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बड़साइत मे बोहनि,बियनि आ कनियाँ -पुतड़ाक विशेष विधान अछि

19 भ्यूज

लेख विचार
प्रेषित: शेफालिका दत्त श्रीजा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- ब्राह्मण एवं हुनक संस्कार

“बरसाइत पावैनक महत्व”।

अप्पन सबहक मिथिला मे बरसाइत पावैनक बहुत पैघ महत्व होइत अछि।सब सोहागिन पवनैतिन सब अपन सोहाग के लेल सोलहो श्रृंगार कs के पूरा हर्सोल्लास के साथ ई पावैन व्रत करैत छथि।बरसाइत पूजा जेठ महिनाक अमावस्या तिथि के दिन होइत अछि।विवाहक पहिले बेर जे पूजा करैत छैथि ओ पवनैतिन खुब विस्तार सँ बरसाइत पूजा करैत छैथि।
बरसाइत पूजा (वट-सावित्री) नवविवाहित कनियाँ सब पहिले बेर जेना पूजा करैत छैथि,ओ जतेक हमरा बुझल अछि ओ लिख रहल छी।
विधि:-
एक दिन पहिने कनिया नहा धोय कय अरवा-अरवैन भोजन करथिन,साँझ खन भगवती,महादेव,ब्राह्मण,हनुमान आ गौरी कs गीत गावि,गौरी नवेद्य बनायल जायत,आ दुईब,कांच हरैद,धनिया (कनी ) फेंट कs गौर बनत,जकरा ढ़उरल सरवा पर एकटा सिक्का पर गौरी राखि पान कs पात सँ झापि,पान कs पातक ऊपर सिंदूरक गद्दी राखि ललका कपडा स झापि भगवति लग राखि देल जाइत अछि।
उड़द दालि कs फुला के 14 गो बड़ पकायल जायत अछि,जकरा सरेला पर सुतरी मे गांथल जायत (बिना सुइया के) बड़ गुथल सुतरी सँ बोहनी के मुँह पर बान्हल जायत अछि। मैना  या केरा के पात पर सिन्दूर आ काजर सँ बिष-विषहारा लिखल जायत अछि। राति खन कनी बेसी कs बूट (काला चना ) फुलय लेल देल जाइत अछि। जे गाम भरिक सोहागिन के परसल जाइत अछि।

वट सावित्री (बरसाइत) पूजा क दिन:-
नव कनियाँ नहा धो कs सासुर सs आयल नव कपङा पहिर के श्रृंगार कय,खोंईंछ लय,भगवती कs पूजा कय,हाथ मे साजी (जाही मे कपड़ा के बनल कनिया-पुतरा रहैत अछि) आ माथ पर बोहनी (जाही मे जल भरल रहैत अछि आ जकरा मुँह पर सुतरी मे चौदहो गो बड़ बान्लह रहैत अछि) लय के भगवती के गोर लागि सबहक संगे बड़क गाछ तर जेती।गाछ तर बोहनी में राखि देथिन।गाछ तर अरिपन रहत,एकटा अरिपन के ऊपर  7 टा बिअनि रहत,आ  7 टा डाली मे फुलायल बूट,फल,मिठाई राखल रहत। गाछ तर अहिबात मे दीप जरायल जायत अछि।
एक टा डाली मे चाउर,सुपारी,जनऊ,पैसा फल-मिठाई राखल रहत जे पूजा के बाद पंडिताइन(कथा कहनिहारि कs द’ देल जायत।

बड़ क’ पात पर फुलायल बूट (चना) आ फल-मिठाई के नवेद्य लगायल जायत।
एकटा बियनि पर आ एक टा आम पर पांच बेर सिन्दूर लगा बड़ के गाछक जड़ि मे राखल जायत अछि। अरिपन पर विष-विषहारा लिखल पात राखि ओही पर माटिक विष-विषहारा राखल जायत। कनिया एक टा बड़ कs पात केश मे खोसती
सबटा ओरिआन केलाक बाद कनियाँ गौरी सबहक (सासूर बला,नहिअर बला जे राति मे बनल गौड़ी ) आगु नवेद्य राखि फूल आ सिन्दूर लय गौरी पूजती। ओकरा बाद कनिया पुतरा हाथ मे लय जांघ तर बोहनी राखि कथा सुनती।
कथा सुनला के बाद कनिया पुतरा एक हाथ मे ल’के गाछ तर रखलाहा सिंदूर लागल आम आ एक टा सिन्दूर क गद्दी ल’ के मौली धागा या कच्चा जनउ गाछ के चारू कात पाँच बेर घूमती। फेर गाछ तर राखल बियनि सँ गाछ के तीन बेर होंकैत गला मिलानी करती।
आब कनिया-पुतरा कs हाँथे कनिया के सिंदूरदान करथिन्ह (कनिये करेती) ओकरा बाद सबटा नवेद्य उसरैग लेती आ विष-विषहरा के दूध लाबा चढ़ेती।
बोहनी मे बांधल सबटा बड़ के वायां हाथ कs अंगुठा आ अनामिका सs तोरि के एक बेर आगु आ एक बेर पाछु फेकैत फकरा पढ़ती,”बड़ लिय (पाछु ) मर दिय (आगु )” ओकरा बाद माथ पर फेर बोहनी उठेती,हाथ मे साजी (फुलडाली) लेती आ भगवती घर मे औती। गाछ तर राखल डाली सेहो उठा कs भगवती घर मे राखल जायत। भगवती के गोर लागि  7 टा अहिवाती के बियैन ,खीर आ डाली देथिन्ह आ सब पैघ सब के गोर लागि आशीर्वाद लेथिन्ह।
कथा:-
बरसाइत  मे गाछ तर दु गो कथा होइयत अछि। एक टा धोबिनक बेटी वला आ दोसर सावित्री -सत्यवान वला।  पुरा कथा नै लिखब कियाकि कथा लिखला से लेख बहुत लंबा भ’ जायत। माँ भगवती सब के सोहाग-भाग सँ भरल राखैथ।
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