ॐ श्री परमात्मने नमः !!
॥एकादशोऽध्यायः॥
अर्जुन उवाच ।
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ॥
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥११-१॥
Arjuna said:
By the supremely profound words, on the discrimination of Self, that have been spoken by Thee out of compassion towards me, this my delusion is gone.
अर्जुन ने कहा:
आपने मुझ पर दया करके, आत्म-ज्ञान के बारे में जो अत्यन्त गूढ़ शब्द कहे हैं, उनसे मेरा यह भ्रम दूर हो गया है ।
अर्जुन कहलनि:
हे भगवन ! अपने हमरा उपर दया कयकेँ आत्मज्ञान केर बारे जे अत्यन्त गूढ़ (गहींर) शब्द कहलहुँ अछि, ताहि सँ हमर भ्रम दूर भ’ गेल अछि ।
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ॥
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥११-२॥
Of Thee, O lotus-eyed, I have heard at length, of the origin and dissolution of beings, as also Thy inexhaustible greatness.
हे कमलनेत्र, मैंने आपके बारे में, प्राणियों (सृष्टि) की उत्पत्ति और विनाश के बारे में, और आपकी अक्षय महानता के बारे में भी विस्तार से सुना है ।
हे कमलनेत्र, हम अपनेक बारे मे, प्राणी (सृष्टि) केर उत्पत्ति आ विनाश केर बारे मे, आर अपनेक अक्षय महानता केर बारे मे सेहो विस्तार सँ सुनलहुँ अछि ।
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ॥
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥११-३॥
So it is, O Supreme Lord! as Thou hast declared Thyself. (Still) I desire to see Thy Isvara-Form, O Supreme Purusha.
The Isvara-Form: as possessed of omnipotence, omnipresence, infinite wisdom, strength, virtue, and splendour.
हे परम प्रभु! जैसा आपने खुद कहा है, वह वैसा ही है । (फिर भी) हे परम पुरुष, मैं आपके ईश्वर-रूप को देखना चाहता हूँ ।
ईश्वर-रूप: जिसमें सबसे अधिक ताकत, सबसे अधिक मौजूदगी, अनन्त ज्ञान, शक्ति, गुण और शान है ।
हे परम प्रभु! जेना अपने स्वयं कहलहुँ अछि, से सब किछु तहिना अछि । (तथापि) हे परमपुरुष, हम अपनेक ईश्वर-रूप केँ देखय चाहैत छी ।
ईश्वर-रूप: जाहि मे सबसँ अधिक ऊर्जा (ताकत), सबसँ अधिक उपस्थिति, अनन्त ज्ञान, शक्ति, गुण एवं शान अछि ।
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ॥
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥११-४॥
If, O Lord, Thou thinkest me capable of seeing it, then, O Lord of Yogis, show me Thy immutable Self.
My Note: We often hear the greatness, it’s natural, we would also like to see the Great Scene too. That’s Arjuna’s curiosity I think. Let’s wait and see how Virata Swaroop will be shown by Sri Krishna.
हे प्रभु, अगर आप मुझे यह देखने के काबिल समझते हैं, तो हे योगियों के स्वामी, मुझे अपना अटल रूप दिखाइए ।
मेरा नोट: हम अक्सर महानताओं के सम्बन्ध में सुनते हैं, यह स्वाभाविक है, हम भी उस महान दृश्य को देखना चाहेंगे । मुझे लगता है कि अर्जुन की यही जिज्ञासा है । आइए इंतज़ार करें और देखें कि श्री कृष्ण विराट स्वरूप को कैसे दिखाते हैं ।
हे प्रभु, अगर अपने हमरा से देखबाक योग्य बुझैत छी, तँ हे योगी सभक स्वामी (योगेश्वर), हमरा अपन अटल रूप देखायल जाउ ।
हमर नोट: हम सबअक्सर महानता सभक सम्बन्ध मे सुनैत छी, ई स्वाभाविक अछि, हम सब महान दृश्य देखहो चाहब । हमरा लगैत अछि जे अर्जुन केर यैह जिज्ञासा छन्हि । आउ प्रतीक्षा करी आ देखी जे श्री कृष्ण विराट स्वरूप केँ केना देखबैत छथि । (अर्थात् जे प्रश्न अर्जुनक मन-मस्तिष्क मे भगवानक दिव्य स्वरूप सभक सम्बन्ध जे पैछला अध्याय मे वर्णन कयल गेल अछि से सुनलाक बाद ओहेन विश्वरूप केर दर्शनक अभिलाषा जागब ओहिना अछि जेना हमहूँ-अहाँ सब भगवानक दर्शन लेल इच्छुक रहैत छी, हुनकर महान गुण आ रूप केर चर्चा सब सुनि-सुनिकय हुनका देखबाक उत्कंठा सेहो रहल करैत अछि । एहि अध्यायक आगामी श्लोक मे भगवान अपन विश्वरूप – विराट ब्रह्माण्डीय स्वरूप प्रस्तुत करथिन । त हम सब ध्यानपूर्वक एक-एक बात पर गौर करैत रहब । ध्यान भंग नहि हेबाक चाही । बस, प्रतीक्षा करैत रहब – बात सब बुझैत चलब ।
श्री भगवानुवाच ।
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ॥
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥११-५॥
The Blessed Lord said:
Behold, O son of Pritha, by hundreds and thousands, My different forms celestial, of various colours and shapes.
भगवान ने कहा:
हे पृथा के पुत्र, सैकड़ों और हजारों की संख्या में, मेरे अलग-अलग दिव्य रूप, अलग-अलग रंग और आकार को देखो ।
भगवान कहलनि:
हे पृथापुत्र, सैकड़ों आर हजारों केर संख्या मे, हमर अलग-अलग दिव्य रूप, अलग-अलग रंग आर आकार केँ देखू ।
पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ॥
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥११-६॥
Behold the Adityas, the Vasus, the Rudras, the twin Asvins, and the Maruts; behold, O descendant of Bharata, many wonders never seen before.
आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, दोनों अश्विनों और मरुतों को देखो; हे भरत के वंशज, पहले कभी न देखे गए कई अजूबे को देखो ।
आदित्य लोकनि, वसु लोकनि, रुद्र लोकनि, जोड़ा (दुनू) अश्विन लोकनि आर मरुत लोकनि केँ देखू; हे भरत केर वंशज, पहिने कहियो नहि देखल गेल कतेको आश्चर्यजनक चीज (अस्तित्व) सब केँ देखू ।
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ॥
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥११-७॥
See now, O Gudakesa, in this My body, the whole universe centred in one – including the moving and the unmoving – and all else that thou desirest to see.
Centred in one: as part of My body.
All else: e.g., your success or defeat in the war about which you entertain a doubt. (2-6).
अब देखो, हे गुडाकेश, मेरे इस शरीर में, पूरा ब्रह्मांड एक में केन्द्रित (अवस्थित) है – जिसमें चल (चलते-फिरते) और अचल (स्थिर अवस्था में) सब कुछ शामिल है – और बाकी सभी कुछ जो तुम देखना चाहते हो ।
एक में केन्द्रित (अवस्थित): मेरे शरीर के हिस्से के तौर पर ।
बाकी सब कुछ: जैसे, उस युद्ध में तुम्हारी सफलता या हार जिसके बारे में तुम्हें सन्देह है । (२-६) ।
आब देखू, हे गुडाकेश, हमर एहि शरीर मे, पूरा ब्रह्माण्ड एक्कहि मे केन्द्रित (अबस्थित) अछि – जाहि मे चल (चलैत-फिरैत) आर अचल (स्थिर अवस्था मे) रहल सम्पूर्ण चीज शामिल अछि – आर बाकी सब किछु जे अहाँ देखय चाहैत छी ।
एक्कहि मे केन्द्रित (अबस्थित): हमर शरीरक हिस्साक रूप मे ।
बाकी सब किछु: जेना, ओहि युद्ध मे अहाँ केँ सफलता अथवा हारि जाहि केर सम्बन्ध मे अहाँक मन मे सन्देह अछि । (२-६) । (सेहो सब किछु एहि विराट रूप मे देख लियह – से भाव छन्हि ई कहयकाल – अहाँ जे देखय चाहैत छी सब किछु देखू ।)
न तु मां शक्यसे द्रुष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ॥
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥११-८॥
But thou canst not see Me with these eyes of thine; I give thee supersensuous sight; behold My supreme Yoga power.
