श्रीमद्भागवद्गीताक अंग्रेजी अनुवाद
– स्वामी स्वरूपानन्द
(प्रथम अध्यक्ष, वेदान्त आश्रम, मायावती, पिथौड़ागढ़)
हिन्दी एवं मैथिली अनुवादक
– प्रवीण नारायण चौधरी
(मैथिली अभियन्ता एवं संपादक, मैथिली जिन्दाबाद वेब पत्रिका)
प्रस्तुत हिन्दी-मैथिली अनुवाद स्वामी स्वरूपानन्द कृत् अंग्रेजी अनुवादक विलक्षण रसास्वादन लेल मात्र कयल गेल अछि । एहि मशीनी युग मे मशीनक सहयोग सँ ई अनुवाद कार्य स्वयं अनुवादक अपन प्रबोधन आ धियापुताक सम्बोधन सहित प्रस्तुत कयलक । अभीष्ट एतबा छैक जे श्रीमद्भागवद्गीताक सारगर्भित सन्देश केँ सहजता सँ बुझल जा सकय । याद रहय, गीताक स्वाध्याय लेल पूर्ण शान्तचित्त मन हेबाक चाही । उछल-कूद शैली मे गीता केँ अनन्त जन्महु धरि कियो नहि बुझि सकैछ । तेँ एकर अध्ययन क्रमिक, एक-एक श्लोक केँ आपस मे जुड़ल आ क्रमिक रूप मे बुझबाक यत्न जे करब हुनकर जीवन मे समस्त अभीष्ट पूर्ण होयत । सभक लेल शुभकामना !!
हरिः हरः!!
विषय-सूची
*सम्पूर्ण गीता – मूल अंग्रेजी अनुवाद – स्वामी स्वरूपानन्द
१. पहिल अध्यायः अर्जुनक शोक-चिन्ता – The Grief of Arjuna
२. दोसर अध्यायः ज्ञानक मार्ग – The Way of Knowledge
३. तेसर अध्यायः कर्मक मार्ग – The Way of Karma
४. चारिम अध्यायः ज्ञान मे कर्म सँ संन्यासक मार्ग – The Way of Renunciation of Action in Knowledge
५. पाँचम अध्यायः संन्यासक मार्ग – The Way of Renunciation
६. छठम अध्यायः योगक (ध्यानक) मार्ग – The Way of Meditation
७. सातम अध्यायः अनुभूतिक संग ज्ञानक मार्ग – The Way of Knowledge with Realisation
८. आठम अध्यायः अक्षर-ब्रह्मक मार्ग – The Way To the Imperishable Brahman
१०. दसम अध्यायः दिव्य महिमाक झलक – The Glimpses of the Divine Glory
११. एगारहम अध्यायः ब्रह्माण्डीय रूपक दृष्टि – The Vision of the Universal Form
१२. बारहम अध्यायः भक्तिक मार्ग – The Way of Devotion
१३. तेरहम अध्यायः क्षेत्र आ क्षेत्रज्ञक भेद – The Discrimination of the Kshetra and the Ksherajna
१४. चौदहम अध्यायः तीन गुणक भेद – The Discrimination of the Three Gunas
१५. पन्द्रहम अध्यायः परमपिता परमात्माक मार्ग – The Way to the Supreme Spirit
१७. सत्रहम अध्यायः त्रिगुणात्मक श्रद्धाक बारे जिज्ञासा – The Enquiry into the Threefold Sraddha
१८. अठारहम अध्यायः संन्यास मे मुक्तिक मार्ग – The Way of Liberation in Renunciation
*अनिवार्य पठनीयः गीताक माहात्म्य – The Greatness of Gita (A must read chapter)
कोनो जरूरी नहि जे सब केँ विश्वास होयत, लेकिन हमर यैह दृढ़विश्वास अत्यन्त बाल्यकाल सँ रहल जे शास्त्रीय वचन (शिक्षा, सन्देश, आदि) एकहु टा गलत नहि कहैछ । आर हँ, एकर फलित हेबाक वैज्ञानिक कारण सेहो छैक, से कथा हम कोनो आन दिन कहब । नर्व्स सिस्टम आ पल्स केर माध्यम सँ कौस्मिक एनर्जीक शरीरधारी उपयोग करैछ । लेकिन, जेकर मोबाइल के सिमे खराब रहत, ओ कि टावर पकड़त – से वाली बात !!
हरिः हरः!!

15 Comments
Bahut badhiya.
Bahut sundar. Asha karait chhi je harek part group men sajha ko debai. Jahi san ete neek prasang sab padhai k saubhagya prapta het. Gor lagai chhi Bhaiya 🙏🏻
हे विद्वत्वर, साधक हमरा जखैन पलखैति भेटत पढैत चल जायब,अखैन मात्र देखल जे हिन्दी संग मैथिलीयो में , बस सोझहि अप्पन तत्काल भावोद्गार ब्यक्त क रहल छी।
यथोचित सत्कार करैछ अभय।
प्रिय प्रवीण भाई लिंक मे तऽ पूरा आठरह अध्याय के अनुवाद अछि। पूरा पढ़बाक लेल समय चाही। समयाभाव में प्रथम अध्याय अर्जुनक शोक चिन्ता पढ़लहूं चिन्तन सँ जे किछु प्राप्त भेल ओ ई अछि।
शोक सँ शरण धरि : गीताक प्रथम अध्यायमे अर्जुनक आत्मजागरण
कुरुक्षेत्रक रणभूमि मे अर्जुनक धनुषक खसि पड़ब केवल एकटा योद्धाक दुर्बलता नहि छल। ई मनुष्यक अन्तःकरण पर उठल ओहि गहींर प्रश्नक प्रतीक छल, जतय कर्तव्य, मोह, करुणा, सम्बन्ध आऽ धर्म एक-दोसरक सम्मुख ठाढ़ भऽ जाइत अछि। गीताक प्रथम अध्यायक अन्तिम दृश्य मे अर्जुन युद्धभूमि सँ पलायन नहि करैत छथि, बल्कि अपन भीतरक द्वन्द्वक सम्मुख बैसि जाइत छथि। एहि अर्थमे हुनकर विषाद हार नहि, बल्कि आत्मज्ञानक द्वार पर पहुँचबाक पहिल आर्त पुकार अछि।
अर्जुनक आँखि जखन शत्रुक रूपमे नहि, बल्कि पितामह, गुरु, भ्राता, पुत्र, पौत्र, सखा आऽ सम्बन्धीक रूपमे लोकसभ केँ देखलक, तखन गांडीवक भार अचानक असह्य भऽ गेल। युद्धक उत्साह करुणामे बदलि गेल, विजयक आकांक्षा अर्थहीन लगऽ लागल आऽ राज-पाट सेहो अपन आकर्षण गँवा देलक। मनुष्यक भीतरक संवेदना जखन जागि जाइत अछि, तखन बाहरी उपलब्धिक चमक क्षणभरि मे फीका पड़ि जाइत अछि।
मुदा अर्जुनक एहि करुणाक भीतर एकटा सूक्ष्म भ्रम सेहो छल। करुणा पवित्र अछि, मुदा मोह सँ मिश्रित करुणा विवेकक स्थान नहि लऽ सकैत अछि। जे मनुष्य अपन कर्तव्य सँ केवल सम्बन्धक मोहमे विमुख भऽ जाइत अछि, से करुणावान तँ देखाइत अछि, मुदा सत्यक सम्पूर्ण पक्ष केँ नहि देख पबैत अछि। अर्जुनक समस्या ई नहि छल जे हुनकर हृदयमे दया छल, समस्या ई छल जे दयाक आवेगमे हुनकर बुद्धि अपन धर्मनिर्णयक सामर्थ्य हराइत जा रहल छल।
एहि कारणेँ गीताक प्रथम अध्यायक वास्तविक नायक केवल कृष्ण नहि, अर्जुनक विषाद सेहो अछि। विषादे अर्जुन केँ प्रश्न करबाक लेल बाध्य केलक। जखन मनुष्य अपन पुरान उत्तर सभ सँ सन्तुष्ट नहि रहि जाइत अछि, तखन भीतर सँ वास्तविक प्रश्न जन्म लैत अछि। अर्जुनक “हम की करू?” वस्तुतः सम्पूर्ण मानवताक सनातन प्रश्न अछि।
कुरुक्षेत्र केवल बाहरी युद्धभूमि नहि अछि, ई मनुष्यक अन्तःकरणक सेहो कुरुक्षेत्र अछि। प्रत्येक मनुष्यक भीतर मोह आऽ विवेक, स्वार्थ आऽ कर्तव्य, भय आऽ साहस, सम्बन्ध आऽ सत्यक बीच युद्ध चलैत रहैत अछि। कखनो-कखनो हमर गांडीव सेहो हाथ सँ छूटैत अछि जखन जीवनक कठिन निर्णयक क्षण अबैत अछि, जखन प्रिय आऽ उचितक बाट अलग-अलग भऽ जाइत अछि, जखन हृदय एकटा बात कहैत अछि आऽ धर्म दोसर।
अर्जुनक महानता एहि बातमे अछि जे ओ अपन दुर्बलताकेँ छिपौलनि नहि। ओ कृष्णक सम्मुख अपन टूटल मन केँ सम्पूर्ण रूपेँ राखि देलनि। ओ कहलनि जे हमरा विजय नहि चाही, राज्य नहि चाही, सुख नहि चाही। ई वचन एकटा गहींर मानवीय क्षण अछि जखन उपलब्धिक समस्त गणित करुणाक एकटा नोरक बुन्दक आगाँ नगण्य भऽ जाइत अछि।
मुदा कृष्णक मौन उपस्थिति एहि बातक संकेत दैत अछि जे केवल भावना जीवनक अन्तिम सत्य नहि। करुणा केँ विवेक चाही, विवेक केँ धर्म चाही आऽ धर्म केँ निष्काम कर्मक साहस चाही। अर्जुनक विषादक उपचार युद्धक उत्साह नहि, बल्कि सत्यक दर्शन होयत। एहि कारणेँ गीता अर्जुन केँ केवल “लड़ू” नहि कहैत अछि, पहिने हुनकर दृष्टि बदलैत अछि, आत्मा, शरीर, कर्म, धर्म आऽ फल सम्बन्धी मोहक गाँठ फोलैत अछि।
एहि दृष्टिसँ देखल जाय तँ गीताक प्रथम अध्यायक अन्तिम दृश्य अत्यन्त आध्यात्मिक अछि। एकटा महान धनुर्धर अपन अस्त्र रखि देलक, मुदा ओहि क्षण एकटा जिज्ञासु आत्मा जन्म लेलक। रणभूमि मे योद्धा अर्जुन कमजोर पड़लाह, मुदा साधक अर्जुन जागि उठलाह। गांडीव हाथ सँ छूटल, मुदा ज्ञानक द्वार खुलबाक तैयारी भेल।
कखनो जीवनमे ईहो आवश्यक होइत अछि जे मनुष्य अपन गति रोकय, बैसय, भीतर झाँकय आऽ अपनहि सँ पूछय “हम जे कऽ रहल छी, से सत्ये हमर कर्तव्य अछि?” मुदा एहि प्रश्नक उत्तर केवल भावुकता सँ नहि, आत्मचिन्तन सँ भेटैत अछि। अर्जुनक विषाद हमरा सिखबैत अछि जे टूटि पड़ब अन्त नहि, जँ ओहि टूटनक मध्य सँ सत्यक खोज शुरू भऽ जाय, तँ ओही क्षण सँ आध्यात्मिक यात्रा आरम्भ भऽ जाइत अछि।
