ॐ श्री परमात्मने नमः!!
॥षष्ठोऽध्यायः॥
श्रीभगवानुवाच ।
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ॥
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥६-१॥
The Blessed Lord said:
He who performs his bounden duty without leaning to the fruit of action – he is a renouncer of action as well as of steadfast mind: not he who is without fire, nor he who is without action.
Bounden duty: Nityakarma
Renouncer of action as well as of steadfast mind: Sannyasi and Yogi.
Without fire: He that has renounced actions enjoined by the Vedas, requiring fire as adjunct, e.g. Agnihotra
Without action: He who has renounced action which do not require fire as adjunct, such as austerities and meritorious acts like digging wells etc.
भगवान ने कहा:
जो कर्म के फल की परवाह किए बिना अपना तय कर्तव्य पूरा करता है – वह कर्म का त्यागी होने के साथ-साथ दृढ़ मन वाला भी है: ना कि वह जो आग के बिना है, ना ही वह जो कर्म के बिना (अक्रिय) है ।
तय कर्तव्य: नित्यकर्म
कर्म का त्यागी होने के साथ-साथ दृढ़ मन वाला: संन्यासी और योगी ।
अग्नि के बिना: जिसने वेदों में बताए गए कर्मों को छोड़ दिया है, जिनमें अग्नि की ज़रूरत होती है, जैसे अग्निहोत्र
कर्म के बिना (अक्रिय): जिसने ऐसे कर्मों को छोड़ दिया है जिनमें अग्नि की सहायक रूप में जरूरत नहीं होती, जैसे तपस्या एवं कुआँ खोदने जैसा अन्य पुण्य के कार्य वगैरह।
भगवान कहलनि:
जे कर्म केर फल केर परवाह कएने बिना अपन तय कर्तव्य पूरा करैत अछि – से कर्म केर त्यागी होयबाक संग-संग दृढ़ मन वाला सेहो होइछ: नहि कि ओ जे अग्निक बिना अछि, नहिये ओ जे कर्मक बिना (अक्रिय) अछि ।
तय कर्तव्य: नित्यकर्म
कर्म केर त्यागी होयबाक संग-संग दृढ़ मन वाला: संन्यासी और योगी ।
अग्निक बिना: जे वेद सब मे बतायल गेल कर्म (हवन, यज्ञादि कर्म) सब छोड़ि देने अछि, जाहि मे अग्नि केर जरूरत पड़ैत छैक, जेना अग्निहोत्र
कर्म केर बिना (अक्रिय): जे एहेन कर्म सब केँ छोड़ि देने अछि जाहि मे अग्नि केर सहायक रूप मे जरूरत पड़ैत छैक, जेना तपस्या आ इनार खुनेबा जेकाँ आरो पुण्यक काज आदि ।
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ॥
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥६-२॥
Know that to be devotion to action, which is called renunciation, O Pandava, for none becomes a devotee to action without forsaking Sankalpa.
Sankalpa – is the working of the imaging faculty, forming fancies making plans, and again brushing them aside conceiving future results, starting afresh on a new line, leading to different issues, and so on and so forth. No one can be a Karma-Yogi or a devotee to action, who makes plans and wishes for the fruit of action.
हे पांडव, इसे कर्म के प्रति समर्पण (कर्मयोग) समझो, जिसे त्याग (संन्यास) कहते हैं, क्योंकि संकल्प (सांसारिक कामनाएँ) छोड़े बिना कोई भी कर्मयोगी नहीं बनता है ।
संकल्प – कल्पना करने की शक्ति का काम है, कल्पनाएँ बनाना, योजनाएँ बनाना, और फिर उन्हें दरकिनार करके भविष्य के नतीजों के बारे में सोचना, एक नई राह पर नए सिरे से शुरुआत करना, जिससे अलग-अलग मुद्दे सामने आते हैं, वगैरह-वगैरह । कोई भी कर्म-योगी या कर्म का भक्त नहीं हो सकता, जो योजनाएँ बनाता है और कर्म के फल की कामना करता है ।
हे पांडव, एकरा कर्म प्रति समर्पण (कर्मयोग) बुझू, जेकरा त्याग (संन्यास) कहैत छैक, कियैक तँ संकल्प (सांसारिक कामना सब केँ) छोड़ने बिना कियो कर्मयोगी नहि बनैत अछि ।
संकल्प – कल्पना करबाक शक्ति केर काज अछि, कल्पना बनेनाय, योजना बनेनाय आ फेर ओकरा किनार लगाकय भविष्यक नतीजा (परिणाम) सभक बारे मे सोचनाय, एकटा नव मार्ग पर नव ढंग सँ शुरुआत कएनाय, जाहि सँ अलग-अलग मुद्दा सब सामने आबैत रहैत अछि, आदि-आदि । कियो कर्मयोगी अथवा कर्म प्रति समर्पित (भक्त) नहि भ’ सकैत अछि, जे योजना सब बनबैत अछि आ कर्मक फल केर कामना करैत अछि ।
आरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ॥
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥६-३॥
For the man of meditation wishing to attain purification of heart leading to concentration, work is said to be the way: For him, when he has attained such (concentration), inaction is said to be the way.
Purification of the heart leading to concentration – Yoga. “For a Brahmana there is no wealth like unto (the eye of) oneness, (and) evenness, truth, refinement, steadiness, harmlessness, straightforwardness, and gradual withdrawal from all all action. – Mahabharata, Shanti-Parva, 175. 38.
ध्यान करने वाले इंसान (साधक) जो हृदय की शुद्धता प्राप्ति की चाहत से एकाग्रता की ओर बढ़ता है, उसके लिये (निष्काम) कर्म करना ही रास्ता कहा गया है: फिर उसके लिए, जब वो ऐसी (एकाग्रता) प्राप्त कर लेता है, तो कर्म नहीं करना (अक्रिय होना) ही रास्ता कहा गया है ।
हृदय की शुद्धि जिससे एकाग्रता हो – योग । “एक ब्राह्मण के लिए एकत्व, समत्व, सत्य, सुधार, स्थिरता, नुकसान न पहुंचाने वालापन, सीधापन, और सभी कर्मों से धीरे-धीरे दूर होने जैसी और कोई दौलत नहीं है ।” – महाभारत, शांति-पर्व, १७५-३८ ।
ध्यान करयवला लोक (साधक) जे हृदयक शुद्धता प्राप्तिक चाहत सँ एकाग्रता (ध्यान लगेबा दिश) बढ़ैत अछि, ओकरा लेल (निष्काम) कर्म कयनाइये सही बाट (रास्ता) कहल गेल अछिः फेर ओकरा लेल, जखन ओ एकाग्रता (ध्यान लगबय मे सफलता) प्राप्त कय लैथछ, तँ कर्म नहि करब (अक्रिय होयब) केँ सही बाट (रास्ता) कहल गेल अछि ।
हृदय केर शुद्धि जाहिसँ एकाग्रता हो – योग । “एकटा ब्राह्मणक लेल एकत्व, समत्व, सत्य, सुधार, स्थिरता, नोकसान नहि पहुंचाबयवालापन (पन माने बैन), सीधापन, आर समस्त कर्म सब सँ धीरे-धीरे दूर होयबाक जेकाँ आर कोनो सम्पत्ति नहि होइछ ।” – महाभारत, शांति-पर्व, १७५-३८ ।
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ॥
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥६-४॥
Verily, when there is no attachment, either to sense-objects, or to actions, having renounced all Sankalpas, then is one said to have attained concentration.
Attained concentration: Yogarudha
Renouncer of all Sankalpas: “O desire, I know where thy root lies; thou art born of Sankalpa. I shall not think of thee, and thou shall cease to exist, together with thy root.” – Mahabharata, Shanti-Parva, 177.25.
