वेदक उपांग: न्याय
– तर्क एवं समीचीनताक विज्ञान
न्याय शास्त्र केँ आम तौर पर तर्क शास्त्र केर नाम सँ सेहो जानल जाइछ । एकरा ऋषि गौतम लिखने रहथि । एकर मुख्य उद्देश्य बहस (विमर्श) केर माध्यम सँ ई सिद्ध करब छल जे परमेश्वर मात्र एहि दुनिया केँ बनबयवला छथि । ई अन्दाज सँ ईश्वर होयबाक तथ्य केँ साबित करैत अछि । एहि तरहें, ई एकटा एहेन शास्त्र अछि जेकरा विश्वास दिएबाक मुख्य माध्यम निगमन (व्यापक सँ व्याप्य धरिक अनुमान) थिक ।
निगमन अपरिहार्य अछि (यानि कोनो बात केँ बुझबाक लेल अनुमान कय केँ बुझनाय अवश्यम्भावी होइछ) । वेद एकटा खास विषय केर बारे मे बात करैत अछि । वैदिक बात सभक दायरा आ महत्व मीमांसा (उत्तर) सँ तय होइछ ।
भले हमरा सब केँ वेद पर पूरा भरोसा हो, तैयो मोन मे किछु न किछु गुप्त तरहक सन्देह बनल रहैछ/रहत । तेँ, एहेन सन्देह केँ दूर करबाक लेल, कतेको रास तरीका सब प्रयोग कयल जाइछ जाहि सँ कि अन्त मे ई विश्वास दृढ़ भ’ सकय । जखन हम सब कोनो खम्भा ठाढ़ करैत छी, त हम सब ओकरा जमीन मे गाड़ैत छी आर ओकरा आगू-पाछू हिलबैत छी, जाहि सँ कि ओ अपन नींव मे मजबूती सँ बैसि जाय । एहि तरहें, सत्य पर विभिन्न तरह सँ तर्क सब सँ प्रहार कयल जेबाक चाही जाहि सँ कि आगाँ बिना कोनो आर बेसी तर्क कएने ओ सत्य स्वीकार्य बनि सकय । हमरा सब केँ कोनो तरहक विवाद केर स्वागत करबाक चाही । लेकिन ई स्वीकार्य आधार या अधिकार पर आधारित होयबाक चाही । तर्क लेल तर्के टा हो, कुतर्क या बकवास केँ निस्सन्देह नजरंदाज कयल जेबाक चाही ।
जखन आदि शंकराचार्यक आखिरी समय लग आबि रहल छलन्हि, त हुनकर आसपास जमा हुनकर शिष्ट सब हुनका सँ अन्तिम सन्देश देबाक अनुरोध कयलनि । परिणामस्वरूप, आचार्य द्वारा पाँच टा श्लोक मे एकटा सन्देश देल गेल, जेकरा उपदेश पंचकम या सोपान पंचकम या साधन पंचकम केर नाम सँ जानल जाइत अछि । एकर एकटा हिस्सा एहि तरहक अछि: “दुस्तर्कात्सुविरम्वतां श्रुतिमतस्तकोऽनुसन्धीयताम्” । यानी, “मात्र बाजिये टा कय बहस करय सँ दूर रहू, केवल वैह तरीका सब केँ अपनाउ जे वैदिक सोच केर सम्मान करैत हो आर एकटा ठोस आधार पर आधारित हो ।”
वैदिक सिद्धान्त सब केँ साबित करबाक लेल प्रयोग कयल जायवला तरीका सब केँ ‘न्याय’ कहल जाइछ । जेना कि हम कहलहुँ, ई शास्त्र गौतम लिखने रहथि । ‘गणत’ नामक एकटा आर व्यक्ति सेहो एकटा न्याय शास्त्र लिखने छथि । एकरा ‘वैशेषिक’ कहल जाइत छैक ।
हम सब दुइ चीज मे एहि द्वारे फर्क करैत छी कियैक तँ ओहि दुनू मे किछु खासियत होइत छैक, हरेक वस्तु मे कोनो एहेन खूबी होइत छैक जे दोसर मे नहि होइत छैक । कियैक तँ ई खासियत (विशेषता या गुण) मात्र जाँचक मुख्य आधार थिक, तेँ एहि प्रक्रिया (सिस्टम) केँ ‘वैशेषिक’ कहल जाय लगलैक । न्याय शास्त्र, जे कि वैज्ञानिक ढंग (साइंटिफिक तरीका) सँ बढ़ैत अछि, एहि स्तर पर वैशेषिक कहाइत अछि जेतय आध्यात्मिक मामिला जेना जीव (आत्मा), जगत (ब्रह्मांड), ईश्वर (भगवान) व मोक्ष (मुक्ति), जेकरा वैशेषिक लोकनि ‘अपवर्ग’क अन्तर्गत वर्णन करैत छथि । एहि दुनू मे तर्क (लॉजिक) तथा तत्व (फिलॉसफी) केर प्रयोग होइत अछि । फिलॉसफी केँ लॉजिक केर माध्यम सँ वर्णन कयल जाइछ ।
न्याय शास्त्र चारि तरीका सँ असल सत्य (फन्डामेन्टल ट्रूथ) पर बात करैत अछि । ई थिक: (१) प्रत्यक्ष, (२) अनुमान, (३) उपमान व (४) शब्द ।
पहिल नाम, यानी प्रत्यक्ष प्रमाण, ओ छी जे हमरा लोकनिक इंद्रिय सब, जेना देखनाय, सूंघनाय, सुननाय, स्वाद बुझनाय आदि सँ बुझल जाइछ । सूची मे ऐगला नाम अनुमान अछि, जे न्याय केर हिसाब सँ सब सँ जरूरी अछि ।
अनुमान कि थिक ? हम सब दूर पहाड़क चोटी पर धुआं देखैत छी । मात्र धुआं टा देखाय दैत अछि मुदा (ओकर कारक) आगि नहि देखाय दैछ । सोझाँक चट्टान सब बेशक आगि केँ हमरा सभक नजरि सँ नुका दैत अछि । एहि तरहें, सिर्फ़ धुआं टा आसमान मे उठैत देखाइत अछि । तथापि, भले देखाय नहि दियए, हम सब एहि निष्कर्ष पर पहुँचय मे कनिकबो नहि झिझकैत छी जे पहाड़ पर आगि अछि । एकरा ‘अनुमान’ कहल जाइछ । एतय, जे चीज हमरा सब केँ ई नतीजा निकालय मे मदति करैछ जे आगि भ’ सकैत छैक आर जे एहि नतीजा पर पहुँचबाक सबूत दैत अछि, ओ धुआं छी । एकरा साधना, लिंग या हेतु कहल जाइत छैक ।
आब, वेदान्तक सिद्धान्त अनुसार, जेकरा हम सब मानैत छी, हमरा लोकनि केँ गुरु सँ दीक्षा लेलाक बाद उपदेश पर ध्यान धरबाक चाही । एकरा ‘मनन’ कहल जाइत छैक । एकर मतलब भेल जे गुरु जे किछु सिखौलनि अछि, ओकरा अपन मानसिक युक्ति सभक मदति सँ लगातार ध्यान मे रखनाय । एतय अनुमान मदति करैत अछि । केवल अनुमानक जरिया टा सँ ओहि चीज सब केँ जेकरा वास्तव मे देखल नहि जा सकैत अछि, ओ आन सबूत सभक आधार पर चिन्हल जा सकैत अछि । परमात्मा आ जीवात्मा केँ हमरा लोकनिक इंद्रिय जेना आँखि, कान, मुँह, नाक वगैरह केर पहुँच मे नहि आनल जा सकैछ । मोक्ष या मुक्ति केर आखिरी अवस्था पर्यन्त एहि इन्द्रिय सभक समझ सँ बाहर छैक । एकरा सब केँ केवल ‘अनुमान’ या तर्क सँ कयल गेल अनुमान टा सँ बुझल जा सकैत अछि । ज्ञात बात सभक जरिया सँ अज्ञात बात सब केँ जननाय अनुमान भेल ।
वैदिक कर्म कयला सँ हमरा सब केँ मानसिक पवित्रता प्राप्त होइछ । एकटा नीक गुरु किछु एहेन निर्देश दैत छथि जाहि पर हम सब भरोसा करैत छी । एहि स्तर (स्टेज) पर, जँ कियो आर लोक किछु अलगे बात कहैत अछि, तखन हमरा सभक मोन मे सन्देह उत्पन्न भ’ जाइत अछि । तेँ, कोनो निष्कर्ष पर पहुँचय सँ पूर्व, हमरा सब केर हर तरहक सम्भावित आपत्ति सब पर सोचबाक चाही । प्रमाण जेना कि अनुमान हमरा सब केँ अपन मान्यता सभक जाँच करय मे मदति करैत अछि । न्याय शास्त्र आ वैशेषिक अपन विवेचना मे ज़्यादातर अनुमानहि टा पर निर्भर करैछ ।
“पदार्थ” – शब्द केर अर्थ
हमरा लोकनिक समस्त दार्शनिक (तात्त्विक – फिलॉसॉफिकल) विमर्श प्रक्रिया ई मानैत अछि जे जँ कोनो शब्दक अर्थ (मतलब) बुझबाक लेल एकदम नीचाँ (गहींर स्तर) धरि (खोज-अनुसन्धान तक) गेल जाय, तँ वैदिक सत्य केँ नीक ढंग सँ बुझल जा सकैछ । कोनो परिणाम पर पहुँचय सँ पहिने सबटा ‘प्रमाण’ (प्रूफ या चैनल जे समझबाक दिशा मे लय जाइछ) केर प्रयोग कयल जेबाक चाही । ओ तथ्य (प्रूफ या चैनल) सब जेकरा जरिए अर्थ बुझनाय सम्भव होइत अछि, से प्रमाण कहाइछ ।
प्रत्यक्ष प्रमाण केर बुझय मे थोड़बे चीज सब अबैत अछि – आँखि, नाक वगैरह सँ सीधा बुझनाय जेकाँ । बेसी चीज एकर पहुँच केर अन्दर हेबाक बदला बाहरे होइत छैक । ओकरा अनुमान प्रमाण – निगमन प्रक्रिया सँ उपर सँ नीचाँ धरि प्रमाण सभक सहारे अनुमान करैत बुझल जाइत छैक । आउ अनुमान पर आर बात करैत छी । ई बुद्धि केँ वैदिक सत्य केँ बुझय मे मदति करैत अछि । तेँ न्याय केँ वेदक सहायक उपांग मानल गेल अछि । मीमांसा कान सँ मदति करैत अछि, जखन कि न्याय ‘मनन’ ध्यान या सोच-विचार एवं बेर-बेर दोहरेबाक (अभ्यास) सँ मदति करैत अछि ।
न्याय शास्त्र मे, ‘पदार्थ’ केर समझ केँ सात प्रकार मे विभाजित कयल गेल अछि, या सात आयाम सँ निवेशित कयल गेल अछि । चूंकि सब ‘पदार्थ’ केँ बुझबाक आवश्यकता छैक तेँ ओकरा अलग-अलग सूचीबद्ध नहि कयल जा सकैछ, ओकरा ओहि माध्यमक आधार पर समूह सब मे बाँटल गेल अछि जाहि (माध्यम) द्वारा ओकरा बुझनाय संभव बनायल गेल अछि । ई सात टा दुइ शीर्षकक अंतर्गत अबैत अछि । ‘भाव’, जे उपस्थित हो आर ‘अभाव’, जे उपस्थित नहि हो । एहि सात समूह मे सँ ‘अभाव’, गैर-अस्तित्वक निषेध सातम अछि । ‘भाव’, या अस्तित्व वला छह प्रकार मे विभाजित अछि ।
प्रश्न ई उठैत अछि जे कोनो एहेन पदार्थक कल्पना केना कय सकैत छी जे उपस्थित नहि अछि । ‘निषेध’ (नकारनाय) एकटा सकारात्मक अवधारणा नहि थिक, लेकिन ‘निषेध’ शब्द केर एकटा निश्चित गुणार्थ (जातिबोधन) आर शब्दार्थ (अर्थ, परिभाषा) सेहो छैक ।
अस्तित्व या उपस्थितिक अभाव किछु स्थान सब पर मौजूद अछि आर किछु अन्य स्थान सब पर मौजूद नहि अछि । “एतय कोनो फूल नहि अछि ।” अर्थात्, एतय, फूल केर उपस्थिति नहि यानि ‘अभाव’ अछि । “ओतय, फूल वेदी (बलिवेदी या अग्निहोत्रक स्थान) पर मौजूद अछि ।” एतय अस्तित्वक नहि भेनाय यानि ‘अभाव’ नहि अछि । एहि द्वारे अभाव कोनो-कोनो जगह पर होइत अछि, आर दोसर जगह पर नहि होइत अछि । एहि तरहें, ई कोनो खास समय मे होइत अछि, आ फेर कोनो दोसर निश्चित समय मे नहि होइत अछि । अतः, अभाव केर एकटा सुनिश्चित अस्तित्व होइत अछि, ठीक ओहिना जेना कि ओ कोनो खास समय आ कि खास स्थान पर होइत अछि ।
पदार्थ केर सात गोट आयाम छैक: (१) द्रव्य या मैटर, (२) गुण, (३) कर्म, (४) सामान्य प्रजाति, (५) विशेष विचित्रता या विशेष स्वरूप, (६) समवाय, व्यक्ति आ प्रजाति केर बीचक जुड़ाव, तथा (७) मैटर (द्रव्य) केर अभाव व ओकर गुण या उपस्थितिक कमी (नहि भेनाय) । द्रव्य, गुण आ कर्म केँ ‘सत्’ कहल जाइछ यानि ओ जेकर होयब देखायल जा सकैत छैक । एहि तरहें बाकी चारि केँ नहि कहल (देखायल) जा सकैत छैक । ‘सत्’ सँ जुड़ल तीन मे सँ, द्रव्य केँ भौतिक रूप सँ (दैहिक तौर पर – फिजिकली) देखायल जा सकैत छैक । ज्ञान, इच्छा, खुशी, दुःख आर एहेन गुण सब केँ ओहि चीज सँ अलग कयकेँ नहि देखायल जा सकैत छैक जाहि पर अपन होयबाक लेल निर्भर अछि । कमल लाल रंगक होइछ; ई ओकर गुण थिकैक । एकरा कमल सँ अलग नहि कयल जा सकैत छैक । एहि तरहें ‘गुण’ कोनो चीज मे रहैत चैक । जाहि चीज सँ ई जुड़ल रहैत छैक, ओ द्रव्य या मैटर थिक । हालांकि खुशी आ दुःख केँ कोनो चीज सँ अलग कय केँ नहि देखायल जा सकैत अछि, तैयो हम सब कोनो एहेन लोक केँ देखि सकैत छी जे खुश अछि या दुःखी अछि । एहि तरह सँ एहि दुइ भाव केर पता चलैत अछि । जखन हम सब लाल कमल देखैत छी, त हम सब बुझैत छी जे लाल केर कि मतलब अछि । ‘कर्म’ केर मतलब अछि काज या एक्शन, गति या मूवमेंट, चलनाय, दौड़नाय आदि । ओहो द्रव्य सँ जुड़ल रहैत अछि आ अकेले (स्वतंत्र) नहि रहि सकैछ । दौड़बाक काज केँ दौड़यवला सँ अलग नहि कयल जा सकैत अछि । एहि तरहें हम सब दौड़ैत देखैत छी आर तखन दौड़ केर पहिचान करैत छी । ‘सामान्य’, पदार्थक चारिम आयाम, जाति या स्पीशीज़ केँ बतबैत अछि । गाय केर झुंड अछि । गाय होयबाक काज ओहि सब मे सामान्य (संयुक्त तौर पर) मौजूद अछि आर ओकरा सब केँ गाय कहल जा सकैत छैक । एकरा हम सब जाति (स्पीशीज़ – प्रजाति) कहैत छी जे हरेक गाय मे होइछ । एकटा स्पीशीज़ भेलाक बादो, हरेक गाय मे एकटा अलग तरहक गुण (क्वालिटी) होइत छैक । एकरा ‘विशेष’ कहल जाइछ । गायक स्पीशीज़ भेलाक बादो, हरेक गाय केर पहिचान एहि लेल कयल जा सकैछ कियैक तँ हरेक मे किछु खास विशेषता (खासियत) होइत छैक । द्रव्य आर ओकर गुण, द्रव्य आर ओकर काज या फंक्शन, स्पीशीज केर तौर पर (सामान्य) समानता आर वैयक्तिक विशेषता (इंडिविजुअलिटी, खासियत), एकटा पूरा पदार्थ आर ओकर अलग-अलग भाग (अंग) – पूरा चीज आर ओकर अलग-अलग हिस्सा जेकरा कि ओकरा सँ अलग नहि कयल जा सकैछ, ई ‘समवाय’ थिक । आगि मे चमक होइछ जेकरा ओकरा सँ अलग नहि कयल जा सकैछ । ई समवाय थिक । यदि पदार्थ (मैटर) दोसर पदार्थ (मैटर) सँ जुड़ैत अछि त ओकरा ‘संयोग’ कहल जाइत छैक । ई अलग-अलग या एक साथो भ’ सकैत अछि । द्रव्य आ गुण समवाय थिक । द्रव्य आ कर्म सेहो समवाय थिक । कियैक तँ गुण आ कर्म अकेले नहि रहि सकैत अछि, ओ निश्चय टा कोनो पदार्थहि केर गुण होइत अछि ।
हम पहिनहिं अभाव केर बारे मे बात कएने छी, जे सातम आयामक तौर पर आखिर मे अबैत अछि । जेना सब पदार्थ केँ सात शीर्षक (हेड्स) मे बांटल गेल अछि, तहिना हरेक विषय (सब्जेक्ट) केँ कतेको वर्ग (कैटेगरी) मे बांटल गेल अछि । द्रव्य केँ नौ वर्ग (टाइप) मे बांटल गेल अछि । ई थिक पृथ्वी (धरती), अप (पानि), तेजस (आगिक रोशनी), वायु (हवा), आकाश (स्पेस), काल (समय), दिक् (दिशा), आत्मा एवं मानस (मन) । एहि मे सँ पहिल पाँच केँ पंचभूत कहल जाइछ । स्पेस बाकी चारि केँ अपना अन्दर रहय दैत अछि । एहि पंचभूत केर सम्बन्ध मे एकटा बात हैरान करयवला अछि । एहि मे सँ प्रत्येक केर हिसाब सँ शरीर मे पाँच गोट ज्ञानेन्द्रिय एहि पाँचो केँ बुझबाक लेल विकसित (स्थित) अछि ।
देखयवला आंखि, सुनयवला कान, स्वाद लयवला जीभ, सर्दी-गर्मी मे फर्क करयवला स्पर्शक इंद्रिय (त्वचा) आर सूंघयवला नाक, ई पाँच टा ज्ञानेन्द्रिय अछि । ज्ञानेन्द्रिय केवल बाहरी त्वचा धरि सीमित नहि अछि । ई पूरा शरीर मे पसरल रहैत अछि । ई शरीर केर भीतर सेहो मौजूद अछि । उदाहरणक लेल, पेट या दिल केर दर्द शरीरक भीतर स्थित स्पर्श इंद्रिय द्वारा महसूस कयल जाइत अछि । एहि पांचो संवेदना केँ केवल उचित अंग केर माध्यम टा सँ अनुभव कयल जा सकैत अछि । दृष्टि आँखि तक मात्र सीमित अछि, कान सँ नहि देखल जा सकैछ । जे संगीत कान सँ सुनल जा सकैछ, ओकरा आँखि या नाक सँ नहि सुनल जा सकैछ । यदि कोनो चीज जीभ पर राखल जाय त ओकर स्वाद अनुभव कयल जा सकैछ, लेकिन ओकर गन्ध नहि । नाक सँ चीनीक मिठास केर पता नहि लगायल जा सकैछ । एहि तरहें, एहि मे सँ प्रत्येक पाँच गुण मे केवल एकटा केँ मात्र जानि सकैत छी । रूप नामक गुण केवल आँखि टा केँ पता होइत छैक । नीक आ खराब गन्धक पहिचान नाके सँ होइत छैक । छह तरहक स्वाद (रस) केर पहिचान जीभ सँ होइत छैक । छूबय केर शक्ति गर्मी आर ठंढा मे फर्क करैत अछि । एहिना पाँच गोट ‘इन्द्रिय’ या सेंस ऑर्गन पाँच गुण केँ देखि या अनुभव (महसूस) कय सकैत अछि । एकरा “ज्ञानेन्द्रिय” कहल जाइछ । अगर ई अंग नहि होइतय, त ई गुण हमरा लोकनिक बुझय सँ बाहर रहितय । अग हमरा सब लग छह गोट सेंस ऑर्गन होइतय, त हम सब शायद छह गुण सब केँ पहिचानि पबितहुँ । शायद, अगर हमरा सब लग एहेन एक हज़ार अंग होइतय, त हम सब चीज केँ ओतबे अलग-अलग गुण सब केँ चिन्हि पबितहुँ । हमरा सब केँ ई नहि पता जे एहि दुनिया मे कतेक रास चीज सब मौजूद अछि । अगर हमरा पास छूबय केर शक्ति नहि होइतय, त हमरा सब केँ कोनो चीज गरम या ठढ़ा अछि से पता नहि चलितय । हमरा सब केँ गर्मीक बदलावक ज्ञान एहि गुणक वजह सँ अछि । हम सब देखैत छी जे आन्हर आ बहीर एक-एक कय केँ रूप आ शब्द सँ अन्जान होइत अछि, हालांकि एहि दुनिया मे एकर कोनो कमी नहि छैक । आँखि, जीभ, नाक, त्वचा (छूबयवला इन्द्रिय) आर कान – एहि पाँच इन्द्रिय सभक अपन-अपन विषय होइत छैक, रूप, रस (स्वाद), गन्ध, स्पर्श (टच) आर शब्द (आवाज़) ।
एहि विषय सभक हिसाब सँ ई पाँच गुण पंचभूतों या पाँच तत्व मे मौजूद छैक । धरती मे ई पाँचो मौजूद अछि । धरतीक रूप आर स्वाद छैक । हमर शरीर, सब्ज़ी, मिश्री, ई सब धरतीये मात्रक देन अछि । धरती मे गन्ध सेहो अछि । फूल सेहो धरतीक थिक । कठोरता, गर्मी आ ठंढ सेहो धरती टा’क देन थिक । धरती मे आवाज़ सेहो छैक । कसल गेल डोरी सँ आवाज अबैत अछि । तहिना जखन कोनो छड़ी सँ कोनो दोसर चीज़ केँ पीटल जाइछत ओकर आवाज अबैत अछि । रस या पानि मे, गन्ध केँ छोड़िकय, बाकी चारू गुण मौजूद रहैत छैक । जखन पानि केँ पीटल जाइछ, त आवाज अबैछ । हालांकि धरती मे पाँचो गुण अछि, लेकिन ओहि एक एहेन गुण अछि बाकी चारि तत्त्व मे कोनो मे नहि छैक, यानि गन्ध, जे धरतीक खास गुण थिक । पानिक मुख्य या खास गुण रस या स्वाद अछि । जल नहि होयत त स्वादक बोध नहि भ’ सकैत अछि । तेँ स्वाद केर पहिचान करयवला इन्द्रिय जीभ मे हमेशा जल मौजूद रहैत अछि । जीभ सुखा गेल हो त स्वादक पता नहि चलैछ । रस केर मतलब सेहो जल होइत अछि । तेजस (अग्नि) मे न गन्ध होइत छै, न स्वादे, ओकरा लग केवल रूप, स्पर्श आ शब्द होइत छैक । रूपे टा एकर विशेष गुण थिक । वायु मे रूप नहि होइछ । ओकरा लग केवल शब्द आर स्पर्श होइत अछि । स्पर्श एकर विशेष गुण थिक । तेँ जखन हवा चलैत अछि त शरीर ओकरा महसूस करैत अछि । आकाश मे केवल ध्वनि छैक । आधुनिक विज्ञान पहिने सोचने छल जे ध्वनि उत्पन्न करबाक लेल वायु या हवा जिम्मेदार अछि । वायरलेस ट्रांसमिशन केर खोजक बाद धीरे-धीरे ई महसूस कयल जा रहल अछि जे ध्वनि अंतरिक्षक एकटा गुण थिक, वायरलेस ट्रांसमिशन हवाक प्रवाह पर निर्भर नहि अछि ।
आकाश या स्पेस, जाहि मे केवल एकटा गुण छैक, जेना आवाज, वायु जाहि मे आवाजक अलावा स्पर्श या ‘टच’ सेहो छैक, अग्नि जाहि मे आवाज आ टच के अलावा देखाय दयवला रूप यानि दृश्यता छैक, पानि जाहि मे रस या स्वाद छैक आ धरती जाि मे चारि गुणक अलावा गन्ध सेहो छैक, ई पंचभूत या पाँच तत्त्व थिक ।
द्रव्य या मैटर अछि जे पंचभूत केँ देखबैत अछि जाहि पर गुण सभक समझ निर्भर करैत अछि । नौ गोट द्रव्य (उपरका पाँच केँ छोड़िकय) मे सँ बाकी अछि – (१) काल या समय, (२) दिक् या दिशा, (३) आत्मा, तथा (४) मानस । घंटा (घड़ीक समय), काल्हि, आबयवला काल्हि, आइ, साल, युग, वगैरह समय या काल केँ बतबैत अछि । दिशाक मतलब अछि इलाका, उपर, नीचाँ, ओतय, एतय, वगैरह । आत्मा ओ थिक जेकरा पास मोन रहैत छैक, जे एहि सब सिद्धान्त केँ बुझि सकैत अछि । आत्मा दुइ तरहक होइत अछि, जीवात्मा आर परमात्मा । जे एहि दुनिया मे होयवला हरेक चीज केँ मात्र देखैत छथि, ओ परमात्मा थिकाह । जे दुनिया मे उलझि जाइछ आ दुःखी भ’ जाइछ, से जीवात्मा थिक । जीवात्मा कतेको अछि; परमात्मा एक छथि । दुनू चैतन्य छथि, यानि संवेदनशील (sentient) छथि । वेदान्त कहैत अछि जे चेतना (अवेयरनेस) या बुद्धिमत्ता (इंटेलिजेंस) टा आत्मा थिक । दोसर दिश, न्याय शास्त्र कहैत अछि जे जेकरा पास (अवेयरनेस) छैक, ओ आत्मा छी । द्वैत (डुअलिज्म) सिद्धान्त मे न्याय कहैत अछि जे “मन्द चेतना” (dulled awareness) वला आत्मा छी । लेकिन वेदान्तक अनुसार, चेतना, जेकर कोनो दोसर (विकल्प) नहि अछि, ओ आत्मा छी । एहेन किछुओ नहि अछि जेकरा एकरा सँ अलग जानल जा सकय । एहि तरहें कोनो ‘मन्द’ आत्मा या जीवात्माक कोनो सवाले नहि भ’ सकैछ । लेकिन, न्याय केर अनुसार, चेतना गुण सँ जुड़ल अछि । आत्मा पदार्थ थिक, चेतना ओकर गुण या गुणवत्ता थिकैक । आत्मा ज्ञान या बुद्धिमत्ता, जानकारी एवं जनबाक क्षमता केर निवासस्थल (घर) थिक ।