Me: in My Universal Form.
Supersensuous sight: The sight beyond these sensual eyes.
लेकिन तुम मुझे अपनी इन आँखों से नहीं देख सकते; मैं तुम्हें इंद्रियातीत दृष्टि (दिव्य दृष्टि) देता हूँ; मेरी सर्वोच्च योग शक्ति को देखो ।
मैं: मेरे ब्रह्माण्डीय रूप में ।
इंद्रियातीत दृष्टिः हमारी इंद्रिय दृष्टि से ऊपर तक देखने योग्य दृष्टि ।
मुदा अहाँ हमरा अपन एहि आँखि सँ नहि देखि सकैत छी; हम अहाँ केँ इन्द्रियातीत दृष्टि (दिव्य दृष्टि) दैत छी; हमर सर्वोच्च योग शक्ति केँ देखू ।
हमरा: हमर ब्रह्माण्डीय रूप मे ।
इंद्रियातीत दृष्टिः हमरा सभक इंद्रिय प्रदत्त आँखिक दृष्टि सँ उपर धरि देखयवला दृष्टि ।
सञ्जय उवाच ।
एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः ॥
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥११-९॥
Sanjaya said:
Having thus spoken, O King, Hari, the Great Lord of Yoga, showed unto the son of Prtha, His Supreme Isvara Form:
संजय ने कहा:
हे राजन, ऐसा कहकर योग के महान भगवान (योगेश्वर) हरि ने पृथा के पुत्र को अपना सर्वोच्च ईश्वर रूप दिखाया:
संजय कहलनि:
हे राजन, एना कहिकय योग केर महान भगवान (योगेश्वर) हरि पृथाक पुत्र (अर्जुन) केँ अपन सर्वोच्च ईश्वर रूप देखौलनि:
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ॥
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥११-१०॥
With numerous mouths and eyes, with numerous wondrous sights, with numerous celestial ornaments, with numerous celestial weapons uplifted;
अनेक मुख और नेत्रों से युक्त, अनेक अद्भुत दृश्यों से युक्त, अनेक दिव्य आभूषणों से युक्त, अनेक दिव्य आयुधों को उठाए हुए;
अनेकों मुख आ नेत्र सँ युक्त, अनेकों अद्भुत दृश्य सँ युक्त, अनेकों दिव्य आभूषण सँ युक्त, अनेकों दिव्य आयुध केँ उठौने;
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ॥
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥११-११॥
Wearing celestial garlands and apparel, anointed with celestial-scented unguents, the All-wonderful Resplendent, Boundless, and All-formed.
दिव्य माला और वस्त्र पहने हुए, दिव्य-सुगंधित उबटन से अभिषेक किए हुए, सर्व-अद्भुत तेजस्वी, असीम और सर्व-रूप वाले ।
दिव्य माला आ वस्त्र सब पहिरने, दिव्य-सुगंधित उबटन सँ अभिषेक कएने, सर्व-अद्भुत तेजस्वी (सर्वथा आश्चर्यजनक तेजस्विता-ओज सँ भरल), असीम (अनन्त) तथा सर्व-रूप (समस्त रूप) वला छथि ।
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ॥
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥११-१२॥
If the splendour of a thousand suns were to rise up simultaneously in the sky, that would like the splendour of that Mighty Being.
Mighty Being: The Universal Form.
The splendour of the Universal Form excels all others; it is indeed beyond compare.
अगर आसमान में एक साथ हजार सूर्य उगने से जो सौर्य (उजाला) चमकेगा, वही उन सर्वशक्तिमान भगवान् (विराट् रूप श्री कृष्ण) के चमक (शक्ति) जैसा होगा ।
सर्वशक्तिमान भगवान: विराट रूप ।
विराट रूप की शान-सौकत (शक्ति) सबसे बढ़कर है; यह सच में तुलना से परे है ।
यदि आसमान मे एक्कहि संग हजार टा सूर्य उगय, ताहि सँ जे सौर्य देखायत (प्रकाश आ ताप चमकत-पसरत), वैह ओहि सर्वशक्तिमान भगवान् (विराट् रूप श्री कृष्ण) केर चमक (शक्ति) जेकाँ होयत ।
सर्वशक्तिमान भगवान: विराट रूप ।
विराट रूप केर शान-सौकत (शक्ति) सबसँ बढ़िकय अछि; ई सच मे तुलना सँ परे (दूर) अछि । (यानि अतुलनीय अछि ।)
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ॥
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥११-१३॥
There in the body of the God of gods, the son of Pandu then saw the whole universe resting in one, with its manifold divisions.
वहाँ देवों के देव के शरीर में, पांडु के पुत्र ने पूरे ब्रह्मांड को उसके कई हिस्सों के साथ उन्हीं एक में अवस्थित (केन्द्रित) देखा ।
ओतय देवहु केर देवक शरीर मे, पांडुक पुत्र (अर्जुन) पूरे ब्रह्मांड केँ ओकर कतेको हिस्सा (भाग) आदिक संग ओहि एक (विराट रूप भगवान) मे अबस्थित (केन्द्रित) देखलनि ।
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ॥
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥११-१४॥
The Dhananjaya, filled with wonder, with hairs standing on end, bending down his head to the Deva in adoration, spoke with joined palms.
Deva: God, in His Universal Form.
धनंजय विस्मय (हैरानी) से भर गए, उनके रोंगटे खड़े हो गए, उन्होंने देवता की पूजा में अपना सिर झुकाया और हाथ जोड़कर बोले ।
देवता: भगवान, अपने ब्रह्मांडीय रूप में ।
धनंजय विस्मय (आश्चर्य) सँ भरि गेलाह, हुनकर देहक रोइयाँ ठाढ़ भ’ गेलनि, ओ देवताक पूजा लेल अपन सिर झुकौलनि आ हाथ जोड़िकय बजलाह ।
देवता: भगवान, अपन ब्रह्माण्डीय रूप मे ।
अर्जुन उवाच ।
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ॥
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरागश्च दिव्यान् ॥११-१५॥
Arjuna said:
I see all the Devas, O Deva, in Thy body, and hosts of all grades of beings; Brahma, the Lord, seated on the lotus, and all the Risis and celestial serpents.
अर्जुन ने कहा:
हे देव, मैं आपके शरीर में सभी देवताओं और सभी प्रकार के प्राणियों को देखता हूं; ब्रह्मा, भगवान, कमल पर बैठे, और सभी ऋषि और दिव्य नागें सहित ।
अर्जुन कहलनि:
हे देव, हम अपनेक शरीर मे समस्त देवता लोकनि आ सब तरहक प्राणी सब केँ देखैत छी; ब्रह्माजी, भगवान, कमल पर बैसल छथि, आर सब ऋषि एवं दिव्य नाग सब सेहो अछि ।
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ॥
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥११-१६॥
I see Thee of boundless form on every side with manifold arms, stomachs, mouths, and eyes; neither the end nor the middle, nor also the beginning of Thee do I see, O Lord of the universe, O Universal Form.
