाक चौका पर जखन महिला सभ जुमि कए पूजा करैत छथि, तखन ओतय केवल अपन संतान नहि, बल्कि पूरे समाजक बच्चा-बुच्ची के कल्याणक लेल प्रार्थना होइत अछि। प्रकृति, पशु-पक्षी (चील्ह-सियारिनी) आ वनस्पति (नोनी साग, झिमनीक पात, कुश) सँ जुड़ल ई पर्व मनुष्य आ प्रकृतिक अन्योन्याश्रित संबंधकेँ सेहो रेखांकित करैत अछि।
माएक छातीमे संजोओल असीम दुलार, नोराएल आँखिमे संतानक उज्जर भविष्यक आस, आ सूखल ओठ सँ निकलल मंगल कामना—इहए थिक जीतिया। ई पावनि संसारक सभ माताक चरणमे साक्षात नमन छी, जिनका त्यागक छाँहमे संतान निश्चिंत भऽ कए जीवनक पथ पर आगू बढ़ैत अछि।
कीर्ति नारायण झा
