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गीता सातम अध्याय (अंग्रेजी, हिन्दी आ मैथिली अनुवाद)

304 भ्यूज

ॐ श्री परमात्मने नमः!!

॥सप्तमोऽध्यायः॥

श्री भगवानुवाच ।

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ॥
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥७-१॥

The Blessed Lord said:

With the mind intent on Me, O son of Prtha, taking refuge in Me, and practising Yoga, how thou shalt without doubt know Me fully, that do thou hear.

Fully: i.e., possessed of infinite greatness, strength, power, grace, and other infinite attributes.

भगवान ने कहा:

हे पृथापुत्र, मुझमें मन लगाकर, मेरी शरण में आकर, और योग का अभ्यास करके, तुम बिना किसी शक के मुझे किस प्रकार पूरी तरह से जान लोगे, अब तुम यह सुनो ।

पूरी तरह से: यानी, अनंत महानता, ताकत, शक्ति, कृपा और दूसरे अनंत गुणों से युक्त (भगवान् के स्वरूपों को पूर्ण रूप से जानने का अभिप्राय है) ।

भगवान कहलनि:

हे पृथापुत्र, हमरा मे मन लगाकय, हमर शरण मे आबिकय, आर योग केर अभ्यास कयकेँ, अहाँ बिना कोनो सन्देह केँ हमरा कोन प्रकार सँ पूरापूरी जानि लेब, आब अहाँ से सुनू । 

पूरापूरी: यानि, अनन्त महानता, ताकत, शक्ति, कृपा एवं दोसर अनन्त गुण सब सँ युक्त (भगवान् केर स्वरूप केँ पूर्ण रूप सँ जनबाक अभिप्राय अछि) ।

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ॥
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥७-२॥

I shall tell you in full, of knowledge, speculative and practical, knowing which, nothing more here remains to be known.

My Note: For all of us, it is very important to become Arjuna and keep following each and every word of Sri Krishna.

मैं तुम्हें ज्ञान, आनुमानिक एवं व्यवहारिक, सब कुछ पूरी तरह से बताऊंगा, जिसे जानने के बाद, यहां और कुछ भी जानना बाकी नहीं रह जाता है ।

मेरा नोट: हम सभी के लिए अर्जुन बनना और श्री कृष्ण की हर बात पर अमल करना बहुत ज़रूरी है ।

हम अहाँ केँ ज्ञान, आनुमानिक (अनुभवात्मक) एवं व्यवहारिक, सब किछु पूरापूरी कहब, जे जानि लेलाक बाद बाकी किछु जानय लेल नहि बचि जाइत अछि । 

हमर नोट: हमरा सभक लेल अर्जुन बननाय आर श्री कृष्ण केर हरेक बात पर अमल कयनाय बहुत जरूरी अछि ।

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ॥
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥७-३॥

One, perchance, in thousands of men, strives for perfection; and one perchance, among the blessed ones, striving thus, knows Me in reality.

The Blessed: Siddhanam – this word literally means the perfected ones – but here it means only those who having acquired good Karma in a past incarnation, strive for freedom in this life.

शायद हज़ारों लोगों में से कोई एक, पूर्णता के लिए प्रयत्न करता है; और शायद, ऐसे धन्य (आशीर्वादित) लोगों में से कोई एक, इस तरह प्रयत्न करते हुए, मुझे वास्तव में जानता है ।

धन्य: सिद्धानम् – इस शब्द का मतलब है सिद्ध लोग – लेकिन यहाँ इसका मतलब सिर्फ़ वे लोग हैं जिन्होंने पिछले जन्म में अच्छे कर्म करके, इस जीवन में स्वतंत्रता (मुक्ति, मोक्ष) के लिए कोशिश की है ।

शायद हजारों लोक मे सँ कियो एक गोटे, पूर्णता (ईश्वर केँ पूर्ण रूप सँ जनबाक) लेल प्रयत्न करैत अछि; आर शायद, एहेन धन्य (आशीर्वादित) लोक सब मे सँ कियो एक गोटे, एहि तरहें प्रयत्न करैत, हमरा वास्तव मे जनैत अछि ।

धन्य: सिद्धानम् – एहि शब्द केर मतलब अछि सिद्ध लोक – लेकिन एहिठाम एकर मतलब मात्र ओहेन लोक अछि जे पैछला जन्म मे नीक कर्म कयकेँ, एहि जीवन मे स्वतंत्रता (मुक्ति, मोक्ष) केर वास्ते प्रयत्न कयलक अछि ।

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ॥
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥७-४॥

Bhumi (earth), Ap (water), Anala (fire), Vayu (air), Kha (ether), mind, intellect, and egoism: thus is My Prakriti divided eightfold.

The raison d’etre of this reduction of matter into five elements is quite different from that conceived by modern science. Man has five senses only, just five ways in which he can be affected by matter; therefore his perception of matter cannot be divided further. The five elements are two kinds, subtle and gross. The gross state is said to be formed by taking half of a subtle element, and adding 1/8th to it, of each of the rest: e.g., gross Akasa = 1/2 subtle Akasa + 1/8 subtle Vayu + 1/8 subtle Tejas + 1/8 subtle Ap + 1/8 subtle Bhumi. Then again, the ether, air, light, water, and earth of modern science do not answer to the five elements of Hindu philosophy. Akasa is just the sound-producing agency. From Akasa rise Vayu, having the properties of sound and touch. From Vayu springs Tejas, possessing the property of visibility, as well as those of its predecessors. From Tejas rises Ap, combining with the above properties its distinctive feature – flavour. Bhumi comes from Ap, bringing the additional property of smell to its inheritance.