अतः गीताक प्रथम अध्याय वस्तुतः विषाद सँ विवेक धरि पहुँचबाक प्रस्तावना अछि। अर्जुनक आँखिमे छल करुणाक नोर, हृदयमे छल सम्बन्धक मोह, बुद्धिमे छल संशय आऽ सामने ठाढ़ छलाह कृष्ण, जे शीघ्रे हुनकर विषाद केँ ज्ञानमे, संशय केँ विवेकमे आऽ दुर्बलताकेँ कर्तव्यक प्रकाशमे परिणत करबाक समर्थ्य रखैत छलाह।
कुरुक्षेत्रक युद्ध तखन आरम्भ नहि भेल छल, असल युद्ध तँ अर्जुनक भीतर आरम्भ भऽ गेल छल। आऽ एहि आन्तरिक युद्धक पहिल दृश्यमे मनुष्य अपन सनातन स्वरूपक दर्शन करैत अछि हम सभ कखनो-कखनो अर्जुन छी, हमर जीवनक प्रत्येक कठिन निर्णय एकटा कुरुक्षेत्र अछि, आऽ अन्ततः हमरा सभ केँ अपन भीतरक कृष्णक वाणी सुनबाक साहस करय पड़ैत अछि।
एहि लेल अर्जुनक धनुष खसि पड़ब पराजय नहि ई अहंकारक हाथ सँ विवेकक जन्मक क्षण छल।
आऽ गीताक प्रथम अध्यायक मौन सन्देश यैह अछि जखन मनुष्य अपन भ्रमक भार सँ झुकि जाइत अछि, तखन परमात्माक ज्ञानक लेल ओकर अन्तःकरण तैयार होइत अछि।
अपनेक अनुवाद प्रशंसनीय अछि जाहि के पढ़ला सँ पाठक गण में आत्म आत्मजागरणक द्वार खुलतइन्ह।
प्रणाम
🙏🙏
✍️ दिलीप झा “ललित”
प्रिय दिलीप भाइ, प्रभाकर जी, अभय पाठक सर एवं समस्त रुचि रखनिहार केँ हमर प्रणाम ! क्रमिक रूप सँ पढ़ैत अपने सब अनुवाद कार्य सँ जे किछु हित भ’ सकल, आगाँ आर किछु सुधारक जरूरत बुझाय, त सुझाव जरूर देब ।
श्रीमद्भगवद्गीताक दोसर अध्याय ‘सांख्ययोग’ गीता-दर्शनक ओहि विराट द्वार समान अछि, जतय मोहमे डूबल मनुष्यक चेतना धीरे-धीरे आत्मबोधक प्रकाश दिस उन्मुख होइत अछि। प्रथम अध्यायमे अर्जुनक अन्तर्द्वन्द्व, करुणा, मोह आ विषादक जे घनघोर अन्हार देखाइ पड़ैत अछि, दोसर अध्यायमे श्रीकृष्णक ज्ञानमय उपदेशक आलोकमे ओहि अन्हारक परत-दर-परत क्षय होमय लगैत अछि। एहि दृष्टिएँ ‘ज्ञानक मार्ग’ पर आधारित भाष्यक मैथिली अनुवाद केवल श्लोकक भाषान्तरण नहि, बल्कि भारतीय आत्मचिन्तनक एक गहन परम्पराकेँ मातृभाषाक भावभूमिमे पुनर्जीवित करबाक सार्थक प्रयास प्रतीत होइत अछि।
कोनो भाष्यक अनुवादक वास्तविक सफलता तखन मानल जाइत अछि, जखन ओ मूल ग्रन्थक शब्दक संग-संग ओकर अन्तर्निहित भाव, दर्शन आ आत्मिक स्पन्दन सेहो पाठकक हृदय धरि पहुँचा सकय। गीताक ज्ञानमार्ग अत्यन्त सूक्ष्म आ गम्भीर अछि। ‘आत्मा’, ‘देह’, ‘कर्म’, ‘बुद्धि’, ‘समत्व’, ‘स्थितप्रज्ञता’ आदि शब्द केवल शब्द नहि, बल्कि अपन भीतर पूरा दर्शनक संसार समेटने अछि। एहि दार्शनिक अवधारणाकेँ सरल मैथिलीमे प्रस्तुत करैत ओकर मूल गरिमा अक्षुण्ण राखब निश्चय कठिन साधना अछि। एहि चुनौतीकेँ अनुवादक आदरणीय श्री प्रवीण जी सहजता, सजगता आ गम्भीरताक संग स्वीकार कएने छथि—ई एहि कृतिक विशेष उपलब्धि अछि।
गीताक दोसर अध्यायक मूल सन्देशमे एकटा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बोध अछि—मनुष्य केवल देह नहि, आत्मा अछि। देह परिवर्तनशील अछि, आत्मा नित्य अछि। जन्म आ मृत्यु देहक अवस्था अछि, आत्माक नहि। एहि सत्यक विस्मरणे मनुष्यकेँ मोह, भय, शोक आ आसक्तिक बन्धनमे बाँधि दैत अछि। श्रीकृष्ण अर्जुनकेँ मात्र युद्ध करबाक प्रेरणा नहि दैत छथि; ओ हुनका जीवनक मूल सत्यक साक्षात्कार करबैत छथि। एहि कारणेँ अर्जुनक कुरुक्षेत्र धीरे-धीरे सम्पूर्ण मानवताक अन्तःकरणक कुरुक्षेत्र बनि जाइत अछि।
एहि गूढ़ आध्यात्मिक सन्देशकेँ संस्कृतक शास्त्रीय गम्भीरतासँ निकालि मैथिलीक आत्मीय शब्द-संसारमे स्थापित करब अपनेमे एकटा महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्य अछि। मैथिली अपन प्रकृतिसँ भावप्रधान, आत्मीय आ जीवनसँ जुड़ल भाषा अछि। दर्शन जखन एहि भाषामे उतरैत अछि तऽ ओ केवल बौद्धिक चिन्तन नहि रहि जाइत, बल्कि अनुभवक रूप ग्रहण करैत अछि। ‘आत्मा अमर अछि’—ई वाक्य पढ़ब एक बात अछि; मुदा एहि सत्यकेँ अपन मातृभाषाक सहज स्वरमे अनुभव करब एकदम दोसर बात। एहि अनुवादक सार्थकता एतहि देखाइ पड़ैत अछि।
गीताक ज्ञानमार्गक दोसर महत्वपूर्ण आयाम अछि कर्म आ अनासक्ति। मनुष्यकेँ कर्म करबाक अधिकार अछि, मुदा फलासक्तिसँ मुक्त रहब आवश्यक अछि। एहि सिद्धान्तकेँ मात्र सफलता-असफलताक सामान्य सूत्र मानि लेब गीताक व्यापक दर्शनकेँ सीमित कऽ देब होयत। कर्मयोगक मर्म अछि—कर्तव्य करैत समय मनकेँ फलासक्तिसँ मुक्त राखब। सफलता भेटल तऽ अहंकार नहि, असफलता अएल तऽ निराशा नहि। एहि समत्वमे जे मानसिक दृढ़ता अछि, से आजुक तनावपूर्ण जीवनमे सेहो अत्यन्त प्रासंगिक अछि।
दोसर अध्यायक ‘स्थितप्रज्ञ’ केर अवधारणा एहि ज्ञानमार्गक चरम परिणतिक संकेत दैत अछि। सुखमे उछलि नहि पड़निहार, दुःखमे विचलित नहि होनिहार, राग-द्वेषसँ ऊपर उठल, इन्द्रियकेँ संयमित रखनिहार आ अन्तर्मनमे स्थिर रहनिहार मनुष्य—ई स्थितप्रज्ञता केवल संन्यासीक उपलब्धि नहि, बल्कि गृहस्थ जीवनमे रहि कऽ सेहो साध्य मानसिक अवस्था अछि। एहि सूक्ष्म आध्यात्मिक भावकेँ पाठकक हृदय धरि पहुँचेनाइ अनुवादकक साहित्यिक दक्षताक परिचायक अछि।
गीताक एकटा आओर विलक्षण विशेषता अछि जे ई जीवनसँ पलायन नहि, बल्कि जीवनक बीच जागरण सिखबैत अछि। अर्जुनकेँ रणभूमिसँ भागबाक लेल नहि, बल्कि मोहक अतिक्रमण कऽ अपन धर्म आ कर्तव्यक निर्वाह करबाक लेल प्रेरित कएल जाइत अछि। अर्थात् ज्ञान मनुष्यकेँ संसारसँ विमुख नहि करैत; बल्कि संसारक बीच रहि कऽ अपन उत्तरदायित्वकेँ अधिक निर्मल, निःस्वार्थ आ सजग ढंगसँ पूरा करबाक शक्ति दैत अछि। आजुक समयमे, जखन बाहरी उपलब्धिक अन्धदौड़मे मनुष्य अपन अन्तःशान्ति गुमबैत जा रहल अछि, ई सन्देश आओर अधिक प्रासंगिक भऽ उठैत अछि।
एहि भाष्यक मैथिली अनुवादक एकटा विशेष उपलब्धि ई सेहो अछि जे कठिन आध्यात्मिक विचारकेँ भाषा सरल बनेबाक प्रयास कएल गेल अछि, मुदा सरलताक नामपर विचारकेँ सतही नहि बनाओल गेल अछि। साहित्यक भाषा जखन दर्शनक संवाहक बनैत अछि, तखन प्रत्येक शब्द अपन भीतर अर्थक अनेक तह खोलैत अछि। एहि अर्थमे गीताक भाष्य मैथिलीमे उपलब्ध होयब केवल भाषिक उपलब्धि नहि, बल्कि सांस्कृतिक आ आध्यात्मिक उत्तरदायित्वक निर्वाह सेहो अछि।
वास्तवमे गीताक दोसर अध्याय अर्जुनक कथा कम आ मनुष्यक कथा बेसी अछि। अर्जुनक हाथमे धनुष अछि, मुदा हमर हाथमे आइ जीवनक अनेक उत्तरदायित्व अछि। अर्जुनक सामने कुरुक्षेत्र अछि, मुदा हमर भीतर सेहो मोह, भय, असमंजस, स्वार्थ, सम्बन्ध आ कर्तव्यक संघर्षक अपन-अपन कुरुक्षेत्र अछि। समय बदलल, परिस्थिति बदलल, जीवनक साधन बदलल; मुदा मनुष्यक अन्तर्द्वन्द्व बहुत नहि बदलल। एहि कारणेँ श्रीकृष्णक वाणी आजुक मनुष्यक लेल सेहो ओतबे जीवित आ प्रासंगिक अछि।
एहि अनुवादकेँ पढ़ैत काल एकटा विशेष अनुभूति होइत अछि—हम केवल गीताक श्लोकक अर्थ नहि पढ़ि रहल छी, बल्कि अपन भीतरक अर्जुनकेँ पहचानबाक प्रयास कऽ रहल छी। सम्भवतः एहि ठाम अनुवादक श्री प्रवीण जीक वास्तविक सार्थकता निहित अछि। जँ पुस्तक बन्द कएला पछाति पाठक किछु क्षण लेल अपन भीतर झाँकय लगैत छथि, अपन मोह, भय, कर्तव्य आ जीवनक उद्देश्यपर विचार करय लगैत छथि, तऽ अनुवाद शब्दक सीमा पार कऽ आत्मचिन्तनक यात्रा बनि जाइत अछि।
गीताक ज्ञानक मार्ग अन्ततः बाहरसँ भीतर दिसक यात्रा अछि—शोकसँ बोध धरि, मोहसँ विवेक धरि, अस्थिरतासँ समत्व धरि आ देहबोधसँ आत्मबोध धरि। एहि दृष्टिएँ प्रस्तुत मैथिली अनुवाद संस्कृतक सनातन ज्ञानधाराकेँ मैथिलीक आत्मीय तटसँ जोड़निहार एकटा सुदृढ़ सेतु समान अछि। ई सेतु केवल दू भाषाकेँ नहि, बल्कि शास्त्र आ जीवन, ज्ञान आ अनुभव, शब्द आ आत्मचेतनाक बीच संवाद स्थापित करैत अछि।
