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उपनिषदक सन्देश केर सारांश

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उपनिषदक सन्देश केर सार

(आत्माक परमात्मा संग) विलय केर ओहि अबस्था धरि पहुँचबाक लेल उपनिषद सब मे निहित शिक्षा सभक सारांश कि अछि ?

आधुनिक विज्ञानक मत छैक जे प्रत्यक्ष जगत काल व स्थानक अवधारणा (Time-Space Theory दिक्-काल सिद्धान्त) केर परस्पर क्रियाक परिणामस्वरूप विद्यमान अछि । उपनिषद कहैत अछि जे जखन कियो एहि वैचारिक अबस्था केँ पार कय लैछ या एहि सँ बाहर निकलि जाइछ, तखन सत्यक साक्षात्कार कय सकैत अछि । क्षितिज केर ओहि स्थान जेतय हम ठाढ़ छी, जाहि बारे मे हम पहिने खिस्सा (पृथ्वी सँ आकाश मिलबाक अनुभूति पर आधारित खिस्सा) सुनेने रही, ताहि मे स्थान-अवधारणा (Space-Concept) मानू समाप्त भ’ जाइत अछि । एहि प्रकार सँ, व्यक्ति केँ काल-अवधारणा (Time-Concept) सँ पार करबाक चाही ।

कि एहि बारे मे सैद्धान्तिक रूप सँ बात करब पर्याप्त अछि ? कि ई हमरा लोकनिक अनुभूतिक क्षमता मे अछि ? ई सिद्ध करबाक लेल जे एहि लक्ष्य केँ प्राप्त करब सम्भव अछि, अपना सभक दैनिक जीवन सँ एकटा उदाहरण उपलब्ध भेटैछ । समय बितेबाक लेल हम सब समाचार पत्र मे अफ्रीका मे भेल एकटा युद्धक विवरण पढ़ैत छी । लेकिन, यदि कोनो युद्ध लगे-पास मे होय, जेना पाकिस्तान या कश्मीर मे, त हम सब लग-पास मे भ’ रहल युद्धक तुलना मे कांगो (अफ्रीका) युद्ध मे कम रुचि लैत छी । अख़बारक संपादक सेहो अफ़्रीकाक ख़बरि केँ एकटा कोण मे लय जाकय पाकिस्तान युद्ध केँ बैनर हेडलाइन आर मोट अक्षर मे छापि दैत अछि । तखन ई ख़बरि हमरा सब केँ बेसी महत्वपूर्ण लगैत अछि । फेर घर लगका खबरि सब मे कोनो दुइ राज्यक बीच सीमा विवादक ख़बरि अबैत अछि, जाहि मे हिंसा सेहो शामिल अछि । तखन पाकिस्तानक ख़बरि सेहो नज़रअंदाज़ भ’ जाइछ आ सीमा विवाद हमरा सभक ध्यान खींच लैत अछि । जखन बगलवला सड़कपर (गली मे) उपद्रव केर ख़बरि अबैछ, त सीमा विवाद सेहो हमरा सभक ध्यान नहि खींचि पबैत अछि । हम सब अखबार फेक दैत छी आ सामनेवला गली मे दौड़िकय देखैत छी जे कि भ’ रहल अछि । अगर ओतय रहिते कियो अपनहिं घर मे झगड़ाक ख़बरि दैत अछि (मान लिय’ अपन बच्चा सभक बीच या सासु-पुतोहुक बीच), तँ हम सब सड़क पर भेल झगड़ा केँ नज़रअंदाज़ कय केँ भागिकय घर पहुँचैत छी ।

अन्तर्राष्ट्रीय सन्दर्भ मे, अफ़्रीका युद्ध सबसँ महत्वपूर्ण लागि सकैत अछि । ओतय सँ, धीरे-धीरे पाकिस्तानक लड़ाइ, (लग-पासक राज्यक) सीमा विवाद, सड़क पर झगड़ा, घरक झगड़ा छोट होइत चलि जाइछ आर शायद अंतिम चरण धरि पहुँचि जाइछ जेतय एहि सभक कोनो महत्व नहि रहि जाइछ । लेकिन उपरोक्त मामिला सब मे हमरा सभक रुचि उलटा क्रम मे रहल अछि धीरे-धीरे बढ़ैत गेल अछि । कियैक ? कियैक तँ दूरी कम भेला संग हमरा सभक रुचि सेहो बढ़ैत जाइत अछि ।