ज्ञान केर पूर्णताक बाहर किछुओ मौजूद नहि अछि । तेँ न्याय परमात्मा केँ ‘सर्वोच्च ज्ञान’ कहैत अछि । जीवात्मा या व्यक्तिगत आत्मा सभक पास केवल एकटा सीमित चेतना रहैत छैक । तेँ ओकरा ‘किंचितज्ञ’ कहल जाइत छैक, जेकर अर्थ अछि, अल्प ज्ञान वला । परमात्मा ‘सर्वज्ञ’ या सब ज्ञान राखयवला, सब किछु जानयवला छथि । हम सब पूरा ज्ञान आर कम ज्ञान, दुनूक घर छी, यानि दुनूक युग्म (कॉम्बिनेशन – मिश्रण) छी । दोसर दिश, परमात्मा पूरे ज्ञान केर भंडार छथि । आत्मा विभु अछि, सर्वव्यापी (सब जगह पसरल) अछि । हालांकि न्यायशास्त्र सेहो कहैत अछि जे परमात्मा सब जगह पसरल छथि, लेकिन परमात्मा आर जीवात्माक बीचक अन्तर नहि पहिचानल जाइछ । एना एहि लेल छैक, कियैक त एहि शास्त्रक अनुसार, बुद्धिमानी (इंटेलिजेन्स) हरेक जीव मे अलग-अलग होइत छैक । ई जाहिठाम रहैत अछि ओ मोन थिक । मोने टा खुशी या दुःखक एहसास (अनुभव) करबैत अछि ।
न्यायशास्त्रक अनुसार, गुण सब केँ पच्चीस भाग (तरह) मे आर कर्म सब केँ पांच भाग (तरह) मे बाँटल गेल छैक । न्यायशास्त्र कहैत अछि जे, यदि केकरो पास सही पदार्थ ज्ञान छैक (यानि पदार्थ सभक सच्चा अवधारणा – कन्सेप्ट पता छैक), त ओकरा सत्यक पता तखनहिं चलतैक जखन ओकर मोन बाकी सब चीज केँ गैर-जरूरी मानिकय नकारि देत आ एहि तरहें ओ मोक्षक स्थिति मे पहुँचि जायत, जेतय न खुशी छैक आ न दुःख छैक ।
यद्यपि हम सब मोक्षक लेल प्रयास कय सकैत छी, वेदान्तिक अवधारणा अनुसार, मनन (ध्यान) जे गुरुक उपदेश सब पर चिन्तन करबाक लेल जरूर अछि, जे कि न्याय पद्धति अछि, सब सँ बेसी उपयोगी अछि । हमरा सब केँ पंचभूत, जीवात्मा आर मोनक पता चलैत अछि । परमात्मा केँ केना जानल जा सकैत छन्हि ? ओ अज्ञेय छथि । हुनका जनबाक लेल अनुमान या निगमन जरूरी अछि । शेष केँ जनबाक लेल, प्रमाण या तथ्य जेकरा ज्ञानेन्द्रिय ग्रहण करय (बुझि सकय) मे सक्षम अछि, वैह पर्याप्त अछि । श्रुति कहैत अछि जे परमात्माक अस्तित्व छन्हि । न्याय निगमन (अनुमान) केर आधार पर कहैत अछि जे परमात्माक अस्तित्व आवश्यक रूप सँ हेबाके टा चाही ।
आउ आब अनुमानक एकटा छोटा सन उदाहरण देखी । ई ज्ञात अछि जे जाहि कुर्सी पर हम बैसल छी ओ निश्चय टा कोनो कमार (बढ़इ) द्वारा बनायल गेल होयत । चूँकि हम वास्तव मे ओहि बनेनिहार आदमी सँ नहि भेटल छी जे एकरा बनेने अछि, कि हम ई कहि सकैत छी जे ई आदमी द्वारा नहि बनायल गेल अछि ? हम आनो कुर्सी सब बनैत देखने छी । ओहि आधार पर, हम जनैत छी जे एकरो कोनो कमारे (बढ़इये) बनेने होयत । हम ई सेहो जनैत छी जे कुर्सी बनेनाय कमारक क्षमताक भीतर अछि । एहि तरहें, एहि ब्रह्मांडक एकटा निर्माता हेबाक चाही । ओ सर्वज्ञ, सर्वसमर्थ, सर्वशक्तिमान छथि । चूँकि ओ सभक रक्षा करैत छथि, तेँ हुनका सर्व-दयालु सेहो हेबाक चाही । न्याय शास्त्र एहेन मामिला सब केँ पक्ष आ विपक्ष पर चर्चा कय केँ उचित निगमन केर सहायता सँ स्थापित करैत अछि ।
प्रमाण या अथॉरिटीज़
प्रत्यक्ष एवं अनुमान केर अलावा, न्याय मे दुइ गोट आर प्रमाण होइछ । ई थिक उपमान (उपमा या उदाहरण) तथा शब्द (आवाज़) ।
उपमान कि होइछ ? ई कोनो एहेन चीज केँ जननाय होइछ जेकरा हम सब पहिने सँ नहि जनैत छी, ओकरा कोनो आन जानल चीज सँ समानता (मिलैत-जुलैत गुण सभक) आधार पर जनैत छी – से उपमान छी । ‘गवय’ नामक एकटा जानवर अछि । हमरा सब केँ नहि पता कि ओ केहेन देखाइत अछि । एकरा गाय जेहेन कहल गेल अछि । हम सब संयोगवश कोनो जंगल लग जाइत छी । ओतय हमरा सब केँ वैह जानकारी जेहेन कोनो जानवर देखाय दैत अछि । फेर हम सब एहि निष्कर्ष पर पहुँचैत छी जे ई ‘गवय’ होयत जेकरा बारे मे हमरा सब केँ बतायल गेल छल । यैह उपमान होइछ ।
शब्द प्रमाण वैदिक ग्रन्थ होइछ जे महापुरुष लोकनिक कहल मौखिक (ज़ुबानी) बात सब थिक । जखन वेद आर महापुरुष (जेना ऋषि) किछु कहैत छथि, त हमरा सब केँ ओकरा प्रमाणिक तौर पर मानबाक चाही कियैक तँ ओ कहियो झूठ नहि भ’ सकैत अछि । नैयायिक लोकनि (जे न्याय स्कूल सँ जुड़ल छथि) केर मानब अछि जे वेद स्वयं भगवानक वाणी थिक । तेँ ओ अपना आप मे प्रमाण अछि । जे महापुरुष बिना कोनो सवाल केर (सोच, शब्द तथा कर्म सँ) सत्य होइत छथि, हुनकर बात सब सेहो शब्द प्रमाण मे शामिल होइत अछि ।
ई चारि टा प्रमाण कुमारिल भट्ट केर बतायल मीमांसा सिद्धांतक हिस्सा थिक । एकर अलावे, ओ “अर्थपात” तथा “अनुपलब्धि” केँ सेहो जोड़लनि, जाहि सँ प्रमाण सभक संख्या छह भ’ गेल । हम सब अद्वैत धर्म केर लोक सब एहि समस्त छह प्रमाण केँ मानि लेने छी । ‘अर्थपात’ केँ हमरा लोकनिक शास्त्र द्वारा एकटा उदाहरण दय केँ आसानी सँ बुझय योग्य बनायल गेल अछि ।
एकर एक गोट वाक्य अछि जेकरा एहि तरहें पढ़ल जा सकैत अछि: पीनो देवदत्तो दिवा न भुङक्ते । एकर मतलब भेल जे “मोटसोट देवदत्त दिन मे नहि खाइछ ।” दिन मे नहि खाइतो ओ पातर नहि भेल अछि आर ओ तैयो मोटायल अछि । एहि तरहक समझ सँ कि होइत छैक ? जे ओ राति मे नीक सँ खाइत अछि । ई दोसरो बेतरतीब निष्कर्ष सब केँ सही ठहराबैत अछि जेना (i) जे ओ बिल्कुल नहि खाइत अछि । (ii) भले ओ बिल्कुले नहि खाइत अछि, तैयो ओ पातर नहि होइत अछि । आब सहमतिक (सुलह करय के) तरीका जे स्पष्ट तौर पर बेतरतीब निष्कर्ष सब सँ बचबैत अछि आर एकटा सही रास्ता निकालैत अछि, से अर्थपात भेल ।
हमरा सभक ई निष्कर्ष (निगमन प्रक्रिया सँ निकालल गेल निष्कर्ष) जे देवदत्त राति मे खाइत अचि, उपर देल गेल प्रमाण मे सँ दोसर, यानि अनुमान सँ नहि जुड़ैत अछि । अनुमान लेल ई जरूरी होइछ जे जाहि चीज केँ जनबाक (चिन्हबाक) अछि, ताहि मे जानय (चिन्हय) केर अवयव मौजूद होइ – जेना मेघ सँ गरजन भेनाय या आगि सँ धुआँ निकलनाय । एतय एहेन कोनो लिंग – आधार नहि अछि ।
उपमान केर संग सेहो एहिना छैक । ई सिर्फ एहि लेल अनुमान केर श्रेणी (कैटेगरी) मे नहि अबैछ कियैक तँ हम सब एकरा देखिते ‘गवय’ मानि लैत छी । एतहु, हमरा सभक निगमन (निष्कर्ष) पहिचान पर आधारित नहि अछि । जानवर केँ ओकर रूप सँ जनैत (चिन्हैत) छी । हम सब एकटा ‘गवय’ केर वर्णन पबैत छी जे पहिनहिं सँ हमरा सभक ज्ञान मे अछि, समानताक आधार पर ओ सच होइत अछि यानि चिन्हा जाइत अछि ।
प्रमाण मे आखिरी अछि ‘अनुपलब्धि’ । ई सिर्फ एतबी जननाय होइछ जे कोनो चीज मौजूद नहि अछि । हम कहलहुँ जे न्याय मे बतायल गेल पदार्थ सब मे आखिरी आर सातम अछि अभाव । हम सब अभाव केँ केना बुझैत छी ? अनुपलब्धिक मदति सँ ।
‘जाउ आ देखू जे कि ओहि बाड़ी मे कोनो हाथी अछि’ – हम सब जाकय देखैत छी आ जानि जाइत छी जे ओतय कोनो हाथी नहि रहय – जँ ओतय कोनो हाथी नहि छल तँ । हाथी देखाय नहि दैछ, लेकिन यथार्थ बात जे ओ ओतय नहि रहय ई हमरा सब केँ पता छल । ई बात हाथीक नहि होयबाक स्थिति सँ सामने अबैत अछि । एहि तरहें जे चीज कोनो चीजक नहि भेला पर पता चलैत अछि, ओ अनुपलब्धि थिक । न्याय शास्त्र एहि दुइ प्रमाण केँ नहि मानैछ । एकर उपयोग अद्वैत स्कूल केर मीमांसा तथा वेदान्त मे कयल जाइत अछि ।
सामान्य ज्ञान या विवेक केर समझ सिर्फ हमरा सब केँ भगवान देखेबाक लेल अछि । जखन हम सब एहि तरहें ई अलग-अलग प्रमाण सभक मदति सँ ई जाँच करैत रहैत छी, जेतय न्याय समाप्त होइत अछि, ओतय सँ वैशेषिक आगाँ बढ़ैत अछि । एहि पद्धतिक संस्थापक ‘गणत’ नामक एक ऋषि भेलथि, जे एहि निष्कर्ष पर पहुँचैत छथि जे सब किछु परमाणु सब पर निर्भर करैत अछि । ओ कहलनि जे ईश्वर विभिन्न तरीका सब सँ परमाणु सब केँ व्यवस्थित करैत छथि आर दुनियाक निर्माण करैत छथि ।
न्याय आर वैशेषिक मे, दुनिया एवं आत्मा केँ ईश्वर सँ अलग मानल जाइत अछि जे वास्तव मे द्वैतवादी सिद्धान्त छी ।
चेतन जीव केँ बुद्धि कतय सँ आयल ? अचेतन परमाणु कतय सँ आयल ? एहि विन्दु सब पर प्रश्न कयलापर, व्यक्ति अद्वैत सिद्धान्त पर पहुँचैत अछि जे सब किछु परमात्माक विभिन्न रूप थिक ।
एहि अद्वैतवादी निष्कर्ष पर पहुँचबाक लेल, न्याय एकटा मध्यवर्ती कदम केर रूप मे आवश्यक अछि । विवेक आर तार्किक निष्कर्ष केँ उचित स्थान देनाय वास्तव मे न्याय या तर्क केर भूमिका थिक । ई वास्तव मे बौद्धिक परीक्षा एवं अनुसंधान मे संलग्न अछि । ई ईहो दर्शाबैत अछि जे तर्कवाद केर नास्तिक या पूरे तरह सँ भौतिकवादी भेनाय जरूरी नहि अछि, असंख्य प्राणी सब तथा जीवन केर व्यवस्थित संचालनक लेल एकटा बनाबयवला जरूर हेबाक चाही । न्याय शास्त्र मानैत अछि जे बौद्धिक समझ केर किछु सीमा सब होइत छैक आर एहि द्वारे ई आदेश दैत अछि, कियैक तँ किछु एहेन क्षेत्र अछि जेकरा बारे मे हम सब कोनो तरहक प्रमाण सँ नहि सोचि सकैत छी, ताहि हेतु हमरा सब केँ वेदक निर्णय केँ मानबाक चाही ।
संक्षेप मे, तर्क केँ बिना सोचने-बुझने बेतुकापन केर हद तक नहि बढ़ायल जेबाक चाही, यानि तर्क केँ दुष्तर्क नहि बनबाक चाही, बल्कि ओकरा अन्तिम सत्य तक पहुँचबाक लेल एकटा माध्यम बनबाक चाही ।
ई वास्तव मे सराहनीय होयत यदि कोनो बौद्धिक जाँच-पड़ताल नहि कयल जाय आ ईश्वर एवं शास्त्र सब केँ पूरापूरी स्वीकार कयल जाय । लेकिन तखन एना पूर्ण आ निर्विवाद विश्वास जे हमरा सब केँ ईश्वर-साक्षात्कार केर स्तर धरि लय जा सकय, से प्राप्त करब कठिन होयत । एहेन मामिला मे, व्यक्तिक जीवन बिना सुतने आ बिना आलस्यक बीत सकैत अछि । हम त एहेन व्यक्ति पसिन करब जे अपन विचार क्षमताक उपयोग करय आर एतय तक जे गलत निष्कर्ष पर पहुँचि जाय जे ईश्वर नहि छथि आर नास्तिकते सच्चा धर्म छी । हम एहेन नास्तिक केँ, जे ओहि निष्कर्ष पर पहुँचबाक लेल कठोर परिश्रम कयलक अछि, ओहि निर्विवाद विश्वास वला व्यक्ति सँ बेसी (ऊँच) दर्जा देब जे अपन दिमागक बिल्कुले उपयोग नहि कयलक । यदि ओ नास्तिक अपन जाँच-पड़ताल जारी रखैत अछि, त ओकरा कोनो स्तर पर (कहियो न कहियो) मानसिक स्पष्टता भेटि सकैत छैक आर ओ नास्तिकता छोड़ि सकैत अछि । लेकिन दोसर आलसी व्यक्ति लग कोनो आशा नहि अछि ।
यैह कारण अछि जे चार्वाक दर्शन, जे एकटा नास्तिक सिद्धान्त थिक, मूल रूप सँ एक प्रकारक धार्मिक विश्वास केर रूप मे मान्यता प्राप्त छल । चारु आर वाक केर मतलब अछि जे कान केँ नीक लागय । “हमरा सब केँ उपवास, तपस्या, मानसिक आ शारीरिक संयम सँ स्वयं केँ परेशान नहि करबाक चाही । ईश्वर या देवता सभक चिन्ता करबाक कोनो जरूरत नहि छैक । हमरा सब केँ मोन आ शरीर केँ आजादी देबाक चाही आ मजा करबाक चाही” – ई सुनय मे मीठ लगैत छैक, यैह चार्वाक सिद्धान्तक सार थिक ।
लेकिन, एहि तरह सँ जिन्दगी जीबय मे, खुशीक संग-संग दुःख सेहो अबैत अछि । असल मे, बादवला (दुःखे) बेसी होइत अछि । केवल भौतिकवादी धर्म केर अलावा दोसर धर्म टा एहि दुःखक स्थायी इलाज दैत अछि ।
हर तरहक बुद्धिमत्ता (इंटेलीजेन्स) केर ज़रूरत होइत अछि ।
दार्शनिक खोज (फिलॉसॉफिकल इन्क्वाइरी) मे तखनहि अधिक मदति भेटत जखन मोन आ बुद्धि केँ गहींर आत्म-जागरुकता सँ तेज कयल जाय । तेँ आदि शंकराचार्य, जे ई कहलनि जे सम्पूर्ण दुनिया माया थिक, हुनका ओहो लोक सब जगत केर गुरु या दुनियाक शिक्षक मानने अछि जे सब शास्त्र, कला आ विज्ञान मे महारत हासिल कय लेने अछि ।
न्याय केँ तर्क (लॉजिक) तथा अन्वीक्षिकी (मेटाफिजिक्स) सेहो कहल जाइत छैक । अपना सभक महान शंकराचार्य एहि सब शास्त्र मे पूर्णतया महारत हासिल कय लेने रहथि – अन्वीक्षिकी या न्याय मे, सांख्या जेकरा कपिलम् सेहो कहल जाइछ, कियैक तँ ऋषि कपिल एकरा स्थापित कएने रहथि ताहि मे, योग शास्त्र जेकरा ऋषि पतंजलि केर नाम पर पतंजलम् कहल जाइत अछि ताहि मे, आर भट्ट जे कुमारिल भट्ट द्वारा समर्थित आस्था (विश्वास) अछि ताहू मे ।
जे आस्था अद्वैत पर ध्यान नहि दैछ, सेहो अद्वैत मे शामिल अछि । तेँ हम, जे सेहो शंकराचार्य नामधारी छी, सब तरहक शास्त्रक बारे मे बात कय रहल छी । अद्वैत मे द्वैत, विशिष्टाद्वैत, शैव तथा वैष्णव जेहेन कतेको आरो आस्था सब शामिल अछि । यद्यपि आन आस्था सब अद्वैतक निन्दा या आलोचना कय सकैछ, लेकिन एहि अद्वैत मे आन सब किछु एकटा हिस्सा या भाग केर रूप मे शामिल अछि । एतय धरि जे एहेन स्थिति जाहि मे अद्वैत आन आस्था सब द्वारा आलोचित होइत अछि, सेहो एकटा सीमे (आंशिक रूप) मे आ कोनो आस्था स्वयं केँ एकमात्र सत्य आस्थाक रूप मे पुष्टि करबाक अनुमति (अधिकार) नहि छैक जे ई कहय कि अद्वैत गलत अछि । आन आस्था सब केँ अद्वैत द्वारा कखनहुँ पूर्ण रूप सँ अस्वीकार्य कहिकय निन्दा नहि करैत अछि । ओकरा उचित समय, स्थान आ विकासक स्तर धरि उचित मान्यता आ महत्च देल जाइत अछि ।
तर्क शास्त्र पर ग्रंथ
गौतम जे न्याय सूत्र लिखने रहथि, हुनका अक्षपाद केर नाम सँ सेहो जानल जाइत अछि । चूँकि ओ लगातार आत्मनिरीक्षण मे लागल रहैत छलथि, हुनका लग-पासक दुनिया सँ पूरापूरी अप्रभावित कहल जाइत छलन्हि । आइयो-काल्हि प्रोफेसर आ वैज्ञानिक, जे विषय सभक गहराइ मे शामिल रहैत छथि, हुनको सब केँ अनुपस्थित दिमागवला कहल जाइत छन्हि । एक दिन, चलैत-चलैत ओ एकटा इनार लग पहुँचि गेलथि आ ताहि मे खसि पड़लथि । कहानी ई छैक जे भगवान हुनका बचौलनि आ आगाँ आर एहेन घटना केँ रोकबाक लेल, हुनकर पैर मे आँखि लगा देलनि । ओ हुनका आशीर्वाद देलनि जे चलैत समय हुनक अनजान डेग आँखिक कारणे रुकावट सँ दूर रहत । जहिया सँ हुनकर पैर मे आँखि आयल, हुनका ‘अक्ष (आँख) पाद (पैर) कहल जाय लागल । इहो कहबाक एकटा तरीका छैक जे भगवान हुनकर डेग केँ रास्ता देखौलनि । वात्स्यायन द्वारा हुनकर सूत्र पर एकटा भाष्य (कमेंट्री) लिखल गेल अछि । वार्तिका (शब्दावलीक व्याख्या) एक उद्योतकर द्वारा कयल गेल छल । महान अद्वैतवादी, वाचस्पति मिश्र एहि वार्तिका पर एक गोट टिप्पणी लिखने छथि । एकरा “तादपर्य टीका परिशुद्धि” कहल जाइछ । उदयन सेहो “न्याय कुसुमांजलि” नामक एकटा किताब लिखने छथि । ओ ओहेन लोक मे प्रमुख छथि जे कि बौद्ध धर्मक निन्दा करय आ एकरा अपन देश मे दुर्लभ बनबय लेल जिम्मेदार छलथि । जयंत न्याय सूत्र पर न्याय मंजरी नाम सँ एकटा टिप्पणी लिखने छथि । एकटा अन्नाम भट्ट द्वारा तर्क संग्रह नामक एकटा किताब लिखल गेल अछि आर ओ स्वयं एहि पर एकटा विस्तृत दीपिका लिखने छथि । आम तौर पर, जे लोक न्याय शास्त्रक अध्ययन करब शुरू करैत अछि, ओ आखिरी मे कहल गेल दुइ किताब सँ शुरू करैत अछि ।
प्रशस्तपाद गणत महर्षि केर वैशेषिक सूत्र पर “पदार्थ धर्म संग्रह” नामक एकटा भाष्य जेहेन ग्रंथ लिखने छथि । उदयन एहि पर एकटा विस्तृत टिप्पणी लिखने छथि । हालहि मे उत्तमूर वीरराघवाचार्य “वैशेषिक रसायन” नामक एकटा किताब लिखलनि अछि ।
वैशेषिक केर एकटा आर नाम “औलुक्य दर्शन” सेहो अछि । औलुक्य उल्लू सँ जुड़ल किछु बात थिक । कहल जाइत अछि जे ‘गणत’ केँ सेहो उलूक कहल जाय लागल छलन्हि । अगर गौतम बहुत ध्यान भटकाबयवला आ अपन गहींर चिन्तन (विचार) मे डूबल रहबाक कारण सँ इनार मे खसि पड़ैत छलथि, तँ गणत दिन भरि अपन शोधकार्य मे व्यस्त रहल करथि आ राति मे भिक्षाटन लेल निकलि जाइथ । चूँकि ओ दिन मे देखाय नहि दैत छलाह आर मात्र राति मे घूमैत छलथि, तेँ हुनकर उपनाम (निकनेम) उल्लू पड़ि गेल । (जखन भगवद गीता मे भगवान कहैत छथि जे बिना ज्ञानवला लोकक राति ज्ञानी लोकक दिन होइत अछि, त ओ ज्ञानी सब केँ उल्लू कहैत छथि ।) चूँकि एकरा गणत लिखने रहथि, तेँ वैशेषिक केँ गणत शास्त्रक नाम सँ जानल जाइत अछि । जानकार सभक मानब अछि जे व्याकरण (ग्रामर) आर न्याय (लॉजिक) सब शास्त्र केँ बुझय मे सर्वाधिक सहयोगी होइछ ।
जाहि कारण सँ ई संसार बनल
कारण दुइ प्रकारक होइत छैक: निमित्त आ उपादान । जँ माटिक घैला छैक, त ओकरा बनेबाक लेल माटि नामक कोनो चीज हेबाक चाही । माटि उपादान थिक – घैलाक कारण । लेकिन माटिक घैला केना बनैत छैक ? ओ अपने आप घैला नहि बनि सकैत अछि । कुम्हार केँ माटि सँ घैला बनबय पड़ैछ । यदि माटि सँ घैला बनेबाक अछि त कुम्हारक सेहो आवश्यकता पड़ैत छैक । ओ (कुम्हार) निमित्त, कारण छी ।
ज्योतिष शास्त्र मे वर्णित निमित्त अलग अछि । न्याय वैशेषिक सिद्धांतक मत अछि जे परमाणुक उपादान रूप मे उपयोग कयकें, निमित्त कारण रूप मे ईश्वर द्वारा संसारक रचना भेल अछि ।
माटिक घैला बनेबाक लेल कुम्हारक होयब नितांत आवश्यक छैक । यदि ओ उपलब्ध नहि होयत, त घैला कहियो नहि बनि सकैछ । एकरा आरम्भवाद या असत् कार्य वाद कहल जाइछ । सत् ओ भेल जे विद्यमान हो । असत् अस्तित्वहीन अछि । माटि मे कोनो घैला नहि छैक । ओहि मे सँ अस्तित्वहीन घैला अस्तित्व मे आयल । कहल जाइत छैक जे एहि तरहें ईश्वर द्वारा ओहि परमाणु सभक सहायता सँ, जाहिमे जगत् नहि अछि, जगत् केर रचना कयल गेल । न्याय मे यैह सिद्धांत प्रतिपादित अछि ।
सांख्यक मुताबिक, जेना कि हम पहिने कहलहुँ, ईश्वर अस्तित्वहीन छथि । ओकरा अनुसार प्रकृति अपने आप सँ जगत् केर रचना कयलक अछि । एकरा आधुनिक नास्तिक लोकनिक दृष्टिकोणक समान नहि मानल जेबाक चाही । एना एहि लेल अछि कियैक तँ सांख्य निर्गुण ब्रह्म या पुरुष केँ मानैत अछि जे पूर्ण ज्ञान (ज्ञान स्वरूपी) छथि । ओ एहि जगत् मे जड़ प्रकृतिक व्यवस्थित व्यवहार केँ पुरुष केर प्रभाव या सानिध्य या समीपताक कारण मानैत अछि । समीपता टा सृष्टि आर सुव्यवस्था केँ सुनिश्चित करबाक लेल उत्तरदायी अछि । पुरुष कोनो क्रियाकलाप मे लिप्त नहि होइत छथि । सूर्यक किरण केर कारण जल वाष्पित होइत अछि, गाछ सब जन्मैत-बढ़ैत अछि आर कपड़ा सेहो सुखाइत अछि । ई सब सूर्यक प्रभावक कारण होइत अछि । सूर्यक पास पोखरि केँ सुखेबाक या कोनो विशेष गाछ केँ जन्मेबाक-बढ़ेबाक कोनो योजना अथवा इच्छा नहि होइत छन्हि । जखन हम सब अपन हाथ बर्फक ठंढा पानि मे रखैत छी, त आंगुर सब सुन्न भ’ जाइत अछि । एहि आधार पर कि हम सब ई निष्कर्ष निकालि सकैत छी जे बर्फक ठंढा पानिक उद्देश्य आंगुर केँ सुन्न करब छल ? एहि तरहें, यद्यपि पुरुष सृजनक कार्य मे बिल्कुले लिप्त नहि होइत छथि, तैयो प्रकृति पुरुष केर प्रभाव मे, अपने आप सँ किछु बनेबाक शक्ति प्राप्त करैत अछि । ईश्वर निमित्त कारण केर रूप मे कोनो तरह सँ हस्तक्षेप नहि करैत छथि । एहि प्रकारे प्रकृति स्वयं केँ सृजनक रूप मे प्रकट करैत अछि । यैह सांख्यक सिद्धांत थिक । एकरा परिणामवाद सेहो कहल जाइत छैक - परिवर्तन केर सिद्धांत ।
