वेदांगः कल्प – वेदक हाथ
वेदपुरुषक छठम् अंग ‘कल्प’ अछि, जेकरा हुनकर भुजा (हाथ) कहल जाइछ । ‘कल्प’ वैदिक कर्म करबाक लेल प्रेरित करैछ । शिक्षा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त आ ज्योतिष सिखलाक बाद लोक केँ कि करबाक चाही ? फल प्राप्त करबाक लेल किछु न किछु अवश्य करबाक चाही । हमरा सब केँ अपना मोन मे आयल (सोच-विचार अनुसार) कयल कर्मक परिणामस्वरूप जे किछु पाप भेल तेकरा साफ करबाक (धोबाक) लेल गोटेक नीक कर्म करबाक चाही । एना करबाक लेल, हमरा सभक पास एकटा मंत्र, ओकर सही उच्चारण तथा अर्थ बुझबाक चाही । कर्म करबाक लेल, हमरा सभक पास आवश्यक भौतिक साधन हेबाक चाही । एहि काज सब केँ करबाक लेल हमरा सभक पास एकटा घर या स्थान हेबाक चाही । फेर एहि कर्म सभक फल ईश्वर केँ समर्पित करबाक चाही । कल्प एहि सब मामिला सँ सम्बन्धित अछि । लोक केँ वेदक निष्ठापूर्वक पाठ करबाक चाही । शिक्षाक माध्यम सँ ओकर शब्द सब केँ त्रुटिरहित रूप सँ सिखबाक चाही । व्याकरण सिखबाक चाही । छन्द आ निरुक्त केर माध्यम सँ नपल-तुलल (सही-सही) पाठ करब तथा अर्थ केँ बुझबाक चाही । ज्योतिष केर सहायता सँ अनुष्ठान करबाक उचित समय निर्धारित करबाक चाही । ई सबटा केवल कल्प मे वर्णित कार्य सब केँ करबाक लेल अछि । कल्प निम्नलिखित विषय सब सँ सम्बन्धित अछिः (१) कोनो विशेष अनुष्ठान केना कयल जेबाक चाही ? (२) प्रत्येक जाति या वर्ण केर लोक केँ कोन अबस्था मे कोन काज या कर्म करबाक चाही ? (अर्थात ब्रह्मचारी, गृहस्थ या संन्यासी केँ अपना लेल निर्धारित वैदिक कर्म केना करबाक चाही ?); (३) कोन अनुष्ठान मे कोन मंत्र, कोन-कोन सामग्री, कोन देवता शामिल छथि ? (४) कतेक ऋत्विक (या पुजारी) नियुक्त कयल जेबाक चाही ? (५) कोन आकार आ माप केर कोन तरहक पात्र उपयोग मे आनल जेबाक चाही ?
कल्प शास्त्रक संकलन अनेकों ऋषि लोकनि द्वारा कयल गेल अछि । कृष्ण यजुर्वेदक सम्बन्ध मे, जे मुख्यतः दक्षिण भारत मे प्रचलित अछि, छह ऋषि लोकनि, आपस्तम्ब, रोधायन, वैखानस, सत्यशाद, भारद्वाज तथा अग्निवेश द्वारा कल्प सूत्र लखल गेल अछि । ऋग्वेदक लेल आश्वलायन केर कल्प सर्वाधिक प्रचलित अछि । संगायन केर सेहो एकटा कल्प अछि । कात्यायन द्वारा शुक्ल यजुर्वेदक लेल एकटा सूत्र केर रचना कयल गेल अछि । सामवेद मे, कौतुक शाखाक लेल लाट्यायन, राणायनीय शाखाक लेल द्राह्यायन आर तलवकार शाखाक लेल जैमिनी द्वारा कल्प सूत्र रचल गेल अछि । प्रत्येक शाखा मे, कल्प केर लेल दुइ प्रकारक सूत्र अछि जेकरा ‘गृह्य सूत्र’ आ ‘श्रौत सूत्र’ कहल जाइत छैक । ई दुनू सूत्र गर्भ मे भ्रूण निर्माण सँ लय केँ शरीरक दाह संस्कार धरि कयल जायवला चालीस कर्म या वैदिक अनुष्ठान सभक विवरण दैत अछि । दाह संस्कार सेहो होम या यज्ञ मे सँ एक होइछ । एकरा अन्त्येष्टि कहल जाइछ, जेकर अर्थ होइछ अन्तिम संस्कार । एहि मे पूरा शरीर केँ अग्नि मे आहुतिक रूप मे अर्पित कयल जाइछ ।
एकटा ब्राह्मण केँ प्रतिदिन अग्निहोत्र पर आधारित एक्कैस गोट यज्ञ करबाक चाही, अर्थात् सात ‘हविर यज्ञ’, सात ‘सोम यज्ञ’ आर सात ‘भाग यज्ञ’ । एहि मे सँ सात हविर यज्ञ आर सात सोम यज्ञ गृह्य सूत्र मे नहि अबैछ । ई चौदह टा श्रौत सूत्र केर अन्तर्गत अबैत अछि । ई चौदह टा चालीस कर्म या संस्कार मे शामिल अछि । (संस्कार ओ अछि जे शुद्ध करैत अछि ।)
अग्निहोत्र घरहि पर टा कयल जेबाक चाही । यज्ञ खुला मैदान मे बनल एक छत्र केर नीचाँ कयल जाइछ । श्रौत सूत्र प्रमुख यज्ञ सभक वर्णन करैत अछि । गृह्य सूत्र घर पर कयल जायवला घरेलू अनुष्ठान सभक वर्णन करैत अछि ।