आउ उपरोक्त प्रतीकात्मकता केँ उजागर करी आ अपन दृष्टि अंतर्मुखी करी । यदि हम सब अपना भीतर चलि रहल आन्तरिक संघर्ष केँ बुझि ली, त घरक झगड़ा सहित आन सब संघर्ष (झगड़ा-लड़ाइ), अफ्रीका मे कतहु भेल युद्धहि जेकाँ महत्वहीन भ’ जायत । आब, आउ हम सब ओहि आन्तरिक कलह केँ सुलझेबाक प्रयास करी, जेना कि अखबार कहैत अछि, तथा शान्ति व स्थिरता प्राप्त करी । ओहि ‘शान्ति’ मे, स्थान आ समय (Time & Space) लुप्त भ’ जायत । कि सुतैत काल हमरा सब केँ स्थान (स्पेस) केर कोनो बोध रहैत अछि ? नीन्द मे, कोनो प्रकारक जागरूकता या अनुभूतिक बोध नहि रहैत अछि, एतय धरि जे स्थानहु केर नहि । ज्ञान अबस्था मे, केवल ज्ञान आर अनुभव केर अबस्था मे रहनाय सम्भव अछि – ओहि मे स्थानक कोनो स्थान नहि होइछ ।

“समय” केर अवधारणा सेहो एहने अछि । जखन कियो अपन पिता सँ बिछुड़ि गेल छल, त ओ अधीर भ’ कय कानल छल । आब ओ नोर कतय गेलैक ? कोनो प्रियजनक मृत्युक समय जे दुःख घुटि-घुटिकय सिसकी सब सँ व्यक्त होइत छल, ओ ऐगलो दिन धरि नहि टिकितय । एना कियैक ? पदोन्नतिक खुशी या लॉटरी जीतबाक उल्लास सेहो समयक संग कम पड़ि जाइत छैक, कियैक ? जाहि प्रकार सँ स्थान मे निकटता अधिक जुड़ाव लेल उत्तरदायी होइत छैक, ताहि प्रकार सँ समयक संग सेहो एनाही होइत छैक । समय मे घटना जतेक लगक होइत छैक, हम सब ओतबे बेसी प्रभावित रहैत छी ।

जखन हमरा सभक विचार बाहर दिश प्रक्षेपित होइत अछि आर जखन हम सब समय व स्थान प्रति पूर्णतः सचेत होइत छी, काफी हद तक, ओ हमरा सभक दिश सँ बिना कोनो प्रयासहि केर अपन महत्व या प्रभाव समाप्त कय लैत अछि । एहि सँ ई आशा जगैत अछि जे, यदि हमरा सभक विचार अन्तर्मुखी हुअय आर हम सब कठोर प्रयास करी, त समय व स्थानक खेल सँ मुक्त होयब सम्भव अछि । यद्यपि, निद्राक दौरान समय आ स्थान केर चेतना नहि होइत अछि, एहेन अबस्था मे ओकर संज्ञानो तक नहि होइत अछि । यदि ज्ञानक फलस्वरूप व्यक्ति ताहि अबस्था केँ प्राप्त कय लैत अछि जेतय, जेना कि सन्त थायुमानवर कहलनि अचि: “मनुष्य बिना सुतनहिये सुतैत अछि”, समय आ स्थान केर अनुभूति सँ सचेतन रूप सँ मुक्त भ’ कय, पूर्ण आनन्द केर अबस्था मे रहनाय सम्भव अछि । तखन, अफ्रीका मे युद्धक त बाते छोड़ू, यदि हमरा सब केँ छुरो मारि देल जाय, तैयो ओ दूरक युद्धक तुलना मे कम या कोनो चिन्ताक विषय नहि होयत । यदि कियो प्रिय आ निकट सम्बन्धी, जेना, पति, पत्नी या बच्चा, केकरहु उपस्थिति समाप्त भ’ जाइछ, त एकर प्रभाव ओतबे कमजोर होयत, जतेक दस वर्ष पहिने पिता केर समाप्त भेला पर होइत छैक ।

आउ, हाल लेल, अद्वैत आ द्वैत केर गुण-दोष सब पर विचार करी । हम सब सबसँ बेसी कि चाहैत छी ? शान्ति ।