विशेष रूपसँ ई प्रयास मैथिली भाषाक सामर्थ्यकेँ सेहो प्रमाणित करैत अछि। मैथिली केवल लोकगीत, कथा, संस्कार आ भावनात्मक अभिव्यक्तिक भाषा नहि; ई दर्शन, अध्यात्म आ गहन चिन्तनकेँ सेहो अपन स्वाभाविक माधुर्य आ आत्मीयताक संग अभिव्यक्त करबाक पूर्ण क्षमता रखैत अछि। गीताक भाष्यक एहि प्रकारक अनुवाद मैथिली साहित्यक क्षितिजकेँ निश्चय व्यापक करैत अछि आ पाठकक आध्यात्मिक संवेदनाकेँ सेहो समृद्ध करैत अछि।
अतः श्री प्रवीण जीक एहि साधनामय प्रयास लेल हृदयसँ साधुवाद। हुनकर लेखनी एही प्रकारेँ शास्त्रक प्रकाशकेँ मातृभाषाक दीपसँ जन-जन धरि पहुँचबैत रहय, मैथिलीक साहित्यिक आ आध्यात्मिक अभिव्यक्तिकेँ नव आयाम दैत रहय—एहि मंगलकामनाक संग हुनका हार्दिक अभिनन्दन आ शुभकामना।
अन्ततः कहि सकैत छी जे गीताक दोसर अध्याय पढ़ब ज्ञान प्राप्त करबाक आरम्भ भऽ सकैत अछि, मुदा ओकर मर्मकेँ जीवनमे उतारब ज्ञानक वास्तविक आरम्भ अछि। एहि भाष्यक अनुवाद जँ पाठकक मनमे ई प्रश्न जगा दैत अछि—‘हम के छी? हमर कर्तव्य की अछि? आ हमर जीवनक सत्य कतय अछि?’—तऽ ई अनुवाद अपन उद्देश्य प्राप्त कऽ चुकल अछि।
श्लोकक शब्द एक दिन समाप्त भऽ सकैत अछि, पुस्तकक पन्ना सेहो बन्द भऽ सकैत अछि; मुदा आत्मबोधक यात्रा तखने आरम्भ होइत अछि। एहि अर्थमे ‘ज्ञानक मार्ग’ केवल गीताक दोसर अध्यायक भाष्य नहि, बल्कि अपन भीतरक कुरुक्षेत्रसँ आत्मप्रकाश दिस बढ़बाक एकटा आत्मीय आमन्त्रण अछि।
🙏🙏
✍️ दिलीप झा “ललित”
श्रीमद्भगवद्गीताक तेसर अध्याय ‘कर्मयोग’ मनुष्यक जीवनमे कर्मक महत्ता, कर्तव्यक गरिमा आ निष्काम भावक आध्यात्मिक अर्थकेँ अत्यन्त गहींर ढंगसँ उद्घाटित करैत अछि। गीताक पहिल अध्यायमे अर्जुनक विषाद छल, दोसर अध्यायमे श्रीकृष्ण हुनका आत्मज्ञान आ सांख्ययोगक आलोक देखौलनि, मुदा तेसर अध्यायमे ओहि ज्ञानकेँ जीवनक व्यवहारमे उतारबाक बाट देखबैत छथि। एतय प्रश्न केवल ई नहि अछि जे “ज्ञान श्रेष्ठ अछि कि कर्म?”, बल्कि मूल प्रश्न ई अछि जे ज्ञान प्राप्त कऽ मनुष्य कर्मसँ विमुख होय अथवा कर्मकेँ योगक रूपमे स्वीकार करय?
श्री प्रवीण नारायण चौधरी द्वारा प्रस्तुत गीताक तेसर अध्यायक मैथिली अनुवाद एहि दार्शनिक प्रश्नकेँ मातृभाषाक सहज, आत्मीय आ सांस्कृतिक धरातल पर बुझबाक एकटा महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान करैत अछि। संस्कृतक गूढ़ श्लोककेँ मैथिलीमे रूपान्तरित करब केवल भाषान्तरणक काज नहि; ई एक प्रकारक भावानुवाद, दर्शनानुवाद आ संस्कृतिसँ संस्कृतिक सेतुनिर्माण सेहो अछि। एहि दृष्टिसँ ई अनुवाद मैथिली पाठकक लेल विशेष महत्त्व रखैत अछि।
तेसर अध्यायक मूल स्वर अछि—कर्म करैत रहू, मुदा कर्मक फलमे आसक्ति नहि राखू। श्रीकृष्ण अर्जुनकेँ कर्मत्यागक बाट नहि देखबैत छथि; बल्कि ओ बुझबैत छथि जे मनुष्य कर्मसँ पूर्णतः मुक्त भऽ नहि सकैत अछि। प्रकृतिक गुण मनुष्यकेँ कर्म दिस प्रेरित करैत अछि। अतः कर्मसँ भागब जीवनक समाधान नहि, बल्कि कर्मकेँ शुद्ध, संयमित आ लोकहितकारी बनायब वास्तविक साधना अछि।
श्री प्रवीण नारायण चौधरीक मैथिली प्रस्तुति एहि भावकेँ पाठकक अन्तर्मन धरि पहुँचाबयमे सफल प्रतीत होइत अछि। मैथिली भाषा अपन सहज आत्मीयता आ लोकजीवनसँ जुड़ल संवेदनशीलताक कारण गूढ़ आध्यात्मिक विचारकेँ सेहो अपन बनाबयक अद्भुत क्षमता रखैत अछि। जखन गीता ‘कर्म’क बात करैत अछि, तऽ मैथिली पाठकक मनमे अपन गामक किसान, अपन काजमे निमग्न गृहस्थ, शिक्षक, श्रमिक, समाजसेवी—सभक छवि सहजहि उभरि अबैत अछि। एहि कारणेँ कर्मयोगक दर्शन पुस्तकक पन्नासँ निकलि जीवनक आँगनमे आबि ठाढ़ भऽ जाइत अछि।
तेसर अध्यायक एकटा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पक्ष अछि यज्ञभाव। श्रीकृष्णक दृष्टिमे कर्म केवल व्यक्तिगत लाभक साधन नहि, बल्कि एकटा व्यापक सामाजिक आ ब्रह्माण्डीय व्यवस्था संग जुड़ल दायित्व अछि। मनुष्य जखन अपन कर्मकेँ केवल ‘हमर’ लाभ-हानि तक सीमित नहि राखि व्यापक कल्याणक भावसँ करैत अछि, तखन कर्म योग बनैत अछि। एहि सन्दर्भमे मैथिली अनुवादक महत्व आरो बढ़ि जाइत अछि, कारण मिथिलाक लोकजीवनमे ‘अपन लेल’ सँ अधिक ‘सभक लेल’क संस्कार प्राचीन समयसँ रहल अछि।
कर्मयोगक दोसर विराट आयाम अछि लोकसंग्रह। श्रेष्ठ व्यक्ति जे आचरण करैत छथि, समाज प्रायः तकर अनुसरण करैत अछि। एहि कारणेँ श्रीकृष्ण अर्जुनकेँ केवल अपन मुक्ति लेल कर्म करबाक नहि, बल्कि समाजक व्यवस्था आ लोकहितक लेल सेहो कर्म करबाक प्रेरणा दैत छथि। आइक समयमे एहि शिक्षाक प्रासंगिकता अत्यन्त बढ़ि गेल अछि। अधिकारक प्रति सजग समाजमे कर्तव्यक चेतना कमजोर पड़ैत जा रहल अछि। प्रत्येक व्यक्ति अपन अधिकारक चर्चा करैत अछि, मुदा अपन दायित्वक प्रश्नसँ कतिपय बेर मुँह मोड़ि लैत अछि। एहन समयमे कर्मयोगक संदेश जीवनक दिशासूचक बनि सकैत अछि।
एहि अनुवादक विशेष प्रशंसनीय पक्ष ई अछि जे ई पाठककेँ केवल श्लोकक अर्थ बुझाबैत नहि, बल्कि कर्मक प्रति एकटा नव दृष्टि देबाक प्रेरणा सेहो दैत अछि। कर्मयोगक मूल रहस्य फलत्यागमे अछि, कर्मत्यागमे नहि। मनुष्यक अधिकार कर्म पर अछि, फल पर नहि—ई विचार जीवनक निराशा, अपेक्षा आ असफलताजन्य मानसिक बोझकेँ हलुक करबाक सामर्थ्य रखैत अछि।
मैथिलीमे गीताक अनुवाद करबाक चुनौती सेहो कम नहि। संस्कृतक प्रत्येक शब्दक पाछाँ दार्शनिक अर्थक एकटा विराट संसार अछि। ‘कर्म’, ‘अकर्म’, ‘विकर्म’, ‘यज्ञ’, ‘लोकसंग्रह’, ‘स्वधर्म’, ‘निष्कामता’ जेकाँ शब्द सभकेँ केवल शब्दार्थसँ पकड़ब सम्भव नहि। हुनकर अन्तर्निहित भावकेँ पाठक धरि पहुँचेनाइ आवश्यक अछि। एहि दृष्टिसँ श्री प्रवीण चौधरीक प्रयास मैथिली भाषाक आध्यात्मिक शब्द-सामर्थ्यकेँ समृद्ध करबाक दिशामे सेहो एकटा सार्थक योगदान मानल जा सकैत अछि।
एहि अनुवादक संग संवाद करैत पाठकक मनमे एकटा स्वाभाविक प्रश्न उठैत अछि—आइ हमर कर्मक आधार की अछि? कर्तव्य कि स्वार्थ? सेवा कि प्रदर्शन? साधना कि परिणामक अपेक्षा? गीता एहि प्रश्नक उत्तर बाहर नहि, भीतर खोजबाक प्रेरणा दैत अछि।
वस्तुतः कर्मयोग केवल अर्जुन लेल रणभूमिक उपदेश नहि अछि। ई प्रत्येक युगक प्रत्येक मनुष्य लेल जीवन-दर्शन अछि। शिक्षक अपन शिक्षणकेँ साधना मानथि, चिकित्सक अपन सेवाकेँ दायित्व मानथि, किसान अपन श्रमकेँ यज्ञ मानथि, अधिकारी अपन पदकेँ लोकसेवाक माध्यम बुझथि आ गृहस्थ अपन दैनिक कर्तव्यकेँ ईश्वरार्पणक भावसँ करथि—तऽ कर्म धीरे-धीरे योगमे रूपान्तरित भऽ सकैत अछि।
श्री प्रवीण चौधरीक मैथिली अनुवाद एहि अर्थमे केवल गीताक तेसर अध्यायक भाषिक रूपान्तरण नहि, बल्कि मैथिली पाठककेँ अपन मातृभाषामे गीता-दर्शनक पुनः आस्वादन करबाक निमंत्रण अछि। एहि प्रयास लेल हुनका साधुवाद देबाक संग-संग ई अपेक्षा सेहो स्वाभाविक अछि जे गीताक अन्य अध्याय सेहो एही भाव-गम्भीरता, भाषिक माधुर्य आ दार्शनिक स्पष्टताक संग मैथिली पाठक धरि पहुँचैत रहय।
अन्ततः कर्मयोगक सारकेँ एकटा पाँतिमे कहब तऽ—
कर्मसँ भागब नहि, कर्मकेँ पवित्र करब;
फलसँ जुड़ब नहि, कर्तव्यसँ जुड़ब;
अपन लेल नहि, लोकहित लेल कर्म करब—
एहने कर्मक साधना मनुष्यकेँ कर्मयोगक पथ पर लऽ जाइत अछि।
श्री प्रवीण चौधरीक एहि मैथिली अनुवादक माध्यमसँ गीता फेर एक बेर हमर अपन भाषा, अपन संस्कार आ अपन जीवनक निकट आबि ठाढ़ होइत अछि। एहि लेल ई प्रयास निश्चय रूपेँ मैथिली साहित्य, अध्यात्म आ सांस्कृतिक चेतनाक त्रिवेणीमे एकटा स्वागतयोग्य अवदान अछि।