मैं आपको हर तरफ़ असीम रूप में देखता हूं, आपके कई हाथ, पेट, मुंह और आँखें हैं; हे ब्रह्मांड के स्वामी, हे ब्रह्माण्डीय (सार्वभौमिक) रूप, मैं आपका न तो अंत देखता हूं, न मध्य, और न ही आरम्भ देखता हूं ।
हम अपने केँ हर तरफ असीमिति (सीमाहीन) रूप मे देखैत छी, अपनेक कतेको रास हाथ, पेट, मुंह आर आँखि सब अछि; हे ब्रह्माण्ड केर स्वामी, हे ब्रह्माण्डीय (सार्वभौमिक) रूप, हम अपनेक नहि त अन्त देखैत छी, न मध्य, आ नहिये आरम्भ देखैत छी ।
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ॥
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥११-१७॥
I see Thee with diadem, club, and discus; a mass of radiance shining everywhere, very hard to look at, all around blazing like burning fire and sun, and immeasurable.
मैं आपको मुकुट, गदा और चक्र के साथ देखता हूँ; हर जगह चमकती हुई किरणोंवाली चमक का एक पुंज (भंडार), जिसे देखना बहुत मुश्किल है, चारों ओर जलती हुई आग जो सूरज की तरह धधक रहा है, और जिसे मापा नहीं जा सकता है ।
हम अपने केँ मुकुट, गदा आर चक्र केर संग देखैत छी; हरेक जगह चमकैत किरणवला चमक केर भंडार, जेकरा देखनाय अत्यन्त कठिन अछि, चारू दिश जरैत आगि जे सूरज जेकाँ धधैक रहल अछि, आर जेकरा नापल नहि जा सकैत अछि ।
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ॥
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥११-१८॥
Thous art the Imperishable, the Supreme Being, the one thing to be known. Thou art the great Refuge of this universe; Thou art the undying Guardian of the Eternal Dharma, Thou art the Ancient Purusha, I ween.
आप अविनाशी हैं, सर्वोच्च हैं, जानने लायक एकमात्र चीज हैं । आप इस ब्रह्मांड की महान आश्रय (शरण देनेवाले) हैं; आप शाश्वत (सनातन) धर्म के अमर रक्षक (अभिभावक) हैं, आप प्राचीन पुरुष हैं, मैं ऐसा मानता (समझता) हूं ।
अपने अविनाशी छी, सर्वोच्च छी, जनबाक लायक एकमात्र चीज छी । अपने एहि ब्रह्माण्ड केर महान आश्रय (शरण दयवला) छी; अपने शाश्वत (सनातन) धर्म केर अमर रक्षक (अभिभावक) छी, अपने प्राचीन पुरुष (आदिपुरुष) छी, हम एना मानैत (बुझैत) छी ।
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ॥
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥११-१९॥
I see Thee without beginning, middle, or end, infinite in power, of manifold arms; the sun and the moon Thine eyes, the burning fire Thy mouth; heating the whole universe with Thy radiance.
मैं आपको वगैर आरम्भ, मध्य या अंत के, अनंत शक्ति वाले, कई भुजाओं वाले देखता हूं; सूरज और चाँद आपकी आँखें हैं, जलती हुई आग आपका मुंह है; आपकी चमक भरे किरणों से पूरा ब्रह्मांड तप्त हो रहा है ।
हम अपने केँ बिना आरम्भ, मध्य या अन्त केँ, अनन्त शक्तिवाला, कतेको भुजावाला देखैत छी; सूर्य आ चन्द्रमा अपनेक आँखि थिक, जरैत आगि अपनेक मुंह थिक; अपनेक चमक सँ ओतप्रोत किरण सँ पूरा ब्रह्माण्ड तप्त (तपित, गरम) भ’ रहल अछि ।
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ॥
दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥११-२०॥
This space betwixt heaven and earth and all the quarters are filled by Thee alone; having seen this, Thy marvellous and awful Form, the three worlds are trembling with fear, O Great-souled One.
स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का यह स्थान और चारों दिशाएं केवल आप ही से भरे हुए हैं; आपके इस अद्भुत और भयानक रूप को देखकर तीनों लोक भय से कांप रहे हैं, हे महात्मा !
स्वर्ग आर पृथ्वीक बीच केर एहि स्थान तथा चारू दिशा सब केवल अपनहिं टा सँ भरल अछि; अपनेक एहि अद्भुत (आश्चर्यजनक) एवं भयानक रूप केँ देखिकय तीनू लोक भय सँ काँपि रहल अछि, हे महात्मा !
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ॥
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥११-२१॥
Verily, into Thee enter these hosts of Devas; some extol Thee in fear with joined palms; “May it be well!” thus saying, bands of great Risis and Siddhas praise Thee with splending hymns.
सचमुच, ये देवों की टोलियाँ आप में ही आती हैं; कुछ लोग डर के मारे हाथ जोड़कर आपकी स्तुति करते हैं; “सब ठीक हो!” ऐसा कहकर, बड़े-बड़े ऋषियों और सिद्धों की टोलियाँ शानदार भजनों से आपकी स्तुति करती हैं ।
सचमुच, ई देवता लोकनिक टोली अपनहि टा मे अबैत छथि; किछु लोक डरक मारे हाथ जोड़िकय अपनेक स्तुति करैत छथि; “सब ठीक हो!” एना कहिकय, बड़का-बड़का ऋषि लोकनि आ सिद्ध सभक टोली (समूह) शानदार भजन सब सँ अपनेक स्तुति करैत छथि ।
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ॥
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते विस्मिताश्चैव सर्वे ॥११-२२॥
The Rudras, Adityas, Vasus, Sadhyas, Visva-Devas, the two Asvins, Maruts, Usmapas, and hosts of Gandharvas, Yaksas, Asuras, and Siddhas – all these are looking at Thee, all quite astounded.
Usmpas: The Pitrs
रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्व-देव, दोनों अश्विनकुमार, मरुत, उष्माप, और गंधर्व, यक्ष, असुर और सिद्धों के समूह – ये सभी आपको देख रहे हैं, और सभी हैरान हैं ।
उष्मापः पितर ।
रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्व-देव, दुनू अश्विनकुमार, मरुत, उष्माप, आर गंधर्वक समूह, यक्ष, असुर आर सिद्ध लोकनिक समूह – ई सब अपने केँ देखि रहल छथि, आर सब विस्मित (हैरान) छथि ।
उष्मापः पितर ।
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ॥
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥११-२३॥
Having seen Thy immeasurable Form – with many mouths and eyes, O mighty-armed, with many arms, thighs, and feet, with many stomachs, and fearful with many tusks – the worlds are terrified, and so am I.
हे महाबाहु, आपके अनगिनत रूप को देखकर – जिसमें कई मुंह और आंखें हैं, कई हाथ, जांघ और पैर हैं, कई पेट हैं, और कई दांतों से डरावने हैं – सारे संसार डर गए हैं, और मैं भी डर गया हूं ।
हे महाबाहु, अपनेक अनगिनत रूप केँ देखिकय – जाहि मे कतेको मुंह आर आंखि अछि, कतेको हाथ, जांघ आर पैर अछि, कतेको पेट अछि, आर कतेको दाँत सब डराओन अछि – सम्पूर्ण संसार डरा गेल अछि, आर हमहूँ डरा गेल छी ।
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ॥
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥११-२४॥
On seeing Thee touching the sky, shining in many a colour, with mouths wide open, with large fiery eyes, I am terrified at heart, and find no courage nor peace, O Vishnu.
हे विष्णु, आपको आकाश को छूते हुए, अनेक रंगों में चमकते हुए, अत्यन्त विस्तृत खुले मुंह वाले, बड़ी-बड़ी उग्र आंखों वाले देखकर, मैं हृदय से भयभीत हो गया हूं और मुझे न तो साहस मिल रहा है और न ही शांति ।
हे विष्णु, अपने केँ आकाश केँ छुबैत, अनेकों रंग मे चमकैत, अत्यन्त विस्तृत खुजल मुंहवाला, बड़का-बड़का उग्र आंखिवाला देखिकय, हम हृदय सँ भयभीत भ’ गेल छी आर हमरा नहि त साहस भेटि रहल अछि आ न शान्ति ।
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ॥
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥११-२५॥
Having seen Thy mouths, fearful with tusks, (blazing) like Pralaya-fires, I know not the four quarters, nor do I find peace; have mercy, O Lord of the Devas, O Abode of the universe.
