Search

गीता – दोसर अध्याय (अंग्रेजी, हिन्दी आ मैथिली अनुवाद भाष्य सहित)

46 भ्यूज

ॐ श्री परमात्मने नमः !!

॥द्वितीयोऽध्यायः॥

सञ्जय उवाच ।
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्वाकुलेक्षणम् ॥
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥२-१॥

Sanjaya said:
To him who was thus overwhelmed with pity and sorrowing, and whose eyes were dimmed with tears, Madhusudana spoke these words.

Overwhelmed with pity: Not Arjun, but Arjuna’s feeling was master of the situation.

संजय ने कहा:
वह (अर्जुन) जो इस तरह दया और दुःख से भर गया था, और जिसकी आँखें आँसुओं से भर गई थीं, मधुसूदन ने उससे ये शब्द कहे ।

दया से भर गया: अर्जुन नहीं, बल्कि अर्जुन की भावना ही हालात की मालिक थी ।

संजय कहलनि:
ओ (अर्जुन) जे एहि प्रकार सँ दया आ दुःख सँ भरि गेल छलथि, आर जिनकर आँखि नोर सँ भरि गेल रहनि, मधुसूदन हुनका सँ ई शब्द कहलनि । 

दया सँ भरि गेल छलथि: अर्जुन नहि, बल्कि अर्जुन केर भावना मात्र एहि स्थितिक स्वामी छल । 

श्रीभगवानुवाच ।
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ॥
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥२-२॥

The Blessed Lord said:
In such a crisis, whence comes upon thee, O Arjuna, this dejection, un-Arya-like, disgraceful, and contrary to the attainment of heaven?

Mark with what contempt Krishna regards Arjuna’s attitude of weakness masked by religious expression!

भगवान ने कहा:
ऐसे संकट में, हे अर्जुन, यह निराशा, आर्यों के विपरीत, शर्मनाक और स्वर्ग प्राप्ति के विपरीत, तुम्हें कहाँ से मिली ?

ध्यान दें, कृष्ण अर्जुन के धार्मिक भावों से छिपी कमजोरियों को कितनी निन्दित रूप से देखते हैं !

भगवान कहलनि:
एहेन संकट मे, हे अर्जुन, ई निराशा, आर्य लोकनिक विपरीत, लज्जास्पद एवं स्वर्ग प्राप्तिक विरूद्ध, अहाँ केँ कतय सँ प्राप्त भेल अछि ? 

ध्यान देब, कृष्ण अर्जुन केर धार्मिक भाव सँ छुपित कमजोर रुख केँ केहेन निन्दित रूप मे देखलनि अछि !

क्लैब्यं मास्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ॥
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥२-३॥

Yield not to unmanliness, O son of Prtha! Ill doth it become thee. Cast off this mean faint-heartedness and arise, O scorcher of thine enemies!

हे पृथा के पुत्र, इस प्रकार गैर-मर्दानगी मत दिखाओ ! यह तुम्हारे लिए बुरा होगा । इस नीच कायरता को छोड़ो और उठो, हे अपने दुश्मनों को जलाने वाले !

हे पृथाक पुत्र, एहि प्रकारक गैर-मर्दानगी जुनि देखाउ ! ई अहाँक वास्ते बहुत खराब होयत । ई तुच्छ कायरता केँ छोड़ू आ उठू, हे अपन दुश्मन केँ जरौनिहार !

अर्जुन उवाच ।
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ॥
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥२-४॥

Arjuna said:
But how can I, in battle, O slayer of Madhu, fight with arrows against Bhishma and Drona, who are rather worthy to be worshipped, O destroyer of foes!

अर्जुन ने कहा:
लेकिन हे मधु के वध करने वाले, मैं युद्ध में भीष्म और द्रोण के विरुद्ध बाणों से कैसे लड़ सकता हूँ, जो कि पूजनीय हैं, हे शत्रुओं के संहारक !

अर्जुन कहलनि:
मुदा हे मधुसूदन! हम युद्ध मे भीष्म आ द्रोणक विरुद्ध बाण सँ केना लड़ि सकैत छी, जे कि पूजनीय छथि, हे अरिसूदन (शत्रु केर संहारक) !

गुरुनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ॥
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥२-५॥

Surely it would be better even to eat the bread of beggary in this life than to slay these great-souled masters. But if I kill them, even this world, all my enjoyment of wealth and desires will be stained with blood.

i.e. even in this world I shall be in hell.

निश्चय ही, इन महानुभावानों (महान आत्मा वाले मालिकों) को मारने से तो इस जन्म में भीख मांगकर रोटी खाना बेहतर होगा । लेकिन अगर मैंने उन्हें मार दिया, तो इस दुनिया में भी, मेरी सारी दौलत और ख्वाहिशें खून से रंग जाएंगी ।

यानी इस दुनिया में भी मैं नर्क में रहूंगा ।

निश्चय टा, एहि महानुभावान लोकनि (महान आत्माक मालिक लोकनि) केँ मारय सँ तँ एहि जन्म मे भीख मांगिकय रोटी खेनाय नीक होयत । जँ अगर हम हुनका सब केँ मारि दैत छी, तँ एहि दुनिया मे सेहो हमर सबटा सम्पत्ति आ सख खून सँ रंगि जायत । 

यानी एहि दुनिया मे सेहो हम नर्कहि मे रहब ।

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ॥
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥२-६॥

And indeed I can scarcely tell which will be better, that we should conquer them, or that they should conquer us. The very sons of Dhrtarastra – after slaying whom we should not care to live – stand facing us.

और यह भी निस्सन्देह है कि मैं मुश्किल से ही कह सकता हूँ कि कौन सा बेहतर होगा, कि हम उन्हें हरा दें, या वे हमें हरा दें । इन धृतराष्ट्र के पुत्रों – जो हमारे सामने डटे हुए हैं – इन्हें मारने के बाद हमें जीने तक की परवाह नहीं करनी चाहिए ।

आर इहो सच अछि जे हम बड मुश्किल सँ कहि सकैत छी कि कोन नीक होयत – हम सब (पाण्डव) ओकरा हरा दी, या ओ सब (कौरव) हमरा सब केँ हरा दिअए । ई जे धृतराष्ट्रक बेटा सब, जे हमरा लोकनिक सामने मे डटल ठाढ़ अछि, एकरा सब केँ मारलाक बाद हमरा लोकनि केँ जिबइयोक परवाह नहि करबाक चाही । 

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः ॥
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥२-७॥

With my nature overpowered by weak commiseration, with a mind in confusion about duty, I supplicate Thee. Say decidedly what is good for me. I am Thy disciple. Instruct me who have taken refuge in Thee.

Dharma is the ness, the law of the inmost constitution of a thing. The primary meaning of Dharma is not virtue or religion, but that is only its secondary significance. Fighting in a just cause is the religious duty or Dharma of a Ksatriya, while the same is a sin to a Brahmana, because it is contrary to the law of his being. Working out one’s Karma according to the law of one’s own being is therefore the Dharma or religion or way to salvation of an individual. The cloud of Karma hides the Self-Sun from view. The means which exhausts this cloud without adding to it and thus helps in one’s Self-restoration is one’s Dharma.

Thy disciple: Until this declaration has been made, the Master may not give the highest knowledge.

मेरे स्वभाव पर कमज़ोर हमदर्दी हावी हो गई है, और मेरे मन में फ़र्ज़ को लेकर उलझन है, मैं आपसे विनती करता हूँ । आप निर्णीत रूप से बताइये जो मेरे लिए अच्छा है । मैं आपका शिष्य हूँ । मैं जो आपकी शरण में आया हूँ, मुझे (उचित) निर्देशन दीजिये ।

धर्म किसी चीज़ का ‘नेस’ (ness) है, किसी भी वस्तु के अन्तर्विधान का नियम (कानून/कायदा) है । धर्म का प्राथमिक अर्थ नेकी (अच्छाई) या रिलीजन (religion) नहीं है, बल्कि यह तो बस इसका दूसरा अर्थ है । सही काम के लिए लड़ना क्षत्रिय का धार्मिक कर्तव्य या धर्म है, जबकि यही काम एक ब्राह्मण के लिए पाप है, क्योंकि यह उसका अस्तित्व के नियम के खिलाफ़ है । इसलिए अपने होने (अस्तित्व) के नियम के हिसाब से कर्म करना ही किसी व्यक्ति का धर्म या मोक्ष का रास्ता है । कर्म का बादल खुद के सूरज को नज़र से छिपा लेता है । जो साधन (तरकीब) इस बादल को बिना बढ़ाए खत्म कर देता है और इस तरह खुद को ठीक करने में मदद करता है, वही धर्म है ।

आपका शिष्य: जब तक यह घोषणा कर नहीं दिया जाता, गुरु सबसे ऊँचा ज्ञान नहीं दे सकते ।

हमर स्वभाव पर कमजोर सहानुभूति हावी भ’ गेल अछि, आर हमर मोन मे कर्तव्य केँ लय कय किछु सन्देह (ओझराहट) आबि गेल अछि, हम अहाँ सँ विनती करैत छी । अहाँ निर्णीत रूप सँ कहू जे हमरा लेल कि नीक अछि । हम अहाँक चेला (शिष्य) छी । हम अहाँक शरण मे आयल छी, हमरा (उचित) निर्देशन (शिक्षा) देल जाउ । 

धर्म कोनो चीजक ‘नेस’ (ness) थिक, कोनो वस्तुक अन्तर्विधान (आन्तरिक सिद्धान्त) केर नियम (कानून/कायदा) थिक । धर्मक प्राथमिक (पहिल) अर्थ नेकी (अच्छाइ) या रिलीजन (religion) नहि अछि, बल्कि ई त बस एकर दोसर अर्थ अछि । सही काजक वास्ते लड़नाय क्षत्रिय केर धार्मिक कर्तव्य या धर्म थिक, जखन कि यैह काज एकटा ब्राह्मणक लेल पाप अछि, कियैक तँ ई ओकर अस्तित्वक सिद्धान्त (नियम) केर विपरीत अछि । तेँ अपन हेबाक (अस्तित्व) केर नियमक हिसाब सँ कर्म करनाइये कोनो व्यक्तिक धर्म या मोक्ष केर रास्ता थिक । कर्मक बादल स्वयं केर सूर्य केँ नजरि सँ नुका लैत अछि । जे साधन (तौर-तरीका-तरकीब) एहि बाद केँ बिना बढ़ेने खत्य कय दैत अछि आर एहि तरहें स्वयं केँ सही करय मे मदति करैत अछि, वैह धर्म थिक ।

अहाँक चेला: जाबत धरि ई घोषणा कय नहि देल जाइछ, गुरु सब सँ ऊँच ज्ञान नहि दय सकैत छथि ।

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ॥
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥२-८॥

I do not see anything to remove this sorrow which blasts my senses, even were I to obtain unrivalled and flourishing dominion over the earth, and mastery over the gods.

मुझे ऐसा कुछ भी नहीं दिख रहा जिससे यह दुःख, जो मेरे होश उड़ा देता है, वह दूर हो जाये; भले ही मुझे धरती पर बेजोड़ और खुशहाल राज और देवताओं पर कब्ज़ा मिल जाए ।

हमरा एहेन किछुओ नहि देखा रहल अछि जाहि सँ ई दुःख, जे हमर होश उड़ा दैत अछि, से दूर भ’ जाय; भले हमरा धरती पर बेजोड़ आ खुशहाल राज तथा देवतो लोकनि पर आधिपत्य (कब्जा) भेटि जाय । 

सञ्जय उवाच ।
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः ॥
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥२-९॥

Sanjaya said:
Having spoken thus to the Lord of the senses, Gudakesa, the scorcher of foes, said to Govinda, “I shall not fight”, and became silent.

The object of Sanjaya in using these names is to remind Dhrtarastra – who may naturally be a little elated at the prospect of Arjuna’s not fighting – that this is only a temporary weakness, since by the presence of the Lord of the senses all ignorance must eventually be dispelled. Arjuna’s own nature also is devoid of darkness. Is he not the conqueror of sleep, and the terror of foes?

संजय ने कहा:
इंद्रियों के स्वामी (श्रीकृष्ण) से ऐसा कहकर, दुश्मनों को जलाने वाले गुडाकेश ने गोविंद से कहा, “मैं नहीं लड़ूंगा”, और चुप हो गए ।

संजय का इन नामों का इस्तेमाल करने का मकसद धृतराष्ट्र को याद दिलाना है – जो अर्जुन के न लड़ने की बात से शायद थोड़ा खुश हो सकते हैं – कि यह सिर्फ़ एक अस्थायी कमजोरी है, क्योंकि इंद्रियों के स्वामी की मौजूदगी से आखिरकार सारा अज्ञान दूर हो जाएगा । अर्जुन का अपना स्वभाव भी अंधेरे से रहित है । क्या वह नींद और दुश्मनों के डर को जीतने वाला नहीं है ?

संजय कहला:
इन्द्रिय केर स्वामी (श्रीकृष्ण) सँ एना कहिकय, दुश्मन सब केँ जराबयवला गुडाकेश गोविन्द सँ कहलनि, “हम नहि लड़ब”, आर चुप भ’ गेलाह । 

संजयक एहि नाम सभक प्रयोग करबाक उद्देश्य धृतराष्ट्र केँ याद दिएनाय छैक – जे अर्जुन केर नहि लड़ब वाली बात सँ शायद कनेक खुशी भ’ सकैत छन्हि – जे कि मात्र एकटा क्षणिक (अस्थायी) कमजोरी थिकैक, कियैक तँ इन्द्रिय केर स्वामीक उपस्थिति सँ आखिरकार सबटा अज्ञान दूर भ’ जेतैक । अर्जुन केर अपनहुँ स्वभाव अंधकार सँ रहित छन्हि । कि ओ नीन्द आर दुश्मन सभक भय केँ जितयवला नहि छथि ?

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ॥
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥२-१०॥

To him who was sorrowing in the midst of the two armies, Hrsikesa, as if smiling, O descendant of Bharata, spoke these words.

