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गीता आठम अध्यायः अंग्रेजी, हिन्दी आ मैथिली अनुवाद

75 भ्यूज

ॐ श्री परमात्मने नमः !!

॥अष्टमोऽध्यायः॥

अर्जुन उवाच ।

किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ॥
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥८-१॥

Arjuna said:

What is the Brahman, what is Adhyatma, what is Karma, O best of Purusas? What is called Adhibhuta, and what Adhidaiva?

अर्जुन ने कहा:

हे पुरुषोत्तम, ब्रह्म क्या है, अध्यात्म क्या है, कर्म क्या है ? अधिभूत किसे कहते हैं, और अधिदैव किसे कहते हैं ?

अर्जुन कहलनि:

हे पुरुषोत्तम, ब्रह्म कि थिक, अध्यात्म कि थिक, कर्म कि थिक ? अधिभूत केकरा कहल जाइत छैक, आर अधिदैव केकरा कहल जाइत छैक ?

अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन् मधुसूदन ॥
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥८-२॥

Who, and in what way, is Adhiyajna here in this body, O destroyer of Madhu? And how art Thou known at the time of death, by the self-controlled?

My Note: As explained by Lord in last verse of Chapter 7, related to that very thing, Arjuna has queried in beginning of this Chapter 8. Let’s learn from the answer to these significant questions, keep yourself at the position where Arjuna is.

हे मधु के नाश करने वाले, इस शरीर में अधियज्ञ कौन और कैसे हैं ? और मृत्यु के समय आत्म-नियंत्रित मनुष्य आपको कैसे पहचानते हैं ?

मेरा नोट: जैसा कि भगवान ने अध्याय 7 के आखिरी श्लोक में बताया है, उसी बात से जुड़ा हुआ, अर्जुन ने इस अध्याय 8 की शुरुआत में पूछा है । आइए इन ज़रूरी सवालों के जवाब से सीखें, खुद को उसी जगह पर रखें जहाँ अर्जुन हैं ।

हे मधुसूदन, एहि शरीर मे अधियज्ञ के आ कोन तरहें रहैत (केहेन) छथि ? आर मृत्युक समय आत्म-नियंत्रित मनुष्य अहाँ केँ केना चिन्हैत छथि ?

हमर नोट: जेना कि भगवान अध्याय ७ केर आखिरी श्लोक मे बतेलनि अछि, वैह बात सँ जुड़ल अछि, अर्जुन एहि अध्याय ८ केर आरम्भ मे पुछलनि अछि । आउ एहि जरूरी सवाल सभक जवाब सँ सिखय जाय, स्वयं केँ ओहि स्थान पर राखू जेतय अर्जुन छथि । 

श्रीभगवानुवाच ।

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ॥
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥८-३॥

The Blessed Lord said:

The Imperishable is the Supreme Brahman. Its dwelling in each individual body is called Adhyatma; the offering in sacrifice which causes the genesis and support of beings, is called Karma.

Offering in sacrifice – includes here all virtuous works.

Karma: Cf. III. 14, 15.

भगवान ने कहा:

वे अविनाशी परम ब्रह्म हैं । हर एक शरीर में उनका निवास अध्यात्म कहलाता है; यज्ञ में जो आहुति दी जाती है, जिससे प्राणियों की उत्पत्ति और पालन होता है, उसे कर्म कहते हैं ।

यज्ञ में आहुति – यहाँ पर सभी अच्छे काम शामिल हैं ।

कर्म: Cf. III. 14, 15.

भगवान कहलनि:

ओ अविनाशी परम ब्रह्म छथि । हरेक शरीर मे हुनक निवास अध्यात्म कहाइत अछि; यज्ञ मे जे आहुति देल जाइत अछि, जाहि सँ प्राणी सभक उत्पत्ति आ पालन होइत अछि, ओकरा कर्म कहल जाइत छैक । 

यज्ञ मे आहुति – एहिठाम सबटा नीक काज शामिल अछि ।

कर्म: देखू गीता अध्याय – ३ केर १४ आ १५ श्लोक ।

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ॥
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥८-४॥

The perishable adjunct is the Adhibhuta, and the Indweller is the Adhidaivata; I alone am the Adhiyajna here in this body, O best of the embodied.

Adhibhuta: that perishable adjunct which is different from, and yet depends for its existence on the self-conscious principle, i.e., everything material, everything that has birth.

Adhidaivata: The universal Self in Its subtle aspect; the Centre from which all living beings have their sense power.

Adhiyajna: the presiding deity of sacrifice – Vishnu.

नाशवान सहायक अधिभूत है, और अधिवासी अधिदैवत हैं; हे देहधारियों श्रेष्ठ (अर्जुन), मैं ही इस शरीर में अधियज्ञ हूं ।

अधिभूत: वह नाशवान सहायक जो अलग है, और फिर भी आत्म-जागरूक सिद्धांत पर अपने अस्तित्व के लिए निर्भर करता है, यानी, हर चीज जो भौतिक है, हर चीज जिसका जन्म होता है ।

अधिदैवत: अपन सूक्ष्म पहलू में सार्वभौमिक स्व (आत्मा); वह केंद्र जहां से सभी जीवित प्राणियों को अपनी इंद्रिय शक्ति प्राप्त होती है ।

अधियज्ञ: यज्ञ केर अधिष्ठाता देवता – विष्णु ।

नाशवान सहायक अधिभूत थिक, आर अधिवासी अधिदैवत थिक; हे देहधारी सब मे श्रेष्ठ (अर्जुन), हमहीं एहि शरीर मे अधियज्ञ थिकहुँ ।

अधिभूत: ओ नाशवान सहायक जे अलग अछि, आर तैयो आत्म-जागरूक सिद्धांत पर अपन अस्तित्वक लेल निर्भर करैत अछि, यानि, हरेक चीज जे भौतिक अछि, हरेक चीज जेकर जन्म होइत छैक ।

अधिदैवत: अपने सूक्ष्म स्वरूप मे सार्वभौमिक स्व (आत्मा); ओ केन्द्र जेतय सँ सब जीवित प्राणी केँ अपन इंद्रिय शक्ति प्राप्त होइत अछि ।

अधियज्ञ: यज्ञ केर अधिष्ठाता देवता – विष्णु ।

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ॥
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥८-५॥

And he who at the time of death, meditating on Me alone, goes forth, leaving the body, attains My Being: there is no doubt about this.