Pralaya fires: The fires which consume the worlds at the time of the final dissolution (Pralaya) of the universe.
I know…. quarters: I cannot distinguish the East from the West, nor the North from the South.
आपके डरावने दाँतों वाले, प्रलय की आग की तरह जलते हुए मुँह देखकर, मुझे चारों दिशाओं का पता नहीं है, न ही मुझे शांति मिलती है; हे देवों के स्वामी, हे ब्रह्मांड के धाम, आप दया करें ।
प्रलय अग्नि: वे अग्नि जो ब्रह्मांड के अंतिम प्रलय के समय दुनिया को भस्म कर देती हैं ।
मुझे चारो दिशाओं का पता नहीं है: मैं पूरब को पश्चिम से, न ही उत्तर को दक्षिण से अलग कर सकता हूँ ।
अपनेक डराओन दाँतवला, प्रलय केर आगि जेकाँ जरैत मुंह केँ देखिकय, हमरा चारू दिशा सभक पता नहि चलैत अछि, आ न शान्ति भेटैत अछि; हे देवता लोकनिक स्वामी, हे ब्रह्माण्डक धाम, अपने दया करी ।
प्रलय अग्नि: ओ अग्नि जे ब्रह्माण्ड केर अन्तिम प्रलय केर समय दुनिया केँ भस्म कय दैत अछि ।
हमरा चारू दिशा सभक पता नहि चलैत अछि: हम पूरब केँ पश्चिम सँ, आ न उत्तर केँ दक्षिण सँ अलग कय सकैत छी ।
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ॥
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥११-२६॥
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ॥
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥११-२७॥
All those sons of Dhritrashtra with hosts of monarchs, Bhishma, Drona and Sutaputra, with the warrior of chiefs of ours, enter precipitately into Thy mouth, terrible with tusks and fearful to behold. Some are found sticking in the interstices of Thy teeth, with their heads crushed to powder.
Sutaputra: The son of charioteer, Karna.
धृतराष्ट्र के वे सभी पुत्र, राजाओं की सेना के साथ, भीष्म, द्रोण और सूतपुत्र, हमारे योद्धा सेनापतियों के साथ, तेजी से आपके मुँह में प्रवेश कर जाते हैं, जिसके दाँत अत्यन्त भयानक हैं और देखने में काफी डरावने लगते हैं । कुछ आपके दाँतों के बीच में फँसे हुए पाए जाते हैं, जिनके सिर चूर्ण हो गए हैं ।
सूतपुत्र: सारथी का पुत्र कर्ण ।
धृतराष्ट्र केर ओ समस्त पुत्र, राजा लोकनिक सेनाक संग, भीष्म, द्रोण आर सूतपुत्र, हमरा सभक योद्धा सेनापति लोकनिक संग, तेजी सँ अपनेक मुंह मे पैसल जाइत छथि, जेकर दाँत अत्यन्त भयानक अछि आर देखय मे काफी भयाओन (डराओन) लगैत अछि । किछु गोटे त अपनेक दाँतक बीच मे फँसल पाओल जाइत छथि, जिनकर सिर (माथ) चूर्ण भ’ गेल छन्हि ।
सूतपुत्र: सारथी (अधिरथ) केर पुत्र कर्ण ।
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ॥
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥११-२८॥
Verily, as the many torrents of rivers flow towards the ocean, so do those heroes in the world of men enter Thy fiercely flaming mouths.
सचमुच, जैसे नदियों की कई धाराएँ समुद्र की ओर बहती हैं, वैसे ही मनुष्य की दुनिया के वे वीर आपके भयंकर जलते हुए मुँह में प्रवेश करते हैं ।
सचमुच, जेना नदी सभक कतेको धारा सब समुद्र दिश बहैत अछि, तेनाही मनुष्य केर दुनियाक ओ वीर सब अपनेक भयंकर जरैत मुँह मे प्रवेश करैत छथि ।
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ॥
तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥११-२९॥
As moths precipitately rush into a blazing fire only to perish, even so do these creatures also precipitately rush into Thy mouths only to perish.
28 and 29 – The two similes vividly illustrate how the assembled warriors rush to destruction, out of their uncontrollable nature, with or without discrimination.
जैसे पतंगे जलती हुई आग में भागते हैं और मर जाते हैं, वैसे ही ये जीव भी आपके मुंह में भागते हैं और मर जाते हैं ।
२८ और २९ – ये दो उदाहरण साफ दिखाते हैं कि कैसे इकट्ठा हुए योद्धा अपने बेकाबू स्वभाव के कारण, चाहे वे भेदभाव (पक्ष या विपक्ष का विवेकपूर्ण समझ) करें या न करें, विनाश की ओर भागते हैं ।
जेना फतिंगा सब जरैत आगि मे भागैत अछि आ मरि जाइत अछि, तेनाही ई जीव सब सेहो अपनेक मुंह मे भागैत अछि आ मरि जाइत अछि ।
२८ आ २९ – ई दुइ गोट उदाहरण साफ देखबैत अछि जे केना एकत्रित भेल योद्धा सब अपन अनियंत्रित प्रकृति (स्वभाव) केर कारण, चाहे ओ भेदभाव (पक्ष या विपक्ष केर विवेकपूर्ण समझ) करथि या नहि करथि, विनाश दिश भागैत छथि ।
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ॥
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥११-३०॥
Swallowing all the worlds on every side with Thy flaming mouths, Thou art licking Thy lips. The fierce rays, filling the whole world with radiance, are burning O Vishnu.
Licking Thy lips: consuming entirely, enjoying it, as it were.
अपने ज्वलंत मुखों से सभी ओर के लोकों को निगलते हुए, आप अपने होठों को चाट रहे हैं । हे विष्णु, समस्त जगत को तेजपुंज (चमकता प्रकाशपुंज) से भरकर (उनकी) प्रचंड किरणें जला रही हैं ।
अपने होठों को चाटना: पूरी तरह से उपभोग करना (चट कर जाना, पूर्णतया निगल जाना) और फिर इसका आनंद लेना, जैसे कि यह (आनन्द लेने के लिये ही) हो ।
अपन ज्वलन्त मुंह सँ सब दिशक लोक केँ संहारैत (निगलैत), अपने अपन ठोर केँ चाटि रहल छी । हे विष्णु, समस्त जगत केँ तेजपुंज (चमकैत प्रकाश) सँ भरिकय (ओकर) प्रचंड किरण सब जरा रहल अछि ।
अपने अपन ठोर केँ चाटि रहल छी: पूरे तरह सँ उपभोग कयनाय (चाटिपोछि खा गेनाय, पूर्णतया निगलि गेनाय) आर फेर ओकर आनन्द लैत, जेना कि एहि लेल (आनन्द लेबाके लेल) ओ सब बनल हो ।
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ॥
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥११-३१॥
Tell me who Thou art, fierce in form. Salutation to Thee, O Supreme Deva! have mercy. I desire to know Thee, O Primeval One. I know not indeed Thy purpose.
मुझे बताएं कि आप, इस तरह के भयंकर रूप वाले, कौन हैं ? आपको नमस्कार है, हे परम देव ! दया करें । मैं आपको जानना चाहता हूँ, हे आदिदेव । मैं सच में आपका उद्देश्य नहीं जानता ।
हमरा बताउ जे अपने, एहि तरहक भयंकर रूपवाला, के थिकहुँ ? अपने केँ नमस्कार अछि, हे परम देव ! दया करू । हम अहाँ केँ जानय चाहैत छी, हे आदिदेव ! हम सच मे अपनेक उद्देश्य नहि जनैत छी ।
श्रीभगवानुवाच ।
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ॥
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥११-३२॥
The Blessed Lord said:
I am the mighty world-destroying Time, here made manifest for the purpose of infolding the world. Even without thee, none of the warriors arrayed in the hostile armies shall live.