Smiling – to drown Arjuna in the ocean of shame. Krishna’s smile at Arjuna’s sorrow is like the lightning that plays over the black monsoon cloud. The rain bursts forth, and the thirsty earth is saturated. It is the smile of the coming illumination.

दोनों सेनाओं के बीच में जो शोक कर रहा था, उससे हे भरत के वंशज, हृषीकेश ने मानो मुस्कुराते हुए ये शब्द कहे ।

मुस्कुराना – अर्जुन को लज्जा के सागर में डुबो देना । अर्जुन के दुःख पर कृष्ण की मुस्कान काले मानसूनी बादलों पर चमकती बिजली की तरह है । वर्षा फूट पड़ती है, और प्यासी पृथ्वी तर हो जाती है । यह आने वाली रोशनी की मुस्कान है ।

दुनू सेनाक बीच मे जे शोक (चिन्ता) कय रहल छलथि, हुनका सँ हे भरत केर वंशज, हृषीकेश मानू विहुँसैत ई शब्द कहलनि । 

विहुँसब – अर्जुन केँ लज्जाक समुद्र मे डुबायब । अर्जुन केर दुःख पर कृष्णक विहुँसब मानू कारी मानसूनी मेघ मे चमकैत बिजली जेकाँ अछि । वर्षा फुटि पड़ैत अछि, आ प्यासल पृथ्वी तृप्त भ’ जाइत अछि । ई (बाद मे) आबयवाली रोशनी केर विहुँसब थिक ।

श्रीभगवानुवाच ।

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ॥
गताशूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥२-११॥

The Blessed Lord said:
Thou hast been mourning for them who should not be mourned for. Yet thou speakest words of wisdom. The (truly) wise grieve neither for the living nor for the dead.

Words of wisdom: Vide 1-35-44.

धन्य भगवान ने कहा:
तू उनके लिये शोक कर रहा है जिनके लिये शोक नहीं करना चाहिये । फिर भी तू ज्ञान की बातें बोलता है । (वास्तव में) ज्ञानीजन न तो जीवितों के लिए शोक करते हैं और न ही मृतकों के लिए ।

ज्ञान की बातें: देखें १-३५-४४ (प्रथम अध्याय का ३५ से ४४वाँ श्लोक तक) ।

धन्य भगवान कहलनि:
अहाँ ओकरा सब लेल शोक कय रहल छी जेकरा लेल शोक नहि करबाक चाही । तैयो अहाँ ज्ञानक बात बजैत छी । (वास्तव मे) ज्ञानीजन नहि तँ जीवित लेल शोक करैत छथि आ न मृत लेल । 

ज्ञानक बात: देखू १-३५-४४ (प्रथम अध्याय केर ३५ सँ ४४मा श्लोक धरि) ।

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ॥
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥२-१२॥

It is not that I have never existed, nor thou nor these kings. Nor is it that we shall cease to exist in the future.

Of course Krishna here does not mean that the body is immortal, but refers to the true Self, behind all bodies.

ऐसा नहीं है कि मैं कभी था ही नहीं, न तुम थे, न ये राजा लोग थे । और न ही ऐसा है कि भविष्य में हमारा अस्तित्व खत्म हो जाएगा ।

बेशक, यहाँ कृष्ण का मतलब यह नहीं है कि शरीर अमर है, बल्कि उनका मतलब सभी शरीरों के पीछे मौजूद सच्ची आत्मा से है ।

एहेन नहि छैक जे हम पहिने कहियो रहबे नहि करी, न अहाँ रही, आ राजा सब रहथि । आर, नहिये एना छैक जे भविष्य मे हमरा सभक अस्तित्व खत्म भ’ जायत । 

बेशक, एतय कृष्ण केर मतलब ई नहि अछि जे शरीर अमर अछि, बल्कि हुनकर मतलब समस्त शरीर केर पाछू मौजूद सत्य आत्मा सँ अछि ।

देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ॥
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥२-१३॥

As are childhood, youth, and old age, in this body, to the embodied soul, so also is the attaining of another body. Calm souls are not deluded thereat.

According to this, the continuity of the ego is no more interrupted by death than by the passing of childhood into youth and youth into old age in this body.

Calm Souls: Those who have become calm by Self-realization.

जैसे इस शरीर में आत्मा के लिए बचपन, जवानी और बुढ़ापा होता है, वैसे ही दूसरा शरीर मिलना भी होता है । शांत आत्माएं इससे गुमराह नहीं होतीं ।

इसके अनुसार, इस शरीर में बचपन से जवानी और जवानी से बुढ़ापे में जाने से मौत से अहंकार की निरंतरता में कोई रुकावट नहीं आती ।

शांत आत्माएं: वे जो आत्म-साक्षात्कार से शांत हो गए हैं ।

जेना एहि शरीर मे आत्माक लेल बचपन, जवानी आर बुढ़ापा होइत छैक, तेनाही दोसर शरीर भेटनाय सेहो होइत छैक । शान्त आत्मा एहि सँ धोखा मे नहि पड़ैत अछि । 

एकर मुताबिक, एहि शरीर मे बचपन सँ जवानी आर जवानी सँ बुढ़ापा मे गेला सँ मृत्यु सँ अहंकार केर निरन्तरता मे कोनो रुकावट नहि अबैछ ।

(हमरा बुझनेः एतय अहंकारक अर्थ – अपन अस्तित्वक सदा-सनातन कायम रहबाक भान/समझ)

शान्त आत्मा: ओ जे आत्म-साक्षात्कार सँ शान्त भ’ गेल अछि ।

मात्रस्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ॥
आगमपायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥२-१४॥

Notions of heat and cold, of pain and pleasure, are born, O son of Kunti, only of the contact of the senses with their objects. They have a beginning and an end. They are impermanent in their nature. Bear them patiently, O descendant of Bharata.

They have a beginning and an end: as distinguished from the permanent Self. The more one is able to identify oneself with the permanent Self, the less one is affected by the agreeable and disagreeable conditions of life.

Impermanent in their nature: That is, the same object which gives pleasure at one moment, gives pain at another, and so on.

हे कुंतीपुत्र, गर्मी और सर्दी, दर्द और खुशी की भावनाएँ केवल इंद्रियों के अपने इच्छित विषयों (सम्बन्धित वस्तुओं) के संपर्क से पैदा होती हैं । उनकी एक शुरुआत और एक अंत होता है । वे अपने स्वभाव में अस्थायी हैं । हे भरत के वंशज, उन्हें धैर्य से सहन करो ।

उनकी एक शुरुआत और एक अंत होता है: जो स्थायी आत्मा से अलग माना गया है । कोई जितना ज़्यादा खुद को स्थायी आत्मा से जोड़ पाता है, उतना ही कम उस पर जीवन की अच्छी और बुरी स्थितियों का असर होता है ।

अपने स्वभाव में अस्थायी: यानी, एक ही चीज़ जो एक पल में खुशी देती है, दूसरे पल में दर्द देती है, आदि ।

हे कुन्तीपुत्र, गर्मी आ ठंढी, दुःख (दर्द) आ सुख (खुशी) केर भावना मात्र इन्द्रिय सभक अपन इच्छित विषय (पसिनक वस्तु सब) केर सम्पर्क सँ उत्पन्न होइत अछि । ओकर एकटा आरम्भ आर एकटा अन्त होइत अछि । ओ अपन स्वभाव मे अस्थायी (क्षणिक, किछु पल भरिक मात्र) होइत अछि । हे भरत केर वंशज, ओकरा धैर्य सँ सहन करू ।

ओकर एकटा आरम्भ आर एकटा अन्त होइत अछि: जे स्थायी आत्मा सँ अलग मानल गेल अछि । कियो जतेक बेसी स्वयं केँ स्थायी आत्मा सँ जोड़ि पबैत अछि, ओतबे कम ओकरा उपर जीवनक नीक आ बेजा स्थिति सभक असैर पड़ैत छैक ।

अपन स्वभाव मे अस्थायी: यानी, एक्के चीज जे एक समय खुशी (सुख) दैत अछि, दोसर पल मे दर्द (दुःख) दैत अछि, आदि ।

यं हि व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ॥
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥२-१५॥

That calm man who is the same in pain and pleasure, whom these cannot disturb, alone is able, O great amongst men, to attain to immortality.

This perfect sameness, amidst the ills of life, means full and unbroken consciousness of our oneness with the immortal Self. Thus is immortality attained.

हे मनुष्यों में महान (अर्जुन) ! जो शांत मनुष्य सुख और दुख (दोनों) में एक जैसा रहता है, जिसे ये दोनों परेशान नहीं कर सकते, केवल वही अमरत्व को पा सकता है ।

जीवन की बुराइयों के बीच इस पूर्ण एकरूपता का अर्थ है अमर आत्मा के साथ हमारी एकता की पूर्ण और अटूट चेतना । इस प्रकार अमरत्व प्राप्त होता है ।

हे मनुष्य सब मे महान (अर्जुन) ! जो शांत मनुष्य सुख और दुख (दोनों) में एक जैसा रहता है, जिसे ये दोनों परेशान नहीं कर सकते, केवल वही अमरत्व को पा सकता है ।

जीवन की बुराइयों के बीच इस पूर्ण एकरूपता का अर्थ है अमर आत्मा के साथ हमारी एकता की पूर्ण और अटूट चेतना । इस प्रकार अमरत्व प्राप्त होता है ।

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ॥
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्तत्त्वदर्शिभिः ॥२-१६॥

The unreal never is. The Real never is not. Men possessed of the knowledge of the Truth fully knows both these.

Unreal and Real: This determination of the nature of the Real is the quest of all philosophy. Shri Krishna here states that a thing which never remain the same for any given period is unreal, and that the Real on the other hand is always the same. The whole of the phenomenal world, therefore, must be unreal, because in it no one state endures for even an infinitesimal division of time. And that which takes note of this incessant change, and is therefore itself changeless – the Atman, Consciousness – is the Real.

जो चीज़ झूठी (असत्य, अवास्तविक, असत्) है, वह हमेशा नहीं रहती । जो चीज़ सच्ची (सत्य, वास्तविक, सत्) है, वह हमेशा न रहे ऐसा नहीं होता । जिन लोगों को परमसत्य का ज्ञान होता है, वे इन दोनों को पूरी तरह जानते हैं ।

झूठी और सच्ची: सच्ची चीजों की स्वभाव का पता करना ही सभी फिलॉसफी (दर्शन) की खोज है । श्री कृष्ण यहाँ कहते हैं कि जो चीज़ किसी भी समय के लिए एक जैसी नहीं रहती, वह झूठी है, और दूसरी ओर सच्ची चीज़ हमेशा एक जैसी रहती है । इसलिए, यह अद्भुत संसार की सम्पूर्ण चीजें, झूठी ही होगी, क्योंकि इसमें कोई भी हालत (स्थिति) समय के एक छोटे से हिस्से तक भी नहीं टिकती । और जो इस लगातार बदलाव पर ध्यान देता है, और इसलिए खुद भी बदला नहीं है – आत्मा, चेतना – वही सच्ची चीज़ है ।

जो चीज झूठ (असत्य, अवास्तविक, असत्) अछि, ओ सदिखन नहि रहि पबैछ । जे चीज सच (सत्य, वास्तविक, सत्) अछि, ओ सदिखन नहि रहय तेना नहि होइछ । जाहि व्यक्ति केँ परमसत्य केर ज्ञान होइत छैक ओ एहि दुनू केँ नीक जेकाँ जनैत अछि । 

झूठ आ सच: सच चीजक स्वभाव केर पता लगेनाय सब फिलॉसफी (दर्शन) केर खोज अछि । श्री कृष्ण एतय कहैत छथि जे चीज कोनो समय धरि वास्ते एक जेकाँ नहि रहैछ, त ओ झूठ छी, आर दोसर दिश सत्य चीज सदिखन एक जेकाँ रहैत अछि । तेँ, ई अद्भुत संसार केर सम्पूर्ण चीज, झूठे टा अछि, कियैक तँ एहि मे कोनो एकहु टा हालत (स्थिति) समय केर एकटा छोट सन हिस्सो धरि नहि टिकि पबैत अछि । आर जे एहि निरन्तर परिवर्तन पर ध्यान दैत अछि, आर तेँ अपने (स्वयं) सेहो नहि बदलल अछि – आत्मा, चेतना – वैह सत्य चीज अछि ।

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ॥
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥२-१७॥

That by which all this (Sat & Asat) is pervaded – That know for certain to be indestructible. None has the power to destroy this Immutable.

That by which all this is pervaded: i.e. He that pervades all this as the Witness.

जिनसे यह सब (सत् और असत्) भरा हुआ है – उनको निश्चयपूर्वक जान लो कि वह अविनाशी हैं । इस अटल (सत्य) को नष्ट करने की शक्ति किसी में नहीं है ।

जिनसे यह सब भरा हुआ है: यानी वह जो साक्षी के रूप में इस सभी (सत् और असत्) में फैले हुए हैं ।

जिनका सँ ई सबटा (सत् आ असत्) भरल रहैत अछि ‍- तिनका निश्चयपूर्वक जानि लिय जे ओ अविनाशी छथि । एहि अटल (दृढ़सत्य) केँ नष्ट करबाक शक्ति (सामर्थ्य) केकरहु पास नहि छैक । 

जिनका सँ ई सबटा भरल रहैत अछि: यानी ओ जे साक्षी रूप मे एहि सबटा (सत् आर असत्) मे पसरल (व्याप्त रहैत) छथि ।

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ॥
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥२-१८॥

Of this indwelling Self – the ever-changeless, the indestructible, illimitable – these bodies are said to have an end. Fight, therefore, O descendant of Bharata.

Arjuna’s grief which deters him from his duty of fighting against the Kauravas is born of ignorance as to the true nature of the soul. Hence Shri Bhagvan’s strong and repeated attempts to illumine him on the subject.