और जो मृत्यु के समय मेरा ही ध्यान करता हुआ शरीर त्याग कर आगे बढ़ता है, वह मेरे स्वरूप (अस्तित्व लोक) को प्राप्त होता है: इसमें कोई संदेह नहीं है ।

आर जे मृत्युक समय हमरहि ध्यान करैत शरीर त्याग कयकेँ आगाँ बढ़ैत अछि, ओ हमर स्वरूप (अस्तित्व लोक) केँ प्राप्त करैत अछि: एहि मे कोनो सन्देह नहि अछि ।

यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ॥
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥८-६॥

Remembering whatever object, at the end, he leaves the body, that alone is reached by him, O son of Kunti, (because) of his constant thought of that object.

Constant thought: the idea is, that the most prominent thought of one’s life occupies the mind at the time of death. One cannot get rid of it, even as one cannot get rid of a disagreeable thought-image in a dream; so the character of the body to be next attained by one is determined accordingly, i.e., by the final thought.

अंत समय में, जिस किसी भी वस्तु का स्मरण करते हुए वह शरीर छोड़ता है, उसी वस्तु तक वह पहुँच जाता है, हे कुन्तीपुत्र, (क्योंकि) वह उस वस्तु का निरन्तर चिन्तन करता रहता है ।

निरंतर विचार: विचार (अवधारणा) यह है कि किसी के जीवन का सबसे प्रमुख सोच मृत्यु के समय दिमाग में रहता है । कोई इससे छुटकारा नहीं पा सकता, जैसे कोई सपने में किसी अप्रिय विचार-छवि से छुटकारा नहीं पा सकता; इसलिए किसी व्यक्ति को अगली बार प्राप्त होने वाले शरीर का चरित्र तदनुसार, यानी अंतिम विचार से निर्धारित होता है ।

अन्त घड़ी (मरबाक समय) मे, जाहि कोनो वस्तु केर स्मरण करिते ओ शरीर छोड़ैत अछि, ताहि वस्तु धरि ओ पहुँचि जाइत अछि, हे कुन्तीपुत्र, (कियैक तँ) ओ ताहि वस्तु केर निरन्तर चिन्तन करैत रहैत अछि । 

निरन्तर चिन्तन: विचार (अवधारणा) ई अछि जे केकरहु जीवन केर सबसँ प्रमुख सोच (विचार) मरबाक समय दिमाग मे रहैत छैक । कियो ओहि सँ छुटकारा नहि पाबि सकैत अछि, जेना कियो सपना मे कोनो अप्रिय विचार-छवि सँ छुटकारा नहि पाबि सकैछ; तेँ कोनो व्यक्तिक ऐगला बेर प्राप्त होयबला शरीर केर चरित्र, यानि अन्तिम विचार सँ निर्धारित होइत छैक ।

तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ॥
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः ॥८-७॥

Therefore, at all times, constantly remember Me, and fight. With mind and intellect absorbed in Me, thou shalt doubtless come to Me.

Remember Me and fight: Do thou constantly keep thy mind fixed on Me and at the same time perform thy Svadharma, as befits a Ksatriya; and thus thou shalt attain purification of the heart.

My Note: Refer the queries of Arjuna and the replies by Lord Krishna very carefully and learn the same principle for our life too.

इसलिए, हर समय, निरन्तर मुझे याद करो, और लड़ो । मन और बुद्धि मुझमें लगे रहने से तुम ज़रूर मेरे पास आओगे ।

मुझे याद करो और लड़ो: तुम अपना मन हमेशा मुझमें लगाए रखो और साथ ही एक क्षत्रिय के तौर पर अपना स्वधर्म निभाओ; और इस तरह तुम दिल की शुद्धि पाओगे ।

मेरा नोट: अर्जुन के सवालों और भगवान कृष्ण के जवाबों को बहुत ध्यान से देखो और अपनी ज़िंदगी के लिए भी यही सिद्धांत सीखो ।

तेँ, हरेक समय, लगातार हमरा याद करू, आर लड़ू । मन आ बुद्धि हमरा मे लागल रहला सँ अहाँ जरूर हमरहि लग आयब । 

हमरा याद करू आर लड़ू: अहाँ अपन मन हमेशा हमरा मे लगेने राखू आ संगहि एकटा क्षत्रिय केर रूप मे अपन स्वधर्म निभाउ; आर एहि तरहें अहाँ हृदय केर शुद्धि पायब ।

हमर नोट: अर्जुन केर सवाल आर भगवान कृष्ण केर जवाब केँ बहुत ध्यान सँ देखू आर अपन जीवनक लेल सेहो यैह सिद्धान्त सीखू । 

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ॥
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥८-८॥
कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ॥
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥८-९॥
प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ॥
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥८-१०॥

The Omniscient, the Ancient, the Overruler, minuter than an atom, the Sustainer of all, of form inconceivable, self-luminous like the sun, and beyond the darkness of Maya – he who meditates on Him thus, at the time of death, full of devotion, with the mind unmoving, and also by the Power of Yoga, fixing the whole Prana betwixt the eyebrows, he goes to that Supreme Resplendent Purusa.