नीक या बेजा, दुनू हमरा सब केँ समान रूप सँ प्रभावित करैत अछि । कननाय आ हँसनाय, दुनू चीज परेशानीक कारक अछि आर हम सब दुनू सँ बचय चाहैत छी । एकटा सीमाक बाद, हँसी सेहो डाँर्ह (पेट) मे दर्द पैदा करैत अछि आर हमरा सब केँ कमज़ोर बना दैत अछि । हम सब तामश सँ चिकरि उठैत छी, ‘हमरा आर जुनि हँसाउ ।’ नचनाय भले आनन्ददायक हो, लेकिन शरीर थाकि जाइत अछि । एकटा समय एहेन अबैत अछि जे हम सब कहैत छियैक, ‘बस, बस’ आर हम सब शान्त भ’ कय असगरे रहय चाहैत छी । हमरा सब केँ यैह (शान्ति) चाही, नहि कि अद्वैत या द्वैत ।

हम सब यैह (शान्ति) देखबाक लेल चारू दिश देखैत छी जे ई प्राप्त करबाक लेल कि कयल जेबाक चाही । जँ हम सब एहि बात पर ध्यान केन्द्रित करी जे परेशानी सँ मुक्ति पाओल जाय, त एकटा बात स्पष्ट भ’ जाइत अछि ।

आउ अफ्रीका मे भेल युद्ध पर वापस चली, जाहि बारे मे हम सब शुरुआत मे तँ बड़ा चाव सँ पढ़ने छलहुँ, लेकिन बाद मे छोड़ि देने छलहुँ । कियैक ? कियैक तँ अन्तरिक्ष मे कोनो चीज़ जतेक दूर होइत अछि, ओकर हमरा सब पर ओतबहि कम प्रभाव पड़ैत अछि । एहि तरहें, दस वर्ष पूर्वहि पिताक मृत्युक सेहो आब कोनो प्रत्यक्ष प्रभाव नहि पड़ैत अछि । दोसर शब्द मे, कोनो वस्तु समय मे जतेक दूर होइत अछि, ओकर प्रभाव ओतबहि कम होइत छैक । ताहि लेल, यदि हमरा सब केँ हर तरहक परेशानी सब सँ पूर्णतः मुक्त हेबाक अछि, त हमरा सब अपना लग-पास घटित होयवला सब घटना केँ दूरक घटनाक रूप मे देखनाय सिखबाक चाही । जेनाही कोनो नीक या बेजा घटित होइत अछि, ओकरा एना बुझबाक चाही जेना कि ओ वर्षों पहिने घटित भेल हो । सुख आर दुःख अधिक समय तक नहि टिकैत अछि । ओहो ‘सापेक्ष’ होइत अछि या कोनो अन्य कारक पर निर्भर होइत अछि । यैह द्वारे, कोनो तरहक मानसिक परेशानी सँ पूर्णतः मुक्त हेबाक लेल, व्यक्ति केँ ‘तत्’ (आत्मा-परमात्मा) केँ पकड़य पड़त जे सापेक्ष (सम्बन्धित कारक) नहि छथि, बल्कि पूर्ण आर निरपेक्ष छथि तथा ओहि अनुभव मे अनन्तकाल धरि जिबय पड़त । यैह आइंस्टीन केर सापेक्षतावाद केर सिद्धान्त थिक जेकरा आध्यात्मिक क्षेत्र मे लागू कयल गेल अछि । ओ समय आर स्थान केर सेहो बात करैत अछि ।

हमरा लेल, उपनिषद सभक सन्देशक सार एहि दुनू अवधारणाक खेल सँ मुक्त होयबाक लिलसा पैदा करब प्रतीत होइछ । जतेक बेसी हम सब एहि सँ मुक्त होयबाक लेल प्रयास आ संघर्ष करब, ओतबे बेसी हमरा सब केँ लक्ष्य दिशक अपन यात्रा मे ईश्वर केर कृपा प्राप्त होयत ।

