Search

पावैन तिहारक प्राणशक्ति छथि “मिथिलाक स्त्रीगण

522 भ्यूज

लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- पावैन तिहारक प्राणशक्ति “मिथिलाक स्त्रीगण”

मिथिला भूमि केवल विद्या, संस्कृति आऽ मर्यादाक धरती नहि, अपितु लोकजीवनक मधुर परम्पराक अमर आँगन सेहो अछि। एतयक पावैनतिहार सभ मात्र तिथि-गणनाक अनुष्ठान नहि, बल्कि जनमानसक हृदयधड़कन अछि। एहि समस्त उत्सवक आत्मा यदि केओ छथि, तँ ओ छथि मिथिलाक स्त्रीगण। घरक दुरखुर सँ लऽ कऽ कुल-परिवार, समाज आऽ संस्कृतिक आधार धरि, स्त्रीगण अपन श्रद्धा, श्रम, स्नेह आऽ समर्पण सँ प्रत्येक पावैन केँ जीवन्त बनबैत छथि।
मिथिलामे जतेक पावैनतिहार अछि जुड़शीतल, छठि, सामा-चकेबा, हरितालिका, जीवित्पुत्रिका, कोजगरा, मधुश्रावणी, वटसावित्री, दुर्गापूजा एहि सभमे स्त्रीगणक भूमिका केन्द्रस्थ अछि। हुनकर बिना उत्सव केवल औपचारिकता बनि जाएत।
भोरक पहिल किरण सँ पहिने जागि, आँगन नीपब, अरिपन सजायब, नेम-नियमक सामग्री जुटायब, गीत गाबय, उपवास राखय, परिवारक मंगलकामना करय ई सब स्त्रीगणक नित्य तपस्या अछि। हुनकर हाथक स्पर्शे घर मंदिर बनि जाइत अछि।
मिथिलाक पावैन – तिहारक सबसँ मधुर पक्ष अछि लोकगीत। सामा-चकेबाक गीत होइ, मधुश्रावणीक मंगल धुनि, कोजगराक रात्रि-गीत वा छठिक लोकभजन एहि सभक असली संरक्षिका मिथिलाक स्त्रीगण छथि।
मातृक कंठ सँ निकसल गीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी संस्कारक रूपमे बहैत रहल अछि। जतेक ग्रन्थ नहि सिखा सकैत, ओतेक एकटा लोकगीत सिखा दैत अछि प्रेम, संयम, श्रद्धा आऽ परिवारक महत्ता।
पावैन – तिहारमे स्त्रीगणक उपवास केवल धार्मिक विधान नहि, बल्कि आत्मबलक परिचायक अछि। जीवित्पुत्रिकामे सन्तान लेल निराहार रहब, हरितालिकामे अखण्ड सौभाग्य लेल तप करब, छठिमे परिवारक आरोग्य लेल कठिन व्रत करब ई त्यागक उच्चतम उदाहरण अछि। नारीक ई मौन साधना समाज केँ बतबैत अछि जे प्रेम केवल शब्द नहि, बल्कि तपस्या अछि।
पावैन तिहारक अवसर पर स्त्रीगण एक-दोसर घर जाए छथि, नेग-आचार निभबैत छथि, बेटी-पुतोहु सभ केँ स्नेह दैत छथि, सम्बन्धक टूटल डोरि जोड़ैत छथि। एहि प्रकारेँ ओ समाजमे समरसता, अपनत्व आऽ सौहार्दक दीप जरबैत छथि।
मिथिलाक पावैनतिहार यदि पुष्प अछि, तँ स्त्रीगण ओकर सुगन्ध छथि। यदि उत्सव दीप अछि, तँ नारी ओकर ज्योति छथि। हुनकर श्रम, श्रद्धा, लोकज्ञान आऽ प्रेम सँ मिथिलाक संस्कृति अद्यापि जीवित आऽ आलोकित अछि।
अतः ई कहब अतिशयोक्ति नहि हएत जे मिथिलाक पावैन – तिहारक वास्तविक आधारशिला स्त्रीगण छथि। हुनकर सम्मान, सहभागिता आऽ गरिमा सँ संस्कृति सुरक्षित रहत, समाज समृद्ध बनत, आऽ मिथिलाक लोक परम्परा चिरकाल धरि सुगन्धित भेल पसरैत रहत।

Related Articles