चारि वेद
“अनन्तावै वेदाः” – “वेद अनन्त अछि”, लेकिन ऋषिगण हमरा सभक लेल एहि असीम वेद मे सँ मात्र किछुए मंत्र सब संकलन कय (पकड़ि) सकल छथि । ई मंत्र हमरा सब लेल एहि लोक मे सुख आ परलोक मे मोक्षक संग-संग सर्वजन (सम्पूर्ण ब्रह्माण्डक) कल्याण लेल पर्याप्त अछि । यद्यपि हम सब वेद केँ चार टा मानैत छी, तैयो एहि चारि गोट पाठ केर अनेकों संस्करण (वर्सन) तथा विभिन्न विधि सब छैक । एकरा पाठान्तरं – या पाठ करबाक तरीका कहल जाइत छैक ।
पाठ केर प्रत्येक संप्रदाय केँ “शाखा” कहल जाइत छैक । यैह प्रत्येक शाखा ‘वैदिक वृक्ष’ केर एकटा शाखा होइत छैक । वेद असंख्य मुख्य एवं सहायक शाखा सब सँ भरल एकटा बरगदक गाछ (वृक्ष) जेकाँ महिमावान होइछ । यद्यपि एकर असंख्य शाखा सब छैक, तैयो एकरा मुख्य शाखा, अर्थात् ऋग, यजु, साम आ अथर्व, केर अन्तर्गत वर्गीकृत आ समूहीकृत कयल गेल अछि, जेकरा एक समूह केर रूप मे ओकर महत्वक कारण ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि कहल जाइछ ।
यद्यपि आधुनिक शोध ऋग्वेद केँ यजुर्वेदहु सँ पुरान मानैत अछि, तैयो हमरा सभक शास्त्र आ अपन मान्यता सभक मुताबिक एकरा सभक समय केर हिसाब सँ कोनो आरम्भ नहि छैक । शोधकर्ता लोकनिक एहि निष्कर्ष पर कोनो विश्वास नहि कयल जा सकैछ जे ई (वेद) पहिने आयल या ओ (वेद) बाद मे आयल, जखन कि हम सब यैह पबैत छी जे सृष्टिक आरम्भ मे, ब्रह्मांड मे चारू वेद उपलब्ध छल ।
एहि तरहें, “शोधकर्ता” संहिता, ब्राह्मण आर आरण्यक जेहेन वेदक अंश सब केँ कोन क्रम मे राखल जाय, सेहो तय करय मे गलती करैत छथि । वेदक उत्पत्ति या क्रम केर सम्बन्ध मे समयक कारक (टाइम फैक्टर) केर गणना अनुचित होयत, यदि ई देखल जाय जे वेदक खोज आ प्रस्तुति ऋषि लोकनि द्वारा वैह समय कयल गेल छल जखन ओ सब समय सँ दूर एकटा एहेन अबस्था मे पहुँचि गेल छलथि जेतय सँ ओ सब भूत, वर्तमान आ भविष्य केँ देखि सकैत छलाह । वेद मंत्र सभक खोज केर विस्तार पारलौकिक अबस्थाक अवधिक आधार पर भिन्न भ’ सकैत अछि ।
ऋग्वेदहि मे कतेको स्थान पर यजुर्वेद आर सामवेदक उल्लेख भेटैछ । ऋग्वेद केर दसमा मंडल, नब्बेमा सूक्त मे वर्णित पुरुष सूक्त, अन्य वेद सभक सेहो उल्लेख करैत अछि । कि एहि सँ ई पता नहि चलैछ जे किछु वेदक “पहिने या बाद के” होयबाक प्रश्नहि नहि उठैछ ?
प्रत्येक शाखा मे तीन टा भाग होइत छैक जेकरा संहिता, ब्राह्मण आर आरण्यक कहल जाइछ । इहो एकटा वर्गीकरण थिकैक । सामान्यतः जखन हम सब वेद अध्ययनक बात करैत छी, तँ हमर तात्पर्य संहिता भाग केर पाठ सँ रहैत अछि । एहि एहि लेल अछि जे संहिता, मानू शाखाक आधार या प्राणवायु थिक ।
संहिताक अर्थ अछि ओ जे एकत्रित आ व्यवस्थित कयल गेल हो । वेदक तात्पर्य केँ मंत्र सब केँ समुचित ढंग सँ व्यवस्थित रूप मे प्रस्तुत करैत अछि ।
ऋग्वेद
सम्पूर्ण ऋग्वेद संहिता छंद रूप मे अछि । जेकरा बादक युग मे श्लोक (छंद) कहल जाय लागल, तेकरा पहिने ‘ऋक्’ या स्तुति स्तोत्र कहल जाइत छलैक ।
सम्पूर्ण ऋग्वेद संहिता केवल ऋग् या स्तोत्र रूप मे अछि जाहि मे विभिन्न देवता लोकनिक स्तुति कयल गेल अछि । प्रत्येक ऋक् एकटा मंत्र थिक । अनेक ऋक् मिलिकय एकटा “सूक्त” बनैत अछि ।
ऋग्वेद – जे एकर संहिता भाग अछि – ताहि मे दस हज़ार सँ बेसी ऋक् (सटीक रूप सँ १०,१७०) अछि । चारू ऋक् संहिता मे २०,५०० मंत्र छैक । ऋग्वेद, जाहि मे १०२८ सूक्त या स्तोत्र सभक संग्रह अछि, एकरा दू टा भाग मे विभाजित कयल गेल छैक जाहि मे १० टा मंडल आर ८ टा अष्टक छैक । ई अग्नि पर एक सूक्त सँ आरम्भ होइत अछि आ अग्निये पर समाप्त सेहो होइत अछि । वेद सब मे, ऋग्वेद पूर्णतः देवता लोकनिक स्तुति मे स्तोत्र सभक रूप मे अछि । चूँकि एकर आरम्भ (उपक्रम) आर अन्त (उपसंहार) मे अग्निक उल्लेख अछि, ताहि सँ किछु लोक मानैत छथि जे वेदक तात्पर्य अग्नि-पूजा थिक । अग्नि केँ आत्माक चेतना (आत्म चैतन्यम्) केर प्रकाश – आत्माक जागरण केर आभा – एना मानल जाय त बेसी उचित होयत ।
यद्यपि ऋग्वेद केर अन्तिम सूक्त अग्नि सँ सम्बन्धित अछि, तैयो एहि मे सार्वभौमिक अपील वला श्लोक अछि: “सब लोक मिलू आ एक मन सँ विचार करू । सभक हृदय प्रेमपूर्वक एक भ’ जाय । सभक लक्ष्य एक्के हो । सब एक्के उद्देश्यक संग सुखपूर्वक रहू ।” ऋग्वेद केर समापन एहिक संग होइत अछि ।
ऋग्वेद केर गौरव ई अछि जे एहि मे सबटा देवता लोकनिक स्तुति मे स्तुतिगान कयल गेल अछि । बुद्धिमान लोकनि एकर सम्मान करैत छथि, कियैक तँ ई सामाजिक जीवन केर तौर-तरीका सब केँ आन ग्रन्थ सभक तुलना मे बेहतर वर्णन करैत अछि । उदाहरणक लेल, विवाह संस्कार सूर्यपुत्रीक विवाह केर तर्ज पर रचल गेल अछि, जेकर एहि विस्तृत विवरण देल गेल अछि । पुरुरवा आर उर्वशीक बीच संवाद जेहेन नाटकीय परिस्थिति सब सेहो ऋग्वेद मे स्थान पेने अछि । बादक वर्ष (समय) मे कालिदास जेहेन कवि लोकनि एहि पर आर विस्तार सँ प्रकाश देलनि अछि ।
ऋग्वेद केर ओहि अंशक, जाहि मे भोर केर देवी ‘उषा’क वर्णन अछि, विवेकशील लोक काव्य रचनाक उत्कृष्ट कृतिक रूप मे प्रशंसा करैत छथि । ऋग्वेद केँ वेद मे प्रथम स्थान कियैक देल गेल छैक, तेकरो कोनो न कोनो कारण अवश्ये हेतैक । यजुर्वेद जाहि कर्म केर उपदेश दैत अछि आर सामवेद जाहि संगीतमय पाठ केर निर्देश दैत अछि, से ऋग्वेदहि केर मूल ऋचा सब सँ उत्पन्न होइत अछि ।
यजुर्वेद
“यजुस्” शब्द “यज्” धातु सँ बनल अछि, जेकर अर्थ होइत छैक पूजा कयनाय । यज्ञ (बलिदान) शब्द सेहो एहि सँ बनल अछि ।