हमरा सब केँ जंगल या पहाड़ मे जाकय समाधान खोजबाक ज़रूरत नहि अछि । समय आ स्थान हमरा सब केँ अपन भावना सभक प्रभाव सँ मुक्त करबाक लेल सर्वोत्तम शिक्षक अछि । अपन सबटा प्रार्थना आ तपस्या यैह हेबाक चाही जे ईश्वर हमरा सब केँ एतय आ एखुनका घटना सब केँ एहि प्रकार देखबाक शक्ति प्रदान करथि मानू ओ समय आ स्थान मे हमरा सब बहुत दूर हो ।

उपनिषद मे सँ प्रथम, अर्थात् ईशावास्य, कहैत अछि, “ओ (आत्मा) चलैत (गति करैत) अछि, (मुदा) नहि चलैत (गति नहि करैत अछि); ओ दूर अछि, मुदा हमर समीप आ हमरहि भीतर मे अछि ।”

तदेजति तन्नेजाति तद्दूरे तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः । (ईशावास्य उपनिषद ५)

एहि सँ नहि केवल स्थान व काल तथा ओकर क्रीड़ा सँ उत्पन्न मोनक परिवर्तनशील अबस्था सभक उल्लेख होइत अछि, बल्कि ई ओहि दुनू सँ मुक्त हेबाक हमरा लोकनिक रुचि केँ सेहो उत्तेजित करैत अछि । उपरोक्त मंत्रक बाद आबयवला मंत्र सब मे यैह उपनिषद आत्माक भीतर समय आर स्थान दुनू केँ विद्यमान देखबाक लेल कहैत अछि । एक बेर ई दृष्टिगोचर भ’ जाय, त फेर न क्रोध, न मोह, न शोक, संक्षेप मे, मन मे कोनो व्याकुलता नहि रहि जाइछ । एकर बाद, एकटा अन्य मंत्र आत्मा केँ सर्वव्यापी हेबाक कारण स्थान सँ परे (हंटिकय, दूर) बतबैत अछि, आर फेर ओहि अबस्थाक वर्णन करैत अछि जेतय आत्मा समय सँ सेहो दूर (परे) भ’ जाइछ ।

संक्षेप मे, उपनिषदक निष्कर्ष आधुनिक विज्ञाने जेकाँ छैक, यानि, दुर्घटनाक समय आ स्थान केर खेलक परिणाम थिकैक । विज्ञान एकरहि प्रयोग पर आधारित एकटा सिद्धान्तक रूप मे प्रस्तुत करैत अछि । दोसर दिश, उपनिषद कहैत अछि जे ई बोध आत्म-अनुभव द्वारा प्राप्त कयल जा सकैत अछि । यैह उपनिषदक अन्तिम सन्देश अछि जे वेद सभक मुकुटमणि थिक ।

हरिः हरः!!

The Essence of the Message of Upanishad

What is the essence of the teachings contained in the Upanishads to reach that stage of merging?

Modern science is of the view that the phenomenal world exists as a result of the inter-play of the concepts of time and space. The Upanishad says that only when one transcends this conceptual state or gets outside it, can one realise the truth. The space-concept gets cancelled as it were in the anecdote I narrated earlier regarding horizon as the place where we stand. Likewise one should get beyond the time-concept.

Is it enough to talk theoretically of these? Is it within our capacity to perceive? To prove that it is possible to achieve this end, an illustration is available from our everyday life. In order to spend time, we read in the newspaper of an account of a war in Africa. But, if there is a war nearer, say in Pakistan or Kashmir, we become less interested in the Congo battle as compared to the battles taking place nearer. Even the editor of the newspaper takes the Africa news to a corner and presents the Pakistan war in banner headlines and bold print. Then this news appears more important to us. Then still nearer homes news of some boundary dispute between two states appears, attended by acts of violence. Then even the Pakistan news is ignored and the boundary dispute draws our attention. When there is news of disturbance in the adjoining street, even the border dispute does not hold our attention. We throw the paper away and run to the next street to see what is happening. If, while there, someone reports a quarrel in our home (say between our children or say between the mother-in-law and daughter-in-law) we ignore the street fight and rush home.

In the international context, the African war may appear all important. From there, progressively the Pakistan battle, the border dispute, the street fight, the fight at home appear smaller and smaller and may reach the final stage where it loses all significance. But our interest in the above matters has been in the inverse order and increased progressively. Why? Because our interest progressively increases with diminishing distance.