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✍️ दिलीप झा “ललित”
सादर आभार भाइ । अपने गम्भीरतापूर्वक सब अध्याय केर समीक्षा कय रहल छी, प्रणम्य छी ।
श्रीमद्भगवद्गीताक चतुर्थ अध्याय ‘ज्ञान-कर्म-संन्यास योग’ गीता-दर्शनक ओहि महत्त्वपूर्ण सोपान समान अछि, जतय कर्म, ज्ञान आ संन्यास तीनू एक-दोसरसँ पृथक नहि, बल्कि एकहि आध्यात्मिक यात्राक परस्पर पूरक पड़ाव बनि जाइत अछि। श्री प्रवीण चौधरी द्वारा प्रस्तुत एहि अध्यायक मैथिली अनुवाद एहि गूढ़ दार्शनिक भावभूमिकेँ अपन मातृभाषाक सहज, सरस आ आत्मीय शब्दावलीमे पाठकक अन्तर्मन धरि पहुँचयबाक सार्थक प्रयास प्रतीत होइत अछि।
गीता स्वयं केवल धर्मग्रन्थ नहि, बल्कि मनुष्यक अन्तःकरणमे उठैत अनन्त प्रश्नक संवाद अछि। चतुर्थ अध्यायमे भगवान श्रीकृष्ण अर्जुनकेँ कर्मक रहस्य बुझबैत कहैत छथि जे कर्मक वास्तविक मूल्य केवल बाहरी क्रियामे नहि, बल्कि कर्मक पाछाँ रहल ज्ञान, भावना आ निष्काम चेतनामे निहित अछि। एहि सूक्ष्म भावकेँ मैथिलीमे रूपान्तरित करब सहज काज नहि। कारण, संस्कृतक दार्शनिक शब्दावलीमे जे बहुस्तरीय अर्थ-संकेत निहित अछि, तकर आत्मा बचबैत मातृभाषाक स्वाभाविक माधुर्य कायम राखब अनुवादक लेल चुनौतीपूर्ण काज अछि।
श्री चौधरीक अनुवादक विशेषता एहि ठाम देखाइ पड़ैत अछि जे भाषा केवल शब्दक आवरण नहि बनैत, बल्कि भावक संवाहक बनि उठैत अछि। मैथिली अपन स्वभावतः कोमल, आत्मीय आ भावसमृद्ध भाषा अछि। ताहि कारणेँ गीताक उपदेश जखन मैथिलीमे उतरैत अछि, तखन कृष्णक वाणीमे एकटा अपनत्वक स्पर्श अनुभव होइत अछि—मानू कुरुक्षेत्रक रणभूमि दूर नहि, बल्कि हमरहि अन्तर्मनक द्वन्द्वक बीच भगवान हमरा सँ संवाद कऽ रहल छथि।
चतुर्थ अध्यायक एकटा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पक्ष अछि—कर्ममे अकर्म आ अकर्ममे कर्म देखबाक दृष्टि। सामान्य मनुष्य कर्मकेँ केवल क्रिया मानैत अछि, मुदा गीता कर्मकेँ चेतनाक धरातल पर स्थापित करैत अछि। कर्म करैत हुए कर्मक फलसँ अनासक्त रहब, अपन कर्तव्यकेँ यज्ञक भावसँ सम्पन्न करब आ अहंकारसँ मुक्त रहब—ई दर्शन आधुनिक जीवनमे सेहो ओतबे प्रासंगिक अछि। श्री चौधरीक मैथिली प्रस्तुति एहि दुरूह विचारकेँ पाठकीय ग्रहणशीलताक निकट अनबाक प्रयत्न करैत अछि।
एहि अध्यायमे ‘ज्ञान’ केवल पुस्तकमे संचित सूचना नहि अछि। ई ओ अन्तर्दृष्टि अछि जे मनुष्यकेँ कर्मक वास्तविक स्वरूपसँ परिचित करबैत अछि। ज्ञानक अग्नि कर्मक बन्धनकेँ भस्म करैत अछि—ई प्रतीकात्मकता गीता-दर्शनक अत्यन्त सुन्दर पक्ष अछि। मैथिलीमे एहि भावक प्रस्तुति पाठककेँ केवल श्लोकक अर्थ नहि बुझबैत, बल्कि ज्ञानक ताप आ आत्मबोधक उजास अनुभव करबाक अवसर सेहो दैत अछि।
चतुर्थ अध्यायक केन्द्रमे भगवानक अवतार-तत्त्व सेहो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। जखन धर्मक क्षय आ अधर्मक अभ्युत्थान होइत अछि, तखन धर्मक संस्थापन लेल दिव्य शक्ति अवतरित होइत अछि। एहि अवधारणाकेँ केवल पौराणिक आख्यान मानि छोड़ि देब गीता-दर्शनक व्यापकता घटा देब होयत। एकर गूढ़ अर्थ ईहो अछि जे जखन मनुष्यक अन्तःकरणमे सत्य दबि जाइत अछि आ असत्य प्रबल भऽ उठैत अछि, तखन भीतरक विवेकक पुनर्जागरण आवश्यक भऽ जाइत अछि। एहि दृष्टिसँ कृष्णक अवतार केवल ऐतिहासिक घटना नहि, बल्कि सतत जाग्रत होइत धर्मचेतनाक प्रतीक बनि जाइत छथि।
श्री प्रवीण चौधरीक अनुवादक प्रशंसनीय पक्ष ई अछि जे मैथिलीक सहज प्रवाहक माध्यमसँ एहि दार्शनिक विमर्शकेँ पाठकक अनुभव-जगतक समीप आनबाक चेष्टा कएल गेल अछि। भाषा जतय कठिन दार्शनिक अवधारणाकेँ बोझिल बनेबाक सम्भावना रखैत अछि, ततय सरलता आ भाव-संगति अनुवादकेँ पठनीय बनबैत अछि। अनुवादक लेल मूल ग्रन्थक भाव-सत्य, अर्थ-सत्य आ भाषिक सौन्दर्य—तीनूकेँ एक संग साधब आवश्यक होइत अछि; एहि दिशामे ई प्रस्तुति उल्लेखनीय प्रयास कहल जा सकैत अछि।
गीता कहैत अछि जे कर्म सँ भागब संन्यास नहि। वास्तविक संन्यास तऽ कर्मक फलमे आसक्तिक त्याग अछि। एहि अर्थमे संन्यास जीवनसँ पलायन नहि, बल्कि जीवनक बीचमे रहि कऽ अहंकार, आसक्ति आ फलाकांक्षासँ ऊपर उठबाक साधना अछि। ई विचार आजुक समयमे विशेष रूपसँ प्रासंगिक अछि, जतय सफलता प्रायः परिणामसँ मापल जाइत अछि आ कर्मक पवित्रता पाछाँ छूटि जाइत अछि।
एहि चतुर्थ अध्यायक मैथिली अनुवादक पाठ हमरा एकटा महत्त्वपूर्ण सत्य दिस फेर सँ देखबैत अछि—ज्ञान कर्मकेँ दिशा दैत अछि आ निष्काम कर्म ज्ञानकेँ जीवनमे प्रतिष्ठित करैत अछि। केवल ज्ञान संग्रह करब पर्याप्त नहि; ज्ञान जखन आचरणमे उतरैत अछि, तखने ओकर सार्थकता अछि। आ कर्म जखन विवेकसँ संचालित होइत अछि, तखन ओ बन्धन नहि, मुक्ति-पथ बनि जाइत अछि।
समग्रतः श्री प्रवीण चौधरी द्वारा प्रस्तुत ‘ज्ञान-कर्म-संन्यास योग’क मैथिली अनुवाद केवल भाषान्तरणक प्रयास नहि, बल्कि गीता-दर्शनकेँ मैथिली पाठकक अन्तर्मनमे पुनः प्रतिष्ठित करबाक एकटा सार्थक साहित्यिक-सांस्कृतिक उपक्रम अछि। एहि प्रस्तुति माध्यमसँ संस्कृतक कालजयी दर्शन मैथिली मातृभाषाक आत्मीय आँगनमे आबि कऽ नव अर्थक प्रकाश फैलाबैत अछि।
कुरुक्षेत्रक रणभूमि सँ उठल कृष्णक वाणी,
मैथिलीक माधुर्यमे जखन होइत अछि पुरान,
तऽ श्लोक केवल पढ़ल नहि जाइत
ओ भीतरक मौनमे उतरि जाइत अछि।
श्री प्रवीण चौधरीक ई अनुवाद-यात्रा एहि अर्थमे स्वागतयोग्य अछि जे ई गीता-पाठकेँ केवल भाषाक सीमा धरि नहि राखैत, बल्कि ज्ञानकेँ जीवनक कर्मसँ आ कर्मकेँ आत्मबोधसँ जोड़बाक एकटा सेतु निर्मित करैत अछि। एहि सेतुक माध्यमसँ मैथिली पाठक गीता केँ पढ़ैत नहि मात्र छथि, बल्कि ओकर दर्शनकेँ अपन जीवनक प्रश्नक उत्तरक रूपमे अनुभव करबाक अवसर पबैत छथि।
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‘संन्यास-योग’क मैथिली रूपान्तरण : श्री प्रवीण चौधरीक अनुवादक आलोचनात्मक मूल्यांकन
(समीक्षा सह प्रतिक्रियात्मक आलेख)
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन-परम्पराक ओ अमर ग्रन्थ थिक, जतय लौकिक जीवनक जटिलता आ पारमार्थिक चेतनाक उदात्तता एकहि दार्शनिक धरातल पर समन्वित भऽ जाइत अछि। ई केवल धर्मोपदेशक संहिता नहि, अपितु मानव-अस्तित्वक अन्तःसंघर्ष, कर्तव्य-बोध, आत्मस्वरूप, कर्म, ज्ञान, त्याग आ मोक्षक बहुआयामी विमर्शक विश्वकोश थिक। कुरुक्षेत्रक रणभूमि एहि अर्थमे मात्र ऐतिहासिक युद्धभूमि नहि, बल्कि मनुष्यक अन्तःकरणक प्रतीकात्मक रंगभूमि थिक जतय मोह आ विवेक, आसक्ति आ अनासक्ति, कर्तव्य आ पलायन, अहंकार आ आत्मबोधक सनातन द्वन्द्व निरन्तर प्रवाहमान अछि।
एहि विराट दार्शनिक परिप्रेक्ष्यमे पंचम अध्याय ‘संन्यास योग’क महत्ता विशेष रूपेण उद्घाटित होइत अछि। कर्म-संन्यास आ कर्मयोगक परस्पर सम्बन्धक सूक्ष्म विवेचन करैत ई अध्याय मनुष्य केँ बाह्य परित्यागक अपेक्षा अन्तःकरणक आसक्ति-परित्याग दिस उन्मुख करैत अछि। अतः एहि अध्यायक मैथिली अनुवाद केवल भाषिक रूपान्तरण नहि, बल्कि एकटा गम्भीर दार्शनिक पुनर्सृजनक अपेक्षा रखैत अछि।
एहि दुष्कर साधनाक परिप्रेक्ष्यमे श्री प्रवीण चौधरी द्वारा प्रस्तुत मैथिली अनुवाद उल्लेखनीय प्रतीत होइत अछि।
शास्त्रीय ग्रन्थक अनुवादक प्रथम चुनौती शब्दक समतुल्यता नहि, बल्कि मूलक तत्त्वचेतना केँ लक्ष्यभाषामे पुनर्स्थापित करब थिक। संस्कृतक एक-एक पद अपन भीतर बहुस्तरीय अर्थ-संरचना, सांस्कृतिक संकेत आ दार्शनिक व्यञ्जना समेटने अछि। ‘संन्यास’, ‘कर्म’, ‘ज्ञान’, ‘त्याग’, ‘अनासक्ति’, ‘ब्रह्म’ अथवा ‘निर्वाण’ सन पद सभक केवल कोशगत प्रतिशब्द देलासँ मूलार्थक सम्पूर्णता प्राप्त नहि भऽ सकैत अछि।