Even without thee, etc.: Even without thy instrumentality, i.e., even if, thou, O Arjuna, wouldst not fight, the end of all these warriors is inevitable, because I as the all-destroying Time have already killed them; so thy instrumentality in that work is insignificant.
भगवान ने कहा:
मैं दुनिया को खत्म करने वाला ताकतवर काल (समय) हूँ, जो दुनिया को अपने में समेटने के लिए यहाँ प्रकट हुआ हूँ । तुम्हारे बिना भी, दुश्मन सेनाओं में खड़े योद्धाओं में से कोई भी ज़िंदा नहीं रहेगा ।
तुम्हारे बिना भी, वगैरह: तुम्हारे बिना भी, यानी, अगर तुम, हे अर्जुन, लड़ना भी नहीं चाहोगे, तो भी इन सभी योद्धाओं का अंत होना तय है, क्योंकि मैं, सब कुछ खत्म करने वाले समय के तौर पर, उन्हें पहले ही मार चुका हूँ; इसलिए उस काम में तुम्हारा हाथ बहुत कम है ।
भगवान कहलनि:
हम दुनिया केँ खत्म करयवाला ताकतवर काल (समय) छी, जे दुनिया केँ अपना मे समेटबाक लेल एतय प्रकट भेलहुँ अछि । अहाँक बिना सेहो, दुश्मन सेना मे ठाढ़ योद्धा लोकनि मे सँ कियो जिन्दा नहि रहत ।
अहाँक बिना सेहो, आदि: अहाँक बिना सेहो, अर्थात्, जँ अहाँ, हे अर्जुन, लड़इयो नहि चाहब, तैयो ई सब योद्धा लोकनिक अन्त होयब तय अछि, कियैक तँ हम, सब किछु खत्म करयवला समय केर रूप मे, हुनका सब केँ पहिनहिं मारि चुकल छी; तेँ ओहि काज मे अहाँक हाथ बहुत कम अछि ।
तस्मात्त्वुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् मुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ॥
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥११-३३॥
Therefore do thou arise and acquire fame. Conquer the enemies, and enjoy the unrivalled dominion. Verily by Myself they been already slain; be thou merely an apparent cause, O Savyasachin (Arjuna).
Be thou…. cause: People will think thee as the vanquisher of thy enemies, whom even the Devas cannot kill, and thus thou wilt gain glory; but thou art only an instrument in My hand.
Savyasachin: One who could shoot arrows with his left hand.
इसलिए तुम उठो और नाम कमाओ । दुश्मनों को हराओ, और अद्वितीय (अतुलनीय) राज का आनन्द लो । सच में, वे मेरे ही हाथों मारे जा चुके हैं; हे सव्यसाचिन (अर्जुन), तुम सिर्फ एक वजह (कारण) बनो ।
तुम…. वजह बनो: लोग तुम्हें अपने दुश्मनों को हराने वाला समझेंगे, जिन्हें देवता भी नहीं मार सकते, और इस तरह तुम्हें नाम मिलेगा; लेकिन तुम सिर्फ़ मेरे हाथ का एक हथियार हो ।
सव्यसाचिन: वह जो अपने बाएं हाथ से तीर चला सके ।
तेँ अहाँ उठू आ नाम कमाउ । दुश्मन सब केँ हराउ, आर अद्वितीय (अतुलनीय, बेजोड़) राज केर आनन्द लिय’ । सच मे, ओ सब हमरा हाथ सँ मारल जा चुकल अछि; हे सव्यसाचिन (अर्जुन), अहाँ सिर्फ एकटा वजह (कारण) बनू ।
अहाँ सिर्फ एकटा कारण बनू: लोक अहाँ केँ अपन दुश्मन सब केँ हरबयवला बुझत, जिनका देवतहु नहि मारि सकैत छथि, आर एहि तरहें अहाँ केँ नाम (यश) भेटत, मुदा अहाँ केवल हमर हाथ केर एकटा औजार (हथियार) टा छी ।
सव्यसाचिन: ओ जे अपन बायाँ हाथ सँ तीर चला सकय ।
द्रोणञ्च भीष्मञ्च जयद्रथञ्च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ॥
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥११-३४॥
Drona, Bhishma, Jayadratha, Karna as well as other brave warriors – these already killed by Me, do thou kill. Be not distressed with fear; fight, and thou shall conquer thy enemies in battle.
Already killed by Me: so do not be afraid of incurring sin by killing Drona, Bhishma, and others though they are venerable to you as your Guru, grandsire, etc.
Distressed with fear: as regards success because these great warriors are regarded as invincible.
द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण तथा अन्य वीर योद्धा – ये मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं, तुम उन्हें मार डालो । भय से व्याकुल न होओ; और लड़ो, तुम युद्ध में अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करोगे ।
मेरे द्वारा पहले ही मारा जा चुका है: इसलिए द्रोण, भीष्म और अन्य लोगों को मारने से पाप लगने से मत डरो, हालांकि वे तुम्हारे गुरु, पितामह आदि के रूप में तुम्हारे लिए पूजनीय हैं ।
भय से व्यथित: सफलता के संबंध में क्योंकि इन महान योद्धाओं को अजेय माना जाता है ।
द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण तथा अन्य वीर योद्धा – ई सब हमरा द्वारा पहिनहिं मारल जा चुकल छथि, अहाँ हुनका (युद्ध मे) मारू । भय सँ व्याकुल नहि होउ; आर लड़ू, अहाँ युद्ध मे अपन शत्रु सब पर विजय प्राप्त करब ।
हमरा द्वारा पहिनहिं मारल जा चुकल छथिः तेँ द्रोण, भीष्म आर अन्य लोक सब केँ मारय सँ पाप लागय सँ जुनि डराउ, चूँकि ओ सब अहाँक गुरु, पितामह आदिक रूप मे अहाँक लेल पूजनीय थिकाह ।
भय सँ व्यथित: सफलता केर सम्बन्ध मे चूँकि ई महान योद्धा सब केँ अजेय अजेय मानल जाइत छथि ।
सञ्जय उवाच ।
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ॥
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥११-३५॥
Sanjaya said:
Having heard this speech of Keshava, the diademed one (Arjuna), with joined palms, trembling, prostrated himself, and again addressed Krishna in a choked voice, bowing down, overwhelmed with fear.
संजय ने कहा:
केशव की यह बात सुनकर, मुकुटधारी अर्जुन ने हाथ जोड़कर, कांपते हुए, दण्डवत् प्रणाम किया, और फिर से दबी हुई आवाज़ में, डर से घबराकर, झुककर कृष्ण से सम्बोधित हुआ (बात किया) ।
संजय कहलनि:
केशव केर ई बात सुनिकय, मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़िकय, कँपिते, दण्डवत् प्रणाम कयलनि, आर फेरो दबल (सहमल) आवाज मे, भय सँ आतुर (घबराहट सँ भरिकय), झुकिकय (नमनभाव मे) कृष्ण सँ सम्बोधित भेला (बात कयलनि) ।
अर्जुन उवाच ।
स्थाने हृषीकेशे तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ॥
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥११-३६॥
Arjuna said:
It is meet, O Hrishikesha, that the world is delighted and rejoices in Thy praise, that Raksasas fly in fear to all quarters and all the hosts of Siddhas bow down to Thee in adoration.
अर्जुन ने कहा:
हे हृषीकेश, यह सही है कि दुनिया आपकी तारीफ से खुश हो और आनंदित हो, राक्षस डर के मारे चारों तरफ भाग जाएं और सिद्धों की सारी टोली आपकी पूजा में झुकते हैं (नमन भाव में रहते हैं) ।
अर्जुन कहलनि:
हे हृषीकेश, यैह सही छैक जे दुनिया अपनेक प्रशंसा सँ प्रसन्न अछि आ आनन्दित अछि, राक्षस सब डरक मारे चारू तरफ भागि जाइछ आर सिद्ध लोकनिक सम्पूर्ण दल अपनेक पूजा (आराधना) मे झुकैत छथि (नमन भाव मे रहैत छथि) ।
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ॥
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥११-३७॥
And why should they not, O Great-souled One, bow to Thee, greater than, and the Primal Cause of even Brahma, O Infinite Being, O Lord of the Devas, O Abode of the universe? Thou art the Imperishable, the Being and the non-Being, (as well as) That which is Beyond (them).