भूमि (धरती), अप (पानी), अनल (आग), वायु (हवा), ख (ईथर), मन, बुद्धि और अहंकार: इस तरह मेरी प्रकृति आठ हिस्सों में बंटी हुई है ।

द्रव्य (मैटर) को पांच तत्त्व (एलिमेंट) में बांटने का कारण आधुनिक विज्ञान (मॉडर्न साइंस) की सोच से काफी अलग है । इंसान के पास सिर्फ पांच ज्ञानेन्द्रिय (सेंसेज) हैं, सिर्फ पांच तरीके हैं जिनसे वह द्रव्यों (मैटर) से प्रभावित हो सकता है; इसलिए द्रव्य के बारे में उसकी समझ को और (आगे तक) नहीं बांटा जा सकता । पांच तत्त्व दो तरह के होते हैं, सूक्ष्म और स्थूल । कहा जाता है कि स्थूल अवस्था एक सूक्ष्म तत्त्व का आधा हिस्सा लेकर, बाकी हर एक का १/८ हिस्सा उसमें मिलाकर बनती है: जैसे, स्थूल आकाश = १/२ सूक्ष्म आकाश + १/८ सूक्ष्म वायु + १/८ सूक्ष्म तेजस + १/८ सूक्ष्म अप + १/८ सूक्ष्म भूमि । फिर, आधुनिक विज्ञान के ईथर, हवा, अग्नि, पानी और भूमि हिंदू दर्शन (फिलॉसफी) के पांच तत्त्वों के उत्तर नहीं देते । आकाश सिर्फ आवाज़ पैदा करने वाली कारक (एजेंसी) है । आकाश से वायु निकलती है, जिसमें आवाज़ और छूने के गुण (स्पृश्यता) होते हैं । वायु से तेजस (अग्नि) निकलता है, जिसमें दिखने का गुण (दृश्यता) होता है, साथ ही अपने पहले वाले तत्त्वों के गुण भी होते हैं । तेजस से अप् निकलता है, जो ऊपर बताए गए गुणों के साथ अपनी खासियत (विशेष गुण) – स्वाद (रस) – को मिलाता है । अप् से भूमि बनती है, जो अपनी विरासत में गंध का अतिरिक्त गुण लाती है ।

भूमि (धरा, क्षिति), अप (पानि, जल), अनल (आगि), वायु (हवा), ख (इथर), मन, बुद्धि आर अहंकार: एहि तरहें हमर प्रकृति आठ भाग मे बँटल अछि ।

द्रव्य (मैटर) केँ पाँच तत्त्व (एलिमेंट) मे बाँटल जेबाक कारण आधुनिक विज्ञान (मॉडर्न साइंस) केर सोच सँ काफी अलग अछि । मनुष्यक पास मात्र पाँच टा ज्ञानेन्द्रिय (सेंसेज) छैक, मात्र पाँच तरीका छैक जाहि सँ ओ द्रव्य (मैटर) सँ प्रभावित भ’ सकैत अछि; ताहि लेल द्रव्य केर बारे मे ओकर समझ केँ आर (आगाँ धरि) नहि बाँटल जा सकैछ । पाँच तत्त्व दुइ प्रकार केर होइत अछि, सूक्ष्म आ स्थूल । कहल जाइत छैक जे स्थूल अवस्था एकटा सूक्ष्म तत्त्वक आधा हिस्सा लय केँ, बाकी हर एक केर १/८ हिस्सा ओहि मे मिलाकय बनैत अछि: जेना, स्थूल आकाश = १/२ सूक्ष्म आकाश + १/८ सूक्ष्म वायु + १/८ सूक्ष्म तेजस + १/८ सूक्ष्म अप + १/८ सूक्ष्म भूमि । फेर, आधुनिक विज्ञान केर ईथर, हवा, अग्नि, पानि आर भूमि हिन्दू दर्शन (फिलॉसफी) केर पाँच तत्त्व केर उत्तर नहि दैछ । आकाश मात्र आवाज पैदा करयवाली कारक (एजेंसी, अभिकर्ता) थिक । आकाश सँ वायु निकलैत अछि, जाहि मे आवाज आ छूबय केर गुण (स्पृश्यता) होएत छैक । वायु सँ तेजस (अग्नि) निकलैत अछि, जाहि मे देखेबाक गुण (दृश्यता) होएत छैक, संगहि अपना सँ पहिलुका तत्त्व सभक गुण सेहो होएत छैक । तेजस सँ अप् निकलैत छैक, जे उपर कहल गेल गुण सभक संग अपन विशेष गुण (खासियत) – स्वाद (रस) – केँ मिलबैत अछि । अप् सँ भूमि बनैत अछि, जे अपना विरासत मे गन्ध केर अतिरिक्त गुण अनैत अछि ।

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ॥
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥७-५॥

This is the lower (Prakriti). But different from it, know thou, O mighty-armed, My higher Prakriti – the principle of self-consciousness, by which this universe is sustained.