जाहि तरहें ‘ऋग्’ शब्दक अर्थ स्तुति स्तोत्र होइत अछि ताहि तरहें ‘यजुस्’ शब्द सेहो यज्ञक कर्मकाण्डीय प्रक्रिया केर बोध करबैत अछि । अपन नामक अनुरूप, यजुर्वेदक मुख्य उद्देश्य ऋग्वेद सँ मंत्र सभक स्तोत्र रूप केँ व्यवहारिक (मानव द्वारा व्यवहार मे उपयोगी) बनेबाक लेल यज्ञ या पूजाक आकार देनाय छैक । यजुर्वेद ऋग्वेदक स्तोत्र रूपी मंत्रहि सभक सन्दर्भ प्रस्तुत करैत अछि । एकर अलावे, ई विभिन्न यज्ञ केर अनुष्ठानक प्रक्रिया केँ गद्य रूप मे वर्णन करैत अछि । ऋग्वेद स्तोत्र द्वारा स्तुतिक जाप करय मे सहायता करैछ । यजुर्वेद ई स्तोत्र आ मंत्र सब उपयोग कयकेँ यज्ञ सभक वास्तविक अनुष्ठान मे सहायता करैछ ।
अन्य वेद जेकाँ, अनेकों शाखाक अतिरिक्त, यजुर्वेदहु केर दुइ गोट मुख्य शाखा छैक, जाहि मे सँ प्रत्येक केर अनेकों पाठ संशोधन (समीक्षा, पुनरालोचना) सेहो छैक ।
मुख्य शाखा केँ शुक्ल यजुर्वेद आर कृष्ण यजुर्वेद कहल जाइत छैक । शुक्ल केर अर्थ श्वेत (उज्जर) आर कृष्ण केर कारी होइत छैक । शुक्ल यजुर्वेद संहिता केँ वाजसनेयी संहिताक नाम सँ सेहो जानल जाइत छैक । वाजसनि सूर्य थिकाह । एना मानल जाइछ जे ऋषि याज्ञवल्क्य सूर्यदेव सँ सिखिकय एहि संहिता केँ संसारक ज्ञान मे अनने रहथि, ताहि लेल एकरा वाजसनेयी संहिता कहल जाइत छैक ।
याज्ञवल्क्य सूर्य सँ वाजसनेयी संहिता केना सिखलनि, एहि बारे मे एकटा रोचक कथा छैक । जखन वेद सब केँ वेद व्यास चारि भाग मे विभाजित कयलनि, तखन यजुर्वेद केर केवल एक्के टा संस्करण या शाखा छल । ऋषि व्यास एकरा शिष्य सभक माध्यम सँ संरक्षण आ प्रचार-प्रसार हेतु ऋषि वैशम्पायन केँ सौंपि देलनि । याज्ञवल्क्य एकरा वैशम्पायन सँ सिखने रहथि । वैशम्पायन तथा याज्ञवल्क्य केर बीच भेल किछु गलतफहमीक कारण, गुरु शिष्य सँ ओ सब किछु वापस करबाक लेल कहलनि जे ओ हुनका सिखौने रहथि । याज्ञवल्क्य गुरुक एहि मांग केँ जायज बुझलनि आर हुनकहि मुताबिक आदेशक पालन सेहो कयलनि । फेर ओ भगवान् सूर्य सँ प्रार्थना कयलनि जे ओ हुनका शिष्यक रूप मे स्वीकार करथि । सूर्य हुनका यजुर्वेदक एकटा अलग संस्करण पढ़ौलनि ।
एहि प्रकारे, एकरा वाजसनेयी या शुक्ल यजुर्वेद नाम भेटल । चूँकि एकरा शुक्ल (या श्वेत) कहल जाइत छल, ताहि सँ वैशम्पायन द्वारा पढ़ायल गेल पहिल वला यजुर्वेद केँ कृष्ण यजुर्वेद कहल जाय लागल ।
कृष्ण यजुर्वेद पूरे तरह सँ संहिता आ ब्राह्मण भाग मे विभाजित नहि अछि । ब्राह्मण भाग सब केँ कखनहुँ-कखनहुँ संहिता मंत्र सभक संग ओकर सम्बन्धित स्थान सब पर जोड़ि देल जाइत अछि ।
यजुर्वेद केर महिमा वैदिक कर्म या अनुष्ठान सभक उत्कृष्ट प्रस्तुति मे निहित अछि । कृष्ण यजुर्वेद मे तैत्तरीय संहिता द्वारा दर्शपूर्णमास, सोमयाग, वाजपेय, राजसूय, अश्वमेध तथा कतेक आन यज्ञ सभक विस्तृत विवरण हमरा सब केँ भेटैत अछि । एकर अलावे, किछु मंत्र जे स्तुति स्तोत्र थिक आर जे ऋग्वेद मे नहि छैक, सेहो यजुर्वेद मे पाओल जाइत अछि । उदाहरणक लेल, श्री रुद्रम्, जे वर्तमान मे प्रचलित अछि, यजुर्वेद सँ अछि । यद्यपि “पंच रुद्रम्” नामक पाँच सूक्त ऋग्वेद मे स्थान पबैत छैक, आइ श्री रुद्रम् केवल यजुर्वेद मे निहित बात सभ टा केँ सन्दर्भित करैत अछि । ताहि लेल महान शिवभक्त, अप्पय्या दिक्षित, केर बारे मे कहल जाइछ जे हुनका एक बेर एहि बातक दुःख भेलनि जे हुनकर जन्म यजुर्वेद मे नहि भेल छन्हि, कियैक तँ ओ मात्र यजुर्वेदहि केर माध्यम टा सँ शिव केर उचित पूजा कय सकैत छलथि । हुनकर जन्म एक एहेन परिवार मे भेल छलन्हि जे पारम्परिक रूप सँ सामवेदक पालन करैत छल । आइ, बेसी रास लोक यजुर्वेदक पालन करैत अछि । जेतय शुक्ल यजुर्वेद उत्तर भारत मे प्रचलित सम्प्रदाय अछि, ओतय कृष्ण यजुर्वेद दक्षिण भारत मे प्रचलित सम्प्रदाय अछि । ऋग्वेद मे वर्णित पुरुष सूक्त, यजुर्वेद मे सेहो किछु परिवर्तनक संग अबैत अछि । लेकिन यदि पुरुष सूक्त केर उल्लेख नाम सँ कयल जाइत अछि त ओ सामान्यतः यजुर्वेद मे वर्णित संस्करण केँ सन्दर्भित करैत अछि ।
यजुर्वेद अद्वैतवादी सभक लेल विशेष महत्व रखैत छैक – ओ लोकनि जे दर्शन केर “अद्वैतवाद” सम्प्रदाय केँ बुझैत आर ओहि मे विश्वास करैत छथि । विद्वान लोकनिक मुताबिक कोनो दार्शनिक सिद्धान्त मे एकटा सूत्र (एफोरिज्म), भाष्य (कमेन्ट्री) तथा वार्तिक या व्याख्यात्मक टिप्पणी (एक्सप्लानेटरी नोट) अवश्य शामिल रहबाक चाही । सूत्र सिद्धान्त केँ संक्षिप्त या सारगर्भित रूप मे प्रस्तुत करैत अछि । भाष्य ओकरा उपर विस्तृत विवरण प्रस्तुत करैत अछि । वार्तिक भाष्यक एकटा आर बेस विस्तृत व्याख्या होइछ । अद्वैत सिद्धान्त मे, वार्तिककार (जे वर्तिका लिखैत छथि) शब्द केवल एक व्यक्ति केँ सन्दर्भित करैछ, यानि सुरेश्वराचार्य, जे आदि शंकराचार्यक शिष्य रहथि । ओ कोन भाष्य पर वार्तिक लिखलनि ? यदि उपनिषद सब केँ सूत्र मानल जाइत अछि, तँ आदि शंकराचार्य ओहि सब पर भाष्य लिखलनि । ओ ब्रह्मसूत्र पर ऋषि बादरायण या वेद व्यास द्वारा रचित एकटा भाष्य सेहो लिखलनि ।
आचार्य केर प्रत्यक्ष शिष्य, सुरेश्वराचार्य ताहि उपर वार्तिक लिखलनि, यानी उपनिषद् भाष्य पर । एना करैत, ओ सम्पूर्ण दस गोट प्रमुख उपनिषद् सबपर (भाष्य) नहि लिखलनि; ओ मात्र दुइ गोट टा केँ लेलनि । ई तैत्तरीय उपनिषद् आर बृहदारण्यक उपनिषद् थिक, जे कि क्रमशः कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद सँ सम्बन्धित अछि । दुनू उपनिषद् यजुर्वेद केर अछि । एहि प्रकारे, अद्वैत दर्शनक अनुयायी लोकनिक लेल यजुर्वेदक अत्यधिक महत्व अछि ।
सामवेद
“साम” केर अर्थ होइछ मन मे शांति अननाय । दोसर शब्द मे, मन केँ शांति मे सुख प्राप्त करबा योग्य बनेनाय । शत्रु सँ निपटारा लेल चारि टा तरीका, अर्थात् साम, दान, भेद आ दंड, मे सँ पहिल थिक साम, अर्थात प्रेम आ मधुर शब्द सँ शत्रु पर विजय प्राप्त करब । ऋग्वेद केर कतेको ऋचा या मंत्र सब केँ सामवेदक मधुर स्तोत्र मे संगीतबद्ध कयल गेल अछि ।