Brahma: The Hiranyagarbha.
The Being and the non-Being, etc.: The Sat (manifested) and the Asat (unmanifested), which form the Upadhis (adjuncts) of the Aksara (Imperishable); as such He is spoken of as the Sat and the Asat. In reality, the Imperishable transcends the Sat and the Asat.
और हे महान आत्मा, वे आपको क्यों न प्रणाम करें, जो ब्रह्मा से भी बड़े और उनके मूल कारण हैं, हे अनंत सत्, हे देवों के स्वामी, हे ब्रह्मांड के धाम ! आप अविनाशी हैं, सत् (अस्तित्व) और असत् (अनस्तित्व) हैं, (साथ ही) वह जो (उनसे) परे है ।
ब्रह्मा: हिरण्यगर्भ ।
सत् और असत्, वगैरह: सत् (दिखाई देने वाला) और असत् (बिना दिखाई देने वाला), जो अक्षर (अविनाशी) की उपाधियाँ (सहायक) बनाते हैं; इस तरह उन्हें सत् और असत् कहा जाता है । असल में, अविनाशी सत् और असत् से परे हैं ।
आर हे महान आत्मा, ओ सब अपने केँ कियैक नहि प्रणाम करथि, जे ब्रह्मा सँ पर्यन्त पैघ आर हुनकर मूल कारण थिकहुँ, हे अनन्त सत्, हे देवता लोकनिक स्वामी, हे ब्रह्माण्ड केर धाम ! अपने अविनाशी थिकहुँ, सत् (अस्तित्व) आर असत् (अनस्तित्व) थिकहुँ, (संगहि) ओ जे (ताहू सँ) परे (उपर) थिकहुँ ।
ब्रह्मा: हिरण्यगर्भ ।
सत् आर असत्, आदि: सत् (देखाय दयवला) आर असत् (बिनु देखायवला), जे अक्षर (अविनाशी) केर उपाधि सब (सहायक) बनैत अछि; एहि तरहें ओकरा सत् आर असत् कहल जाइत छैक । असल मे, अविनाशी सत् आर असत् सँ परे छथि ।
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ॥
वेत्ताऽसि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूपम् ॥११-३८॥
Thou art the Primal Deva, the Ancient Purusha; Thou art the Supreme Refuge of this universe, Thou art the Knower, and the One Thing to be known; Thou art the Supreme Goal. By Thee is the universe pervaded, O boundless Form.
आप आदि देव हैं, प्राचीन पुरुष हैं; आप इस ब्रह्मांड की सर्वोच्च आश्रय (शरण, आधार) हैं, आप सब कुछ जानने वाले हैं, और जानने योग्य एकमात्र चीज हैं; आप सर्वोच्च लक्ष्य हैं । हे असीम रूप, यह ब्रह्मांड आपसे व्याप्त है ।
अपने आदि देव थिकहुँ, प्राचीन पुरुष थिकहुँ; अपने एहि ब्रह्माण्ड केर सर्वोच्च आश्रय (शरण, आधार) थिकहुँ, अपने सब किछु जानयवाला थिकहुँ, आर जानय योग्य एकमात्र चीज थिकहुँ; अपने सर्वोच्च लक्ष्य थिकहुँ । हे असीम रूप, ई ब्रह्माड अपने सँ व्याप्त अछि ।
वायुर्यमोऽग्निवरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ॥
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥११-३९॥
Thou art Vayu, Yama, Agni, Varuna the Moon, Prajapati, and the Great-Grandfather. Salutation, salutation to Thee, a thousand times, and again and again salutation, salutation to Thee.
आप वायु, यम, अग्नि, वरुण, चंद्रमा, प्रजापति और प्रपितामह हैं । आपको हजार बार नमस्कार, नमस्कार, और बार-बार नमस्कार, नमस्कार है ।
अपने वायु, यम, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजापति आर प्रपितामह थिकहुँ । अपने केँ हजार बेर नमस्कार, नमस्कार, आर बेर-बेर नमस्कार, नमस्कार अछि ।
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्वं ॥
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥११-४०॥
Salutation to Thee before and behind, salutation to Thee on every side, O All ! Thou infinite in power and infinite in prowess, pervedest all; wherefore Thou art all.
On every side: As Thou art present everywhere.
Pervadest: by thy One self.
आगे और पीछे आपको नमस्कार है, हर तरफ आपको नमस्कार है, हे सर्वेसर्वा ! आप शक्ति में अनंत और पराक्रम में अनंत हैं, सभी में व्याप्त (सर्वव्यापी) हैं; इसलिए आप ही सर्वस्व हैं ।
हर तरफ: जैसे आप हर जगह मौजूद हैं ।
सर्वव्यापी: सिर्फ उनके एक स्व से (सब कुछ व्याप्त है) ।
आगू आर पाछू अपने केँ नमस्कार अछि, हर तरफ अपने केँ नमस्कार अछि, हे सर्वेसर्वा ! अपने शक्ति मे अनन्त आर पराक्रम मे अनन्त थिकहुँ, सर्वव्यापी (सब मे व्याप्त) थिकहुँ; तेँ अपने टा सर्वस्व (सब किछु) थिकहुँ ।
हर तरफ: जेना अपने हरेक स्थान मे उपस्थित छी ।
सर्वव्यापी: सिर्फ अपनेक एक स्वत्व सँ (सब किछु व्याप्त अछि) ।
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे माधव हे सखेति ॥
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥११-४१॥
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ॥
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥११-४२॥
Whatever I have presumptuously said from carelessness or love, addressing Thee as “O Krishna, O Yadava, O Friend” regarding Thee merely as a friend, unconscious of this Thy greatness – in whatever way I may have been disrespectful to Thee in fun, while walking, reposing, sitting, or at meals, when alone (with Thee), O Achyuta, or in company – I implore Thee, Immeasurable One, to forgive all this.
Love: Confidence born of affection.
In company: in the presence of others.
मैंने दुराशापूर्वक जो कुछ भी कहा हो (पूर्व के समय में आपको इस तरह न जानते हुए) बेपरवाही या प्यार से, आपको “हे कृष्ण, हे यादव, हे दोस्त” कहकर (सम्बोधित करते हुए), आपको केवल एक मित्र समझकर, आपकी इस महानता से अनजान – किसी भी तरह से मैंने मजाक में, चलते समय, आराम करते समय, बैठते समय, या खाना खाते समय, अकेले में (आपके साथ), हे अच्युत, या अन्य लोगों के साथ आपका अपमान (अश्रद्धा की भाव) किया हो – मैं आप, एक असीमित (परब्रह्म) से, यह सब माफ करने के लिये प्रार्थना (गुज़ारिश) करता हूँ ।
प्यार: प्यार से पैदा हुआ भरोसा ।
साथ में: दूसरों की मौजूदगी में ।
हम दुराशापूर्वक जे किछुओ कहने होइ (पूर्व केर समय मे अपने केँ एना नहि जनैत) बेपरवाही या स्नेहवश, अपने केँ “हे कृष्ण, हे यादव, हे मित्र” कहिकय (सम्बोधित करैत), अपने केँ केवल एकटा मित्र बुझिकय, अपनेक एहि महानता सँ अनजान – कोनो भी तरह सँ हम मजाक मे, चलैत समय, आराम करैत समय, बैसबाक समय, या भोजन करैत समय, अकेले में(अपनेक संग), हे अच्युत, या आन लोक सभक संग अपनेक निरादर (अपमान, अश्रद्धाक भाव मे) कएने होइ – हम अपने, एक असीमित (परब्रह्म) सँ, ई सबटा क्षमा कय देबाक लेल प्रार्थना करैत छी ।
स्नेह: प्रेम सँ उत्पन्न भेल भरोसा ।
संग मे: दोसरा लोकनिक उपस्थिति मे ।
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ॥
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥११-४३॥
Thou art the Father of the world, moving and unmoving; the object of its worship; greater than the great. None there exists who is equal to Thee in the three worlds; who then can excel Thee, O Thou of power incomparable?