Let us unfold the above symbolism and turn our vision inward. If we realise the inner conflict within us, all other conflicts including those at home, will become unimportant like the war somewhere in Africa. Now, let us try to resolve the in-fighting as the newspapers would call it and achieve peace and calmness. In that ‘peace’, space and time  will disappear. Are we aware of space when sleeping? In sleep, there is no sense of awareness or feeling, not even of space. In the Jnaana stage, it is possible to live solely in a state of enlightenment and experience – space has no place in it.

The “Time” concept is similar. When one lost his father one wept inconsolably. Where are those tears now? Grief which found expression in choking sobs at the time of the death of somebody dear would not even last till the next day. Why is that? The joy of a promotion or the jubilation of winning a lottery  also fade our in time, why? Just as proximity in space is responsible for greater involvement, so is the case with time. The nearer the incident in time, the more are we affected.

When our thoughts are projected outwards and when we are fully conscious of time and space, we find that, to a great extent, they lose their significance or impact without any effort on our part. This raises the hope that, if our thoughts are focussed inward and we try hard, it is possible to get free from the play of time and space. Although, during sleep, there is no awareness of time and space, there is no congnisance of such a state. If, as a result of Jnaana (wisdom), one reaches the state where as saint Thaayumaanavar has said: “One sleeps without being asleep”, it is possible to be in a state of absolute bliss, consciously free from the feeling of time and space. Then, let alone the war in Africa, even if we are stabbed, it will be a matter of little or no concern as the distant war. If a dear and near relative, say a husband, wife or child, is lost in one’s very presence, it will only have a feeble impact like the loss of a father ten years ago.

Let us have alone, for the moment, the merits and demerits of Advaita and Dvaita. What do we want most? Peace – Shanti.

Both good and bad affect us equally. Weeping and laughter are both a bother and one would rather not have either. Beyond a point, even laughter causes pain in the sides and, it makes us weak. We burst out in rage, ‘Don’t make me laugh.’ Dancing may be a pleasure but the body get tired. At some stage one says ‘enough’ and one longs to be quiet and to be left alone. This is what is needed by us and not Advaita nor Dvaita.

We look around to see what should be done to achieve this. If we focus attention on how to get free from bother, one thing becomes clear.

Let us go back to the war in Africa which we avidly read in the beginning but later gave up. Why? Because the more distant a thing is in space, the less is its effect on us. Similarly one’s father’s death ten years ago does not have any visible effect now. In other words, the more distant a thing is in time, the less is the effect. Therefore, if we are to get totally free from all bother, we should learn to treat things that happen around us as happening far away. The moment good or bad occurs, it should be treated as though it happened years ago. Happiness and grief do not last long. They are also ‘relative’ or dependent on some other factor. Therefore, to be totally free from any type of mental botheration, one has to catch hold of ‘that’ which is not relative but is full and absolute and to live eternally in that experience. This is Einstein’s theory of Relativity applied to the spiritual field. He also talks of time and space.

To me, the essence of the message of the Upanishads appears to be to create a longing to be free from the play of these two concepts. To the extent we strive and struggle to get free from these, to that extent we are bound to have God’s grace in our journey towards the goal.

We do not have to search for the solution in forests or mountains. Time and space are the best teachers to free us from the effects of involvement with our feelings. All our prayers and penance should be that God may give us the power to treat happenings here and now as if they were widely separated from us by time and space.

The first of the Upanishads viz., Isaavaasya, says “That (Aatma) moves, (but) moves not; that is distant, but is near and inside us.”

Tadejati Tannejati Taddoore Tadvantike. Tadantarasya Sarvasya Tadu Sarvasyaas/y Baahyatah (I. U. 5)

By this, it not only refers to space and time and the alternating states of the mind which are caused by their play, but it stimulates our interest to get free from both of them. In the mantras which follow the above mantra the same Upanishad asks one to see both time and space existing inside the Aatma. Once this is sighted, then there is no anger, illusion or grief, in short no agitation of the mind. Thereafter, another mantra talks of the Aatma as transcending space by being omnipresent, and then goes on to describe the stage where time is also transcended by Aatma.

Summing up, the Upanishad has the same conclusion as modern science, viz., casualty is the result of the play of time and space. Science presents this as a postulate based on experiment. On the other hand, the Upanishad says that this realisation can be achieved by self experience. This is the final message of the Upanishad which is the crown jewel of the Vedas.