यह (मेरी) नीचे की (प्रकृति) है । लेकिन इससे अलग, हे महाबाहु, मेरी ऊपर की प्रकृति को जानो – आत्म-चेतना का सिद्धांत, जिससे यह ब्रह्मांड बना हुआ है ।

ई (हमर) नीचाँ केर (प्रकृति) छी । मुदा एहि सँ अलग, हे महाबाहु, हमर उपर केर प्रकृति केँ जानू – आत्म-चेतना केर सिद्धान्त, जाहि सँ ई ब्रह्माण्ड बनल अछि ।

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ॥
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥७-६॥

Know that these (two Prakritis) are the womb of all beings; I am the origin and dissolution of the whole universe.

I am the origin, etc.: In Me the whole universe originates and dissolves, as everything springs from My Prakriti.

जान लो कि यही (दो प्रकृतियाँ) सभी प्राणियों का गर्भ हैं; मैं पूरे ब्रह्मांड की आरम्भ (मूल) और अंत (विलय, विनाश) हूँ ।

मैं आरम्भ हूँ, वगैरह: मुझमें ही पूरा ब्रह्मांड शुरू और खत्म होता है, जैसे सब कुछ मेरी प्रकृति से निकलता है ।

जानि लिय’ जे यैह (दुनू प्रकृति) समस्त प्राणी सभक गर्भ थिक; हमहीं पूरे ब्रह्माण्ड केर आरम्भ (मूल) आर अंत (विनाश, विलय) छी ।

हमहीं आरम्भ छी, आदि: हमरहि टा सँ पूरा ब्रह्माण्ड शुरू आर खत्म होइत अछि, जेना सब किछु हमरहि प्रकृति सँ निकलैत अछि ।

मतः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ॥
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥७-७॥

Beyond Me, O Dhananjaya, there is naught. All this is strung in Me, as a row of jewels on a thread.

Beyond Me: there is no other cause of the universe but Me.

मुझसे परे, हे धनंजय, कुछ भी नहीं है । यह सब मुझमें धागे में मणियों की पंक्ति की तरह पिरोया हुआ है ।

मुझसे परे: मेरे अलावा ब्रह्मांड का कोई अन्य कारण नहीं है ।

हमरा सँ हंटिकय, हे धनंजय, किछुओ नहि अछि । ई सब हमरहि मे धागा मे मणि सभक पाँति जेकाँ गाँथल अछि । 

हमरा सँ हंटिकय: हमरा अलावा ब्रह्माण्ड केर कोनो आन कारण नहि अछि ।

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभाऽस्मि शशिसूर्ययोः ॥
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥७-८॥

I am the sapidity in water, O son of Kunti; I, the radiance in the moon and the sun; I am the Om (pranav) in all the Vedas, sound in Akasa, and manhood in men.

In Me as essence, all these are woven, as being My manifestations.

हे कुंतीपुत्र, मैं पानी में स्वाद हूँ; मैं चाँद और सूरज में चमक हूँ; मैं सभी वेदों में ॐ (प्रणव), आकाश में आवाज़ और इंसानों में मर्दानगी हूँ ।

ये सब मेरे सार रूप में बुने हुए हैं, मेरे (प्रकट) रूप होने के नाते ।

हे कुंतीपुत्र, हम पानि मे स्वाद छी; हम चाँद आर सूरज मे चमक छी; हम सब वेद मे ॐ (प्रणव अक्षर), आकाश मे आवाज आर मर्द (मनुष्य) मे मर्दानगी हमहीं छी ।

ई सब हमर सार रूप मे बुनल गेल अछि, हमर (प्रकट) रूप हेबाक नाते ।

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ॥
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥७-९॥

I am the sweet fragrance in earth, and the brilliance in fire am I; the life in all beings, and the austerity am I in ascetics.

मैं धरती में मीठी खुशबू हूँ, और आग में चमक हूँ; सभी प्राणियों में जीवन हूँ, और तपस्वियों में तपस्या हूँ ।

हम धरती मे सुन्दर सुगन्ध छी, आर आगि मे तेज (चमक) छी; सब प्राणी मे जीवन छी, आर तपस्वी लोकनि मे तपस्या छी ।

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ॥
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥७-१०॥

Know Me, O son of Prtha, as the eternal seed of all beings. I am the intellect of the intelligent, and the heroism of the heroic.

हे पृथा के पुत्र, मुझे सभी प्राणियों का सनातन बीज जानो । मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और वीरों की वीरता हूँ ।

हे पृथापुत्र, हमरा समस्त प्राणी सभक सनातन बीज जानू । हम बुद्धिमान सभक बुद्धि आर वीर सभक वीरता छी ।

बलं बलवतामस्मि कामरागविवर्जितम् ॥
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥७-११॥

Of the strong, I am the strength devoid of desire and attachment. I am, O bull among the Bharatas, desire in beings, unopposed to Dharma.

Desire: Kama – thirst for objects not present to the senses.

Attachment: Raga – for those presented to the senses.

Unopposed to Dharma: the desire which moves in harmony with the ordained duties of life.