यद्यपि मूलतः ई ऋग्वेद केर मंत्र थिक, तैयो एकरा संगीतबद्ध कयल गेल अछि जे आत्माक आध्यात्मिक विकास तथा देवता सभक कृपा वास्ते अत्यन्त अनुकूल अछि । ई सामवेदक विशेष गुण थिक आ एहि लेल भगवद्गीता मे भगवान् कृष्ण कहैत छथि: “वेद मे, हम सामवेद छी ।” ललिता सहस्रनाम, जाहि मे देवी ललिता, दिव्य माँ केर हज़ार गुणगान छन्हि, एकटा विशेषण “सामगानप्रिया” केर उल्लेख अछि – जेकर अर्थ अछि सामवेद केर पाठ सँ प्रसन्न होयवाली देवी ।
अथर्ववेद
अथर्व केर अर्थ अछि पुरोहित । एहि नामक एकटा ऋषि छलाह । अथर्ववेद केर मंत्र सब केँ अथर्वण नामक ऋषि प्रकाश मे अनने रहथि । एहि वेद मे कतेको प्रकारक मंत्र अछि जे बुराइ आ कष्ट सब केँ दूर करय मे आर शत्रु सभक नाश करय लेल बनाए गेल अछि । अथर्व मंत्र गद्यक संग-संग पद्य मे सेहो अछि । अथर्ववेद मे एहेन मंत्र भेटैत अछि जे ओहि देवता सब सँ सम्बन्धित अछि जिनकर उल्लेख आर (आन) वेद सब मे नहि छन्हि ।
अथर्ववेद मे सृष्टि सँ सम्बन्धित कतेको रास सूक्त सेहो अछि । सृष्टिक आश्चर्य सभक बखान करयवला सूक्त “पृथ्वी सूक्तम्” यैह वेद मे अबैत अछि ।
एहि वेदक गौरव यैह छैक जे यज्ञक संचालन करयवला ब्रह्मा अथर्ववेद केर प्रतिनिधि छथि । दस प्रमुख उपनिषद मे सँ तीन टा – प्रश्न, मुण्डक आ माण्डूक्य - एहि वेदक अंग थिकैक ।
एकटा कहावत अछि जे मुमुक्षु या सत्य केर साधकक लेल केवल माण्डूक्य उपनिषद टा मोक्ष या मुक्ति सुनिश्चित कय सकैत अछि । अथर्ववेदक महत्वक अन्दाजा यैह सँ लगायल जा सकैत अछि ।
गायत्री, जेकरा सब मंत्र मे सब सँ महान मानल जाइत छैक, केँ तीनू वेद – ऋग्, यजुर् और साम केर सार कहल जाइत छैक । स्पष्टतः, अथर्ववेद केर एकटा अलग मंत्र छैक । तेँ हेतु, अथर्ववेद केर अध्ययन शुरू करय सँ पहिने, एकटा अलग उपनयन संस्कार या जनेउ संस्कार कयनाय आर अथर्ववेद केर अध्ययन से पहिने ब्रह्मोपदेश प्राप्त कयनाय आवश्यक मानल जाइत छैक ।
उपनयनक दौरान बरुआ (लड़का) केँ जाहि गायत्री सँ दीक्षित कयल जाइछ, ओकरा त्रिपाद गायत्री कहैत छैक, अर्थात तीन पैर वाली । से एहि लेल कहल जाइत छैक कियैक तँ एकर तीन टा अंग होइत छैक । प्रत्येक पाद या अंग एकटा वेद केर सार थिकैक । हालाँकि, अथर्ववेद केर अपन एक (अलग) गायत्री छैक । ताहि लेल अथर्व गायत्री मे दीक्षित भेनाय आ फेर अथर्ववेद सिखनाय आवश्यक छैक । दोसरी दिश, यदि कोनो व्यक्ति अन्य तीन वेद मे सँ कोनो एकटा सँ सम्बन्धित अछि आर तीनू मे आर दुइ वेद केँ सिखय चाहैत अछि त ओकरा अपन दोसर उपनयन संस्कार करबाक कोनो आवश्यकता नहि छैक । एना एहि लेल छैक कियैक तँ तीनू वेद, ऋग्, यजु और साम, केर वास्ते एक्के टा गायत्री छैक ।
उत्तर भारत मे, जेतय कहियो अथर्ववेद प्रचलित छल, बहुत कम लोक अथर्ववेदक शाखा सभक विद्वान छथि । दक्षिण भारत मे शुद्ध अथर्ववेदी ग्रंथे नहि अछि । अतः वर्तमान मे एहि वेद केर शाखा सभक पाठ केर स्थिति वास्तव मे दयनीय अछि । उड़ीसा मे ब्राह्मण लोकनिक अठारह प्रजाति अछि । ताहि मे सँ एकटा केँ “अथर्वणिका” कहल जाइत छन्हि, जेकर अर्थ होइछ अथर्ववेद सँ सम्बन्धित । आइयो गुजरात, सौराष्ट्र आ नेपाल मे अथर्ववेदी ग्रंथ कमहि संख्या मे सही, पाओल जाइत अछि ।
यद्यपि चारू वेद किछु रीति या उपदेश सभक पाठ केर विधि आदि मे भिन्न (अलग) प्रतीत भ’ सकैत अछि, तैयो ओहि सबटाक एक्के टा लक्ष्य छैक, अर्थात् ब्रह्मांड केर कल्याण सुनिश्चित करब आर सब केँ आध्यात्मिक प्रगति दिश अग्रसर करब ।
वेद केर एकटा विशिष्ट विशेषता ई अछि जे कोनो वेद ई नहि कहैत अछि, “यैह एकमात्र मार्ग अछि”, “यैह एकमात्र ईश्वर छथि” । सब वेद कहैत अछि जे श्रद्धा आ निष्ठाक संग अनुसरण कयल गेल कोनो नीक मार्ग आ कोनो देवताक कोनो तरहक पूजा कयल जाय, ओ व्यक्ति (लोक) केँ सच्चा लक्ष्य धरि पहुँचा देत । एकर अलावे, एहि दुनिया मे कोनो धर्मग्रंथ एहेन नहि अछि जे विविध मार्ग सभक अनुसरण केर समर्थन करैत होए । हरेक धर्म कहैत अछि जे ओकरहि सिद्धांत टा स्वर्ग दिश लय जायत । अकेले वेद मे टा एतेक व्यापक दृष्टि छैक जे ओ कहैत अछि एक्कहि सत्य केर विविध मार्ग सभक अनुसरण कयनिहार अनेकों तरीका सँ प्राप्त कय सकैत छथि । यैह वेदक महानता थिक ।
ब्राह्मण आ आरण्यक
एखन धरि, जाबत हम सब वेदक बारे मे बात कय रहल छलहुँ, त हम सब ज्यादातर वेदक संहिता भाग केर जिकिर टा करैत आबि रहल छी । कोनो वेदक मुख्य पाठ ओकर संहिता भाग होइत छैक । एकर अलावे, प्रत्येक वेदक एकटा भाग ब्राह्मण आर दोसर आरण्यक होइत छैक । ब्राह्मण नामक भाग, वैदिक कर्म (करबा योग्य अनुष्ठान) सभक सूची दैत अछि आर बतबैत अछि जे ओ सब केना कयल जेबाक चाही । जखन वेद संहिता मे निहित मंत्र सब केँ यज्ञ नामक क्रिया मे परिवर्तित कयल जाइत अछि, तखन ब्राह्मण भाग एकटा मार्गदर्शक या उपयोगी पुस्तिकाक काज करैत अछि जे ई बुझबैत अछि जे प्रत्येक शब्द केँ केना बुझल जेबाक चाही, या प्रत्येक शब्दक कि अर्थ हेबाक चाही, दोसर शब्द मे मंत्रक उचित उपयोग बुझबैत अछि ।
‘आरण्यक’ शब्द ‘अरण्य’ सँ बनल अछि जेकर अर्थ होइत छैक “वन” । हालाँकि, नहि त संहिता आ नहिये ब्राह्मण एहि बातक वकालत करैत अछि जे लोक केँ शहर या गाम छोड़िकय जंगल मे एकान्तवास करबाक चाही । यज्ञ आर अन्य अनुष्ठान केवल ओहि लोक सब लेल निर्धारित अछि जे गृहस्थ जीवन जिबैत छथि । लेकिन ई बुझय पड़त जे वैदिक अनुष्ठान सभक उद्देश्य नहि केवल भौतिक लाभ प्रदान करब छैक, बल्कि निरन्तर अनुशासन द्वारा मानसिक शुद्धता सेहो प्रदान करब छैक । मानसिक शुद्धता (चित्त शुद्धि) प्राप्त कयलाक बाद, लोक केँ आगूक एकाग्रता आर ध्यानक लेल वनक एकान्त मे जेबाक चाही । वेदक उच्चारण, यज्ञ आर अनुशासनक नियम, ई सब आत्माक वास्तविक स्वरूप और वास्तविकताक वास्तविक स्वरूप पर अन्तिम ध्यान केर वास्ते प्रारम्भिक चरण थिक ।
