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मोन पड़ैए गामक टिकुला केर चटनी

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लेख विचार
प्रेषित: आभा झा अद्विका
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- आमक मास, आ हमर गाम: एकटा मधुर संस्मरण

मिथिलाक माटि आ आमक अटूट संबंध छैक। जखन बैसाखक रौद चहचहाय लागैत अछि आ जेठक पछुआ बहैत अछि, तखन मोन अनायास गामक ओही अमराही (आमक बगैचा) दिस खिंचायल जाइत अछि। हमरा लेल ‘आमक मास’ केवल एकटा ऋतु नहि, बल्कि नेनपनक ओ अनमोल पोथी अछि जकर हर पन्ना रस आ गंध सँ भरल अछि।

गामक ओ अमराही आ नेनपनक उमंग –
नेनपनक ओ दिन मोन पड़ैत अछि तँ आँखि आगाँ गामक दृश्य नाचै लागैत अछि। वैशाखक दुपहरी, जखन घरक बुजुर्ग सुतैक तैयारी करैत छलाह, तखन हम सब छौड़ा-छौड़ीक टोली बिना जुत्ता-चप्पलक ‘मझिहिया’ रौद में बगैचा दिस प्रस्थान करैत छलहुँ।

ओहि समयक मुख्य आकर्षण छल ‘टिकोला’ चुनब। पछुआ हवाक झोंका सँ जखन आमक गाछ डोलैत छल, तँ ‘धप-धप’ क आवाज होइतहि हम सब दौड़ि कए ओहि ठाम पहुँचैत छलहुँ। केकर हाथ में पहिने ‘बम्बई’ वा ‘मालदह’ पड़त, एकर होड़ लागल रहैत छल। कखनो-कखनो तँ हवाक झोंका सँ पहिने पाथर मारि कए आम तोड़बाक आनंद किछु आर छल।

अँधर-बिहारिक ओ रोमांच –
आमक मास में ‘बिहारि (तूफान) एकटा उत्सव जकाँ होइत छल। आकाश करिया होइतहि गामक बच्चा-बुढ़ सब बगैचा दिस दौड़ैत छलाह। धूर उड़ैत हवा, कड़कइत बिजली, आ झमझम बरसैत पानि में भिजैत आम चुनब कोनो युद्ध जीतय सँ कम नहि छल। झोरा भरि-भरि कए आमक टिकोला आ टपका ल कए जखन घर पहुँचैत छलहुँ, तँ मायक गारि में सेहो एकटा अजब ममता लुकायल रहैत छल।

मिथिलाक ‘आम संस्कृति’ –
आमक मास में गामक ड्योढ़ी पर केवल आमक चर्चा होइत अछि। ककर गाछ मे बेसी ‘मज्जर’ लागल, ककर ‘जर्दा’ क फल नीक भेल, ई सब मुख्य विषय रहैत छल।

अचारक तैयारी: घरक आँगने-आँगन ‘अचार’ बनय क प्रक्रिया चलैत छल। आम काटब, ओकरा रौद मे सुखाएब, आ फेर मसालाक गंध सँ पूरा टोल महकय लगैत छल।

अमटक मिठास: आमक रस कए कपड़ा पर सुखा कए बनाओल गेल ‘अमट’ (अमावट) जाड़ भरि लेल संचय कएल जाइत छल।

पाकल आमक भोज: साँझ खन दलान पर दूध-चूड़ा आ आमक भोज मिथिलाक पारम्परिक ‘डिनर’ छलैक।

मालदह आ बम्बई क महिमा –
यद्यपि मिथिला में आमक अनेक प्रजाति छैक, मुदा मालदह (फजली) क जे स्वाद छैक, ओ संसारक कोनो फल मे नहि। ओकर ओ केसरिया रँग, ओकर महक आ ओकर मिठास—एकटा अलग तृप्ति दैत अछि। ओहिना बम्बई आम अपन खास खुशबू लेल जानल जाइत अछि। नेनपन मे हमरा सब लेल ‘बीजू’ आम (जे गुठली सँ उपजैत अछि) सेहो कोनो पकवान सँ कम नहि छल।

आइ जखन हम सब शहरक कंक्रीट वाला जंगल में छी, तखन गामक ओ आमक गाछ, ओ ठंढा छाँह, आ ओ ‘बगैचा’ बहुत मोन पड़ैत अछि। एतय बाजार में आम तँ बहुत अछि, मुदा ओहि में नहि तँ गामक माटिक गंध छैक आ नहि ओ अपनापन।

“गामक आम केवल एकटा फल नहि, बल्कि हमर पूर्वजक आशीर्वाद अछि जे पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमरा सबहक जीवन मे मिठास घोलैत आबि रहल अछि।”

नेनपनक ओ दिन आब नहि फिरत, मुदा जखन-जखन वैशाख-जेठ मे पछुआ बहैत अछि, मोन ओहि पुरान अमराही मे ‘टिकोला’ खोजय लेल व्याकुल भ’ जाइत अछि। आमक ओ मास हमरा लेल संस्मरणक एकटा अमिट खजाना अछि। जय मिथिला, जय मैथिली।

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