लेख विचार
प्रेषित: कीर्ति झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- मिथिलाक पकवान व्यंजन
भारतक ओहि सांस्कृतिक धरतीसभमे सँ एक अछि जतय भोजन केवल पेट भरबाक साधन नहि, बल्कि जीवन, परंपरा, प्रकृति आ भावना सभक महत्वपूर्ण हिस्सा मानल जाइत अछि। एतयक भोजन सादगी, पौष्टिकता आ पारंपरिक ज्ञानक अद्भुत संगम अछि। मैथिल समाजमे भोजनक सीधा संबंध धार्मिक मान्यता, ऋतु, खेती आ सामाजिक संबंध सँ जुड़ल अछि। एहि कारण मिथिलाक प्रत्येक व्यंजन केवल स्वाद नहि दैत अछि, बल्कि अपन संग एक सांस्कृतिक पहचान सेहो लऽ कऽ अबैत अछि।
एतयक पारंपरिक व्यंजनसभमे मसालाक अत्यधिक प्रयोग नहि होइत अछि, बल्कि सामग्रीक असली स्वादकेँ महत्व देल जाइत अछि। सरिसक तेल, पंचफोरन, सत्तू, दहि, चूड़ा, मखान आ मौसमी तरकारीसभ एतयक भोजनक आत्मा मानल जाइत अछि !
मिथिलामे भोजनक स्वरूप मौसमक अनुसार बदलैत रहैत अछि। गर्मीमे शरीरकेँ ठंढक देबाक लेल सत्तू, दहि, आम पना आ चूड़ा जकाँ पदार्थ अधिक खायल जाइत अछि, जखन कि जाड़ामे घी, तिल, गुड़ आ मखान सँ बनल पौष्टिक व्यंजन लोकप्रिय होइत अछि। ई परंपरा केवल स्वाद लेल नहि, बल्कि शरीरकेँ मौसमक अनुसार स्वस्थ रखबाक लेल विकसित भेल छल। एहि दृष्टिसँ मिथिलाक भोजन आयुर्वेदिक सोचक बहुत निकट मानल जाइत अछि।
मिथिलाक सबसे प्रसिद्ध आ पारंपरिक भोजन “दहि-चूड़ा” मानल जाइत अछि। मकर संक्रांतिक अवसर पर दहि-चूड़ा खायबाक परंपरा सम्पूर्ण मिथिला क्षेत्रमे अत्यंत लोकप्रिय अछि। चूड़ाकेँ दहि, गुड़, केरा आ कहियो-कहियो आमक संग खायल जाइत अछि। ई भोजन अत्यंत सरल होइतहुँ पोषण सँ भरपूर होइत अछि। दहि शरीरकेँ ठंढक दैत अछि आ चूड़ा आसानी सँ पचि जाइत अछि, एहि कारण ई भोजन स्वास्थ्य लेल सेहो उपयुक्त मानल जाइत अछि।
आइ जखन लोक प्रोटीन आ हेल्दी फूड दिस आकर्षित भऽ रहल छथि, तखन सत्तूकेँ “सुपरफूड” केर रूपमे नव पहचान भेटि रहल अछि।
मिथिलाक पारंपरिक थारीमे दाइल भातक विशेष महत्व होइत अछि। पसुआ भात, राहर अथवा मूँगक दाइल आ ऊपर सँ देसी घीक स्वाद मैथिल भोजनक पहचान मानल जाइत अछि। एकर संग अचार, चोखा, तरुआ आ हरियर मिरचाइ परोसल जाइत अछि। एतय भोजनमे घीक प्रयोग केवल स्वाद लेल नहि, बल्कि शरीरकेँ ऊर्जा देबाक लेल सेहो कयल जाइत अछि।
मखान बिना मिथिलाक पहचान अधूरा मानल जाइत अछि। मखान सँ बनल खीर, तरकारी आ नमकीन व्यंजन एतय बहुत लोकप्रिय अछि। मखान स्वास्थ्य लेल अत्यंत लाभकारी मानल जाइत अछि। विवाह, पूजा आ अन्य शुभ अवसरसभ पर मखानक खीर विशेष रूप सँ बनाओल जाइत अछि।
मिथिलामे माछक महत्व सर्व विदित अईछ। कतेको विवाह समारोहमे माछक उपयोग परंपराक रूप मे कयल जाइत अछि ।
मिथिलाक मिठाइसभ सेहो अपन अलग पहचान रखैत अछि। खाजा, ठेकुआ, पिड़किया, अनरसा, बालूशाही आ मलाईदार मिठाइसभ एतयक पर्व-त्योहार आ विवाहक महत्वपूर्ण हिस्सा अछि।
मिथिलाक भोजनक सामाजिक रूप सं लोकसभकेँ जोड़बाक माध्यम मानल जाइत अछि। विवाह, उपनयन, पर्व अथवा कोनो सामाजिक अवसर पर सामूहिक भोजक परंपरा आइयो जीवित अछि। अतिथिक स्वागतमे विशेष भोजन बनायब मैथिल संस्कृतिक पहचान अछि। एहि कारण मिथिलाक भोजनमे आत्मीयता आ अपनापन विशेष रूप सँ अनुभव होइत अछि।
धार्मिक दृष्टिसँ सेहो मिथिलाक भोजनक विशेष महत्व अछि। कतेको व्यंजन पूर्ण रूप सँ सात्विक होइत अछि आ बिना प्याज-लहसुनक बनाओल जाइत अछि। मिथिलामे भोजन केवल स्वाद नहि, बल्कि आस्था आ अनुशासनक विषय सेहो अछि।
हालाँकि आधुनिक जीवनशैलीक कारण कतेको पारंपरिक व्यंजन धीरे-धीरे कम भऽ रहल अछि, मुदा तैयो मिथिलाक भोजन अपन सांस्कृतिक ताकतक कारण जीवित अछि।
मिथिलाक भोजन केवल व्यंजनसभक संग्रह नहि, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक विरासत अछि।