कल्प सूत्र चालीस गोट संस्कार सभक तथा आठ गोट आत्मगुण सभक विवरण दैत अछि । चौदह हविर-सोम यज्ञ केँ छोड़िकय, शेष छब्बीस टाक उल्लेख गृह्य सूत्र मे कयल गेल अछि । ई गर्भाधान, पुंसवन, सीमंत, जातकर्म (जन्म संस्कार), नामकरण, अन्नप्राशन, चौला, उपनयन, विवाह, अन्त्येष्टि आदि थिक । एकरा बारे मे बाद मे आर अधिक जानकारी देल जायत ।
आठ टा आत्मगुण अछि: (१) दया, (२) क्षमा, (३) अनसूया, (असूया, क्रोध एवं ईर्ष्या केर अभाव), (४) शौच, (५) हठ केर अभाव, (६) मधुर स्वभाव, (७) लोभ केर अभाव तथा (८) इच्छा केर अभाव । एकरा ‘सामन्य धर्म’ या आदेश कहल जाइत छैक जे कोनो जातिक सब पुरुष पर लागू होइत अछि ।
जखन हम सब अभिवादन (पैघ केँ प्रणाम) करैत छी, त हम सब घोषणा करैत छी जे हम कोन सूत्रक पालन कय रहल छी । ई केवल श्रौत सूत्र केँ सन्दर्भित करैत अछि । उदाहरणक लेल, सामवेदी लोकनिक कहब छन्हि जे ओ सब द्रौतयान सूत्र केर पालन करैत छथि । द्रौतयान केवल श्रौत सूत्र केर रचनाक अछि । गोबिल नामक एकटा अन्य वेदज्ञ गृह्य सूत्र केर रचना कयलनि अछि । लेकिन, प्राचीन काल मे, चूँकि वैदिक अनुष्ठान निष्ठापूर्वक आर उत्साहपूर्वक कयल जाइत छल, तेँ श्रौत सूत्र केँ अपन सूत्र कहल जाय लागल, जेकर प्रचलन आइ धरि जारी अछि । जे लोक परवर्ती युग केर छथि, ओ सब आब कोनो पैघ श्रौत संस्कार नहि करैछ, बल्कि केवल विवाह जेहेन किछु गृह्य कर्म टा करैत अछि । गृह्य कर्म सभक श्रौत कर्म सब सँ कम महत्वपूर्ण मानल जाइत छल, लेकिन आब ओ बेसी महत्वपूर्ण भ’ गेल अछि ।
प्राचीन काल मे, गरीबो लोक सब आवश्यकता पड़ला पर भिक्षो मांगिकय श्रौत कर्म करैत छल । प्राचीन काल मे, किछु लोक ‘प्रतिवसंत-सोमयाजी’ कहाइत छल, यानि ओ जे प्रत्येक बसन्त मे सोम याग करैत छल । यदि कोनो व्यक्तिक वार्षिक आय तीन वर्ष धरि चलबा लायक हो, त ओ प्रत्येक बसन्त मे सोम याग करैत छल ।
आब ई सब बदलि गेल अछि । आइ, धनिको लोक सभक पास मे एक वर्षक आय विरूद्ध तीन वर्षक खर्चाक भार रहैत छैक । आधुनिक समाज केर आर्थिक स्थिति व्यापारी सहित सभक लेल गरीबी आर दुःख आनि देने अछि । हमरा सब केँ हरेक मामिला मे संयम बरतबाक चाही । अति सँ सदिखन बचबाक चाही । आधुनिक प्रबन्धन केर सारा चतुराइ हमरा लोकनि केँ निरन्तर अभावे दिश लय गेल अछि । एकटा धनी व्यक्ति केर सेहो अत्यधिक व्यय होइत छैक । एहि सब व्यक्तिगत व्यय केँ नियंत्रित कयल जा सकैछ आर संसाधन सब केँ नीक काजक लेल लगायल जेबाक चाही ।
यज्ञ सभक संचालन मे ‘चयन’ नामक एकटा क्रिया होइत अछि । कल्प मे एहि सँ सम्बन्धित एकटा अलग भाग अछि जेकरा ‘सुल्प सूत्र’ कहल जाइत छैक । सुल्प सूत्र दुइ तरहक होइत अछि । सामान्य आ विशेष । कात्यायन, बोधायन तथा हिरण्यकेश द्वारा सुल्प सूत्र केर रचना कयल गेल अछि । श्रौत ओ थिक जे श्रुति – वेद मे अबैत अछि । ई श्रौत कर्म पैघ अनुष्ठान थिक जेकरा विस्तृत रूप सँ कयल जेबाक चाही । ई अस्थायी रूप सँ बनायल गेल शेड केर नीचाँ पैघ खुल्ला स्थान सब मे करबाक होइत छैक । ई घरक अन्दर सम्भव नहि अछि । तेँ घर पर कयल जायवला छोट-मोट अनुष्ठान सब केँ गृह्य कर्म कहल जाय लागल अछि । आइ-काल्हि, यज्ञ बहुत कम कयल जाइत छैक । लेकिन किछु गृह्य कर्म एखनहुँ धरि कयल जा रहल अछि ।
हमरा सभक सम्पूर्ण शास्त्र केर उद्देश्य ईश्वर केर प्राप्ति अछि । जेहो किछु लिखल या पढ़ल जाय से ईश्वर केँ समर्पित हेबाक चाही तथा आध्यात्मिक कल्याणकारी हेबाक चाही । अपन सभक समस्त शास्त्र एहि उद्देश्य सँ (स्थापित भेल) अछि । ई अत्यन्त दुःखक बात थिक जे श्रौत कर्म (हविर सोम यज्ञ करबाक वैदिक आदेश), जे कि वेद सभक सार थिक, आइ-काल्हि अधिकाधिक पाछाँ दिश ठेलल जा रहल अछि । (अर्थात् एकरा नकारल आ छोड़ल जा रहल अछि ।)