Self-luminous: Known by no agency like the understanding the mind or the senses, but by Self alone.

Power of Yoga: which comes by the constant practice of Samadhi.

Prana: the vital current.

Fixing the whole Prana – means, concentrating the whole will and self-consciousness.

वह सर्वज्ञ, प्राचीन, अधिपति, परमाणु से भी सूक्ष्म, सबका पालनकर्ता, अकल्पनीय, सूर्य के समान स्वयं प्रकाशवान और माया के अंधकार से परे है – जो इस प्रकार उसका ध्यान करता है, मृत्यु के समय, भक्ति से परिपूर्ण, मन को स्थिर रखते हुए, और योग की शक्ति से, भौंहों के बीच पूरे प्राण को स्थिर करके, वह उस परम तेजस्वी पुरुष के पास जाता है ।

स्व-प्रकाशमान: मन या इंद्रियों को समझने जैसी किसी एजेंसी द्वारा नहीं, बल्कि केवल स्वयं द्वारा जाना जाता है ।

योग की शक्ति: जो समाधि के निरंतर अभ्यास से आती है ।

प्राण: महत्वपूर्ण (ऊर्जा – शक्ति की) धारा ।

संपूर्ण प्राण को स्थिर करना – अर्थात संपूर्ण संकल्प और आत्मचेतना को एकाग्र करना ।

ओ सर्वज्ञ, प्राचीन, अधिपति, परमाणुओ सँ सूक्ष्म, सभक पालनकर्ता, अकल्पनीय, सूर्य केर समान स्वयं प्रकाशवान तथा माया केर अंधकार सँ परे छथि – जे एहि तरहें हुनकर ध्यान करैत अछि, मरबाक समय, मन केँ स्थिर रखिते, आर योग केर शक्ति सँ, भौंह केर बीच पूरा प्राण केँ स्थिर कयकेँ, से ओहि परम तेजस्वी पुरुष (परमब्रह्म) लग जाइत छथि ।

स्व-प्रकाशमान: मन या इंद्रिय सभक बुझयवला कोनो कारक (अभिकर्ता) द्वारा नहि, बल्कि केवल स्वयं द्वारा जानल जाइत छथि ।

योग केर शक्ति: जे समाधि केर निरंतर अभ्यास सँ अबैत अछि ।

प्राण: महत्वपूर्ण (ऊर्जा – शक्ति केर) धारा ।

सम्पूर्ण प्राण केँ स्थिर करब – अर्थात सम्पूर्ण संकल्प आ आत्मचेतना केँ एकाग्र करब ।

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ॥
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥८-११॥

What the knowers of the Veda speak of as Imperishable, what the self-controlled (Sannyasis), freed from attachment enter, and to gain which goal they live the life of Brahmachari, that I shall declare unto thee in brief.

Brahmachari – a religious student who takes the vow of continence, etc.; every moment of this stage is one of hard discipline and asceticism.

Cf. Kathopanishad, II. 14.

वेद के ज्ञाता जिसे अविनाशी कहते हैं, आत्म-संयमी (संन्यासी) आसक्ति से मुक्त होकर जिस विषय में प्रवेश करते हैं और जिस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे ब्रह्मचारी का जीवन जीते हैं, वह मैं संक्षेप में तुमसे कहूँगा ।

ब्रह्मचारी – एक धार्मिक छात्र जो संयम आदि का व्रत लेता है; इस चरण का प्रत्येक क्षण कठिन अनुशासन और तपस्या का है ।

{Confer (cf.) means compare} कठोपनिषद, द्वितीय अध्याय – १४वाँ श्लोक । 

वेदक ज्ञाता जिनका अविनाशी कहैत छथि, आत्म-संयमी (संन्यासी) लोकनि आसक्ति सँ मुक्त भ’ कय जाहि विषय मे प्रवेश करैत छथि आर जाहि लक्ष्य केर प्राप्तिक लेल ओ सब ब्रह्मचारी केर जीवन जिबैत छथि, से हम संक्षेप मे अहाँ सँ कहब ।

ब्रह्मचारी – एक धार्मिक छात्र जे संयम आदि केर व्रत लैत अछि; एहि चरण केर प्रत्येक क्षण कठिन अनुशासन आ तपस्या केर होइछ ।

{Confer (cf.) means compare} कठोपनिषद, द्वितीय अध्याय – १४वाँ श्लोक ।

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ॥
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥८-१२॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ॥
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥८-१३॥

Controlling all the senses, confining the mind in the heart, drawing the Prana into the head, occupied in the practice of concentration, uttering the one-syllabled “Om” – the Brahman, and meditating on Me – he who so departs, leaving the body, attains the Supreme Goal.

सभी इंद्रियों को वश में करके, मन को दिल में सीमित (बंद) करके, प्राण को सिर में खींचकर, ध्यान लगाने की अभ्यास में लगा हुआ, एक अक्षर वाले “ॐ” – ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ, और मेरा ध्यान करता हुआ – जो इस तरह शरीर छोड़कर महाप्रस्थान (मृत्यु प्राप्त करता) है, वह परम लक्ष्य (परमब्रह्म) को प्राप्त करता है ।

समस्त इंद्रिय सब केँ वश मे कयकेँ, मन केँ हृदय मे सीमित (बंद) कयकेँ, प्राण केँ माथ मे तानिकय, ध्यान लगेबाक अभ्यास मे लागल, एक अक्षर वला “ॐ” – ब्रह्म केर उच्चारण करैत, आर हमर ध्यान करैत – जो एहि तरहें शरीर छोड़िकय महाप्रस्थान (मृत्यु प्राप्त करैत) अछि, ओ परम लक्ष्य (परमब्रह्म) केँ प्राप्त करैत अछि ।

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ॥
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥८-१४॥

I am easily attainable by that ever-steadfast Yogi who remembers Me constantly and daily, with a single mind, O son of Pritha.

