लेख विचार
प्रेषित: निशि कांत पाठक
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- ब्राह्मण एवं हुनक संस्कार
मिथिलानी लेल बरसाइत पर्वक महत्व
मिथिलाक संस्कृति अपन समृद्ध परंपरा, लोकआस्था आ महिलासभक धार्मिक भावना लेल प्रसिद्ध अछि। एतय मनाओल जाएबला प्रत्येक पर्व केवल पूजा-पाठ धरि सीमित नहि रहैत अछि, बल्कि परिवार, समाज आ प्रकृति सँ जुड़ल गहन भावनाक प्रतीक होइत अछि। एहि लोकपर्वसभमे “बरसाइत” केर विशेष स्थान अछि। ई पावनि खास कए मिथिलानीसभक मानल जाइत अछि। बरसाइत एक मिथिलानी लेल केवल धार्मिक अनुष्ठान नहि, बल्कि प्रेम, समर्पण, सौभाग्य आ पारिवारिक मंगलकामनाक प्रतीक अछि।
बरसाइतक दिन महिलासभ वट वृक्ष अर्थात बरगदक गाछक पूजा करैत छथि। ओ सभ गाछक चारूकात धागा बान्हैत छथि आ अपन पति केर दीर्घायु, परिवारक सुख-शांति आ अखंड सौभाग्यक कामना करैत छथि। मिथिलामे वट वृक्षकेँ स्थिरता, सुरक्षा आ दीर्घ जीवनक प्रतीक मानल जाइत अछि। जाहि प्रकार बरगदक गाछ अपन विशाल छाँह सँ सभकेँ संरक्षण दैत अछि, तहिना एक मिथिलानी अपन परिवारकेँ प्रेम, त्याग आ ममता सँ जोड़कए रखैत छथि। एहि कारण बरसाइत मिथिलानीक जीवनमे विशेष भावनात्मक महत्व रखैत अछि।
एक नवविवाहिता मिथिलानी लेल पहिल बरसाइत अत्यंत महत्वपूर्ण मानल जाइत अछि। विवाहक बाद पहिल बेर ई पर्व मनबैत समय ओ अपन नव जीवन आ दांपत्य सुख लेल श्रद्धापूर्वक पूजा करैत छथि। एहि अवसर पर नसासुर वा नैहर सँ साड़ी, श्रृंगार सामग्री,बिधक सामग्री,मिठाइ आ उपहार पठेबाक परंपरा अछि। एहि सँ बेटीकेँ वा पुतहु कें ई अनुभव होइत अछि जे विवाहक बादो मायके स्नेह आ सासु केर अपनापन सदिखन ओकरा संग अछि। ई परंपरा मिथिलाक पारिवारिक संबंधकेँ मजबूत बनबैत अछि।
बरसाइतक एकटा महत्वपूर्ण पक्ष महिलासभक सामूहिकता सेहो अछि। गामक महिलासभ एकठाम जुटिकए वट वृक्षक पूजा करैत छथि आ मैथिली लोकगीत गबैत छथि। एहि गीतसभमे प्रेम, वर्षा ऋतु, सौभाग्य आ दांपत्य जीवनक मधुर भावना झलकैत अछि। ढोलक आ मंजीराक धुन पर गाओल जाएबला ई गीत मिथिलाक सांस्कृतिक पहचान अछि। एक मिथिलानी लेल ई पर्व अपन संस्कृति आ परंपरासँ जुड़ल रहबाक माध्यम बनि जाइत अछि।
बरसाइत मिथिलानीक त्याग, धैर्य आ समर्पणक प्रतीक सेहो अछि। भारतीय समाजमे नारीकेँ परिवारक आधार मानल गेल अछि। एक मिथिलानी अपन परिवारक सुख लेल अनेक जिम्मेदारी निभाबैत छथि। बरसाइतक व्रत आ पूजा द्वारा ओ अपन परिवारक मंगल आ समृद्धिक प्रार्थना करैत छथि। एहि पर्वमे ओकर श्रद्धा, प्रेम आ समर्पण स्पष्ट रूप सँ देखल जा सकैत अछि।
ई पर्व प्रकृति संरक्षणक संदेश सेहो दैत अछि। वट वृक्षक पूजा करबाक परंपरा बतबैत अछि जे गाछ-पात केवल प्रकृतिक हिस्सा नहि, बल्कि जीवनक आधार अछि। मिथिलामे महिलासभ बचपन सँ प्रकृतिक सम्मान करबाक शिक्षा पबैत छथि। बरसाइत ओहि परंपराकेँ जीवित रखैत अछि।
आधुनिकता आ शहरीकरणक प्रभावक बावजूद मिथिलानीसभक मनमे बरसाइतक महत्व आइयो बरकरार अछि। शहरमे रहनिहार महिलासभ सेहो श्रद्धा सँ ई पर्व मनबैत छथि आ अपन संस्कृति सँ जुड़ल रहबाक प्रयास करैत छथि।
अंतमे कहल जा सकैत अछि जे बरसाइत केवल एकटा पर्व नहि, बल्कि मिथिलानीक आस्था, प्रेम, समर्पण आ सांस्कृतिक पहचानक जीवंत प्रतीक अछि। वट वृक्षक चारूकात बान्हल जाएबला धागा केवल एक परंपरा नहि, बल्कि परिवारक मजबूती, विश्वास आ अटूट संबंधक प्रतीक अछि। एहि कारण बरसाइत मिथिलानीसभक हृदयमे विशेष स्थान रखैत अछि।पतिक दीर्घायु लेल इ व्रत सभसँ पैघ होइत अछि।