सच में, जब इंद्रियों या कर्मों से कोई लगाव (आसक्ति) नहीं रहता, और सभी संकल्प छोड़ दिए जाते हैं, तो कहा जाता है कि व्यक्ति ने एकाग्रता पा ली है ।
एकाग्रता पा ली: योगारूढ़
सभी संकल्पों का त्यागी: “हे इच्छा, मैं जानता हूँ कि तुम्हारी जड़ कहाँ है; तुम संकल्प से पैदा हुए हो । मैं तुम्हारे बारे में नहीं सोचूँगा, और तुम अपनी जड़ के साथ ही खत्म हो जाओगे ।” – महाभारत, शांति-पर्व, १७७.२५.
सच मे, जखन इंद्रिय सब या कर्म सब सँ कोनो लगाव (आसक्ति) नहि रहैछ, आर सबटा संकल्प छोड़ि देल जाइत अछि, तखन कहल जाइछ जे लोक एकाग्रता (ध्यान) पाबि गेल अछि ।
एकाग्रता पाबि गेल: योगारूढ़
सब संकल्प सभक त्यागी: “हे इच्छा, हम जनैत छी जे तोहर जैड़ कतय अछि; तूँ संकल्प सँ जन्म लेने छँ । हम तोहर बारे मे नहि सोचब, आर तूँ अपन जैड़ केर संगहि खत्म भ’ जेमें ।” – महाभारत, शांति-पर्व, १७७.२५.
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ॥
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥६-५॥
A man should uplift himself by his own self, so let him not weaken this self. For this self is the friend of oneself, and this self is the enemy of oneself.
The self-conscious nature of man is here considered in two aspects as being both the object of spiritual uplift and the subject of spiritual uplift, the ego acted upon and the ego acting upon the former. This latter active principle or ego should be kept strong in its uplifting function, for it is apt to turn an enemy if it is not a friend; and the next verse explain the reason.
इंसान को खुद से ही खुद को ऊपर उठाना चाहिए, इसलिए उसे इस खुद को कमज़ोर नहीं करना चाहिए । क्योंकि यह खुद ही खुद का दोस्त है, और यह खुद ही खुद का दुश्मन है ।
इंसान के आत्म-ज्ञानी स्वभाव को यहाँ दो तरह से देखा गया है, एक तो यह आध्यात्मिक तरक्की का उद्देश्य और आध्यात्मिक तरक्की का विषय दोनों है, दूसरा अहंता (ईगो) जिस पर काम किया जाता है और अहंता (ईगो) जो पहले वाले (ईगो) पर काम करता है । इस दूसरेवाले सक्रिय तत्त्व या अहंता (ईगो) को अपने ऊपर उठाने वाले काम में मजबूत रखना चाहिए, क्योंकि अगर यह दोस्त नहीं है तो दुश्मन बन सकता है; और अगला श्लोक में इसका कारण बताया गया है ।
मनुष्य केँ स्वयं सँ स्वयं केँ उपर उठेबाक चाही, तेँ ओकरा एहि स्वयं केँ कमजोर नहि करबाक चाही । कियैक तँ ओ स्वयं टा स्वयं केर मित्र थिक, आर स्वयं टा स्वयं केर दुश्मन थिक ।
मनुष्य केर आत्म-ज्ञानी स्वभाव केँ एतय दुइ रूप सँ देखल गेल अछि, एक त ई आध्यात्मिक प्रगति (तरक्की) केर उद्देश्य आ आध्यात्मिक प्रगतिक विषय दुनू थिक, दोसर अहंता (ईगो) जेकरा उपर काज कयल जाइत अछि आर अहंता (ईगो) जे पहिल वला पर काज करैत अछि । यैह दोसरवला सक्रिय तत्त्व या अहंता (ईगो) केँ अपना (अपन सेल्फ – आत्मा यानि स्वयं) केँ उपर उठबयवला काज मे मजगूत रखबाक चाही, कियैक तँ जँ ई मित्र नहि बनत त दुश्मन बनि सकैत अछि; आर ऐगला श्लोक मे एकर कारण बतायल गेल अछि ।
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ॥
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥६-६॥
The self (the active part of our nature) is the friend of the self, for him who has conquered himself by this self. But to the unconquered self, this self is inimical, (and behaves) like (an external) foe.
The self is the friends of one, in whom the aggregate of the body and the senses has been brought under control, and any enemy when such is not the case.
आत्मा (हमारे प्रकृति का सक्रिया हिस्सा) स्वयं का मित्र है, उसके लिए जिसने इस स्वयं (आत्मा) से स्वयं (आत्मा) को जीत लिया है । लेकिन जिस आत्मा को जीता नहीं गया है, उसके लिए यह आत्मा शत्रु के समान है, जो एक (बाहरी) शत्रु (की तरह बर्ताव करता) है ।
आत्मा उसका मित्र होता है, जिसने समग्र शरीर और इंद्रियों के समूह को नियंत्रण में कर लिया है, और जब ऐसा न हो तो वही एक शत्रु होता है ।
आत्मा (हमरा लोकनिक प्रकृतिक सक्रिय भाग) स्वयं (आत्मा) केर मित्र थिक, से ओकरा लेल जे एहि स्वयं अपना (आत्मा) केँ अपना आप (स्वयं आत्मा) द्वारा जितने अछि । लेकिन जे अपन स्वयं पर जीत हासिल नहि कय सकल अछि, ओकरा लेल ई (स्वयं) आत्मा शत्रुवत छैक, जे (बाहरी) शत्रु (जेकाँ व्यवहार करैत) छैक ।
आत्मा ओकर मित्र छैक, जे समग्र शरीर आ इंद्रिय सभक समूह केँ नियंत्रण कय लेने अछि, आ जँ एना नहि भेल छैक त वैह ओकर दुश्मन होइत छैक ।
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ॥
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥६-७॥
To the self-controlled and serene, the Supreme Self is the object of constant realisation, in cold and heat, pleasure and pain, as well as in honour and dishonour.
Hence he remains unruffled in pleasant and adverse environments.
खुद पर काबू रखने वाले और शांत इंसान के लिए, भगवान ही लगातार महसूस करने का विषय है, चाहे सर्दी हो या गर्मी, सुख हो या दु:ख, साथ ही मान हो या अपमान हो ।
इसलिए वह अच्छे और बुरे माहौल में भी शांत रहता है ।
स्वयं पर नियंत्रण रखनिहार आ शान्त व्यक्ति लेल, भगवान टा निरन्तर अनुभव करयवला विषय छथि, चाहे जाड़ हो कि गर्मी, सुख हो कि दुःख, संगहि मान हो कि अपमान ।
तेँ ओ नीक आ बेजा दुनू माहौल मे शान्त रहैत अछि ।
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ॥
युक्त इत्युच्यते योगी समालोष्टाश्मकाञ्चनः ॥६-८॥
Whose heart is filled with satisfaction by wisdom and realisation, and is changeless, whose senses are conquered, and to whom a lump of earth, stone, and gold are the same; that Yogi is called steadfast.
Wisdom – Jnana: knowledge of Sastras.
Realisation – Vijnana: one’s own experience of the teachings of Sastras.
Changeless – like the anvil. Things are hammered and shaped on the anvil, but the anvil remains unchanged; in the same manner he is called Kutastha – whose heart remains unchanged though objects are present.