हे पृथापुत्र! जो सदा दृढ़ रहने वाला योगी एक मन से लगातार और नित्य मेरा स्मरण करता है, उसके लिए मैं आसानी से प्राप्त होने योग्य हूँ ।

हे पृथापुत्र! जे हमेशा दृढ़ रहयवला योगी एक मन सँ लगातार आर नित्य हमर स्मरण करैत अछि, ओकरा लेल हम सहजता सँ प्राप्त होयबाक योग्य छी ।

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ॥
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥८-१५॥

Reaching the highest perfection and having attained Me, the great-souled ones are no more subject to rebirth – which is the home of pain, and ephemeral.

Ephemeral: non-eternal, of an ever-changing nature.

सबसे ऊँची पूर्णता तक पहुँचकर और मुझे पाकर, महान आत्मा वाले लोग दोबारा जन्म नहीं लेते – जो (जन्म) दर्द का घर है, और क्षणिक (कुछ ही समय का) है ।

कुछ समय का: हमेशा न रहने वाला, हमेशा बदलनेवाली स्वभाव वाला ।

सबसँ ऊँच पूर्णता धरि पहुँचिकय आर हमरा पाबिकय, महान आत्मावला लोक दोबारा जन्म नहि लैछ – जे (जन्म) दर्दक घर छी, आर क्षणिक (किछुए समय केर) छी ।

किछुए समय केर: हमेशा नहि रहयवला, हमेशा बदलैत रहबाक स्वभाववला ।

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ॥
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥८-१६॥

All the worlds, O Arjuna, including the realm of Brahma, are subject to return, but after attaining Me, O son of Kunti, there is no rebirth.

Subject to return: because limited by time.

हे अर्जुन, ब्रह्मा के लोक समेत सभी लोकों से (आत्माएं) वापस जाने वाले हैं, लेकिन हे कुंती पुत्र, मुझे पाने के बाद कोई पुनर्जन्म नहीं होता ।

वापस जाने वाला: क्योंकि समय की सीमा है ।

हे अर्जुन, ब्रह्मा केर लोक समेत समस्त लोक सब सँ (आत्मा सब) वापस जायवला होइछ, मुदा हे कुंतीपुत्र, हमरा पेलाक बाद कोनो पुनर्जन्म नहि होइत अछि ।

वापस जायवला: कियैक तँ समय केर सीमा होइछ ।

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ॥
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥८-१७॥

They who know (the true measure of) day and night, know the day of Brahma which ends in a thousand Yugas, and the night which (also) ends in a thousand Yugas.

Day and night: mean evolution and involution of the whole universe respectively.

जो दिन और रात की (वास्तविक माप को) जानते हैं, वे ब्रह्मा के उस दिन को भी जानते हैं जो एक हजार युगों में समाप्त होता है, और उस रात को भी जानते हैं जो एक हजार युगों में समाप्त होती है ।

दिन और रात: क्रमशः पूरे ब्रह्मांड का विकास और समावेशन ।

जे दिन आ रातिक (वास्तविक माप केँ) जनैत छथि, से ब्रह्मा केर ओहि दिन केँ सेहो जनैत छथि जे कि एक हजार युग मे समाप्त होइत छैक, आर ओहि राति केँ सेहो जनैत छथि जे कि एक हजार युग मे समाप्त होइत छैक ।

दिन आर राति: क्रमशः पूरे ब्रह्मांड केर विकास (इवोल्यूशन) आर समावेशन (इनवोल्यूशन) ।

अव्यक्ताद्वयक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ॥
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥८-१८॥

At the approach of (Brahma’s) day, all manifestations proceed from the unmanifested state; at the approach of night, they merger verily into that alone, which is called the unmanifested.

ब्रह्मा के दिन के आने पर, सभी चीजें अव्यक्त अवस्था (अनमैनिफेस्टेड स्टेट) से व्यक्त होती (निकलती) हैं; रात के आने पर, वे सच में उसी में मिल जाती हैं, जिसे अव्यक्त (अनमैनिफेस्टेड) कहा जाता है ।

ब्रह्माक दिन अयला पर, सब चीज अव्यक्त अवस्था (अनमैनिफेस्टेड स्टेट) सँ व्यक्त होइत (निकलैत) अछि; रातिक अयला पर, ओ सब सच मे ओही मे मिलि जाइत अछि, जेकरा अव्यक्त (अनमैनिफेस्टेड) कहल जाइत छैक ।

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ॥
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥८-१९॥

The very same multitude of beings (that existed in the preceding day of Brahma), being born again and again, merge, in spite of themselves, O son of Pritha, at the approach of night, and re-manifest at the approach of day.

Being born …. themselves: They repeatedly come forth and dissolve, being forced by the effects of their own Karma.

हे पृथा के पुत्र, वही बहुत सारे जीव (जो ब्रह्मा के पहले के दिन में थे), बार-बार जन्म लेते हैं, और रात होने पर खुद के बावजूद एक हो जाते हैं, और दिन होने पर फिर से प्रकट हो जाते हैं ।

खुद के बावजूद… जन्म लेते हैं: वे अपने कर्मों के असर से मजबूर होकर बार-बार आते हैं और घुल जाते हैं ।

हे पृथापुत्र, वैह बहुते रास जीव (जे ब्रह्माक पहिलुक दिन मे छल), बेर-बेर जन्म लैत अछि, आर रात भेला पर स्वयं केर बावजूद एक भ’ जाइत अछि (अर्थात् ब्रह्मा मे समा जाइत अछि, मिलि जाइत अछि), आर दिन भेला पर फेर सँ प्रकट (व्यक्त) भ’ जाइत अछि ।

स्वयं केर बावजूद… जन्म लैत अछि: ओ अपन कर्म सभक प्रभाव सँ मजबूर भ’ कय बेर-बेर अबैत अछि आ घुलैत अछि ।

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ॥
याः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥८-२०॥

But beyond this unmanifested, there is that other Unmanifested, Eternal Existence – that which is not destroyed at the destruction of all beings.