बलवानों में मैं वह बल हूँ जिसमें कोई इच्छा और आसक्ति नहीं है । हे भरतवंश के अर्षभ (भरतर्षभ), मैं जीवों में वह इच्छा हूँ जो धर्म के विरुद्ध नहीं है ।

इच्छा: काम – उन चीज़ों की प्यास जो इंद्रियों के सामने नहीं होते हैं ।

आसक्ति: राग – उन चीज़ों के लिए जो इंद्रियों के सामने होते हैं ।

धर्म के विरुद्ध नहीं: वह इच्छा जो जीवन के तय कामों (कर्तव्यों) के साथ तालमेल बिठाकर चलती है ।

बलवान सब मे हम ओ बल छी जाहि मे कोनो इच्छा तथा आसक्ति नहि होइत अछि । हे भरतर्षभ (भरतवंश के बलशाली अर्षभ अर्थात् साँढ़), हम जीव सब मे ओ इच्छा छी जे धर्म केर विरुद्ध नहि होइछ ।

इच्छा: काम – ताहि चीज सभक प्यास जे इंद्रिय सभक सोझाँ नहि होइछ ।

आसक्ति: राग – ताहि चीज सभक लेल जे इंद्रिय सभक सोझाँ होइछ ।

धर्मक विरुद्ध नहि: ओहेन इच्छा जे जीवन केर तय काज (कर्तव्य) केर संग तालमेल बैसाकय चलैत अछि ।

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ॥
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥७-१२॥

And whatever states pertaining to Sattva, and those pertaining to Rajas, and to Tamas, know them to proceed from Me alone; still I am not in them, but they are in Me.

All things are in Him, yet not He in them. Logically, this can only happen in superimposition through illusion: as that of a ghost seen in the stump of a tree; the ghost is in the stump, from the point of view of the man in the dark, but the stump is never in the ghost. Similarly the universe is superimposed on the Lord, seen in His place through Maya, but He is not in it. The Lord returns to the same teaching in Chapter IX, 4, 5.

और जो भी सत्व, रजस और तमस से जुड़ी अवस्थाएँ हैं, उन्हें सिर्फ़ मुझसे ही आना जानो; फिर भी मैं उनमें नहीं हूँ, लेकिन वे मुझमें हैं ।

सब चीज़ें उनमें हैं, फिर भी वह उनमें नहीं हैं । तार्किक रूप से, यह केवल भ्रान्ति (भ्रम, माया, ईल्यूजन) के जरिए आरोपित (उपर चढ़ाया हुआ आवरण के जैसा – सुपरइम्पोज़िशन) में ही हो सकता है: जैसे किसी भूत को पेड़ के ठूंठ में देखा जाता है; अंधेरे में रहने वाले आदमी के नज़रिए से भूत ठूंठ में होता है, लेकिन ठूंठ कभी भूत में नहीं होता । इसी तरह यह ब्रह्माण्ड (यूनिवर्स) भगवान पर आरोपित (सुपरइम्पोज़्ड) है, माया के ज़रिए उनकी जगह पर देखा जाता है, लेकिन वह उसमें नहीं हैं । भगवान श्रीकृष्ण चैप्टर IX, ४, ५ में उसी शिक्षा (उपदेश) पर वापस आते हैं ।

आर जेहो सत्व, रजस आर तमस सँ जुड़ल अवस्था सब अछि, तेकरा केवल हमरहि सँ आयल जानू; तैयो हम ओहि मे नहि छी, लेकिन ओ सब हमरा मे अछि । 

सब चीज हुनका मे अछि, तैयो ओ ओहि सब मे नहि छथि । तार्किक रूप सँ, ई केवल भ्रान्ति (भ्रम, माया, ईल्यूजन) केर मार्फत आरोपित (उपर चढ़ायल गेल आवरण जेकाँ – सुपरइम्पोज़िशन) मे टा भ’ सकैत अछि; जेना कोनो भूत केँ गाछक ठूंठ मे देखल जाइत अछि; अन्हार मे रहयवला आदमीक नजरिया सँ भूत ठूंठ मे रहैत अछि, मुदा ठूंठ कखनहुँ भूत मे नहि रहैछ । तहिना ई ब्रह्माण्ड (यूनिवर्स) भगवान पर आरोपित (सुपरइम्पोज़्ड) अछि, मायाक जरिए हुनकर स्थान पर देखल जाइत अछि, लेकिन ओ ओहिमे नहि छथि । भगवान श्रीकृष्ण चैप्टर IX, ४, ५ मे एहि शिक्षा (उपदेश) पर वापस अबैत छथि ।

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ॥
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥७-१३॥

Deluded by these states, the modifications of the three Gunas (of Prakriti), all this world does not know Me who is beyond them, and immutable.

इन अवस्थाओं, तीनों (प्रकृति के) गुणों के बदलावों से भ्रमित होकर, यह सारी दुनिया मुझे नहीं जानती, जो इनसे परे हूँ और जिसको बदला नहीं जा सकता है ।

एहि अवस्था सब सँ, तीनू (प्रकृति केर) गुण सभक बदलाव सब सँ मोहित (भ्रमित) भ’ कय, ई सम्पूर्ण दुनिया हमरा नहि जनैत अछि, जे एहि सँ नितान्त दूर (परे) छी आ जेकरा बदलल नहि जा सकैत अछि । 

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ॥
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥७-१४॥

Verily this divine illusion of Mine, constituted of the Gunas, is difficult to cross over; those who devote themselves to Me alone, cross over this illusion.