वेदक आरण्यक भाग – आन्तरिक अर्थ, संहिता सब मे मंत्रक रूप मे तथा ब्राह्मण मे कर्मक रूप मे निहित सिद्धान्त या दर्शन केर व्याख्या करबाक लेल अछि । आरण्यक हमरा सब केँ वेद मे निहित अस्पष्ट आर दूरदर्शी कल्पनाक बारे मे ज्ञान दैत अछि । आरण्यक केर मुताबिक, केवल ओकर वास्तविक प्रदर्शन टाक नहि, बल्कि इहो बुझनाय महत्वपूर्ण अछि जे यज्ञ कियैक कयल जेबाक चाही । आधुनिक शोध सभक मानब छैक जे आरण्यक ओहि ऋषि सभक ध्यान केर परिणाम थिक जे सब वनक एकान्त केर खोज कयने रहथि । बृहदारण्यक उपनिषद, जे आरण्यक तथा उपनिषदक मिश्रण छी, विश्लेषणात्मक दर्शन केर एहने एकटा अंश पर अश्वमेध यज्ञक व्याख्या सँ आरम्भ होइत अछि ।
हरिः हरः!!
The Four Vedas
“Ananthavai Vedaah” – “Endless are the vedas”, but the Rishis have been able to capture for us only some mantras out of the vast limitless Vedas. These are sufficient for our happiness here and salvation hereinafter as well as for universal welfare. Although we refer to the Vedas as four in number, there are different versions and differing methods of recitation of these four. These are called paathaantharam – or way of recitation.
Each school of recitation is called a “saakha”, meaning branch. Each of these is a branch of the Vedic tree. The Veda stands in majesty like a banyan tree with innumerable main and subsidiary branches. Even though it has innumerable branches, they have been classified and grouped as belonging to the main branches viz., the Rig, Yajus, Saama and Atharva which are called Rig Veda, Yajur Veda, etc., because of their importance as a group.
Although modern research assigns to Rig Veda a date earlier than Yajur Veda, according to our Saastras, and our beliefs, they are all without beginning in time. No credence can be placed on the findings of researchers that this (Veda) came first or that came later when we find that, at the beginning of creation, all the four Vedas were available in the universe.
Similarly “researchers” err in deciding the sequence in which the portions of Vedas such as Samhita, Braahmana, and Aranyaka are to be placed. Calculations on the time factor in regard to the origin or sequence of the Vedas would become inappropriate, if it is seen that the Vedas were discovered and presented to us by the Rishis when they reached a stage which transcended time and from which they could see the past, present and future. The extent of the discovery of the Veda mantras may have varied depending upon the period of transcendental state.
Rig Veda itself contains references to Yajus and Saama Veda in many places. Purusha Sookta, which appears in the tenth mandala, ninetieth hymn of Rig Veda, refers to the other Vedas as well. Does this not show that there can be no question of some Vedas being “earlier or later”?
In each Saakha, there are three portions called Samhita, Braahmana and Aranyaka. This again is a classification. Generally when we speak of Veda adhyayana, we mean the recitation of the Samhita portion. This is because the Samhitas are the foundation or life breath, as it were, of a saakha.
Samhita means that which has been collected and arranged. It brings out the purport of a Veda in the shape of mantras systematically arranged.
Rig Veda
The whole of the Rig Veda Samhita is in the form of verses. What in the later age came to be called slokas (stanzas) was earlier known as ‘Rik’, or a hymn in praise.
The whole of the Rig Veda Samhita is only in Rig or hymn form extolling different Devatas. Each Rik is a mantra. A number of Riks constitute a “Sookta”.
Rig Veda – that is the Samhita portion of it – contains more than ten thousand Riks (10,170 to be precise). The Samhitas of all the four contain 20,500 mantras. Rig Veda, which contains 1028 Sooktas or collection of hymns has been divided into two containing 10 mandalas and eight ashtakas. It begins with a sookta on Agni and also ends with it. Amongst the Vedas, the Rig Veda is wholly in the form of hymns in praise of Devatas. Since in the beginning (Upakrama) and end (Upasamhaara) it talks of Agni, some think that the purport of the Veda is fire-worship. It would be more correct if Agni is taken to mean the light of the soul’s consciousness (Aatma Chaitanyam) – the glow of the soul’s awakening.
Although the last Sookta of the Rig Veda pertains to Agni, it contains verses of universal appeal : “Let all men meet and think as with one mind. Let all hearts unite in love. Let the goal be common. May all live in happiness with a common purpose.” so ends the Rig Veda.