जिसका दिल ज्ञान और एहसास से संतुष्टि से भर गया है, और जो कभी नहीं बदलता, जिसकी इंद्रियां जीत ली गई हैं, और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सोना एक समान हैं; उस योगी को दृढ़ निश्चयी कहा जाता है ।
ज्ञान: शास्त्रों का ज्ञान ।
एहसास – विज्ञान: शास्त्रों की शिक्षाओं का अपना अनुभव ।
बिना बदलाव – निहाई की तरह । निहाई पर चीज़ों को ठोंका और आकार दिया जाता है, लेकिन निहाई वैसी ही रहती है; उसी तरह उसे कूटस्थ कहा जाता है – जिसका दिल तब भी नहीं बदलता जब चीज़ें मौजूद हों ।
जेकर हृदय ज्ञान आ अनुभूति सब सँ सन्तुष्टि सँ भरि गेल अछि, आर जे कखनहुँ नहि बदलैत अछि, जेकर इंद्रिय जीति लेल गेल अछि, आर जेकरा वास्ते माटि, पाथर आ सोना एक्के समान अछि; ताहि योगी केँ दृढ़निश्चयी (दृढ़प्रतिज्ञ) कहल जाइत छैक ।
ज्ञान: शास्त्र सभका ज्ञान ।
अनुभूति – विज्ञान: शास्त्र सभक शिक्षा सभक अपन अनुभव ।
बिना बदलाव – निहाई जेकाँ । निहाई पर चीज सब केँ ठोकल आ आकार देल जाइत छैक, लेकिन निहाई ओहिनाक ओहने रहैत अछि’ ताहि तरहें ओकरा कूटस्थ कहल जाइत छैक – जेकर हृदय तखनहुँ नहि बदलैत छैक जखन तेहेन चीज सब उपस्थित होइ ।
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ॥
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥६-९॥
He attains excellence who looks with equal regard upon well-wishers, friends, foes, neutrals, arbiters, the hateful, the relatives, and upon the righteous and the unrighteous alike.
वह श्रेष्ठता प्राप्त करता है जो शुभचिंतकों, मित्रों, शत्रुओं, तटस्थ लोगों, मध्यस्थों, नफ़रत करने वालों, रिश्तेदारों, तथा अच्छे और बुरे लोगों को समान रूप से देखता है ।
ओ श्रेष्ठता प्राप्त करैत अछि जे शुभचिंतक, मित्र, शत्रु, तटस्थ लोक, मध्यस्थ, घृणा करयवला, नातादार, आ नीक एवं बेजा लोक केँ समान रूप सँ देखैत अछि ।
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ॥
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥६-१०॥
The Yogi should constantly practise concentration of the heart, retiring into solitude, alone, with the mind and body subdued, and free from hope and possession.
योगी को लगातार दिल को एकाग्र करने की अभ्यास करनी चाहिए, अकेले एकांत में जाना चाहिए, मन और शरीर को शांत रखना चाहिए, और उम्मीद और जुनून से मुक्त होना चाहिए ।
योगी केँ लगातार हृदय केँ एकाग्र (ध्यान मे केन्द्रित) करबाक अभ्यास करबाक चाही, असगर एकान्त मे जेबाक चाही, मन आ शरीर केँ शान्त रखबाक चाही, आर आशा (उम्मीद) तथा परिग्रह (सम्पत्ति) सब सँ मुक्त हेबाक चाही ।
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ॥
नात्युच्छ्रतं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥६-११॥
Having established in a cleanly spot his seat, firm, neither too high nor too low, made of a cloth, a skin, and Kusa-grass, arranged in consecution.
Arranged in consecution: that – the Kusa-grass arranged on the ground; above that, a tiger or a deer skin, covered by a cloth.
एक साफ़ जगह पर अपना आसन स्थापित किया, मज़बूत, न ज़्यादा ऊँचा न ज़्यादा नीचा, कपड़े, खाल और कुश-घास से बना, एक के बाद एक रखकर बनाया हुए (आसन) ।
एक के बाद एक व्यवस्थित: वह – ज़मीन पर कुश-घास व्यवस्थित; उसके ऊपर, एक बाघ या हिरण की खाल, कपड़े से ढकी हुई ।
एकटा साफ स्थान पर अपन आसन स्थापित करय, मजगूत, नहि बेसी ऊँच न बेसी नीचाँ, कपड़ा, खाल आ कुश-घास सँ बनल, एक केर बाद एक केँ राखिकय बनायल (आसन) ।
एक केर बाद एक व्यवस्थित: ओ (साधक) – जमीन पर कुश-घास व्यवस्थित राखिकय; ओकर उपर, एकटा बाघ या हरिणक खाल, कपड़ा सँ झाँपल रहय ।
तत्रैकाग्रं मनः कृत्व यतचित्तेन्द्रियक्रियः ॥
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥६-१२॥
There, seated on that seat, making the mind one-pointed and subduing the action of the imaging faculty and the senses, let him practise Yoga for the purification of the heart.
वहाँ, उस आसन पर बैठकर, मन को एकाग्र करके और कल्पना करने की शक्ति और इंद्रियों की क्रिया को वश में करके, उसे हृदय की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करना चाहिए ।
ओतय, ओहि आसन पर बैसिकय, मन केँ एकाग्र कयकेँ आर कल्पना करबाक शक्ति एवं इंद्रिय सभक क्रिया केँ वश मे कयकेँ, ओकरा हृदय केर शुद्धिक लेल योग केर अभ्यास करबाक चाही ।
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ॥
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥६-१३॥
Let him firmly hold his body, head, and neck erect and still, (with the eyeballs fixed, as if) gazing at the tip of his nose, and not looking around.
Gazing at the tip of his nose – could not be literally meant here, because then the mind would be fixed only there, and not on the Self; when the eyes are half-closed in meditation, and the eye-balls are still, the gaze is directed, as it were, on the tip of the nose.
वो अपना शरीर, सिर और गर्दन को मजबूती से सीधा और स्थिर रखे, (नेत्रगोलक को स्थिर रखते हुए, जैसे कि) अपनी नाक की नोक को देख रहा हो, और इधर-उधर न देखे ।
उसकी नाक की नोक पर टकटकी लगाना – यहाँ शाब्दिक अर्थ नहीं हो सकता है, क्योंकि तब मन केवल वहीं पर केंद्रित होगा, स्वयं पर नहीं; जब ध्यान में आंखें आधी बंद होती हैं और नेत्रगोलक स्थिर होते हैं, तो दृष्टि, मानो, नाक की नोक पर निर्देशित होती है ।
ओ अपन शरीर, सिर आर गर्दन केँ मजगूती सँ सीधा आ स्थिर राखय, (नेत्रगोलक केँ स्थिर राखैत, जेना कि) अपन नाकक नोक केँ देखि रहल हो, आर एम्हर-आम्हर नहि देखय ।
ओकर नाक केर नोक पर टकटकी लगेनाय – एतय शाब्दिक अर्थ नहि भ’ सकैत छैक, कियैक तँ तखन मन मात्र ओतहि केन्द्रित हेतैक, स्वयं पर नहि; जखन ध्यान मे आँखि आधा बन्द होइत छैक आ नेत्रगोलक स्थिर होइत छैक, त दृष्टि, मानू, नाक केर नोक पर निर्देशित होइत छैक ।
प्रशान्तात्मा विगतभीर्बह्मचारिव्रते स्थितः ॥
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥६-१४॥
With the heart serene and fearless, firm in the vow of a Brahmachari, with the mind controlled, and ever thinking of Me, let him sit (in Yoga) having Me as his supreme goal.
दिल शांत और निडर होकर, ब्रह्मचारी के व्रत में पक्के होकर, मन को काबू में रखकर, और हमेशा मेरा ध्यान करते हुए, मुझे अपना सबसे बड़ा लक्ष्य मानकर (योग में) बैठे ।
हृदय शान्त ओ निडर भ’ कय, ब्रह्मचर्यक व्रत मे दृढ़ बनिकय, मन केँ नियंत्रण मे राखिकय, आ हमेशा हमरहि (परमात्मा) केर ध्यान करैत, हमरे अपन सब सँ पैघ लक्ष्य मानिकय (योग मे) बैसय ।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ॥
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥६-१५॥
Thus always keeping the mind steadfast, the Yogi of subdued mind attains the peace residing in Me – the peace which culminates in Nirvana (Moksha).