Harih Harah!!

उपनिषद के संदेश का सार

(आत्मा का परमात्मा के साथ) विलय की उस अवस्था तक पहुँचने के लिए उपनिषदों में निहित शिक्षाओं का सार क्या है ?

आधुनिक विज्ञान का मत है कि प्रत्यक्ष जगत काल और स्थान की अवधारणाओं (Time-Space Theory दिक्-काल सिद्धान्त) के परस्पर क्रिया के परिणामस्वरूप विद्यमान है । उपनिषद कहता है कि जब कोई इस वैचारिक अवस्था से परे हो जाता है या इससे बाहर निकल जाता है, तभी वह सत्य का साक्षात्कार कर सकता है । क्षितिज का वह स्थान जहाँ हम खड़े हैं, इस बारे में मैंने पहले जो किस्सा (पृथ्वी से आकाश का मिलने वाली धारणा पर आधारित किस्सा) सुनाया था, उसमें स्थान-अवधारणा मानो समाप्त हो जाती है । इसी प्रकार, व्यक्ति को काल-अवधारणा से परे जाना चाहिए ।

क्या इनके बारे में सैद्धांतिक रूप से बात करना पर्याप्त है ? क्या यह हमारी अनुभूति की क्षमता में है ? यह सिद्ध करने के लिए कि इस लक्ष्य को प्राप्त करना संभव है, हमारे दैनिक जीवन से एक उदाहरण उपलब्ध है । समय बिताने के लिए, हम समाचार पत्र में अफ्रीका में हुए एक युद्ध का विवरण पढ़ते हैं । लेकिन, यदि कोई युद्ध निकट में हो, जैसे पाकिस्तान या कश्मीर में, तो हम निकट में हो रहे युद्धों की तुलना में कांगो युद्ध में कम रुचि लेते हैं । अख़बार का संपादक भी अफ़्रीका की ख़बरों को एक कोने में ले जाकर पाकिस्तान युद्ध को बैनर हेडलाइन और मोटे अक्षरों में छाप देता है । तब यह ख़बर हमें ज़्यादा महत्वपूर्ण लगती है । फिर घर नज़दीक के खबरों में दो राज्यों के बीच सीमा विवाद की ख़बरें आती हैं, जिनमें हिंसा भी शामिल है । तब पाकिस्तान की ख़बरें भी नज़रअंदाज़ हो जाती हैं और सीमा विवाद हमारा ध्यान खींच लेता है । जब बगल वाली सड़कपर (गली में) उपद्रव की ख़बर आती है, तो सीमा विवाद भी हमारा ध्यान नहीं खींच पाता । हम अख़बार फेंक देते हैं और अगली गली में दौड़कर देखते हैं कि क्या हो रहा है । अगर वहाँ रहते हुए भी कोई हमारे घर में झगड़े की ख़बर देता है (मान लीजिए हमारे बच्चों के बीच या सास-बहू के बीच), तो हम सड़क पर हुए झगड़े को नज़रअंदाज़ करके घर भाग जाते हैं ।

अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में, अफ़्रीका युद्ध सबसे महत्वपूर्ण लग सकता है । वहाँ से, धीरे-धीरे पाकिस्तान की लड़ाई, सीमा विवाद, सड़क पर झगड़ा, घर का झगड़ा छोटा होता जाता है और शायद अंतिम चरण तक पहुँच जाता है जहाँ इसका कोई महत्व नहीं रह जाता । लेकिन उपरोक्त मामलों में हमारी रुचि उलटे क्रम में रही है और धीरे-धीरे बढ़ती गई है । क्यों ? क्योंकि दूरी कम होने के साथ हमारी रुचि भी बढ़ती जाती है ।

आइए उपरोक्त प्रतीकात्मकता को उजागर करें और अपनी दृष्टि अंतर्मुखी करें । यदि हम अपने भीतर के आंतरिक संघर्ष को समझ लें, तो घर के संघर्षों सहित अन्य सभी संघर्ष, अफ्रीका में कहीं हुए युद्ध की तरह महत्वहीन हो जाएँगे । अब, आइए हम उस आंतरिक कलह को सुलझाने का प्रयास करें, जैसा कि अखबार कहते हैं, तथा शांति और स्थिरता प्राप्त करें । उस ‘शांति’ में, स्थान और समय लुप्त हो जाएँगे । क्या सोते समय हमें स्थान का बोध होता है ? नींद में, किसी प्रकार की जागरूकता या अनुभूति का बोध नहीं होता, यहाँ तक कि स्थान का भी नहीं । ज्ञान अवस्था में, केवल ज्ञान और अनुभव की अवस्था में रहना संभव है – उसमें स्थान का कोई स्थान नहीं होता ।