This unmanifested: which being the seed of the manifested, is Avidya itself.

लेकिन इस अनदेखे (अव्यक्त) से परे, एक और अनदेखे, शाश्वत अस्तित्व है – जो सभी प्राणियों (लोकों) के विनाश पर नष्ट नहीं होता ।

इस अनदेखे: जो प्रकट का बीज है, वह खुद अविद्या है ।

लेकिन एहि अनदेखल (अव्यक्त) सँ हंटिकय (परे), एकटा आर अनदेखल, शाश्वत अस्तित्व अछि – जे समस्त प्राणी (लोक सब) केर विनाश भेलापर नष्ट नहि होइता छैक ।

एहि अनदेखल: जे देखल (प्रकट, व्यक्त) केर बीज अछि, ओ स्वयं अविद्या थिक ।

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ॥
यं प्राप्य निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥८-२१॥

What has been called Unmanifested and Imperishable, has been described as the Goal Supreme. That is My highest state, having attained which, there is no return.

जिसे अव्यक्त और अविनाशी कहा गया है, उसे सर्वोच्च लक्ष्य बताया गया है । वह मेरी सबसे ऊँची अवस्था है, जिसे पाने के बाद कोई वापसी नहीं होती ।

जेकरा अव्यक्त आर अविनाशी कहल गेल अछि, ओकरा सर्वोच्च लक्ष्य कहल गेल अछि । ओ हमर सबसँ ऊँच अवस्था छी, जेकर प्राप्तिक बाद कोनो वापसी नहि होइत अछि । 

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ॥
यस्यान्तःस्थानि भूतानि ये सर्वमिदं ततम् ॥८-२२॥

And that Supreme Purusa is attainable, O son of Pritha, by a whole-souled devotion to Him alone, in Whom all beings dwell, and by Whom all this is pervaded.

और हे पृथापुत्र, उस परम पुरुष (अविनाशी ब्रह्म) को केवल उसी के प्रति पूरे मन से भक्ति करने से पाया जा सकता है, जिसमें सभी प्राणी निवास करते हैं, और जिससे यह सब व्याप्त है ।

आर हे पृथापुत्र, ताहि परम पुरुष (अविनाशी ब्रह्म) केँ केवल हुनकहि प्रति पूरा मन सँ भक्ति कयला सँ प्राप्त कयल जा सकैत अछि, जाहिमे समस्त प्राणी (लोक) निवास करैत अछि, आर जिनका सँ ई सम्पूर्ण चीज व्याप्त अछि ।

यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ॥
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥८-२३॥

Now I shall tell thee, O bull of the Bharatas, of the time (path) travelling in which, the Yogis return, (and again of that, taking which) they do not return.

That path would be explained in next verses.

अब मैं तुम्हें बताऊंगा, हे भरतवंशियों के भरतर्षभ, उस समय (रास्ते) के बारे में जिस पर चलकर योगी (वापस) लौटते हैं, (और फिर उस समय/रास्ते के बारे में भी जिस पर चलकर) वे वापस नहीं लौटते ।

उस रास्ते के बारे में अगले श्लोकों में बताया जाएगा ।

आब हम बतायब, हे भरतवंशी लोकनिक भरतर्षभ, ओहि समय (रास्ता) केर बारे मे जाहि पर चलिकय योगी (वापस) लौटैत छथि, (आर फेर ओहि समय/रास्ताक बारे मे सेहो जाहि पर चलिकय) ओ वापस नहि लौटैत छथि ।

ओहि रास्ताक बारे मे ऐगला श्लोक सब मे बतायल जायत ।

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ॥
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥८-२४॥

Fire, flame, day-time, the bright fortnight, the six months of the Northern passage of the sun – taking this path, the knowers of Brahman go to Brahman.

अग्नि, लौ, दिन का समय, शुक्ल पक्ष, सूर्य के उत्तरायण के छह महीने – इस मार्ग को अपनाते हुए, ब्रह्म के जानने वाले ब्रह्म के पास जाते हैं ।

अग्नि, (दीप केर) लौ, दिन केर समय, शुक्ल पक्ष, सूर्य केर उत्तरायणक छह मास – एहि मार्ग केँ अपनाबैत, ब्रह्म केँ जानयवला ब्रह्म केर लग (लोक) मे जाइत छथि ।

धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ॥
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥८-२५॥

Smoke, night-time, the dark fortnight, the six months of the Southern passage of the sun – taking this path the Yogi, attaining the lunar light, returns.

Swamy Swaroopananda Saraswati’s special commentary:

It is difficult to decide the true significance of these two verses (24 & 25). Some are inclined to think that each of the steps means a sphere; while others, a state of consciousness. Still others think, that the series beginning with fire means developing states of illumination and renunciation, and that beginning with smoke, increasing state of ignorance and attachment.

The two paths, Devayana and Pitrayana, by which the souls of the dead are supposed to travel to the other world according to their deserts are mentioned in the Upanishads, prominently in the Chandogya, V.x. 1, 2. Badarayana discusses these passages in the Brahma-Sutras, IV, ii, 18-21. But an interesting light has been thrown upon the question by the Late Mr. Tilak’s theory of the Arctic home of the ancestors of the Aryan race. He has also dealt with this subject specially, in a paper of great value which appeared in the Prabuddha Bharata (Vol. IX, p. 160). Considering the importance of the doctrine and the excellent way in which it has been elucidated by Mr. Tilak, we shall briefly note below the main heads of his argument.