कल्प सूत्रक रचयिता आपस्तम्ब, बोधायन आर कात्यायन श्रौत सूत्र तथा गृह्य सूत्र दुनू केर रचना कयलनि अछि । एकर अलावे, धर्म सूत्र नामक किछु बात सेहो अछि । ई लोकक लेल एकटा मनुष्यक रूप मे, एकटा परिवारक सदस्यक रूप मे आर समाज मे आचरण केर नियम सब निर्धारित करैत अछि । एहि सँ बादक दिन मे ‘धर्मशास्त्र’ केर विकास भेल अछि ।
अथर्ववेद आब बेसी प्रचलन मे नहि अछि आर एकर कल्प सूत्र आसानी सँ उपलब्ध नहि अछि ।
कल्प हमरा लोकनि केँ प्रत्येक कार्य केर शिक्षा दैत अछि, चाहे ओ कतबो छोट कियैक न हो । आर एकटा ब्राह्मण जेहो काज करैत छथि, चाहे ओ कतबो छोट कियैक न हो, ओ वेद सँ जुड़ल रहैत अछि । तखनहिं तँ ओ हरेक बेर जखन साँस लैत छथि तथा अपन हरेक कदम पर हमरा सभक सहायताक लेल दैवीय शक्ति सब प्रदान कय पबैत छथि । तेँ ई एकटा आदेशक रूप मे निर्धारित कयल गेल अछि जे हुनका सब केँ केना बैसबाक चाही, केना खेबाक चाही आर केना कपड़ा पहिरबाक चाही । उदाहरणक लेल, कल्प शास्त्र इहो बतबैत अछि जे घर केना बनायल जेबाक चाही । एहि मे गृह निर्माण (घर केर योजना), वास्तु लक्षण (प्रयोग कयल जायवला सामग्रीक विवरण), इत्यादिक वर्णन कयल गेल अछि । एकरा एहि द्वारे निर्धारित कयल गेल छैक जाहि सँ कि घरक वास्तुकला दुनिया केर लाभ वास्ते दिव्य शक्ति सभक उपयोग करबाक ओकर काज मे ओकर मदति करय । वैश्व देव बलि केँ घरक एकटा निश्चित निर्दिष्ट द्वारहि टा पर कयल जेबाक चाही । ई एकटा आधुनिक फ्लैट मे नहि कयल जा सकैछ । वैदिक आदेश सभक अनुष्ठान या अभ्यास मे मदति करबाके लेल कल्प सूत्र मे घरक डिजाइन केर उल्लेख कयल गेल अछि । उपासना स्थल (ओ स्थान जेतय होम केर लेल अग्नि प्रज्वलित हेबाक अछि) केँ एकर सही प्रदर्शन लेल एकटा विशेष डिजाइन केर होयब आवश्यक अछि । एकर विनिर्देश शास्त्र सब मे देल गेल अछि । यदि ई निर्दिष्ट आकार (लेआउट) केर अनुसार नहि अछि, तखन अनुष्ठान करब मुश्किल होयत । जेना एकटा स्कूल मे कक्षा, बेंच, टेबल आदि, सबटा शिक्षा प्रदान करय मे मदति करबाक लेल पूर्व नियोजित होइत अछि (यानि क्रमबद्ध अपन-अपन स्थानपर मिलाकय-सजाकय राखल रहैछ), सामान्य जीवन मे सेहो हम सब देखैत छी जे स्कूलक प्रयोगशाला, जेतय प्रयोग सब कयल जाइछ, तेकर ले-आउट आर फ़र्नीचर स्कूल केर बाकी हिस्सा जेतय छात्र सब व्याख्यान सुनैत अछि ताहि सँ अलग रहैत छैक ।
हमरा सब केँ अपन घर अपन शिल्प शास्त्र अनुसार डिज़ाइन करबाक चाही । सूत्र सभक लेखक लोकनि गृहस्थ लेल एकटा विशेष डिज़ाइन टा मे घर बनेनाय अनिवार्य कयलनि अछि । ई निश्चित रूप सँ केवल वैह लोक पर बाध्यकारी होयत जे वैदिक जीवन शैली केर पालन करय चाहैत अछि । लेकिन अगर हम कोनो अलग सभ्यता या जीवनशैलीवला कोनो आन व्यक्तिक योजना अनुसार बनायल घर मे रहैत छी, त हम सब देखैत छी जे घरक योजना अनुष्ठान सभक संचालन मे बाधा दैत अछि । हम सब ई कहिकय शुरू करैत छी जे ई घर किछु अनुष्ठान सभक प्रदर्शन लेल अनुकूल नहि अछि आर समयक संग हमरा सभक संकल्प कमजोर भ’ जाइत अछि तथा विश्वास सेहो डगमगा जाइत अछि । हम सब अपन जीवनशैली बदलि दैत छी कियैक तँ घर बदलनाय मुश्किल लगैत अछि ।
शिक्षा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष तथा कल्प, ई छह गोट शास्त्र अछि आर चारि टा वेदक संग, एखन धरि हमरा लोकनि चौदह विद्या मे सँ दस टाक बारे मे जानि चुकलहुँ । आउ, शेष चारि टा पर एक नजरि दी ।
हरिः हरः!!
THE VEDANGAS
KALPA – The Arm of the Vedas