Divine: transcending human perception.

Devotee … alone: Abandoning all formal religion (Dharma) completely take refuge in Me, their own Self, the Lord of illusion.

वास्तव में गुणों से बनी मेरी इस दैविक (दिव्य) माया को पार करना कठिन है; जो लोग स्वयं को केवल मेरे प्रति समर्पित करते हैं, वे इस भ्रम से पार हो जाते हैं ।

दैविक (दिव्य): मानवीय धारणा से परे ।

भक्त … केवल: सभी औपचारिक धर्म को पूरी तरह से त्यागकर मुझमें, अपने स्वयं के स्वरूप में, माया के भगवान की शरण लें ।

वास्तव मे गुण सब सँ बनल हमर यैह दैविक (दिव्य) माया केँ पार करब कठिन अछि; जे लोक स्वयं केँ केवल हमरा प्रति समर्पित करैत अछि, ओ एहि भ्रम सँ पार भ’ जाइत अछि ।

दैविक (दिव्य): मानवीय धारणा सँ अलग भ’ कय (नितान्त हंटिकय, परे) ।

भक्त … केवल: समस्त औपचारिक धर्म केँ पूरापूरी त्यागिकय हमरा मे, अपन स्वयं केर स्वरूप मे, माया केर भगवान मे शरण लियए ।

न मां दुष्कृतिनो मूढ़ाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ॥
माययाऽपहृज्ञानां आसुरं भावमाश्रिताः ॥७-१५॥

They do not devote themselves to Me – the evil-doers, the deluded, the lowest of men, deprived of discrimination by Maya, and following the way of the Asuras.

Way of the Asuras: i.e., cruelty, untruth, and the like.

वे लोग स्वयं को मेरी तरफ नहीं लगाते – जो बुरे काम करने वाले हैं, गुमराह (मोहित-भ्रमित) लोग हैं, सबसे नीच इंसान हैं, माया की वजह से (सही) समझ से दूर हैं, और जो असुरों के रास्ते पर चलने वाले लोग हैं ।

असुरों का रास्ता: यानी, क्रूरता, झूठ, और इसी तरह के दूसरे काम ।

ओ लोक स्वयं केँ हमरा दिश नहि लगबैत अछि – जे खराब काज करयवला अछि, मोह-माया सँ भ्रमित लोक अछि, सब सँ नीच लोक अछि, माया केर कारण (सही) समझ (बुझय) सँ दूर अछि, आर जे असुर लोकनिक बाट पर चलयवला लोक अछि । 

असुर लोकनिक बाट: यानि, क्रूरता, झूठ, आर एहि तरहक आर काज सब ।

चतुर्विधा भजन्ते मां नाः सुकृतिनोऽर्जुन ॥
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥१६॥

Four kinds of virtuous men worship Me, O Arjuna – the distressed, the seeker of knowledge, the seeker of enjoyment, and the wise, O bull among the Bharatas.

Seeker of enjoyment: one who wishes for objects of enjoyment, both here and hereafter.

The wise: One who has forsaken all desires, knowing them to arise from Maya.

हे अर्जुन, चार प्रकार के पुण्यात्मा पुरुष मेरी पूजा करते हैं – दुःखी (आर्त), ज्ञान चाहने वाला (जिज्ञासु), भोग चाहने वाला (अर्थार्थी) और बुद्धिमान (ज्ञानी), हे भरतवंशियों में सर्वथा वीरपुरुष (अर्षभ – साँढ़) ।

भोग चाहनेवाला (अर्थार्थी): जो यहां और उसके बाद भी भोग की वस्तुओं की इच्छा रखता है ।

बुद्धिमान: जिसने सभी इच्छाओं को माया से उत्पन्न हुआ जानकर त्याग दिया है ।

हे अर्जुन, चारि प्रकारक पुण्यात्मा पुरुष हमर पूजा करैत अछि – दुःखी (आर्त), ज्ञान चाहयवला (जिज्ञासु), भोग चाहयवला (अर्थार्थी) आर बुद्धिमान (ज्ञानी), हे भरतवंशी मे सर्वथा वीरपुरुष (अर्षभ – साँढ़ समान अर्जुन) ।

भोग चाहयवला (अर्थार्थी): जे एतय (एहि संसार मे) आर एकर बाद (अन्य संसार मे) भोग (आनन्द केर) वस्तु सभक इच्छा रखैत अछि ।

बुद्धिमान (ज्ञानी): जे सब इच्छा सब केँ माया सँ उत्पन्न भेल जानिकय त्यागि दैत अछि ।

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ॥
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥७-१७॥

Of them, the wise man, ever-steadfast, (and fired) with devotion to the One, excels; for supremely dear am I to the wise, and he dear to Me.

उनमें से, बुद्धिमान आदमी (ज्ञानीजन), जो हमेशा एक के प्रति दृढ़, और भक्ति से (भरा हुआ) रहता है, वह श्रेष्ठ है; क्योंकि मैं बुद्धिमान (ज्ञानी) को बहुत प्रिय हूँ, और वह मुझे प्रिय है ।

ओहि मे सँ, बुद्धिमान लोक (ज्ञानीजन), जे हमेशा एक केर प्रति दृढ़, आ भक्ति सँ (भरल) रहैत अछि, से श्रेष्ठ अछि; कियैक तँ हम बुद्धिमान (ज्ञानी) केँ बहुते प्रिय छी, आर ओ हमरा प्रिय अछि ।

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ॥
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥७-१८॥

Noble indeed are they all, but the wise man I regard as My very Self; for with the mind steadfast, he is established in Me alone, as the supreme goal.