“समय” की अवधारणा भी ऐसी ही है । जब किसी ने अपने पिता को खोया था, तो वह फूट-फूट कर रोया था । अब वे आँसू कहाँ हैं ? किसी प्रियजन की मृत्यु के समय जो दुःख घुटन भरी सिसकियों में व्यक्त होता था, वह अगले दिन तक भी नहीं टिकता । ऐसा क्यों ? पदोन्नति की खुशी या लॉटरी जीतने का उल्लास भी समय के साथ फीका पड़ जाता है, क्यों ? जिस प्रकार स्थान में निकटता अधिक जुड़ाव के लिए उत्तरदायी होती है, उसी प्रकार समय के साथ भी ऐसा ही है । समय में घटना जितनी निकट होती है, हम उतने ही अधिक प्रभावित होते हैं ।

जब हमारे विचार बाहर की ओर प्रक्षेपित होते हैं और जब हम समय और स्थान के प्रति पूर्णतः सचेत होते हैं, तो हम पाते हैं कि, काफी हद तक, वे हमारी ओर से बिना किसी प्रयास के ही अपना महत्व या प्रभाव खो देते हैं । इससे यह आशा जगती है कि, यदि हमारे विचार अंतर्मुखी हों और हम कठोर प्रयास करें, तो समय और स्थान के खेल से मुक्त होना संभव है । यद्यपि, निद्रा के दौरान समय और स्थान का चेतना नहीं होता, ऐसी अवस्था का संज्ञान तक नहीं होता । यदि ज्ञान के फलस्वरूप व्यक्ति उस अवस्था को प्राप्त कर लेता है जहाँ, जैसा कि संत थायुमानवर ने कहा है: “मनुष्य बिना सोए सोता है”, तो समय और स्थान की अनुभूति से सचेतन रूप से मुक्त होकर, पूर्ण आनंद की अवस्था में रहना संभव है । तब, अफ्रीका में युद्ध की तो बात ही छोड़िए, यदि हमें छुरा भी मारा जाए, तो भी वह दूर के युद्ध की तुलना में कम या कोई चिंता का विषय नहीं होगा । यदि कोई प्रिय और निकट संबंधी, जैसे पति, पत्नी या बच्चा, किसी की उपस्थिति में ही खो जाता है, तो इसका प्रभाव उतना ही कमजोर होगा, जितना दस वर्ष पहले पिता को खोने पर होता है ।

आइए, फिलहाल, अद्वैत और द्वैत के गुण-दोषों पर विचार करें । हम सबसे ज़्यादा क्या चाहते हैं ? शांति ।

अच्छाई और बुराई, दोनों ही हमें समान रूप से प्रभावित करते हैं । रोना और हँसना, दोनों ही परेशानी का सबब हैं और हम दोनों से बचना चाहते हैं । एक सीमा के बाद, हँसी भी कमर में दर्द पैदा करती है और हमें कमज़ोर बना देती है । हम गुस्से से चिल्ला उठते हैं, ‘मुझे मत हँसाओ ।’ नाचना भले ही आनंददायक हो, लेकिन शरीर थक जाता है । एक समय ऐसा आता है जब हम कहते हैं, ‘बस, बस’ और हम शांत होकर अकेले रहना चाहते हैं । हमें यही चाहिए, न कि अद्वैत या द्वैत ।

हम यह (शान्ति) देखने के लिए चारों ओर देखते हैं कि इसे प्राप्त करने के लिए क्या किया जाना चाहिए । अगर हम इस बात पर ध्यान केंद्रित करें कि परेशानी से कैसे मुक्ति पाई जाए, तो एक बात स्पष्ट हो जाती है ।