None… to Thee: There cannot be two or more Isvaras; if there were, the world could not get on as it does. When one Isvara desires to create, another desire to destroy. Who knows that all the different Isvaras would be of one mind, as they would all be independent of each other?
आप इस चल और अचल संसार के पिता हैं, इसकी पूजा के पात्र हैं; महान से भी बड़े महान हैं । तीनों लोकों में आपके बराबर कोई नहीं है; फिर आपसे बढ़कर कौन हो सकता है, हे अतुलनीय शक्ति वाले ?
तीनों लोकों में… कोई नहीं: दो या उससे ज़्यादा ईश्वर नहीं हो सकते; अगर होते भी, तो दुनिया वैसी नहीं चलती जैसी चलती है । जब एक ईश्वर बनाना चाहते हैं, तो दूसरा मिटाना चाहते हैं । कौन जानता है कि सभी अलग-अलग ईश्वर एक ही सोच के होंगे, क्योंकि वे सभी एक-दूसरे से अलग होंगे ?
अपने एहि चल आर अचल संसार केर पिता थिकहुँ, एकरा सभक पूजाक पात्र थिकहुँ; महानो सँ पैघ महान थिकहुँ । तीनू लोक मे अपनेक बराबर कियो नहि अछि; फेर अपने सँ बढ़िकय के भ’ सकैत अछि, हे अतुलनीय शक्तिवाला (परमेश्वर) ?
तीनू लोक मे… कियो नहि: दुइ या ओहि सँ बेसी ईश्वर नहि भ’ सकैत छथि, अगर हेबो करितथि, तँ दुनिया ओना नहि चलैत जेना चलैत अछि । जखन एकटा ईश्वर बनाबय चाहता, तँ दोसर मेटाबय चाहता । के जनैत अछि जे सब अलग-अलग ईश्वर एक्के सोच केँ हेताह, कियैक तँ ओ सब एक-दोसर सँ अलग हेता ?
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ॥
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसहि देव सोढुम् ॥११-४४॥
So prostrating my body in adoration, I crave Thy forgiveness, Lord adorable ! As a father forgiveth his son, friend a dear friend, a beloved one his love, even so shouldst Thou forgive me, O Deva.
इसलिए अपने शरीर को पूजा (प्रशंसा) में झुकाकर (दण्डवत् अवस्था में), मैं आपके द्वारा क्षमा चाहता हूँ, हे अतिप्रिय भगवान ! जैसे एक पिता अपने बेटे को, दोस्त अपने प्यारे दोस्त को, और एक प्रिय अपने प्रियतम को क्षमा कर देता है, वैसे ही आपको मुझे क्षमा करना चाहिए, हे देव ।
तेँ अपना शरीर केँ (अपनेक) पूजा (प्रशंसा) मे दण्डवत् (झुकाकय) प्रणाम करैत, हम अपने सँ क्षमा चाहैत छी, हे अतिप्रिय भगवान ! जेना एकटा पिता अपन पुत्र केँ, मित्र अपन मित्र केँ, आर एकटा प्रिय अपन प्रियतम केँ क्षमा कय दैत छथि, तहिना अपने केँ हमरा क्षमा करबाक चाही, हे देव !
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ॥
तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥११-४५॥
Overjoyed am I to have seen what I saw never before; yet mind is distracted with terror. Show me, O Deva, only that Form of Thine. Have mercy, O Lord of Devas, O Abode of the universe.
मैं बहुत खुश हूँ कि मैंने वो देखा जो मैंने पहले कभी नहीं देखा; फिर भी मेरा मन डर से भटक रहा है । हे देव, मुझे सिर्फ अपना वो रूप दिखाएं । हे देवों के स्वामी, हे ब्रह्मांड के धाम, दया करें ।
हम बहुते प्रसन्न छी कि हम ओ देखलहुँ जे हम पहिने कहियो नहि देखने रही; तथापि हमर मन भय सँ भटकि रहल अछि । हे देव, हमरा मात्र अपन ओ रूप देखाउ । हे देवता सभक स्वामी, हे ब्रह्माण्ड केर धाम, दया करू ।
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ॥
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥११-४६॥
Diademed, bearing a mace and a discus, Thee I desire to see as before. Assume that same four-armed Form, O Thou of thousand arms, of universal Form.
मुकुट पहने, गदा और चक्र लिए, मैं आपको पहले की तरह देखना चाहता हूँ । हे हजार भुजाओं वाले, विश्व रूप वाले, वही चार भुजाओं वाला (चतुर्भुज) रूप धारण करें ।
मुकुट पहिरने, गदा आ चक्र लेने, हम अपने केँ पहिनहिं जेकाँ देखय चाहैत छी । हे हजार हाथवाला, विश्वरूपवाला, वैह चारि भुजावाला (चतुर्भुज) रूप धारण करी ।
श्री भगवानुवाच ।
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ॥
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥११-४७॥
Graciously have I shown to thee, O Arjuna, this Form supreme, by My own Yoga power, this resplendent, primeval, infinite universal Form of Mine, which hath not been seen before by anyone else.
हे अर्जुन, मैंने कृपापूर्वक अपनी योग शक्ति से, अपना यह देदीप्यमान, आदिम, अनंत ब्रह्माण्डीय (सार्वभौमिक) रूप तुम्हें दिखाया है, जिसे पहले किसी ने नहीं देखा है ।
हे अर्जुन, हम कृपापूर्वक अपन योग शक्ति सँ, अपन ई देदीप्यमान, आदिम, अनन्त ब्रह्माण्डीय (सार्वभौमिक) रूप अहाँ केँ देखेलहुँ अछि, जे पहिने कियो नहि देखलक ।
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ॥
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥११-४८॥
Neither by the study of the Veda and Yajna, nor by gifts, nor by rituals, nor by severe austerities, am I in such Form seen, in the world of men, by any other than thee, O great hero of the Kurus.
हे कौरवों के महानायक, न तो वेद के अध्ययन से और न ही यज्ञ से, न दान से, न अनुष्ठानों से, न कठोर तपस्या से, मनुष्यों के संसार में तुम्हारे अतिरिक्त किसी और को मैं इस रूप में दिखाई देता हूँ ।
हे कौरव लोकनिक महानायक, नहि तँ वेद केर अध्ययन सँ आ नहिये यज्ञ सँ, न दान सँ, न अनुष्ठान सब सँ, न कठोर तपस्या सँ, मनुष्य लोकनिक संसार मे अहाँक अतिरिक्त कियो आर केँ हम एहि रूप मे देखाय दैत छी ।
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ॥
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥११-४९॥
Be not afraid nor bewildered, having behold this Form of Mine, so terrific. With thy fears dispelled and with gladdened heart, now see again this former Form of Mine.
मेरे इस भयानक रूप को देखकर डरो मत और न ही हैरान होओ । अपने डर को दूर करके और प्रसन्न हृदय (खुश दिल) से, अब मेरे इस पुराने रूप को फिर से देखो ।
हमर एहि भयानक रूप केँ देखिकय डराउ जुनि आ नहिये विस्मित होउ । अपन डर (भय) केँ दूर कयकेँ आर प्रसन्न हृदय (खुश दिल) सँ, आब हमर एहि पुरान रूप केँ फेर सँ देखू ।
सञ्जय उवाच ।
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ॥
आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥११-५०॥
Sanjaya said:
So Vasudeva, having thus spoken to Arjuna, showed again His own Form; and the Great-souled One, assuming His gentle Form, pacified him who was terrified.
