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जप केर त्रुटिरहित विधि – शुद्ध उच्चारण एवं आवाजक सुन्दर महिमाक वर्णन

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जप केर त्रुटिरहित विधि 

अपन पूर्वज लोकनि वेद मे छोटो टाक त्रुटि सँ परहेज लेल लेखनक सहारा लेनहिये बिना अनेकों उपाय निकालि लेने छलथि । वैदिक मंत्र केर पूर्ण लाभ तखनहि प्राप्त भ’ सकैछ जखन कोनो शब्द मे कोनो तरहक परिवर्तन (हेरफेर) नहि कयल जाय; पाठक समय स्वर (आवाज) मे कोनो प्रकारक अनाधिकृत तर-उपर बहकाव नहि हो । तेँ अनेकों सुरक्षा उपाय कयल गेल छल ।

प्रत्येक शब्दक उच्चारण मे कतेक समय लगबाक चाही, से मात्रा (एक लघु स्वर केर उच्चारण मे लागयवला समय) केर माध्यम सँ दर्शायल जाइत अछि । शुद्ध शब्द-ध्वनिक जन्म देबाक लेल शरीरक कोन भाग मे कम्पन उत्पन्न हो, एहि लेल श्वास केँ केना नियंत्रित कयल जाय, सेहो वेदांग मे बतायल गेल अछि, जेकरा शिक्षा कहैत छैकः

शीक्षां व्याख्यास्यामः । वर्णस्वरः । मात्राबलं । सामसन्तानः ।

शिक्षा मे वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम आ संतान केर वर्णन छैक ।

एक अचूक विधि ई छैक जे प्रत्येक मंत्रक जाप विभिन्न पैटर्न आ संयोजन मे कयल जाय, जेकरा वाक्य, पाद, क्रम, जटा, माला, शिखा, रेखा, ध्वजा, दंड, रथ, घन आदि कहल जाइत छैक ।

किछु विद्वान् पंडित लोकनि केँ “घनपति” कहल जाइत छन्हि । एकर अर्थ भेल जे ओ सब वेदक ज्ञाता होइत छथि आ घन नामक पैटर्न मे वेदक जाप करैत छथि । जखन हम सब कोनो घनपतिक घन रूप मे वेदक पाठ करैत सुनैत छी त हम सब देखैत छी जे ओ शब्द सब केँ विभिन्न तरीका सँ आगाँ-पाछाँ आ अलग-अलग पैटर्न मे दोहराबैत छथि । ई कान केँ बहुत सुखद लगैत अछि आ मोन मे प्रसन्नताक भाव सेहो उत्पन्न करैत अछि । एना प्रतीत होइत अछि जाहि सँ वेद मंत्रक स्वाभाविक महिमा आरो बढ़ि गेल अछि । क्रम, जटा, शिखा, माला आदि अन्य निर्धारित पैटर्न मे पाठक प्रभाव सेहो एहने होयत । लेकिन एकर जापक मुख्य उद्देश्य शब्द सभक मूल अर्थ आ ध्वनि पैटर्न मे कोनो गलती नहि करब थिक ।

वाक्य पाठ या संहित पाठ मे मंत्र सभक सीधा उच्चारण कयल जाइछ । जखन मंत्र वाक्य सब मे अबैत अछि, तखन ओकर किछु शब्द सब केँ जप मे संयोजित करय पड़ैछ । वेद मंत्रक पाठ, शब्द सब केँ जोड़िकय ओकरा एकटा सूत्र मे गुथबाक बदला, पद-दर-पद या शब्द-दर-शब्द कयनाय, पद पाठ कहाइत अछि ।