नैयायिक लोकनिक असत् कार्य वादक विपरीत, सांख्य सत् कार्य वाद केँ प्रस्तुत करैत अछि । असत् कार्य वादी कहैत छथि जे घैला उपादान कारण मे नहि होइत छैक, अर्थात् माटि मे, ओ निमित्त कारण, यानि कुम्हार द्वारा अस्तित्व मे आनल जाइत अछि । सत कार्य वादी, सांख्य, एहि प्रकारक तर्क दैत छथि: घैल पहिनहिं सँ माटि मे समाहित छल । चक्कीवला तेलक बिया केँ पिसैत अछि जाहि मे तेल रहैत छैक, जाहि सँ तेल बनैत अछि । तहिना, जे घैला पहिनहिं सँ माटि मे मौजूद रहैछ, ओहि सँ प्रयासक माध्यम सँ घैला बनायल जाइछ । माटिक उपयोग कइये केँ घैला बनायल जा सकैत अछि । एकरा तेलवला बिया (बीज) सँ नहि बनायल जा सकैछ, या एकर विपरीत माटि सँ तेल नहि निकालल जा सकैछ । घैला मे माटिक परमाणुक अलावा आर किछु नहि रहैत छैक । यदि ओकर व्यवस्था मे हेरफेर कयल जाइछ, त घैला बनि जाइत अछि ।
अपन आचार्य शंकर भगवद्पाद कहैत छथि: ‘नहि त आरंभ वाद आ नहिये परिणाम वाद तर्कसंगत अछि । ब्रह्म द्वारा मायाक सहायता सँ सृष्टिक वेश धारण कयल जाइछ ।’ ब्रह्मांडीय कुम्हार सँ अलग या हुनका सँ अलग कोनो माटि नहि अछि । एहि प्रकारे आरंभ वादक कोनो वैधता नहि भ’ सकैछ । ई सोचब जे परमात्मा दूध केँ दही मे बदलि देबाक जेकाँ परिणाम द्वारा संसारक रचना कयलनि, इहो सही नहि अछि । कियैक तँ, एहेन परिवर्तनक बाद, केवल दही टा भ’ सकैत छैक, (दही सँ फेर) दूध नहि । एहि लेल ई कहब बेतुका होयत जे परमात्मा स्वयं केँ सृष्टि मे रूपांतरित कयलाक बाद अपन पहिचान हरा देलनि । तेँ, इहो परिणाम नहि छैक । ओ एक तरफ शुद्ध ज्ञानक रूप मे रहैत छथि, आ दोसर तरफ जीव तथा जगत रूप मे प्रस्तुत करैत छथि । ई सब एक आ केवल सत् केर अभिव्यक्ति छी – आविर्भाव – नाटक छी । यदि कियो व्यक्ति नाटक मे कोनो भूमिका निभबैछ, त कि ओ वास्तव मे अपन मूल पहिचान हरा दैत अछि ? सृष्टि सेहो एहने अछि । अपन असंख्य अभिव्यक्ति सभक संगहि, सत् स्वयं सँ अप्रभावित रहैत अछि । यैह शंकर केर साहसिक व व्यापक कथन छल । एकरा विवर्त वाद कहल जाइछ ।
सांपक भ्रम पैदा करयवाली रस्सी विवर्त छी । रस्सी जे उपादान कारण थिक, ओकरा कोनो अन्य निमित्त कारण द्वारा सांप मे नहि बदलल गेल अछि । एहि प्रकारे ई आरंभवाद नहि थिक । रस्सी साँप मे नहि बदलि गेल अछि । रस्सी रस्सिये रहैत अछि । (रस्सीक सांप होयब केवल भ्रम अछि ।) लेकिन, अपन सच्चा ज्ञान (बोध) केर अभावक कारण, रस्सी साँप जेहेन देखाइत अछि । एहि प्रकारे, अविद्या – सच्चा ज्ञानक अभाव केर कारण – ब्रह्म हमरा सब केँ जगत, सृष्टि आ ओहि मे समाहित व्यक्ति प्रतीत होइत छथि ।
आचार्य द्वारा प्रतिपादित सत्य केँ बुझबाक लेल न्याय शास्त्र द्वारा विश्लेषणात्मक जांच (विचार युक्ति) केर विभिन्न उपकरण सभक विस्तृत विवरण देल गेल अछि । पदार्थ केर वास्तविक प्रकृति आ महत्व, एहि विश्लेषणात्मक तरीका सभक उपयोग कयकें पदार्थ केँ बुझल जेबाक चाही । एतय सँ, व्यक्ति वैराग्य प्राप्त करैत अछि । एतहि सँ व्यक्ति “अपवर्ग” नामक क्षेत्र मे जाइत अछि, जेतय नहि त सुख अछि आ नहिये दुःख अछि । एतय न्याय-वैशेषिक सिद्धांत समाप्त भ’ जाइत अछि ।
द्वैत या द्वैतवादी सिद्धांतक अनुसार सेहो कियो एहि सँ आगाँ नहि जा सकैछ । अद्वैत, जे एकटा व्यापक ‘सत्’ केर परिकल्पना करैछ जेकरा द्वारा हम सब सेहो पूर्ण आ समग्र मोक्ष या जन्म और मृत्युक चक्र सँ मुक्ति प्राप्त करैत छी ।
लेकिन, न्याय मे हमरा सब केँ एहि दुनिया मे जीवन सँ सन्तुष्ट हेबाक बजाय ‘अपवर्ग’ नामक बेहतर दुनिया मे जेबाक लेल प्रेरित करबाक गुण छैक ।
एहि शास्त्र मे एकटा आर विशिष्टताक दावा छैक । एहि सब तरहक तर्क आ युक्ति सब प्रस्तुत कयल गेल अछि, जे बौद्ध, सांख्य आ चार्वाकक सिद्धान्त सभक खंडन करैत अछि तथा ईश्वर केँ एहि संसारक रचयिता सिद्ध करैत अछि ।
किछु खिस्सापिहानी तथा तर्क
गंगेश मिश्रोपाध्याय अपन किताब “तत्व चिंतामणि” मे ६४ गोट अलग-अलग तर्क देलनि अछि । एखन धरि हम सब दिमाग पर अजीब-अजीब सोच (विचार) सभक बोझ (दबाव) दैत रहल छलहुँ । चलू, गंगेश मिश्राक बारे मे एकटा खिस्साक संग कनेक हंटिकय बात करैत छी ।
गंगेश शुरू मे बड होशियार बालक नहि रहथि । ओ बंगाल (यथार्थतः लेखनक समय बंगाल प्रान्त अन्तर्गतक मिथिलाक्षेत्र) केर एकटा ऊँच जातिक ब्राह्मण परिवार – कुलीन ब्राह्मण परिवार सँ छलथि । बंगाल मे ई रिवाज छल जे ऊँच वर्गक ब्राह्मणक विवाह कतेको ब्राह्मण दुल्हिन सभक संग कय देल जाइत छलन्हि, जाहि मे एहनो स्तरवाली (दुल्हिन) भेल करथि जे बेसी ऊँच तहवाली अथवा कुलीन नहि रहथि । (यथार्थतः मिथिला मे ई रिवाज प्रचलित छल आर एहेन ब्राह्मण केँ ‘बिकाऊ ब्राह्मण’ सेहो कहल जाय लागल छलन्हि लोकव्यवहार मे) । एहि तरहें एकटा कुलीन ब्राह्मण कतेक पत्नी सब रखैत छलथि, एतय धरि कि पचासो तक । लेकिन गंगा मिश्र केर मात्र एकटा पत्नी छलथिन आर ओ हुनकहि माता-पिता (कन्याक घर) केर संग रहैत छलथि । स्पष्टे अछि, हुनका विवाहक बहुत बेसी प्रस्ताव नहि भेटलनि कियैक तँ ओ स्पष्ट रूप सँ एकटा कमजोर लोक छलाह ।
बंगाली लोक माछ खाइत अछि आर बंगाल मे भारी वर्षा एवं कतेको नदी सभक कारण सँ भरि सालक कतेको मास धरि कतेको जगह सब मे पानि भरि जाइत अछि । सब्जी सब उगेबाक लेल सूखल जमीन तक नहि बचैछ । एहि अबधिक दौरान ओ सब माछ खाइत छल, जे प्रचुर मात्रा मे उपलब्ध रहय । पूर्वी बंगाल (अर्थात् मिथिलाक्षेत्र) मे मछली केँ जल पुष्प (जल परोड़) सेहो कहल जाइत रहैक, जेकर अर्थ छल जे ई एक तरहक सब्जीक समान छल । तेँ सब्जीक कमीक कारण बंगाल मे मछली खेबाक आदति विकसित भेल ।
गंगेशक ससुर केर घर मे भोजनक वास्ते मछली पकेबाक रिवाज रहनि । गंगेश केँ संक्षेप मे ‘गंगा’ कहल जाइत छलन्हि । चूंकि हुनका सुस्त मानल जाइत छलन्हि, तेँ हुनका मात्र माछक काँट (हड्डी) टा परोसल जाइत छलन्हि । दोसर केँ गुदगर (मांसल) भाग भेटैत छलैक । फेर लोक सब हुनकर मजाको उड़बैत छल । ओ उपहास बर्दाश्त नहि कय सकैत छलथि । एक दिन ओ चुपचाप भोरे-अन्हारे काशी (बनारस) लेल रवाना भ’ गेलाह । ओ ओतय दस साल धरि मनोयोग सँ अध्ययन कयल । घर पर लोक सब हुनकर अनुपस्थिति केँ महत्वहीन मानिकय नजरअन्दाज कय देलक । जखन ओ अपन पढ़ाइ पूरा कय केँ घर घुरलाह, त सब सोचलक जे ओ बिना कोनो उद्देश्यक घूमि रहल हतेाह आ पहिनहि जेकाँ एखनहुँ सुस्ते लौटल हेताह । गंगेश मिश्र अपन ससुरारिक लोक सभक एहेन टिप्पणी सुनिकय बहुत आश्चर्य कयलनि आ कहलनि, “नाहं गंगा किन्तु गंगेश मिश्रः” । ‘हम आब गंगा नहि रहलहुँ, हम गंगेश मिश्र छी, जेकर अर्थ भेल: यदि हम पुरने नीरस गंगा होइतहुँ, तखन हमरा काँटेवला माछक भाग खाय लेल देनाय ठीक रहितय, मुदा आब हम एक विद्वान् व्यक्ति छी, तेँ हमर नामक बाद मिश्र (पंडित) प्रत्यय जोड़बाक योग्य अछि – ओ ई सब बात अत्यन्त संछेप एवं मधुर ढंग सँ संकेत देलनि । तखन हुनकर सासुरक लोक केँ हुनकर योग्यताक अनुभूति भेटलैक ।
वैह गंगेश मिश्र तत्व चिंतामणि लिखलनि । कतेको लोक (विद्वान् सब) एहि पर टिप्पणी लिखलनि अछि । एकटा रघुनाथ शिरोमणि एहि पर एकटा टिप्पणी लिखलनि अछि । रघुनाथ शिरोमणिक समय केर बादे सँ “शिरोमणि” केर उपाधिक प्रयोग संस्कृत शिक्षा मे वरिष्ठ स्तर केँ इंगित करबाक लेल उपयोग कयल जाय लागल । एकटा गदाधर द्वारा एकर केवल दस गोट श्लोक केर व्याख्या मे एकटा विशाल ग्रन्थ लिखल गेल अछि । लेकिन एकर एकहु टा वाक्य केँ अनावश्यक नहि मानल जा सकैछ । गदाधर केर लिखल किताब केँ गदाधरी कहल जाइछ । अगर कियो एहि मे सँ पाँच गोट वाद या तर्क पढ़ि आ बुझि लियए, तँ ओकरा चतुर-चालाक मानल जा सकैछ । अगर कियो एहि मे सँ दसो टा पढ़ि लियए, त ओकरा बहुते बेसी चतुर-चालाक मानल जा सकैत अछि । एकटा तर्क या वाद केँ ‘प्रामाण्य वाद’ कहल जाइत छैक । कहल जाइछ कि जे एहि मे माहिर भ’ जाइत अछि, ओ सब बेसी चतुर-चालाक बनि जाइत अछि । आइयो तर्क शास्त्र पढ़निहार गदाधरी केँ एकटा किताबक रूप मे प्रयोग करैत छथि ।
प्रामाण्य वाद अथवा प्रमाण या सबूत सब पर चर्चा, जेना हम बतेलहुँ, जखन हम एकरा बुझेबाक प्रयत्न करैत छी त हमर माथ चकरा उठैत अछि (घुमि जाइत अछि) । लेकिन जाहि समय अपन आचार्य (आदि शंकराचार्य) जीवित रहथि, कहल जाइछ जे मंडन मिश्रक घरक बाहर लटकल पिंजरा मे सुग्गा (तोता) सेहो प्रामाण्य वाद पर चर्चा कय रहल छल ।
आदि शंकराचार्य महिष्मती शहर गेलाह जेतय मंडन मिश्र रहैत छलथि । ओ नदी* सँ पानि भरिकय घर आनि रहल किछु महिला लोकनि सँ पुछलनि जे मंडन मिश्रक घर कतय छन्हि । ओहि शहर मे सामान्य महिला सब सेहो पढ़ल-लिखल होइत छलथि । तेँ, ओ सब आचार्यक सवालक जवाब श्लोकहि मे देलनि । कहल जाइछ जे शंकराचार्य केँ मंडन मिश्रक घर तक पहुँचबाक लेल प्रयोग कयल गेल एकटा श्लोक एहि तरहक छलः
“स्वतःप्रमाणं परतःप्रमाणं, कीराङनाः यत्र संकिरन्ते, द्वारस्थ नीडान्तर सन्निरुद्धा, जानीहि तत् मंडन पंडितौकः ।”
“जाहिठाम तोता-मैना सब स्वतः प्रमाण आ परतः प्रमाण पर बहस करैत अछि, ताहिठाम जानि लेब जे ओ घर पंडित मंडन केर थिक ।” एहि सँ पता चलैत अछि जे प्राचीन भारत मे मात्र पुरुषे टा नहि, बल्कि महिला सेहो पढ़-लिखल होइत छलिह । मात्र महिले टा नहि, बल्कि तोता-मैना (चिड़ै-चुनमुनी) सब सेहो वेदान्तक बात मे माहिर होइत छल । ई श्लोक यैह बतबैत अछि ।
एतेक रास बात सब कहलाक बाद, चलू एहि “वाद” केर थोड़ेक लग (करीब) पहुँचैत छी, हालांकि ई कठिन काज अछि । एहि बारे मे सेहो एकटा मजेदार खिस्सा अछि ।
एकटा दक्षिण भारतीय (साउथ इंडियन) बंगालक नवद्वीप मे तर्क शास्त्र या लॉजिक केर पढ़ाइ करय गेलाह । ताहि दिन मे बंगालक खासियत ई छल जे एहि विषय मे कतेको माहिर लोक सब रहैत छलथि । दक्षिण सँ जे गेल छलाह, से एकटा प्रतिभावान (टैलेंटेड) कवि रहथि । ओ अपन कविता सँ बहुते टका कमेने छलथि । ओ नवद्वीप गेलाह आर ओतहिक माहिर गुरु सब सँ पहिने (प्रथमतः) ‘प्रामाण्य वाद’ केर पढ़ाइ करय लगलाह । ओ पढ़ाइ कयलनि मुदा बहुत किछु बुझि नहि पेलाह । ओ थोड़ेक आर कोशिश कयलनि । ताहि चलते (कारणे), हुनकर कविताक जे प्रवाह छलन्हि से कम भ’ गेलनि । हुनकर टका-पैसा सेहो खर्च भ’ गेलनि । कविता सब लिखिकय आरो कमाय करबाक काबिलियत सेहो खत्म भ’ गेलनि । ई दोब्बर नुकसानी सँ, हुनकर दुःखक कोनो सीमा नहि रहलनि । प्रामाण्य वाद केँ बुझि नहि पेबाक कारण सँ, ओ अपन बचल-खुचल कविताक संग काव्यात्मक विलाप (कवितेक माध्यम सँ अपन कननाय) करय लगलाह । “हम ओहि प्रामाण्य वाद केँ प्रणाम करैत छी जे हमर कविता छिन लेलक अछि ।”
अगर कोनो चीज देखाइत अछि, त हमरा सब केँ ओकर चेतना (अनुभव, अनुभूति) होइत अछि । कहियो-कहियो, चेतना सहियो होइत अछि; आ कहियो-कहियो सही नहियो होइत अछि । हम सब पहिल नजरि मे फिटकिरी केँ मिश्री (सुगर कैन्डी) बुझि सकैत छी । ई दोषपूर्ण जानकारी (ज्ञान) भेल । सही ज्ञान केँ “प्रम” कहल जाइत छैक । दोषपूर्ण ज्ञान केँ “भ्रम” कहल जाइत छैक । ज्ञान अथवा जानकारी केँ एहि तरहें आगाँ दुइ श्रेणी मे वर्गीकृत कयल गेल अछि, संशय ज्ञान (संदेहास्पद ज्ञान) तथा निश्चय ज्ञान (निश्चित ज्ञान) । ओ ज्ञान जे संदेह सँ भरल हो, संशय थिक । जे बिना कोनो संदेहक निश्चित रूप सँ जानल जाइत अछि, ओ निश्चय ज्ञान थिक । कहियो-कहियो, जखन ज्ञान दोषपूर्ण होइत अछि, त ई (गलती) सही प्रतीत होइत अछि । तखन एहि ज्ञान केँ प्रमाण, आधिकारिक या सबूत केर रूप मे लेल जायत, जेना फिटकिरी केँ सचमुच मिश्री बुझनाय । किछु ज्ञान या चेतना शुरुए मे संदिग्ध (सन्देहास्पद) लगैत अछि । जखन हम सब पानिक कोनो कुंड मे गाछक छवि केँ उलटा देखैत छी, त हम सब ई जनैत छी जे गाछ उलटा ठाढ़ नहि अछि आर हम सब एहेन सबूत या प्रमाण केँ अस्वीकार कय दैत छी । जे ज्ञान समय बितलाक बादो सही रहैत अछि, ओ प्रामाण्य गृह ज्ञान थिक । जे शुरुए सँ झूठ लगैत अछि, ओ अप्रामाण्य गृहस्कंदित ज्ञान थिक । जेना “प्रम” या सत्य ज्ञान मे होइछ, तहिना भ्रम – या झूठ ज्ञान मे सेहो, प्रमाण या सबूत (पहिचान) केर माध्यम ज्ञान मौजूद रहैत अछि । तेँ जखन फिटकिरी केँ मिश्री बुझि लेल जाइत अछि, तखनहुँ हमरा लोकनिक जानकारी असली प्रमाण या सबूत होइत अछि ।
एहि प्रकारे दुइ तरहक प्रमाण होइत अछि, एक जे हमरा सब केँ शुरू मे असली लगैत अछि या दोसर जे हमरा सब केँ शुरू मे नकली लगैत अछि । आब, सवाल ई उठैत अछि जे कि सच्चा या झूठा केर ज्ञान हमरा लोकनिक बुझबाक शक्ति सँ आत्मगत रूप मे (सब्जेक्टिवली) अबैत अछि या देखल गेल चीजक गुणवत्ता (क्वालिटी) केर कारण सँ अपने-आप निष्पक्ष रूप सँ (ऑब्जेक्टिवली) अबैत अछि । अगर गलती हमरे सभक कारण सँ हो, त ओ स्वतःप्रमाण भेल । अगर गलती चीजक प्रकृति (नेचर) केर कारण सँ हो, त ओ परतःप्रमाण भेल ।
एहि मे सँ कोन सही अछि, ई मंडन मिश्रक घरक बाहर चिड़ै-चुनमुन (सुग्गा, मैना आदि) केर बीच चर्चाक विषय होइत छल ।
जखन हम सब कोनो वस्तुक पहिचान करैत छी, त पहिचान करयवला मोन (माइंड) लेल व्यक्तिपरक रूप सँ ई निर्णय लेनाय संभव नहि होइत छैक जे पहिचान सही (प्रमाण) अछि कि गलत (अप्रामाण) अछि । ई निर्णय वस्तुक गुण केर प्रकृति पर निर्भर करैत अछि । जाबत धरि हम सब वस्तुक कार्य केँ ओकर हमरा सब पर पड़यवला प्रभावक आधार पर नहि परखैत छी, ताबत धरि ई निष्कर्ष निकालनाय संभव नहि अछि जे एकर ज्ञानात्मक पहिचान (cognised identification) सही अछि या गलत । दोसर शब्द मे, हमरा लोकनिक चिन्हबाक ज्ञान (पहिचान) या धारणा वस्तुनिष्ठ अछि – ई न्याय शास्त्र केर दृष्टिकोण थिक । लेकिन मंडन मिश्र जेहेन मीमांसक लोकनिक दृष्टिकोण एकर विपरीत अछि । ओ कहैत छथि जे वस्तुक वास्तविक स्वरूपक निर्णय कयनाय हमरा सभक बुद्धि (wisdom) केर क्षेत्र मे अछि । लेकिन जखन हमरा सभक ज्ञान (cognisance) व्यक्तिपरक (subjectively) रूप सँ गलत (अप्रमाण) साबित भ’ सकैत अछि, त ई पूर्ण रूप सँ वस्तुक प्रकृति केर कारण होइत अछि । दोसर शब्द मे, सही ज्ञान या प्रमाण हमरा सब पर निर्भर करैत अछि, आर गलत ज्ञान वस्तु पर निर्भर करैत अछि । यैह हुनकर तर्क छन्हि । ई सम्पूर्ण चर्चा सब तर्क-वितर्क सँ समाधान कयल जायवला विषय थिक ।
आइ-काल्हि ‘वाद’ – चर्चा – केर मतलब सामान्य रूप सँ यैह होइत अछि – कोनो लोकक विचार अथवा पक्ष (स्टैंड) केँ स्थापित करबाक लेल (समर्थन मे) देल गेल तर्क (विमर्श या बहस) । वास्तव मे, ई चर्चा (विमर्श, बहस) करयवला दुनू पक्षक विचार सभक बीच एकटा सन्तुलन (बैलेंस) हेबाक चाही । बरु, एहि मे उपयोग कयल गेल सम्पूर्ण तर्क सभक आधार पर, चाहे ओ पक्ष मे हो अथवा विपक्ष मे, एकटा निष्कर्ष (नतीजा) निकालबाक चाही । जखन हम सब कहैत छी जे हमरा सभक आचार्य (आदि शंकराचार्य) मंडन मिश्र जेहेन कतेको विद्वान सभक संग पूरे देश मे वाद या शब्दक लड़ाइ (शास्त्रार्थ) मे घुमलाह, त हमरा सभक मतलब बस यैह अछि जे ओ सब खुलिकय विचारक आदान-प्रदान कयलनि, जाहि सँ सदिखन हुनकर बात सही सिद्ध भेलनि । ओ अपन विरोधी सब द्वारा प्रयोग कयल जायवला सब तर्क केँ ध्यान मे रखलाक बाद, अद्वैतक सर्वोच्चता केँ मजबूती सँ स्थापित कयलनि । तेँ, वाद विचार सभक आदान-प्रदान थिक, नहि कि केवल अपन बात केँ सही ठहरेनाय । अपन पहिनहिं सँ तय कयल निष्कर्ष (नतीजा) केँ तर्कक संग बनाकय राखब – एकर नाम ‘जलपा’ थिक, वाद नहि । एकटा तेसर वर्गीकरण (क्लासिफिकेशन) सेहो अछि । जलपा जेकाँ अपन राय रखबाक बदले, दोसर पक्षक कहल बात केर विरोध कयनाय आ सब विरोधी लोकनि केँ गलत साबित करबाक लेल कोनो तरहें तर्क तकनाय – एकरा “वितण्ड वाद” कहल जाइत छैक ।
जहिया सँ गंगेश मिश्र एकटा बहुत विद्वान व्यक्तिक रूप मे बंगाल वापस भेलाह, यानी १२वीं शताब्दी मे, न्याय शास्त्र केर पुनर्जागरण भेल । बंगाल मे नया सिरा सँ शुरू हेबाक बाद, ई ताकतवर होइत रहल आ ‘नव्य न्याय’ केर रूप मे जानल जाय लागल, ‘नव्य’ केर अर्थ अछि नया । एकरा एना कहेबाक एकटा आरो कारण अछि । ‘नवद्वीप’ बंगाल मे ओ स्थान अछि जेतय गंगेश मिश्र आर हुनकर बाद आयल हुनकर अनुयायी लोकनि रहैत छलथि । नवद्वीप केँ नादियाद सेहो कहल जाइत छैक आर श्री कृष्ण चैतन्य सेहो एहि ठाम सँ छलथि । ओहो एकटा अत्यन्त विद्वान व्यक्ति छलथि जे समस्त शास्त्र सब मे महारत हासिल कएने रहथि । बाद मे, ओ भजन संकीर्तन केर रूप मे कृष्ण केर नामक जाप कयनाय शुरू कयलनि आर पंथक स्थापना कयलनि, जे मानैत अछि कि भगवानक नाम गेनाय मुक्ति या मोक्ष प्राप्त करबाक मार्ग थिक ।
हालांकि न्याय शास्त्र एहेन सैद्धान्तिक बात (थ्योरीज़) बतबैत अछि जेना: “दुनिया वास्तविक अछि नहि कि माया अछि; अलग-अलग आत्मा सब कतेको रास अछि आर ब्रह्माण्डक आत्मा (कॉस्मिक आत्मा – परमात्मा) सँ अलग अछि”, जाहि सँ अद्वैत सहमत नहि अछि, ई नास्तिकता (नीरीश्वर वाद) केर निन्दा करैत अछि तथा भगवानक होयबाक सत्य केँ अत्यन्त दृढ़ता सँ मानैत अछि । कियैक तँ एहि उद्देश्यक लेल ई जे तर्क दैत अछि, से बादक तर्क सब (युक्ति) लेल नींव (फाउन्डेशन) केर काज करैत अछि जे अद्वैत केर दिशा मे लय जाइत अछि, तेँ एकरा एक जरूरी शास्त्र या विज्ञान (साइंस) मानल जाइछ ।
न्याय वेदक एक उपांग थिक कियैक तँ एहि मे बहुत ज्यादा बौद्धिक एवं तार्किक विमर्श (चर्चा सब) शामिल अछि । हालाँकि, पुराण जे चौदह विद्या (चतुर्दश विद्या) मे आगाँ अबैत अछि, ओकरा आजुक पीढ़ीक कतेको लोक मात्र अंधविश्वास मानैत अछि । आउ, आब कनेक एकर बारे मे आगाँ निरीक्षण (जाँच-खोज) करैत छी । (ऐगला चेप्टर मे एहि पर चर्चा कयल जायत ।)
हरिः हरः!!
THE UPAANGAS of Vedas: NYAAYA
– The Science of Logic and Expediency
The Nyaaya Saastra is generally known as Tarka Saastra also This was composed by Sage Gautama. Its main object is to establish by means of disputation that Parameswara is the creator of this universe. It establishes the existence of Isvara by inference. Thus, it is a Saastra whose chief instrument of conviction is deduction.
Deduction is inescapable. Vedas talk of a particular subject. The scope and significance of the Vedic utterances are determined by Meemaamsa (Uttara).