वे सभी महान हैं, लेकिन बुद्धिमान (ज्ञानी) व्यक्ति को मैं अपना ही स्वरूप मानता हूँ; क्योंकि दृढ़ स्थिर मन के साथ, वह केवल मुझमें ही, सर्वोच्च लक्ष्य के रूप में, स्थित रहता है ।

ओना ओ सब गोटे महान अछि, मुदा बुद्धिमान (ज्ञानी) लोक केँ हम अपनहि स्वरूप मानैत छी; कियैक तँ दृढ़ स्थिर (निश्चल) मन सँ,  ओ मात्र हमरहि टा मे, सर्वोच्च लक्ष्य केर रूप मे, स्थित रहैत अछि ।

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ॥
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥७-१९॥

At the end of many births, the man of wisdom takes refuge in Me, realising that all this is Vasudeva (in innermost Self). Very rare is that great soul.

कई जन्मों के अंत में, बुद्धिमान (ज्ञानी) व्यक्ति यह जानकर मेरी शरण लेता है कि यह सब वासुदेव (अंतरतम आत्मा में) है । वह महान आत्मा अत्यंत दुर्लभ है ।

कतेको जन्मक अन्त मे, बुद्धिमान (ज्ञानी) लोक ई जानिकय हमर शरण लैत अछि जे ई सबटा वासुदेव (अंतरतम आत्मा मे) अछि । ओ महान आत्मा अत्यन्त दुर्लभ होइछ ।

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ॥
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥७-२०॥

Others again, deprived of discrimination by this or that desire, following this or that rite, devote themselves to other gods, led by their own natures.

Own natures: Samsakaras acquire in previous lives.

फिर, कुछ लोग, इस या उस इच्छा की वजह से विवेक खोकर, इस या उस रस्म को मानते हुए, अपने स्वभाव के अनुसार दूसरे देवताओं को समर्पित हो जाते हैं ।

अपना स्वभाव: अपने पिछले जन्मों में मिले संस्कारों से बना हुआ होता है ।

फेर, किछु लोक, एहि या ओहि इच्छा केर कारण सँ विवेक हेराकय, एहि या ओहि विधि (रस्म, रिबाज) केँ मानैत, अपन स्वभाव केर अनुसार दोसर देवता सब केँ समर्पित भ’ जाइत अछि ।

अपन स्वभाव: अपन पैछला जन्म सब मे भेटल संस्कार सब सँ बनल रहैत अछि ।

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयाऽर्चितुमिच्छति ॥
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥७-२१॥

Whatever form any devotee seeks to worship with Sradhha – that Sraddha of his do I make unwavering.

कोई भी भक्त श्रद्धा से जिस भी रूप में पूजा करना चाहता है – उसकी उस श्रद्धा को मैं अटल बनाता हूँ ।

कोनो भक्त श्रद्धा सँ जाहि कोनो रूप मे पूजा करय चाहैत अछि – ओकर वैह श्रद्धा केँ हम अटल बनबैत छी ।

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ॥
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥७-२२॥

Endued with that Sraddha, he engages in the worship of that, and from it, gains his desires – these being verily dispensed by Me alone.

उस श्रद्धा से युक्त होकर, वह उसकी पूजा में संलग्न होता है, और उससे अपनी इच्छाओं को प्राप्त करता है – ये वास्तव में केवल मेरे द्वारा ही प्रदान की जाती हैं ।

वैह श्रद्धा सँ युक्त भ’ कय, ओ ओकर पूजा मे संलग्न होइत अछि, आर ओकरा सँ अपन इच्छा सब केँ प्राप्त करैत अछि – ई वास्तव मे केवल हमरहि द्वारा टा प्रदान कयल जाइत अछि ।

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ॥
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥७-२३॥

But the fruit (accruing) to these men of little understanding is limited. The worshippers of the Devas go to the Devas; My devotees too come to Me.

These men of little understanding: Though the amount of exertion is the same (in the two kinds of worship), these people do not take refuge in Me, by doing which they may attain infinite results.

My Note for all my children: Do take very special care of each and every verse inter-connected with one-another. This Chapter VII teaches us exact way of becoming a devotee of Supreme Lord.