The pride of Rig Veda is that it contains hymns in praise of all Devatas. Wise men honour it, for it describes the ways of social living better than others. For example, the marriage rites have been created on the pattern of the marriage of Soorya’s daughter, which it details. Dramatic situations like the dialogue between Pruooravas and Urvasi also find a place in Rig Veda. In later years poets like Kalidasa have expatiated on these.
Discerning men (cognoscente) extol the portions in Rig Veda like those dealing with Ushas, the goddess of dawn, as masterpieces of poetic composition. There must be some reason indeed why Rig Veda has been assigned the first place amongst Vedas. The action which Yajur Veda predicates and the musical recitation which Saama Veda dictates emerge from the basic Riks in Rig Veda.
Yajur Veda
The word “yajus” is derived from the root “yaj”, which means worship. The word yajna (sacrificial worship) is also derived from it.
Just as the word ‘Rig’ itself means a hymn in praise, so also the word ‘Yajus’ connotes spelling out the ritualistic procedure of the yajna. True to its name, the chief purpose of Yajur Veda is to give the mantras in hymn form from the Rig Veda. In addition, it describes in prose the procedural details for the performance of different yajnas. Rig Veda helps in chanting the praise by hymn. Yajur Veda helps in the actual performance of yajnas using these hymns and mantras.
In addition to having many branches (saakhas), as in the other Vedas, Yajur Veda has two main branches with numerous recensions in each branch.
The main branches are called Sukla Yajur Veda and Krishna Yajur Veda. Sukla means white and Krishna black. The Sukla Yajur Veda Samhita is also known as Vaajasaneyi Samhita. Vaajasani is the Sun. As Rishi Yaajnavalkya is believed to have brought this Samhita to the knowledge of the world after learning it from the Sun God, it is called Vaajasaneyi Samhita.
There is an interesting story as to how Yaajnavalkya learnt the Vaajasaneyi Samhita from the sun. When the Vedas were classified by Veda Vyasa into four, Yajur Veda had only one version or branch. This was entrusted by Sage Vyasa to Sage Vaisampaayana for preservation and propagation through disciples. Yaajnavalkya learnt this from Vaisampaayana. Due to a misunderstanding between them, viz., Vaisampaayana and Yaajnavalkya, the teacher asked the pupil to return what he had taught him. Yaajnavalkya saw the justice of this demand and complied accordingly. He then prayed to the God Soorya (Sun) to accept him as a pupil. Soorya taught him the Yajur Veda in a different version.
Thus, it gained the name of Vaajasaneyi or Sukla Yajur Veda. Since this was called Sukla (or white), the earlier one taught by Vaisampaayana came to be called the Krishna Yajur Veda.
Krishna Yajur Veda is not wholly divided into Samhita and Braahmana portions. The Braahmana portions are at times conjoined with the Samhita mantras in their respective places.
The glory of Yajur Veda lies in its good presentations of Vedic Karma or rituals. Yajnas like Darsa Poornamasa, Somayaga, Vaajapeya, Rajasooya, Asvamedha and many other are made known to us in all their procedural detail by the Taittareeya Samhita in Krishna Yajur Veda. In addition, some mantras which are hymns of praise and which are not contained in Rig Veda are also found in the Yajur Veda. For example, the Sri Rudram, now in vogue, is from the Yajur Veda. Although five Sooktas called “Pancha Rudram”, find a place in Rig Veda, today Sri Rudram refers only to that which is contained in Yajur Veda. That is why the great Siva Bhakta, Appayya Dikshita, is stated once to have felt sorry that he was not born in Yajur Veda as he could adequately worship Siva only through Yajur Veda. He was born in a family which traditionally followed the Sama Veda. Today, a vast majority follow the Yajur Veda. While Sukla Yajur Veda is the prevalent school in Northern India, the Krishna Yajur Veda is the prevalent school in South India. The Purusha Sooka, which appears in the Rig Veda, also appears with certain changes in Yajur Veda. But if Purusha Sookta is mentioned by name, as such, it generally refers to the version which appears in Yajur Veda.
Yajur Veda is of special significance to Advaitins – those who understand and believe in the “non-dualism” school of philosophy. Any philosophical doctrine (Siddhaanta), according to the learned, should contain a Sootra or aphorism, Bhaashya or commentary and Vaartika or an explanatory note. Sootra is enunciate the doctrine in a condensed or pithy form. Bhaashya is a detailed commentary thereon. Vaartika is a further elaborate elucidation of the Bhaashya. In Advaita Siddhaanta, the word Vaartikakaara (one who has written the Vaartika) refers only to one person, viz., Sureswaracharya, a disciple of Adi Sankaracharya. To which Bhaashya did he write a Vaartika? If the Upanishads are regarded as Sootras, Adi Sankaracharya wrote Bhaashya thereon. He also wrote a Bhaashya on Brahmasutra, composed by Sage Baadaraayana or Veda Vyasa.
The direct disciple of the Acharya, Sureswaracharya, wrote the Vaartika thereon, i.e., on the Upanishad Bhaashya. In doing so, he did not take up all the ten major Upanishads (for commentary); he took up only two. These are the Taittareeya Upanishad and the Brahadaaranyaka Upanishad, pertaining to the Krishna Yajur Veda and the Sukla Yajur Veda respectively. Both the Upanishads are of the Yajur Veda. Thus, Yajur Veda is of great importance to the followers of Advaita philosophy.
Saama Veda
“Saama” means to bring “Shanti” or peace to the minds. In other words, to make mind find happiness in peace. Of the four methods of tackling an enemy, viz., saama, daana, bheda and danda, the first is saama or conquering the enemy by love and conciliatory words. Many of the Riks or mantras in Rig Veda are set to music in melodious hymns in Saama Veda.
Although basically they are mantras from Rig Veda, they are set to music which is greatly conductive to the spiritual evolution of the self and the grace of the Gods. This is the special virtue of Saama Veda and so, in the Bhagavad Gita, Lord Krishna Bhagavan declares: “Amongst Vedas, I am Saama Veda.” In Lalita Sahasranaama, which gives a thousand extolling attributes of Goddess Lalita, the Divine Mother, one of the epithets mentioned is “Saamagaanapriya” – meaning one who is pleased by the recital of Saama Veda.
Atharva Veda
Atharva means a purohit. There was a Rishi by that name. The mantras in the Atharva Veda were brought to light by this Rishi, called Atharvan. This Veda contains many types of mantras designed to ward off evil and hardship and to destroy enemies. The Atharva mantras are in prose as well as in verse. In Atharva Veda are found mantras which pertain to Devatas not mentioned in the other Vedas.
Atharva Veda also contains many hymns dealing with creation. The hymn which extols the wonder of creation called the “Prithvi Sooktam” appears in this Veda.
The pride of this Veda is that Brahma who supervises the conduct of yajnas is representative of Atharva Veda. Amongst the ten major Upanishads, the three viz., Prasna, Mundaka and Maandukya are part of this Veda.
There is a saying that, for a Mumukshu or seeker after truth, Maandukya Upanishad alone can ensure Moksha or liberation. The importance of Atharva Veda can be judged from this.
Gaayatri, which is regarded as the greatest of all mantras, is said to be the essence of the three Vedas, viz., Rig, Yajur and Saama. Obviously, Atharva Veda has a separate mantra. Therefore, before undertaking the study of Atharva Veda, it is said that a separate Upanayanam or sacred thread ceremony has to be performed and Brahmopadesa obtained before a study of Atharva Veda.
The Gaayatri to which boys are initiated during Upanayana is called Tripaada Gaayatri, i.e. three legged. It is so called since it has three limbs. Each Paada or limb, is the essence of one Veda. Atharva Veda, however, has a Gaayatri of its own. Hence the necessity to get initiated into Atharva Gaayatri and then learn Atharva Veda. On the other hand, a person belonging to one of the other three Vedas and who wishes to learn the other two among the three need not get a second Upanayana performed for himself. That is because there is a common Gaayatri for all the three Vedas, Righ, Yajus and Saama.