Even though we have total faith in the Vedas, there will be a lurking doubt in the mind. Therefore, in order to dispel such doubts, many devices are used so that in conclusion the belief may become firm. When we erect a pillar, we embed it in the ground and shake it to and fro, so that it gets firmly settled in its base. Likewise, truths should be assailed on all sides by arguments so as to make them acceptable without any argument. We must welcome any kind of disputation. But these should be based on acceptable premises or authority. Argument for argument’s sake, sophistry or quibbling should of course be ignored.
When Adi Sankara’s last moment was nearing, his disciples who were gathered round him begged him to give them a final message. As a result, the Acharya gave them a message in five slokas known as Upadesa Panchakam or Sopaana Panchakam or Saadhana Panchakam. A portion of this reads as: “दुस्तर्कात्सुविरम्वतां श्रुतिमतस्तकोंऽ-नुसन्धीयताम्” Dustarkat Suviramyatam Srutimatastarkonusandhee yatam. That is: “keep away from mere verbal arguments: adopt only those devices which respect the Vedic strain of thought and are based on a sound premise.”
The devices used to establish Vedic postulates are called Nyaaya. As I said, this Sastra was authored by Gautama. Another person called ‘Ganata’ has also written a Nyaaya Saastra. It is called ‘Vaiseshika’ (वैशेषिका).
We make a distinction between two objects because of the presence of some peculiar characteristics in them, each having some attributes not found in the other. Since this peculiarity (Visesha or attribute) is the main basis of examination, the system mainly on scientific lines, joins Vaiseshika at the stage where came to be called as Vaiseshika. Nyaaya Saastra, which proceeds Adhyaatmic (spiritual) matters such as Jiva (soul), Jagat (universe), Isvara (the Lord) and Moksha (Liberation) which, incidentally, the Vaiseshikas call Apavarga’ are dealt with. Both of these use Tarka (logic) and Tatva (philosophy). Philosophy is enunciated through the medium of logic.
The Nyaaya Saastra discusses the fundamental Truth through the aid of four devices. They are: (i) Pratyaksha (प्रत्यक्ष), (ii) Anumaana (अनुमान), (iii) Upamaana and (iv) Sabda.
The first named, viz., Pratyaksha Pramaana, is what is experienced by our sense organs, like sight, smell, hearing, taste etc. The next on the list called Anumaana is the most important in so far as Nyaaya is concerned.
What is Anumaana? We see smoke on a distant mountain-top. The smoke alone is visible but no fire can be sighted. The rocks in front no doubt hide the fire from our view. Thus, the smoke alone is seen rising in the sky. Even so, although not visible, we have no hesitation in coming to the conclusion that there is a fire on the mountain. This is called ‘Anumaana’. Here, what helps us to conclude that fire is possible and which provides the evidence to come to such a conclusion is the smoke. This is called saadhana, linga or hetu.
Now, according to the Vedantic doctrine, which we profess, we must meditate on the Upadesa, after being initiated into it by a Guru. This is called ‘Manana’. This is to constantly keep in mind what the Guru has taught with the help of one’s own mental devices (Yukti). Here Anumaaana lends a hand. It is only through Anumaaana that things that cannot be actually perceived are cognised on the basis of other proofs. The Paramaatma and Jivaatma cannot be brought within the ken of our sensory perceptions like the eyes, ears, mouth, nose and so on. The ultimate state of Moksha or liberation is also beyond their grasp. All these can be understood only through ‘Anumaaana’ or reasoned deduction. Knowing the unknown through the known is Anumaaana.
By performing Vedic karmas, we get mental purity. A good Guru gives certain instructions in which we have faith. At this stage, if somebody else says something different, doubts assail our mind. Therefore, before coming to a conclusion, we must run through the whole gamut of possible objections. Proofs such as Anumaaana help us so as to examine our beliefs. The Nyaaya Saastra and Vaiseshika depend mostly on Anumaaana in their disquisitions.
“Padaartha” (पदार्थ) Meaning of Words.
All our systems of philosophical discussions believe that, if one were to go right down to the very bottom to grasp the meaning of words, the Vedic truths will be better understood. All ‘Pramaanas’ (proofs or channels which lead to understanding) should be used before coming to a conclusion. The proof or channel through which understanding is made possible is Pramaana.
There are only a limited number of things that come within the ken of Pratyaksha Pramaana direct perception through eyes, nose and so on. More things are outside their reach than within. These are grasped by Anumaaana Pramaana proof arising from deduction. Let us consider Anumaaana further. It helps the intellect in its effort to understand the Vedic truth. That is why Nyaaya has been classified as an Upaanga an auxiliary to the Vedas. Meemaamsa helps through the ears, while Nyaaya helps through ‘Manana’ meditation or cogitation and by constant repetition.
In Nyaaya, ‘Padaartha’ (पदार्थ) understanding has been divided into seven kinds, or invested with seven dimensions. Since all matters that require to be understood cannot be listed individually, they have been grouped depending on the medium through which their understanding is made possible. These seven fall under two headings. ‘Bhaava, that which exists or has presence and ‘abhaava’, that which exists not or has no presence. Of these seven groupings, ‘abhaava’, non-existence negation is the seventh. ‘Bhaava’, or those with existence are divided into six kinds.
The question arises as to how one can conceive of a matter that does not exist. Negation is not a positive concept but the word ‘negation’ has a definite connotation and meaning too.
Lack of existence or presence exists in some places and does not exist in some other places. “Here there are no flowers.” That is, here, there is the existence or ‘lack of flowers’. “There, the flowers are present on the altar.” The lack of existence (abhaava) is not there. Thus abhaava exists in some places, and does not exist in some other places. Likewise, it exists at certain times, and does not exist at certain other times. Therefore, abhaava has a definite existence, in as much as it is present at certain times or at certain places.
The seven dimensions of ‘Padhaartha’ are: Dravya (द्रव्य) or matter, (ii) Guna (गुण) Quality, (iii) Karma (कर्म) Activity, (iv) Saamaanya (सामान्य) species, (v) Visesha (विशेष) peculiarity or special attribute, (vi) Samavaaya (समवाय) connection between individual and species and (vii) Abhaava of matter and its quality or lack of presence. Dravya, Guna and Karma are termed as ‘Sat’ or those which can be shown to exist. The remaining four cannot thus be pointed out. Of the three belonging to ‘Sat’, Dravya can be physically shown. Knowledge, desire, happiness, sorrow and such qualities cannot be separated and shown from subjects on whom they depend for their existence. Lotus is red; it is its attribute. It cannot be isolated from lotus. Thus ‘Guna’ is resident in an object. The thing to which it is attached is Dravya, or matter. Although happiness and sorrow cannot be isolated from a subject and shown, we can see a person who is happy or sorrowful. Thus these two emotions get to be known. When we see a red lotus, we understand what red means. Karma is work or action, movement, walking, running etc.
They also are attached to Dravya and cannot exist by themselves. The act of running cannot be separated from the one who runs. We can see him running and we can also distinguish running from sitting, sleeping etc. That is how we see and identify running. Saamaanya, the fourth of the Padaartha, refers to the jaati or species. There is a herd of cows. The act of being a cow is common to all of them and they can be generalised as cows. This is what we call the species which is present in every cow. Although belonging to a species, each cow has an individual quality. This is ‘Vishesha’. Although belonging to the cow species, each cow can be identified as there are some special distinguishing features in each. Dravya and its quality, Dravya and its work or function, generality as in species and individuality, a whole matter and its separate limbs – the whole object and its various parts which cannot be separated this is Samavaaya. Fire has brightness which cannot be separated from it. It is Samavaaya. If matter joins matter it is called ‘Samyoga’. These can exist separately or together. Dravya and Guna are Samavaaya. Dravya and Karma are also Samavaaya. Because Guna and Karma cannot exist by themselves. they are necessarily attributes to matter.
I have already dealt with Abhaava, which comes last as the seventh. Just as all matter has been classified under seven heads, each subject has been classified under several categories. Dravya has been divided into nine types. These are Prithvi (earth), Aap (water), Tejas (fire light), Vaayu (air), Aakaasa (space), Kaala (time), Dik (direction), Aathma (soul) and Manas (mind). Of these, the first five are called Pancha Bhootha. Space permits the remaining four to exist in it. There is a point to wonder at regarding these Pancha Bhoothas. Corresponding to each of these, the body has five senses of perception.
The eye which sees, the ear which hears, the tongue which tastes, the sense of touch which distinguishes heat and cold, the nose that smells, these are the five instruments of perception. The sense of perception is not merely confined to the outer skin. It is spread all over the body. It is also present inside the body. For example, stomach or heartache is felt by the sense of touch located inside the body. These five sensations can be felt only through the appropriate organs. Sight is confined to the eye; one cannot see through the ears. The music which can be heard through the ear cannot be heard through the eye or nose. If something is placed on the tongue, its taste can be felt but not its smell. The sweetness of sugar cannot be discerned by the nose. Thus, each of these organs can know only one of the five attributes. The guna called ‘roopa’ is known only to the eye. Roopa is the colour and dimensions of an object. White, yellow, black, green, red and brown are the colors. Sounds and their variations are discerned by the ear. Good and bad smell are distinguished by the nose. The six types of tastes (Rasas) are identified by the tongue. The organ of touch distinguishes heat and cold. Thus the five ‘Indriyas’ or sense organs are able to observe or sense the five gunas. These are called “Jnaanendriyas”. If these organs were absent, then these gunas would have been beyond our comprehension. If we had six sense organs, we could have perhaps identified six gunas. Possibly, if we had a thousand such organs, we might have been able to discern an equal number of different qualities of matter. We do not know how many things are present in this world. If we did not have the sense of touch, we would not have known the existence of heat or cold. We owe our knowledge of thermal variations to this guna. We find the blind and the deaf being unaware of roopa (form) and sabda (sound), respectively, although there is no dearth of these in this world. Eye, tongue, nose, skin, (sense of touch) and ear – these five sense organs have their corresponding vishayas or object of discernment in Roopa (form), Rasa (savour), Gandha (smell), Sparsa (touch) and Sabda (sound).
These five gunas appropriate to these vishayas are present in the Pancha Bhootas or five elements. In earth, all these five are present. Earth has form and taste. Our body, a vegetable, sugar candy are all of the earth only. Earth has smell too. The flower is of the earth. Hardness, heat and cold are also of the earth. Earth has sound too. A tightened string produces sound. So does a stick when it is used to beat another object. In Rasa or water, except for smell, all the other four qualities are present. When water is beaten, sound is produced. Although the earth has five qualities, it has one which none of the other four elements have viz., smell, which is the special quality of Earth. The main or special quality of water is Rasa or taste. If there is no water, there can be no perception of taste. That is why in the organ which identifies taste, viz, the tongue, water is always present. If the tongue is dry, taste is not discernible. Rasa also means water. Tejas (Fire) has neither smell nor taste, it has only Roopa (form), Sparsa (touch) and Sabda (sound). Its special quality is Roopa. There is no Roopa in Vaayu or air. It has only Sabda and Sparsa. Its special quality is Sparsa or touch. That is why when the wind blows, the body feels it. Aakaasa (space) has only sound. Modern science had earlier thought that air or the wind was responsible for producing sound. After the discovery of wireless transmission, it is slowly being realised that sound is a quality of space wireless transmission is not dependent on the flow of winds.
The sky or space, with a single guna of sound, vayu which in addition to sound has sparsa or ‘touch’, Agni or Fire which in addition to sound and touch, has roopa or form visible to the eye, water having Rasa or savour and earth which has smell in addition to the four gunas these are the Pancha Bhootas or the five elements.
There are Dravyas or matters which represent the Pancha Bhootas on whom depend the gunas for their discernment. The balance out of the nine Dravyas (excluding the above five) are Kaala or time, Dik or direction, Aatma, the soul and Manas, the mind. The hour, yesterday, tomorrow, today, year, yuga, etc., refer to time or kaala. Direction is territory, up, down, there, here, etc. Aatma is that which has the mind which is able to conceive all these principles. Aatma is of two types, the Jivaatma and the Paramaatma. The one who merely witnesses all that happens in this world is the Paramaatma. The one who gets involved with the world and becomes miserable is the Jivaatma. Jivaatmas are many; Paramaatma is one. Both are Chaitanya i.e. sentient. Vedanta says that awareness or intelligence is itself Aatma. On the other hand, Nyaaya Saastra says that one who possesses the awareness is Aatma. The one with the dulled awareness is Aatma, says Nyaaya, which is the doctrine of Dvaita (Dualism). But as per Vedanta, awareness, which is without a second, is Aatma. There is nothing else that can be known as different from it. There can thus be no question of any ‘dull’ Aatmas or Jivaatmas. But, according to Nyaaya, awareness is wedded to guna. Aatma is matter, awareness is its guna or quality. Aatma is the abode of jnaana or intelligence, knowledge and the ability to know.