इस अन्तर्निहित आत्मा – सदैव अपरिवर्तनशील, अविनाशी, असीमित – के इन शरीरों का अंत (मृत्यु) होना कहा जाता है । इसलिए, हे भरत के वंशज, युद्ध करो ।

अर्जुन का शोक (दुःख) जो उन्हें कौरवों के खिलाफ लड़ने के अपने कर्तव्य से रोकता है, आत्मा की वास्तविक प्रकृति के बारे में अज्ञानता से पैदा हुआ है । इसलिए श्री भगवान ने उनके समझने के लिये इस विषय पर प्रकाश डालने के लिए बार-बार और जोरदार प्रयास किये ।

एहि अन्तर्निहित आत्मा – सदिखन अपरिवर्तनशील, अविनाशी, असीमित – केर एहि शरीर सभक अन्त (मृत्यु) होयब कहल जाइत अछि । तेँ, हे भरतवंशी, अहाँ युद्ध करू । 

अर्जुन केर शोक (दुःख) जे हुनका कौरव लोकनिक विरूद्ध लड़बाक अपन कर्तव्य सँ रोकैत अछि, से आत्माक वास्तविक प्रकृतिक बारे अज्ञानताक कारण उत्पन्न भेल अछि । तेँ श्री भगवान हुनका बुझेबाक लेल एहि विषय पर प्रकाश देबाक बेर-बेर आ जबर्दस्त (जोरदार) प्रयास कयलनि ।

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ॥
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥२-१९॥

He who takes the Self to be the slayer, and he who takes It to be the slain, neither of these knows. It does not slay, nor is it slain.

जो आत्मा को मारने वाला मानता है और जो आत्मा को मारा हुआ मानता है, इनमें से कोई नहीं जानता है । न तो आत्मा (किसीको) मारता है और न ही (कभी) मारा जाता है ।

जे आत्मा केँ मारयवला जानैत अछि आर जे आत्मा केँ मारल गेल जानैत अछि, एहि मे सँ कियो नहि जानैत अछि ।  नहि तँ आत्मा (केकरहु) मारैत अछि आर नहिये (कथमपि) मारल जाइत अछि ।

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ॥
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥२-२०॥

This is never born, nor does it die. It is not that, not having been, It again comes into being. (Or according to another view: It is not that having been, It again ceases to be). This is unborn, eternal, changeless, ever-Itself. It is not killed when the body is killed.

This sloka refers in the sense of denial to the six kinds of modification inherent in matter: birth, subsistence, growth, transformation, decay, and death.

यह न कभी पैदा होता है, न मरता है । ऐसा नहीं है कि, न होने पर, यह फिर से बन जाता है । (या दूसरे नज़रिए से: ऐसा नहीं है कि होने पर, यह फिर से नहीं हो सकता) । यह अजन्मा, हमेशा रहने वाला (सदा सनातन), कभी न बदलने वाला (अपरिवर्तनशील), हमेशा (खुद की अस्तित्व में) रहने वाला होता है । शरीर के मारे जाने पर यह नहीं मरता ।

यह श्लोक पदार्थ में मौजूद छह तरह के बदलावों को नकारने के अर्थ मे (सन्दर्भ को) बताता है: जन्म, रहना, बढ़ना, बदलना, जीर्ण होना और मृत्यु होना (ये छः अवस्थाएं पदार्थों के लिये कहा गया है) ।

ई नहि त जन्म लैत अछि, न मरैत अछि । एहेन नहि छैक जे, नहि भेला पर, ई फेर सँ बनि जाइत अछि । (या दोसर दृष्टि सँः एहेन नहि छैक जे भेला पर, ई फेर सँ नहि भ’ सकैत अछि) । ई अजन्मल, सदिखन रहयवला (सदा सनातन), कहियो नहि बदलयवला (अपरिवर्तनशील), हमेशा (स्वयं केर अस्तित्व मे) रहयवला होइत अछि । शरीर केर मारल गेलो पर ई नहि मरैत अछि । 

ई श्लोक पदार्थ मे मौजूद छह प्रकारक परिवर्तन केँ नकारबाक अर्थ मे (सन्दर्भ) बतबैत अछि –  जन्म, रहब, बढ़ब, बदलब, जीर्ण होयब आर मरब (ई छः अबस्था सब पदार्थ लेल कहल गेल अछि) ।

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ॥
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥२-२१॥

He that knows This to be indestructible, changeless, without birth, and immutable how is he, O son of Prtha, to slay or cause another to slay?

How is he to slay ? – referring to Arjuna. To cause another to slay – referring to Krishna’s own part.

हे पृथा के पुत्र, जो जानता है कि यह अविनाशी, अपरिवर्तित, जन्म से रहित और अचल है, वह कैसे किसी को मार सकता है या किसी दूसरे से मरवाया जा सकता है ?

वह कैसे मार सकता है ? – अर्जुन की ओर इशारा करते हुए । किसी दूसरे से मरवाना – कृष्ण के अपने हिस्से की ओर इशारा करते हुए ।

हे पृथापुत्र, जे जनैत अछि जे ई अविनाशी, अपरिवर्तित, जन्म सँ रहित आर अचल अछि, ओ केना केकरो मारि सकैत अछि या कियो दोसर सँ मरबायल जा सकैत अछि ? 

ओ केना मारि सकैत अछि ? – अर्जुन दिश संकेत करैत । कियो दोसर सँ मरबायल जा सकैत अछि – कृष्ण अपना दिश संकेत करैत ।

वसांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ॥
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥२-२२॥

Even as a man casts off worn-out clothes, and puts on others which are new, so the embodied casts off worn-out bodies, and enters into others which are new.

As one only puts off the old, when one already possesses the new garment, so the embodied is already entering a new body in the act of leaving this. The Upanishad compares this to the movement of a leech, which has already established a new foothold before leaving the old.

जैसे कोई इंसान पुराने कपड़े उतारकर नए कपड़े पहन लेता है, वैसे ही शरीरधारी (आत्मा) भी पुराने शरीर छोड़कर (उतारकर) नए शरीर में प्रवेश कर जाता है ।

जैसे कोई पुराना तभी उतारता है, जब उसके पास नया कपड़ा पहले से हो, वैसे ही शरीरधारी भी इस शरीर को छोड़ने के क्रम में पहले से ही एक नए शरीर में चला जाता है । उपनिषद इसकी तुलना एक जोंक की चाल (गति) से करते हैं, जो अपना पुराना आश्रय (पैर रखने का सहारा) को छोड़ने से पहले ही एक नया आश्रय बना लेती है ।

जेना कोनो मनुष्य पुरान कपड़ा उतारिकय नव कपड़ा पहिरि लैत अछि, तहिना कोनो शरीरधारी (आत्मा) सेहो पुरान शरीर छोड़िकय (उतारिकय) नव शरीर मे प्रवेश कय जाइत अछि । 

जेना कियो पुरान (कपड़ा) तखनहि उतारैत (त्यागैत) अछि, जखन ओकरा लग नव कपड़ा पहिनहि सँ हो, तेनाही शरीरधारी (आत्मा) सेहो एहि (पुरान) शरीर केँ छोड़बाक क्रम मे पहिनहिं सँ एकटा नव शरीर मे चलि जाइत अछि । उपनिषद एकर तुलना एकटा जोंकक गति (चाइल) सँ करैत अछि, जे अपन पुरान आश्रय (पैर/देह रखबाक आधार) केँ छोड़य सँ पहिनहिं एकटा नव आश्रय बना लैत अछि ।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ॥
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२-२३॥

This (Self), weapons cut not; This, fire burns not; This, water wets not; and This, wind dries not.

इस (स्वयं – आत्मा) को हथियार नहीं काटते; इसे आग नहीं जलाती; इसे पानी नहीं भिगोता; और इसे हवा नहीं सुखाती ।

एहि (स्वयं – आत्मा) केँ हथियार नहि काटैछ; एकरा आगि नहि जरबैछ; एकरा पानि नहि भिजबैछ; आर एकरा हवा नहि सुखबैछ ।

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ॥
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२-२४॥

This Self cannot be cut, nor burnt, nor wetted, nor dried. Changeless, all-pervading, unmoving, immovable, the Self is eternal.

इस आत्मा को न काटा जा सकता है, न जलाया जा सकता है, न गीला किया जा सकता है, न सुखाया जा सकता है । कभी नहीं बदलनेवाली (हमेशा अपरिवर्तित), हर जगह मौजूद (सर्वव्याप्त), न ही हिलती है, यह आत्मा हमेशा रहने वाली ‘सनातन’ है ।

एहि आत्मा केँ नहिये काटल जा सकैछ, न जरायल जा सकैछ, नहिये भिजायल जा सकैछ, न सुखायल जा सकैछ । कखनहुँ नहि बदलयवाली (हमेशा अपरिवर्तित), हर स्थान पर उपस्थित (सर्वव्याप्त), आ न हिलयवाली (अचल),  आत्मा सदा-सनातन रहयवाली अछि ।

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ॥
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥२-२५॥

This (Self) is said to be unmanifested, unthinkable, and unchangeable. Therefore, knowing This to be such, thou oughtest not to mourn.

This Self is infinite and partless, so can be neither subject nor object of any action.

इस (स्वयं – आत्मा) को अव्यक्त, अकल्पनीय और अपरिवर्तनीय कहा गया है । इसलिए, इसे ऐसा जानकर, तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए ।

यह आत्मा अनंत और अविभाज्य है, इसलिए यह न तो किसी क्रिया का विषय हो सकता है और न ही वस्तु ।

एहि (स्वयं – आत्मा) केँ अव्यक्त, अकल्पनीय आर अपरिवर्तनीय कहल गेल छैक । तेँ, एकरा एना बुझिकय, अहाँ केँ शोक नहि करबाक चाही । 

ई आत्मा अनन्त आ अविभाज्य अछि, तेँ ई नहि त कोनो क्रियाक विषय भ’ सकैछ आ नहिये वस्तु ।

अथ चैन नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ॥
तथापि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि ॥२-२६॥

But if thou shouldst take This to have constant birth and death, even in that case, O mighty-armed, thou oughtest not to mourn for This.

Krishna here, for the sake of argument, takes up the materialistic supposition, and shows that even if the Self were impermanent, sorrow ought to be destroyed, since in that case there would be no hereafter, no sin, no hell.

लेकिन अगर तुम इसे लगातार जन्म और मृत्यु वाला मानते हो, तो भी, हे महाबाहु, तुम्हें इसके लिए शोक नहीं करना चाहिए ।

यहाँ कृष्ण, तर्क के लिए, भौतिकवादी सोच को लेते हैं, और दिखाते हैं कि अगर आत्मा भी कुछ समय के लिए हो, तो भी दुःख खत्म हो जाना चाहिए, क्योंकि उस स्थिति में कोई परलोक नहीं होगा, कोई पाप नहीं होगा, कोई नरक नहीं होगा ।

मुदा जँ अहाँ एकरा लगातार जन्मय आ मरयवला मानैत छी, तैयो, हे महाबाहु, अहाँ केँ एकरा लेल शोक नहि करबाक चाही । 

एतय कृष्ण, तर्क लेल, भौतिकवादी सोच केँ लैत छथि, आर देखबैत छथि जे जँ आत्मा सेह किछु समय लेल होइ, तैयो दुःख खत्म भ’ जेबाक चाही, कियैक तँ ओहि स्थिति मे कोनो परलोक नहि होयत, कोनो पाप नहि होयत, कोनो नरक नहि होयत । 

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ॥
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२-२७॥

Of that which is born, death is certain; of that which is dead, birth is certain. Over the unavoidable, therefore, thou oughtest not to grieve.

This sloka concerns only who are not yet free. So long as there is desire, birth and death are inevitable.

Therefore thou oughtest not to grieve: Since you cannot control the inevitable and preserve the bodies of your relations, work out your own Karma and go beyond both birth and death.

वह जो पैदा हुआ है, उसकी मौत पक्की है; जो मर गया है, उसका जन्म भी पक्की है । इसलिए, जो होना ही है, उसके लिए तुम्हें दुःखी नहीं होना चाहिए ।

यह श्लोक सिर्फ़ उनके लिए है जो अभी स्वतंत्र नहीं हुए हैं । जब तक इच्छाएं (बची हुई) है, जन्म और मृत्यु तो होनी ही है ।

इसलिए तुम्हें दुखी नहीं होना चाहिए: क्योंकि तुम जो होना ही है उसे नियंत्रित नहीं कर सकते और अपने रिश्तेदारों के शरीर को बचा नहीं सकते, इसलिए अपने कर्म खुद करो और जन्म और मृत्यु दोनों से आगे बढ़ो ।

ओ जे जन्म लेने अछि, ओकर मृत्यु पक्का अछि; जे मरि गेल अछि, ओकर जन्म सेहो पक्का अछि । तेँ, जे हेबाके टा अछि, ताहि लेल अहाँ केँ दुःखी नहि हेबाक चाही । 

ई श्लोक सिर्फ ओकरा लेल अछि जे एखन तक स्वतंत्र नहि भेल अछि । जाबत धरि इच्छा (बचल रहैत) छैक, जन्म आ मृत्यु त’ हेब्बे टा करतैक । 

तेँ, अहाँ केँ दुःखी नहि हेबाक चाहीः कियैक तँ अहाँ जे हेबाके टा छैक तेकरा नियंत्रित नहि कय सकैत छी आर अपन सम्बन्धी लोकनिक शरीर केँ बचइयो नहि सकैत छी, अतः अहाँ अपन कर्म अपने करू आ जन्म एवं मृत्यु दुनू सँ आगू बढ़ू । 

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ॥
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥२-२८॥

All beings are unmanifested in their beginning, O Bharata, manifested in their middle state, and unmanifested again in their end. What is there then to grieve about?

Being: In their relationship as sons and friends, who are mere combinations of material elements, correlated as causes and effects.

The idea here is that which has no existence in the beginning and in the end, must be merely illusory in the interim, and should not therefore be allowed to have any influence upon the mind.

हे भारत, सभी जीव अपनी शुरुआत में बिना दिखे (अव्यक्त), अपनी बीच की हालत में दिखे (व्यक्त), और अपने अंत में फिर से बिना दिखे (अव्यक्त) होते हैं । तो फिर दुःख की क्या बात है ?