There are very few persons who are learned in the saakhaa of Atharva Veda in Northern India where it was once prevalent. In South India, there are no pure Atharva Vedins at all. Thus, the position of the recitation of the Saakhaas of this Veda at present is indeed pitiable. There are eighteen subjects amongst Brahmins in Orissa. One of them is called “Atharvanika”, which means those belonging to Atharva Veda. Even today Atharva Vedins can be found although in small numbers in Gujarat, Saurashtra and Nepal.
Although the four Vedas may appear different, in certain observances or precepts, in the mode of recitation, etc., all of them have a common goal, viz., to ensure the well-being of the universe and to help every one towards spiritual progress.
A distinguishing feature of the Vedas, is that no Veda says, “this is the only way”, “this is the only God.” All of them say that any good path followed with faith and loyalty and any Devata worshipped in whatever way, will lead one to the true goal. Further, there is no other book of religion in this world which advocates the pursuit of diverse paths. Every religion says that its doctrine alone will lead to heaven. The Vedas alone have such a breadth of vision as to say that the same truth can be realised in many ways by those pursuing diverse routes. This is the greatness of the Vedas.
Braahmana And Aaranyaka
So far, we have been referring mostly to the Samhita portion of the Veda, when were talking about the Vedas. The main text of a Veda is its Samhita portion. In addition, each Veda has a part called Braahmana and another called Aaranyaka. The portion called Braahmana, lists what the Vedic Karmas are (rituals to be performed) and explains how they should be performed. When the mantras contained in a Veda Samhita are converted into action, called Yajna, the Braahmanas serve the purpose of a guidebook or handy manual explaining how each word should be understood, or what construction should be placed on each word used, in other words the proper use of the mantra.
‘Aaranyaka’ is derived from the word ‘Aranya’ meaning “forest”. However, neither the Samhita nor the Braahmana advocates that a person should leave the town or village and seek the solitude of the forest. Yajna and other rituals are prescribed only for those who live in homes and lead the life of house-holders. But it has to be understood that Vedic rituals are intended to confer not only material benefits but also mental purity by constant discipline. Having obtained mental purity (Chiththa Shuddhi), one must see the solitude of forests for further concentration and meditation. Chanting of Vedas, performance of yajnas and rules of discipline are all meant as preliminaries for the ultimate meditation on the true nature of the self and true nature of reality.
The Aaranyaka portions of the Vedas are meant to explain the inner meaning, the doctrine or philosophy contained in the Samhitas as mantras and in the Braahmanas as Karmas. Aaranyakas enlighten us about the obscure and distant imagery which the Vedas contain. According to Aaranyakas, it is important to understand the reason why yajnas are required to be done and not merely their actual performance. Modern research is of the view that Aaranyakas are the result of the meditation of sages who sought the solitude or the forests. The Brhihadaaranyaka Upanishad, which is a combination of Aaranyaka and Upanishad, begins with an explanation of the Awamedha Yajna on such a note of analytical philosophy.
चार वेद
“अनन्तावै वेदाः” – “वेद अनंत हैं”, लेकिन ऋषिगण हमारे लिए इस असीम वेद में से केवल कुछ ही मंत्रों का संकलन (खोज) कर पाए हैं । ये मंत्र हमारे इस लोक में सुख और परलोक में मोक्ष के साथ-साथ सर्वजन कल्याण के लिए पर्याप्त हैं । यद्यपि हम वेदों को चार मानते हैं, फिर भी इन चारों के पाठ के विभिन्न संस्करण और भिन्न विधियाँ हैं । इन्हें पाठान्तरं – या पाठ करने का तरीका कहा जाता है ।
पाठ के प्रत्येक संप्रदाय को “शाखा” कहा जाता है । इनमें से प्रत्येक ‘वैदिक वृक्ष’ की एक शाखा है । वेद असंख्य मुख्य और सहायक शाखाओं वाले बरगद के वृक्ष की तरह महिमावान है । यद्यपि इसकी असंख्य शाखाएँ हैं, फिर भी इन्हें मुख्य शाखाओं, अर्थात् ऋग, यजु, साम और अथर्व, के अंतर्गत वर्गीकृत और समूहीकृत किया गया है, जिन्हें एक समूह के रूप में उनके महत्व के कारण ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि कहा जाता है ।
यद्यपि आधुनिक शोध ऋग्वेद को यजुर्वेद से भी पुराना मानते हैं, फिर भी हमारे शास्त्रों और हमारी मान्यताओं के अनुसार, इन सभी का समय के हिसाब से कोई आरंभ नहीं है । शोधकर्ताओं के इस निष्कर्ष पर कोई विश्वास नहीं किया जा सकता कि यह (वेद) पहले आया या वह बाद में आया, जबकि हम पाते हैं कि सृष्टि के आरंभ में, ब्रह्मांड में चारों वेद उपलब्ध थे ।
इसी प्रकार, “शोधकर्ता” संहिता, ब्राह्मण और आरण्यक जैसे वेदों के अंशों को किस क्रम में रखा जाए, यह तय करने में गलती करते हैं । वेदों की उत्पत्ति या क्रम के संबंध में समय के कारक की गणना अनुचित होगी, यदि यह देखा जाए कि वेदों की खोज और प्रस्तुति ऋषियों द्वारा उस समय की गई थी जब वे समय से परे एक ऐसी अवस्था में पहुँच गए थे जहाँ से वे भूत, वर्तमान और भविष्य को देख सकते थे । वेद मंत्रों की खोज का विस्तार पारलौकिक अवस्था की अवधि के आधार पर भिन्न हो सकता है ।
ऋग्वेद में ही कई स्थानों पर यजुर्वेद और सामवेद का उल्लेख मिलता है । ऋग्वेद के दसवें मंडल, नब्बेवें सूक्त में वर्णित पुरुष सूक्त, अन्य वेदों का भी उल्लेख करता है । क्या इससे यह नहीं पता चलता कि कुछ वेदों के “पहले या बाद के” होने का प्रश्न ही नहीं उठता ?