The sixth organ of the Veda Purusha is ‘Kalpa, which is called his arm. ‘Kalpa’ is what induces one to Vedic action. T What does one have to do after having learnt Siksha, Vyaakarana, Chandas, Nirukta and Jyotisha? One must do something to achieve results. We must do some good deeds to wash off the sins which had occurred as a result of doing what came to our mind. To do this, we must have a mantra, its correct pronunciation and meaning. To do the karma, we must have the necessary material aids. We must have a house or place to do these things. Then the result of these actions should be dedicated to God. Kalpa deals with all such matters. One has to recite the Vedas faithfully. The words therein have to be learnt faultlessly through Siksha. The grammar or Vyaakarana should be learnt. The metre and meaning should be known through Chandas and Nirukta and the proper time to perform the rituals should be determined with the help of Jyotisha. All these are only to do the jobs mentioned in Kalpa. Kalpa deals with matters such as (1) how should a particular ritual be done? (2) what functions or Karma should be performed by man of each caste or varna in which state or Aasrama? (ie. brahmachaari, householder or sanyaasi); (3) which ritual involves which mantra, which materials, which Devata? (4) how many Ritviks (or priests) should be employed? (5) what vessels of what shape and size should be used?
The Kalpa Saastra has been compiled by a number of Sages. In regard to Krishna Yajur Veda, which is mostly prevalent in Southern India, six rishis or Sages viz., Aapasthamba, Rodhaayana, Vaikhaanasa, Satyaashaada, Bharadwaaja and Agnivesa have written Kalpa Sutras. For the Rig Veda Aaswalayana’s Kalpa is the one mostly in vogue. There is also one by Saangaayana. Katyaayana has authored a Sutra for Sukla Yajur Veda. In Saama Veda, for the Kautuma Saakha, Laatyaayana and for Ranaayaneeya Saakha, Draahyaayana and for the Talavakaara Saakha, Jaimini have done the Kalpa Sutras. In each Saakha, for the Kalpa, there are two kinds of Sutras called the Grihya Sutra and the Srouta Sutra. These two Sutras detail the forty karmas or vedic rituals to be performed from the time the embryo forms in the womb to the time the body is cremated. Cremation is also one of the Homa or sacrificial offerings. It is called the Antiyeshti, meaning the last rite. In this, the entire body is offered as a sacrifice in Agni.
A brahmin must perform twenty-one yajnas everyday based on Agni Hotra, viz., seven Havir Yajnas, seven Soma Yajnas and seven Bhaaga Yajnas. Of these the seven Havir Yajnas and seven Soma Yajnas will not appear in the Grihya Sutra. These fourteen come under the Srouta Sutra. These fourteen are included in the forty karmas or samskaras. (Samskara is that which purifies.)
Agni Hotra is to be done at home. Yajna is done under a canopy erected on open ground. The Srouta Sutra describes the major sacrifices. The Grihya Sutra describes the domestic rites those done at home.