The words Pitrayana and Devayana are used many times in the Rigveda. But the distinction made in the Upanisads about the soul’s path, according as a man died during the dark or the bright half of the year, was unknown to the bards of the Rigveda, who held the view that the soul of a man always travelled by the Pitrayana road, whatever the time of his death. It is therefore clear that the doctrine of the Upanisads was a later development, probably evolved after physical light and darkness had come to be connected with moral good and evil and the dual character of the world was established. Now, if along with this we consider that death during the Southern passage of the sun was regarded as inauspicious from the Arctic times, we can see how the distinction arose between the paths of a man’s soul according as he died in the dark or the bright part of the year.

As to the series of steps in each path, since Agni was believed to be the only leader of the soul on its path, and both paths ended with the passages of the sun, the starting and halting points thus settled, it was not difficult to fill in the intermediate steps. The dual character of the world is manifested in Agni as flame and smoke, of the other. Day and night, increasing and decreasing moon, Northern and Southern passages of the sun came next in natural order. The number of steps can easily be increased, and as a matter of fact has been increased in Kaushitaki and some other Upanisads on the same general principle.

Another point in this connection may be noted. There is nothing in the second or Pitrayana path to correspond to Agni, in the first. We must therefore either reduce the number of steps in the first path by taking the words “fire” and “flame” in appositional relation and translate the same as “fire, that is flame”, or increase the steps in the second by adding “fire” as one.

धुआं, रात का समय, कृष्ण पक्ष, सूरज के दक्षिणायन (दक्षिण दिशा में जाने के) छह महीने – इस रास्ते से योगी, चांद की रोशनी पाकर वापस लौटता है ।

इन दो श्लोकों (२४ और २५) का असली महत्व (मर्म) तय करना मुश्किल है । कुछ लोग सोचते हैं कि हर चरण का तात्पर्य एक गोला से है; जबकि दूसरा, चेतना की एक अवस्था से है । फिर भी कुछ और लोग सोचते हैं कि आग से शुरू होने वाली क्रमिक यात्रा का तात्पर्य ज्ञानप्राप्ति की प्रकाशपुंज और संन्यास (आसक्ति-बन्धन से मुक्ति) की बढ़ती हुई अवस्था से है, और धुएं से शुरू होने वाली क्रमिक यात्रा का तात्पर्य है अज्ञानता और आसक्ति की बढ़ती हुई अवस्था ।

देवयान और पितृयान, दो रास्ते, जिनसे मरे हुए लोगों की आत्माएं अपनी गुणों-कर्मों (अच्छाई या बुराई) के हिसाब से दूसरे लोकों (दुनिया) में जाती हैं, उनका ज़िक्र उपनिषदों में किया गया है, खासकर छांदोग्य, V.x. 1, 2 में । बादरायण ने ब्रह्म-सूत्र, IV, ii, 18-21 में इन रास्तों (मृतकों के आत्माओं की अन्य लोकों में जानेवाली मार्गों) पर बात की है । लेकिन स्वर्गीय श्री तिलक की आर्य जाति के पूर्वजों का आर्कटिक घर वाली सैद्धान्तिक गाथाएं (थ्योरी) ने इस सवाल पर एक दिलचस्प रोशनी डाली है । उन्होंने इस विषय पर खास तौर पर एक बहुत कीमती कार्यपत्र (पेपर) में भी बात की है, जो प्रबुद्ध भारत (वॉल्यूम IX, पेज 160) में छपा था । इस सिद्धांत के महत्व और श्री तिलक द्वारा इसे जिस बेहतरीन तरीके से समझाया गया है, उसे देखते हुए, हम नीचे उनके तर्क के मुख्य हिस्सों को संक्षेप में देखेंगे ।

ऋग्वेद में पितृयान और देवयान शब्दों का कई बार इस्तेमाल हुआ है । लेकिन उपनिषदों में आत्मा के गमन-मार्ग (रास्ते) के बारे में जो फर्क बताया गया है, कि आदमी साल के कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष में मरा, वह ऋग्वेद के कवियों (सर्जकों) को पता नहीं था, जिनका मानना ​​था कि आदमी की आत्मा हमेशा पितृयान रास्ते से ही जाती है, चाहे उसकी मौत का समय कुछ भी हो । इसलिए यह साफ़ है कि उपनिषदों का सिद्धांत बाद में बना, शायद तब बना जब भौतिक (फिजिकल) प्रकाश और अंधेरा को नैतिक अच्छाई और बुराई से जोड़ दिया गया और दुनिया का दोहरा चरित्र स्थापित हो गया । अब, अगर इसके साथ हम यह भी देखें कि आर्कटिक समय से सूरज के दक्षिणी रास्ते में मौत को अशुभ माना जाता था, तो हम देख सकते हैं कि इंसान की आत्मा के रास्तों में कैसे फर्क पैदा हुआ, यह इस बात पर निर्भर करता था कि वह साल के अंधेरे या उजाले हिस्सों में मरा ।

हर रास्ते में चरणों की क्रमिकता के बारे में, चूँकि ये माना जाता था कि अग्नि ही आत्मा को उसके रास्ते पर ले जाने वाली अकेली नेतृत्वकर्त्री (लीडर) है, और दोनों रास्ते सूरज के रास्तों पर खत्म होते थे, इस तरह शुरू करने और रुकने के विन्दु तय हो जाते थे, इसलिए बीच के चरणों (कदमों) को भरना मुश्किल नहीं था । और दूसरे में, दुनिया का दोहरा चरित्र अग्नि में आग और धुएं के रूप में दिखता है । दिन और रात, बढ़ता और घटता चाँद, सूरज के उत्तरी और दक्षिणी रास्ते प्राकृतिक क्रम (नेचुरल ऑर्डर) में आगे आये थे । कदमों की संख्या आसानी से बढ़ाई जा सकती है, और असल में कौशीतकी और कुछ दूसरे उपनिषदों में इसी आम सिद्धांत पर इसे बढ़ाया भी गया है ।