अस्तित्व: पुत्र और मित्र के रूप में अपने सम्बन्धों में, जो सिर्फ भौतिक चीजों का मेल है, जो कारण और प्रभाव के तौर पर जुड़े हुए हैं ।

यहाँ यह बात है कि जिसका शुरुआत और अंत में कोई वजूद नहीं है, वह बीच में सिर्फ भ्रम होना चाहिए, और इसलिए उसे मन पर कोई असर नहीं डालने देना चाहिए ।

हे भारत, सब जीव अपन आरम्भ मे बिना देखेने (यानि अव्यक्त रूप मे), अपन बीच केर हालत मे देखायल (व्यक्त), आर अपन अन्त मे फेर बिन देखेने होइत अछि । त फेर दुःख केर कोन बात छैक ?

अस्तित्व: पुत्र आ मित्र केर रूप मे अपन सम्बन्ध मे, जे मात्र भौतिक चीज सभक मेल थिक, जे कारण आर प्रभाव केर रूप सँ जुड़ि गेल अछि । 

एतय जे बात (विचार) अछि से ई जे जेकर आरम्भ आ अन्त मे कोनो अस्तित्व नहि छैक, (ओ अव्यक्त रहैत अछि), ओ बीच मे मात्र भ्रम टा हेबाक चाही, आर तेँ ओकर कोनो प्रभाव मन पर नहि पड़य देबाक चाही । 

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ॥
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥२-२९॥

Some look upon the Self as marvelous. Others speak of It as wonderful. Other again hear of It as a wonder. And still others, though hearing, do not understand It at all.

The sloka may also be interpreted in the sense that those who see, hear, and speak of the Self are wonderful men, because their number is so small. It is not therefore remarkable that you should mourn, because the Aatman is so difficult to comprehend.

कुछ लोग आत्मा को विलक्षण मानते हैं । दूसरे इसे आश्चर्यजनक कहते हैं । कुछ और लोग इसे एक अजूबे की तरह सुनते हैं । और कुछ लोग, सुनते हुए भी, इसे बिल्कुल नहीं समझते ।

इस श्लोक का मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि जो लोग आत्मा को देखते, सुनते और बोलते हैं, वे अद्भुत लोग हैं, क्योंकि उनकी संख्या बहुत कम है । इसलिए यह कोई अजीब बात नहीं है कि आपको दुःख मनाना चाहिए, क्योंकि आत्मा को समझना बहुत मुश्किल है ।

किछु लोक आत्मा केँ विलक्षण मानैत अछि । दोसर एकरा विस्मयकारी (आश्चर्यजनक) कहैत अछि । किछु आरो लोक एकरा एकटा आश्चर्य जेकाँ सुनैत अछि । आर किछु लोक, सुनितहु, एकरा एकदमे नहि बुझैत अछि । 

एहि श्लोक केर मतलब इहो निकालल जा सकैत अछि कि जे लोक आत्मा केँ देखैत, सुनैत आ कहैत अछि, से अद्भुत लोक अछि, कियैक तँ ओकर संख्या बहुते कम छैक । तेँ ई कोनो अजीब बात नहि छैक जे अहाँ केँ दुःख मनेबाक चाही, कियैक तँ आत्मा केँ बुझनाय बड कठिन काज छैक । 

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ॥
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२-३०॥

This, the Indweller in the bodies of all, is ever indestructible, O descendant of Bharata. Therefore, thou oughtest not to mourn for any creature.

Krishna here returns to His own point of view.

हे भरत के वंशज, यह सभी के शरीरों में रहने वाला सदैव अविनाशी है । अत: तुम्हें किसी भी प्राणी के लिये शोक नहीं करना चाहिये ।

कृष्ण यहाँ अपने दृष्टिकोण पर लौटते हैं ।

हे भरत केर वंशज, ई सभक शरीर मे रहयवला सदैव अविनाशी अछि । अत: अहाँ केँ कोनो प्राणीक वास्ते शोक नहि करबाक चाही । 

कृष्ण एतय अपन दृष्टिकोण पर लौटैत छथि ।

स्वधर्मपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ॥
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥२-३१॥

Looking at thine own Dharma, also, thou oughtest not to waver, for there is nothing higher for a Kshatriya than a righteous war.

That is to say, it is the duty of Kshatriya to fight in the interest of his country, people and religion.

अपने धर्म को देखते हुए भी तुम्हें डगमगाना नहीं चाहिए, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर कुछ नहीं है ।

यानी, क्षत्रिय का कर्तव्य है कि वह अपने देश, लोगों और धर्म के हित में लड़े ।

अपन धर्म केँ देखैतो अहाँ केँ नहि डगमगेबाक चाही, कियैक तँ क्षत्रिय लेल धर्मयुद्ध सँ बढ़िकय किछु नहि होइछ ।

यानी, क्षत्रिय केर कर्तव्य अछि जे ओ अपन देश, प्रजा आर धर्म केर हित मे लड़य ।

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ॥
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥२-३२॥

Fortunate certainly are the Kshatriyas, O son of Pritha, who are called to fight in such a battle that come unsought as an open gate to heaven.

The Shastras say that if a Kshatriya, fighting for a righteous cause, falls in the battle-field, he at once goes to heaven.

हे पृथा के पुत्र, क्षत्रिय सचमुच भाग्यशाली हैं, जिन्हें ऐसे युद्ध में लड़ने के लिए बुलाया जाता है जो स्वर्ग के खुले द्वार की तरह बिना माँगे ही आ जाता है ।

शास्त्र कहते हैं कि अगर कोई क्षत्रिय, सही काम के लिए लड़ते हुए, युद्ध के मैदान में गिर जाता है, तो वह तुरंत स्वर्ग जाता है ।

हे पृथापुत्र, क्षत्रिय सचमुच भाग्यशाली अछि, जेकरा एहेन युद्ध मे लड़बाक लेल बजायल जाइत छैक जे स्वर्गक खुजल द्वार जेकाँ बिना मंगनहि आबि जाइत छैक । 

शास्त्र कहैत अछि जे यदि कियो क्षत्रिय, सही काजक वास्ते लड़ैते, युद्धक मैदान मे खसि पड़ैत अछि (मरि जाइत अछि), त ओ तुरन्त स्वर्ग जाइत अछि । 

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ॥
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥२-३३॥

But if thou refusest to engage in this righteous warfare, then forfeiting thine own Dharma and honor, thou shalt incur sin.

परन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध में भाग लेने से इन्कार करेगा, तो अपने धर्म और सम्मान को खोकर तुझे पाप लगेगा ।

मुदा जँ अहाँ एहि धर्मयुक्त युद्ध मे भाग लय सँ मना करब, त अपन धर्म आ प्रतिष्ठा हरेबाक कारण अहाँ केँ पाप लागत । 

अकीर्तिञ्चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ॥
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥२-३४॥

The world also will ever hold thee in reprobation. To the honored, disrepute is surely worse than death.

The present argument – Slokas 33-36 – assumes that the cause in hand is already proved to be right. Hence it would only be from cowardice that Arjuna could abandon it. Even a hero may be weakened by the stirring of his deepest emotions.

दुनिया भी तुम्हारे इस अकीर्ति (अकर्मण्यता) को हमेशा बुरा मानेगी । इज्ज़तदार लोगों के लिए (अकीर्ति – अकर्मण्यता की) बदनामी मौत से भी बुरी होती है ।

यह तर्क – श्लोक ३३-३६ – यह मानता है कि जो वजह सामने उपस्थित है वह पहले से ही सही साबित हो चुकी है । इसलिए अर्जुन इसे सिर्फ़ कायरता की वजह से ही छोड़ सकता था । एक हीरो भी अपनी गहरी भावनाओं के उभार से कमज़ोर पड़ सकता है ।

दुनिया सेहो अहाँक एहि अकीर्ति (अकर्मण्यता) केँ हमेशा खराब मानत । प्रतिष्ठित लोक वास्ते (अकीर्ति – अकर्मण्यताक) बदनामी मरइयो सँ खराब होइत छैक ।

ई तर्क – श्लोक ३३-३६ – ई मानैत अछि कि जे कारण सोझाँ उपस्थित भेल अछि से पहिनहिं सँ सही साबित भ’ गेल अछि । तेँ अर्जुन एकरा मात्र कायरता (डरपोक बनबाक) कारण मात्र छोड़ि सकैत छलथि । एकटा नायक सेहो अपना भीतर गहींर भावना जगला सँ कमजोर पड़ि सकैत अछि । 

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ॥
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥२-३५॥

The great chariot-warriors will believe that thou hast withdrawn from the battle through fear. And thou wilt be lightly esteemed by them who have thought much of thee.

बड़े-बड़े रथी-योद्धा लोग यह मान लेंगे कि तुम भय के कारण युद्ध से हट गये हो । और जिन लोगों ने तेरे विषय में बहुत कुछ सोचा है वे तुझे तुच्छ समझेंगे ।

बड़का-बड़का रथी-योद्धा लोकनि यैह विश्वास करता जे अहाँ डराकय युद्ध सँ पाछाँ हंटि गेलहुँ । आर जे लोक सब अहाँक बारे मे बहुत पैघ बात सब सोचने छथि ओहो सब अहाँ केँ तुच्छ (नीच) बुझताह । 

अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ॥
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥२-३६॥

Thine enemies also, cavilling at thy great prowess, will say of thee things that are not to be uttered. What could be more intolerable than this?

तुम्हारे दुश्मन भी तुम्हारी महान शक्ति की बुराई करते हुए तुम्हारे बारे में ऐसी बातें कहेंगे जो कहने लायक नहीं हैं । इससे ज़्यादा बर्दाश्त के बाहर और क्या हो सकता है ?

अहाँक दुश्मन पर्यन्त अहाँक महान शक्तिक निन्दा करैत अहाँक बारे मे एहेन बात कहत जे कहबाक योग्य नहि अछि । एहि सँ बेसी बर्दाश्तक बाहर आर कि भ’ सकैत अछि ? 

हतो वा प्राप्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ॥
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥२-३७॥

Dying thou gainest heaven; conquering thou enjoyest earth. Therefore, O son of Kunti, arise, resolved to fight.

मरकर तुम स्वर्ग पाते हो; जीतकर तुम पृथ्वी का आनंद लेते हो । इसलिए, हे कुंतीपुत्र, युद्ध करने का निश्चय करके उठो ।

मरिकय अहाँ स्वर्ग पबैत छी; जितिकय अहाँ पृथ्वी पर आनन्द लैत छी । तेँ, हे कुन्तीपुत्र, युद्ध करबाक निश्चय कय केँ उठू ।

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ॥
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥२-३८॥

Having made pain and pleasure, gain and loss, conquest and defeat, the same, engage thou then in battle. So shalt thou incur no sin.

It is always the desire for one of the pairs of opposites that binds. When an act is done without attachment either for itself or its fruit, then Karma can be worked out without adding so its store, and this leads to Freedom.

दुःख और सुख, फायदा और नुकसान, जीत और हार को एक मानकर, तू युद्ध में लग जा । तो तुझे कोई पाप नहीं लगेगा ।

हमेशा विपरीत चीज़ों में से किसी एक की चाहत ही बांधती है । जब कोई काम बिना किसी लगाव के किया जाता है, चाहे वह खुद के लिए हो या उसके फल के लिए, तो कर्म का फल बिना ज़्यादा बढ़ाए चुकाया जा सकता है, और इससे आज़ादी मिलती है । 

दुःख आ सुख, फायदा आ नुकसान, जीत आ हार केँ एक मानिकय, अहाँ युद्ध मे लागि जाउ । तखन अहाँ केँ कोनो पाप नहि लागत ।

हमेशा विपरीत चीज मे सँ कोनो एक केर चाहत मात्र बान्हैत अछि । जखन कोनो काज बिना कोनो लगाव केँ कयल जाइत अछि, चाहे ओ अपना लेल हो या ओकर फल केर लेल, तखन कर्मक फल बिना बेसी बढ़ेने चुकायल जा सकैत अछि, आर एहि सँ स्वतंत्रता (मुक्ति) भेटैत अछि । 

एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ॥
बुद्ध्या युक्ता यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥२-३९॥

The wisdom of Self-realization has been declared unto thee. Hearken thou now to the wisdom of Yoga, endued with which, O Son of Pritha, thou shalt break through the bonds of Karma.

Yoga: Karma-Yoga, or that plan of conduct which secures the working out of past Karma, non-accumulation of new and the striving for Self-realization with the whole of the will. In this discipline, one’s sole object in life is Self-realization; hence no importance is attached to anything else. Thus all actions are performed without attachment, or care for results. So no new Karma is made; only the already accumulated is exhausted. And at the same time, the whole will is left free to devote itself to the achievement of Self-realization alone.

In the preceding Slokas, 11-25, Krishna has given the point of view of the highest knowledge, the ancient Brahmjnana. In the 26th and 27th we have a purely materialistic standpoint. Slokas 28 to 37 give the attitude of a man of the world. In the 38th we have an anticipation of the Yoga. And in what is to follow, we have Shri Krishna’s own contribution to the philosophy of life.

