लेख विचार
प्रेषित: किरण लता झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- दहेज क दंश आखिर कहिया तक
दहेज समाज के बहुत पैघ समस्या अछि । समाज के सब व्यक्ति लेल सोचनीय विषय सेहो बनल जा रहल अछि । दहेज के अर्थ विवाह मे वर पक्ष सँ मॉग ।
एहि विषय पर हम अपन राय अछि जे अनुभव क रहल छी ओहि आधार पर द रहल छी । पुर्व काल मे संभवतः दहेज कन्या के माता पिता द्वारा उपहार स्वरूप नव गृहस्थि के प्रारंभ करै लेल देल जाइत छलै , जे कि अपना सामर्थ्य एवं सौख सँ बेटी के देल जाइत छलै ।
धीरे -धीरे एकर रूप- रंग बदलैत गेलैक और वर पक्ष सँ अनावश्यक मांग के रूप धारण करैत गेलै ,जे दहेज के नाम सँ सामने एलै । लड़का वाला कें मांग के पूर्ति नई भेला पर कन्या के प्रतारणा , डर , भय सँ शोषित करैत भयावह रूप धारण क लेलकै । लड़का वाला के मांग दिनोदिन बढ़’ लगलैन । लड़का के मोल- भाव तक तय होअ लगलै। लड़की वाला अपन औकात मुताबिक लड़का ठीक करै लगलथि । लड़की के जन्म होइते ओकर विवाह के चिंता पिता केर माथ पर सवार होअ लगलै । दिनोदिन रूप बिगड़ैत चलि गेलै ।
आखिर दहेज के दंश कहिया तक खिहारत ?
इ एकटा बड़का प्रश्न उभरि क’ आयल अछि।
हम समाज मे शिक्षाके समाधानक कड़ी मे जोड़ब बुझैत छी। शिक्षा सँ सोच बदलत , तहने दहेज समाप्त हैत ।
ओना तँ अर्थप्रधान समय मे दहेजक रूप बदलैत हम देख रहल छी । किन्तु ज्यादातर जतए शिक्षा आर अर्थ केर कमी छैक ओतए दहेजक लालसा बेसी छै। लड़का वाला अपना पाइ सँ सौख , मनोरथ पूरा कर’ मे अपन अपमान बुझैत छथिन ।लड़की वाला के पाई पर अपन अनावश्यक सौख पूरा करै कें अपन अधिकार बूझै छथिन ।
दहेजके दंश समाज सँ समाप्त कर लेल लड़का – लड़की के शिक्षित और आत्मनिर्भर बनब आवश्यक अछि। लड़का के अपना परिवार मे साफ मना करैत कहए पड़तैन जे हम मांग रूपी दहेज ल कऽ बिआह नै करब । जतबे क्षमता अछि ओहि अनुसार सौख और खर्च करैत बिआहक बिध पूरा कैल जैत।
लड़की के सेहो अपना परिवार मे कह पड़तैन जे हमर विवाह ओतए नै करी जतए बिआहके बीच मे कोनो तरहक अनावश्यक मांग नै हुए । लड़का -लड़की के आपस मे सेहो बात करै पड़तैन जे दहेजके मांगके बिना बिआह हुए । यदि माता पिता लग पाई नै छनि आर आवश्यक खर्च एवं सौख बड्ड भ’रहल छनि , तऽ आपसी समझ बूझ सँ अनावश्यक ताम झाम के बिना बिआहक बिध कयल जाय ।
यदि विवाह मे लड़की लड़का के गुण परिवारिक सोच के प्रधानता रहत त दहेज के दंश अवशय समाप्त भ जायत ।