इस तरह मन को हमेशा स्थिर रखकर, शांत मन वाला योगी मुझमें रहने वाली शांति को पाता है – वह शांति जो निर्वाण (मोक्ष) में मिलती है ।
एहि तरहें मन केँ हमेशा स्थिर राखिकय, शान्त मनवाला योगी हमरा मे रहयवला शान्ति केँ प्राप्त करैत अछि – ओ शान्ति जेकरा निर्वाण (मोक्ष) मे भेटैत छैक ।
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः॥
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥६-१६॥
(Success in) Yoga is not for him who eats too much or too little – nor, O Arjuna, for him who sleeps too much or too little.
The Yoga-Sastra prescribes: “Half (the stomach) for food and condiments, the third (quarter) for water, and the fourth should be reserved for free motion of air.”
योग में सफलता उसके लिए नहीं है जो बहुत ज़्यादा या बहुत कम खाता है – और न ही, हे अर्जुन, उसके लिए है जो बहुत ज़्यादा या बहुत कम सोता है ।
योग-शास्त्र कहता है: “आधा (पेट) खाने और मसालों के लिए, तीसरा (चौथाई हिस्सा) पानी के लिए, और चौथा हिस्सा हवा के आने-जाने के लिए बचाकर रखना चाहिए ।”
योग मे सफलता ओकरा लेल नहि छैक जे बहुत बेसी खाइत अछि या बहुत कम खाइत अछि – आ नहिये, हे अर्जुन, ओकरा लेल छैक जे बहुते बेसी बहुत कम सुतैत अछि ।
योग-शास्त्र कहैत अछि: “आधा (पेट) खाना आ मर-मसाला (अनाजक अतिरिक्त) लेल तेसर (चौथाइ भाग) पानिक लेल, आर चारिम चौथाइ भाग हवा अयबा-जयबा लेल बचाकय रखबाक चाही ।”
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ॥
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥६-१७॥
To him who is temperate in eating and recreation, in his effort for work, and in sleep and wakefulness, Yoga becomes the destroyer of misery.
जो खाने और मनोरंजन में, काम करने की कोशिश में, और सोने व जागने में संयम रखता है, उसके लिए योग दुःख का नाश करने वाला बन जाता है ।
जे खेनाय आ मनोरंजन मे, काज करय केर प्रयत्न मे, आर सुतय तथा जागय मे संयम रखैत अछि, ओकरा लेल योग दुःख केँ नाश करयवला बनि जाइत छैक ।
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ॥
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥६-१८॥
When the completely controlled mind rests serenely in the Self alone, free from longing after all desires, then is one called steadfast (in the Self).
जब पूरी तरह से संयमित किया हुआ मन (चित्त) शांति से सिर्फ आत्मा में रहता है, सभी इच्छाओं से मुक्त, तब उसे (आत्मा में) स्थिर कहा जाता है ।
जखन पूरे तरीका सँ संयमित कयल गेल मन (चित्त) शान्ति सँ मात्र आत्मा मे रहैत अछि, सम्पूर्ण इच्छा सब सँ मुक्त, तखन ओकरा (आत्मा मे) स्थिर कहल जाइत छैक ।
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ॥
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥६-१९॥
“As a lamp in a spot sheltered from the wind does not flicker” – even such has been the simile used for a Yogi of subdued mind, practising concentration in the Self.
“जैसे हवा से सुरक्षित जगह पर रखा हुआ दीपक नहीं टिमटिमाता” – ऐसी ही उपमा शांत मन वाले योगी के लिए इस्तेमाल की गई है, जो खुद पर ध्यान लगाने की अभ्यास करता है ।
“जेना हवा सँ सुरक्षित स्थान पर राखल गेल दीपक नहि टिमटिमाइछ (भुकभुकाइछ)” – एहने उपमा शान्त मनवला योगीक लेल प्रयोग कयल गेल अछि, जे स्वयं पर ध्यान लगेबाक अभ्यास करैत अछि ।
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ॥
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥६-२०॥
सुमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥६-२१॥
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ॥
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥६-२२॥
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ॥
स निश्चयेन योक्तव्यो योहोऽनिर्विण्णचेतसा ॥६-२३॥
When the mind, absolutely restrained by the practice of concentration, attains quietude, and when seeing the Self by the self, one is satisfied in his own Self; when he feels that infinite bliss – which perceived by the (purified) intellect and which transcends the senses, and established wherein he never departs from his real state; and having obtained which, regards no other acquisition superior to that, and where established, he is not moved even by heavy sorrow; let that be known as the state, called by the name of Yoga – a state of severance from the contact of pain. This Yoga should be practised with perseverance, undisturbed by depression of heart.
Which is perceived… intellect: Which the purified intellect can grasp independently of the senses. When in meditation the mind is deeply concentrated, the senses do not function and are resolved into their cause – that is, the mind; and when the latter is steady, so that there is only the intellect functioning, or in other words, cognition only exists, the indescribable Self is realised.
@All
Ponder the way of meditation – concentration. What should be the state of mind and intellect, how senses function, etc. Very important to keep the depressions of heart controlled, do not feel anything other than the Self (Paramatma) by the self (Aatma).