पद पाठ, संहिता पाठक बाद अबैत छैक । पद पाठ मे वाक्य केँ ‘शब्द’ या पद मे विभाजित कयल जाइत छैक । एहि सँ वेदक विद्यार्थी केँ वाक्यक प्रत्येक शब्द केर ज्ञान भ’ जाइत छैक । एकर बाद क्रम पाठ अबैत अछि । एहि विधि मे, मंत्रक पहिल शब्द केँ दोसर मे, दोसर केँ तेसर मे, तेसर केँ चारिम मे आ एहि प्रकारे ताबत धरि जोड़ल जाइत छैक जाबत धरि मंत्रक वाक्य पूरा नहि भ’ जाइक । ई पाठ या पाठ विधि विद्यार्थी केँ नहि केवल अलग-अलग शब्द सब केँ बुझय मे मदति करैत छैक, बल्कि इहो बुझय मे मदति करैत छैक जे पाठ मे दुइ शब्द केँ केना जोड़ल जा सकैछ आ एहेन संयोजन (जोड़नाय) मे स्वर मे कि परिवर्तन होइत छैक ।

गोटेक प्राचीन शिलालेख सब मे, खासकय दानपत्र सब मे, गोटेक विख्यात व्यक्ति लोकनिक नामक अन्त मे ‘क्रमवित्’ प्रत्यय लागल रहैत छल । ‘वेदवित्’ जेकाँ, ‘क्रमवित्’ केर अर्थ अछि जे कोनो व्यक्ति क्रमपाठ विधि सँ वेदक पाठ करय मे पारंगत छथि । दक्षिण भारत मे एहेन कतेको शिलालेख सब भेटैत अछि ।

एकर बाद अबैत अछि जटा पाठ । एहि मे, पहिल आ दोसर शब्द केँ एक संग पाठ कयल जाइत अछि आर फेर शब्द सब केँ उल्टा क्रम मे आ फेर मूल क्रम मे पढ़ल जाइत अछि । जेतय क्रम पाठ मे शब्द सभक क्रम १-२; २-३; ३-४; ४-५ इत्यादि होइत छैक, ओतय जटा पाठ मे ई क्रम १-२-२-१-१-२, २-३-३-२-२-३, ३-४-४-३-३-४, ४-५-५-४-४-५ इत्यादि होयत । जाहि प्रकार सँ जटा पाठ मे दुइ शब्द केँ आगू-पाछू दोहरायल जाइछ, ताहि प्रकार सँ शिखा पाठ मे तीन शब्द केँ एहि प्रकार सँ जोड़ल गेनाय आवश्यक अछि ।

घन पाठ उपरोक्त पाठ सँ अधिक कठिन अछि । एकर पाँच गोट आरो प्रकार अछि । ई सब जपक विभिन्न तरीका छी, जाहि मे शब्द सभक क्रम केँ विभिन्न क्रमपरिवर्तन व संयोजन द्वारा परिवर्तित कयल जाइत अछि ।

घन रूप मे शब्द सभक संयोजन १-२-२-१-१-२-३-३-२-१-१-२-३; २-३-३-२-२-३-४-४-३-२-२-३-४ इत्यादि होयत ।

जाहि प्रकार सँ प्रयोगशाला मे जीवनदायी अमृत केँ अत्यन्त सावधानी सँ संरक्षित कयल जाइत अछि, ताहि प्रकार सँ वेद मंत्र, जे सर्वहित वास्ते अछि, पूर्वज लोकनि द्वारा बिना कोनो क्षरण या हनन केँ आ बिना कोनो लेखन विधिक सहारा लेने, एहि प्रकारक पाठ द्वारा संरक्षित कयल गेल अछि । ई याद रखबाक चाही जे शब्द सब केँ आगू-पाछू करैत समय मे, प्रत्येक स्वर केँ उचित रूप सँ संरक्षण करब आवश्यक अछि तथा विद्यार्थी सिखैत अछि जे शब्द सभक संयोजन स्वर केँ केना प्रभावित करैत छैक ।

संहिता पाठ आ पाद पाठ केँ प्रकृति पाठ कहल जाइत छैक, कियैक तँ मंत्र केर शब्द सामान्य क्रम मे अबैत छैक । शेष केँ विकृति (कृत्रिम या अप्राकृत) कहल जाइत छैक । क्रम मे, यद्यपि शब्द एक, दुइ आ तीन केर स्वाभाविक क्रम मे नहि अबैत छैक, कियैक तँ ओहि मे दुइ के बाद एक आ तीन के बाद दुइ जेकाँ नहि अबैत छैक, ताहि लेल एकरा पूर्णतः विकृति या कृत्रिम नहि कहल जा सकैत छैक । विकृति सब आठ गोट अछि ।