The Kalpa Sutras detail the forty Samskaaras and eight Aatma Gunas. Barring the fourteen Havir-Soma Yajnas, the remaining twenty-six are mentioned in the Grihya Sutra. These are in the nature of conception or Garbhadana, Pumsavana, Seemanta, Jaatakarma (rites on birth), Namakarana (naming ceremony), Annapraasana, Chowla or tonsure, Upanayana or sacred thread investiture, Vivaaha (marriage), Anti Yesthi, etc. More of these later.
The eight Aatma gunas are: (1) daya (दया) or compassion. (2) Kshama (क्षमा) or patience (3) Anasuya (अनसूया) absence of asuya, anger and envy. (1) Soucha (शौच) or cleanliness, (5) absence of obstinacy, (6) sweet nature, (7) lack of greed and (8) absence of desire. These are called ‘Saamaanya Dharma’ or injunctions applicable to all men of whatever caste.
When we do Abhivaadana (obeisance to elders) we declare as to which Sutra we follow. This only refers to the Srouta Sutra. For example the Saama Vedis say they follow the Draahyaayana Sutra. Draahyaayana has authored only Srouta Sutra. Another, by the name of Gobila, has done the Grihya Sutra. But, in the past, since the Vedic rituals were performed faithfully and with gusto, the Srouta Sutra came to be called one’s own Sootra which practice still continues. Those who belong to the later age, do not perform any big Srouta ceremony now but only do some of the Grihya karmas like marriage. The Grihya karmas were to be taken as less important than Srouta karmas but they have now become more important.
In the olden days, even the poor performed the Srouta karmas, by seeking alms if necessary. In the past, there were some who were called ‘Prati Vasanta-Soma-Yaji’ (प्रतिवसंत सोमयाजी) i.e., those who performed the Soma Yaaga every spring. If the annual earning of a person is enough to last for three years, he used to perform the Soma Yaaga every spring.
All this has now changed. Today, even rich men have three years’ expenses lined up against one year’s income. The economic climate of modern society has brought poverty and misery to all, including the traders. We should be moderate in all things. Excesses should always be avoided. All the cleverness of modern management has only led us to the point of perpetual insufficiency. Even a rich man has overwhelming expenses to meet. All these personal expenses can be moderated and resources should be diverted to the performance of good acts.
In the conduct of yajnas, there is a thing called ‘Chayana’ (चयन). Kalpa has a separate portion called Sulpa Sutra dealing with this. Sulpa Sutras are of two kinds. Saamaanya (सामान्य) and Visesha (विशेष). Katyaayana, Bodhaayana and Hiranya Kesa have written Sulpa Sutra. Srouta is what comes in Sruti – the Veda. These Srouta karmas are big rituals to be done elaborately. These have to be done in big open spaces under temporarily erected sheds. They cannot possibly be done inside the confines of a house. That is why the minor rituals which can be performed at home have come to be called Grihya karmas. These days, yajnas are rarely done. But some of the Grihya karmas are still being done.
All our Saastras aim at leading one to Godhead. Whatever is written or read should be dedicated to God and must be productive of spiritual well-being. Our Saastras are all so oriented. It is a matter for great regret that the Srouta Karmas (Vedic injunctions in the performance of Havir Sona Yajnas) which are the very essence of Vedas are being relegated to the background more and more nowadays.
The authors of Kalpa Sutra, viz., Aapasthamba, Bodhaayana and Katyaayana, have done both the Srouta Sutras and Grihva Sutras In addition, there are certain things called Dharma Sutras. These lay down the rules of conduct for a man as an individual, as a member of a family and in society. From these have evolved the Dharma Saastras in later days.
The Atharva Veda is not much in practice now and its Kalpa Sutras are not readily available.
Kalpa teaches us every job, however small it may be. And whatever a brahmin does and however small it may be, it is connected with the Vedas. Only then every time he breathes and with every step he takes can he get us the divine forces to help out. That is why it has been laid down as an injunction, as to how he should sit, how he should eat and how he should wear his clothes. For example, the Kalpa Saastra also lays down how houses are to be built. It describes Griha Nirmaana (Plan of the house), Vaastu Lakshana (description of the materials to be used), etc. The reason why this is laid down is that the architecture of the house should help him in his job of harnessing divine forces for the benefit of the world. The Vaiswa Deva Bali has to be performed only at a certain specified portal of the house. This cannot be done in a modern flat. It is only in order to help the Anushtaana or practice of Vedic injunctions that the design of the home is mentioned in Kalpa Sutra. The Upaasana (place where the Agni is to be lit for Homa), has to have a particular design for its correct performance. Its specifications are laid down in the Saastras. If these are not according to the specified layout, it would be difficult to perform the ritual. Just as in a school the classroom, the benches, tables, etc., are all pre-planned to help in imparting education, so are these plans laid down for the proper performance of the Vedic rituals. Even in ordinary life we see that in a school laboratory, where experiments are conducted, the lay-out and furniture are different from the rest of the school where students listen to lectures.