इस बारे में एक और बात पर ध्यान दिया जा सकता है  । दूसरे या पितृयान पथ में ऐसा कुछ भी नहीं है जो पहले पथ में अग्नि जैसा हो । इसलिए हमें या तो पहले पथ में, “अग्नि” और “ज्वालाएं” शब्दों को एक जैसा सन्दर्भ/तात्पर्य में प्रयुक्त हुआ समझकर कदमों की संख्या कम करनी होगी,  और उनका अनुवाद “अग्नि, यानी ज्वालाएं” जैसा करना होगा, या दूसरे पथ में एक और चरण के रूप में “अग्नि” को जोड़कर बढ़ाना होगा ।

धुआं, राति केर समय, कृष्ण पक्ष, सूरज केर दक्षिणायन (दक्षिण दिशा मे जेबाक) छह मास – एहि रास्ता सँ योगी, चांदक इजोत पाबिकय वापस लाौटैत छथि । 

एहि दुइ श्लोक (२४ आ २५) केर असली महत्व (मर्म) निर्धारित करब कठिन अछि । किछु लोक सोचैत छथि जे हरेक चरण केर तात्पर्य एकटा गोला सँ अछि; जखन कि दोसर, चेतनाक एकटा अवस्था सँ बुझल जाइछ । तैयो किछु आर लोक सोचैत छथि जे आगि सँ शुरू होयवला क्रमिक यात्राक तात्पर्य ज्ञानप्राप्तिक प्रकाशपुंज जेकाँ आ संन्यास (आसक्ति-बन्धन आदि सँ मुक्ति) केर बढ़ैत अवस्था सँ अछि, आर धुआं सँ शुरू होयवला क्रमिक यात्राक तात्पर्य अछि अज्ञानता आर आसक्ति केर बढ़ैत गेल अवस्था ।

देवयान और पितृयान, दुइ गोट बाट (रास्ता), जाहि सँ मृत लोकक आत्मा अपन गुण-कर्म (नीक या बेजा) केर हिसाब सँ दोसर दुनिया (लोक) मे जाइत अछि, एहि बातक चर्चा उपनिषद सब मे कयल गेल अछि, खासकय केँ छांदोग्य, V.x. १, २ मे । बादरायण ब्रह्म-सूत्र, IV, ii, १८-२१ मे एहि बाटसभ (मृतक केर आत्मा सभक अन्य लोक सब मे जायवला मार्ग सब) पर चर्चा कयलनि अछि । लेकिन स्वर्गीय श्री तिलक केर आर्य जातिक पूर्वज लोकनिक आर्कटिक घर वला सैद्धान्तिक कथा (थ्योरी) एहि सवाल पर एकटा रोचक प्रकाश (वर्णन) देलक अछि । ओ एहि विषय पर खास रूप सँ एकटा बेश मूल्यवान (कीमती) कार्यपत्र (पेपर) मे सेहो बात कयलनि अछि, जे प्रबुद्ध भारत (वॉल्यूम IX, पेज १६०) मे छपल छल । एहि सिद्धांत केर महत्व आर श्री तिलक द्वारा एकरा जाहि बेहतरीन ढंग सँ बुझायल गेल अछि, से देखैत, हम नीचाँ हुनकर तर्कक मुख्य भाग केँ संछेप मे देखब । 

ऋग्वेद मे पितृयान आर देवयान शब्द सभक कतेक बेर प्रयोग भेल अछि । मुदा उपनिषद सब मे आत्माक गमन-मार्ग (रास्ता) केर बारे मे जे फर्क कहल गेल अछि, जे आदमी साल केर कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष मे मरत, से बात ऋग्वेदक द्रष्टा (सर्जक, कवि) लोकनि केँ पता नहि रहनि, जिनकर माननाय रहनि जे आदमीक आत्मा हमेशा पितृयान रास्ता टा सँ जाइत अछि, चाहे ओकर मृत्युक समय कोनो भी हो । तेँ ई स्पष्ट अछि जे उपनिषद सभक सिद्धांत बाद मे बनल, शायद तखन बनल जखन भौतिक इजोत (प्रकाश) तथा अन्धकार केँ नैतिक नीक आ बेजा सँ जोड़ि देल गेल आर दुनियाक दोहरा चरित्र सेहो स्थापित भ’ गेल । आब, अगर एकरा संगहि हम सब इहो देखब जे आर्कटिक समय सँ सूरज केर दक्षिणी मार्ग मे मृत्यु केँ अशुभ मानल जाइत छल, त हम सब देखि सकैत छी जे लोकक आत्माक (गमन) मार्ग मे केना अन्तर उत्पन्न भेल, ई एहि बात पर निर्भर करैत छल जे ओ सालक अन्हरिया (कृष्णपक्ष) अथवा इजोरिया (शुक्लपक्ष) केर समय मे मरल । 