जब मन, ध्यान लगाने की अभ्यास से पूरी तरह काबू में होकर, शांति पा लेता है, और जब स्वयं (आत्मा) को स्वयं से देखता है, तो इंसान अपने आप में संतुष्ट (खुश) होता है; जब उसे वह अनन्त (परम) आनन्द महसूस होती है – जिसे (शुद्ध) बुद्धि महसूस करती है और जो इंद्रियों से परे हैं, और जहाँ पहुँचकर (मनःस्थिति को स्थापित कर) वह अपनी इस यथार्थ अवस्था से कभी नहीं भटकता; और जिसे पाकर, वह किसी दूसरी चीज़ को उससे बेहतर नहीं मानता, और जहाँ वह स्थापित हो जाता है, वहाँ भारी दुःख भी उसे परेशान नहीं करता; उसे इस अवस्था जानो, जिसको ‘योग’ के नाम से जाना जाता है – दर्द के संपर्क से अलग होने की एक अवस्था । इस योग को हृदय की कार्यक्षमता में कोई कमी से बिना परेशान हुए, अत्यन्त दृढ़ता (लगन) के साथ अभ्यास करना चाहिए ।
जिसे (शुद्ध) बुद्धि महसूस करती है …: जिसे शुद्ध बुद्धि इंद्रियों से अलग होकर समझ सकती है । जब ध्यान में मन गहराई से एकाग्र होता है, इंद्रियां काम नहीं करतीं और अपने कारण – यानी मन में मिल जाती हैं; और जब मन स्थिर होता है, ताकि सिर्फ बुद्धि काम कर रही होती हो, या दूसरे शब्दों में, सिर्फ ज्ञान ही मौजूद हो, तो अवर्णनीय आत्मा का एहसास होता है ।
@All
योग के तरीके – ध्यान पर विचार करें । मन और बुद्धि की हालत कैसी होनी चाहिए, इंद्रियां कैसे काम करती हैं, वगैरह । दिल के कार्यक्षमता में कमी (डिप्रेशन अफ हार्ट) को नियंत्रण में रखना बहुत ज़रूरी है, खुद से परमात्मा के अलावा कुछ और महसूस न करें ।
जखन मन, ध्यान लगेबाक अभ्यास सँ पूरापूरी नियंत्रण मे रहिकय, शान्ति पाबि लैत अछि, आर जखन स्वयं (आत्मा) केँ स्वयं सँ देखैत अछि, तखन मनुष्य अपना आप मे सन्तुष्ट (प्रसन्न) रहैत अछि; जखन ओकरा अनन्त प्रसन्नता (परमानन्द, परम सन्तुष्टि) प्राप्त होइत छैक – जेकरा (शुद्ध) बुद्धि अनुभव करैत छैक आर जे इन्द्रिय सब सँ परे होइत अछि, आर जेतय पहुँचिकय (मनःस्थिति केँ स्थापित कय केँ) ओ अपन एहि असल (यथार्थ, वास्तविक) अवस्था सँ कखनहुँ नहि भटकैत अछि; आर जेकरा पाबिकय, ओ कोनो दोसर चीज केँ ओकरा सँ बेसी नीक नहि मानैछ, आर जाहिठाम ओ स्थापित भ’ जाइछ, ओहिठाम भारी दुःख सेहो ओकरा परेशान नहि करैत छैक; ओकर एहि अवस्था केँ जानू (बुझू), जेकरा ‘योग’ केर नाम सँ जानल जाइत छैक – दर्द (कष्ट) केर सम्पर्क सँ अलग रहबाक एकटा अवस्था (मानल जाइत छैक) । एहि योग केँ हृदय केर कार्यक्षमता मे कोनो कमियो (अयला) सँ बिना परेशान भेने, अत्यन्त दृढ़ता (लगन) केर संग अभ्यास करबाक चाही ।
जेकरा (शुद्ध) बुद्धि अनुभव करैत छैक …: जेकरा शुद्ध बुद्धि इन्द्रिय सब सँ अलग भ’ कय बुझि सकैत अछि । जखन ध्यान मे मन गहिंराइ सँ एकाग्र होइत अछि, इंद्रिय सब काज नहि करैछ आर अपन कारण – यानी मन मे मिल जाइछ; आर जखन मन स्थिर रहैछ, जाहि सँ खाली बुद्धि काज कय रहल होइत छैक, या दोसर शब्द मे, मात्र ज्ञान टा उपस्थित रहैत छैक, तखन अवर्णनीय आत्माक अनुभूति होइत छैक ।
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योग केर तरीका – ध्यान पर विचार करय जाउ । मन आ बुद्धि केर हालत केहेन हेबाक चाही, इंद्रिय सब केना काज करैत छैक, आदि । हृदय केर कार्यक्षमता मे कमी (डिप्रेशन अफ हार्ट) केँ नियंत्रण मे रखनाय बहुत जरूरी छैक, स्वयं सँ परमात्माक अतिरिक्त किछुओ आर नहि अनुभव करू ।
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ॥
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥६-२४॥
Abandoning without reserve all desires born of Sankalpa, and completely restraining, by the mind alone, the whole group of senses from their objects in all directions;
संकल्प से उत्पन्न समस्त कामनाओं का बिना किसी संकोच के त्याग करना तथा इन्द्रियों के सम्पूर्ण समूह को केवल मन के द्वारा ही सब दिशाओं में उनके विषयों से पूर्णतया निग्रह कर देना;
संकल्प सँ उत्पन्न समस्त कामना सब केँ बिना कोनो संकोच केँ त्याग कयनाय तथा इंद्रिय सभक सम्पूर्ण समूह केँ मात्र मनहि टा द्वारा सब दिशा मे ओकर विषय सब सँ पूर्णतया निग्रह कय देनाय;
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ॥
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥६-२५॥
With the intellect set in patience, with the mind fastened on the Self, let him attain quietude by degrees; let him not think of anything.
बुद्धि को धैर्य में रखकर, मन को आत्मा पर स्थिर करके, उसे धीरे-धीरे शांति (स्थिरता) प्राप्त करनी चाहिए; उसे किसी भी चीज़ के बारे में नहीं सोचना चाहिए ।
बुद्धि केँ धीरज मे राखिकय,मन केँ आत्मा पर स्थिर कयकेँ, ओकरा धीरे-धीरे शान्ति (स्थिरता) प्राप्त करबाक चाही; ओकरा कोनो चीजक बारे नहि सोचबाक चाही ।
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ॥
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥६-२६॥
Through whatever reason the restless, unsteady mind wanders away, let him, curbing it from that, bring it under the subjugation of the Self alone.
जिस भी कारण से बेचैन, अस्थिर मन भटकता है, उसे उन चीजों से मोड़कर, केवल आत्मा के वश में कर ले ।
जेहो कारण सँ बेचैन, अस्थिर मन भटकैत अछि, ओकरा ताहि चीज सब सँ मोड़िकय, मात्र आत्माक वश मे कय लिय’ ।
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ॥
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥६-२७॥
Verily, the supreme bliss comes to that Yogi of perfectly tranquil mind, with passions quieted, Brahman-become, and freed from taint.
Brahman-become: i.e., one who has realised that all Brahman.
Taint – of good and evil.
सच में, परम आनंद उस योगी को मिलता है जिसका मन पूरी तरह शांत हो, जिसकी भावनाएं शांत हों, जो ब्रह्म बन गया हो, और जो कलंक से मुक्त हो ।
ब्रह्म बन गया हो: यानी, जिसने यह जान लिया है कि सब ब्रह्म है ।
कलंक – अच्छाई और बुराई का ।
सच मे, परम आनन्द ओहि योगी केँ भेटैत छैक जेकर मन पूरापूरी शान्त हो, जेकर भावना सब शान्त हो, जे ब्रह्म बनि गेल हो, आर जे कलंक (दाग सब) सँ मुक्त हो ।
ब्रह्म बनि गेल हो: यानी, जे ई जानि लेलक जे सब किछु ब्रह्म थिक ।
कलंक (दाग सब) – नीक आर बेजा केर (द्वंद्व) मे पड़नाय एतय कलंक (दाग सब) लगनाय बुझल जेबाक चाही ।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ॥
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥६-२८॥
The Yogi, freed from taint (of good and evil), constantly engaging the mind thus, with ease attains the infinite bliss of contact with Brahman.
योगी, (अच्छे और बुरे के) दाग (कलंक) से मुक्त होकर, लगातार मन को इसी तरह लगाकर, आसानी से ब्रह्म के संपर्क का अनंत आनंद पा लेता है ।
योगी, (नीक आर बेजा केर) दाग सब (कलंक) सँ मुक्त भ’ कय, लगातार मन केँ एहि तरहें लगाकय, आसानी सँ ब्रह्म केर सम्पर्क केर अनन्त आनन्द पाबि लैत अछि ।
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ॥
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥६-२९॥
With the heart concentrated by Yoga, with the eye of evenness for all things, he beholds the Self in all beings and all beings in the Self.
योग से एकाग्र हृदय से, सभी चीज़ों के लिए एक जैसी दृष्टि से, वह सभी प्राणियों में आत्मा को और सभी प्राणियों को आत्मा में देखता है ।
योग सँ एकाग्र हृदय सँ, सब चीज वास्ते एक्के जेकाँ नजरि (दृष्टि) से, ओ सब प्राणी सब मे आत्मा केँ आ सब प्राणी सब केँ आत्मा मे देखैत अछि ।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ॥
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६-३०॥
He who sees Me in all things and sees all things in Me, he never becomes separated from Me, nor do I become separated from him.
Separated: i.e., by time, space, or anything intervening.