लेकिन इन कम समझ वाले लोगों को (मिलने वाला) फल सीमित है । देवताओं की पूजा करने वाले देवताओं के पास जाते हैं; मेरे भक्त भी मेरे पास आते हैं ।

ये कम समझ वाले लोग: भले ही मेहनत की मात्रा (दोनों तरह की पूजा में) एक जैसी है, ये लोग मेरी शरण में नहीं आते, जिससे उन्हें अनंत फल मिल सकते हैं ।

मेरे सभी बच्चों के लिए मेरा नोट: एक-दूसरे से जुड़े हर श्लोक का बहुत खास ध्यान रखना । यह अध्याय VII हमें भगवान का भक्त बनने का सही तरीका सिखाता है ।

मुदा एहि कम समझ वला लोक केँ (भेटयवला) फल सीमित होइछ । देवता लोकनिक पूजा करयवला देवता लोकनि लग पहुँचैत अछि; हमर भक्त सेहो हमरहि लग अबैत अछि ।

ई कम समझ वला लोक: भले मेहनतक मात्रा (दुनू तरहक पूजा मे) एक जेकाँ छैक, ई लोक सब हमर शरण मे नहि अबैछ, जाहि सँ ओकरा अनन्त फल भेटि सकैत छैक ।

हमर समस्त सन्ततिवर्ग लेल हमर नोट: एक-दोसर सँ जुड़ल हरेक श्लोक केर बहुत खास ध्यान राखब । ई अध्याय VII हमरा सब केँ भगवानक भक्त बनबाक सही तरीका सिखबैत अछि ।

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ॥
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमुत्तमम् ॥७-२४॥

The foolish regard Me, the unmanifested, as come into manifestation, not knowing My supreme state – immutable and transcendental.

The ignorant take Me as an ordinary mortal, assuming embodiment from the unmanifested state, like all other men, being impelled by the force of past Karma. This is due to their ignorance of my real nature; hence they do not worship Me, the One without a second.

मूर्ख लोग मुझ, अव्यक्त को, व्यक्त मानते हैं, मेरी सर्वोच्च स्थिति – अपरिवर्तनीय और पारलौकिक, को नहीं जानते ।

अज्ञानी मुझे एक साधारण नश्वर व्यक्ति के रूप में लेते हैं, जो अन्य सभी मनुष्यों की तरह अव्यक्त अवस्था से अवतार लेता है, जो पिछले कर्मों के बल से प्रेरित होता है । यह मेरे वास्तविक स्वरूप के प्रति उनकी अज्ञानता के कारण है; इसलिए वे मेरी, वगैर किसी दूसरा केवल एक की, पूजा नहीं करते हैं ।

मूर्ख लोक हमरा, अव्यक्त केँ, व्यक्त मानैत अछि, हमर सर्वोच्च स्थिति – अपरिवर्तनीय आर पारलौकिक, केँ नहि जनैत अछि ।

अज्ञानी हमरा एकटा साधारण नश्वर व्यक्ति केर रूप मे लैत अछि, जे आन सब मनुष्य सब जेकाँ अव्यक्त अवस्था सँ व्यक्त अवस्था मे अवतार लैत अछि, जे कि पैछला कर्म सभक बल सँ प्रेरित रहैत छैक । ई हमर वास्तविक स्वरूप केर प्रति ओकर अज्ञानताक कारण छैक; तेँ ओ हमर, जे कि बिना कोनो आर दोसर केँ केवल एक छी, पूजा नहि करैत अछि ।

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ॥
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥७-२५॥

Veiled by the illusion born of the congress of the Gunas, I am not manifest to all. This deluded world knows Me not – the Unborn, the Immutable.

This Yoga-Maya spread over the Lord, which veils the understanding of others in recognising Him, does not obscure His own knowledge, as it is His, and He is the wielder of it – just as the glamour (Maya) caused by juggler (Mayavi) does not obstruct his own knowledge. This illusion which binds others, cannot dim His vision.

गुणों के मेल से उत्पन्न हुए भ्रम में, मैं सबके सामने नहीं दिखता (व्यक्त नहीं होता) । यह भ्रमित संसार मुझे नहीं जानती – जो अजन्मा है, अटल है ।

यह योग-माया भगवान पर फैली हुई है, जो दूसरों को उन्हें पहचान करने में समझशक्ति को ढक देती है, यह उनके (भगवानके) अपने ज्ञान को धुंधला नहीं करती, क्योंकि यह (योगमाया) उन्हीं का है, और वही इसके मालिक हैं – ठीक वैसे ही जैसे किसी जादूगर (मायावी) की वजह से होनेवाला चमत्कारिक आकर्षण (माया) उनके अपने ज्ञान में रुकावट नहीं डालता । यह भ्रम जो दूसरों को बांधता है, उनकी नज़र को धुंधला नहीं कर सकता ।

गुण सभक मेल सँ उत्पन्न भेल भ्रम मे, हम सभक सामने नहि देखाइत छी (व्यक्त नहि होइत छी) । ई भ्रमित संसार हमरा नहि जनैत अछि – जे अजन्मा छी, अटल छी ।

ई योग-माया भगवान पर पसरल छन्हि, जे दोसर केँ हुनका चिन्ह पेबाक समझशक्ति केँ झाँपि दैत छैक, ई हुनकर (भगवानक) अपन ज्ञान केँ नहि धुन्धला करैछ, कियैक तँ ई (योगमाया) हुनकहि थिकन्हि, आर वैह एकर मालिक छथि – ठीक ओहिना जेना कोनो जादूगर (मायावी) केर कारण सँ होयवला चमत्कारिक आकर्षण (माया) ओकर अपन ज्ञान (वास्तविक बात बुझय) मे बाधा नहि दैत छैक । ई भ्रम जे दोसर केँ बाँधैत अछि, से भगवानक नजरि केँ धुंधला नहि कय सकैछ । 

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ॥
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥७-२६॥

I know, O Arjuna, the beings of the whole past, and the present, and the future, but Me none knoweth.