श्री चौधरीक अनुवादक प्रशंसनीय पक्ष ई अछि जे ओ शब्दक बाह्य देह सँ अधिक ओकर भावात्मक आ दार्शनिक आत्मा केँ ग्रहण करबाक प्रयत्न करैत छथि। फलतः अनुवादमे मूल गीता केर उपदेशात्मक ओज, तात्त्विक गाम्भीर्य आ आत्मसंवादी स्वरक एकरूपता बनल रहैत अछि।
ई अनुवाद पाठक केँ संस्कृत मूलसँ विमुख नहि करैत, उल्टे मैथिली माध्यमसँ मूलक अन्तर्निहित अर्थलोकमे प्रवेश करबाक सेतु निर्मित करैत अछि। एहि दृष्टिए ई अनुवाद ‘भाषान्तरण’ सँ आरो बढ़ि भावान्तरण आ तत्त्वान्तरणक स्वरूप ग्रहण करैत अछि।
पंचम अध्यायक मूल दार्शनिक तनाव कर्म-संन्यास आ कर्मयोगक मध्य स्थित अछि। सामान्य लौकिक चेतनामे संन्यासक अर्थ कर्म-परित्याग अथवा सांसारिक निवृत्ति रूपेण ग्रहण कएल जाइत अछि, किन्तु गीता एहि संकीर्ण अवधारणाक अतिक्रमण करैत अछि।
गीता केर दृष्टिमे वास्तविक संन्यास बाह्य कर्मक परित्याग नहि, बल्कि कर्मफलप्रतिक आसक्ति, कर्तृत्वाभिमान आ अहंकारक क्षय थिक। मनुष्य संसारक मध्य रहि कऽ सेहो यदि कर्म केँ यज्ञभावसँ सम्पन्न करैत अछि आ ओकर फलमे स्वत्वक आग्रह नहि रखैत अछि, तँ ओ कर्ममे स्थित भऽ कऽ सेहो संन्यस्त थिक।
श्री चौधरीक मैथिली प्रस्तुति एहि सूक्ष्म दार्शनिक अन्तर केँ पाठकीय चेतनामे प्रतिष्ठित करबाक प्रयत्न करैत अछि। एहि कारणे ‘संन्यास योग’ एकटा निष्क्रिय निवृत्तिवादक प्रतिपादन नहि रहि जाइत, बल्कि सक्रिय जीवनमे अन्तर्मुक्तिक साधना बनि उठैत अछि।
पंचम अध्याय केर आरो एकटा महत्त्वपूर्ण दार्शनिक उपलब्धि कर्म आ ज्ञानक मध्य कृत्रिम विरोध केँ निरस्त करब थिक। गीता कर्म केँ ज्ञानक प्रतिपक्ष नहि मानैत अछि। यथार्थ ज्ञान कर्म केँ परिष्कृत करैत अछि आ निष्काम कर्म ज्ञानक अन्तःभूमि केँ निर्मल करैत अछि।
एहि सन्दर्भमे अनुवादकक भाषिक दृष्टि विशेष ध्यानाकर्षक अछि। दार्शनिक गूढ़ता केँ ज्यों-के-त्यों मैथिलीमे आरोपित करबाक बदला ओकरा मैथिलीक स्वाभाविक वाक्य-विन्यास, पद-लालित्य आ भाव-संवेदना सँ समन्वित करबाक प्रयत्न कएल गेल अछि। फलतः दर्शन ‘शुष्क सिद्धान्त’ नहि बनि पाठकक आत्मानुभूतिक विषय बनबाक सम्भावना अर्जित करैत अछि।
यैह एहि अनुवादक वास्तविक सार्थकता थिक गीता केँ पढ़ल नहि, गीता केँ भीतर घटित होइत अनुभव करबाक वातावरण निर्मित करब।
श्री चौधरीक अनुवादक भाषिक धरातल पर संस्कृतनिष्ठ शब्दावली आ मैथिली केर स्वाभाविक माधुर्यक मध्य एकटा संतुलित सामञ्जस्य दृष्टिगोचर होइत अछि। ई संतुलन विशेष महत्त्वपूर्ण अछि, कारण अत्यधिक संस्कृतनिष्ठता अनुवाद केँ सामान्य पाठकसँ दूर कऽ सकैत अछि आ अत्यधिक लोकाभिमुख सरलता मूलक दार्शनिक गरिमामे क्षरण आनबाक आशंका उत्पन्न करैत अछि।
अनुवादक एहि द्वन्द्वक बीच जे मध्यपथ ग्रहण कएने छथि, ओ साहित्यिक दृष्टिए प्रशंसनीय अछि। भाषा नितान्त पाण्डित्यप्रदर्शनक माध्यम नहि बनैत आ नहिये मूल दर्शनक गाम्भीर्य केँ लोकप्रचलित सहजताक नाम पर सरलीकृत करैत अछि।
मैथिलीमे गीता केर दर्शनक ई अवतरण वस्तुतः भाषाक सामर्थ्यक सेहो उद्घोषणा थिक। ई प्रमाणित करैत अछि जे मैथिली केवल लोकगीत, प्रेम, विरह आ संस्कारक भाषा मात्र नहि, बल्कि उच्चतम दार्शनिक विमर्शक अभिव्यक्ति लेल सेहो समर्थ भाषा थिक।
शास्त्रीय अनुवादमे अनुवादक स्वयं एकटा अदृश्य साधक होइत छथि। हुनकर व्यक्तित्वक आग्रह मूल ग्रन्थक स्वर पर हावी नहि हो, आ मूलक जटिलता लक्ष्यभाषाक कृत्रिमता मे विलीन नहि हो ई दुनू बातक मध्य संतुलन आवश्यक अछि।
श्री प्रवीण चौधरीक प्रयासमे एहि अनुवादकीय संयमक आभास भेटैत अछि। ओ मूलक ऊपर अपन वैचारिक आधिपत्य स्थापित करबाक अपेक्षा ओकर तात्त्विक स्वर केँ मैथिलीमे प्रतिध्वनित करबाक प्रयास करैत छथि। एहि कारणे पाठक अनुवादकक हस्तक्षेपक अपेक्षा गीता केर आत्मस्वरक समीप पहुँचैत अछि।
तथापि शास्त्रीय कृतिक दीर्घजीविता लेल भविष्यक संस्करण सभमे कठिन दार्शनिक पदक संक्षिप्त टीका, प्रसंग-व्याख्या, पदान्वय अथवा तात्त्विक टिप्पणी जोड़ल जाए तँ एहि अनुवादक व्याख्यात्मक क्षमता आरो विस्तृत भऽ सकैत अछि। विशेषतः नव पीढ़ीक पाठक लेल ई अतिरिक्त उपकरण उपयोगी सिद्ध भऽ सकैत अछि।
मैथिली साहित्यक इतिहास मूलतः लोक आ शास्त्र, भक्ति आ दर्शन, गीत आ गद्य, संवेदना आ चिन्तनक समन्वित परम्परा रहल अछि। विद्यापतिक पदावली सँ लऽ कऽ आधुनिक मैथिली साहित्य धरि आध्यात्मिकता आ मानवीय संवेदनाक एकटा अखण्ड अन्तर्धारा देखाइत अछि।
एहि परम्परामे गीता केर मैथिली अनुवाद एकटा महत्त्वपूर्ण कड़ी जोड़ैत अछि। ई केवल पाठक लेल एकटा पवित्र ग्रन्थक सुलभ संस्करण नहि, बल्कि मैथिली भाषाक दार्शनिक अभिव्यक्ति क्षमताक प्रमाणपत्र सेहो थिक।
विशेषतः वर्तमान समयमे, जतय भाषा अपन पाठकीय आधारक विस्तार लेल संघर्षरत अछि, ताहि समयमे शाश्वत ज्ञान परम्पराक कृति सभकेँ मातृभाषामे उपलब्ध करेनाय सांस्कृतिक संरक्षणक एकटा सशक्त माध्यम बनि सकैत अछि।
समग्रतः श्री प्रवीण चौधरीक ‘गीताक पंचम अध्याय “संन्यास योग’क” मैथिली अनुवाद केँ एकटा दार्शनिक, भाषिक आ सांस्कृतिक साधना रूपेण देखल जा सकैत अछि। एहि अनुवादक सार्थकता केवल एहि बातमे नहि जे संस्कृत श्लोकक अर्थ मैथिली पाठक धरि पहुँचल, बल्कि एहि बातमे अछि जे कर्म, त्याग, ज्ञान आ अनासक्तिक शाश्वत विमर्श मैथिलीक आत्मीय भाषिक परिवेशमे पुनः स्पन्दित भेल।
गीता कहैत अछि जे कर्मक मध्य रहि कऽ सेहो मनुष्य अनासक्त भऽ सकैत अछि। एहि अनुवादक साहित्यिक अर्थ सेहो किछु एहनहि अछि मूलसँ निष्ठावान रहि कऽ लक्ष्यभाषाक स्वतन्त्र आत्मा केँ जागृत करब।
अन्ततः कहि सकैत छी जे श्री प्रवीण चौधरीक ई प्रयास मैथिलीमे गीता केर केवल भाषिक प्रतिरूप प्रस्तुत करैत नहि देखाइत, ई एकटा एहन आध्यात्मिक भाषिक पुनर्जागरणक संकेत दैत अछि, जतय संस्कृतक सनातन तत्त्व मैथिलीक मृदुल कण्ठसँ नव स्वर ग्रहण करैत अछि।
गीता केर अमर सन्देश…
कर्ममे स्थित रहू, किन्तु कर्मफलमे आसक्त नहि होऊ,
संसारमे रहू, किन्तु संसार केँ अन्तःकरण पर आधिपत्य नहि करऽ दिअ,
ज्ञान अर्जित करू, किन्तु ज्ञानक अहंकार सँ सेहो मुक्त रहू एहि त्रयीमे ‘संन्यास योग’क आत्मा निहित अछि।
आ श्री प्रवीण चौधरीक मैथिली अनुवाद एहि आत्माक भाषिक आवास निर्मित करबाक दिशामे एकटा स्तुत्य, सार्थक आ साहित्यिक रूपेण महत्त्वपूर्ण प्रयास थिक।
एहि साधनाक लेल अनुवादक आदरणीय श्री प्रवीण जी केँ साधुवाद किएक तँ शास्त्रक अनुवाद तखनहि सफल होइत अछि, जखन शब्द बदलैत अछि, मुदा सत्य नहि, भाषा बदलैत अछि, मुदा भाव नहि, आ पाठ बदलैत अछि, मुदा प्रकाश नहि।
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✍️ दिलीप झा “ललित”
योग-साधनाक आन्तरिक आलोक : श्री प्रवीण चौधरीक मैथिली अनुवादमे गीताक छठम अध्यायक समीक्षात्मक अनुशीलन
श्रीमद्भगवद्गीताक छठम अध्याय ‘आत्मसंयम योग’ अथवा ‘ध्यानयोग’ भारतीय आध्यात्मिक चिन्तनक ओ उज्ज्वल सोपान अछि, जतय बाह्य कर्मसँ अन्तरात्माक साधनाक दिशामे मानवक यात्रा प्रारम्भ होइत अछि। एतय योग केवल शारीरिक क्रिया नहि, अपितु मन, बुद्धि, इन्द्रिय आ आत्माक सामंजस्यक दिव्य विज्ञान बनि कऽ प्रकट होइत अछि। श्री प्रवीण चौधरी द्वारा प्रस्तुत एहि अध्यायक मैथिली अनुवाद एहि आध्यात्मिक विमर्शकेँ लोकभाषाक सहजता आ साहित्यिक गरिमाक संग पाठक धरि पहुँचयबाक एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक प्रयास अछि।