There is nothing that exists outside the fullness of knowledge. Hence Nyaaya calls Paramaatma as the Supreme Knowledge. The Jivaatmas or the individual souls have only a limited awareness. Hence they are called ‘Kinchithajna’ meaning, with scanty knowledge. The Paramaatma is ‘Sarvajna’ or all-knowledge, all-knowing. We are the abode of both full jnaana and scanty jnaana, i.e. a combination of both. On the other hand, Paramaatma is the repository of total jnaana. The Aatma is Vibhu, all-pervading. Although the Nyayasaastra also says that Paramaatma is all-pervading, the difference between Paramaatma and Jivaatma is not recognised. That is because, in the view of this Saastra, intelligence exists separately in each Jiva. The place where it resides is the mind. The mind alone causes the feeling of happiness or sorrow.
As per Nyaaya Sastra, gunas or qualities are divided into twenty-five types and karmas, action, into five types. The Nyaaya Sastra says that, if one has a correct Padaartha jnaana (true concept of matter), truth will become known when the mind will reject the rest as unimportant and thus attain the Moksha state, where there is neither happiness nor sorrow.
Although we may strive for Moksha, as per the Vedantic concept, Mananá (meditation) which is necessary for cogitating on the guru’s upadesa, which is the Nyaaya method, is most useful. We come to know of the Pancha Bhootas, Jivaatma and mind. How can the Paramaatma be known? He is unknowable. Anumaana or deduction is essential to know him. To know the rest, the pramaana or the proof which the sense organs are capable of collecting is sufficient. The Sruti says that Paramaatma exists. Nyaaya avers, on the basis of deduction (Anumaana), that Paramaatma must necessarily exist.
Let us now examine a small example of Anumaana. That the chair on which I sit must have been made by some carpenter is known. Because we have not actually met the man who made it, can we say that this has not been made by the man. We have seen other chairs being made. On that basis, we know that this one must also have been made by a carpenter. We also know that it is within the capability of the carpenter to make a chair. Likewise, there must be a creator of this universe. He is all-knowledge, all-sakti, all-power. Since he protects all, he should be all-mercy too. Nyaaya Saastra establishes such matters by discussing the pros and cons and with the aid of proper deduction.
Pramaanas or Authorities
In addition to Pratyaksha and Anumaana, Nyaaya has two other pramaanas. These are Upamaana (simile or example) and Sabda (sound).
What is Upamaana? It is to know something which we have not known on the basis of similarity with the thing already known. There is an animal called ‘Gavaya’. We do not know what it looks like. It is described as something resembling a cow. We happen to go near a forest. There we see some animal resembling the description. We then come to the conclusion that it must be the Gavaya we have been told about. This is Upamaana.
Sabda pramaana is Vedic text and the (oral) sayings of great men. When the Vedas and the great men (like Rishis) say something, we must accept it as authority as it can never be false. It is the tenet of Naiyaayikas (those who belong to the Nyaaya School) that the Vedas are the utterances of the Lord Himself. That is why they are their own pramaana. The sayings of great men who are without question truthful (in thought, word and deed) are also included in the Sabda Pramaana.
These four pramaanas form part of the Meemaamsa doctrine propounded by Kumarila Bhatta. In addition to these, he has added “Arthapat” and “Anupalabdhi”, making the number of pramaanas six. We of the Advaitic faith have accepted all these six pramaanas. ‘Arthapat’ has been made easily understandable by our Saastras by giving an illustration.
It takes a sentence reading as पीनो देवदत्तो दिवा न मुड़क्ते (Peeno devadatto diva na bhungte). This means that “fat Devadatta does not eat during the day. He has not become thin even by not eating during the day and he still remains fat. What does this understanding lead to? That he eats well during night. It reconciles other absurd conclusions like (i) that he does not eat at all. (ii) even though he does not eat at all, he does not become thin. This reconciliatory approach which eschews obviously absurd conclusions and finds an acceptable way out is Arthapat.
Our deduction that Devadatta eats at night does not belong to the second of the pramaanas listed above, viz., Anumaana. Anumaana requires the factor of identification to be inherent in the matter that requires to be identified – like thunder from the clouds or smoke from the fire. Here there is no such linga premise.
So is the case with Upamaana. It does not fall in the category of Anumaana merely because we deduce it to be ‘Gavaya’ on sight. Here too, our deduction is not based on identification of the animal by its form. We find the description of a ‘gavaya’ which is already within our knowledge coming true by similarity.
The last of the pramaanas is ‘Anupalabdhi. This is merely to know that a thing does not exist. I said that the last and the seventh of the Padaarthas mentioned in Nyaaya is Abhaava. How do we understand Abhaava? With the help of Anupalabdhi.
‘Go and see if there is an elephant in that shed’ we go and see and would know there was no elephant if there was none. The elephant is not seen, but the fact that it is not there is known. This fact emerges from the state of there being no elephant. Thus what comes to be known in the absence of an object is Anupalabdhi. Nyaaya Saastra does not recognise these two pramaanas. These are used in Meemaamsa and Vedanta of the Advaitic School.
Common sense or sense of discrimination is only for showing God to us. When we thus go on examining with the help of these various pramaanas, where Nyaaya leaves off, Vaiseshika takes over. The founder of this method is a sage called Ganata, who concludes that all subsist on atoms. He said that Isvara arranges the atoms in various ways and creates the world.
In Nyaaya and Vaiseshika, the world and soul are deemed to exist separate from Isvara which is actually the Dvaitic (Dualistic) Siddhaanta.
Where did the intellect of the sentient Jiva come from? Where did the insentient atom come from? Questioning on these lines, one reaches the Advaitic Siddhaanta that all these are the various appearances of Paramaatma.
To reach this Advaitic conclusion, Nyaaya is required as an intermediary step. To give due place to discrimination and logical conclusions is indeed the role of Nyaaya or Tarka (logic). It indulges actually in intellectual examination and research. It also shows that rationalism need not necessarily be atheistic or solely materialistic. The basic fact is that the world with its myriad beings and orderly conduct of life should necessarily have had a creator. Nyaaya Saastra accepts that there are limitations to intellectual understanding and therefore enjoins that, since there are areas which we cannot conceive of by any kind of proof, we must accept the verdict of the Vedas.
In short, logic should not be stretched indiscriminately to the extent of illogicity i.e. Tarka should not become Dhustarka but should serve as a means of arriving at the ultimate Truth.
It would indeed be commendable if no intellectual enquiry is indulged in and God and Saastras are fully accepted. But then such total and unquestioning faith that can take us up to the level of God-realisation is hard to come by. In such a case, one’s life may well pass without sleeping and idleness. I would rather have a man using his thinking faculty and even come to the wrong conclusions that there is no God and atheism is the true religion. I would rate such an atheist who has laboured hard to reach that conclusion higher than a man of unquestioning faith who had not cared to exercise his mind at all. If that atheist continues with his enquiries, he may get mental clarity at some stage and may give up atheism. But the other lazy fellow has no hope at all.
That is why Charvaaka philosophy which is an atheistic doctrine was originally recognised as one kind of religious faith. Charu and Vaaka literally means what is good to the ears. “Let us not torture ourselves with fasting, austerities, mental and physical restraints. There is no need to bother with gods or demigods. Let us give free play to the mind and body and enjoy ourselves” – This, which is sweet to hear, is the essence of the Charvaaka doctrine.
But, whilst conducting one’s life on these lines, sorrow creeps in along with pleasure. In fact, there is more of the former. Only faiths other than purely materialistic offer lasting remedies for this sorrow.
All kinds of intelligence is required.
Philosophical enquiry will be helped considerably only if the mind and intellect are honed sharp with deep introspection. That is why Adi Sankaracharya, who summed up that all the phenomenal world was Maaya or illusion, has been accepted as Jagat Guru or world teacher by even those who have mastered all Saastras, arts and sciences.
Nyaaya is also known as Tarka (logic) and Anveekshiki (metaphysics). Our great Sankaracharya had thoroughly mastered this anveekshiki or Nyaaya, Saankhya which is also called Kapilam, because sage Kapila established it, the Yoga Saastra which is called Patanjalam after sage Patanjali, and Bhatta which is the faith advocated by Kumarila Bhatta.
Faiths that do not take note of Advaita are also contained in Advaita. This is why I, who also bear the name of Sankaracharya, am talking about all kinds of Saastras. Advaita contains in itself various other faiths such as Dvaita, Visishtaadvaita, Saivam and Vaishnavam. Although the other faiths may condemn or criticise Advaita, the latter contains within itself all the others as part of it. Even in those situations where Advaita is critical of the other faiths it is only to the extent that they are not allowed to affirm their faith as the only true faith and that Advaita is wrong. The other faiths are never condemned by Advaita as totally unacceptable. They are given due recognition and importance at the appropriate time and place and level of development.
Treatises on Tarka Saastra
Gautama who wrote the Nyaaya Sutra is also known as Akshapaada. Since he was so constantly engaged in introspection, he was said to be wholly impervious to the world around. Even these days professors and scientists, who are deeply involved with subjects, are termed absent-minded. Their absent-mindedness is the subject of many a quip or joke. Gautama was one such. One day, his walk led him to a well into which he fell. The story goes that God rescued him and, to prevent further accidents, he placed a pair of eyes in his feet. He blessed him whereby the involuntary steps whilst walking would be guided away from obstacles by the involuntary action of the eyes. Since he acquired eyes in his feet he came to be known as ‘Aksha (eye) Paada (feet). This is another way of expressing that God guided his footsteps. Vaatsyaayana wrote a commentary on his Sutra. The Vaartika (glossorial exposition was made by one Udyotakara. The great Advaitin, Vaachaspathi Misra, has written a commentary on this Vaartika. It is called “Taadparya Teekaa Parisuddhi”. Udayana has also written a book called “Nyaaya Kusumaanjali”. He is chief among those who were responsible for condemning Buddhism and making it scarce in our country. Jayanta has written a commentary on Nyaaya Sutra with the name of Nyaaya Manjari. One Annam Bhatta has written a book called Tarka Samgraha and has himself written a detailed deepika on it. Normally, those who set out to study Nyaaya Saastra begin with the last named two books.
Prasastapada has written a Bhaashya-like treatise on the Vaiseshika Sutra of Ganata Maharshi, called “Padaartha Dharma Samgraha”. Udayana has written a detailed commentary on this. Very recently Utthaamur Viraraghavaachariya has written a book called “Vaiseshika Rasayana”.
Vaiseshika goes by another name too “Oulukya Darsana” Oulukya is something connected with the owl. It is said that Ganata himself came to be called as Ulooka. If Gautama fell into a well because of extreme absent-mindedness and preoccupation with his deep thoughts Ganata used to be busy all through the day with his research and go out for biksha (collecting alms) at night. Since he was not seen during the day and was moving around only at night, he was nicknamed as an owl. (When in Bhagavad Gita the Lord says that the night of the man without knowledge is the day of the man with knowledge (jnaani), he classifies jnaanis as owls.) Since it was propounded by Ganata, Vaiseshika is known as Ganata Saastra. It is the opinion of the learned that Vyaakarana (Grammar) and Nyaaya (logic) are most helpful in understanding all the Saastras.
The reason why this world was created
Causes are of two kinds: Nimitta (निमित्त) and Upaadaana. (उपादान). If there is an earthen pot, there must be a thing called clay to make it from. Clay is the Upaadaana the reason for the pot. But how does the clay become the pot? It cannot make itself into one. The potter has to make the pot with clay. If clay has to be made into a pot, a potter is also required. He is the Nimitta, cause.
The Nimitta or omen mentioned in the Jyotisha Saastra or astrology is different. The view of the Nyaaya Vaiseshika doctrine is that, using the atoms as Upaadaana, Isvara as the Nimitta Kaarana has created the world.
To convert mud into a pot, it is absolutely necessary to have a potter. If he were not available, the pot can never be created. This is known as Aarambha Vaada or Asat Kaarya Vaada. Sat is what is existing. Asat is non-existing. In mere mud, there is no pot. The non-existent pot came into existence out of it. It is said that, likewise, Isvara with the help of atoms which do not contain the world, had created the world. This is the theory which Nyaaya posits.
According to the Saankhyas, as I said earlier, God is non-existent. According to them, nature or Prakriti threw up the world from itself. This is not to be regarded as the same as the view of modern atheists. That is because Saankhyas recognise the attributeless (Nirguna) Brahman or the Purusha which is total knowledge (Jnaana Swaroopi). They attribute the orderly behaviour of the insentient Prakriti, in this world as due to the influence or Saannidhya (सान्निध्य) or proximity of the Purusha. The nearness is responsible for ensuring creation and orderliness. The Purusha as such does not indulge in any activity. Because of the rays of the sun, water evaporates, plants grow and clothes dry. These are due to exposure to the influence of the sun. The sun obviously has no plans or desire to dry the pond or make a particular plant to grow. When we keep our hand in ice-cold water, the fingers become numb. On that basis can we conclude that it was the intention of ice-cold water to benumb fingers? Likewise, although the Purusha does not at all indulge in the act of creation, Prakriti derives its power, under the influence of Purusha, to create something out of itself. Isvara does not interfere in any way as Nimitta Kaarana. Prakriti thus manifests itself as creation. This is the doctrine of the Saankhyas. This is also called Parinaama Vaada – theory of transformation.
In contrast to the Asat Kaarya Vaada of the Naiyaayikas, the Saankhyas project the Sat Kaarya Vaada. The Asat Kaarya Vaadis say that the pot, which does not exist in the Upaadaana Kaarana, which is the mud, is brought forth into existence by the Nimitta Kaarana, the potter. The Sat Kaarya Vaadis, the Saankhyas, argue thus: the pot was involved in the mud ab initio. The miller grinds the oil seed which contains oil to produce oil. Likewise, the pot which is already immanent in the mud is made to appear as pot through effort. The pot can result only by using the mud. It cannot be made from oil seeds, or conversely oil cannot be extracted from mud. The pot contains nothing but mud atoms. If their arrangement is manipulated, the pot results.
Our Acharya, Sankara Bhagavadpada, however, says: ‘Neither the Aarambha Vaada nor the Parinaama Vaada is logical. Brahman, with the aid of Maaya, has assumed the garb of creation. There is no mud different from or apart from the Cosmic potter. Thus Aarmbha Vanda can have no validity. To think that the Paramaatma created the world by Parinaama transformation like milk into curds is also not correct. Because, after such transformation, there can be only curd and no milk. So it would be absurd to say that the Paramaatma lost his identity after transforming himself into creation. Therefore, it is not also Parinaama. He remains himself as pure knowledge or Jnaana on one side, and presents the other side as Jiva and Jagat. All this is the appearance of the one and only Sat – manifestation – play-acting. If a man plays a role in a drama, does he really lose his original identity? So is creation. Even with all its myriad manifestations, the Sat remains unaffected by itself. This was Sankara’s bold and sweeping assertion. It is called Vivarta Vaada (विवर्तवाद).
A rope giving the illusion of a snake is Vivarta. The rope which is the Upaadaana Kaarana has not been converted by another Nimitta Kaarana into a snake. Thus it is not Aarambha Vaada. The rope has not been transformed into a snake. The rope remains as rope. But, due to our lack of true knowledge (perception), the rope looks like a snake. Likewise, due to Avidya lack of true knowledge – the Brahman appears to us to be the world, creation and individuals comprised therein.
To realise the truth propounded by the Acharya various devices of analytical enquiry (Vichaara Yukti) are detailed by Nyaaya Saastra. The true nature and significance of matter, Padaartha (पदार्थ) is to be understood by using these analytical methods. From here, one attains dispassion or vairaagya. From here one goes to a region called “Apavarga” (अपवर्ग), where there is no happiness or sorrow. Here stops the Nyaaya-Vaiseshika doctrines.
According to Dvaita or the Dualistic Siddaanta too, one can go no further. Advaita, which postulates one comprehensive ‘sat’ (सत्) by which we also become It leads to full and total Moksha or release from the cycle of births and deaths.
But, Nyaaya has the merit of inducing us to go to a better world called ‘Apavarga’ instead of being content with life as we find it in this world.
This Saastra has another claim to distinction. It has projected all conceivable types of arguments and devices (Yukti) in negating the doctrines of the Buddhists, Saankhyas, and Charvakas and proving the existence of Isvara as the creator of this world.
Some anecdotes and arguments
Gangesa Misropaadhyaaya, in his book “Tatva Chinthamani” has listed 64 different arguments. So far we have been taxing the brain with abstruse thoughts. Let us have a slight deviation with an anecdote about Gangesa Misra.
Gangesa to begin with was not a bright boy. He belonged to a high caste brahmin family – Kulina Brahmin of Bengal. It was the custom in Bengal to get these high class brahmins married to a number of brahmin brides, including those not so highly placed or not so kulina. A kulina brahmin thus used to take many wives even up to fifty in number. But Ganga Misra had only one wife and he lived with her parents. Obviously he did not get more offers for marriage as he was apparently a dim-witted person.
The Bengalis eat fish and in Bengal, due to heavy rains and many rivers, many places get water-logged for many months in the year. There would be no dry land to grow vegetables. During this period they consumed fish, which was in abundant supply. In East Bengal, fish was even called Jala Pushpa, the water flower, implying that it was tantamount to a vegetable. This was bow the habit of fish eating developed in Bengal due to scarcity of vegetables.
It was the custom in Gangesa’s father-in-law’s household to cook fish for food. Gangesa used to be called ‘Ganga’ for short. Since he was considered dull, they used to serve him with only fish bones. The others got the meat. They then used to make fun of him. He couldn’t stand the ridicule. He quietly left for Kasi (Benaras) one morning. He studied there avidly for ten years. Those at home ignored his absence as of no consequence. When he returned home after his studies, every one thought that he must have knocked around aimlessly and returned home the same dulled as before. He sat for his meal. As was the past practice, he was served fish. They were surprised to hear him remark “Naaham Ganga Kimtu Gangesa Misra” (नाहं गंगा किंतु गंगेश मिश्र), I am no longer Ganga, I am Gangesa Misra, meaning: If I was the old dull Ganga, then it would be all right to serve me the bones, but I am now a learned man, competent to add the suffix of Misra (Pundit) after my name – he indicated all this in a short and sweet way. His in-laws then realised his worth.
The same Gangesa Misra wrote the Tatva Chintaamani (तत्व चितामणी). Many persons have written commentaries on it. One Raghunatha Siromani has written a commentary on it. It was only after the time of Raghunatha Siromani that the title of “Siromani” came to be used to indicate a senior level in Sanskrit education. One Gadaadhara (गदाधर) has written a huge tome in explanation of only ten of its slokas. But not a single sentence thereof can be regarded as superfluous. The book written by Gadhaadhara is called Gadadhari (गदाधरी). If one reads and understands five vaadas (वाद) or arguments from this, he can be regarded as a clever man. If he reads ten of these, he can be deemed very clever. One of the arguments or vaada is called ‘Praamaanya Vaada’ (प्रामाण्य वाद). It is said that one who masters it becomes the cleverest of all. Even to this day those studying Tarka Saastra use Gadaadhari as a text.
The Praamaanya Vaada or discussion on Pramanas or proofs, I mentioned, would make the head reel when I try to explain it. But at the time our Acharya was living, even the parrots in the cage hung outside Mandana Misra’s house are said to have been discussing Praamaanya Vaada.
Adi Sankara went to the city of Mahishmati where Mandana Misra lived. He asked from some women who were carrying water home from the river as to where Mandana Misra’s house was. In that city, even ordinary women were learned. Therefore, they replied to the Acharya’s query in the form of slokas or verses. One of the slokas said to have been used to direct Sankara to Mandana Misra’s house was as follows:
Swahapramaanam Paratahpramaanam
Keeranganaah yatracha samkirante
Dwaarastha needaantara sanniruddha Jaaneehi tat mandana panditowkah
स्वतः प्रमाणं परतः प्रमाणं कीराङनाः यत्रच संकिरन्ते द्वारस्थ नीडान्तर सन्निरुद्धा जानीहि तत् मण्डन पण्डितौकः
“Where the female parrots argue about swatah pramaana and paratah pramaana know that house belongs to the learned Mandana.” From this, it will be seen that in ancient India not only men but women also were learned. Not only women but even female-parrots too were proficient in Vedantic enquiries. That is what the sloka indicates.
Having said so much, let us get a little nearer to this Vaada difficult though it is. There is even a humourous anecdote about it.
A South Indian went to Navadweepa in Bengal to study Tarka Saastra or the science of logic. Bengal had in those days the distinction of having many who had mastery over the subject. The one who went from the South was a gifted poet. He had earned a lot of money through his poetic works. He went to Navadweepa to study Praamaaanya Vaada first-hand from the masters. He studied but could not understand much. He tried further. As a result, his flow of poetry suffered. Constant combat with logic blunted the edge of his poetical compostions. His money also got spent. He also lost the capacity to earn more through composing poems. At this double loss, his misery knew no bounds. Not having absorbed Praamaanya Vaada, he poetically wailed with what little poesy was left in him. “I bow to the Praamaanya Vaada which has robbed me of my poetry.”
If an object is seen, we become aware of it. Sometimes, awareness is correct; sometimes it is not so. We may mistake alum for sugar-candy at first sight. That is faulty knowledge. Correct knowledge is called “Prama”. Faulty one is Bhrama. Jnaana, (ज्ञान) or knowledge is further classified into two namely, Samsaya Jnaana (doubtful knowledge) and Nischaya Jnaana (certain knowledge). That knowledge which is fraught with doubt is Samasya. That which is known for certain without any doubt is the Nischaya Jnaana. Sometimes, when knowledge is faulty, it does appear to be correct. Then this knowledge will be taken as a Pramaana, authority or proof like alum being genuinely taken for sugar candy. Some knowledge or awareness appears doubtful even to begin with. When we see the images of trees upside down in a pool of water, we know that the trees are not standing topsy-turvey and hence we discredit the evidence or Pramaana. Thus, even at the time of initial awareness, or onset of knowledge, it gets classified as true or otherwise. The knowledge that will hold good even after the lapse of time, is Praamaanya Griha Jnaana. That which ab initio rings false is Apraamaanya Grhaaskandita Jnaana. As in “Prama” (प्रम) or true knowledge, even in Bhrama – or false knowledge, the knowledge through Pramaana or proof (identity) is present. That is why even when alum is mistaken for sugar candy, our awareness is genuine pramaana or proof.
Thus there are two types of proof, viz., one which strikes us as real initially or the one which strikes us as unreal initially. Now, the question arises whether the true false knowledge arises subjectively from our perceptive faculties or it is objectively caused because of the quality of the object perceived. If the fault is due to us, it is Swatahpramaana. If the fault is due to the nature of the object, it is Paratahpramaana.
Which of these is correct was the subject of discussion of the female parrots outside Mandana Misra’s house.
When we cognise an object, it is not subjectively possible for the cognising mind to decide whether cognisance is correct (Pramaana) or incorrect (Apramaana). The decision depends on the nature of the quality possessed by the object. Unless we test the function of the object in its impact on us, it is not possible to conclude whether its cognised identification is right or wrong. In other words, our cognisance or perception is objective – this is the view of Nyaaya Saastra. But the view of Meemaamsakas like Mandana Misra is contrary to this. They aver that it is within the domain of our wisdom to decide the true nature of the object. But when our cognisance subjectively can be proved wrong (Apramaana), it is solely due to the nature of the object. In other words, correct cognisance or Pramaana depends on us, and incorrect cognisance depends on the object. This is their contention. All these discussions are the subjects dealt with by Tarka – Logic.
The word ‘Vaada’ discussion is generally taken these days to mean arguments used to somehow uphold one’s views or stand. In actual fact, it should be a balance between the views of both the parties discussing. Nay, it should throw up a conclusion based on all the arguments used, for or against. When we say that our Acharya went all over the country in vaada or wordy combat with many learned men like Mandana Misra, we mean just this, that he freely exchanged views which invariably proved him to be right. He firmly established the supremacy of Advaita, after taking into account all the arguments used by his antagonists. Therefore, vaada is exchange of thoughts, not merely justifying one’s own point of view. The name for upholding with argument one’s pre-determined conclusion is ‘Jalpa’ and not vaada. There is a third classification also. Instead of having an opinion as in Jalpa, to oppose whatever the other party says and find arguments somehow to prove all opponents to be wrong is called “Vitanda Vaada’ (वितण्ड वाद).