जटा माला शिखा रेखा ध्वजो दण्डो रथो घनः
इत्यष्टा विकृतयः प्रोक्ताः क्रमपूर्वा महर्षिभिः

वेदक शब्द, ध्वनि, स्वर, आवाजक उतार-चढाव, उच्चारण तथा ध्वनि संयोजनक शुद्धता केँ बनाकय रखबाक वास्ते जटिल पाठक उपरोक्त प्रणाली बहुत प्राचीन काल मे तैयार कयल गेल छल । शब्द सब केँ अनेकों तरीका सँ दोहरेला सँ शब्दक सही संख्या सेहो बनल रहैत छल जाहि सँ स्वाभाविक रूप सँ ओकर शुद्धता सुनिश्चित होइत छल । विद्वान् लोकनि केँ पाठ केर कठिन विधि सब अपनाबय मे सक्षम बनेबाक लेल, इहो निर्धारित कयल गेल छल जे जप केर बेसी कठिन विधि सब सँ जपकर्ता केँ बेसी पुण्य प्राप्त होइत छलन्हि ।

चूँकि पूर्वज सब वेद मंत्र केर स्वरूप केँ सुरक्षित आ शुद्ध बनेने रहबाक लेल बहुते प्रयास कएने रहथि, ताहि लेल आधुनिक शोधकर्ता सब द्वारा वेद मंत्रक ध्वनि मे परिवर्तन केर समय मुताबिक मापन करबाक विधि अवास्तविक अछि आर सत्य केँ बुझय मे सहायक नहि भ’ सकैछ ।

ईश्वर केर वचन

एहि बात पर विवाद करब उचित नहि अछि जे वेद एकटा रहस्योद्घाटन थिक । नहि केवल अपन देश मे, बल्कि आनहु धर्मक लोक सेहो मानैत छथि जे हुनका सभक पवित्र ग्रन्थ एकटा रहस्योद्घाटन मात्र छी । ईसा मसीह कहने रहथि जे हुनकर उपदेश हुनकर अपन नहि छल, बल्कि ईश्वर केर छल जेकरा ओ मात्र प्रचार कएने रहथि । मुसलमान सब कहैत छथि जे मोहम्मद केवल अल्लाह केर निर्देश सभक प्रचार कयलनि जे हुनका समक्ष प्रकट भेल रहनि ।

रहस्योद्घाटन केर अपन सिद्धान्त केँ ओहो लोकनि “प्रकट ग्रन्थ” केर रूप मे दोहराबैत छथि । ईश्वर केर वचन हमरा सब केँ संत लोकनिक ‍माध्यम सँ उपलब्ध भेल अछि । एहि प्रकार सँ सब धर्म मे, ईश्वर केर वचन महान द्रष्टा लोकनि, पैगम्बर लोकनि आर ऋषि लोकनि केँ प्रकट भेलनि आ वैह सब ओकरा मानवजातिक कल्याण वास्ते उपलब्ध करौलनि अछि ।

जे व्यक्ति कोनो क्षेत्र मे, एकनिष्ठ उद्देश्यक संग, गहिराइ सँ खोज करैत अछि, ओकरा सत्य केर खोज अवश्य होइत छैक । एकरा समझ या अंतर्ज्ञान केर चमक (प्रकाश) कहल जाइत छैक । एना कहल जाइत छैक जे आइंस्टीन सापेक्षताक सिद्धान्त पर कोनो विचार प्रक्रिया सँ नहि पहुँचल रहथि, बल्कि ई समीकरण हुनकर मन मे कौंधल (चमक – प्रकाश रूप मे आयल) छलन्हि । यदि हम सब एकरा एकटा तथ्यक रूप मे स्वीकार कय सकैत छी, तँ निश्चित रूप सँ ई तथ्य जे अत्यधिक विकसित तथा अनुशासित मस्तिष्क एवं आध्यात्मिकता सँ युक्त ऋषिगण अपन हृदयक गहिराइ मे मंत्र सभक प्रति सचेत भ’ गेल रहथि, एहि पर कोनो विवाद नहि भ’ सकैछ आ एकरा मानहे टा पड़त ।

Error Free Methods of Chanting

Without resort to writing, our forefathers had devised many ways to present even a small error to creep into the Vedas. The fullest benefit from the Vedic mantras can result only if no word is changed; no unauthorized upward or downward drift in the note occurs in recitation. Hence the numerous safeguards.