जो सब वस्तुओं में मुझे देखता है और सब वस्तुओं को मुझमें देखता है, वह कभी मुझसे अलग नहीं होता और न मैं उससे अलग होता हूँ ।
अलग: यानी, समय, जगह, या बीच में आने वाली किसी भी चीज से ।
जे सब वस्तु सब मे हमरा देखैत अछि आर सब वस्तु सब केँ हमरा मे देखैत अछि, ओ कहियो हमरा सँ अलग नहि होइत अछि आर नहिये हम ओकरा सँ अलग होइत छी ।
अलग: यानी, समय, जगह, या बीच मे आबयवाली कोनो चीज (बाधा, फर्क, आदि) सँ ।
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ॥
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥६-३१॥
He who being established in unity, worships Me, who am dwelling in all beings, whatever his mode of life, that Yogi abides in Me.
Worships Me: Realises Me as the Self of all.
Established in unity: i.e., having resolved all duality in the underlying unity.
जो एकात्म भाव में स्थित होकर, मेरी पूजा करता है, मैं जो सभी प्राणियों में निवास करता हूँ, चाहे उनका जीवन कैसा भी हो, वह योगी मुझमें रहता है ।
मेरी पूजा करता है: मुझे सभी की आत्मा के रूप में महसूस करता है ।
एकात्म भाव में स्थित: यानी, सभी द्वैत को मूल एकता में सुलझाकर ।
जे एकात्म भाव मे स्थित रहिकय, हमर पूजा करैत अछि, हम जे समस्त प्राणी मे निवास करैत छी, चाहे ओकर जीवन केहनो हो, ओ योगी हमरा मे रहैत अछि ।
हमर पूजा करैत अछि: हमरा सभक आत्माक रूप मे अनुभूति करैत अछि ।
एकात्म भाव मे स्थित: यानी, सब द्वैत केर मूल एकता मे सोझराकय (एकता मे परिणत कय केँ अपन मन केँ मना लैछ) ।
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ॥
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥६-३२॥
He who judges of pleasure or pain everywhere, by the same standard as he applies to himself, that Yogi, O Arjuna, is regarded as the highest.
Seeing that whatever is pleasure or pain to himself, is alike pleasure or pain to all beings, he, the highest of Yogis, wishes good to all and evil to none – he is always harmless and compassionate to all creatures.
हे अर्जुन, जो हर जगह सुख या दुःख को उसी पैमाने से देखता है, जिस पैमाने से वह सुख या दुःख को खुद के लिये देखता है, वह योगी सबसे ऊँचा माना जाता है ।
यह देखकर कि जो चीज उसे सुख या दुःख देती है, वही सभी प्राणियों को भी सुख या दुःख देती है, वह सबसे ऊँचा योगी, सभी के लिए अच्छा और किसी का बुरा नहीं चाहता – वह हमेशा सभी प्राणियों के लिए नुकसान न पहुँचाने वाला और दयालु होता है ।
हे अर्जुन, जे हरेक ठाम सुख या दुःख केँ वैह मापदंड सँ देखैछ, जाहि मापदंड सँ ओ सुख या दुःख केँ अपना लेल देखैछ, ओ योगी सब सँ श्रेष्ठ (उच्च) मानल जाइत अछि ।
ई देखिकय कि जे चीज ओकरा सुख या दुःख दैत छैक, वैह सब प्राणी सब केँ सेहो सुख या दुःख दैत छैक, ओ सब सँ श्रेष्ठ (उच्च) योगी, सभक लेल नीक आ केकरो लेल खराब नहि चाहैत अछि – ओ हमेशा सब प्राणी सभक लेल नुकसान नहि पहुँचाबयवला आ दयालु होइत अछि ।
अर्जुन उवाच ।
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ॥
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम् ॥६-३३॥
Arjuna said:
This Yoga which has been taught by thee, O slayer of Madhu, as characterised by evenness, I do not see (the possibility of) its lasting endurance, owing to restlessness (of the mind).
अर्जुन ने कहा:
हे मधु के संहारक, आपने जो यह योग सिखाया है, जो समता से बना है, मन की बेचैनी के कारण मुझे इसके टिकने की संभावना नहीं दिखती ।
अर्जुन कहलनि:
हे मधु केर संहारक, अपने जे ई योग सिखेलहुँ अछि, जे समता (सब मे एकसमान दृष्टि या भावना) सँ बनल अछि, मन केर बेचैनीक कारण हमरा एकर टिकबाक संभावना नहि देखाइत अछि ।
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलबद्दृढम् ॥
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥६-३४॥
Verily, the mind, O Krishna, is restless, turbulent, strong, and unyielding; I regard it quite as hard to achieve its control as that of the wind.
“Krishna”, is derived from “Krish”, to scrape: Krishna is so called because He scrapes or draws away all sins and other evils from His devotees.
वास्तव में, हे कृष्ण, मन बेचैन, अशांत, मजबूत और अडिग है; मैं इस पर नियंत्रण पाना हवा पर नियंत्रण समान ही कठिन मानता हूं ।
“कृष्ण”, “कृष्” से लिया गया है, परिमार्जन करने के लिए: कृष्ण को इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह अपने भक्तों के सभी पापों और अन्य बुराइयों को दूर कर देते हैं ।
वास्तव मे, हे कृष्ण, मन बेचैन, अशान्त, मजगूत आर अडिग अछि; हम एकरा उपर नियंत्रण पेनाय हवा पर नियंत्रण पेनाय जेकाँ कठिन मानैत छी ।
“कृष्ण”, “कृष्” सँ लेल गेल अछि, परिमार्जन करबाक लेलः कृष्ण केँ एहि द्वारे कृष्ण कहल जाइत छन्हि कियैक तँ ओ अपन भक्त सभक पाप आ अन्य खराबी सब केँ परिमार्जित कय दैत छथि (दूर कय दैत छथि) ।
श्रीभगवानुवाच ।
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ॥
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥६-३५॥
The Blessed Lord said:
Without doubt, O mighty-armed, the mind is restless, and difficult to control; but through practice and renunciation, O Son of Kunti, it may be governed.
Cf. Patanjali’s Yoga Sutras, I. 12.
Practice: Earnest and repeated attempt to make the mind steady in its unmodified state of Pure Intelligence, by means of constant meditation upon the Chosen Ideal.
Renunciation: Freedom from desire for any pleasure, seen or unseen, achieved by a constant perception of evil in them.
भगवान ने कहा:
बेशक, हे महाबाहु, मन बेचैन है, और उसे संयमित (नियंत्रित) करना मुश्किल है; लेकिन हे कुंती पुत्र, अभ्यास और संन्यास (त्याग) से इनपर काबू किया जा सकता है । (अपने मनोनुकूल भाव से इनको शासित किया जा सकता है ।)
देखें पतंजलि के योग सूत्र, १. १२.
अभ्यास: मन को उसकी बिना बदले शुद्ध बुद्धि की स्थिति में स्थिर करने की सच्ची और बार-बार कोशिश, चुने हुए आदर्श पर लगातार ध्यान लगाकर करना ।
त्याग: किसी भी खुशी की इच्छा से मुक्ति, चाहे वह देखी हो या अनदेखी हो, जो उनमें बुराई की लगातार समझ से मिलती है ।
भगवान कहलनि:
बेशक, हे महाबाहु, मन बेचैन अछि, आर ओकरा संयमित (नियंत्रित) करब मुश्किल अछि; लेकिन हे कुंती पुत्र, अभ्यास आर परित्याग (संन्यास, त्याग) सँ एकरा उपर नियंत्रण (संयम) कयल जा सकैत अछि । (अपन मनोनुकूल भाव सँ एकरा शासित करैत संयमित राखल जा सकैत अछि ।)
देखू पतंजलि केर योग सूत्र, १. १२.