हरेक बाट मे चरण (डेग) केर क्रमिकताक सम्बन्ध मे, चूँकि ई मानल जाइत छल जे अग्नि अकेला मात्र आत्मा केँ ओकर बाट देखेनिहार नेतृत्वकर्ता अछि, आर दुनू रास्ता सूरज केर रास्ते पर खत्म होइत छल, एहि तरहें शुरू करबाक आ रुकबाक विन्दु तय भ’ जाइत छल, तेँ बीच केर डेग (चरण) सब केँ भरनाय सेहो कठिन नहि छल । आर दोसर मे, दुनियाक दोहरा चरित्र अग्नि मे आगि आ धुआंक रूप मे देखाइत अछि । दिन आर राति, बढ़ैत आ घटैत चांद, सूरज केर उत्तरी आ दक्षिणी मार्ग – ई सबटा प्राकृतिक क्रम (नेचुरल ऑर्डर) में आगाँ आयल छल । चरण (डेग) केर संख्या सहजता सँ बढ़ायल जा सकैत अछि, आर असल मे कौशीतकी तथा किछु आरो उपनिषद सब मे एहि आम सिद्धांत पर एकरा बढ़ायल सेहो गेल अछि । 

एहि बारे मे एकटा आर बात पर ध्यान देल जा सकैत अछि । दोसर यानि पितृयान पथ मे एहेन किछुओ नहि छैक जे पहिल पथ मे अग्नि जेकाँ होइक । तेँ हमरा सब केँ या त पहिल पथ मे, “अग्नि” आर “ज्वाला” (रोशनी) शब्द केँ एक जेकाँ सन्दर्भ/तात्पर्य-सम्बन्ध मे प्रयुक्त भेल बुझिकय चरण (डेग) केर संख्या केँ कम करय पड़त, आर ओकर अनुवाद “अग्नि, यानी ज्वाला” जेकाँ करय पड़त, या दोसर पथ मे एकटा आरो चरण केर रूप मे “अग्नि” केँ जोड़िकय बढ़ाबय पड़त ।

शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥८-२६॥

Truly are those bright and dark paths of the world considered eternal; one leads to non-return; by the other, one returns.

The paths are eternal, because Samsara is eternal.

सच में दुनिया के ये उजाले और अंधेरे रास्ते हमेशा रहने वाले माने जाते हैं; एक रास्ता वापस नहीं आता; दूसरा रास्ता वापस आता है ।

रास्ते हमेशा रहने वाले हैं, क्योंकि संसार हमेशा रहने वाला है ।

सच मे दुनिया केर ई इजोरिया (उजाला) आ अन्हरिया (अन्धेरा) वला रास्ता हमेशा रहयवला मानल जाइत अछि; एकटा रास्ता वापस नहि अबैत अछि; दोसर रास्ता वापस अबैत अछि । 

रास्ता हमेशा रहयवला अछि, कियैक तँ संसार हमेशा रहयवला अछि ।

नैते सृति पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन ॥
तस्मत्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥८-२७॥

No Yogi, O son of Pritha, is deluded after knowing these paths. Therefore, O Arjuna, be thou steadfast in Yoga, at all times.

Knowing that one of the paths leads to Samsara and the other to Moksa, the Yogi takes up the one leading to illumination and rejects the other.

हे पृथापुत्र, इन रास्तों को जानने के बाद भी कोई योगी भ्रमित नहीं होता । इसलिए हे अर्जुन, तुम हर समय योग में दृढ़ रहो ।

यह जानते हुए कि एक रास्ता संसार की ओर ले जाता है और दूसरा मोक्ष की ओर, योगी ज्ञान की ओर ले जाने वाले रास्ते को अपनाता है और दूसरे को छोड़ देता है ।

हे पृथापुत्र, एहि रास्ता सब केँ जानि लेलाक बाद कोनो योगी भ्रमित (मोहित) नहि होइत अछि । तेँ, हे अर्जुन, अहाँ हर समय योग मे दृढ़ रहू । 

ई जनैते जे एकटा रास्ता संसार दिश लय जाइत छैक आ दोसर मोक्ष दिश, योगी लोकनि ज्ञान दिश लय जायवला रास्ता केँ अपनाबैत अछि आ दोसर केँ छोड़ि दैत अछि । 

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ॥
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥८-२८॥

Whatever meritorious effect is declared (in the Scriptures) to accrue from (the study of) the Vedas, (the performance of) Yajnas, (the practice of) austerities and gifts – above all this rises the Yogi, having known this, and attains to the primeval, supreme Abode.

This – the truth imparted by the Lord is answer to the question of Arjuna at the beginning of the present chapter.

(शास्त्रों में) वेदों (की पढ़ाई), यज्ञों (के करने), तपस्या (का अभ्यास) और दान से जो भी पुण्य बताया गया है – यह जानकर (उपरोक्त वर्णित तथ्यों के बारे में ज्ञान प्राप्त कर), योगी इन (शास्त्र निर्देशित कर्म) सबसे ऊपर उठ जाता है, और सबसे प्राचीन, परम धाम (ब्रह्मलोक) को प्राप्त करता है ।

यह जानकर – भगवान द्वारा बताया गया सत्य, इस अध्याय की शुरुआत में अर्जुन के सवाल का जवाब है ।

(शास्त्र सब मे) वेद (केर पढ़ाइ), यज्ञ (केर आयोजन कयनाय), तपस्या (केर अभ्यास) तथा दान सँ जेहो पुण्य सब कहल गेल अछि – ई जानिकय (उपरोक्त वर्णित तथ्य सभक बारे मे ज्ञान प्राप्त कय), योगी एहि (शास्त्र निर्देशित कर्म) सबसँ उपर उठि जाइत अछि, आर सबसँ प्राचीन, परम धाम (ब्रह्मलोक) केँ प्राप्त करैत अछि ।

ई जानिकय – भगवान द्वारा कहल गेल सत्य, एहि अध्याय केर आरम्भ मे अर्जुन केर सवाल केर जवाब थिक ।

इति अक्षरब्रह्मयोगो नामाष्टमोध्यायः ॥

हरिः हरः!!

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