Since the time Gangesa Misra came back to Bengal as a very learned man, i.e. the 12th Century, the Nyaaya Saastra had a renaissance. Having started afresh in Bengal, it grew in strength and came to be known as ‘Navya Nyaaya, ‘Navya’ meaning new. There is another reason why it came to be so called. ‘Navadweep’ is the place in Bengal where Gangesa Misra and his followers who came after him lived. Navadweep is called Nadiad also Sri Krishna Chaitanya also hailed from this place. He was also a very learned man who had mastered all the Saastras. Later, he resorted to reciting Krishna’s name as Bhajan Sankeertan and established the cult which believes that singing God’s name is the way to attain liberation or Moksha.
Although Nyaaya Saastra propounds such theories as: “The world is real and not illusory (Maaya): the individual souls are many and are different from the cosmic soul (Paramaatma)”, with which Advaita does not agree, it condemns atheism (Nireeswara Vaada) and strongly affirms the existence of God. Since the arguments it provides for this purpose serve as the foundation to the subsequent reasonings (Yukti) which lead to Advaita, it is regarded as an important Saastra or Science.
Nyaaya is an Upaanga of Veda because it contains highly in-tellectual and logical discussions. However, Puraana which comes next amongst the fourteen disciplines (Chaturdesa Vidya) is regard-ed by many among the modern generation as mere superstition. Let us now examine this a little further.
Harih Harah!!
वेदों के उपांग: न्याय
– तर्क एवं समीचीनता का विज्ञान
न्याय शास्त्र को आम तौर पर तर्क शास्त्र के नाम से भी जाना जाता है । इसे ऋषि गौतम ने लिखा था । इसका मुख्य मकसद बहस के ज़रिए यह साबित करना है कि परमेश्वर ही इस दुनिया के बनाने वाले हैं । यह अंदाज़े से ईश्वर के होने को साबित करता है । इस तरह, यह एक ऐसा शास्त्र है जिसका यकीन दिलाने का मुख्य ज़रिया निगमन (व्यापक से व्याप्य तक का अनुमान) है ।
निगमन अपरिहार्य है (यानि किसी भी बातों को समझने के लिये अनुमान करके समझना अवश्यम्भावी होता है) । वेद एक खास विषय के बारे में बात करते हैं । वैदिक बातों का दायरा और महत्व मीमांसा (उत्तर) से तय होता है ।
भले ही हमें वेदों पर पूरा भरोसा हो, फिर भी मन में कुछ न कुछ गुप्त तरीके का शक बना रहेगा । इसलिए, ऐसे शक को दूर करने के लिए, कई तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं ताकि आखिर में यकीन पक्का हो सके । जब हम कोई खंभा खड़ा करते हैं, तो हम उसे ज़मीन में गाड़ते हैं और उसे आगे-पीछे हिलाते हैं, ताकि वह अपनी नींव में मज़बूती से बैठ जाए । इसी तरह, सच पर हर तरफ से तर्कों से प्रहार किया जाना चाहिए ताकि वे आगे बिना किसी और तर्कों के स्वीकार्य हो सकें । हमें किसी भी तरह के विवाद का स्वागत करना चाहिए । लेकिन ये स्वीकार्य आधार या अधिकार पर आधारित होने चाहिए । तर्क के लिए तर्क, कुतर्क या बकवास को बेशक नज़रअंदाज़ किया जाना चाहिए ।
जब आदि शंकराचार्य का आखिरी समय पास आ रहा था, तो उनके आस-पास जमा उनके शिष्यों ने उनसे आखिरी संदेश देने की गुज़ारिश की । नतीजतन, आचार्य ने उन्हें पाँच श्लोकों में एक संदेश दिया, जिन्हें उपदेश पंचकम या सोपान पंचकम या साधन पंचकम के नाम से जाना जाता है । इसका एक हिस्सा इस तरह है: “दुस्तर्कात्सुविरम्वतां श्रुतिमतस्तकोऽनुसन्धीयताम्” । यानी, “सिर्फ़ बोलकर बहस करने से दूर रहो, सिर्फ़ उन्हीं तरीकों को अपनाओ जो वैदिक सोच का सम्मान करते हों और एक ठोस आधार पर आधारित हों ।”
वैदिक सिद्धांतों को साबित करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले तरीकों को न्याय कहते हैं । जैसा कि मैंने कहा, यह शास्त्र गौतम ने लिखा था । ‘गणत’ नाम के एक और व्यक्ति ने भी एक न्याय शास्त्र लिखा है । इसे ‘वैशेषिक’ कहते हैं ।
हम दो चीज़ों में इसलिए फ़र्क करते हैं क्योंकि उनमें कुछ खासियतें होती हैं, हर चीज़ में कुछ ऐसी खूबियाँ होती हैं जो दूसरी में नहीं होतीं । क्योंकि यह खासियत (विशेषता या गुण) ही जाँच का मुख्य आधार है, इसलिए यह प्रक्रिया (सिस्टम) को ‘वैशेषिक’ कहा जाने लगा । न्याय शास्त्र, जो कि वैज्ञानिक ढंग (साइंटिफिक तरीके) से बढ़ता है, इस स्तर पर वैशेषिक कहलाता है जहाँ पर आध्यात्मिक मामले जैसे जीव (आत्मा), जगत (ब्रह्मांड), ईश्वर (भगवान) और मोक्ष (मुक्ति), जिन्हें वैशेषिक लोग ‘अपवर्ग’ के तहत वर्णन करते हैं । इन दोनों में तर्क (लॉजिक) और तत्व (फिलॉसफी) का इस्तेमाल होता है । फिलॉसफी को लॉजिक के ज़रिए बताया जाता (वर्णन किया जाता) है ।
न्याय शास्त्र चार तरीकों से असल सत्य (फन्डामेन्टल ट्रूथ) पर बात करता है । वे हैं: (१) प्रत्यक्ष, (२) अनुमान, (३) उपमान और (४) शब्द ।
पहला नाम, यानी प्रत्यक्ष प्रमाण, वह है जो हमारी इंद्रियों, जैसे देखना, सूंघना, सुनना, स्वाद वगैरह से महसूस होता है । सूची में अगला नाम अनुमान है, जो न्याय के हिसाब से सबसे ज़रूरी है ।
अनुमान क्या है ? हम दूर पहाड़ की चोटी पर धुआं देखते हैं । सिर्फ़ धुआं ही दिखाई देता है लेकिन आग नहीं दिखती । सामने की चट्टानें बेशक आग को हमारी नज़र से छिपाती हैं । इस तरह, सिर्फ़ धुआं ही आसमान में उठता हुआ दिखता है । फिर भी, भले ही दिखाई न दे, हमें इस नतीजे पर पहुंचने में कोई झिझक नहीं होती कि पहाड़ पर आग है । इसे ‘अनुमान’ कहते हैं । यहां, जो चीज़ हमें यह नतीजा निकालने में मदद करती है कि आग हो सकती है और जो इस नतीजे पर पहुंचने का सबूत देती है, वह धुआं है । इसे साधना, लिंग या हेतु कहते हैं ।
अब, वेदांत के सिद्धांत के अनुसार, जिसे हम मानते हैं, हमें गुरु से दीक्षा लेने के बाद उपदेश पर ध्यान करना चाहिए । इसे ‘मनन’ कहते हैं । इसका मतलब है कि गुरु ने जो सिखाया है, उसे अपनी मानसिक युक्तियों की मदद से लगातार ध्यान में रखना । यहाँ अनुमान मदद करता है । केवल अनुमान के ज़रिए ही उन चीज़ों को जिन्हें असल में देखा नहीं जा सकता वह अन्य सबूतों के आधार पर पहचाना जा सकता है । परमात्मा और जीवात्मा को हमारी इंद्रियों जैसे आँख, कान, मुँह, नाक वगैरह की पहुँच में नहीं लाया जा सकता । मोक्ष या मुक्ति की आखिरी अवस्था भी उनकी समझ से बाहर है । इन सभी को केवल ‘अनुमान’ या तर्क से किए गए अनुमान से ही समझा जा सकता है । ज्ञात बातों के जरिए अज्ञात बातों को जानना अनुमान है ।
वैदिक कर्म करने से हमें मानसिक पवित्रता मिलती है । एक अच्छा गुरु कुछ ऐसे निर्देश देता है जिन पर हमें भरोसा होता है । इस स्टेज पर, अगर कोई और लोग कुछ अलग कहता है, तो हमारे मन में शक पैदा होता है । इसलिए, किसी नतीजे पर पहुँचने से पहले, हमें हर तरह के संभावित आपत्तियों पर सोचना चाहिए । प्रमाण जैसे कि अनुमान हमें अपनी मान्यताओं की जाँच करने में मदद करते हैं । न्याय शास्त्र और वैशेषिक अपनी विवेचना में ज़्यादातर अनुमान पर निर्भर करते हैं ।
“पदार्थ” – शब्दों का अर्थ
हमारे सभी दार्शनिक (तात्त्विक – फिलॉसॉफिकल) विमर्श प्रक्रिया मानते हैं कि, अगर कोई शब्दों का अर्थ (मतलब) समझने के लिए बिल्कुल नीचे (गहराई) तक जाए, तो वैदिक सत्य को बेहतर तरीके से समझे जा सकेंगे । किसी नतीजे पर पहुँचने से पहले सभी ‘प्रमाण’ (प्रूफ या चैनल जो समझने की ओर ले जाते हैं) का इस्तेमाल किया जाना चाहिए । वह तथ्य (प्रूफ या चैनल) जिसके ज़रिए समझ मुमकिन होती है, वह प्रमाण है ।
प्रत्यक्ष प्रमाण की समझ में कुछ ही चीज़ें आती हैं – आँखों, नाक वगैरह से सीधे समझना । ज़्यादा चीज़ें इनकी पहुँच के अन्दर होने के बजाय बाहर ही होती हैं । उन्हें अनुमान प्रमाण – निगमन प्रक्रिया से ऊपर से नीचे तक प्रमाणों के सहारे अनुमान करते) समझा जाता है । आइए अनुमान पर और बात करते हैं । यह बुद्धि को वैदिक सत्य को समझने में मदद करता है । इसीलिए न्याय को वेदों का सहायक उपांग माना गया है । मीमांसा कानों से मदद करता है, जबकि न्याय ‘मनन’ ध्यान या सोच-विचार और लगातार दोहराने से मदद करता है ।
न्याय शास्त्र में, ‘पदार्थ’ की समझ को सात प्रकारों में विभाजित किया गया है, या सात आयामों से निवेशित किया गया है । चूंकि सभी ‘पदार्थों’ को समझने की आवश्यकता है इसलिये उन्हें अलग-अलग सूचीबद्ध नहीं किया जा सकता है, उन्हें उस माध्यम के आधार पर समूहों में बाँटा गया है जिस (माध्यम) के द्वारा उनकी समझ को संभव बनाया गया है । ये सात दो शीर्षकों के अंतर्गत आते हैं । ‘भाव’, जो मौजूद है या जिसकी उपस्थिति है और ‘अभाव’, जो मौजूद नहीं है या जिसकी कोई उपस्थिति नहीं है । इन सात समूहों में से ‘अभाव’, गैर-अस्तित्व का निषेध सातवां है । ‘भाव’, या अस्तित्व वाले छह प्रकारों में विभाजित हैं ।
प्रश्न यह उठता है कि कोई ऐसे पदार्थ की कल्पना कैसे कर सकता है जो मौजूद नहीं है । ‘निषेध’ (नकारना) एक सकारात्मक अवधारणा नहीं है, लेकिन ‘निषेध’ शब्द का एक निश्चित गुणार्थ (जातिबोधन) और शब्दार्थ (अर्थ, परिभाषा) भी है ।
अस्तित्व या उपस्थिति का अभाव कुछ स्थानों पर मौजूद है और कुछ अन्य स्थानों पर मौजूद नहीं है । “यहाँ कोई फूल नहीं हैं।” अर्थात्, यहाँ, फूलों का अस्तित्व या ‘अभाव’ है । “वहाँ, फूल वेदी (बलिवेदी या अग्निहोत्र का स्थान) पर मौजूद हैं ।” यहाँ अस्तित्व का न होना यानि ‘अभाव’ नहीं है । इसलिए अभाव कुछ जगहों पर होता है, और कुछ दूसरी जगहों पर नहीं होता है । इसी तरह, यह कुछ खास समय पर होता है, और कुछ दूसरे निश्चित समय पर नहीं होता है । इसलिए, अभाव का एक सुनिश्चित अस्तित्व होता है, ठीक वैसे जैसे (जितना) कि वह किसी खास समय या किसी खास स्थानों पर होता है ।
पदार्थ के सात आयाम हैं: (१) द्रव्य या मैटर, (२) गुण, (३) कर्म, (४) सामान्य प्रजाति, (५) विशेष विचित्रता या विशेष स्वरूप, (६) समवाय, व्यक्ति और प्रजाति के बीच का जुड़ाव, और (७) मैटर (द्रव्य) का अभाव और उसके गुण या उपस्थिति की कमी (न होना) । द्रव्य, गुण और कर्म को ‘सत्’ कहा जाता अर्थात वो जिनका होना दिखाया जा सकता है । इस तरह से बाकी चार को नहीं बताया (दिखाया) जा सकता है । ‘सत्’ से जुड़े तीन में से, द्रव्य को भौतिक रूप से (फिजिकली) दिखाया जा सकता है । ज्ञान, इच्छा, खुशी, दुःख और ऐसे गुणों को उन चीज़ों से अलग करके नहीं दिखाया जा सकता जिन पर वे अपने होने के लिए निर्भर हैं । कमल लाल होता है; यह उसका गुण है । इसे कमल से अलग नहीं किया जा सकता । इस तरह ‘गुण’ किसी चीज़ में रहता है । जिस चीज़ से यह जुड़ा होता है, वह द्रव्य या मैटर है । हालांकि खुशी और दुःख को किसी चीज़ से अलग करके नहीं दिखाया जा सकता, फिर भी हम किसी ऐसे इंसान को देख सकते हैं जो खुश या दुःखी है । इस तरह इन दो (भाव) इमोशन का पता चलता है । जब हम लाल कमल देखते हैं, तो हम समझते हैं कि लाल का क्या मतलब है । ‘कर्म’ का मतलब है काम या एक्शन, मूवमेंट, चलना, दौड़ना वगैरह । वे भी द्रव्य से जुड़े होते हैं और अकेले नहीं रह सकते । दौड़ने के काम को दौड़ने वाले से अलग नहीं किया जा सकता । हम उसे दौड़ते हुए देख सकते हैं और हम दौड़ने को बैठने, सोने वगैरह से भी अलग कर सकते हैं । इसी तरह हम दौड़ते हुए देखते हैं और तब दौड़ने का पहचान करते हैं । ‘सामान्य’, पदार्थ का चौथा आयाम, जाति या स्पीशीज़ को बताता है । गायों का झुंड है । गाय होने का काम उन सभी में सामान्य (संयुक्त तौर पर) है और उन्हें गाय कहा जा सकता है । इसे हम जाति (स्पीशीज़ – प्रजाति) कहते हैं जो हर गाय में होती है । एक स्पीशीज़ होने के बावजूद, हर गाय में एक अलग गुण (क्वालिटी) होती है । इसे ‘विशेष’ कहते हैं । गाय की स्पीशीज़ होने के बावजूद, हर गाय की पहचान इसलिए की जा सकती है क्योंकि हर एक में कुछ खास विशेषताएं (खासियतें) होती हैं । द्रव्य और उसका गुण, द्रव्य और उसका काम या फंक्शन, स्पीशीज़ के तौर पर (सामान्य) समानताएं और वैयक्तिक विशेषताएं (इंडिविजुअलिटी), एक पूरा पदार्थ और उसके अलग-अलग हिस्से (अंग) – पूरी चीज़ और उसके अलग-अलग हिस्से जिन्हें उससे अलग नहीं किया जा सकता, यह ‘समवाय’ है । आग में चमक होती है जिसे उससे अलग नहीं किया जा सकता । यह समवाय है । अगर मैटर मैटर से जुड़ता है तो उसे ‘संयोग’ कहते हैं । ये अलग-अलग या एक साथ हो सकते हैं । द्रव्य और गुण समवाय हैं । द्रव्य और कर्म भी समवाय हैं । क्योंकि गुण और कर्म अकेले नहीं हो सकते, वे ज़रूरी तौर पर मैटर के गुण होते हैं ।
मैंने पहले ही अभाव के बारे में बात की है, जो सातवें के तौर पर आखिर में आता है । जैसे सभी मैटर को सात शीर्षकों (हेड्स) में बांटा गया है, वैसे ही हर विषय (सब्जेक्ट) को कई वर्गों (कैटेगरी) में बांटा गया है । द्रव्य को नौ वर्गों (टाइप) में बांटा गया है । ये हैं पृथ्वी (धरती), अप (पानी), तेजस (आग की रोशनी), वायु (हवा), आकाश (स्पेस), काल (समय), दिक् (दिशा), आत्मा (आत्मा) और मानस (मन) । इनमें से पहले पाँच को पंचभूत कहा जाता है । स्पेस बाकी चार को अपने अंदर रहने देता है । इन पंच भूतों के बारे में एक बात हैरान करने वाली है । इनमें से हर एक के हिसाब से, शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रिय उन पाँचों को समझने के लिये विकसित (रहता) है ।
देखने वाली आंख, सुनने वाला कान, स्वाद लेने वाली जीभ, सर्दी-गर्मी में फर्क करने वाली स्पर्श की इंद्रिय (त्वचा) और सूंघने वाली नाक, ये पांच ज्ञानेंद्रिय हैं । ज्ञानेंद्रिय केवल बाहरी त्वचा तक ही सीमित नहीं है । यह पूरे शरीर में फैली हुई है । यह शरीर के अंदर भी मौजूद है । उदाहरण के लिए, पेट या दिल का दर्द शरीर के अंदर स्थित स्पर्श इंद्रिय द्वारा महसूस किया जाता है । इन पांचों संवेदनाओं को केवल उचित अंगों के माध्यम से ही महसूस किया जा सकता है । दृष्टि आंख तक ही सीमित है, कानों से नहीं देखा जा सकता । जो संगीत कान से सुना जा सकता है, उसे आंख या नाक से नहीं सुना जा सकता । यदि कोई चीज जीभ पर रखी जाए तो उसका स्वाद महसूस किया जा सकता है लेकिन उसकी गंध नहीं । नाक से चीनी की मिठास का पता नहीं लगाया जा सकता । इस प्रकार, इनमें से प्रत्येक अंग पांच गुणों में से केवल एक को ही जान सकता है । रूप नामक गुण केवल आंख को ही पता होता है । अच्छी और बुरी गंध की पहचान नाक से होती है । छह तरह के स्वाद (रस) की पहचान जीभ से होती है । छूने की शक्ति गर्मी और ठंड में फर्क करती है । इस तरह पांच ‘इंद्रियां’ या सेंस ऑर्गन पांच गुणों को देख या महसूस कर सकते हैं । इन्हें “ज्ञानेंद्रियां” कहा जाता है । अगर ये अंग नहीं होते, तो ये गुण हमारी समझ से बाहर होते । अगर हमारे पास छह सेंस ऑर्गन होते, तो हम शायद छह गुणों को पहचान पाते । शायद, अगर हमारे पास ऐसे एक हज़ार अंग होते, तो हम चीज़ों के उतने ही अलग-अलग गुणों को पहचान पाते । हमें नहीं पता कि इस दुनिया में कितनी चीज़ें मौजूद हैं । अगर हमारे पास छूने की शक्ति नहीं होती, तो हमें गर्मी या ठंड के होने का पता नहीं चलता । हमें गर्मी के बदलावों का ज्ञान इसी गुण की वजह से है । हम देखते हैं कि अंधे और बहरे एक-एक करके रूप और शब्द से अनजान होते हैं, हालांकि इस दुनिया में इनकी कोई कमी नहीं है । आँख, जीभ, नाक, स्किन (छूने की इंद्रिय) और कान – इन पाँच इंद्रियों के अपने-अपने विषय होते हैं, रूप, रस (स्वाद), गंध, स्पर्श (टच) और शब्द (आवाज़) ।
इन विषयों के हिसाब से ये पाँच गुण पंचभूतों या पाँच तत्वों में मौजूद हैं । धरती में ये पाँचों मौजूद हैं । धरती का रूप और स्वाद है । हमारा शरीर, सब्ज़ी, मिश्री, ये सब धरती की ही देन हैं । धरती में गंध भी है । फूल भी धरती का है । कठोरता, गर्मी और ठंड भी धरती की ही देन है । धरती में आवाज़ भी है । कसी हुई डोरी से आवाज़ आती है । वैसे ही जब किसी छड़ी से किसी दूसरी चीज़ को पीटा जाता है तो उससे आवाज़ आती है । रस या पानी में, गंध को छोड़कर, बाकी चारों गुण मौजूद होते हैं । जब पानी को पीटा जाता है, तो आवाज़ आती है । हालाँकि धरती में पाँच गुण हैं, लेकिन उसमें एक ऐसा गुण है जो बाकी चार तत्वों में से किसी में नहीं है, यानी गंध, जो धरती का खास गुण है । पानी का मुख्य या खास गुण रस या स्वाद है । जल नहीं होगा तो स्वाद का बोध नहीं हो सकता । इसीलिए स्वाद की पहचान करने वाली इंद्रिय अर्थात जीभ में हमेशा जल मौजूद रहता है । जीभ सूखी हो तो स्वाद का पता नहीं चलता । रस का मतलब भी जल होता है । तेजस (अग्नि) में न गंध होती है, न स्वाद, उसके पास केवल रूप, स्पर्श और शब्द होता है । रूप ही इसका विशेष गुण है । वायु में रूप नहीं होता । उसके पास केवल शब्द और स्पर्श होता है । स्पर्श इसका विशेष गुण है । इसीलिए जब हवा चलती है तो शरीर उसे महसूस करता है । आकाश में केवल ध्वनि है । आधुनिक विज्ञान ने पहले सोचा था कि ध्वनि उत्पन्न करने के लिए वायु या हवा जिम्मेदार है । वायरलेस ट्रांसमिशन की खोज के बाद धीरे-धीरे यह महसूस किया जा रहा है कि ध्वनि अंतरिक्ष का एक गुण है वायरलेस ट्रांसमिशन हवाओं के प्रवाह पर निर्भर नहीं है ।
आकाश या स्पेस, जिसमें सिर्फ़ एक गुण है, जैसे आवाज़, वायु जिसमें आवाज़ के अलावा स्पर्श या ‘टच’ भी है, अग्नि जिसमें आवाज़ और टच के अलावा, आँखों से दिखने वाला रूप यानि दृश्यता है, पानी जिसमें रस या स्वाद है और धरती जिसमें चार गुणों के अलावा गंध भी है, ये पंचभूत या पाँच तत्व हैं ।