गीता कहैत अछि “उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्” अर्थात मनुष्य स्वयं अपन उत्थानक कारण बनय, पतनक नहि। श्री प्रवीण चौधरी एहि गूढ़ तत्त्वज्ञानकेँ मैथिली भाषामे एहन सरल, स्वाभाविक आ अर्थगर्भित शैलीमे प्रस्तुत करैत छथि जे पाठक केवल शब्द नहि पढ़ैत छथि, बल्कि आत्म-अनुशासनक ओ दिव्य आह्वान अनुभव करैत छथि। श्री प्रवीण भाषिक स्पष्टताक संग मूल भावक पवित्रता बनौने छथि, जे कोनो आध्यात्मिक अनुवादक लेल सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण काज होइत अछि।
छठम अध्यायक केन्द्रबिन्दु अछि मनक संयम। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुनकेँ कहैत छथि जे चञ्चल मनकेँ अभ्यास आ वैराग्य द्वारा वशमे कयल जा सकैत अछि। श्री चौधरीक अनुवादमे ‘अभ्यास’ आ ‘वैराग्य’ जेकाँ दार्शनिक शब्द केवल भाषान्तरित नहि भेल अछि, अपितु ओ अपन आध्यात्मिक आभा सहित पाठकक अन्तर्मनमे अवतरित होइत अछि। ई अनुवाद पाठककेँ शास्त्रीय जटिलतासँ मुक्त कऽ आत्मचिन्तनक सहज धरातल पर आनैत अछि।
ध्यानयोगक सन्दर्भमे योगीक जीवनशैली मिताहार, नियमित आचार, संयमित निद्रा आ समत्वभाव के अत्यन्त सूक्ष्म वर्णन गीता करैत अछि। श्री चौधरी एहि सन्देशकेँ मैथिल समाजक सांस्कृतिक चेतनासँ जोड़ैत एक आत्मीय स्वर प्रदान केने छथि। फलस्वरूप पाठककेँ एहन प्रतीति होइत अछि जे गीता केवल युद्धभूमिक उपदेश नहि, अपितु जीवनक प्रत्येक क्षणक साधना-पथ अछि।
विशेष रूपसँ उल्लेखनीय अछि योगभ्रष्टक विषयमे भगवानक करुणामय आश्वासन “नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति” कऽ भावधारा। श्री चौधरीक प्रस्तुति एहि सन्देशकेँ अत्यन्त मार्मिकता सँ व्यक्त करैत अछि कि आध्यात्मिक प्रयास कदापि व्यर्थ नहि जाइत, प्रत्येक शुभ प्रयत्न आत्मोन्नतिक मार्ग प्रशस्त करैत अछि। ई भाव आधुनिक जीवनक तनाव, अस्थिरता आ निराशाक मध्य आशाक दीप जेकाँ प्रकाशित होइत अछि।
भाषिक दृष्टिसँ ई अनुवाद संस्कृतनिष्ठ गरिमा आ लोकभाषाक सरसता दुनूक अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करैत अछि। शब्द-चयनमे सहजता, वाक्य-विन्यासमे प्रवाह आ भावाभिव्यक्तिमे श्रद्धा स्पष्ट रूपेँ दृष्टिगोचर होइत अछि। श्री प्रवीण मूल श्लोकक आध्यात्मिक ऊर्जा केँ अक्षुण्ण रखैत मैथिली पाठक समाजक लेल एक नव आध्यात्मिक सेतु निर्माण केने छथि।
समग्रतः, श्री प्रवीण चौधरी द्वारा प्रस्तुत गीताक छठम अध्याय : योगक मार्ग केर मैथिली अनुवाद केवल भाषिक रूपान्तरण नहि, बल्कि आत्मसंयम, ध्यान आ आध्यात्मिक जागरणक एक जीवन्त साधना-पाठ अछि। ई कृति मैथिली साहित्यकेँ आध्यात्मिक विमर्शक एक नवीन आयाम प्रदान करैत अछि तथा पाठककेँ बाह्य जगत्सँ अन्तर्जगतक दिशामे उन्मुख करैत अछि।
अन्ततः हम तऽ यैह कहब जे जखन योग केवल आसन नहि, बल्कि आत्मा आ परमात्माक मध्य सेतु बनि जाइत अछि, तखन एहन अनुवाद सभ भाषा, संस्कृति आ आध्यात्मिक परम्पराकेँ नव जीवन प्रदान करैत अछि। श्री प्रवीण चौधरीक ई प्रयास निश्चयहि मैथिली साहित्य आ गीता-दर्शन दुनूक लेल एक महत्त्वपूर्ण साधनात्मक उपलब्धि अछि।
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✍️ दिलीप झा “ललित”
ज्ञान सँ अनुभूति धरि : गीताक आत्मसंवादक मैथिली पुनर्सृजन
भगवद्गीता केवल दर्शनक ग्रंथ नहि, अपितु मनुष्यक अन्तर्मनसँ परमात्माक अन्तःसंवादक अमर दस्तावेज अछि। एकर प्रत्येक अध्याय जीवनक कोनो ने कोनो गूढ़ प्रश्नक द्वार खोलैत अछि। सप्तम अध्याय ‘ज्ञान-विज्ञान योग’ एहि यात्रामे एक एहन सोपान अछि, जतय साधक केवल ‘जानबाक’ दिशामे नहि, बल्कि जानल सत्यकेँ अनुभूति बनाबयक दिशामे अग्रसर होइत अछि।
श्री प्रवीण चौधरी द्वारा प्रस्तुत एहि अध्यायक मैथिली अनुवादक विशेषता ई अछि जे संस्कृतक दार्शनिक गाम्भीर्यकेँ अक्षुण्ण रखैत, भावकेँ मैथिलीक सहज आत्मीयतामे उतारबाक प्रयास कएल गेल अछि। ई अनुवाद केवल शब्दक स्थानान्तरण नहि, बल्कि तत्त्वक अनुभूतिमय पुनर्सृजन प्रतीत होइत अछि।
सप्तम अध्यायमे भगवान श्रीकृष्ण अर्जुनकेँ अपन स्वरूप आ परम सत्ता सँ परिचित करबैत छथि। ज्ञानक संग विज्ञान अर्थात बौद्धिक बोधक संग प्रत्यक्ष अनुभूति एहि अध्यायक मूल चेतना अछि। परमात्मा केवल दूरस्थ, अगोचर सत्ता नहि छथि, प्रकृतिक प्रत्येक कणमे, जीवनक प्रत्येक स्पन्दनमे, चेतनाक प्रत्येक तहमे हुनक उपस्थिति व्याप्त अछि। एहि बोधसँ साधकक दृष्टि बदलैत अछि बाहरक संसार वस्तु नहि रहि, परम तत्त्वक अभिव्यक्ति बनि जाइत अछि।
श्री चौधरीक अनुवादक एक महत्वपूर्ण उपलब्धि ई लागैत अछि जे गीता सदृश गूढ़ आध्यात्मिक विचारकेँ मैथिलीक स्वाभाविक प्रवाहमे ग्रहण करबाक अवसर भेटैत अछि। मैथिलीमे अध्यात्मक अपन प्राचीन लोक-संस्कार रहल अछि। माटि, जल, वृक्ष, नदी, तुलसी, पीपर, सूर्योदय, संध्या, लोकगीत सभक भीतर एक अदृश्य चेतनाक अनुभूति। एहि कारणेँ गीताक ‘मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव’ जकाँ भाव मैथिल मानस लेल पराया नहि बुझाइत, ई तऽ अपनहि जीवन-दृष्टिक दार्शनिक विस्तार जकाँ प्रतीत होइत अछि।
एहि अध्यायक एक आरो महत्त्वपूर्ण पक्ष अछि माया आ त्रिगुणक आवरण। मनुष्य परम सत्यक निकट रहितो ओकरा चिन्हि नहि पबैत अछि, कारण चेतना प्रकृतिक गुण, आसक्ति, इच्छा आ अहंकारक जालमे आबद्ध रहैत अछि। चौधरीजीक अनुवाद एहि दार्शनिक पक्षकेँ सहज मैथिली अभिव्यक्तिमे रखबाक प्रयत्न करैत अछि। पाठककेँ केवल श्लोकक अर्थ नहि भेटैत अछि, बल्कि अपन भीतर झाँकबाक एक अवसर सेहो भेटैत अछि।
एहि अनुवादकेँ पढ़ैत काल ई अनुभूति प्रबल होइत अछि जे ज्ञान केवल पढ़ल नहि जाइछ जीवल जाइछ अछि। शास्त्रक वास्तविक प्रयोजन सूचना देब नहि, दृष्टि देब अछि। शब्दक उद्देश्य स्मृति बढैब नहि, चेतना जगाएब अछि। ज्ञान जखन हृदयमे उतरैत अछि, तखन ओ विज्ञान अर्थात अनुभूत सत्य बनि जाइत अछि।
मैथिली भाषामे गीताक एहन प्रस्तुति अपन सांस्कृतिक धरातलपर सेहो महत्वपूर्ण अछि। ई केवल भाषान्तरण नहि, बल्कि आध्यात्मिक ज्ञानक मातृभाषीय पुनर्जागरण अछि। जखन गीता अपनहि भाषामे मनसँ संवाद करैत अछि, तखन शास्त्र आ साधकक बीचक दूरी घटैत अछि। संस्कृतक दिव्य वाणी मैथिलीक आत्मीय स्वरमे आबि कऽ आर अधिक निकट, अपन आ अनुभूतिपरक भऽ जाइत अछि।
समग्रतः श्री प्रवीण चौधरीक ‘ज्ञान-विज्ञान योग’क मैथिली अनुवाद आध्यात्मिक जिज्ञासु लेल केवल पाठ नहि, बल्कि आत्मचिन्तनक एक निमंत्रण अछि। एहि काजमे भाषा माध्यम अछि, दर्शन पथ अछि आ अनुभूति लक्ष्य।
गीता पढ़बाक वस्तु नहि जीबाक साधना अछि आऽ ज्ञान सुनबाक विषय नहि अन्तःकरणमे जागबाक प्रकाश अछि।
श्री चौधरीक एहि साधनामय साहित्यिक प्रयास लेल साधुवाद। हुनक लेखनी मैथिलीमे गीता-कृष्णक वाणीकेँ एही तरह आत्मीय, सहज आ अनुभूतिपरक बनबैत रहय तकर जिज्ञासु हम सदैब रहब। एहि तरहक भाषायी रुपान्तरण के लेल मंगलकामना आ शुभेच्छा।
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✍️ दिलीप झा “ललित”
भगवद्गीता केवल युद्धभूमिमे कहल गेल उपदेश नहि, बल्कि मनुष्यक भीतर चलैत अनन्त द्वन्द्वक समाधानक सनातन संवाद अछि। श्री प्रवीण चौधरी द्वारा प्रस्तुत गीताक मैथिली अनुवादक आठम अध्याय ‘अक्षर-ब्रह्म योग’ एहि अन्तःसंवादकेँ मृत्यु, ब्रह्म, आत्मा, कर्म आ परमगतिक गहन रहस्यसँ जोड़ैत अछि। एहि अध्यायक मूल प्रश्न केवल ‘मृत्युक बाद की होइत अछि? नहि, बल्कि ई अछि जीवनक अन्तिम क्षण धरि मनुष्य अपन चेतनाक केन्द्र कतय स्थापित करैत अछि?
