लेख विचार
प्रेषित: आभा झा अद्विका
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
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बिषय :- मिथिलाक पारंपरिक व्यंजन आ सांस्कृतिक महत्व
मिथिला अपन लोकसंस्कृति, रीति-रिवाज, लोकगीत आ साहित्यक संग-संग स्वादिष्ट व्यंजन सभ लेल सेहो प्रसिद्ध अछि। अहिठामक भोजन मे अपन माटिक सुगंध, परंपराक मिठास आ अपनापनक भाव समाहित रहैत अछि। मिथिलाक व्यंजन केवल स्वाद धरि सीमित नहि अछि, बल्कि सामाजिक, धार्मिक आ सांस्कृतिक जीवनक महत्वपूर्ण हिस्सा अछि। गाम-घरक चूल्हासँ उठैत भोजनक सुगंध मिथिलाक पहचान बनि गेल अछि।
मिथिलाक भोजन साधारण होइतहुँ अत्यंत पौष्टिक मानल जाइत अछि। एतय दाल-भात-तरकारी, तरुआ, चूड़ा-दही, सत्तू, माछ-भात, पिट्ठा, पुआ, खाजा, ठेकुआ, मखानाक खीर आदि विशेष रूप सँ लोकप्रिय अछि। मखाना मिथिलाक गौरव मानल जाइत अछि, जे स्वादक संग स्वास्थ्य लेल सेहो लाभकारी अछि। विवाह, उपनयन अथवा पर्व-त्योहार मे मखानाक खीर अवश्य बनाओल जाइत अछि।
मिथिलाक व्यंजन सभमे मौसमक प्रभाव सेहो स्पष्ट देखल जाइत अछि। गर्मीक समय चूड़ा-दही आ सत्तूक सेवन शरीरकेँ ठंढक प्रदान करैत अछि, तँ जाड़क दिन मे पिट्ठा आ घी-संयुक्त भोजन शरीरमे ऊर्जा भरैत अछि। एहि प्रकार एतयकेँ खानपान प्रकृतिक अनुरूप विकसित भेल अछि।
धार्मिक पर्व सभमे भोजनक विशेष महत्व रहैत अछि। छठि पर्वमे ठेकुआ, कसार आ फल-प्रसाद बनाओल जाइत अछि। सामा-चकेवा, जुड़शीतल, मधुश्रावणी, वट-सावित्री आदि पर्व सभमे सेहो अलग-अलग प्रकारक पारंपरिक व्यंजन बनबैकेँ परंपरा अछि। भोजन केवल खाए लेल नहि, बल्कि श्रद्धा, आस्था आ संस्कृतिक प्रतीक रूपमे प्रस्तुत होइत अछि।
मिथिलामे अतिथिक स्वागत भोजन सँ करबाक परंपरा प्राचीन कालसँ चलि आबि रहल अछि। “अतिथि देवो भव” केर भावना अनुसार अतिथिक आगमन पर घरक स्त्रीसभ अपन हाथसँ स्वादिष्ट भोजन तैयार करैत छथि। एहि सँ अपनापन, प्रेम आ सामाजिक संबंध मजबूत होइत अछि।
आधुनिक समयमे फास्ट फूड आ पाश्चात्य खानपानक प्रभाव तेजी सँ बढ़ि रहल अछि। फलस्वरूप युवा पीढ़ी धीरे-धीरे अपन पारंपरिक व्यंजनसभ सँ दूर होइत जा रहल अछि। यदि एहि व्यंजन सभकेँ संरक्षित नहि कयल गेल, तँ भविष्यमे मिथिलाक खानपान संस्कृति कमजोर पड़ि सकैत अछि। अतः आवश्यक अछि जे बच्चासँ वृद्ध धरि सभ अपन पारंपरिक भोजनक महत्व बुझथि आ ओकर प्रयोग बढ़ाबथि।
मिथिलाक व्यंजन सभमे केवल स्वाद नहि, बल्कि लोकजीवनक इतिहास आ संस्कृतिक पहचान सेहो समाहित अछि। एतयक भोजन अपन माटि, मेहनत आ प्रेमक प्रतीक अछि। पारंपरिक व्यंजनक संरक्षण सँ हम अपन संस्कृति, स्वास्थ्य आ सामाजिक एकताकेँ मजबूत बना सकैत छी।
निष्कर्ष रूपमे कहल जा सकैत अछि जे मिथिलाक व्यंजन सभ मिथिला संस्कृतिक अमूल्य धरोहर अछि। एहि व्यंजन सभमे अपन माटिक आत्मा बसैत अछि। जतेक हम अपन पारंपरिक भोजनकेँ अपनाएब, ततेक अपन संस्कृति आ पहचान सुरक्षित रहत। जय मिथिला, जय मैथिली।