अभ्यास: मन केँ ओकर बिना बदलल शुद्ध बुद्धि केर स्थिति मे स्थिर करबाक सत्य आ निरन्तर (बेर-बेर केर) प्रयत्न, चुनल गेल आदर्श पर लगातार ध्यान लगाकय कयनाय ।
परित्याग: कोनो प्रसन्नता (प्राप्तिक) इच्छा सँ मुक्ति, चाहे ओ देखल (भोगल) हो या अनदेखा (अनभोगल) हो, जे ओहि मे खराबी छैक एहि बातक निरन्तर समझ सँ भेटैत अछि ।
असंयतात्मना योगो दुष्प्रभाव इति मे मतिः ॥
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥६-३६॥
Yoga is hard to be attained by one of uncontrolled self; such is my conviction; but the self-controlled, striving by right means can obtain it.
My Note: Take care of what Arjuna asked in previous two slokas and what Sri Krishna replied to him. Practice makes man perfect !
अनियंत्रित व्यक्ति के लिये योग की स्थिति में पहुँचना मुश्किल है; ऐसा मेरा मानना है; लेकिन जो आत्मनियंत्रित है, सही तरीकों से कोशिश करता है, वह इसे पा सकता है ।
मेरा नोट: पिछले दो श्लोकों में अर्जुन ने जो पूछा था और श्री कृष्ण ने उसे जो जवाब दिया, उस पर ध्यान दें । अभ्यास से इंसान पूर्ण बनता है !
अनियंत्रित लोकक लेल योग केर स्थिति मे पहुँचनाय मुश्किल छैक; एना हमर मननाय अछि; लेकिन जे आत्मनियंत्रित अछि, सही तरीका सँ कोशिश करैत अछि, से ई पाबि सकैत अछि ।
हमर नोट: पैछला दुनू श्लोक मे अर्जुन जे पुछने रहथि आर श्री कृष्ण हुनका जे सब जवाब देलनि, ताहि पर ध्यान देल जाउ । अभ्यासहि सँ लोक पूर्ण बनैत अछि ।
अर्जुन उवाच ।
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ॥
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥६-३७॥
Arjuna said:
Though possessed of Sraddha but unable to control himself, with the mind wandering away from Yoga, what end does one, failing to gain perfection in Yoga, meet, O Krishna?
अर्जुन ने कहा:
श्रद्धा से युक्त होते हुए भी, स्वयं को नियंत्रित करने में असमर्थ, मन योग से भटक रहा है, योग में पूर्णता प्राप्त करने में असफल होने पर, हे कृष्ण, उसे क्या अंत मिलता है ?
अर्जुन कहलनि:
श्रद्धा सँ युक्त रहितहु, स्वयं केँ नियंत्रित करय मे असमर्थ, मन योग सँ भटकि रहल अछि, योग मे पूर्णता प्राप्त करय मे असफल भेला पर, हे कृष्ण, ओकरा केहेन अन्त (परिणाम) भेटैत छैक ?
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ॥
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥६-३८॥
Does he not, fallen from both, perish, without support, like a rent cloud, O mighty-armed, deluded in the path of Brahman?
Fallen from both: That is, from both the paths of knowledge and action.
हे महाबाहु, ब्रह्म के मार्ग में भ्रमित, क्या वह दोनों से गिरकर, बिना सहारे के, फटे हुए बादल की तरह नष्ट नहीं हो जाता ?
दोनों से गिरा हुआ: यानी ज्ञान और कर्म दोनों मार्गों से ।
हे महाबाहु, ब्रह्म केर मार्ग मे भ्रमित, की ओ दुनू सँ खसिकय, बिना सहारा केँ, फाटल मेघ जेकाँ नष्ट नहि भ’ जाइत अछि ?
दुनू सँ खसल: यानी ज्ञान आर कर्म दुनू मार्ग सँ खसल (च्यूत) ।
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ॥
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥६-३९॥
This doubt of mine, O Krishna, Thou shouldst completely dispel; for it is not possible for any but Thee to dispel this doubt.
Since there can be no better teacher than the Omniscient Lord.
हे कृष्ण, मेरा यह शक आपको पूरी तरह दूर कर देना चाहिए; क्योंकि आपके अलावा किसी और के लिए इस शक को दूर करना मुमकिन नहीं है ।
क्योंकि सब कुछ जानने वाले भगवान से बेहतर कोई गुरु नहीं हो सकता ।
हे कृष्ण, हमर ई सन्देह (शक) अपने केँ पूरापूरी दूर कय देबाक चाही; कियैक तँ अपनेक अलावे केकरो आर लेल एहि सन्देह केँ दूर कयनाय सम्भव नहि अछि ।
कियैक तँ सब किछु जानयवला भगवान सँ नीक कियो गुरु नहि भ’ सकैत अछि ।
श्री भगवानुवाच ।
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ॥
नहि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥६-४०॥
The Blessed Lord said:
Verily, O son of Prtha, there is destruction for him, neither here nor hereafter for, the doer of good, O my son, never comes to grief.
Tata (तात) – son. A disciple is looked upon as a son; Arjuna is thus addressed as he had placed himself in the position of a disciple to Krishna.
भगवान ने कहा:
सच में, हे पृथा के बेटे, उसका नाश न तो यहाँ होता है और न ही परलोक में, क्योंकि अच्छा करने वाला, हे तात (मेरे पुत्र), कभी दुःखी नहीं होता ।
तात – पुत्र । एक शिष्य को बेटे जैसा देखा जाता है; अर्जुन को इस तरह बुलाया गया है क्योंकि उसने खुद को कृष्ण के शिष्य की जगह पर रखा था ।
भगवान कहलनि:
सच मे, हे पृथापुत्र, ओकर नाश नहि तँ एतय होइत छैक आ नहिये परलोक मे, कियैक तँ नीक करयवला, हे तात (हमर पुत्र), कखनहुँ दुःखी नहि होइछ ।
तात – पुत्र । एकटा शिष्य केँ बेटा जेकाँ देखल जाइत छैक; अर्जुन केँ एहि तरहें सम्बोधित कयल गेलनि अछि कियैक तँ ओ स्वयं केँ कृष्णक शिष्य केर स्थान पर रखने छलथि ।
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ॥
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥६-४१॥
Having attained to the world of righteous, and dwelling there for everlasting years, one falled from Yoga reincarnates in the home of the pure and the prosperous.
Everlasting years: meaning not absolutely, but a very long period.
धर्मी लोगों की दुनिया में जाकर, और वहाँ हमेशा रहने के बाद, योग से भटका हुआ इंसान पवित्र और खुशहाल लोगों के घर में दोबारा जन्म लेता है ।
हमेशा रहने वाले साल: मतलब पूरी तरह से नहीं, बल्कि बहुत लंबा समय तक ।
धर्मी लोक सभक संसार मे पहुँचिकय, आर ओतय हमेशा रहलाक बाद, योग सँ भटकि गेल लोक पवित्र आ खुशहाल (श्रीमान्) लोकक घर मे दोबारा जन्म लैत अछि ।
हमेशा रहयवला साल (समय): मतलब पूरे तरह सँ नहि, बल्कि बहुत लंबा समय धरि ।
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ॥
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥६-४२॥
Or else he is born into a family of wise Yogis only; verily, a birth such as that is very rare to obtain in this world.
Very rare: more difficult than the one mentioned in the preceding Sloka.
या फिर वह सिर्फ़ ज्ञानी योगियों के परिवार में जन्म लेता है; सच में, ऐसा जन्म इस दुनिया में मिलना बहुत मुश्किल है ।
बहुत मुश्किल: पिछले श्लोक में बताए गए जन्म से भी ज़्यादा मुश्किल ।
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ॥
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥६-४३॥
There he is united with the intelligence acquired in his former body, and strives more than before, for perfection, O son of the Kurus.