How much time should it take to utter each word is indicated by resort to the notation by maatras – (the time it takes to pronounce a short vowel). How to regulate breathing so that the vibrations can occur at what part of the body to give birth to the pure word-sound is also laid down in the Vedanga called Seeksha thus:

Seeksham Vyakhyaa Syaamah – Varna Swarah – Maatra Balam – Saama Santaanah)

Seeksha deals with Varna, Swara, Maatra, Strength, Saama and Santaanah.

A fool-proof method used is to chant each mantra in various patterns and combinations known as Vaakya, Pada, Krama, Jata, Maala, Sikha, Rekha, Dhwaha, Danda, Ratha, Ghana, etc.

Some learned pandits are called “Ghanapaatis”. This means that they are learned in the Vedas to the extent of chanting of Vedas in the pattern called Ghanam. When we listen to a Ghanapaati reciting Vedas in Ghana form, we note that he repeats the words in various ways back and forth and in different patterns. This would be pleasant to the ears and creates a sense of happiness within. It would seem that the natural grandeur of the Veda mantras in heightened, as it were. So would be the effect of recitation in the other prescribed patterns of Kramam, Jata, Sikha, Maala, etc. But the main object of reciting them is to make no mistake in the original meaning and sound pattern of the words.

Vaakya Paatha or Samita Paatha is to recite the mantras in a sentence straight. When mantras come in sentences, some of the words therein have to be conjoined in chanting. To recite the Veda mantras, pada by pada or word by word, instead of joining the words and stringing them together, is Pada Paatha.

Pada Paatha occurs after Samhita Paatha. In Pada Paatha the sentence is broken down to ‘words’ or pada. This gives the student of the Vedas the knowledge of each word in a sentence. Next is Krama Paatha. In this method, the first word of a mantra is added to the second, the second to the third, the third to the fourth and so on, until the whole sentence of the mantra is completed. This paatha or method of recitation helps the student understand not only the individual words but also how two words can be combined in recitation and what modification occurs in swara in such a combination.

In certain ancient edicts, notably gift deeds, at the end of the names of some illustrious persons, there would a suffix ‘Krama Vit’. Like ‘Vedavit’, ‘Krama Vit’ means that a person is well-versed in reciting the Vedas by the Krama Paatha method. There are many such edicts found in South India.

Next is Jataa Paatha. In this, the first word and the second are first recited together and then the words are recited in a reverse order and then again in the original order. Whereas in the Krama type of recitation the order of words is 1-2; 2-3; 3-4; 4-5 and so on, in the Jataa Paatha, the order will be 1-2-2-1-1-2, 2-3-3-2-2-3, 3-4-4-3-3-4, 4-5-5-4-4-5 and so on. Just as two words are repeated forwards and backwards in the Jataa Paatha, the Sikha Paatha requires three words to be so linked.

The Ghana Paatha is more difficult than the above. There are five more types. They all are different ways of chanting, by changing the order of words by various permutations and combinations.

The combination of words will be 1-2-2-1-1-2-3-3-2-1-1-2-3; 2-3-3-2-2-3-4-4-3-2-2-3-4 and so on in the Ghana Form.

Just as in a laboratory, a life giving elixir is preserved with the utmost care, the Veda mantras, which are for universal benefit, have been preserved by the ancients, without suffering erosion or corrosion even a bit and without resort to writing by such methods of recitation. It must be remembered that, while chanting words backwards and forwards, the swaras of each have to be properly preserved and the student learns how the combination of words affects the swaras.

The Samhita Paatha and Pada Paatha are called Prakriti (or natural) Paatha, as the words of the mantra occur in normal sequence. The rest are called Vikriti (or artificial or not natural). In Krama, although the words do not occur in the natural order of one, two and three, since they do not revert like one after two and two after three, it cannot be called fully Vikriti or artificial. The Vikritis are eight in number.