द्रव्य या मैटर हैं जो पंचभूतों को दिखाते हैं जिन पर गुणों की समझ निर्भर करती है । नौ द्रव्यों (ऊपर के पाँच को छोड़कर) में से बाकी हैं काल या समय, दिक् या दिशा, आत्मा और मानस । घंटा (घड़ीका समय), कल, आने वाला कल, आज, साल, युग, वगैरह, समय या काल को बताते हैं । दिशा का मतलब है इलाका, ऊपर, नीचे, वहाँ, यहाँ, वगैरह । आत्मा वह है जिसके पास मन होता है जो इन सभी सिद्धांतों को समझ सकता है । आत्मा दो तरह की होती है, जीवात्मा और परमात्मा । जो इस दुनिया में होने वाली हर चीज़ को सिर्फ़ देखता है, वही परमात्मा है । जो दुनिया में उलझ जाता है और दुःखी हो जाता है, वही जीवात्मा है । जीवात्माएँ कई हैं; परमात्मा एक है । दोनों चैतन्य हैं, यानी संवेदनशील (sentient) हैं । वेदांत कहता है कि चेतना (अवेयरनेस) या बुद्धिमत्ता (इंटेलिजेंस) ही आत्मा है । दूसरी ओर, न्याय शास्त्र कहता है कि जिसके पास चेतना (अवेयरनेस) है, वही आत्मा है । द्वैत (डुअलिज्म) सिद्धान्त में न्याय कहता है कि मंद चेतना (dulled awareness) वाला आत्मा है । लेकिन वेदांत के अनुसार, चेतना, जिसका कोई दूसरा (विकल्प) नहीं है, वह आत्मा है । ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे इससे अलग जाना जा सके । इस प्रकार किसी ‘मंद’ आत्मा या जीवात्मा का कोई सवाल ही नहीं हो सकता । लेकिन, न्याय के अनुसार, चेतना गुण से जुड़ी है । आत्मा पदार्थ है, चेतना उसका गुण या गुणवत्ता है । आत्मा ज्ञान या बुद्धिमत्ता, जानकारी एवं जानने की क्षमता का निवास (घर) है ।
ज्ञान की पूर्णता के बाहर कुछ भी मौजूद नहीं है । इसलिए न्याय परमात्मा को ‘सर्वोच्च ज्ञान’ कहता है । जीवात्माओं या व्यक्तिगत आत्माओं के पास केवल एक सीमित चेतना होती है । इसलिए उन्हें ‘किंचितज्ञ’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है, अल्प ज्ञान वाला । परमात्मा ‘सर्वज्ञ’ या सभी ज्ञान रखनेवाले, सब कुछ जाननेवाले हैं । हम पूरे ज्ञान और कम ज्ञान, दोनों का घर हैं, यानी दोनों का युग्म (कॉम्बिनेशन – मिश्रण) हैं । दूसरी ओर, परमात्मा पूरे ज्ञान के भंडार हैं । आत्मा विभु है, सर्वव्यापी (सभी जगह फैली हुई) है । हालांकि न्यायशास्त्र भी कहता है कि परमात्मा सब जगह फैला हुआ है, लेकिन परमात्मा और जीवात्मा के बीच का अंतर नहीं पहचाना जाता । ऐसा इसलिए है, क्योंकि इस शास्त्र के अनुसार, बुद्धिमानी (इंटेलिजेन्स) हर जीव में अलग-अलग होती है । यह जहां रहती है वह मन है । मन ही खुशी या दुःख का एहसास कराता है ।
न्यायशास्त्र के अनुसार, गुणों को पच्चीस तरह में और कर्मों को पांच तरह में बांटा गया है । न्यायशास्त्र कहता है कि, अगर किसी के पास सही पदार्थ ज्ञान है (यानि पदार्थों की सच्ची अवधारणा – कन्सेप्ट मालूम है), तो उसे सत्य का पता तभी चलेगा जब उसका मन बाकी सभी चीजों को गैर-जरूरी मानकर नकार देगा और इस तरह वह मोक्ष की स्थिति में पहुंच जाएगा, जहां न खुशी है न दुःख है ।
यद्यपि हम मोक्ष के लिए प्रयास कर सकते हैं, वेदांतिक अवधारणा के अनुसार, मनन (ध्यान) जो गुरु के उपदेशों पर चिंतन करने के लिए आवश्यक है, जो कि न्याय पद्धति है, सबसे उपयोगी है । हमें पंचभूतों, जीवात्मा और मन का पता चलता है । परमात्मा को कैसे जाना जा सकता है ? वह अज्ञेय है । उसे जानने के लिए अनुमान या निगमन आवश्यक है । शेष को जानने के लिए, प्रमाण या तथ्यों जिन्हें ज्ञानेन्द्रियां ग्रहण करने (समझ सकने) में सक्षम हैं, वही पर्याप्त है । श्रुति कहती है कि परमात्मा का अस्तित्व है । न्याय निगमन (अनुमान) के आधार पर कहता है कि परमात्मा का अस्तित्व आवश्यक रूप से होना ही चाहिए ।
आइए अब अनुमान का एक छोटा सा उदाहरण देखें । यह ज्ञात है कि जिस कुर्सी पर मैं बैठा हूँ वह निश्चय ही किसी बढ़ई द्वारा बनाई गई होगी । चूँकि हम वास्तव में उस आदमी से नहीं मिले हैं जिसने इसे बनाया है, क्या हम कह सकते हैं कि यह आदमी द्वारा नहीं बनाई गई है ? हमने अन्य कुर्सियों को बनते देखा है । उस आधार पर, हम जानते हैं कि इसे भी किसी बढ़ई ने बनाया होगा । हम यह भी जानते हैं कि कुर्सी बनाना बढ़ई की क्षमता के भीतर है । इसी तरह, इस ब्रह्मांड का एक निर्माता होना चाहिए । वह सर्वज्ञ, सर्वसमर्थ, सर्वशक्तिमान है । चूँकि वह सभी की रक्षा करता है, इसलिए उसे सर्व-दयालु भी होना चाहिए । न्याय शास्त्र ऐसे मामलों को पक्ष और विपक्ष पर चर्चा करके और उचित निगमन की सहायता से स्थापित करता है ।
प्रमाण या अथॉरिटीज़
प्रत्यक्ष और अनुमान के अलावा, न्याय में दो और प्रमाण हैं । ये हैं उपमान (उपमा या उदाहरण) और शब्द (आवाज़) ।
उपमान क्या है ? यह किसी ऐसी चीज को जानना है जिसे हम पहले से नहीं जानते हैं, उसे किसी अन्य जाने हुए चीजों से समानताओं (मिलते-जुलते गुणों) के आधार पर जानते हैं – यह उपमान है । ‘गवय’ नाम का एक जानवर है । हमें नहीं पता कि वह कैसा दिखता है । इसे गाय जैसा बताया गया है । हम इत्तेफ़ाक से किसी जंगल के पास जाते हैं । वहाँ हमें उस जानकारी जैसा कोई जानवर दिखता है । फिर हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि यह वही गवय होगा जिसके बारे में हमें बताया गया है । यही उपमान है ।
शब्द प्रमाण वैदिक ग्रन्थ है महापुरुषों की कही मौखिक (ज़ुबानी) बातें हैं । जब वेद और महापुरुष (जैसे ऋषि) कुछ कहते हैं, तो हमें उसे प्रमाणिक तौर पर मानना चाहिए क्योंकि वह कभी झूठा नहीं हो सकता । नैयायिकों (जो न्याय स्कूल से जुड़े हैं) का मानना है कि वेद खुद भगवान की वाणी हैं । इसलिए वे अपने आप में प्रमाण हैं । जो महापुरुष बिना किसी सवाल के (सोच, शब्द और कर्म से) सच्चे होते हैं, उनकी बातें भी शब्द प्रमाण में शामिल होती हैं ।
ये चार प्रमाण कुमारिल भट्ट के बताए मीमांसा सिद्धांत का हिस्सा हैं । इनके अलावा, उन्होंने “अर्थपात” और “अनुपलब्धि” को भी जोड़ा, जिससे प्रमाणों की संख्या छह हो गई । हम अद्वैत धर्म के लोगों ने इन सभी छह प्रमाणों को मान लिया है । ‘अर्थपात’ को हमारे शास्त्रों ने एक उदाहरण देकर आसानी से समझने लायक बनाया है ।
इसका एक वाक्य है जिसे इस तरह पढ़ा जा सकता है: पीनो देवदत्तो दिवा न भुङक्ते । इसका मतलब है कि “मोटा देवदत्त दिन में नहीं खाता ।” दिन में न खाने से भी वह पतला नहीं हुआ है और वह फिर भी मोटा है । इस समझ से क्या होता है ? कि वह रात में अच्छा खाता है । यह दूसरे बेतुके नतीजों को भी सही ठहराता है जैसे (i) कि वह बिल्कुल नहीं खाता । (ii) भले ही वह बिल्कुल नहीं खाता, फिर भी वह पतला नहीं होता । यह सुलह (समझौता) का तरीका जो साफ तौर पर बेतुके नतीजों से बचता है और एक सही रास्ता निकालता है, अर्थपात है ।
हमारा यह निष्कर्ष (निगमन प्रक्रिया से निष्कर्ष) कि देवदत्त रात में खाता है, ऊपर दिए गए प्रमाणों में से दूसरे, यानी अनुमान से जुड़ा नहीं है । अनुमान के लिए यह ज़रूरी है कि जिस चीज़ को पहचानना है, उसमें पहचान का अवयव मौजूद हो – जैसे बादलों से गरजना या आग से धुआँ । यहाँ ऐसा कोई लिंग – आधार नहीं है ।
उपमान के साथ भी ऐसा ही है । यह सिर्फ इसलिए अनुमान की श्रेणी (कैटेगरी) में नहीं आता क्योंकि हम इसे देखते ही ‘गवय’ मान लेते हैं । यहाँ भी, हमारा निगमन (निष्कर्ष) पहचान पर आधारित नहीं है । जानवर को उसके रूप से पहचानते हैं । हम एक ‘गवय’ का वर्णन पाते हैं जो पहले से ही हमारे ज्ञान में है, समानता से सच होता है ।
प्रमाणों में आखिरी है ‘अनुपलब्धि’ । यह सिर्फ यह जानना है कि कोई चीज़ मौजूद नहीं है । मैंने कहा कि न्याय में बताए गए पदार्थों में आखिरी और सातवां है अभाव । हम अभाव को कैसे समझते हैं ? अनुपलब्धि की मदद से ।
‘जाओ और देखो कि क्या उस बाड़े में कोई हाथी है’ – हम जाकर देखते हैं और जान जाते हैं कि वहाँ कोई हाथी नहीं था – यदि वहाँ कोई हाथी नहीं होता । हाथी दिखाई नहीं देता, लेकिन यथार्थ बात कि वह वहाँ नहीं था यह हमें पता था । यह बात हाथी के न होने की स्थिति से सामने आती है । इस तरह जो चीज़ किसी चीज़ के न होने पर पता चलती है, वह अनुपलब्धि है । न्याय शास्त्र इन दो प्रमाणों को नहीं मानता । इनका इस्तेमाल अद्वैत स्कूल के मीमांसा और वेदांत में किया जाता है ।
सामान्य ज्ञान या विवेक की समझ सिर्फ हमें भगवान दिखाने के लिए है । जब हम इस तरह इन अलग-अलग प्रमाणों की मदद से यह जांच करते रहते हैं, जहाँ न्याय समाप्त होता है, वहाँ से वैशेषिक आगे बढ़ता है । इस पद्धति के संस्थापक गणत नामक एक ऋषि हैं, जो इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सभी परमाणुओं पर निर्वाह करते हैं । उन्होंने कहा कि ईश्वर विभिन्न तरीकों से परमाणुओं की व्यवस्था करता है और दुनिया का निर्माण करता है ।
न्याय और वैशेषिक में, दुनिया और आत्मा को ईश्वर से अलग माना जाता है जो वास्तव में द्वैतवादी सिद्धांत है ।
चेतन जीव की बुद्धि कहाँ से आई ? अचेतन परमाणु कहाँ से आया ? इन विन्दुओं पर प्रश्न करने पर, व्यक्ति अद्वैत सिद्धांत पर पहुँचता है कि ये सभी परमात्मा के विभिन्न रूप हैं ।
इस अद्वैतवादी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए, न्याय एक मध्यवर्ती कदम के रूप में आवश्यक है । विवेक और तार्किक निष्कर्ष को उचित स्थान देना वास्तव में न्याय या तर्क की भूमिका है । यह वास्तव में बौद्धिक परीक्षा और अनुसंधान में संलग्न है । यह यह भी दर्शाता है कि तर्कवाद का नास्तिक या पूरी तरह से भौतिकवादी होना आवश्यक नहीं है असंख्य प्राणियों और जीवन के व्यवस्थित संचालन के लिए एक बनाने वाला ज़रूर होना चाहिए । न्याय शास्त्र मानता है कि बौद्धिक समझ की कुछ सीमाएँ होती हैं और इसलिए यह आदेश देता है कि, क्योंकि कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिनके बारे में हम किसी भी तरह के सबूत से नहीं सोच सकते, इसलिए हमें वेदों के फ़ैसले को मानना चाहिए ।
संक्षेप में, तर्क को बिना सोचे-समझे बेतुकेपन की हद तक नहीं बढ़ाया जाना चाहिए, यानी तर्क को दुष्तर्क नहीं बनना चाहिए, बल्कि उसे अंतिम सत्य तक पहुँचने का एक ज़रिया बनना चाहिए ।
यह वास्तव में सराहनीय होगा यदि कोई बौद्धिक जांच-पड़ताल न की जाए और ईश्वर और शास्त्रों को पूरी तरह स्वीकार किया जाए । लेकिन तब ऐसा पूर्ण और निर्विवाद विश्वास जो हमें ईश्वर-साक्षात्कार के स्तर तक ले जा सके, प्राप्त करना कठिन है । ऐसे मामले में, व्यक्ति का जीवन बिना सोए और आलस्य के बीत सकता है । मैं तो ऐसा व्यक्ति पसंद करूंगा जो अपनी विचार क्षमता का उपयोग करे और यहां तक कि गलत निष्कर्ष पर पहुंच जाए कि ईश्वर नहीं है और नास्तिकता ही सच्चा धर्म है । मैं ऐसे नास्तिक को, जिसने उस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए कठोर परिश्रम किया है, उस निर्विवाद विश्वास वाले व्यक्ति से अधिक दर्जा दूंगा जिसने अपने दिमाग का बिल्कुल भी उपयोग नहीं किया । यदि वह नास्तिक अपनी जांच-पड़ताल जारी रखता है, तो उसे किसी स्तर पर मानसिक स्पष्टता मिल सकती है और वह नास्तिकता छोड़ सकता है । लेकिन दूसरे आलसी व्यक्ति के पास कोई आशा नहीं है ।
यही कारण है कि चार्वाक दर्शन, जो एक नास्तिक सिद्धांत है, मूल रूप से एक प्रकार के धार्मिक विश्वास के रूप में मान्यता प्राप्त थी । चारु और वाक का मतलब है जो कानों को अच्छा लगे। “हमें उपवास, तपस्या, मानसिक और शारीरिक संयम से खुद को परेशान नहीं करना चाहिए । ईश्वर या देवताओं की चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है । हमें मन और शरीर को आज़ादी देनी चाहिए और मज़े करने चाहिए” – यह सुनने में मीठा लगता है, यही चार्वाक सिद्धांत का सार है।
लेकिन, इस तरह से ज़िंदगी जीने पर, खुशी के साथ-साथ दुःख भी आता है । असल में, बाद वाला ही ज़्यादा होता है । सिर्फ़ भौतिकवादी धर्मों के अलावा दूसरे धर्म ही इस दुःख का स्थायी इलाज देते हैं ।
हर तरह की बुद्धिमत्ता (इंटेलीजेन्स) की ज़रूरत होती है ।
दार्शनिक खोज (फिलॉसॉफिकल इन्क्वाइरी) में तभी काफी मदद मिलेगी जब मन और बुद्धि को गहरी आत्म-जागरूकता से तेज किया जाए । इसीलिए आदि शंकराचार्य, जिन्होंने यह कहा कि सारी दुनिया माया है, उन्हें उन लोगों ने भी जगत गुरु या दुनिया का शिक्षक माना है जिन्होंने सभी शास्त्रों, कलाओं और विज्ञान (साइंस) में महारत हासिल कर ली है ।
न्याय को तर्क (लॉजिक) और अन्वीक्षिकी (मेटाफिजिक्स) भी कहा जाता है । हमारे महान शंकराचार्य ने इन सभी में – अन्वीक्षिकी या न्याय, सांख्य जिसे कपिलम् भी कहा जाता है, क्योंकि ऋषि कपिल ने इसे स्थापित किया था इसमें, योग शास्त्र जिसे ऋषि पतंजलि के नाम पर पतंजलम् कहा जाता है, तथा भट्ट जो कुमारिल भट्ट द्वारा समर्थित आस्था (विश्वास) है – इन सभी में पूरी तरह से महारत हासिल कर लिये थे ।
जो आस्था अद्वैत पर ध्यान नहीं देते, वे भी अद्वैत में शामिल हैं । इसीलिए मैं, जिसका नाम भी शंकराचार्य है, सभी तरह के शास्त्रों के बारे में बात कर रहा हूँ । अद्वैत में द्वैत, विशिष्टाद्वैत, शैव और वैष्णव जैसे कई अन्य आस्थाएं शामिल हैं । यद्यपि अन्य आस्था अद्वैत की निंदा या आलोचना कर सकते हैं, परन्तु बादवाला (अद्वैत) में अन्य सभी आस्थाएं शामिल – एक हिस्सा या भाग के रूप में । यहाँ तक कि उन स्थितियों में जहाँ अद्वैत अन्य विश्वासों द्वारा आलोचित होता, वह केवल एक सीमा तक होता है कि किसी भी आस्था को एकमात्र सत्य के रूप में पुष्टि करने की अनुमति नहीं है जो यह कहे कि अद्वैत गलत है । अन्य आस्थाओं को अद्वैत द्वारा कभी भी पूरी तरह से अस्वीकार्य के रूप में निंदा नहीं की जाती है । उन्हें उचित समय, स्थान और विकास के स्तर पर उचित मान्यता और महत्व दिया जाता है ।
तर्क शास्त्र पर ग्रंथ
गौतम जिन्होंने न्याय सूत्र लिखा था, उन्हें अक्षपाद के नाम से भी जाना जाता है । चूँकि वह लगातार आत्मनिरीक्षण में लगे रहते थे, उन्हें आसपास की दुनिया से पूरी तरह अप्रभावित कहा जाता था । इन दिनों भी प्रोफेसर और वैज्ञानिक, जो विषयों में गहराई से शामिल होते हैं, उन्हें अनुपस्थित दिमाग वाला कहा जाता है । एक दिन, चलते-चलते वह एक कुएं के पास पहुँच गये जिसमें वह गिर गये । कहानी यह है कि भगवान ने उन्हें बचाया और आगे और हादसे रोकने के लिए, उसके पैरों में आँखें लगा दीं । उन्होंने उनको आशीर्वाद दिया कि चलते समय उनके अनजाने कदम आँखों की वजह से रुकावटों से दूर रहेंगे । जब से उनके पैरों में आँखें आईं, उसे ‘अक्ष (आँख) पाद (पैर) कहा जाने लगा । यह भी कहने का एक तरीका है कि भगवान ने उसके कदमों को रास्ता दिखाया । वात्स्यायन ने उनके सूत्र पर एक भाष्य (कमेंट्री) लिखी । वार्तिका (शब्दावली की व्याख्या) एक उद्योतकर ने की थी । महान अद्वैतवादी, वाचस्पति मिश्र ने इस वार्तिका पर एक टिप्पणी लिखी है । इसे “तादपर्य टीका परिशुद्धि” कहा जाता है । उदयन ने भी “न्याय कुसुमांजलि” नाम की एक किताब लिखी है । वह उन लोगों में प्रमुख हैं जो बौद्ध धर्म की निंदा करने और इसे हमारे देश में दुर्लभ बनाने के लिए जिम्मेदार थे । जयंत ने न्याय सूत्र पर न्याय मंजरी नाम से एक टिप्पणी लिखी है । एक अन्नाम भट्ट ने तर्क संग्रह नाम की एक किताब लिखी है और खुद इस पर एक विस्तृत दीपिका लिखी है । आम तौर पर, जो लोग न्याय शास्त्र का अध्ययन करना शुरू करते हैं, वे आखिरी बताई गई दो किताबों से शुरू करते हैं ।
प्रशस्तपाद ने गणत महर्षि के वैशेषिक सूत्र पर “पदार्थ धर्म संग्रह” नाम का एक भाष्य जैसा ग्रंथ लिखा है । उदयन ने इस पर एक विस्तृत टिप्पणी लिखी है । हाल ही में उत्तमूर वीरराघवाचार्य “वैशेषिक रसायन” नाम की एक किताब लिखी है ।
वैशेषिक का एक और नाम “औलुक्य दर्शन” भी है। औलुक्य उल्लू से जुड़ा हुआ कुछ है । कहा जाता है कि गणत को ही उलूक कहा जाने लगा । अगर गौतम बहुत ज़्यादा ध्यान भटकने और अपने गहरे विचारों में डूबे रहने की वजह से कुएं में गिर जाते हैं, तो गणत दिन भर अपनी शोधकार्य (रिसर्च) में व्यस्त रहते और रात में भिक्षा (भिक्षा इकट्ठा करने) के लिए निकल जाते । क्योंकि वह दिन में दिखाई नहीं देते थे और सिर्फ़ रात में घूमते थे, इसलिए उनका उपनाम (निकनेम) उल्लू पड़ गया । (जब भगवद गीता में भगवान कहते हैं कि बिना ज्ञान वाले आदमी की रात ज्ञानी आदमी का दिन होती है, तो वह ज्ञानियों को उल्लू कहते हैं ।) क्योंकि इसे गणत ने लिखा था, इसलिए वैशेषिक को गणत शास्त्र के नाम से जाना जाता है । जानकारों का मानना है कि व्याकरण (ग्रामर) और न्याय (लॉजिक) सभी शास्त्रों को समझने में सबसे ज़्यादा मददगार हैं ।
जिस कारण से यह संसार बना
कारण दो प्रकार के होते हैं: निमित्त और उपादान । यदि मिट्टी का घड़ा है, तो उसे बनाने के लिए मिट्टी नाम की कोई चीज़ होनी चाहिए । मिट्टी उपादान है – घड़े का कारण । लेकिन मिट्टी से घड़ा कैसे बनती है ? वह खुद को घड़ा नहीं बना सकती । कुम्हार को मिट्टी से घड़ा बनाना पड़ता है । यदि मिट्टी से घड़ा बनाना है, तो कुम्हार की भी आवश्यकता होती है । वह (कुम्हार) निमित्त, कारण है ।
ज्योतिष शास्त्र में वर्णित निमित्त अलग है । न्याय वैशेषिक सिद्धांत का मत है कि परमाणुओं को उपादान के रूप में उपयोग करके, निमित्त कारण के रूप में ईश्वर ने संसार की रचना की है ।