‘अक्षर’ अर्थात जे क्षरित नहि होइत अछि, जे परिवर्तनक पार स्थिर अछि ओहि अक्षर-ब्रह्मक बोधसँ अध्यायक आध्यात्मिक यात्रा आरम्भ होइत अछि। अर्जुनक जिज्ञासामे ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव आ अधियज्ञक प्रश्न उठैत अछि। श्रीकृष्णक उत्तर क्रमशः दृश्य जगतक सीमासँ अदृश्य सत्यक दिशामे साधकक दृष्टि मोड़ैत अछि। चौधरीजीक मैथिली अनुवाद एहि गूढ़ दार्शनिक अवधारणाकेँ मातृभाषाक सहज संवेदनामे उतारबाक सार्थक प्रयास प्रतीत होइत अछि।
एहि अध्यायक सर्वाधिक मार्मिक पक्ष अछि अन्तकालक स्मरण। श्रीकृष्ण कहैत छथि जे मनुष्य अन्तिम समय जे भावक स्मरण करैत देह त्याग करैत अछि, ताहि भावकेँ प्राप्त होइत अछि। मुदा एकरा केवल मृत्युक्षणक धार्मिक क्रिया मानब अध्यायक गहराइकेँ सीमित कऽ देत। एकर आध्यात्मिक संकेत बहुत व्यापक अछि अन्तिम स्मरण अचानक निर्मित नहि होइत, सम्पूर्ण जीवनक साधना ओकर पूर्वाभ्यास होइत अछि। जे जीवनभरि चेतनाक केन्द्र सांसारिक आसक्ति रहल, ओकर अन्तिम क्षणमे परमात्माक अखण्ड स्मरण सहज कतेक सम्भव? एहि लेल गीता मृत्युकेँ जीवनसँ अलग घटना नहि मानैत अछि, मृत्यु तऽ जीवनभरि अर्जित चेतनाक अन्तिम अभिव्यक्ति मात्र अछि।
एहि सन्दर्भमे ‘ॐ’क स्मरण विशेष अर्थ ग्रहण करैत अछि। ॐ केवल ध्वनि नहि, बल्कि समस्त अस्तित्वक मूल नादक प्रतीक अछि। श्रीकृष्णक उपदेशमे योगयुक्त मन, प्राणक संयम आ ब्रह्मक चिन्तन एक एहन आन्तरिक अनुशासनक संकेत दैत अछि जतय साधक धीरे-धीरे देहक सीमासँ चेतनाक व्यापक आकाश धरि पहुँचैत अछि। मृत्यु तखन अन्त नहि रहि जाइत अछि, ओ सीमित ‘हम’ सँ असीम ‘तत्’ दिस संक्रमणक द्वार बनि जाइत अछि।
अध्यायमे ‘अव्यक्त’ आ ‘अक्षर’क चर्चा एहि बोधकेँ आरो सूक्ष्म बनबैत अछि। जे दृश्य अछि, से परिवर्तनशील अछि। जे परिवर्तनशील अछि, से क्षर अछि। मुदा एहि क्षर जगतक आधारमे जे अक्षर तत्त्व विद्यमान अछि, ओ नाशरहित अछि। मनुष्यक वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा बाह्य उपलब्धिसँ अन्तःस्थित अविनाशी तत्त्वक पहचान धरि पहुँचबाक यात्रा अछि। देह बदलैत अछि, परिस्थिति बदलैत अछि, विचार बदलैत अछि मुदा आत्मतत्त्व अपन मूल स्वरूपमे अविनाशी अछि।
श्री प्रवीण चौधरीक मैथिली अनुवादक विशेष सार्थकता एहि ठाम अनुभव होइत अछि जे संस्कृतक दार्शनिक गम्भीरताकेँ मैथिली भावभूमिसँ जोड़बाक प्रयास भेल अछि। मैथिलीमे ‘अन्तकाल’, ‘स्मरण’, ‘परमगति’, ‘अक्षर’, ‘ब्रह्म’ जेकाँ आध्यात्मिक पद केवल शब्द नहि रहि जाइत अछि। ओ सभ अपन सांस्कृतिक आ आत्मीय अनुगूँजक संग पाठकक अन्तर्मनमे प्रवेश करैत अछि। अनुवादक सफलता तखने मानल जा सकैत अछि, जखन मूल शास्त्रक अर्थक संग ओकर आत्मिक ताप सेहो सुरक्षित रहय। एहि दृष्टिएँ ई प्रस्तुति पाठकेँ केवल अर्थ बुझबैत नहि, बल्कि आत्मचिन्तनक दिशामे प्रेरित करैत अछि।
अध्यायक उत्तरार्द्धमे शुक्ल आ कृष्ण दू मार्गक उल्लेख सेहो अत्यन्त प्रतीकात्मक अछि। एक दिस प्रकाश, ज्ञान आ उच्चतर चेतनाक मार्ग, दोसर दिस पुनरावृत्तिक संसार। एकरा केवल बाह्य मृत्यु-पश्चात् यात्राक भौगोलिक मानचित्र मानि लेब गीता-दर्शनक व्यापकता घटा देत। एकर गूढ़ अर्थ साधकक चेतनाक दिशामे सेहो खोजल जा सकैत अछि मनुष्यक भीतर प्रतिक्षण दू सम्भावना सक्रिय अछि प्रकाश दिस आरोहण अथवा अज्ञान-आसक्तिक चक्रमे पुनः पतन।
अन्ततः आठम अध्याय हमरा एकटा अत्यन्त गहन सत्यक सम्मुख ठाढ़ करैत अछि मृत्यु जीवनक अन्तिम प्रश्न नहि, जीवनक सम्पूर्ण साधनाक दर्पण अछि। जे जीवनमे परम सत्यक स्मरण करैत अछि, ओकर लेल मृत्यु भयक विषय नहि, बल्कि मिलनक सम्भावना बनैत अछि। अक्षर-ब्रह्मक मार्ग देह त्यागक मार्ग मात्र नहि, ई तऽ प्रत्येक क्षण क्षर सँ अक्षर, अस्थिर सँ शाश्वत, अहंकार सँ आत्मा आ आत्मासँ परमात्माक दिशामे चलबाक साधना अछि।
श्री प्रवीण चौधरीक मैथिली अनुवाद एहि अध्यायक दार्शनिक गम्भीरताकेँ अपन मातृभाषाक आत्मीय धरातलपर आनैत अछि। एहि कारणेँ ‘अक्षर-ब्रह्म योग’ पढ़बाक विषय मात्र नहि, भीतर उतारबाक आमन्त्रण बनि जाइत अछि। गीता हमरा मृत्युकेँ बुझबाक पहिने जीवनकेँ बुझबाक शिक्षा दैत अछि आ जीवनकेँ बुझबाक पहिने अपन वास्तविक स्वरूपकेँ पहचानबाक।
अक्षरक खोज बाहरक ब्रह्माण्डमे नहि अपितु ओहि अन्तर्मौनमे अछि, जतय ‘हम’ क्रमशः विलीन भऽ ‘ओ’ मात्र शेष रहि जाइत अछि।
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भगवद्गीताक नवम अध्याय ‘राजविद्या–राजगुह्य योग’ ज्ञान आ भक्तिक बीच कोनो विभाजन नहि करैत। ई दुनूकेँ आत्मबोधक एकहि प्रवाहमे देखैत अछि। श्री प्रवीण चौधरीक मैथिली अनुवादक विशेषता एहि बातमे अछि जे ओ एहि सूक्ष्म आध्यात्मिक विमर्शकेँ मैथिलीक सहज भाषिक धरातलपर आनबाक प्रयास करैत छथि, बिना ओकर दार्शनिक गरिमाकेँ हलुक कएने।
अनुवादकक पहिल महत्त्वपूर्ण योगदान मूल दार्शनिक पदावलीक अर्थ-संरक्षण अछि। ‘राजविद्या’, ‘राजगुह्य’, ‘भक्ति’, ‘कर्म’, ‘समर्पण’ आदि पद गीतामे मात्र शब्द नहि, विशिष्ट तत्त्वदृष्टिक वाहक अछि। एहि अवधारणाक भावकेँ मैथिलीमे ग्रहणीय बनबेनाइ साधारण शब्दान्तरण नहि, बल्कि दार्शनिक अनुशासनक काज अछि। चौधरी एहि स्तरपर संस्कृत-मूलक गाम्भीर्य आ मैथिलीक आत्मीयतामे संतुलन साधबाक प्रयत्न करैत छथि।
दोसर उपलब्धि भाषिक स्वाभाविकता अछि। गीताक संवादक स्वर उपदेश, तत्त्वचिन्तन, भक्ति आ आत्मीय सम्बोधन यदि एकरस गद्य बनि जाए तँ ओकर आन्तरिक लय टूटि जाइत। मैथिली वाक्य-विन्यास आ परिचित शब्द-संरचनाक सहारा लऽ अनुवादक पाठककेँ मूल संवादक निकट राखबाक काज करैत छथि। एहि कारण अनुवाद ‘भाषान्तरण’ सँ आगाँ बढ़ि पुनर्संवादक रूप ग्रहण करैत अछि।
नवम अध्यायक ‘पत्रं पुष्पं फलं तोयं’क प्रसंग विशेष रूपसँ उल्लेखनीय अछि। एकर आध्यात्मिक केन्द्र वस्तु नहि, भाव अछि। साधारण अर्पण सेहो जखन निष्कपट भक्तिसँ होइत अछि, तखन ओकर मूल्य बदलि जाइत अछि। एहि मर्मकेँ मैथिली संवेदनामे पहुँचेनाइ अनुवादकक सूक्ष्म भावग्राह्यताक परिचायक मानल जा सकैत अछि।
एहि अनुवादक एकटा व्यापक सांस्कृतिक महत्त्व सेहो अछि। मैथिलीमे गीता पढ़ब केवल अपन भाषामे एकटा महान ग्रन्थ पढ़ब नहि, ई अपन लोक-संस्कार आ आध्यात्मिक परम्पराक संग नवसँ संवाद स्थापित करब थिक। एहि अर्थमे चौधरीक प्रयास मैथिली पाठक लेल ज्ञान-परम्पराक भाषिक पुनर्स्थापन करैत अछि।
तथापि गीताजेकाँ ग्रन्थक अनुवादक कसौटी केवल सहजता नहि होयबाक चाही। जहाँ भाषा अत्यधिक सरल होइत अछि, ततय दार्शनिक सूक्ष्मता क्षीण होयबाक आशंका रहैत अछि आ जहाँ मूल पदावलीक आग्रह बेसी होइत अछि, ततय पाठकीय प्रवाह बाधित भऽ सकैत अछि। अतः एहि अनुवादक मूल्यांकनमे सरलता आ तात्त्विक सटीकताक संतुलन प्रमुख कसौटी अछि। चौधरीक प्रस्तुति एहि संतुलन दिस एकटा सार्थक कदमक रूपमे देखल जा सकैत अछि।