हे अर्जुन! मैं भूत, वर्तमान और भविष्य की समस्त सत्ताओं को जानता हूँ, परन्तु मुझे कोई नहीं जानता ।

हे अर्जुन! हम भूत, वर्तमान आ भविष्य केर समस्त सत्ता सब केँ जनैत छी, मुदा हमरा कियो नहि जनैत अछि ।

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ॥
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥७-२७॥

By the delusion of the pairs of opposites, arising from desire and aversion, O descendant of Bharata, all beings fall into delusion at birth, O scorcher of foes.

To one whose mind is subject to the dualistic delusion, caused by the passions of desire and aversion, there cannot indeed arise a knowledge of things as they are, even of the external world; far less can such an intellect grasp the transcendental knowledge of the innermost Self.

हे भरतवंशी, इच्छा और द्वेष से पैदा होने वाले विपरीत गुणों के भ्रम से, सभी प्राणी जन्म से ही भ्रम में पड़ जाते हैं, हे शत्रुओं को जलाने वाले ।

जिसका मन इच्छा और द्वेष के जुनून से पैदा होने वाले दोहरे भ्रम में रहता है, उसे चीज़ों का, यहाँ तक कि बाहरी दुनिया का भी, जैसी वे हैं, ज्ञान नहीं हो सकता; ऐसी बुद्धि अंतरतम आत्मा के दिव्य ज्ञान को तो और भी कम समझ सकती है ।

हे भरतवंशी, इच्छा आ द्वेष सँ जन्म लयवला विपरीत गुण सभक भ्रम सँ, समस्त प्राणी जन्महि सँ भ्रम मे पड़ि जाइत अछि, हे शत्रु सब केँ जरबयवला (अर्जुन) । 

जेकर मन इच्छा व द्वेष केर जुनून सँ जन्म लयवला दोहरा भ्रम मे रहैत छैक, ओकरा चीज सभक, एतय धरि जे बाहरी संसारक सेहो, जेहेन जे चीज सब रहैत छैक, तेकर ज्ञान नहि भ’ सकैत छैक; एहेन बुद्धि लेल अन्तरतम आत्माक दिव्य ज्ञान केँ त आरो कमे टा बुझि सकैत अछि । 

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ॥
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥७-२८॥

Those men of virtuous deeds, whose sin has come to an end – they, freed from the delusion of the pairs of opposites, worship Me with firm resolve.

जो अच्छे कर्म करने वाले लोग हैं, जिनके पाप खत्म हो गए हैं – वे विपरीत गुणों के भ्रम से मुक्त होकर, दृढ़ संकल्प (पक्के इरादे) से मेरी पूजा करते हैं ।

जे बढियाँ कर्म करयवला लोक अछि, जेकर पाप खत्म भ’ गेल छैक – ओ विपरीत गुण सभक भ्रम सँ मुक्त भ’ कय, दृढ़ इच्छा (पक्का इरादा) सँ हमर पूजा करैत अछि । 

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ॥
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥७-२९॥

Those who strive for freedom from old age and death, taking refuge in Me – they know Brahman, the whole of Adhyatma, and Karma in its entirety.

(They know) the whole of Adhyatma: They realise in full the Reality underlying the innermost individual Self.

जो लोग बुढ़ापे और मौत से स्वतंत्रता के लिए, मेरी शरण में आकर, पूरा यत्न करते हैं – वे ब्रह्म को, पूरे अध्यात्म को और कर्म को पूरी तरह से जानते हैं ।

(वे) पूरे अध्यात्म को जानते हैं: वे अपने अंदर छिपी सच्चाई को पूरी तरह से महसूस करते हैं ।

जे लोक बुढ़ापा आ मृत्यु सँ छुटकारा (स्वतंत्रता) वास्ते, हमर शरण मे आबिकय, पूरा यत्न (कोशिश) करैत अछि – ओ ब्रह्म केँ, पूरे अध्यात्म केँ आ कर्म केँ पूरापूरी जनैत अछि । 

(ओ लोक) पूरा अध्यात्म केँ जनैत अछि: ओ अपना भीतर मे छुपल सत्य (सच्चाइ) केँ पूरापूरी अनुभव करैत अछि । 

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ॥
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥७-३०॥

Those who know Me the Adhibhuta, the Adhidaiva, and the Adhiyajna (continue to) know Me even at the time of death, steadfast in mind.

The consciousness of Me continues as ever, unaffected by the change of approaching death.

जो लोग मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के रूप में जानते हैं, वे मृत्यु के समय भी मन में दृढ़ रहते हुए मुझे जानते रहते हैं ।

मेरी चेतना हमेशा की तरह बनी रहती है, आने वाली मृत्यु के बदलाव से अप्रभावित रहकर ।

जे लोक हमरा अधिभूत, अधिदैव आर अधियज्ञ केर रूप मे जनैत अछि, ओ मृत्यु केर समय सेहो मन मे दृढ़ रहैत हमरा जानैत रहैत अछि ।

हमर चेतना हमेशा जेकाँ बनल रहैत छैक, आबयवाली मृत्युक बदलाव सँ अप्रभावित रहिकय । 

इति ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥

The end of the seventh chapter, designated, The Way of Knowledge with Realisation. 

हरिः हरः!!

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