तुम्हें आत्म-साक्षात्कार का ज्ञान बताया गया है । अब तुम योग के ज्ञान को सुनो, जिससे संपन्न होकर, हे पृथा के पुत्र, तुम कर्म के बंधनों को तोड़ दोगे ।

योग: कर्म-योग, या आचरण की वह योजना जो पिछले कर्मों को पूरा करने, नए कर्मों को जमा न करने और पूरी इच्छाशक्ति के साथ आत्म-साक्षात्कार के लिए प्रयास करने को सुरक्षित करती है । इस विद्या में, जीवन में व्यक्ति का एकमात्र उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार है; इसलिए किसी और चीज़ को कोई महत्व नहीं दिया जाता है । इस प्रकार सभी कार्य बिना किसी आसक्ति या परिणाम की परवाह बिना किए जाते हैं । इसलिए कोई नया कर्म नहीं किया जाता है; केवल पहले से जमा किए गए कर्म ही समाप्त होते हैं । और साथ ही, पूरी इच्छाशक्ति को केवल आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने के लिए समर्पित होने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है ।

पिछले श्लोकों, ११-२५ में, कृष्ण ने सबसे ऊंचे ज्ञान, प्राचीन ब्रह्मज्ञान का दृष्टिकोण दिया है । २६ वें और २७वें में हमारा पूरी तरह से भौतिकवादी दृष्टिकोण है । श्लोक २८ से ३७ में दुनियादारी के बारे में बताया गया है । ३८वें श्लोक में हमें योग की उम्मीद प्राप्त होता है । और आगे जो है, उसमें हमें जीवन के दर्शन में श्री कृष्ण का अपना योगदान मिलता है ।

अहाँ केँ आत्म-साक्षात्कार केर ज्ञान कहल गेल अछि । आब अहाँ योग केर ज्ञान केँ सुनू, जाहि सँ सम्पन्न भ’ कय, हे पृथापुत्र, अहाँ कर्म केर बन्धन सब केँ तोड़ि देब । 

योग: कर्म-योग, या आचरण केर ओ योजना जे पैछला कर्म सब केँ पूरा करय मे, नव कर्म सब केँ संचित (जमा) नहि करय मे आ पूरा इच्छाशक्तिक संग आत्म-साक्षात्कार लेल प्रयास करबाक वास्ते सुरक्षित करैत अछि । एहि विद्या मे, जीवन मे व्यक्तिक एकमात्र उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार होइत छैक; ताहि सँ कोनो आर चीजक कोनो महत्व नहि देल जाइत छैक । एहि तरहें सब कार्य बिना कोनो आसक्ति या परिणाम केर परवाह कएने बिना कयल जाइत छैक । तेँ कोनो नव कर्म नहि कयल जाइत छैक; मात्र पहिनहिं सँ संचित कयल गेल कर्म टा समाप्त होइत रहैत छैक । आर संगहि, पूरा इच्छाशक्ति केँ मात्र आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करबाक लेल समर्पित होयबाक लेल स्वतंत्र छोड़ि देल जाइत छैक । 

पिछले श्लोकों, ११-२५ में, कृष्ण ने सबसे ऊंचे ज्ञान, प्राचीन ब्रह्मज्ञान का दृष्टिकोण दिया है । २६ वें और २७वें में हमारा पूरी तरह से भौतिकवादी दृष्टिकोण है । श्लोक २८ से ३७ में दुनियादारी के बारे में बताया गया है । ३८वें श्लोक में हमें योग की उम्मीद प्राप्त होता है । और आगे जो है, उसमें हमें जीवन के दर्शन में श्री कृष्ण का अपना योगदान मिलता है ।

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ॥
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥२-४०॥

In this (Yoga), there is no waste of the unfinished attempt, nor is there production of contrary results. Even very little of this Dharma protects from the great terror.

Waste of the unfinished attempt: A religious rite or ceremony performed for a definite object, if left uncompleted, is wasted, like a house unroofed which neither serviceable nor enduring. In Karma-Yoga, however, that is, action and worship performed without desire, this law does not apply, for every effort results in immediate purification of the heart.

Production of contrary results: In worship for an object, any imperfection in the process produces positive loss instead of gain. As in cases of sickness, the non-use of the right medicine results in death.

The great terror: Being caught in the wheel of birth and death.

इस (योग) में न तो अधूरे प्रयास की बर्बादी होती है और न ही विपरीत परिणाम उत्पन्न होते हैं । इस धर्म का थोड़ा सा अंश भी महान आतंक से रक्षा करता है ।

अधूरे प्रयास की बर्बादी: किसी निश्चित उद्देश्य के लिए किया गया धार्मिक अनुष्ठान या समारोह, अगर अधूरा छोड़ दिया जाता है, तो बर्बाद हो जाता है, जैसे बिना छत वाला घर जो न तो सेवा योग्य होता है और न ही टिकाऊ होता है । हालाँकि, कर्म-योग में, अर्थात् इच्छा के बिना किए गए कार्य और पूजा में, यह नियम लागू नहीं होता है, क्योंकि हर प्रयास के परिणामस्वरूप हृदय की तत्काल शुद्धि होती है ।

विपरीत परिणामों का उत्पादन: किसी वस्तु की पूजा में, प्रक्रिया में कोई भी अपूर्णता लाभ के बजाय सकारात्मक हानि उत्पन्न करती है । जैसा कि बीमारी के मामलों में होता है, सही दवा का उपयोग न करने से मृत्यु हो जाती है ।

महान भय : जन्म और मृत्यु के चक्र में फँसना ।

एहि (योग) मे नहि त अधूरा प्रयास केर बर्बादी होइत छैक आर नहिये उलटा फल (परिणाम) भेटैत छैक । एहि धर्म केर कनियो टा अंश सेहो महान आतंक सँ रक्षा करैत अछि ।

अधूरा प्रयास केर बर्बादी: कोनो निश्चित उद्देश्य वास्ते कयल गेल धार्मिक अनुष्ठान या समारोह, अगर अधूरा छोड़ि देल जाइत छैक, त बर्बाद भ’ जाइत छैक, जेना बिना छतवला घर जे नहि त सेवा योग्य होइत छैक आर नहिये टिकाउ होइत छैक । जखन कि, कर्म-योग मे, अर्थात् कोनो विशेष चाह (मनक कामना) बिना कयल गेल कार्य व पूजा मे, ई नियम लागू नहि होइत छैक, कियैक तँ हरेक प्रयासक परिणामस्वरूप हृदय केर तत्काल शुद्धि होइत रहैत छैक ।

उलटा फल सब भेटब: कोनो वस्तुक पूजा मे, प्रक्रिया मे कोनो तरहक अपूर्णता लाभक बदला सकारात्मक हानि उत्पन्न करैत छैक । जेना कि बीमारीक मामिल सब मे होइत छैक, सही दबाइ केर उपयोग नहि कयला सँ मृत्यु भ’ जाइत छैक ।

महान भय : जन्म आर मृत्यु केर चक्र मे फँसब ।

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ॥
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥२-४१॥

In this (Karma-Yoga), O scion of Kuru, there is but a single one-pointed determination. The purpose of the undecided are innumerable and many-branching.

In Karma-Yoga, the one goal is Self-realization.

The undecided (that is about the highest), naturally devote themselves to lower ideals, no one of which can satisfy. Thus they pass from plan to plan.

इस (कर्म-योग) में, हे कुरुवंशी, बस एक ही पक्का इरादा है । जो तय नहीं कर पाते उनके मकसद अनगिनत और कई हिस्सों में बंटे होते हैं ।

कर्म-योग में, एक ही मकसद है खुद को पाना (आत्म-साक्षात्कार) ।

जो तय नहीं कर पाते (यानी सर्वश्रेष्ठता के बारे में), वे अपने आप को छोटे आदर्शों में लगा देते हैं, जिनमें से कोई भी उन्हें संतोष दे सकता है । इस तरह वे एक योजना से दूसरा योजना में जाते रहता है ।

एहि (कर्म-योग) मे, हे कुरुवंशी, बस एक्के टा सुनिश्चित बात छैक । जे निर्णय नहि कय पबैछ ओकर उद्देश्य अनगिनत आ कतेको भाग मे बँटल रहैत छैक । 

कर्म-योग मे, एकमात्र उद्देश्य छैक जे स्वयं केँ प्राप्त करू (आत्म-साक्षात्कार) ।

जे निर्णय नहि कय पबैछ (यानी सब सँ नीक “सर्वश्रेष्ठ” केर बारे मे), ओ अपना आप केँ छोट आदर्श (कार्य सब) मे लगा दैत अछि, जाहि मे सँ कोनो टा सन्तोष नहि दय सकैत छैक । एहि तरहें ओ एक योजना सँ दोसर योजना मे जाइत रहैत अछि ।

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ॥
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीतिवादिनः ॥२-४२॥
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ॥
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥२-४३॥
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम ॥
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥२-४४॥

O Partha, no set determination is formed in the minds of those that are deeply attached to pleasure and power, and whose discrimination is stolen away by the flowery words of the unwise, who are full of desires and look upon heaven as their highest goad and who, taking pleasure in the panegyric words of the Vedas, declare that there is nothing else. Their flowery words are exuberant with various specific rites as the means to pleasure and power and are the causes of (new) births as the result of their works (performed with desire).

Samadhi has been rendered into “mind” in the above. The generally accepted significance of the term (absorption in God-consciousness produced by deep meditation) would give an equally consistent and happy meaning; Persons attached to pleasure and power cannot have perfect steadiness of mind divine meditation.

Panegyric words of the Vedas: The Karma-Kanda or the sacrificial portion of the Vedas which lays down specific rules for specific actions and their fruits, and extols these latter unduly.

Nothing else: Beyond the heavenly enjoyments procurable by the sacrificial rites of the Vedas.

हे पार्थ, जो लोग सुख और शक्ति के पीछे बहुत ज़्यादा लगे रहते हैं, और जिनकी समझ अज्ञानियों की फूलों जैसी बातों चुरा ली जाती है (अर्थात् अज्ञानियों की आकर्षक बातों मे जिनकी समझ फँस जाती है), जो कई तरह के इच्छाओं से भरे होते हैं और स्वर्ग को अपना सबसे बड़ा गन्तव्य (प्राप्य उद्देश्य) मानते हैं और जो वेदों की स्तुतिपरक शब्दों (वेद-स्तोत्र जो विभिन्न देवताओं के प्रशंसा करनेवाली शब्दभाव से भरे हुए हैं) में आनन्द लेते हुए कहते हैं कि और कुछ भी नहीं है, उनके मन में कोई पक्का इरादा (निश्चयात्मक बुद्धि) नहीं बनता । उनकी फूलों सी बातें सुख और शक्ति के साधन के तौर पर कई खास रीतियों से भरी होती हैं और उनके (सकाम भाव से किए गए) कामों के नतीजे के तौर पर (नए) जन्मों का कारण होती हैं ।

ऊपर समाधि का मतलब “मन” से जुड़ा हुआ है । इस शब्द का आम तौर पर माना जाने वाला मतलब (गहरे ध्यान से पैदा होने वाली ईश्वर-चेतना में डूब जाना) भी उतना ही एक जैसा और खुशियाँ वाला मतलब देगा; सुख और शक्ति के पीछे लगे लोग दिव्य ध्यान में मन की पूरी स्थिरता नहीं पा सकते ।

वेदों की स्तुतिपरक बातें: वेदों का कर्म-कांड या यज्ञ वाला हिस्सा जो खास कामों और उनके फलों के लिए खास नियम बताता है, और इनकी बेवजह तारीफ़ करता है ।

और कुछ नहीं: वेदों के यज्ञों से मिलने वाले स्वर्गीय सुखों के अलावा ।

हे पार्थ, जे लोक सुख आर शक्तिक पाछाँ बहुत बेसी लागल रहैत अछि, आर जेकर समझ अज्ञानी लोकक फूल जेहेन (आकर्षक) बात द्वारा चोरा लेल (आकर्षित कय लेल) जाइत अछि (अर्थात् अज्ञानी लोकक आकर्षक बात सब मे जेकर समझशक्ति फँसि जाइत अछि), जे कतेको तरहक इच्छा (कामना) सब सँ भरल रहैत अछि आर स्वर्ग केँ अपन सब सँ पैघ गन्तव्य (प्राप्त होयबला उद्देश्य) मानैत अछि आर वेदक स्तुतिपर शब्द (वेद-स्तोत्र जे विभिन्न देवता लोकनिक प्रशंसा करयवला शब्दभाव सँ भरल अछि) ताहि सब मे आनन्द उठबैत कहैत अछि जे आर बाकी किछु अछिये नहि, ओकर मन मे दृढ़निश्चय इच्छा (निश्चय बुद्धि) नहि बनैछ । ओकर फूल सन (आकर्षक) बात सब सुख आ शक्तिक साधन केर रूप मे कोनो खास रीति सब सँ भरल रहैत छैक आ ओकर (सकाम भाव सँ कयल गेल) कर्मक परिणाम स्वरूप नव जन्म सभक कारण भेल करैत छैक । 

उपर समाधि केर माने “मन” सँ जोड़ल गेल अछि । एहि शब्दक सामान्यतया मानल जायवला अर्थ (गहींर ध्यान सँ उत्पन्न होयबला ईश्वर-चेतना मे डुबि गेनाय) सेहो ओतबेक एकरूप वला आ प्रसन्नता प्रदान करयवला अर्थ देत; सुख आर शक्तिक पाछाँ लागल लोक दिव्य ध्यान मे मन केँ पूरापूरी स्थिरता नहि पाबि सकैत अछि । 

वेदक स्तुतिपरक बात: वेद केर कर्म-कांड या यज्ञ वला भाग जे खास कर्म आर ओकर फल लेल खास नियम (रीति) बतबैत अछि आर एकर बिना वजह बेसी प्रशंसा करैत अछि । 

आर किछुओ नहि: वेद केर यज्ञ सब सँ भेटयवला स्वर्गीय सुख सभक अलावा ।

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ॥
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥२-४५॥

The Vedas deal with the three Gunas. Be thou free, O Arjuna, from the triad of the Gunas, free from the pairs of opposites, ever-balanced, free from (the thought of) getting and keeping, and established in the Self.

The Vedas deal with etc.: That is to say, the Vedas treat of relativity.

Pairs of opposites: Dvandva, all correlated ideas and sensations, e.g., good and bad, pleasure and pain, heat and cold, light and darkness, etc.

Guna is a technical term of the Sankhya philosophy also used in the same sense by the Vedanta. Prakriti or Nature is constituted of three Gunas; Sattva (equilibrium), Rajas (attraction), Tamas (inertia). Prakriti is the three Gunas, not that she has them. Guna is wrongly translated as quality; it is substance as well as quality, matter, and force. Wherever there is name and form, there is Guna. Guna also means a rope, that which binds.