Jataa Maalaa sikha sekha dhwajo dando Ratho ghanah.
Ityashta vikrtayah proktah kramapoorvaa maharshibhih.

The above system of complicated recitations was devised in very early times in order to preserve the purity of the word, sound, intonation, pronunciation, accent and sound combinations of the Vedas. By repeating the words in manifold ways, the correct tally of words also was kept which has naturally ensured its purity. To enable the scholars to take up the difficult methods of recitation, it was even laid down that the more difficult methods of chanting earned the chanter more punya or merit.

Since the ancients had taken so much pains to keep the form of the Veda mantras safe and pure the method of the modern researchers to measure in terms of time the changes in the sound of Veda mantras is unrealistic and cannot help to understand the truth.

God’s Words

It is not correct to dispute that the Vedas are a revelation. Not only in our country but hose belonging to other religions also do believe that their sacred texts are but a revelation. Jesus said that his preaching were not his own, but those of God which he only propagated. Mohammedans say that Mohammed merely preached the instructions of Allah which were revealed to him.

Ore theory of revelation is repeated by them too as “Revealed Texts”. God’s words have become available to us through saints. Thus in all religions, God’s words have been revealed to great seers, prophets and Rishis who have made them available to mankind for its betterment.

A person who delves deep, with a single-minded purpose, into any field, is bound to discover the truth. This is called the flash of understanding or intuition. It is said that Einstein did not arrive at the theory of relativity by any thought process but that the equation flashed through his mind. If we can accept this as a fact certainly the fact that the Rishis with highly developed and disciplined minds and spirituality attuned became conscious of the mantras deep down in their hearts cannot be disputed and has to be accepted as correct.

जप की त्रुटिरहित विधियाँ

हमारे पूर्वजों ने वेदों में छोटी सी भी त्रुटि को रोकने के लिए, लेखन का सहारा लिए बिना ही, अनेक उपाय ईजाद कर लिए थे । वैदिक मंत्रों का पूर्ण लाभ तभी प्राप्त हो सकता है जब किसी शब्द में कोई परिवर्तन न किया जाए; पाठ के दौरान स्वर में कोई अनाधिकृत ऊपर या नीचे की ओर बहाव न हो । इसीलिए अनेक सुरक्षा उपाय किए गए हैं ।

प्रत्येक शब्द के उच्चारण में कितना समय लगना चाहिए, यह मात्राओं (एक लघु स्वर के उच्चारण में लगने वाला समय) के माध्यम से दर्शाया जाता है । शुद्ध शब्द-ध्वनि को जन्म देने के लिए शरीर के किस भाग में कंपन उत्पन्न हो, इसके लिए श्वास को कैसे नियंत्रित किया जाए, यह भी वेदांग में बताया गया है, जिसे शिक्षा कहते हैं:

शीक्षां व्याख्यास्यामः । वर्णस्वरः । मात्राबलं । सामसन्तानः ।

शिक्षा में वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम और संतानः का वर्णन है ।

एक अचूक विधि यह है कि प्रत्येक मंत्र का जाप विभिन्न पैटर्न और संयोजनों में किया जाए, जिन्हें वाक्य, पाद, क्रम, जटा, माला, शिखा, रेखा, ध्वजा, दंड, रथ, घन आदि कहा जाता है ।

कुछ विद्वान पंडितों को “घनपति” कहा जाता है । इसका अर्थ है कि वे वेदों के ज्ञाता होते हैं और घन नामक पैटर्न में वेदों का जाप करते हैं । जब हम किसी घनपति को घन रूप में वेदों का पाठ करते हुए सुनते हैं, तो हम देखते हैं कि वह शब्दों को विभिन्न तरीकों से आगे-पीछे और अलग-अलग पैटर्न में दोहराता है । यह कानों को सुखद लगता है और मन में प्रसन्नता का भाव उत्पन्न करता है । ऐसा प्रतीत होता है कि वेद मंत्रों की स्वाभाविक महिमा और भी बढ़ गई है । क्रमम्, जटा, शिखा, माला आदि अन्य निर्धारित पैटर्न में पाठ का प्रभाव भी ऐसा ही होगा । लेकिन इनके जाप का मुख्य उद्देश्य शब्दों के मूल अर्थ और ध्वनि पैटर्न में कोई गलती न करना है ।