प्रत्येक शाखा में तीन भाग होते हैं जिन्हें संहिता, ब्राह्मण और आरण्यक कहा जाता है । यह भी एक वर्गीकरण है । सामान्यतः जब हम वेद अध्ययन की बात करते हैं, तो हमारा तात्पर्य संहिता भाग के पाठ से होता है । ऐसा इसलिए है क्योंकि संहिताएँ, मानो शाखा का आधार या प्राणवायु हों ।
संहिता का अर्थ है वह जो एकत्रित और व्यवस्थित किया गया हो । वेद के तात्पर्य को मंत्रों के समुचित आकार को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करता है ।
ऋग्वेद
सम्पूर्ण ऋग्वेद संहिता छंदों के रूप में है । जिसे बाद के युग में श्लोक (छंद) कहा जाने लगा, उसे पहले ‘ऋक्’ या स्तुति स्तोत्र कहा जाता था ।
संपूर्ण ऋग्वेद संहिता केवल ऋग् या स्तोत्र रूप में है जिसमें विभिन्न देवताओं की स्तुति की गई है । प्रत्येक ऋक् एक मंत्र है । अनेक ऋक् मिलकर एक “सूक्त” बनाते हैं ।
ऋग्वेद – जो इसका संहिता भाग है – में दस हज़ार से अधिक ऋक् (सटीक रूप से १०,१७०) हैं। चारों ऋक् संहिताओं में २०,५०० मंत्र हैं । ऋग्वेद, जिसमें १०२८ सूक्त या स्तोत्रों का संग्रह है, को दो भागों में विभाजित किया गया है जिनमें १० मंडल और आठ अष्टक हैं । यह अग्नि पर एक सूक्त से आरंभ होता है और अग्नि पर ही समाप्त भी होता है । वेदों में, ऋग्वेद पूर्णतः देवताओं की स्तुति में स्तोत्रों के रूप में है । चूँकि इसके आरंभ (उपक्रम) और अंत (उपसंहार) में अग्नि का उल्लेख है, इसलिए कुछ लोग मानते हैं कि वेद का तात्पर्य अग्नि-पूजा है । अग्नि को आत्मा की चेतना (आत्म चैतन्यम्) का प्रकाश – आत्मा के जागरण की आभा – ऐसा माना जाए तो अधिक उचित होगा ।
यद्यपि ऋग्वेद का अंतिम सूक्त अग्नि से संबंधित है, फिर भी इसमें सार्वभौमिक अपील वाले श्लोक हैं: “सभी लोग मिलें और एक मन से विचार करें । सभी हृदय प्रेमपूर्वक एक हो जाएँ । सभी का लक्ष्य एक हो । सभी एक ही उद्देश्य के साथ सुखपूर्वक रहें ।” ऋग्वेद का समापन इसी के साथ होता है ।
ऋग्वेद का गौरव यह है कि इसमें सभी देवताओं की स्तुति में स्तुतिगान हैं । बुद्धिमान लोग इसका सम्मान करते हैं, क्योंकि यह सामाजिक जीवन के तौर-तरीकों का अन्य ग्रन्थों की तुलना में बेहतर वर्णन करता है । उदाहरण के लिए, विवाह संस्कार सूर्यपुत्री के विवाह की तर्ज पर रचे गए हैं, जिसका इसमें विस्तृत विवरण दिया गया है । पुरुरवा और उर्वशी के बीच संवाद जैसी नाटकीय परिस्थितियाँ भी ऋग्वेद में स्थान पाती हैं । बाद के वर्षों में कालिदास जैसे कवियों ने इन पर विस्तार से प्रकाश डाला है ।
ऋग्वेद के उन अंशों की, जिनमें भोर की देवी उषा का वर्णन है, विवेकशील लोग काव्य रचना की उत्कृष्ट कृतियों के रूप में प्रशंसा करते हैं । ऋग्वेद को वेदों में प्रथम स्थान क्यों दिया गया है, इसका कोई न कोई कारण अवश्य होगा । यजुर्वेद जिस कर्म का उपदेश देता है और सामवेद जिस संगीतमय पाठ का निर्देश देता है, वे ऋग्वेद की मूल ऋचाओं से ही उत्पन्न होते हैं ।
यजुर्वेद
“यजुस्” शब्द “यज्” धातु से बना है, जिसका अर्थ है पूजा । यज्ञ (बलिदान) शब्द भी इसी से बना है ।
जिस प्रकार ‘ऋग्’ शब्द का अर्थ स्तुति स्तोत्र होता है, उसी प्रकार ‘यजुस्’ शब्द भी यज्ञ की कर्मकाण्डीय प्रक्रिया का बोध कराता है । अपने नाम के अनुरूप, यजुर्वेद का मुख्य उद्देश्य ऋग्वेद से मंत्रों के स्तोत्र रूप को व्यवहारिक बनाने के लिये यज्ञ या पूजा का आकार देना है । यजुर्वेद ऋग्वेद के स्तोत्र रूपी मंत्रों का ही सन्दर्भ प्रस्तुत करता है । इसके अतिरिक्त, यह विभिन्न यज्ञों के अनुष्ठान की प्रक्रिया का गद्य रूप में वर्णन करता है । ऋग्वेद स्तोत्र द्वारा स्तुति का जाप करने में सहायता करता है । यजुर्वेद इन स्तोत्रों और मंत्रों का उपयोग करके यज्ञों के वास्तविक अनुष्ठान में सहायता करता है ।
अन्य वेदों की तरह, अनेक शाखाओं के अतिरिक्त, यजुर्वेद की भी दो मुख्य शाखाएँ हैं, जिनमें से प्रत्येक का अनेक पाठ संशोधन (समीक्षा, पुनरालोचना) हैं ।
मुख्य शाखाओं को शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद कहा जाता है । शुक्ल का अर्थ श्वेत और कृष्ण का काला होता है । शुक्ल यजुर्वेद संहिता को वाजसनेयी संहिता के नाम से भी जाना जाता है । वाजसनि सूर्य है । ऐसा माना जाता है कि ऋषि याज्ञवल्क्य ने सूर्य देव से सीखकर इस संहिता को संसार के ज्ञान में लाया था, इसलिए इसे वाजसनेयी संहिता कहा जाता है ।
याज्ञवल्क्य ने सूर्य से वाजसनेयी संहिता कैसे सीखी, इसके बारे में एक रोचक कथा है । जब वेदों को वेद व्यास ने चार भागों में विभाजित किया, तब यजुर्वेद का केवल एक ही संस्करण या शाखा थी । ऋषि व्यास ने इसे शिष्यों के माध्यम से संरक्षण और प्रचार-प्रसार हेतु ऋषि वैशम्पायन को सौंप दिया । याज्ञवल्क्य ने इसे वैशम्पायन से सीखा था । वैशम्पायन और याज्ञवल्क्य के बीच हुई गलतफहमी के कारण, गुरु ने शिष्य से वह सब कुछ वापस करने को कहा जो उन्होंने उसे सिखाया था । याज्ञवल्क्य ने इस मांग को उचित समझा और उसके अनुसार पालन किया । फिर उन्होंने भगवान सूर्य से प्रार्थना की कि वे उन्हें शिष्य के रूप में स्वीकार करें । सूर्य ने उन्हें यजुर्वेद का एक अलग संस्करण पढ़ाया ।
इस प्रकार, इसे वाजसनेयी या शुक्ल यजुर्वेद नाम मिला । चूँकि इसे शुक्ल (या श्वेत) कहा जाता था, इसलिए वैशम्पायन द्वारा पढ़ाए गए पहले वाले यजुर्वेद को कृष्ण यजुर्वेद कहा जाने लगा ।
कृष्ण यजुर्वेद पूरी तरह से संहिता और ब्राह्मण भागों में विभाजित नहीं है । ब्राह्मण भागों को कभी-कभी संहिता मंत्रों के साथ उनके संबंधित स्थानों पर जोड़ दिया जाता है ।
यजुर्वेद की महिमा वैदिक कर्म या अनुष्ठानों की इसकी उत्कृष्ट प्रस्तुति में निहित है । कृष्ण यजुर्वेद में तैत्तरीय संहिता द्वारा दर्शपूर्णमास, सोमयाग, वाजपेय, राजसूय, अश्वमेध और कई अन्य यज्ञों का विस्तृत विवरण हमें मिलता है । इसके अतिरिक्त, कुछ मंत्र जो स्तुति स्तोत्र हैं और जो ऋग्वेद में नहीं हैं, वे भी यजुर्वेद में पाए जाते हैं । उदाहरण के लिए, श्री रुद्रम्, जो वर्तमान में प्रचलित है, यजुर्वेद से है । यद्यपि “पंच रुद्रम्” नामक पाँच सूक्त ऋग्वेद में स्थान पाते हैं, आज श्री रुद्रम् केवल यजुर्वेद में निहित बातों को ही संदर्भित करता है । इसीलिए महान शिवभक्त, अप्पय्या दिक्षित, के बारे में कहा जाता है कि उन्हें एक बार इस बात का दुःख हुआ था कि उनका जन्म यजुर्वेद में नहीं हुआ क्योंकि वे केवल यजुर्वेद के माध्यम से ही शिव की उचित पूजा कर सकते थे । उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जो पारंपरिक रूप से सामवेद का पालन करता था । आज, अधिकांश लोग यजुर्वेद का पालन करते हैं । जहाँ शुक्ल यजुर्वेद उत्तर भारत में प्रचलित सम्प्रदाय है, वहीं कृष्ण यजुर्वेद दक्षिण भारत में प्रचलित सम्प्रदाय है । ऋग्वेद में वर्णित पुरुष सूक्त, यजुर्वेद में भी कुछ परिवर्तनों के साथ आता है । परन्तु यदि पुरुष सूक्त का उल्लेख नाम से किया जाता है, तो वह सामान्यतः यजुर्वेद में वर्णित संस्करण को संदर्भित करता है ।