We should design our homes as per our Silpa Saastra. The writers of Sutras make it obligatory for a grihastha (householder) to build his house only in a particular design. This of course will be binding only on those who wish to follow the Vedic way of life. But if we live in a house built as per the plan of others with a different civilisation or a way of life, we find that the house plan interferes with the conduct of rituals. We start by saying that the house is not congenial to the performance of certain rituals and in course of time our resolves weaken and faith flickers. We change our way of life as it is found difficult to change the house.
Siksha, Vyaakarana, Chandas, Nirukta, Jyotisha and Kalpa are the six Saastras and, together with the four Vedas, we have so far had a glimpse of ten out of the fourteen Vidyas or disciplines. Let us have a look at the remaining four.
Harih Harah!!
(हिन्दी अनुवाद)
वेदांगः कल्प – वेदों की भुजा
वेदपुरुष का छठा अंग ‘कल्प’ है, जिसे उसकी भुजा कहा जाता है । ‘कल्प’ ही वैदिक कर्मों के लिए प्रेरित करता है । शिक्षा, व्याकरण, छंद, निरुक्त और ज्योतिष सीखने के बाद व्यक्ति को क्या करना चाहिए ? फल प्राप्त करने के लिए कुछ न कुछ अवश्य करना चाहिए । हमें अपने मन में आए कर्मों के परिणामस्वरूप हुए पापों को धोने के लिए कुछ अच्छे कर्म करने चाहिए । ऐसा करने के लिए, हमारे पास एक मंत्र, उसका सही उच्चारण और अर्थ होना चाहिए । कर्म करने के लिए, हमारे पास आवश्यक भौतिक साधन होने चाहिए । इन कार्यों को करने के लिए हमारे पास एक घर या स्थान होना चाहिए । फिर इन कर्मों का फल ईश्वर को समर्पित करना चाहिए । कल्प ऐसे सभी मामलों से संबंधित है । व्यक्ति को वेदों का निष्ठापूर्वक पाठ करना चाहिए । शिक्षा के माध्यम से उनके शब्दों को त्रुटिरहित रूप से सीखना चाहिए । व्याकरण सीखना चाहिए । छंद और निरुक्त के माध्यम से नपा-तुला पाठ करना तथा अर्थ को जानना चाहिए और ज्योतिष की सहायता से अनुष्ठान करने का उचित समय निर्धारित करना चाहिए । ये सभी केवल कल्प में वर्णित कार्यों को करने के लिए हैं । कल्प निम्नलिखित विषयों से संबंधित है: (१) कोई विशेष अनुष्ठान कैसे किया जाना चाहिए ? (२) प्रत्येक जाति या वर्ण के व्यक्ति को किस अवस्था या आश्रम में कौन से कार्य या कर्म करने चाहिए ? (अर्थात ब्रह्मचारी, गृहस्थ या संन्यासी); (३) किस अनुष्ठान में कौन सा मंत्र, कौन सी सामग्री, कौन से देवता शामिल हैं ? (४) कितने ऋत्विक (या पुजारी) नियुक्त किए जाने चाहिए ? (५) किस आकार और माप के कौन से पात्र उपयोग में लाए जाने चाहिए ?
कल्प शास्त्र का संकलन अनेक ऋषियों द्वारा किया गया है । कृष्ण यजुर्वेद के संबंध में, जो मुख्यतः दक्षिण भारत में प्रचलित है, छह ऋषियों, आपस्तम्ब, रोधायन, वैखानस, सत्यशाद, भारद्वाज और अग्निवेश ने कल्प सूत्र लिखे हैं । ऋग्वेद के लिए आश्वलायन का कल्प सर्वाधिक प्रचलित है । संगायन का भी एक कल्प है । कात्यायन ने शुक्ल यजुर्वेद के लिए एक सूत्र की रचना की है । सामवेद में, कौतुक शाखा के लिए लाट्यायन, राणायनीय शाखा के लिए द्राह्यायन और तलवकार शाखा के लिए जैमिनी ने कल्प सूत्र रचे हैं । प्रत्येक शाखा में, कल्प के लिए दो प्रकार के सूत्र हैं जिन्हें गृह्य सूत्र और श्रौत सूत्र कहते हैं । ये दोनों सूत्र गर्भ में भ्रूण निर्माण से लेकर शरीर के दाह संस्कार तक किए जाने वाले चालीस कर्मों या वैदिक अनुष्ठानों का विवरण देते हैं । दाह संस्कार भी होम या यज्ञों में से एक है । इसे अंत्येष्टि कहा जाता है, जिसका अर्थ है अंतिम संस्कार । इसमें, पूरे शरीर को अग्नि में आहुति के रूप में अर्पित किया जाता है ।