मिट्टी को घड़ा बनाने के लिए कुम्हार का होना नितांत आवश्यक है । यदि वह उपलब्ध न हो, तो घड़ा कभी नहीं बन सकता । इसे आरंभवाद या असत् कार्य वाद कहते हैं । सत् वह है जो विद्यमान है । असत् अस्तित्वहीन है । मिट्टी में कोई घड़ा नहीं है । उसमें से अस्तित्वहीन घड़ा अस्तित्व में आया । कहा जाता है कि इसी प्रकार ईश्वर ने उन परमाणुओं की सहायता से, जिनमें जगत् नहीं है, जगत् की रचना की । न्याय में यही सिद्धांत प्रतिपादित है । सांख्यों के अनुसार, जैसा कि मैंने पहले कहा, ईश्वर अस्तित्वहीन है । उनके अनुसार प्रकृति ने अपने आप से जगत् की रचना की है । इसे आधुनिक नास्तिकों के दृष्टिकोण के समान नहीं माना जाना चाहिए । ऐसा इसलिए है क्योंकि सांख्य निर्गुण ब्रह्म या पुरुष को मानते हैं जो पूर्ण ज्ञान (ज्ञान स्वरूपी) है । वे इस जगत् में जड़ प्रकृति के व्यवस्थित व्यवहार को पुरुष के प्रभाव या सानिध्य या समीपता के कारण मानते हैं । समीपता ही सृष्टि और सुव्यवस्था को सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी है । पुरुष किसी भी क्रियाकलाप में लिप्त नहीं होता । सूर्य की किरणों के कारण जल वाष्पित होता है, पौधे उगते हैं और कपड़े सूखते हैं । ये सब सूर्य के प्रभाव के कारण होता है । सूर्य के पास तालाब को सुखाने या किसी विशेष पौधे को उगाने की कोई योजना या इच्छा नहीं होती । जब हम अपना हाथ बर्फ के ठंडे पानी में रखते हैं, तो उंगलियां सुन्न हो जाती हैं । इस आधार पर क्या हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि बर्फ के ठंडे पानी का उद्देश्य उंगलियों को सुन्न करना था ? इसी तरह, यद्यपि पुरुष सृजन के कार्य में बिल्कुल भी लिप्त नहीं होता, फिर भी प्रकृति पुरुष के प्रभाव में, अपने आप से कुछ बनाने की शक्ति प्राप्त करती है । ईश्वर निमित्त कारण के रूप में किसी भी तरह से हस्तक्षेप नहीं करता । इस प्रकार प्रकृति स्वयं को सृजन के रूप में प्रकट करती है । यह सांख्यों का सिद्धांत है । इसे परिणामवाद भी कहा जाता है – परिवर्तन का सिद्धांत ।
नैयायिकों के असत् कार्य वाद के विपरीत, सांख्य सत् कार्य वाद को प्रस्तुत करते हैं । असत् कार्य वादी कहते हैं कि जो घड़ा उपादान कारण में नहीं होता, अर्थात मिट्टी, वह निमित्त कारण, अर्थात कुम्हार द्वारा अस्तित्व में लाया जाता है । सत कार्य वादी, सांख्य, इस प्रकार तर्क देते हैं: घड़ा शुरू से ही मिट्टी में शामिल था । चक्कीवाला तेल के बीज को पीसता है जिसमें तेल होता है, जिससे तेल बनता है । इसी प्रकार, जो घड़ा पहले से ही मिट्टी में मौजूद है, उसे प्रयास के माध्यम से घड़ा बनाया जाता है । मिट्टी का उपयोग करके ही घड़ा बनाया जा सकता है । इसे तिलहनों से नहीं बनाया जा सकता है, या इसके विपरीत मिट्टी से तेल नहीं निकाला जा सकता है । घड़े में मिट्टी के परमाणुओं के अलावा कुछ भी नहीं होता है । यदि उनकी व्यवस्था में हेरफेर किया जाता है, तो घड़ा बन जाता है ।
हमारे आचार्य शंकर भगवद्पाद कहते हैं: ‘न तो आरंभ वाद और न ही परिणाम वाद तर्कसंगत है । ब्रह्म ने माया की सहायता से सृष्टि का वेश धारण किया है । ब्रह्मांडीय कुम्हार से अलग या उससे अलग कोई मिट्टी नहीं है ।’ इस प्रकार आरंभ वाद की कोई वैधता नहीं हो सकती । यह सोचना कि परमात्मा ने दूध को दही में बदलने की तरह परिणाम द्वारा संसार की रचना की, यह भी सही नहीं है । क्योंकि, ऐसे परिवर्तन के बाद, केवल दही हो सकता है, दूध नहीं । इसलिए यह कहना बेतुका होगा कि परमात्मा ने खुद को सृष्टि में रूपांतरित करने के बाद अपनी पहचान खो दी । इसलिए, यह भी परिणाम नहीं है । वह एक तरफ शुद्ध ज्ञान के रूप में रहता है, और दूसरी तरफ जीव और जगत के रूप में प्रस्तुत करता है । यह सब एक और केवल सत् का अभिव्यक्ति है – आविर्भाव – नाटक है । यदि कोई व्यक्ति नाटक में कोई भूमिका निभाता है, तो क्या वह वास्तव में अपनी मूल पहचान खो देता है ? सृष्टि भी ऐसी ही है । अपनी असंख्य अभिव्यक्तियों के साथ भी, सत् स्वयं से अप्रभावित रहता है । यह शंकर का साहसिक और व्यापक कथन था । इसे विवर्त वाद कहते हैं ।
सांप का भ्रम पैदा करने वाली रस्सी विवर्त है । रस्सी जो उपादान कारण है, उसे किसी अन्य निमित्त कारण द्वारा सांप में नहीं बदला गया है । इस प्रकार यह आरंभवाद नहीं है । रस्सी साँप में नहीं बदली गई है । रस्सी रस्सी ही रहती है । लेकिन, हमारे सच्चे ज्ञान (बोध) के अभाव के कारण, रस्सी साँप जैसी दिखती है । इसी प्रकार, अविद्या – सच्चे ज्ञान के अभाव के कारण – ब्रह्म हमें जगत, सृष्टि और उसमें समाहित व्यक्ति प्रतीत होता है ।
आचार्य द्वारा प्रतिपादित सत्य को समझने के लिए न्याय शास्त्र द्वारा विश्लेषणात्मक जांच (विचार युक्ति) के विभिन्न उपकरणों का विस्तृत विवरण दिया गया है । पदार्थ की वास्तविक प्रकृति और महत्व, इन विश्लेषणात्मक तरीकों का उपयोग करके पदार्थ को समझा जाना चाहिए । यहाँ से, व्यक्ति वैराग्य प्राप्त करता है । यहाँ से व्यक्ति “अपवर्ग” नामक क्षेत्र में जाता है, जहाँ न तो सुख है और न ही दुःख । यहाँ न्याय-वैशेषिक सिद्धांत समाप्त हो जाते हैं ।
द्वैत या द्वैतवादी सिद्धांत के अनुसार भी कोई इससे आगे नहीं जा सकता । अद्वैत, जो एक व्यापक ‘सत्’ की परिकल्पना करता है जिसके द्वारा हम भी पूर्ण और समग्र मोक्ष या जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्राप्त करते हैं ।
लेकिन, न्याय में हमें इस दुनिया में जीवन से संतुष्ट होने के बजाय ‘अपवर्ग’ नामक बेहतर दुनिया में जाने के लिए प्रेरित करने का गुण है ।
इस शास्त्र में एक और विशिष्टता का दावा है । इसमें सभी प्रकार के तर्क और युक्ति प्रस्तुत की गई है, जो बौद्धों, सांख्यों और चार्वाकों के सिद्धांतों का खंडन करती है तथा ईश्वर को इस संसार का रचयिता सिद्ध करती है ।
कुछ किस्से और तर्क
गंगेश मिश्रोपाध्याय ने अपनी किताब “तत्व चिंतामणि” में ६४ अलग-अलग बहस (तर्क) दिए हैं । अब तक हम दिमाग पर अजीब-अजीब विचारों (ख्यालों) का बोझ डाल रहे थे । चलिए, गंगेश मिश्रा के बारे में एक किस्से के साथ थोड़ा हंटकर बात करते हैं ।
गंगेश शुरू में कोई होशियार लड़का नहीं था । वह बंगाल (यथार्थतः लेखन के समय बंगाल प्रान्त अन्तर्गत मिथिलाक्षेत्र) के एक ऊँची जाति के ब्राह्मण परिवार – कुलीन ब्राह्मण परिवार से था । बंगाल में यह रिवाज था कि इन ऊँचे तबके के ब्राह्मणों की शादी कई ब्राह्मण दुल्हनों से कर दी जाती थी, जिनमें वे भी शामिल थीं जो उतनी ऊँची रैंक वाली या कुलीन नहीं थीं । (यथार्थतः मिथिला में यह रिवाज प्रचलित था और ऐसे ब्राह्मणों को बिकाऊ ब्राह्मण भी कहा जाने लगा था लोकव्यवहार में) । इस तरह एक कुलीन ब्राह्मण कई पत्नियाँ रखता था, यहाँ तक कि पचास तक भी । लेकिन गंगा मिश्रा की सिर्फ़ एक पत्नी थी और वह उसीके माता-पिता के साथ रहता था । ज़ाहिर है, उसे शादी के ज़्यादा प्रस्ताव (ऑफ़र) नहीं मिले क्योंकि वह साफ़ तौर पर एक कमज़ोर इंसान था ।
बंगाली लोग मछली खाते हैं और बंगाल में भारी बारिश और कई नदियों की वजह से साल में कई महीनों तक कई जगहों पर पानी भर जाता है । सब्ज़ियाँ उगाने के लिए सूखी ज़मीन नहीं बचती। इस अवधि के दौरान वे मछली खाते थे, जो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थी । पूर्वी बंगाल (अर्थात् मिथिलाक्षेत्र) में मछली को जल पुष्प (जल परोड़) भी कहा जाता था, जिसका अर्थ था कि यह एक सब्जी के समान थी । इसलिए सब्जियों की कमी के कारण बंगाल में मछली खाने की आदत विकसित हुई ।
गंगेश के ससुर के घर में भोजन के लिए मछली पकाने का रिवाज था । गंगेश को संक्षेप में ‘गंगा’ कहा जाता था । चूंकि उन्हें सुस्त माना जाता था, इसलिए उन्हें केवल मछली की हड्डियाँ परोसी जाती थीं । दूसरों को मांस मिलता था । फिर वे उनका मजाक उड़ाते थे । वह उपहास बर्दाश्त नहीं कर सकते थे । वह चुपचाप एक सुबह काशी (बनारस) के लिए रवाना हो गए । उन्होंने वहां दस साल तक मनोयोग से अध्ययन किया । घर पर लोगों ने उनकी अनुपस्थिति को महत्वहीन समझकर नजरअंदाज कर दिया । जब वह अपनी पढ़ाई के बाद घर लौटे, तो सभी ने सोचा कि वह बिना किसी उद्देश्य के घूमे होंगे और पहले की तरह ही सुस्त घर लौटे होंगे । उन्होंने उनलोगों की (ससुरालवालोंकी) यह टिप्पणी सुनकर आश्चर्य किया, “नाहं गंगा किन्तु गंगेश मिश्रः” । ‘मैं अब गंगा नहीं रहा, मैं गंगेसा मिश्र हूँ, जिसका अर्थ है: यदि मैं पुराना नीरस गंगा होता, तो मुझे हड्डियों की सेवा करना ठीक रहता, लेकिन अब मैं एक विद्वान व्यक्ति हूँ, जो मेरे नाम के बाद मिश्र (पंडित) प्रत्यय जोड़ने में सक्षम है – उसने यह सब संक्षिप्त और मधुर तरीके से संकेत दिया । तब उसके ससुराल वालों को उसकी योग्यता का एहसास हुआ ।
उसी गंगेश मिश्र ने तत्व चिंतामणि लिखी । कई व्यक्तियों ने इस पर टिप्पणियां लिखी हैं । एक रघुनाथ शिरोमणि ने इस पर एक टिप्पणी लिखी है । रघुनाथ शिरोमणि के समय के बाद ही “शिरोमणी” की उपाधि का प्रयोग संस्कृत शिक्षा में वरिष्ठ स्तर को इंगित करने के लिए किया जाने लगा । एक गदाधर (गदाधर) ने इसके केवल दस श्लोकों की व्याख्या में एक विशाल ग्रंथ लिखा है । लेकिन इसका एक भी वाक्य अनावश्यक नहीं माना जा सकता । गदाधर की लिखी किताब को गदाधारी कहते हैं । अगर कोई इसमें से पाँच वाद या तर्क पढ़ और समझ ले, तो उसे चतुर-चालाक माना जा सकता है । अगर कोई इनमें से दस पढ़ ले, तो उसे बहुत बड़ा चतुर-चालाक माना जा सकता है । एक तर्क या वाद को ‘प्रामाण्य वाद’ कहते हैं । कहा जाता है कि जो इसमें माहिर हो जाता है, वह सबसे अधिक चतुर-चालाक बन जाता है । आज भी तर्क शास्त्र पढ़ने वाले लोग गदाधारी को एक किताब की तरह इस्तेमाल करते हैं ।
प्रामाण्य वाद या प्रमाणों या सबूतों पर चर्चा, जैसा कि मैंने बताया, जब मैं इसे समझाने की कोशिश करता हूँ तो मेरा सिर घूम जाता है । लेकिन जिस समय हमारे आचार्य जीवित थे, कहा जाता है कि मंडन मिश्र के घर के बाहर लटके पिंजरे में तोते भी प्रामाण्य वाद पर चर्चा कर रहे थे ।
आदि शंकर महिष्मती शहर गए जहाँ मंडना मिश्र रहते थे । उन्होंने नदी से पानी भरकर घर ला रही कुछ औरतों से पूछा कि मंडन मिश्र का घर कहाँ है । उस शहर में आम औरतें भी पढ़ी-लिखी होती थीं । इसलिए, उन्होंने आचार्य के सवाल का जवाब श्लोकों या वर्सेज में दिया । कहा जाता है कि शंकर को मंडन मिश्र के घर तक पहुँचाने के लिए इस्तेमाल किया गया एक श्लोक इस तरह था:
स्वतःप्रमाणं परतःप्रमाणं, कीराङनाः यत्र संकिरन्ते, द्वारस्थ नीडान्तर सन्निरुद्धा जानीहि तत् मंडन पंडितोवकः
“जहाँ मादा तोते स्वतः प्रमाण और परतः प्रमाण पर बहस करती हैं, वहाँ जान लें कि वह घर पढ़े-लिखे मंडन का है ।” इससे पता चलता है कि प्राचीन भारत में सिर्फ़ मर्द ही नहीं, बल्कि औरतें भी पढ़ी-लिखी थीं । सिर्फ़ औरतें ही नहीं, बल्कि तोते भी वेदांत की बातों में माहिर थीं । यह श्लोक यही बताता है ।
इतना कहने के बाद, चलिए इस वाद के थोड़ा और करीब आते हैं, भले ही यह मुश्किल हो । इसके बारे में एक मज़ेदार किस्सा भी है ।
एक दक्षिण भारतीय (साउथ इंडियन) बंगाल के नवद्वीप में तर्क शास्त्र या लॉजिक की पढ़ाई करने गया । उन दिनों बंगाल की खासियत यह थी कि इस विषय में माहिर (महारत हासिल किये) कई लोग थे । दक्षिण से जो गया था, वह एक प्रतिभावान (टैलेंटेड) कवि था । उसने अपनी कविताओं से बहुत पैसा कमाया था । वह नवद्वीप गया और वहाँ के माहिर गुरुओं से पहले (प्रथमतः) ‘प्रामाण्य वाद’ का पढ़ाई करने लगा । उसने पढ़ाई की लेकिन बहुत कुछ समझ नहीं पाया । उसने और कोशिश की । इस वजह से, उसकी कविताओं का प्रवाह कम हो गया । लॉजिक से लगातार जुझते रहने (लड़ते रहने) की वजह से उसकी कविताओं की धार कम हो गई । उसके पैसे भी खर्च हो गए । कविताएँ लिखकर और कमाने की उसकी काबिलियत भी खत्म हो गई । इस दोहरे नुकसान से, उसके दुःख की कोई सीमा नहीं थी । प्रामाण्य वाद को समझ न पाने की वजह से, वह अपनी बची-खुची कविता के साथ काव्यात्मक विलाप करने लगा । “मैं उस प्रामाण्य वाद को प्रणाम करता हूँ जिसने मेरी कविता छीन ली है ।”
अगर कोई चीज़ दिखती है, तो हमें उसका एहसास होता है । कभी-कभी, एहसास सही होता है; कभी-कभी सही नहीं भी होता है । हम पहली नजर में फिटकरी को मिश्री समझ सकते हैं । यह दोषपूर्ण ज्ञान है । सही ज्ञान को “प्रम” कहते हैं । दोषपूर्ण ज्ञान को “भ्रम” कहा जाता है । ज्ञान को आगे दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है, संशय ज्ञान (संदेहास्पद ज्ञान) और निश्चय ज्ञान (निश्चित ज्ञान) । वह ज्ञान जो संदेह से भरा है, संशय है । जो बिना किसी संदेह के निश्चित रूप से जाना जाता है, वह निश्चय ज्ञान है । कभी-कभी, जब ज्ञान दोषपूर्ण होता है, तो यह सही प्रतीत होता है । तब इस ज्ञान को प्रमाण, अधिकार या प्रमाण के रूप में लिया जाएगा जैसे फिटकरी को सचमुच मिश्री समझना । कुछ ज्ञान या जागरूकता शुरू में ही संदिग्ध लगती है । जब हम पानी के एक कुंड में पेड़ों की छवियों को उलटा देखते हैं, तो हम जानते हैं कि पेड़ उल्टे खड़े नहीं हैं और इसलिए हम सबूत या प्रमाण को अस्वीकार कर देते हैं । जो ज्ञान समय बीतने के बाद भी सही रहता है, वह प्रामाण्य गृह ज्ञान है । जो शुरू से ही झूठा लगता है, वह अप्रामाण्य गृहस्कंदित ज्ञान है । जैसे “प्रम” या सच्चे ज्ञान में होता है, वैसे ही भ्रम – या झूठे ज्ञान में भी, प्रमाण या सबूत (पहचान) के ज़रिए ज्ञान मौजूद होता है । इसीलिए जब फिटकरी को मिश्री समझ लिया जाता है, तब भी हमारी जानकारी असली प्रमाण या सबूत होती है ।
इस प्रकार दो तरह के प्रमाण होते हैं, एक जो हमें शुरू में असली लगता है या दूसरा जो हमें शुरू में नकली लगता है । अब, सवाल यह उठता है कि क्या सच्चा या झूठा का ज्ञान हमारी समझने की शक्ति से आत्मगत रूप में (सब्जेक्टिवली) आता है या यह देखी गई चीज़ की गुणवत्ता (क्वालिटी) की वजह से निष्पक्ष रूप से (ऑब्जेक्टिवली) होता है । अगर गलती हमारी वजह से है, तो वह स्वतःप्रमाण है । अगर गलती चीज़ के प्रकृति (नेचर) की वजह से है, तो वह परतःप्रमाण है ।
इनमें से कौन सा सही है, यह मंडन मिश्र के घर के बाहर मादा तोतों के बीच चर्चा का विषय था ।
जब हम किसी वस्तु का ज्ञान करते हैं, तो ज्ञानी मन के लिए व्यक्तिपरक रूप से यह निर्णय लेना संभव नहीं होता है कि ज्ञान सही (प्रमाण) है या गलत (अप्रामाण) । यह निर्णय वस्तु के गुण की प्रकृति पर निर्भर करता है । जब तक हम वस्तु के कार्य को उसके हम पर पड़ने वाले प्रभाव के आधार पर नहीं परखते, तब तक यह निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है कि इसकी ज्ञानात्मक पहचान सही है या गलत । दूसरे शब्दों में, हमारा ज्ञान या धारणा वस्तुनिष्ठ है – यह न्याय शास्त्र का दृष्टिकोण है । लेकिन मंडन मिश्र जैसे मीमांसकों का दृष्टिकोण इसके विपरीत है । वे कहते हैं कि वस्तु के वास्तविक स्वरूप का निर्णय करना हमारी बुद्धि के क्षेत्र में है । लेकिन जब हमारा ज्ञान व्यक्तिपरक रूप से गलत (अप्रमाण) साबित हो सकता है, तो यह पूरी तरह से वस्तु की प्रकृति के कारण होता है । दूसरे शब्दों में, सही ज्ञान या प्रमाण हम पर निर्भर करता है, और गलत ज्ञान वस्तु पर निर्भर करता है । यही उनका तर्क है । ये सभी चर्चाएँ तर्क-वितर्क से समाधान किये जाने वाले विषय हैं ।
आजकल ‘वाद’ चर्चा का मतलब आम तौर पर यह होता है कि किसी के विचारों या स्टैंड को किसी तरह से बनाए रखने के लिए तर्क दिए जाते हैं । असल में, यह चर्चा करने वाले दोनों पक्षों के विचारों के बीच एक सन्तुलन (बैलेंस) होना चाहिए । बल्कि, इसमें इस्तेमाल किए गए सभी तर्कों के आधार पर, चाहे वे पक्ष में हों या विपक्ष में, एक निष्कर्ष (नतीजा) निकालना चाहिए । जब हम कहते हैं कि हमारे आचार्य मंडन मिश्र जैसे कई विद्वानों के साथ पूरे देश में वाद या शब्दों की लड़ाई (शास्त्रार्थ) में घूमे, तो हमारा मतलब बस यही है कि उन्होंने खुलकर विचारों का आदान-प्रदान किया, जिससे हमेशा उनकी बात सही साबित हुई । उन्होंने अपने विरोधियों द्वारा इस्तेमाल किए गए सभी तर्कों को ध्यान में रखने के बाद, अद्वैत की सर्वोच्चता को मज़बूती से स्थापित किया । इसलिए, वाद विचारों का आदान-प्रदान है, न कि सिर्फ़ अपनी बात को सही ठहराना । अपने पहले से तय नतीजे को तर्क के साथ बनाए रखने का नाम ‘जलपा’ है, वाद नहीं । एक तीसरा वर्गीकरण (क्लासिफिकेशन) भी है । जलपा की तरह अपनी राय रखने के बजाय, दूसरे पक्ष की कही बात का विरोध करना और सभी विरोधियों को गलत साबित करने के लिए किसी तरह तर्क ढूंढना “वितण्ड वाद” कहलाता है ।
जब से गंगेश मिश्र एक बहुत विद्वान व्यक्ति के रूप में बंगाल वापस आए, यानी १२वीं शताब्दी में, न्याय शास्त्र का पुनर्जागरण हुआ । बंगाल में नए सिरे से शुरू होने के बाद, यह ताकतवर होता गया और ‘नव्य न्याय’ के रूप में जाना जाने लगा, ‘नव्य’ का अर्थ है नया । इसे ऐसा कहलाने का एक और कारण है । ‘नवद्वीप’ बंगाल में वह स्थान है जहाँ गंगेश मिश्र और उनके बाद आए उनके अनुयायी रहते थे । नवद्वीप को नाडियाद भी कहा जाता है और श्री कृष्ण चैतन्य भी इसी जगह से थे । वह भी एक बहुत विद्वान व्यक्ति थे जिन्होंने सभी शास्त्रों में महारत हासिल की थी । बाद में, उन्होंने भजन संकीर्तन के रूप में कृष्ण के नाम का जाप करना शुरू किया और पंथ की स्थापना की, जो मानता है कि भगवान का नाम गाना मुक्ति या मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग है ।
हालांकि न्याय शास्त्र ऐसी थ्योरीज़ बताता है जैसे: “दुनिया असली है और माया नहीं है: अलग-अलग आत्माएं कई हैं और कॉस्मिक आत्मा (परमात्मा) से अलग हैं”, जिससे अद्वैत सहमत नहीं है, यह नास्तिकता (नीरीश्वर वाद) की बुराई करता है और भगवान के होने को मज़बूती से मानता है । क्योंकि इस मकसद के लिए यह जो तर्क देता है, वे बाद की रीज़निंग (युक्ति) के लिए नींव का काम करते हैं जो अद्वैत की ओर ले जाती हैं, इसलिए इसे एक ज़रूरी शास्त्र या साइंस माना जाता है ।
न्याय वेद का एक उपांग है क्योंकि इसमें बहुत ज़्यादा बौद्धिक और लॉजिकल चर्चाएँ हैं । हालाँकि, पुराण जो चौदह विद्याओं (चतुर्दश विद्या) में अगला आता है, उसे आज की पीढ़ी के कई लोग सिर्फ़ अंधविश्वास मानते हैं । आइए अब इसे थोड़ा और देखते हैं ।
हरिः हरः!!

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Bahut Sunder varnan kel gel chhai. Gyan aa karma sange bahut kichhu janai k lel kahal gel chhain.
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