My Note: These are very important philosophies, we need deep contemplation on these verses. 🙂

वेद तीन गुणों के बारे में बताते हैं । हे अर्जुन, तुम गुणों के तिकड़ी से आज़ाद हो जाओ, विपरीत के जोड़ों से आज़ाद हो जाओ, हमेशा सन्तुलित रहो, पाने और रखने के (सोच से) आज़ाद हो जाओ, और खुद में स्थिर रहो ।

वेद इनके बारे में बताते हैं, आदि: यानी, वेद सापेक्षता के बारे में बताते हैं ।

विपरीत के जोड़े: द्वंद्व, सभी जुड़े हुए विचार और एहसास, जैसे, अच्छा और बुरा, सुख और दुःख, गर्मी और सर्दी, रोशनी और अंधेरा, आदि ।

गुण सांख्य दर्शन का एक तकनीकी शब्द है जिसे वेदांत भी इसी मतलब से इस्तेमाल करता है । प्रकृति तीन गुणों से बनी है; सत्व (इक्विलिब्रियम), रजस (अट्रैक्शन), तमस (इनर्शिया) । प्रकृति के तीन गुण हैं, ऐसा नहीं है कि उसमें वे हैं । गुण का गलत अनुवाद क्वालिटी है; यह सब्सटेंस के साथ-साथ क्वालिटी, मैटर और फोर्स भी है । जहाँ भी नाम और रूप है, वहाँ गुण है । गुण का मतलब रस्सी भी होता है, जो बांधता है ।

मेरा नोट: ये बहुत महत्वपूर्ण दर्शन हैं, हमें इन श्लोकों पर गहराई से सोचने की ज़रूरत है ।

वेद तीन गुण केर बारे मे कहैत अछि । हे अर्जुन, अहाँ गुण सभक तिकड़ी सँ मुक्त भ’ जाउ, विपरीतार्थक शब्दक जोड़ा सँ मुक्त भ’ जाउ, हमेशा सन्तुलित रहू, पेबाक आ रखबाक (सोच सँ) मुक्त भ’ जाउ, आ स्वयं मे स्थिर रहू । 

वेद एकर बारे मे कहैत अछि, आदि: यानी, वेद सापेक्षताक (गुण सभक सापेक्ष सम्बन्ध) बारे मे बतबैत अछि ।

विपरीतार्थक शब्दक जोड़ा: द्वंद्व, सबटा जुड़ल विचार आ अनुभूति, जेना, नीक आ बेजाय, सुख आ दुःख, गर्मी आ ठंढी, इजोर आ अन्हार, आदि । 

गुण सांख्य दर्शन केर एकटा तकनीकी शब्द अछि जेकरा वेदान्त सेहो एहि अर्थक संग उपयोग करैत अछि । प्रकृति तीन गुण सब सँ बनल अछि; सत्व (इक्विलिब्रियम), रजस (अट्रैक्शन), तमस (इनर्शिया) । प्रकृति केर तीनटा गुण छैक, एहेन नहि छैक जे ओ (प्रकृति) ओकरा सब मे छैक । गुण केर अशुद्ध अनुवाद (माने) क्वालिटी छैक; ई सब्सटेंस (पदार्थ) केर संग क्वालिटी (गुण), मैटर (द्रव्य) आ फोर्स (बल) सेहो छैक । जेतय कतहु नाम आ रूप छैक, ओतय गुण छैक । गुण केर अर्थ रस्सी सेहो होइत छैक, जे बान्हैत अछि । 

हमर नोट: ई बहुते महत्वपूर्ण दर्शन अछि, हमरा सब केँ एहि श्लोक सबपर खुब गहींरता सँ सोचबाक जरूरत अछि । 

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ॥
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥२-४६॥

To the Brahmana who has known the Self, all the Vedas are of so much use as a reservoir is, when there is a flood everywhere.

A man possessed of Self-knowledge has no need whatever of the Vedas. This does not, however, mean that the Vedas are useless; only to the knower of Brahmana they have no value, as the transient pleasures derivable from them are comprehended in the infinite bliss of Self-knowledge.

जिस ब्राह्मण ने खुद को जान लिया है, उसके लिए सभी वेद उतने ही काम के हैं, जितने बाढ़ आने पर कोई तालाब ।

जिस व्यक्ति के पास आत्मज्ञान होता है उसको वेदों की कोई ज़रूरत नहीं है । लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि वेद बेकार हैं; बस ब्रह्म को जानने वाले के लिए उनका कोई महत्व नहीं है, क्योंकि उनसे मिलने वाले कुछ समय का सुख स्वयं को जानने (आत्मज्ञान) के अनंत आनंद में मिल जाते हैं ।

जे ब्राह्मण स्वयं केँ जानि लेने छथि, हुनका वास्ते सबटा वेद ओतबे काजक अछि, जतेक बाढ़ि एलापर कोनो पोखरि केर । 

जाहि व्यक्तिक पास आत्मज्ञान होइत छैक ओकरा वेद केर कोनो जरूरत नहि छैक । मुदा, एकर मतलब ई नहि जे वेद बेकार अछि; बस ब्रह्म केँ जननिहार लेल ओकर कोनो महत्व नहि छैक, कियैक तँ ओहि सँ भेटयवला किछु समय केर सुख स्वयं केँ जानि लेबाक (आत्मज्ञान प्राप्त कय लेबाक) अनन्त आनन्द मे भेटि जाइत छैक । 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ॥
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥२-४७॥

Thy right is to work only; but never to the fruits thereof. Be thou not the producer of the fruits of (thy) actions; neither let thy attachment be towards inaction.

Be thou not the producer, etc.: That is, do not work with any desire for results, for actions produce fruits or bondage only if they are performed with desire.

Karma primarily means action, but a much profounder meaning has come to be attached to this word. It means the destiny forged by one in one’s past incarnation or present: the store of tendencies, impulses, characteristics, and habits laid by, which determines the future embodiment, environment, and the whole of one’s organization.

Another meaning of Karma often used in reference to one’s caste or position in life, is duty, the course of conduct which one ought to follow in pursuance of the tendencies which one acquired in one’s past, with a view to working them out and regaining the pristine purity of the Self.

तेरा अधिकार केवल काम करना है; लेकिन उसका फल के लिए कभी नहीं । तू (अपने) कर्मों के फल का उत्पादक मत बन; न ही अपनी आसक्ति को अकर्मण्यता की ओर जाने दे ।

तू उत्पादक आदि न हो: अर्थात् फल की इच्छा से कर्म मत कर, क्योंकि इच्छा से किये गये कर्म से ही फल या बंधन उत्पन्न होता है ।

कर्म का अर्थ मुख्य रूप से क्रिया है, लेकिन इस शब्द के साथ बहुत गहरा अर्थ जुड़ गया है । इसका अर्थ है किसी के पिछले अवतार या वर्तमान में बनाई गई नियति: प्रवृत्तियों, आवेगों, विशेषताओं और आदतों का भंडार, जो भविष्य के अवतार, वातावरण और किसी के पूरे संगठन को निर्धारित करता है ।

कर्म का एक और अर्थ जो अक्सर किसी की जाति या जीवन में स्थिति के संदर्भ में उपयोग किया जाता है, वह कर्तव्य है, आचरण का मार्ग जिसे किसी व्यक्ति को अपने अतीत में अर्जित प्रवृत्तियों के अनुसरण में पालन करना चाहिए, उन्हें काम में लाने और स्वयं की प्राचीन शुद्धता को पुनः प्राप्त करने की दृष्टि से ।

अहाँक अधिकार मात्र कर्म करब अछि; मुदा ओकर (कर्मक) फल पर किन्नहुं नहि । अहाँ (अपन) कर्म केर फल केर उत्पादक जुनि बनू; नहिये अपन आसक्ति केँ अकर्मण्यता (कर्महीनता) दिश जाय दिय’ । 

अहाँ उत्पादक आदि नहि बनू: अर्थात् फल केर इच्छा सँ कर्म जुनि करू, कियैक तँ इच्छा सँ कयल गेल कर्महि सँ फल या बन्धन उत्पन्न होइत अछि । 

कर्म केर अर्थ मुख्य रूप सँ क्रिया थिक, मुदा एहि शब्दक संग बहुत गहींर अर्थ जुड़ि गेल अछि । एकर अर्थ अछि जे केकरो पैछला अवतार (जन्म) या वर्तमान मे बनायल गेल नियतिः प्रवृत्ति, आवेग, विशेषता तथा आदति सभक भंडार, जे भविष्य मे जन्म, वातावरण आर ओकर पूरा संगठन केँ निर्धारित करैत अछि । 

कर्म केर एकटा आर अर्थ जे बेसीकार केकरो जाति या जीवन मे स्थितिक सन्दर्भ मे उपयोग कयल जाइत अछि, से कर्तव्य छी, आचरण केर मार्ग जे कोनो व्यक्ति केँ अपन अतीत मे अर्जित प्रवृत्ति सभक अनुसरण मे पालन करबाक चाही, ओकरा काज मे आनय आ स्वयं केर प्राचीन शुद्धता केँ फेरो प्राप्त करबाक दृष्टि सँ ।

योगस्थः कुरु कर्मणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ॥
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥२-४८॥

Being steadfast in Yoga, O Dhananjaya, perform actions, abandoning attachment, remaining unconcerned as regards success and failure. This evenness of mind (in regards to success and failure) is known as Yoga.

हे धनंजय, योग में स्थिर रहकर, आसक्ति छोड़कर, सफलता और असफलता की चिंता किए बिना कर्म करो । मन की यह एकरूपता (समत्व भाव) (सफलता और असफलता के संबंध में) योग कहलाती है ।

हे धनंजय, योग मे स्थिर रहिकय, आसक्ति छोड़िकय, सफलता आर असफलताक चिन्ता कएने बिना कर्म करू । मन केर यैह एकरूपता (समत्व भाव) (सफलता व असफलताक सम्बन्ध मे) योग कहाइत अछि ।

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ॥
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥२-४९॥

Work (with desire) is verily far inferior to that performed without with the mind undisturbed by thoughts of results. O Dhananjaya, seek refuge in this evenness of mind. Wretched are they who act for results.

(इच्छा के साथ) कर्म करना, मन को बिना नतीजों के विचारों से परेशान हुए बिना किए गए कर्म से कहीं ज़्यादा तुच्छ है । हे धनंजय, मन की इस समत्व भाव (एकरूपता) में शरण लो । वे लोग बुरे हैं जो नतीजों के लिए कर्म करते हैं ।

(इच्छाक संग) कर्म करब, मन केँ बिना नतीजक विचार सब सँ परेशान भेने बिना कयल गेल कर्म सँ कतहु बेसिये निम्नतर अछि । हे धनंजय, मन केर एहि समत्व भाव (एकरूपता) मे शरण लिय’ । ओ लोक खराब अछि जे परिणाम केर लेल कर्म करैत अछि । 

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ॥
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥२-५०॥

Endued with this evenness of mind, one frees oneself in this life, alike from vice and virtue. Devote thyself, therefore, to this Yoga. Yoga is the very dexterity of work.

Alike from vice and virtue: A follower of Karma-Yoga can have no personal motive for any action. Our action without motive becomes colorless, loses its character of vice or virtue.

Dexterity of work: It is the nature of work to produce bondage. Karma-Yoga is the dexterity of work, because it not only robs work of its power to bind, but also transforms it into an efficient means of freedom.

मन की इस एकता से इंसान इस जीवन में खुद को बुराई और अच्छाई दोनों से आज़ाद कर लेता है । इसलिए, खुद को इस योग में लगा दो । योग ही काम की कुशलता है ।

बुराई और अच्छाई दोनों से एक जैसा: कर्म-योग को मानने वाले का किसी भी काम के लिए कोई निजी मकसद नहीं हो सकता । बिना मकसद के हमारा काम बेरंग हो जाता है, उसमें बुराई या अच्छाई का गुण नहीं रहता ।

काम की कुशलता: काम का स्वभाव ही बंधन पैदा करना है । कर्म-योग काम की कुशलता है, क्योंकि यह न केवल काम की बांधने की ताकत को खत्म करता है, बल्कि उसे आज़ादी का एक असरदार ज़रिया भी बनाता है ।

मन केर एहि समत्व भाव सँ मनुष्य एहि जीवन मे स्वयं केँ खराब आ नीक दुनू सँ मुक्त कय लैत अछि । तेँ, अहाँ स्वयं केँ एहि योग मे लगा दिय’ । योग टा कर्मक कुशलता थिक । 

खराब आ नीक दुनू सँ एक जेकाँः कर्म-योग केँ मानयवला केँ कोनो काजक लेल कोनो निजी हेतु (उद्देश्य) नहि भ’ सकैत छैक । बिना हेतु केँ हमरा लोकनिक कर्म बेरंग (रंगहीन) भ’ जाइछ, ओहि मे खराब या नीक केर गुण नहि रहैत छैक । 

कर्मक कुशलता: कर्मक स्वभावे छैक बन्धन उत्पन्न कयनाय । कर्म-योग कर्मक कुशलता छी, कियैक तँ ई नहि केवल कर्म बन्हबाक ताकत केँ खत्म करैत अछि, बल्कि ओकरा मुक्तिक एक गोट प्रभावशाली माध्यम सेहो बनबैत अछि । 

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ॥
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयं ॥२-५१॥

The wise, possessed of this evenness of mind, abandoning the fruits of their actions, freed for ever from the fetters of birth, go to that state which is beyond all evil.

इस समत्व मन वाले बुद्धिमान लोग, अपने कर्मों के फल को छोड़कर, जन्म के बंधनों से हमेशा के लिए मुक्त होकर, उस स्थिति में चले जाते हैं जो सभी बुराइयों से परे है ।

एहि समत्व मन वला बुद्धिमान लोक, अपन कर्मक फल केँ छोड़िकय, जन्मक बन्धन सँ हमेशाक लेल मुक्त भ’ कय, ओहि स्थिति मे चलि जाइत अछि जे सबटा खराबी सँ दूर अछि ।

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ॥
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥२-५२॥

When thy intellect crosses beyond the taint of illusion, then shalt thou attain to indifference, regarding things heard and things yet to be heard.

The taint of illusion: the identifying of the Self with the non-Self, the ego.