एक ब्राह्मण को प्रतिदिन अग्निहोत्र पर आधारित इक्कीस यज्ञ करने चाहिए, अर्थात् सात हविर यज्ञ, सात सोम यज्ञ और सात भाग यज्ञ । इनमें से सात हविर यज्ञ और सात सोम यज्ञ गृह्य सूत्र में नहीं आते । ये चौदह श्रौत सूत्र के अंतर्गत आते हैं । ये चौदह चालीस कर्मों या संस्कारों में शामिल हैं । (संस्कार वह है जो शुद्ध करता है ।)
अग्निहोत्र घर पर ही किया जाना चाहिए । यज्ञ खुले मैदान में बने एक छत्र के नीचे किया जाता है । श्रौत सूत्र प्रमुख यज्ञों का वर्णन करता है । गृह्य सूत्र घर पर किए जाने वाले घरेलू अनुष्ठानों का वर्णन करता है ।
कल्प सूत्र चालीस संस्कारों और आठ आत्म गुणों का विवरण देते हैं । चौदह हविर-सोम यज्ञों को छोड़कर, शेष छब्बीस का उल्लेख गृह्य सूत्र में किया गया है । ये गर्भाधान, पुंसवन, सीमंत, जातकर्म (जन्म संस्कार), नामकरण, अन्नप्राशन, चौला, उपनयन, विवाह, अन्त्येष्टि आदि हैं । इनके बारे में बाद में और अधिक जानकारी दी जाएगी ।
आठ आत्म गुण हैं: (१) दया, (२) क्षमा, (३) अनसूया, (असूया, क्रोध और ईर्ष्या का अभाव), (४) शौच, (५) हठ का अभाव, (६) मधुर स्वभाव, (७) लोभ का अभाव और (८) इच्छा का अभाव । इन्हें ‘सामन्य धर्म’ या आदेश कहा जाता है जो किसी भी जाति के सभी पुरुषों पर लागू होते हैं ।
जब हम अभिवादन (बड़ों को प्रणाम) करते हैं, तो हम घोषणा करते हैं कि हम किस सूत्र का पालन कर रहे हैं । यह केवल श्रौत सूत्र को संदर्भित करता है । उदाहरण के लिए, साम वेदियों का कहना है कि वे द्रौतयान सूत्र का पालन करते हैं । द्रौतयान ने केवल श्रौत सूत्र की रचना की है । गोबिल नामक एक अन्य वेदज्ञ ने गृह्य सूत्र की रचना की है । लेकिन, प्राचीन काल में, चूँकि वैदिक अनुष्ठान निष्ठापूर्वक और उत्साहपूर्वक किए जाते थे, इसलिए श्रौत सूत्र को अपना सूत्र कहा जाने लगा, जिसका प्रचलन आज भी जारी है । जो लोग परवर्ती युग के हैं, वे अब कोई बड़ा श्रौत संस्कार नहीं करते, बल्कि केवल विवाह जैसे कुछ गृह्य कर्म ही करते हैं । गृह्य कर्मों को श्रौत कर्मों से कम महत्वपूर्ण माना जाता था, लेकिन अब वे अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं ।
प्राचीन काल में, गरीब लोग भी आवश्यकता पड़ने पर भिक्षा मांगकर श्रौत कर्म करते थे । प्राचीन काल में, कुछ लोग ‘प्रतिवसंत-सोमयाजी’ कहलाते थे, अर्थात वे जो हर बसंत में सोम याग करते थे । यदि किसी व्यक्ति की वार्षिक आय तीन वर्ष तक चलने लायक हो, तो वह हर बसंत में सोम याग करता था ।
अब यह सब बदल गया है । आज, धनी व्यक्तियों के पास भी एक वर्ष की आय के विरुद्ध तीन वर्ष के व्यय का भार होता है । आधुनिक समाज की आर्थिक स्थिति ने व्यापारियों सहित सभी के लिए गरीबी और दुःख ला दिया है । हमें सभी मामलों में संयम बरतना चाहिए । अति से सदैव बचना चाहिए । आधुनिक प्रबंधन की सारी चतुराई हमें निरंतर अभाव की ओर ही ले गई है । एक धनी व्यक्ति के भी अत्यधिक व्यय होते हैं । इन सभी व्यक्तिगत व्ययों को नियंत्रित किया जा सकता है और संसाधनों को अच्छे कार्यों के लिए लगाया जाना चाहिए ।
यज्ञों के संचालन में ‘चयन’ नामक एक क्रिया होती है । कल्प में इससे संबंधित एक अलग भाग है जिसे सुल्प सूत्र कहा जाता है । सुल्प सूत्र दो प्रकार के होते हैं । सामान्य और विशेष । कात्यायन, बोधायन और हिरण्यकेश ने सुल्प सूत्र की रचना की है । श्रौत वह है जो श्रुति – वेद में आता है । ये श्रौत कर्म बड़े अनुष्ठान हैं जिन्हें विस्तृत रूप से किया जाना चाहिए । इन्हें अस्थायी रूप से बनाए गए शेड के नीचे बड़े खुले स्थानों में करना पड़ता है । ये घर के अंदर संभव नहीं हैं । इसीलिए घर पर किए जाने वाले छोटे-मोटे अनुष्ठानों को गृह्य कर्म कहा जाने लगा है । आजकल, यज्ञ बहुत कम किए जाते हैं । लेकिन कुछ गृह्य कर्म अभी भी किए जा रहे हैं ।