वाक्य पाठ या संहित पाठ में मंत्रों का सीधा उच्चारण किया जाता है । जब मंत्र वाक्यों में आते हैं, तो उनके कुछ शब्दों को जप में संयोजित करना पड़ता है । वेद मंत्रों का पाठ, शब्दों को जोड़कर उन्हें एक सूत्र में पिरोने के बजाय, पद-दर-पद या शब्द-दर-शब्द करना, पद पाठ कहलाता है ।

पद पाठ, संहिता पाठ के बाद आता है । पद पाठ में वाक्य को ‘शब्दों’ या पदों में विभाजित किया जाता है । इससे वेदों के विद्यार्थी को वाक्य के प्रत्येक शब्द का ज्ञान होता है । इसके बाद क्रम पाठ आता है । इस विधि में, मंत्र के पहले शब्द को दूसरे में, दूसरे को तीसरे में, तीसरे को चौथे में और इसी प्रकार तब तक जोड़ा जाता है जब तक कि मंत्र का पूरा वाक्य पूरा न हो जाए । यह पाठ या पाठ विधि विद्यार्थी को न केवल अलग-अलग शब्दों को समझने में मदद करती है, बल्कि यह भी समझने में मदद करती है कि पाठ में दो शब्दों को कैसे जोड़ा जा सकता है और ऐसे संयोजन में स्वर में क्या परिवर्तन होता है ।

कुछ प्राचीन शिलालेखों, विशेषकर दानपत्रों में, कुछ विख्यात व्यक्तियों के नामों के अंत में ‘क्रमवित्’ प्रत्यय लगा होता था । ‘वेदवित्’ की तरह, ‘क्रमवित्’ का अर्थ है कि कोई व्यक्ति क्रमपाठ विधि से वेदों का पाठ करने में पारंगत है । दक्षिण भारत में ऐसे कई शिलालेख मिलते हैं ।

इसके बाद आता है जटा पाठ । इसमें, पहले और दूसरे शब्द का एक साथ पाठ किया जाता है और फिर शब्दों को उल्टे क्रम में और फिर मूल क्रम में पढ़ा जाता है । जहाँ क्रम पाठ में शब्दों का क्रम १-२; २-३; ३-४; ४-५ इत्यादि होता है, वहीं जटा पाठ में यह क्रम १-२-२-१-१-२, २-३-३-२-२-३, ३-४-४-३-३-४, ४-५-५-४-४-५ इत्यादि होगा । जिस प्रकार जटा पाठ में दो शब्दों को आगे-पीछे दोहराया जाता है, उसी प्रकार शिखा पाठ में तीन शब्दों को इस प्रकार जोड़ा जाना आवश्यक है ।

घन पाठ उपरोक्त पाठ से अधिक कठिन है । इसके पाँच और प्रकार हैं । ये सभी जप के विभिन्न तरीके हैं, जिनमें शब्दों के क्रम को विभिन्न क्रमपरिवर्तनों और संयोजनों द्वारा परिवर्तित किया जाता है ।

घन रूप में शब्दों का संयोजन १-२-२-१-१-२-३-३-२-१-१-२-३; २-३-३-२-२-३-४-४-३-२-२-३-४ इत्यादि होगा।

जिस प्रकार प्रयोगशाला में जीवनदायी अमृत को अत्यंत सावधानी से संरक्षित किया जाता है, उसी प्रकार वेद मंत्र, जो सर्वहित के लिए हैं, पूर्वजों द्वारा बिना किसी क्षरण या हनन के और बिना किसी लेखन विधि का सहारा लिए, इस प्रकार के पाठ द्वारा संरक्षित किए गए हैं । यह याद रखना चाहिए कि शब्दों को आगे-पीछे करते समय, प्रत्येक स्वर का उचित रूप से संरक्षण करना आवश्यक है और विद्यार्थी सीखता है कि शब्दों का संयोजन स्वरों को कैसे प्रभावित करता है ।