अन्ततः प्रवीण चौधरीक योगदानक मूल अर्थ शब्द बदलि देबमे नहि, मूल अनुभूतिकेँ मैथिलीमे पुनर्जीवित करबमे अछि। जखन गीता पाठक लेल केवल पढ़ल जायवला श्लोक नहि रहि कऽ आत्मचिन्तनक कारण बनैत अछि, तखन अनुवाद अपन साहित्यिक सीमा पार कऽ आध्यात्मिक साधनाक रूप ग्रहण करैत अछि।
राजविद्या ज्ञानक आलोक अछि, राजगुह्य अन्तःकरणक रहस्य आ प्रवीण चौधरीक मैथिली अनुवाद एहि दुनूक बीच एकटा भाषिक सेतु।
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✍️ दिलीप झा “ललित”
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय अध्यात्म-चिन्तनक ओ दिव्य आलोकस्तम्भ थिक, जाहिमे जीवन, जगत आ जगदीश्वरक पारस्परिक सम्बन्धक रहस्य उद्घाटित होइत अछि। एकर प्रत्येक अध्याय साधकक अन्तश्चेतनाक एकटा नव द्वार खोलैत अछि। नवम अध्यायमे भगवान् श्रीकृष्ण जाहि राजविद्या आ राजगुह्यक आध्यात्मिक रहस्य उद्घाटित कयने छथि, तकर स्वाभाविक विस्तार दशम अध्यायमे ‘विभूतियोग’क रूपमे प्रकट होइत अछि। एतय परमात्मा अपन विराट सत्ताक ओहि विशिष्ट अभिव्यक्तिसभक परिचय दैत छथि, जाहिमे हुनकर दिव्य महिमाक आभा विशेष रूपेँ अनुभूत होइत अछि।
श्री प्रवीण चौधरी द्वारा प्रस्तुत गीताक मैथिली अनुवादक एहि अध्यायकेँ ‘दिव्य महिमाक झलक’ शीर्षक देब सार्थक प्रतीत होइत अछि। ई शीर्षक पाठककेँ स्मरण करबैत अछि जे परमात्माक सम्पूर्ण स्वरूप मानवीय बुद्धि आ भाषाक सीमामे समेटल नहि जा सकैत अछि, तथापि प्रकृतिक विलक्षणता, जीवनक तेजस्विता, ज्ञानक गरिमा आ सृष्टिक विराटतामे हुनकर महिमाक झलक अवश्य भेटैत अछि। ई अध्याय केवल ईश्वरक श्रेष्ठतम स्वरूपसभक सूची नहि, बल्कि दृश्य जगतक माध्यमे अदृश्य परमसत्ताकेँ चिन्हबाक आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करैत अछि।
दशम अध्यायमे भगवान श्रीकृष्ण अपन अनादि स्वरूप आ समस्त सृष्टिक मूलाधार होयबाक सत्य स्पष्ट करैत छथि। देवता, महर्षि आ अन्यान्य दिव्य सत्तासभ सेहो हुनकर उत्पत्तिक पूर्ण रहस्य नहि जनैत छथि, कारण ओ स्वयं सभक आदि छथि। एहि उद्घोषमे परमात्माक निरपेक्ष सत्ता आ अनादि स्वरूपक बोध निहित अछि।
भगवान् अपन विभूतिसभक वर्णन करैत कहैत छथि जे आदित्यसभमे विष्णु, ज्योतिष्मान पिण्डसभमे सूर्य, नक्षत्रसभमे चन्द्रमा, वेदसभमे सामवेद, इन्द्रियसभमे मन आ प्राणीसभक चेतना ओ स्वयं छथि। पर्वतसभमे मेरु, जलाशयसभमे समुद्र, वृक्षसभमे पीपल, ऋषिसभमे नारद आ शस्त्रधारीसभमे रामक उल्लेख करैत ओ अपन विराट् महिमाक विविध आयाम उद्घाटित करैत छथि।
एहि वर्णनक मूल भाव ई नहि जे परमात्मा केवल किछुए श्रेष्ठ वस्तु वा व्यक्तिमे सीमित छथि, बल्कि ई जे संसारक प्रत्येक विशिष्टता, सामर्थ्य, सौन्दर्य आ तेजक मूलमे ओहि परम चेतनाक सत्ता विद्यमान अछि। जाहिठाम प्रतिभा अपन उत्कर्ष पर पहुँचैत अछि, जाहिठाम साहस धर्मक रक्षार्थ जागैत अछि, जाहिठाम ज्ञान अज्ञानक अन्हार दूर करैत अछि, ओतहि दिव्यताक आभास भेटैत अछि।
विभूतियोगक मूल सन्देश थिक श्रेष्ठतामे अहंकार नहि, परमसत्ताक स्मरण; वैभवमे आसक्ति नहि, ओकर मूल स्रोतक बोध।
श्री चौधरीक एहि अनुवाद-प्रयासकेँ एहि व्यापक परिप्रेक्ष्यमे देखबाक चाही। हुनकर योगदानक मूल महत्त्व ई अछि जे गीताक गूढ़ आध्यात्मिक चिन्तन मैथिली भाषी पाठकक अध्ययन आ मननक क्षेत्रमे सहज उपलब्ध होइत अछि। मातृभाषामे आध्यात्मिक ग्रन्थक पाठ पाठक आ दर्शनक बीचक दूरी कम करैत अछि तथा भावकेँ आत्मचिन्तन धरि पहुँचबाक अवसर दैत अछि।
अनुवादक वास्तविक कसौटी केवल शब्दक शुद्धता नहि, बल्कि भावक प्रामाणिकता, अवधारणाक स्पष्टता आ मूल दर्शनक गरिमाक संरक्षण सेहो थिक। विभूतियोग सन अध्यायमे, जतय प्रत्येक प्रतीकक पाछाँ गहींर आध्यात्मिक आशय अछि, ओतय एहि तीनू पक्षक विशेष महत्त्व अछि। एहि कारणेँ श्री प्रवीण चौधरीक अनुवादकेँ मैथिलीमे गीताध्ययनक एकटा महत्त्वपूर्ण भाषिक सेतु मानल जा सकैत अछि।
दशम अध्याय केवल ब्रह्माण्डक बाहरी विराटताक वर्णन करैत अछि, एहेन नहि। ई मनुष्यक भीतरी संसारकेँ सेहो आलोकित करैत अछि। भगवान् कहैत छथि जे समस्त प्राणीसभक हृदयमे स्थित आत्मा ओ स्वयं छथि। एहि उद्घोषसँ अध्यायक दृष्टि बाहरी वैभवसँ हटि आन्तरिक चेतनाक गहराइ धरि पहुँचैत अछि।
मनुष्य प्रायः दिव्यताकेँ मन्दिरक गर्भगृह, तीर्थक पवित्रता वा पूजा-पाठक अनुष्ठानमे खोजैत अछि। मुदा गीताक ई अध्याय बुझबैत अछि जे परमात्माक महिमा प्रकृतिक विराटता संग-संग चेतनाक सूक्ष्मतामे सेहो प्रकट होइत अछि। विवेक, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख-दुःखक अनुभव, भय-अभय आ बुद्धि मानवीय जीवनक एहन विविध आयाम सेहो परमसत्तासँ सम्बद्ध अछि।
एहि दृष्टिसँ अध्यात्म संसारसँ पलायन नहि, बल्कि संसारकेँ नव दृष्टिसँ देखबाक कला बनि जाइत अछि। जे मनुष्य प्रत्येक प्राणीमे चेतनाक गरिमा देखैत अछि, जे प्रकृतिक सौन्दर्यकेँ केवल उपभोगक वस्तु नहि मानि ओकर संरक्षणक दायित्व बुझैत अछि, जे अपन प्रतिभाकेँ अहंकारक नहि, लोकमंगलक साधन बनबैत अछि ओ विभूतियोगक भावकेँ जीवनमे उतारबाक दिशामे अग्रसर होइत अछि।
एतहि एहि अध्यायक नैतिक सन्देश सेहो स्पष्ट होइत अछि। जखन सभ किछु परमसत्ताक महिमाक अभिव्यक्ति थिक, तखन दोसराक अपमान, प्रकृतिक विनाश आ अपन सामर्थ्यक दुरुपयोग आध्यात्मिक चेतनाक विपरीत आचरण थिक।
श्री प्रवीण चौधरीक मैथिली अनुवाद एहि आध्यात्मिक चिन्तनकेँ मातृभाषाक माध्यमसँ पाठक धरि पहुँचयबाक महत्त्वपूर्ण प्रयास थिक। गीताक मूल भाव जखन अपन भाषाक आत्मीयतामे पढ़ल जाइत अछि, तखन ओ केवल ग्रन्थक विषय नहि रहि जीवनक चिन्तन बनबाक सम्भावना प्राप्त करैत अछि। एहि अनुवाद-प्रयासक वास्तविक सार्थकता सेहो एतहि अछि पाठक श्लोकक अर्थ बुझबाक संग ओकर अन्तर्निहित जीवनबोधपर विचार करथि।
तथापि विभूतियोगक वास्तविक उपलब्धि तखन होयत, जखन ई अध्ययन व्यवहारमे विनम्रता, दृष्टिमे समता, कर्ममे उत्तरदायित्व आ हृदयमे सर्वभूत-हितक भावना जगाओत। परमात्माक महिमा चिन्हबाक अर्थ केवल हुनकर ऐश्वर्यक प्रशंसा करब नहि, बल्कि अपन भीतर विद्यमान विवेक, करुणा आ सत्यनिष्ठाकेँ जागृत करब सेहो थिक।
अन्ततः कहल जा सकैत अछि जे दशम अध्याय ‘विभूतियोग’ ईश्वरक महिमाक वर्णन करैत-करैत मनुष्यकेँ आत्मबोधक देहरी धरि पहुँचा दैत अछि। श्रीकृष्णक सन्देश स्पष्ट अछि दिव्यताकेँ देखबाक लेल दृष्टि बदलू, सृष्टिक श्रेष्ठतामे अहंकार नहि, मूल चेतनाक स्मरण करू, आ अपन जीवनकेँ ओहि विराट सत्ताक गरिमा अनुरूप बनाउ।
जतय तेज अछि, ओतय हुनकर आभा; जतय ज्ञान अछि, ओतय हुनकर प्रकाश; जतय करुणा अछि, ओतय हुनकर स्पन्दन। विभूतियोगक साधना एहि झलककेँ पहचानैत-चिन्हैत अन्ततः ओहि अनन्तक प्रति समर्पित होयबाक साधना थिक।