जब तुम्हारी बुद्धि भ्रम के दाग से आगे निकल जाएगी, तब तुम सुनी हुई और सुनी जाने वाली चीज़ों के बारे में बेपरवाह हो जाओगे ।

भ्रम का दाग: स्वयं को गैर-स्वयं, अहंकार के साथ पहचानना ।

जखन अहाँक बुद्धि भ्रम केर दाग सँ आगाँ निकलि जायत, तखन अहाँ सुनल गेल आ सुनल जायवला चीज सभक बारे मे बेपरवाह भ’ जायब । 

भ्रम केर दाग: स्वयं केँ गैर-स्वयं, अहंकार केर संग चिन्हब ।

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ॥
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥२-५३॥

When thy intellect, tossed about by the conflict of opinions, has become immovable and firmly established in the self, then thou shalt attain Self-realization.

जब तुम्हारी बुद्धि, जो विचारों के टकराव से इधर-उधर भटक रही थी, स्थिर हो जाएगी और खुद में मज़बूती से स्थापित हो जाएगी, तब तुम्हें आत्म-साक्षात्कार मिल जाएगा ।

जखन अहाँक बुद्धि, जे विचार सभक टकराहट सँ एम्हर-ओम्हर भटैक रहल छल, स्थिर भ’ जायत आ स्वयं मे दृढ़ता सँ स्थापित भ’ जायत, तखन अहाँ केँ आत्म-साक्षात्कार भेटि जायत । 

अर्जुन उवाच ।

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ॥
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥२-५४॥

Arjuna said:

What, O Keshava, is the description of the man of steady wisdom, merged in Samadhi ? How (on the other hand) does the man of steady wisdom speak, how sit, how walk ?

Arjuna is asking, (1) what is the state of the mind of the man of realization when in Samadhi ? and (2) how is its influence shown in his conduct when out of it ?

Steady wisdom: Settled conviction of one’s identity with Brahman gained by direct realization.

अर्जुन ने कहा:

हे केशव, समाधि में डूबे हुए, स्थिर बुद्धि वाले आदमी का क्या वर्णन है ? दूसरी ओर, स्थिर बुद्धि वाला आदमी कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, कैसे चलता है ?

अर्जुन पूछ रहा है, (१) समाधि में होने पर ज्ञानी आदमी के मन की हालत क्या होती है ? और (२) समाधि से बाहर होने पर उसके व्यवहार पर इसका असर कैसे दिखता है ?

स्थिर बुद्धि: प्रत्यक्ष अनुभूति (सीधा एहसास) से मिलने वाला खुद की पहचान ब्रह्म के साथ होने का पक्का यकीन ।

अर्जुन कहलनि:

हे केशव, समाधि मे डूबल रहल, स्थिर बुद्धिवला आदमीक कि वर्णन अछि ? दोसर दिश, स्थिर बुद्धिवला आदमी केना बजैत अछि, केना बैसैत अछि, केना चलैत अछि ?

अर्जुन पुछि रहल छथि, (१) समाधि मे रहला पर ज्ञानी आदमी (स्थिर बुद्धिवला लोक) केर मनक हालत केहेन होइत छैक ? आर (२) समाधि सँ बाहर रहला पर ओकर व्यवहार पर एकर असर केना देखाइत छैक ?

स्थिर बुद्धि: प्रत्यक्ष अनुभूति (सीधा अनुभव) सँ भेटयवला स्वयं केर पहिचान ब्रह्म संग हेबाक दृढ़ विश्वास । 

श्री भगवानुवाच ।

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ॥
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥२-५५॥

The Blessed Lord said:

When a man completely casts away, O Partha, all the desires of the mind, satisfied in the Self alone by the Self, then is he said to be one of steady wisdom.

This answers the first part of Arjuna’s question.

भगवान ने कहा:

हे पार्थ, जब कोई इंसान मन की सभी इच्छाओं को पूरी तरह से त्याग देता है, और सिर्फ़ आत्मा से ही संतुष्ट हो जाता है, तो उसे स्थिर बुद्धि वाला कहा जाता है ।

यह अर्जुन के सवाल के पहले हिस्से का जवाब है ।

भगवान कहलनि:

हे पार्थ, जखन कोनो लोक मन केर सबटा इच्छा सब केँ पूर्णतया त्यागि दैत अछि, आर मात्र आत्मा टा सँ सन्तुष्ट भ’ जाइत अछि, त ओकरा स्थिर बुद्धिवला कहल जाइत छैक । 

ई अर्जुन केर सवालक पहिल भागक जवाब थिक ।

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ॥
वीतरागभयक्रोधः स्थिधीर्मुनिरुच्यते ॥२-५६॥

He whose mind is not shaken by adversity, who does not hanker after happiness, who has become free from affection, fear and wrath, is indeed the Muni of steady wisdom.

This and the following two (more Slokas of Chapter II) answer the second part of Arjuna’s question, as to the conduct of one of perfect realization.

Muni: Man of meditation.

जिसका मन मुश्किलों से नहीं डगमगाता, जो खुशी के पीछे नहीं भागता, जो प्यार, डर और गुस्से से आज़ाद हो गया है, वही पक्का ज्ञान वाला (स्थिरबुद्धि) मुनि है ।

यह और अगले दो (अध्याय २ के और श्लोक) अर्जुन के सवाल के दूसरे हिस्से का जवाब देते हैं, कि पूरी तरह से आत्मज्ञानी व्यक्ति का व्यवहार कैसा होना चाहिए ।

मुनि: ध्यान करने वाला आदमी । 

जेकर मन कठिन घड़ी मे नहि डोलैत (डगमगाइत) अछि, जे खुशीक पाछाँ नहि भागैत अछि, जे प्रेम, भय आ क्रोध सँ मुक्त भ’ गेल अचि, ओ पक्का ज्ञान वला (स्थिरबुद्धि) मुनि थिक । 

ई आर ऐगला दुइ (अध्याय २ केर आर श्लोक) अर्जुन केर सवालक दोसर हिस्साक जवाब दैत अछि, जे पूर्णरूप सँ आत्मज्ञानी व्यक्तिक व्यवहार केहेन हेबाक चाही ।

मुनि: ध्यान करयवला मनुष्य ।

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ॥
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२-५७॥

He who is everywhere unattached, not pleased at receiving good, nor vexed at evil, his wisdom is fixed.

Not pleased, etc.: consequently he does not praise or blame. This is an answer to the query: “How does he speak?”

जो हर जगह अनासक्त रहता है, अच्छाई पाकर खुश नहीं होता, न ही बुराई से परेशान होता है, उसकी बुद्धि स्थिर रहती है ।

खुश नहीं होता, वगैरह: इसलिए वह तारीफ़ या बुराई नहीं करता । यह इस सवाल का जवाब है: “वह कैसे बोलता है?”

जे हर जगह अनासक्त रहैत अछि, नीक पाबिकय खुश नहि होइछ, नहिये खराब सँ परेशान होइछ, ओकर बुद्धि स्थिर रहैत छैक । 

खुश नहि होइछ, आदि: तेँ ओ प्रशंसा या निन्दा नहि करैछ । ई एहि सवाल केर जवाब थिकः “ओ केना बजैत अछि?” । 

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२-५८॥

When also, like the tortoise drawing its limbs, he can completely withdraw the senses from their objects, then his wisdom becomes steady.

Withdraw the senses: bring the mind back upon the Self from all sense-objects. This is known as Pratyahara in Yoga.

To explain the Sloka more fully: a man of the highest realization can, at any moment, shake himself clear of all impressions of the sense-world and go into samadhi, with the ease and naturalness of a tortoise drawing its limbs within itself.

जब कछुए की तरह, वह अपने अंगों को खींचकर, इंद्रियों को उनकी चीज़ों से पूरी तरह हटा सकता है, तो उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है ।

इंद्रियों को वापस खींचो: मन को सभी इंद्रियों की चीज़ों से वापस खुद पर लाओ । इसे योग में प्रत्याहार कहते हैं ।

श्लोक को और अच्छे से समझाने के लिए: सबसे ऊंचा आत्मज्ञान वाला इंसान, किसी भी पल, कछुए जैसे अत्यन्त ही आसानी प्राकृतिक रूप जैसे समाधि में जा सकता है, इंद्रियों की दुनिया के सभी असर से खुद को दूर कर सकता है ।

जखन कछुआ जेकाँ, ओ अपन सबटा अंग केँ खिचिकय, इंद्रिय सब केँ ओकर चीज सब सँ पूर्ण रूप सँ हंटा सकैत अछि, त ओकर बुद्धि स्थिर भ’ जाइत छैक । 

इंद्रिय केँ वापस खिंचब: मन केँ सब इंद्रिय केर चीज सब सँ वापस अपना आप मे आनब । एकरा योग मे प्रत्याहार कहैत छैक ।

श्लोक केँ आर नीक सँ बुझबाक लेलः सबसँ ऊंच आत्मज्ञान वला लोक, कोनो पल मे, कछुआ जेकाँ अत्यन्तहि सहजता आ प्राकृतिक रूप सँ समाधि मे जा सकैत अछि, इंद्रिय सब केँ दुनियाक सबटा प्रभाव सँ अपना केँ दूर कय सकैत अछि । 

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ॥
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥२-५९॥

Objects fall away from the abstinent man, leaving the longing behind. But his longing also ceases, who sees the supreme.

Abstinent man: An unillumined person abstaining from sense-pleasure for penance, or because of physical incapacity.

संयमी मनुष्य से वस्तुएँ दूर हो जाती हैं और लालसा पीछे छूट जाती है । लेकिन जो परम (परमात्मा) को देख लेता है, उसकी लालसाएं भी समाप्त हो जाती है ।

संयमी व्यक्ति: एक (ज्ञान के प्रकाश से वंचित) अप्रकाशित व्यक्ति जो तपस्या के लिए (संयमित होने से) या फिर शारीरिक अक्षमता के कारण इंद्रिय-सुख से दूर रहता है ।

संयमी मनुष्य सँ वस्तु सब दूर भ’ जाइत अछि आर लालसा सब सेहो पाछाँ छुटि जाइत अछि । मुदा जे परम (परमात्मा) केँ देखि लैत अछि, ओकरो लालसा सब समाप्त भ’ जाइत छैक । 

संयमी व्यक्ति: एक (ज्ञान केर प्रकाश से वंचित) अप्रकाशित व्यक्ति जे तपस्याक वास्ते (संयमित भेला सँ) या फेर शारीरिक अक्षमताक कारण इंद्रिय-सुख सँ दूर रहैत अछि ।

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ॥
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥२-६०॥

The turbulent senses, O son of Kunti, do violently snatch away the mind of even a wise man, striving after perfection.

हे कुंती पुत्र, अशांत इंद्रियां पूर्णता की खोज में लगे बुद्धिमान व्यक्ति के मन को भी बुरी तरह से छीन लेती हैं ।

हे कुंतीपुत्र, अशांत इंद्रिय सेहो पूर्णताक खोज मे लागल बुद्धिमान लोकक मन केँ एकदम बेतरतीब ढंग सँ हरण कय लैत अछि । 

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ॥
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिताः ॥२-६१॥

The steadfast, having controlled them all (turbulent senses), sits focused on Me as the Supreme. His wisdom is steady, whose senses are under control.

जो दृढ़ निश्चयी है, वह उन सभी (अशांत इंद्रियों) को काबू में करके, सर्वोच्च मानकर मुझमें ध्यान लगाकर बैठता है । जिसकी इंद्रियां काबू में हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है ।

जे दृढ़ निश्चयी अछि, ओ ओहि सबटा (अशान्त इंद्रिय सब) केँ नियंत्रण मे कयकेँ, सर्वोच्च मानिकय हमरहि मे ध्यान लगाकय बैसैत अछि । जेकरस इंद्रिय सब वश मे छैक, ओकर बुद्धि स्थिर अछि ।

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ॥
सङ्गात् संजायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥२-६२॥

Thinking of objects, attachment to them is formed in a man. From attachment longing, and from longing anger grows.

वस्तुओं के बारे में सोचने से इंसान में उनके प्रति लगाव पैदा होता है । लगाव से चाहत होती है, और चाहत से गुस्सा बढ़ता है ।

चीज सभक बारे मे सोचला सँ मनुष्य मे ओकरा सब प्रति लगाव उत्पन्न होइत छैक । लगाव सँ चाह उत्पन्न होइत छैक । आ चाह सँ तामश बढ़ैत छैक । 

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ॥
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥२-६३॥

From anger comes delusion, and from delusion loss of memory. From loss of memory comes the ruin of discrimination, and from the ruin of discrimination he perishes.

A beautiful image appears. The tendency of the mind is to repeat it. Then, if the image is allowed to recur, a liking grows. With the growth of liking the wish to come close, to possess, anger throws the mind into confusion, which casts a veil over the lessons of wisdom learnt by past experience. Thus deprived of his moral standard, he is prevented from using his discrimination. Failing in discrimination, he acts irrationally, on the impulse of passion, and paves the way to moral death.

Thus Krishna traces moral degradation to those first breaths of thought that come softly and almost unconsciously to the mind.