आइए अफ्रीका में हुए युद्ध पर वापस जाएँ, जिसके बारे में हमने शुरुआत में तो बड़े चाव से पढ़ा था, लेकिन बाद में छोड़ दिया था । क्यों ? क्योंकि अंतरिक्ष में कोई चीज़ जितनी दूर होती है, उसका हम पर उतना ही कम प्रभाव पड़ता है । इसी प्रकार, दस वर्ष पूर्व पिता की मृत्यु का भी अब कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ता । दूसरे शब्दों में, कोई वस्तु समय में जितनी दूर होती है, उसका प्रभाव उतना ही कम होता है । इसलिए, यदि हमें सभी प्रकार की परेशानियों से पूर्णतः मुक्त होना है, तो हमें अपने आस-पास घटित होने वाली घटनाओं को दूर की घटनाओं के रूप में देखना सीखना चाहिए । जैसे ही कोई अच्छा या बुरा घटित होता है, उसे ऐसे समझना चाहिए जैसे वह वर्षों पहले घटित हुआ हो । सुख और दुःख अधिक समय तक नहीं टिकते । वे भी ‘सापेक्ष’ होते हैं या किसी अन्य कारक पर निर्भर होते हैं । इसलिए, किसी भी प्रकार की मानसिक परेशानी से पूर्णतः मुक्त होने के लिए, व्यक्ति को ‘उस’ को पकड़ना होगा जो सापेक्ष नहीं, बल्कि पूर्ण और निरपेक्ष है और उस अनुभव में अनंत काल तक जीना होगा । यही आइंस्टीन का सापेक्षतावाद का सिद्धांत है जिसे आध्यात्मिक क्षेत्र में लागू किया गया है । वे समय और स्थान की भी बात करते हैं ।

मेरे लिए, उपनिषदों के संदेश का सार इन दोनों अवधारणाओं के खेल से मुक्त होने की लालसा पैदा करना प्रतीत होता है । जितना अधिक हम इनसे मुक्त होने के लिए प्रयास और संघर्ष करेंगे, उतना ही अधिक हमें लक्ष्य की ओर अपनी यात्रा में ईश्वर की कृपा प्राप्त होगी ।

हमें जंगलों या पहाड़ों में समाधान ढूँढ़ने की ज़रूरत नहीं है । समय और स्थान हमें अपनी भावनाओं के प्रभाव से मुक्त करने के सर्वोत्तम शिक्षक हैं । हमारी सारी प्रार्थनाएँ और तपस्या यही होनी चाहिए कि ईश्वर हमें यहाँ और अभी की घटनाओं को इस प्रकार देखने की शक्ति प्रदान करें मानो वे समय और स्थान द्वारा हमसे बहुत दूर हों ।

उपनिषदों में से प्रथम, अर्थात् ईशावास्य, कहता है, “वह (आत्मा) गति करती है, (पर) गति नहीं करती; वह दूर है, पर हमारे निकट और हमारे भीतर है ।”

तदेजति तन्नेजाति तद्दूरे तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः । (ईषावास्य उपनिषद ५)

इससे न केवल स्थान और काल तथा उनके क्रीड़ा से उत्पन्न मन की परिवर्तनशील अवस्थाओं का उल्लेख होता है, बल्कि यह उन दोनों से मुक्त होने की हमारी रुचि को भी उत्तेजित करता है । उपरोक्त मंत्र के बाद आने वाले मंत्रों में यही उपनिषद आत्मा के भीतर समय और स्थान दोनों को विद्यमान देखने के लिए कहता है । एक बार यह दृष्टिगोचर हो जाए, तो फिर न क्रोध, न मोह, न शोक, संक्षेप में, मन में कोई व्याकुलता नहीं रहती । इसके बाद, एक अन्य मंत्र आत्मा को सर्वव्यापी होने के कारण स्थान से परे बताता है, और फिर उस अवस्था का वर्णन करता है जहाँ आत्मा समय से भी परे हो जाती है ।

संक्षेप में, उपनिषद का निष्कर्ष आधुनिक विज्ञान जैसा ही है, अर्थात्, दुर्घटना समय और स्थान के खेल का परिणाम है । विज्ञान इसे प्रयोग पर आधारित एक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत करता है । दूसरी ओर, उपनिषद कहता है कि यह बोध आत्म-अनुभव द्वारा प्राप्त किया जा सकता है । यही उपनिषद का अंतिम संदेश है जो वेदों का मुकुटमणि है ।

हरिः हरः!!

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