संजय ने कहा:
इस तरह वासुदेव ने अर्जुन से बात करके फिर से अपना रूप दिखाया; और महात्मा ने अपना सौम्य रूप धारण करके, डरे हुए अर्जुन को शांत किया (समझा-बुझाकर सन्तुष्ट किया) ।
संजय कहलनि:
एहि तरहें वासुदेव अर्जुन सँ बात कयकेँ फेर सँ अपन रूप देखौलनि; आर महात्मा (कृष्ण) अपन सौम्य रूप धारण कयकेँ, डरा गेल अर्जुन केँ शान्त कयलनि (बुझा-सुझाकय सन्तुष्ट कयलनि) ।
अर्जुन उवाच ।
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्य जनार्दन ॥
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥११-५१॥
Arjuna said:
Having seen this Thy gentle human Form, O Janardana, my thoughts are now composed, and I am restored to my nature.
अर्जुन ने कहा:
हे जनार्दन, आपके इस सौम्य मानव रूप को देखकर मेरे विचार अब शांत हो गए हैं, और मैं अपने प्रकृति में वापस आ गया हूँ ।
अर्जुन कहलनि:
हे जनार्दन, अपनेक एहि सौम्य मानव रूप केँ देखिकय हमर विचार आब शान्त भ’ गेल अछि, आर हम अपन प्रकृति मे वापस आबि गेलहुँ अछि ।
श्री भगवानुवाच ।
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ॥
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥११-५२॥
The Blessed Lord said:
Very hard indeed it is to see this Form of Mine which thou hast seen. Even the Devas ever long to behold this Form.
भगवान ने कहा:
मेरे इस रूप को देखना वाकई बहुत मुश्किल है जिसे तुमने देखा है । देवता भी इस रूप को देखने के लिए हमेशा लालायित रहते हैं ।
भगवान कहलनि:
हमर एहि रूप केँ देखनाय वास्तव मे बहुत मुश्किल अछि जेना अहाँ देखलहुँ अछि । देवतो लोकनि एहि रूप केँ देखबाक लेल हमेशा लालायित रहैत छथि ।
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ॥
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥११-५३॥
Neither by the Vedas, nor by austerity, nor by gifts, nor by sacrifice can I be seen as thou hast seen Me.
न तो वेदों से, न तपस्या से, न दान से, न यज्ञ से मुझे वैसे देखा जा सकता है जैसा तुमने मुझे देखा है ।
नहि त वेद सँ, नहि तपस्या सँ, नहि दान सँ, नहि यज्ञ सँ हमरा एना देखल जा सकैत अछि जेना अहाँ हमरा देखलहुँ अछि ।
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ॥
ज्ञातुं द्रष्टुञ्च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥११-५४॥
But by single-minded devotion I may in this form, be known, O Arjuna, and seen in reality, and also entered into, O scorcher of foes.
Single-minded devotion: That devotion which never seeks any other object but the Lord alone, and consequently cognises no other object but the Lord.
लेकिन एकनिष्ठ भक्ति से, हे अर्जुन, मुझे इस रूप में जाना जा सकता है, असल में देखा जा सकता है, और हे दुश्मनों को जलाने वाले, उसमें प्रवेश भी किया जा सकता है ।
एकनिष्ठ भक्ति: वह भक्ति जो कभी भी सिर्फ भगवान के अलावा किसी और चीज की तलाश नहीं करती, और इसलिए भगवान के अलावा किसी और चीज को नहीं पहचानती ।
लेकिन एकनिष्ठ भक्ति सँ, हे अर्जुन, हमरा एहि रूप मे जानल जा सकैत अछि, असल मे देखल जा सकैत अछि, आर हे दुश्मन सब केँ जरेनिहार, ओहि मे प्रवेश सेहो कयल जा सकैत अछि ।
एकनिष्ठ भक्ति: ओहेन भक्ति जे कहियो मात्र भगवानक अलावे कोनो आर चीजक खोज नहि करैछ, आर ताहि द्वारे भगवानक अलावे कोनो आर चीज केँ नहि चिन्हैछ ।
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ॥
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥११-५५॥
He who does work for Me alone and has Me for his goal, is devoted to Me, is freed from attachment, and bears enmity towards no creature – he entereth into Me, O Pandava.
Does work for Me alone: Serves Me alone in all forms and manner of ways, with his whole heart and soul, and thus does not become attached to them.
He alone, whose devotion takes the forms as described in this Sloka can know and realise Him as He is in reality, and subsequently become one with Him.
जो केवल मेरे लिए कार्य करता है और मुझे ही अपना लक्ष्य मानता है, मेरे प्रति समर्पित है, आसक्ति से मुक्त है और किसी भी प्राणी के प्रति शत्रुता नहीं रखता है – हे पांडव, वह मुझमें प्रवेश कर जाता है ।
अकेले मेरे लिए काम करता है: अपने पूरे दिल और आत्मा से सभी रूपों और तरीकों से अकेले मेरी सेवा करता है, और इस तरह उनसे आसक्त नहीं होता है ।
केवल वही, जिसकी भक्ति इस श्लोक में वर्णित रूप लेती है, उन्हें जान सकता है और उनका एहसास कर सकता है जैसे वह वास्तविकता में हैं, और बाद में उनके साथ एक हो सकता है ।
जे अकेले हमरा लेल काज करैत अछि आर हमरहि टा अपन लक्ष्य मानैत अछि, हमरा प्रति समर्पित अछि, आसक्ति सँ मुक्त अछि आर कोनो प्राणीक प्रति शत्रुता नहि रखैत अछि – हे पांडव, ओ हमरा मे प्रवेश करैत अछि ।
अकेले हमरा लेल काज करैत अछि: अपन पूरा हृदय आ आत्मा सँ सब रूप आ तरीका सँ अकेले हमर सेवा करैत अछि, आर एहि तरहें ओहि सब मे आसक्त नहि होइत अछि ।
केवल वैह टा, जेकर भक्ति एहि श्लोक मे वर्णित रूप लैत हैअछि, हुनका जानि सकैत अछि तथा हुनका अनुभव कय सकैत अछि जेना ओ वास्तविकता मे छथि, आर बाद मे हुनका संग एक भ’ सकैत अछि ।
इति विश्वरूपदर्शनं नाम एकादशोऽध्यायः ॥
The end of eleventh chapter, designated, The Vision of the Universal Form.
हरिः हरः!!

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Arjun k Bhagban k virat roop k lel ehi bhag k paidh k varnan jahi m dunugota k sambandhit chail rahal chhain. Arjun kahait chhathin k he prabhu aha apan Vishal roop hamra dekhao jahi san hom ahan k jain saki. Takhan prabhu kahalkhin ki. Aha ehi dristi san hamra nai dekh peb. Tai aha k Divya dristi do rahal chhi. Fer hunka o dristi bhetla k baad o hunkak ete Vishal roop k dekh dera gelah. Ohi kram m Prabhu kahalkhin aha eh chinta juin karu je hom kena hinka sabkan marab? Sab maral gel chhaith. Aha hinka sab k sab k dekhabai lel eh kaaj karu. Jahi san sab bujhtah je aha hinka marlao. O ete dera gelah jahi san kichh fura nai rahal chhain.
Punah Arjun k sabkichh bujha k samanya avastha k lel bujhelah. Okar baad prabhu apno samanya roop (Manushya k roop) aabi gelah.
अर्जुन उवाच ।
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ॥
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥११-१॥
अर्जुन कहलनि:
हे भगवन ! अपने हमरा उपर दया कयकेँ आत्मज्ञान केर बारे जे अत्यन्त गूढ़ (गहींर) शब्द कहलहुँ अछि, ताहि सँ हमर भ्रम दूर भ’ गेल अछि ।
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