हमारे सभी शास्त्रों का उद्देश्य ईश्वर की प्राप्ति है । जो कुछ भी लिखा या पढ़ा जाए वह ईश्वर को समर्पित होना चाहिए और आध्यात्मिक कल्याणकारी होना चाहिए । हमारे सभी शास्त्र इसी उद्देश्य से हैं । यह अत्यंत खेद की बात है कि श्रौत कर्म (हविर सोम यज्ञ करने के वैदिक आदेश), जो वेदों का सार हैं, आजकल अधिकाधिक पीछे की ओर धकेले जा रहे हैं ।
कल्प सूत्र के रचयिता आपस्तम्ब, बोधयान और कात्यायन ने श्रौत सूत्र और गृह्य सूत्र दोनों की रचना की है । इसके अतिरिक्त, धर्म सूत्र नामक कुछ बातें भी हैं । ये व्यक्ति के लिए एक व्यक्ति के रूप में, एक परिवार के सदस्य के रूप में और समाज में आचरण के नियम निर्धारित करते हैं । इन्हीं से बाद के दिनों में धर्मशास्त्रों का विकास हुआ ।
अथर्ववेद अब अधिक प्रचलन में नहीं है और इसके कल्प सूत्र आसानी से उपलब्ध नहीं हैं ।
कल्प हमें हर कार्य की शिक्षा देता है, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो । और एक ब्राह्मण जो भी कार्य करता है, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, वह वेदों से जुड़ा होता है । तभी तो वह हर बार जब वह साँस लेता है और अपने हर कदम पर हमें सहायता के लिए दैवीय शक्तियाँ प्रदान कर सकता है । इसीलिए यह एक आदेश के रूप में निर्धारित किया गया है कि उसे कैसे बैठना चाहिए, कैसे खाना चाहिए और कैसे कपड़े पहनने चाहिए । उदाहरण के लिए, कल्प शास्त्र यह भी बताता है कि घर कैसे बनाए जाने चाहिए । इसमें गृह निर्माण (घर की योजना), वास्तु लक्षण (प्रयोग की जाने वाली सामग्री का विवरण), इत्यादि का वर्णन किया गया है । इसे इसलिए निर्धारित किया गया है ताकि घर की वास्तुकला दुनिया के लाभ के लिए दिव्य शक्तियों का उपयोग करने के उसके कार्य में उसकी मदद करे । वैश्व देव बलि को घर के एक निश्चित निर्दिष्ट द्वार पर ही किया जाना चाहिए । यह एक आधुनिक फ्लैट में नहीं किया जा सकता है । वैदिक आदेशों के अनुष्ठान या अभ्यास में मदद करने के लिए ही कल्प सूत्र में घर के डिजाइन का उल्लेख किया गया है । उपासना स्थल (वह स्थान जहाँ होम के लिए अग्नि जलाई जानी है) को इसके सही प्रदर्शन के लिए एक विशेष डिजाइन का होना आवश्यक है । इसके विनिर्देश शास्त्रों में दिए गए हैं । यदि ये निर्दिष्ट आकार (लेआउट) के अनुसार नहीं हैं, तो अनुष्ठान करना मुश्किल होगा । जैसे एक स्कूल में कक्षा, बेंच, टेबल आदि, सभी शिक्षा प्रदान करने में मदद करने के लिए पूर्व नियोजित होते हैं, सामान्य जीवन में भी हम देखते हैं कि स्कूल की प्रयोगशाला, जहाँ प्रयोग किए जाते हैं, का लेआउट और फ़र्नीचर स्कूल के बाकी हिस्सों से अलग होता है जहाँ छात्र व्याख्यान सुनते हैं ।
हमें अपने घरों को अपने शिल्प शास्त्र के अनुसार डिज़ाइन करना चाहिए । सूत्रों के लेखकों ने गृहस्थ के लिए एक विशेष डिज़ाइन में ही घर बनाना अनिवार्य किया है । यह निश्चित रूप से केवल उन लोगों पर बाध्यकारी होगा जो वैदिक जीवन शैली का पालन करना चाहते हैं । लेकिन अगर हम किसी अलग सभ्यता या जीवन शैली वाले किसी अन्य व्यक्ति की योजना के अनुसार बने घर में रहते हैं, तो हम पाते हैं कि घर की योजना अनुष्ठानों के संचालन में बाधा डालती है । हम यह कहकर शुरू करते हैं कि यह घर कुछ अनुष्ठानों के प्रदर्शन के लिए अनुकूल नहीं है और समय के साथ हमारे संकल्प कमजोर हो जाते हैं और विश्वास डगमगा जाता है । हम अपनी जीवन शैली बदल देते हैं क्योंकि घर बदलना मुश्किल लगता है ।
शिक्षा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष और कल्प, ये छह शास्त्र हैं और चार वेदों के साथ, अब तक हम चौदह विद्याओं में से दस के बारे में जान चुके हैं । आइए, शेष चार पर एक नज़र डालें ।
हरिः हरः!!