Intelligence – Samskara: store of experience in the shape of impressions and habits.
Strives …. perfection: Strives more strenuously to attain to higher places of realisation than those acquired in his former birth.
वहाँ वह अपने पिछले शरीर में मिली बुद्धि से जुड़ जाता है, और हे कुरुओं के पुत्र, पूर्णता के लिए (वह) पहले से ज़्यादा कोशिश करता है ।
बुद्धि – संस्कार: प्रभावों (सांस्कारिक प्रस्तुतियों) और आदतों के रूप में अनुभव का भंडार ।
पूर्णता के लिए कोशिश करता है: अपने पिछले जन्म में मिली चीज़ों से ज़्यादा ऊँचे स्थानों तक पहुँचने के लिए ज़्यादा मेहनत करता है ।
ओतय ओ अपन पैछला शरीर मे भेटल बुद्धि सँ जुड़ि जाइत अछि, आर हे कुरु लोकनिक सन्तान, पूर्णताक वास्ते (ओ) पहिने सँ आर बेसी प्रयत्न करैत अछि ।
बुद्धि – संस्कार: प्रभाव (सांस्कारिक प्रस्तुति सब) आर आदति सभक रूप मे अनुभव केर भंडार ।
पूर्णताक लेल प्रयत्न करैत अछि: अपन पैछला जन्म सब मे भेटल चीज सब सँ बेसी उच्च स्थान पर पहुँचबाक लेल बेसी मेहनत करैत अछि ।
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ॥
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥६-४४॥
By that previous practice alone, he is borne on in spite of himself. Even the enquirer after Yoga rises superior to the performer of Vedic actions.
Born on as in spite of himself: carried to the goal of the course which he marked out for himself in his last incarnation, by the force of his former Samskaras, though he might be unconscious of them – or even unwilling to pursue it, owing to the interference of some untoward Karma.
Rises, etc.: lit. goes beyond the Word-Brahman, i.e., the Vedas.
सिर्फ उस पहले (पूर्व जन्मों) के अभ्यास से ही, वह खुद के बदौलत आगे बढ़ता है । योग जानने के लिये जिज्ञासा रखनेवाला भी वैदिक कर्म करने वाले से आगे बढ़ जाता है ।
खुद के बदौलत आगे बढ़ता है: अपने पिछले जन्म में अपने लिए तय किए गए रास्ते के लक्ष्य तक, अपने पिछले संस्कारों के बल पर पहुँच जाता है, भले ही वह उनके बारे में अनजान हो – या किसी गलत कर्म के दखल की वजह से उसे आगे बढ़ाने को तैयार भी न हो ।
आगे बढ़ जाता है, वगैरह: यानी शब्द-ब्रह्म, यानी वेदों से आगे निकल जाता है ।
सिर्फ ओहि पहिलुका (पूर्व जन्म सभक) अभ्यास मात्र सँ, ओ अपना आप (स्वयं) केर बदौलत आगाँ बढ़ैत अछि । योग जनबाक जिज्ञासा रखनिहार सेहो वैदिक कर्म करनिहार सँ आगाँ बढ़ि जाइत अछि ।
अपना आप केर बदौलत आगाँ बढ़ैत अछि: अपन पैछला जन्म मे अपना लेल तय कयल गेल रास्ताक लक्ष्य धरि, अपन पैछला संस्कार सभक बल पर पहुँच जाइत अछि, भले ही ओ ओहि बारे मे अनजान रहय – या कोनो गलत कर्म केर दखल केर कारण सँ ओकरा आगू बढ़ाबय लेल तैयार सेहो नहि रहय ।
आगाँ बढ़ि जाइत अछि, आदि: यानी शब्द-ब्रह्म, यानी वेद सँ आगाँ निकलि जाइत अछि ।
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ॥
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥६-४५॥
The Yogi, striving assiduously, purified of taint, gradually gaining perfection through many births, then reaches the highest goal.
My Note: This chapter is very important for us to understand the exact way how to live our life. Mind the questions of Arjuna and the reply by Sri Krishna.
योगी, मेहनत से कोशिश करते हुए, कलंक से मुक्त होकर, धीरे-धीरे कई जन्मों में पूर्णता प्राप्त करते हुए, सबसे ऊंचे लक्ष्य तक पहुँचता है ।
मेरा नोट: यह चैप्टर हमारे लिए यह समझने के लिए बहुत ज़रूरी है कि हमें अपनी ज़िंदगी कैसे जीनी है । अर्जुन के सवालों और श्री कृष्ण के जवाब पर ध्यान दें ।
योगी, मेहनत सँ कोशिश करैत, कलंक (दाग आदि) सँ मुक्त भ’ कय, धीरे-धीरे कतेको जन्म मे पूर्णता प्राप्त करैत, सबसँ ऊंच लक्ष्य धरि पहुँचैत अछि ।
हमर नोट: ई चैप्टर हमरा सब लेल ई बुझबाक वास्ते बहुत जरूरी अछि जे हम सब अपन जीवन केना जीबी । अर्जुनक सवाल आ कृष्ण केर जवाब पर ध्यान दी ।
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानीभ्योऽपि मतोऽधिकः ॥
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥६-४६॥
The Yogi is regarded as superior to those who practise asceticism, also to those who have obtained wisdom (though the Sastras). He is also superior to the performers of action (enjoined in the Vedas). Therefore, be thou a Yogi, O Arjuna.
योगी को तप करने वालों से और शास्त्रों से ज्ञान पाने वालों से भी श्रेष्ठ माना जाता है । वह (वेदों में बताए गए) कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ है । इसलिए हे अर्जुन, तुम योगी बनो ।
योगी केँ तप करयवला आर शास्त्र सब सँ ज्ञान प्राप्त करयवला सँ सेहो श्रेष्ठ मानल जाइछ । ओ (वेद मे कहल गेल) कर्म करयवला सब सँ सेहो श्रेष्ठ होइछ । तेँ, हे अर्जुन, अहाँ योगी बनू ।
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ॥
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥६-४७॥
And of all Yogis, he who with the inner self merged in Me, with Sraddha devotes himself to Me, is considered by Me the most steadfast.
Of all Yogis, etc.: Of all Yogis he who devotes himself to the All-pervading Infinite, is superior to those who devote themselves to the lesser ideals, or gods, such a Vasu, Rudra, Aditya, etc.
और सभी योगियों में, जो अपने अंदर के आत्मा को मुझमें समाकर, श्रद्धा के साथ मुझमें समर्पित हो जाता है, उसे मैं सबसे ज़्यादा अटल मानता हूँ ।
सभी योगियों में, वगैरह: सभी योगियों में से जो खुद को सब जगह मौजूद अनंत में समर्पित कर देता है, वह उन लोगों से बेहतर है जो खुद को छोटे आदर्शों, या देवताओं, जैसे वसु, रुद्र, आदित्य, वगैरह में समर्पित कर देते हैं ।
आर सब योगी लोकनि मे, जे अपना भीतर केर आत्मा केँ हमरा मे समाहित कय केँ, श्रद्धा सँ हमरहि मे समर्पित भ’ जाइत अछि, ओकरा हम सब सँ बेसी दृढ़ (अटल) मानैत छी ।
सब योगी लोकनि मे, आदि: सब योगी लोकनि मे सँ जे स्वयं केँ सब ठाम मौजूद अनन्त (परमात्मा) मे समर्पित कय दैत अछि, ओ ताहि सब सँ बेसी नीक अछि जे सब स्वयं केँ छोट आदर्श सब, या देवता सब, जेना वसु, रुद्र, आदित्य आदि मे समर्पित कय दैत अछि ।
इति ध्यानयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥
The end of the sixth chapter, designated The Way of Meditation.
हरिः हरः!!