संहिता पाठ और पाद पाठ को प्रकृति पाठ कहा जाता है, क्योंकि मंत्र के शब्द सामान्य क्रम में आते हैं । शेष को विकृति (कृत्रिम या अप्राकृत) कहा जाता है । क्रम में, यद्यपि शब्द एक, दो और तीन के स्वाभाविक क्रम में नहीं आते, क्योंकि वे दो के बाद एक और तीन के बाद दो की तरह नहीं आते, इसलिए इसे पूर्णतः विकृति या कृत्रिम नहीं कहा जा सकता । विकृतियाँ आठ हैं ।

जटा माला शिखा रेखा ध्वजो दण्डो रथो घनः
इत्यष्टा विकृतयः प्रोक्ताः क्रमपूर्वा महर्षिभिः

वेदों के शब्द, ध्वनि, स्वर, आवाज का उतार-चढाव, उच्चारण और ध्वनि संयोजन की शुद्धता को बनाए रखने के लिए जटिल पाठ की उपरोक्त प्रणाली बहुत प्राचीन काल में तैयार की गई थी । शब्दों को अनेक तरीकों से दोहराने से शब्दों की सही संख्या भी बनी रहती थी जिससे स्वाभाविक रूप से उनकी शुद्धता सुनिश्चित होती थी । विद्वानों को पाठ की कठिन विधियों को अपनाने में सक्षम बनाने के लिए, यह भी निर्धारित किया गया था कि जप की अधिक कठिन विधियों से जपकर्ता को अधिक पुण्य प्राप्त होता था ।

चूँकि पूर्वजों ने वेद मंत्रों के स्वरूप को सुरक्षित और शुद्ध बनाए रखने के लिए बहुत प्रयास किए थे, इसलिए आधुनिक शोधकर्ताओं द्वारा वेद मंत्रों की ध्वनि में परिवर्तन को समय के अनुसार मापने की विधि अवास्तविक है और सत्य को समझने में सहायक नहीं हो सकती ।

ईश्वर के वचन

इस बात पर विवाद करना उचित नहीं है कि वेद एक रहस्योद्घाटन है । न केवल हमारे देश में, बल्कि अन्य धर्मों के लोग भी मानते हैं कि उनके पवित्र ग्रंथ एक रहस्योद्घाटन मात्र हैं । ईसा मसीह ने कहा था कि उनके उपदेश उनके अपने नहीं थे, बल्कि ईश्वर के थे जिनका उन्होंने केवल प्रचार किया था । मुसलमान कहते हैं कि मोहम्मद ने केवल अल्लाह के निर्देशों का प्रचार किया जो उन पर प्रकट हुए थे ।

रहस्योद्घाटन के हमारे सिद्धांत को वे लोग भी “प्रकट ग्रंथों” के रूप में दोहराते हैं । ईश्वर के वचन हमें संतों के माध्यम से उपलब्ध हुए हैं । इस प्रकार सभी धर्मों में, ईश्वर के वचन महान ऋषियों, पैगम्बरों और ऋषियों को प्रकट हुए हैं जिन्होंने उन्हें मानवजाति के कल्याण के लिए उपलब्ध कराया है ।

जो व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में, एकनिष्ठ उद्देश्य के साथ, गहराई से खोज करता है, उसे सत्य की खोज अवश्य होती है । इसे समझ या अंतर्ज्ञान की चमक (कौंध) कहा जाता है । ऐसा कहा जाता है कि आइंस्टीन सापेक्षता के सिद्धांत पर किसी विचार प्रक्रिया से नहीं पहुँचे थे, बल्कि यह समीकरण उनके मन में कौंध (चमक) गया था । यदि हम इसे एक तथ्य के रूप में स्वीकार कर सकते हैं, तो निश्चित रूप से यह तथ्य कि अत्यधिक विकसित और अनुशासित मस्तिष्क और आध्यात्मिकता से युक्त ऋषिगण अपने हृदय की गहराई में मंत्रों के प्रति सचेत हो गए थे, इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता और इसे सही मानना ​​ही होगा ।

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