गुस्से से वहम होता है, और वहम से याददाश्त चली जाती है । याददाश्त जाने से समझ खत्म हो जाती है, और समझ खत्म होने से वह खत्म हो जाता है ।

एक सुंदर तस्वीर सामने आती है । मन की आदत उसे दोहराने की होती है । फिर, अगर उस तस्वीर को बार-बार आने दिया जाए, तो पसंद आने लगती है । पसंद बढ़ने के साथ-साथ उसके पास आने, हासिल करने की चाहें, क्रोध मन को सन्देह में डाल देता है, जो पिछले अनुभव से सीखी समझदारी की बातों पर पर्दा डाल देता है । इस तरह अपने नैतिक मानक (स्टैन्डर्ड) से दूर होकर, वह अपनी समझ का इस्तेमाल नहीं कर पाता । समझ में चूक (फेल) होने पर, वह बिना सोचे-समझे (अविवेकी जैसा), जोश में आकर काम करता है, और नैतिक मरण का रास्ता बनाता है ।

इस तरह कृष्ण नैतिक गिरावट का पता उन पहली सांसों से लगाते हैं जो मन में धीरे-धीरे और लगभग अनजाने में आती हैं ।

तामश (क्रोध) सँ दुविधा (वहम) होइत अछि, आर दुविधा सँ स्मरणशक्ति हरा जाइत अछि । स्मरण हरा गेला सँ बुझनाय खत्म भ’ जाइछ, आ बुझनाय खत्म भेलापर ओ (स्वयं) खत्म भ’ जाइछ । 

एकटा सुन्दर तस्वीर सोझाँ अबैत अछि । मन केर आदत ओकरा दोहराबय केर होइत छैक । फेर, अगर ओहि तस्वीर केँ बेर-बेर आबय देल जा, त पसनिन पड़ल लगैछ । पसिन बढ़ला सँ ओकर लग एबाक, ओकरा हासिल करबाक इच्छा, (हासिल नहि भेलापर) तामश चढ़ब, तामश मन केँ सन्देह मे पाड़ि दैत अछि, जे पहिनेक अनुभव सँ सिखल समझदारीक बात सब पर पर्दा डालि दैत अछि । एहि तरहें अपन नैतिक मानक (स्टैन्डर्ड) सँ दूर भ’ कय, ओ अपन समझ केर उपयोग नहि कय पबैछ । समझ मे चूक (फेल) भेला पर, ओ बिना सोचने-बुझने (अविवेकी जेकाँ), जोश मे आबिकय काज करैत अछि, आर नैतिक मरण केर रास्ता बनबैत अछि ।

एहि तरहें कृष्ण नैतिक गिरावट केर पता ओहि पहिल साँस सँ लगबैत छथि जे मन मे धीरे-धीरे लगभग अन्जानहि मे अबैत अछि ।

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयान्द्रियैश्चरन् ॥
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥२-६४॥

But the self-controlled man, moving among objects with senses under restraint, and free from attraction and aversion, attains to tranquility.

The above is in answer to Arjuna’s fourth question, “How does he move?”

परंतु आत्म-नियंत्रित मनुष्य, इंद्रियों को संयमित करके और आकर्षण (राग) तथा द्वेष से मुक्त होकर वस्तुओं के बीच घूमता हुआ शांति प्राप्त करता है ।

उपरोक्त कथन अर्जुन के चौथे प्रश्न, “वह कैसे चलता है?” के उत्तर में है ।

मुदा आत्म-नियंत्रित मनुष्य, इंद्रिय सब केँ संयमित कयकेँ आर आकर्षण (राग) तथा द्वेष सँ मुक्त भ’ केँ वस्तु सभक बीच घुमितो शान्ति प्राप्त करैत अछि । 

उपरोक्त कथन अर्जुन केर चारिम प्रश्न, “ओ केना चलैत अछि?” केर उत्तर मे कहल गेल अछि ।

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ॥
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥२-६५॥

In tranquility, all sorrow is destroyed. For the intellect of him, who is tranquil-minded, is soon established in firmness.

That is, firmly concentrate itself on the Self.

शांति में, सभी दुःख नष्ट हो जाते हैं । क्योंकि जो शान्तचित्त है उसकी बुद्धि शीघ्र ही दृढ़ हो जाती है ।

अर्थात स्वयं को दृढ़तापूर्वक स्वयं पर केन्द्रित करें ।

शान्ति मे, सबटा दुःख नष्ट भ’ जाइत छैक । कियैक तँ जे शान्तचित्त अछि ओकर बुद्धि जल्दिये दृढ़ भ’ जाइत छैक । 

यानि स्वयं केँ दृढ़तापूर्वक स्वयं पर केन्द्रित करू ।

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ॥
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥२-६६॥

No knowledge (of the Self) has the unsteady. Nor has he meditation. To the unmeditative there is no peace. And how can one without peace have happiness?

अस्थिर व्यक्ति को (स्वयं का – आत्मा का) ज्ञान नहीं होता । न ही उसे ध्यान होता है । ध्यान न करने वाले को शांति नहीं मिलती । और शांति के बिना व्यक्ति को खुशी कैसे मिल सकती है ?

अस्थिर व्यक्ति केँ (स्वयं केर – आत्मा केर) ज्ञान नहि होइत छैक । आ न ओकरा मे ध्यान होइत छैक । ध्यान नहि करनिहार केँ शान्ति नहि भेटैत छैक । आर शान्तिक बिना लोक केँ खुशी केना भेटि सकैत छैक ? 

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ॥
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥२-६७॥

For, the mind, which follows in the wake of the wandering senses, carries away his discrimination, as a wind (carries away from its course) a boat on the waters.

क्योंकि, मन, जो भटकती हुई इंद्रियों के पीछे चलता है, उसकी समझ को वैसे ही दूर ले जाता है, जैसे हवा पानी पर नाव को उसके रास्ते से दूर ले जाती है ।

कियैक तँ, मन, जे भटकैत रहल इंद्रिय सभक पाछाँ चलैत अछि, ओकर समझ केँ ओनाही दूर लय जाइत छैक, जेना हवा पानि पर नाव केँ ओकर रास्ता (निर्धारित मार्ग) सँ दूर लय जाइत छैक । 

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ॥
इन्द्रियाणीन्दियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२-६८॥

Therefore, O mighty-armed, his knowledge is steady, whose senses are completely restrained from their objects.

This does not mean that the senses remain completely estranged, but that they are all estrangeable at will.

इसलिए, हे महाबाहो, उसका ज्ञान स्थिर है, जिसकी इंद्रियाँ अपने विषयों से पूरी तरह से नियंत्रित हैं ।

इसका मतलब यह नहीं है कि इंद्रियाँ पूरी तरह से अलग-थलग रहती हैं, बल्कि यह कि वे सभी अपनी स्वेच्छा करने से अलग-थलग रहती हैं ।

तेँ, हे महाबाहो, ओकर ज्ञान स्थिर छैक, जेकर इंद्रिय सब अपन विषय सब सँ पूरा तरीका सँ नियंत्रित छैक ।

एकर मतलब ई नहि अछि जे इंद्रिय सब पूरे तरीका सँ अलग-थलग रहैत छैक, बल्कि ई छैक जे ओ सब अपन स्वेच्छा कयला सँ अलग-थलग रहैत छैक ।

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ॥
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥२-६९॥

That which is night to all beings, in that the self-controlled man wakes. That in which all beings wake, is night to the Self-seeing Muni.

Where all beings are in darkness, there the Muni sees, and vice versa. The consciousness of the man of realisation is so full of God that he cannot see anything apart from Him. The ignorant man, on the other hand, lives in the world of plurality alone and God is a non-entity to him.

It follows, that non-susceptibility to the influences of Nature, that is, perfect self-control (spoken of in the preceding Sloka 68) is quite as natural a trait of the illumined soul as its opposite is of the ignorant.

जो सभी प्राणियों के लिए रात है, उसमें आत्म-नियंत्रित इंसान जागता है । जिसमें सभी प्राणी जागते हैं, वह आत्म-द्रष्टा मुनि के लिए रात है ।

जहां सभी प्राणी अंधेरे में होते हैं, वहां मुनि देखता है, और इसका उल्टा भी होता है । ज्ञानी व्यक्ति की चेतना ईश्वर से इतनी भरी होती है कि वह उसके अलावा कुछ भी नहीं देख सकता । दूसरी ओर, अज्ञानी व्यक्ति सिर्फ़ बहुतों की दुनिया में रहता है और ईश्वर उसके लिए कुछ नहीं होता ।

इसका मतलब है, कि प्रकृति के असर से दूर रहना, यानी पूर्ण आत्म-नियंत्रण (जिसके बारे में पिछले श्लोक ६८ में बताया गया है) ज्ञानी आत्मा का उतना ही प्राकृतिक गुण है जितना कि इसका उल्टा अज्ञानी का ।

जे सब प्राणीक लेल राति अछि, ताहि मे आत्म-नियंत्रित लोक जागैत अछि । जाहि मे सब प्राणी जागैत अछि, ओ आत्म-द्रष्टा मुनिक लेल राति अछि ।

जेतय सब प्राणी अन्हार मे रहैत अछि, ओतय मुनि देखैत छथि, आर एकर उलटा सेहो होइत छैक । ज्ञानी लोकक चेतना ईश्वर सँ एतबे भरल रहैत छैक जे ओ हुनका अलावा किछु नहि देखि सकैछ । दोसर दिश, अज्ञानी लोक मात्र बहुजनक दुनिया मे रहैत अछि आर ईश्वर ओकरा लेल किछु होइत छथि । 

एकर मतलब अछि, जे प्रकृति केर प्रभाव सँ दूर रहनाय, यानि पूर्ण आत्म-नियंत्रण (जेकरा बारे मे श्लोक ६८ मे कहल गेल अछि) ज्ञानी आत्मा केर ओतबेक प्राकृतिक गुण छैक जतेक कि एकर उलटा अज्ञानी केर । 

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ॥
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥२-७०॥

As into the ocean – brimful, and still – flow the waters, even so the Muni into whom enter all desires, he, and not the desirer of desires, attains to peace.

The ocean is not at all affected by the waters flowing into it from all sides. Similarly, that man alone finds true peace in whom no reaction of desire is produced by the objects of enjoyment, which he happens to come across during his sojourn on earth.

जैसे समुद्र में – जो लबालब भरा और शांत है – पानी बहता है, वैसे ही जिस मुनि में सारी इच्छाएँ आ जाती हैं, उसे शांति मिलती है, न कि इच्छाओं को चाहने वालों को ।

समुद्र पर चारों तरफ से बहते पानी का कोई असर नहीं होता । इसी तरह, सिर्फ़ वही इंसान सच्ची शांति पाता है जिसमें धरती पर रहने के दौरान मिलने वाली भोग-विलास की चीज़ों से कोई इच्छा पैदा नहीं होती ।

जेना समुद्र मे – जे लबालब भरल अछि आ शान्त अछि – पानि बहैत छैक, तहिना जाहि मुनि मे सबटा इच्छा सब समा जाइत अछि, हुनका शान्ति भेटैत अछि, नहि कि इच्छा सब केँ चाहनिहार केँ । 

समुद्र पर चारू दिश सँ बहैत पानिक कोनो प्रभाव नहि पड़ैत छैक । तहिना, मात्र वैह लोक सचमुच मे शान्ति पबैत अछि जेकरा मे धरती पर रहबाक दरम्यान भेटयवला भोग-विलास केर चीज-वस्तु सँ कोनो इच्छा उत्पन्न नहि होइत छैक । 

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निस्पृहः ॥
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥२-७१॥

That man who lives devoid of longing, abandoning all desires, without the sense of “I” and “mine”, he attains to peace.

The man who lives – merely to work out his pas karma.

जो आदमी बिना किसी चाहत के, सभी इच्छाओं को छोड़कर, “मैं” और “मेरा” की भावना के बिना जीता है, उसे शांति मिलती है ।

जो आदमी जीता है – सिर्फ़ अपने कर्मों को पूरा करने के लिए ।

जे आदमी बिना कोनो चाहत केर, सबटा इच्छा सब केँ छोड़िकय, “हम” आ “हमर” केर भावनाक बिना जिबैत अछि, ओकरा शान्ति भेटैत छैक ।

जे आदमी जिबैत अछि – मात्र अपन कर्म सब केँ पूरा करबाक लेल ।

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ॥
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥२-७२॥

This is to have one’s being in Brahman, O son of Pritha. None, attaining to this, becomes deluded. Being established therein, even at the end of life, a man attains to oneness with Brahman.

हे पृथापुत्र, यही ब्रह्म में रहने की किसी की स्थिति है । इसे पाकर कोई भी भ्रमित नहीं होता । इसमें स्थित होकर, जीवन के अंत में भी, मनुष्य ब्रह्म के साथ एक हो जाता है ।

हे पृथापुत्र, यैह ब्रह्म मे रहबाक केकरहु स्थिति थिक । ई पाबिकय कियो भ्रमित नहि होइत अछि । एहि मे स्थित भ’ कय, जीवनक अन्त मे पर्यन्त, मनुष्य ब्रह्म केर संग एक भ’ जाइत अछि ।

इति सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥

The end of the second chapter, designated, The Way of Knowledge.

My Note: After completing Chapter I and II of Gita, we’ve now entered into Chapter III. We have seen, how Shri Krishna addressed Arjuna on his decision to not fight with own people – teachers, brothers, relatives etc. for mere right to get his kingdom back. Shri Krishna explained about the soul and steadfast knowledge in length. And now Arjuna’s questions in first two slokas are like this:

मेरा नोट: गीता का चैप्टर १ और २ पूरा करने के बाद, अब हम चैप्टर ३ में आ गए हैं । हमने देखा है कि कैसे श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपने राज्य को वापस पाने के अधिकार के लिए अपने ही लोगों – गुरु, भाई, रिश्तेदार वगैरह से न लड़ने के उसके फैसले पर बात की । श्री कृष्ण ने आत्मा और दृढ़ आत्मज्ञान के बारे में विस्तार से समझाया । और अब पहले दो श्लोकों में अर्जुन के सवाल इस तरह हैं: आगे अध्याय ३ में देखेंगे । हरिः हरः!!

हमर नोट: गीताक चैप्टर १ आ २ पूरा कयलाक बाद, आब हम सब चैप्टर ३ मे आबि गेल छी । हम सब देखलहुँ जे केना श्री कृष्ण अर्जुन केँ अपन राज्य वापस पेबाक अधिकार वास्ते अपनहि लोक सब केँ – गुरु, भाइ, सम्बन्धी आदि सँ नहि लड़बाक हुनकर निर्णय पर बात कयलनि अछि । श्री कृष्ण आत्मा आर दृढ़ आत्मज्ञान केर बारे मे विस्तार सँ बुझौलनि अछि । आर आब पहिले दुइ श्लोक मे अर्जुनक सवाल एहि तरहक अछि: आगू अध्याय ३ मे देखब । हरिः हरः!!

Related Articles