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दहेजक दंश सँ बेटी केँ आत्मा ठोहि पारि कनैत अछि

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लेख विचार
प्रेषित: – दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- दहेजक दंश

नेहक पवित्र संस्कार पर लोभक कालिख : दहेजक दंश

मैथिल समाजमे विवाह केवल दू व्यक्तिक मिलन नहि, अपितु दू परिवार, दू संस्कार आऽ दू आत्माक पवित्र बन्धन मानल जाइत रहल अछि। मिथिलाक परम्परामे तँ विवाहकेँ यज्ञक समान पवित्र संस्कार मानल गेल अछि, जतऽ नेह, विश्वास, मर्यादा आऽ सामाजिक उत्तरदायित्वक दीप प्रज्वलित होइत अछि। मुदा विडम्बना ई अछि जे एहि पवित्र संस्कार पर दहेज जेकाँ अमानवीय कुरीतिक कालिख पोतल जा चुकल अछि। जे बेटी कहियो कुलक लक्ष्मी कहल जाइत छल, आइ ओहि बेटीकेँ रुपैया-पाई, गाड़ी, जमीन आऽ भौतिक वस्तुक तराजूमे तौलल जा रहल अछि।
दहेज केवल आर्थिक लेन-देन नहि, ई मानवताक आत्मा पर लगल गहिर घाव अछि। ई ओहि समाजक क्रूर चेहरा अछि जतऽ शिक्षित कहाबय वला लोक सेहो अपन लोभक कारण बेटी पक्षक विवशताकेँ शोषण करैत छथि। दहेजक कारण असंख्य बाप कर्जक बोझ तर दबि जाइत छथि, माय अपन जीवनक सुख त्यागि दैत छथि, आऽ अनेक बेटी विवाहक पश्चात अपमान, प्रताड़ना आऽ हिंसाक शिकार बनैत छथि। प्रश्न उठैत अछि अखिर ई दहेजक दंश कहिया तक समाजक आत्माकेँ घायल करैत रहत?
प्राचीन कालमे कन्याकेँ स्नेहवश जे उपहार देल जाइत छल, ओ स्वेच्छा आऽ सामर्थ्य पर आधारित छल। मुदा कालान्तरमे ई परम्परा लोभक विकृत रूप धारण कऽ लेलक। आब विवाह प्रेम आऽ संस्कारक उत्सव नहि, बल्कि सौदाक बाजार बनि गेल अछि। वरक शिक्षा, नौकरी आऽ प्रतिष्ठाकेँ मूल्य निर्धारित करबाक साधन बना देल गेल अछि। जतऽ बेटा इंजीनियर अछि, ओतऽ मोट रकमक माँग, जतऽ सरकारी नौकरी अछि, ओतऽ गाड़ी आऽ जमीनक शर्त। बूझु विवाह नहि, कोनो वस्तुक नीलामी भऽ रहल होइक। समाजक ई मानसिकता अत्यन्त पीड़ादायक अछि। जे बेटी अपन ममता, सेवा आऽ समर्पण सँ दू परिवारकेँ जोड़ैत अछि, ओकर मूल्य धनसँ कियैक आँकल जाए?

दुष्परिणामतः दहेजक कुप्रथा समाजमे अनेक भयावह परिणाम उत्पन्न कएने अछि। गरीब परिवार बेटी जन्म पर प्रसन्न होएबाक स्थान पर चिन्तित भऽ जाइत अछि। कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह, घरेलू हिंसा, आत्महत्या आऽ हत्या जेकाँ अपराधक मूलमे बहुत हद तक दहेजक लोभ विद्यमान अछि।
कतेको बेटी विवाहक पश्चात् केवल एहि लेल प्रताड़ित वा उपेक्षित होइत छथि जे ओ अपेक्षित दहेज नहि आनि सकलीह। कतहु ओहि पर मानसिक अत्याचार होइत अछि, कतहु शारीरिक हिंसा। कतेको घरमे बेटीकेँ जरा देबाक घटना समाजक संवेदनाकेँ झकझोरि दैत अछि। ई केवल एक परिवारक त्रासदी नहि, सम्पूर्ण मानवताक पराजय अछि।
सबसँ दुखद तथ्य ई अछि जे आधुनिक शिक्षा आऽ आर्थिक विकासक बादो समाजक मानसिकता पूर्णतः परिवर्तित नहि भऽ सकल अछि। शिक्षित लोक सेहो दहेज लेबामे अपन गौरव अनुभव करैत छथि। जाहिसँ स्पष्ट अछि जे केवल डिग्री प्राप्त कऽ लेनाइ वा रसीदक रूप मे कागजक टुकड़ा पर मुद्रित प्रमाणपत्र प्राप्त केनाइ शिक्षा नहि, वास्तविक शिक्षा तँ मानवीय मूल्यक विकासमे निहित अछि।
अतः कहब जे समाजमे परिवर्तन सदिखन युवा चेतनासँ सम्भव भेल अछि आऽ भविष्य में सेहो होइत रहत। आइ आवश्यकता अछि जे नवपीढ़ी दहेजक विरुद्ध दृढ़ संकल्प लेथि। जँ युवक स्वयं दहेज लेबासँ इन्कार कऽ देताह, तँ एहि कुरीतिक आधा अन्त स्वतः भऽ जाएत। विवाहकेँ सरल, सादगीपूर्ण आऽ संस्कारमय बनाबय पड़त। आजुक समय मे युवा पिढ़ी दहेजक प्रतिकार केँ अपन उत्तरदयित्व बुझथि।
माय-बापकेँ सेहो अपन पुत्रकेँ ई शिक्षा देबाक आवश्यकता अछि जे पत्नी कोनो उपभोगक वस्तु नहि, बल्कि जीवनसंगिनी छथि। ओहि कन्याक सम्मान करब आवश्यक अछि जे अपन घर-परिवार छोड़ि नव जीवनक शुरुआत करबाक साहस करैत अछि।
समाजक बुद्धिजीवी, साहित्यकार, शिक्षक, धर्मगुरु आऽ सामाजिक संस्थासभक सेहो उत्तरदायित्व अछि जे लोकचेतना जागृत करथि। साहित्य सदिखन समाजक दर्पण रहल अछि। अतः साहित्यकारकेँ अपन लेखनीसँ एहि कुरीतिक विरोध करैत मानवताक पक्षमे स्वर उठाबय पड़त।
दहेजक दंश केवल बेटी पक्षक पीड़ा नहि, ई सम्पूर्ण समाजक नैतिक पतनक प्रतीक अछि। जतेक दिन धरि विवाह प्रेम, सम्मान आऽ समानताक आधार पर नहि, बल्कि धनक आधार पर होइत रहत, ततेक दिन धरि समाजमे सच्चा सुख आऽ शान्ति सम्भव नहि।
आब समय आबि गेल अछि जे समाज सामूहिक रूपेँ संकल्प लए…
“नहि लेब दहेज, नहि देब दहेज।
बेटीकेँ बोझ नहि, वरदान मानब।
विवाहकेँ व्यापार नहि, संस्कार बनायब।”
जखन समाजक चेतना जागत, जखन युवक अपन स्वाभिमानकेँ दहेज सँ ऊपर राखताह, जखन माय-बाप बेटी आऽ बेटामे भेद करब छोड़ताह, तखन निश्चित रूपेँ ई दहेजक दंश समाप्त होएत। मानवता फेर मुस्कुराएत, आऽ विवाह पुनः प्रेम, श्रद्धा आऽ पवित्रताक उत्सव बनि जायत।

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