यजुर्वेद अद्वैतवादियों के लिए विशेष महत्व रखता है – वे जो दर्शन के “अद्वैतवाद” सम्प्रदाय को समझते और उसमें विश्वास करते हैं । विद्वानों के अनुसार किसी भी दार्शनिक सिद्धांत में एक सूत्र (एफोरिज्म), भाष्य (कमेन्ट्री) और वार्तिक या व्याख्यात्मक टिप्पणी (एक्सप्लानेटरी नोट) अवश्य शामिल होना चाहिये । सूत्र सिद्धांत को संक्षिप्त या सारगर्भित रूप में प्रस्तुत करता है । भाष्य उस पर विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है । वार्तिक भाष्य की एक और विस्तृत व्याख्या है । अद्वैत सिद्धांत में, वर्तिककार (जिसने वर्तिका लिखा है) शब्द केवल एक व्यक्ति को संदर्भित करता है, अर्थात् सुरेश्वराचार्य, जो आदि शंकराचार्य के शिष्य थे । उन्होंने किस भाष्य पर वार्तिक लिखा ? यदि उपनिषदों को सूत्र माना जाता है, तो आदि शंकराचार्य ने उस पर भाष्य लिखा । उन्होंने ब्रह्मसूत्र पर ऋषि बादरायण या वेद व्यास द्वारा रचित एक भाष्य भी लिखा ।
आचार्य के प्रत्यक्ष शिष्य, सुरेश्वराचार्य ने उस पर वार्तिक लिखा, यानी उपनिषद भाष्य पर । ऐसा करते हुए, उन्होंने सभी दस प्रमुख उपनिषदों (भाष्य के लिए) को नहीं लिया; उन्होंने केवल दो को ही लिया । ये तैत्तरीय उपनिषद और ब्रहदारण्यक उपनिषद हैं, जो क्रमशः कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद से संबंधित हैं । दोनों उपनिषद यजुर्वेद के हैं । इस प्रकार, अद्वैत दर्शन के अनुयायियों के लिए यजुर्वेद का अत्यधिक महत्व है ।
सामवेद
“साम” का अर्थ है मन में शांति लाना । दूसरे शब्दों में, मन को शांति में सुख प्राप्त करने योग्य बनाना । शत्रु से निपटने के चार तरीकों, अर्थात् साम, दान, भेद और दंड, में से पहला है साम, अर्थात प्रेम और मधुर शब्दों से शत्रु पर विजय प्राप्त करना । ऋग्वेद के कई ऋचाओं या मंत्रों को सामवेद के मधुर स्तोत्रों में संगीतबद्ध किया गया है ।
यद्यपि मूलतः ये ऋग्वेद के मंत्र हैं, फिर भी इन्हें संगीतबद्ध किया गया है जो आत्मा के आध्यात्मिक विकास और देवताओं की कृपा के लिए अत्यंत अनुकूल है । यह सामवेद का विशेष गुण है और इसीलिए, भगवद्गीता में, भगवान कृष्ण कहते हैं: “वेदों में, मैं सामवेद हूँ ।” ललिता सहस्रनाम में, जिसमें देवी ललिता, दिव्य माँ, के हज़ार गुणगान हैं, एक विशेषण “सामगानप्रिया” का उल्लेख है – जिसका अर्थ है सामवेद के पाठ से प्रसन्न होने वाली देवी ।
अथर्ववेद
अथर्व का अर्थ है पुरोहित । इस नाम के एक ऋषि थे । अथर्ववेद के मंत्रों को अथर्वण नामक इसी ऋषि ने प्रकाश में लाया था । इस वेद में कई प्रकार के मंत्र हैं जो बुराई और कष्टों को दूर करने और शत्रुओं का नाश करने के लिए बनाए गए हैं । अथर्व मंत्र गद्य के साथ-साथ पद्य में भी हैं । अथर्ववेद में ऐसे मंत्र मिलते हैं जो उन देवताओं से संबंधित हैं जिनका उल्लेख अन्य वेदों में नहीं है ।
अथर्ववेद में सृष्टि से संबंधित कई सूक्त भी हैं । सृष्टि के आश्चर्य का बखान करने वाला सूक्त “पृथ्वी सूक्तम्” इसी वेद में आता है ।
इस वेद का गौरव यह है कि यज्ञों का संचालन करने वाले ब्रह्मा अथर्ववेद के प्रतिनिधि हैं । दस प्रमुख उपनिषदों में से तीन, प्रश्न, मुण्डक और माण्डूक्य, इसी वेद के अंग हैं ।
एक कहावत है कि मुमुक्षु या सत्य के साधक के लिए केवल माण्डूक्य उपनिषद ही मोक्ष या मुक्ति सुनिश्चित कर सकता है । अथर्ववेद के महत्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है ।
गायत्री, जिसे सभी मंत्रों में सबसे महान माना जाता है, को तीनों वेदों, ऋग्, यजुर् और साम, का सार कहा जाता है । स्पष्टतः, अथर्ववेद का एक अलग मंत्र है । इसलिए, अथर्ववेद का अध्ययन शुरू करने से पहले, एक अलग उपनयन संस्कार या जनेऊ संस्कार करना और अथर्ववेद के अध्ययन से पहले ब्रह्मोपदेश प्राप्त करना आवश्यक माना जाता है ।
उपनयन के दौरान लड़कों को जिस गायत्री से दीक्षित किया जाता है, उसे त्रिपाद गायत्री कहते हैं, अर्थात तीन पैरों वाली । यह इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके तीन अंग होते हैं । प्रत्येक पाद या अंग एक वेद का सार है । हालाँकि, अथर्ववेद की अपनी एक गायत्री है । इसलिए अथर्व गायत्री में दीक्षित होना और फिर अथर्ववेद सीखना आवश्यक है । दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति अन्य तीन वेदों में से किसी एक से संबंधित है और तीनों में से अन्य दो वेदों को सीखना चाहता है, तो उसे अपना दूसरा उपनयन संस्कार कराने की आवश्यकता नहीं है । ऐसा इसलिए है क्योंकि तीनों वेदों, ऋग्, यजु और साम, के लिए एक ही गायत्री है ।
उत्तर भारत में, जहाँ कभी अथर्ववेद प्रचलित था, बहुत कम लोग अथर्ववेद की शाखा के विद्वान हैं । दक्षिण भारत में शुद्ध अथर्ववेदी ग्रंथ ही नहीं हैं । अतः वर्तमान में इस वेद की शाखाओं के पाठ की स्थिति वास्तव में दयनीय है । उड़ीसा में ब्राह्मणों में अठारह प्रजाएँ हैं । उनमें से एक को “अथर्वणिका” कहा जाता है, जिसका अर्थ है अथर्ववेद से संबंधित । आज भी गुजरात, सौराष्ट्र और नेपाल में अथर्ववेदी ग्रंथ कम संख्या में ही सही, पाए जाते हैं ।
यद्यपि चारों वेद कुछ रीतियों या उपदेशों, पाठ की विधि आदि में भिन्न प्रतीत हो सकते हैं, फिर भी उन सभी का एक ही लक्ष्य है, अर्थात् ब्रह्मांड का कल्याण सुनिश्चित करना और सभी को आध्यात्मिक प्रगति की ओर अग्रसर करना ।
वेदों की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि कोई भी वेद यह नहीं कहता कि, “यही एकमात्र मार्ग है”, “यही एकमात्र ईश्वर है ।” सभी वेद कहते हैं कि श्रद्धा और निष्ठा के साथ अनुसरण किया गया कोई भी अच्छा मार्ग और किसी भी देवता की किसी भी प्रकार से पूजा की जाए, वह व्यक्ति को सच्चे लक्ष्य तक पहुँचाएगा । इसके अलावा, इस दुनिया में कोई भी धर्मग्रंथ ऐसा नहीं है जो विविध मार्गों के अनुसरण का समर्थन करता हो । हर धर्म कहता है कि उसका सिद्धांत ही स्वर्ग की ओर ले जाएगा । अकेले वेदों में ही इतनी व्यापक दृष्टि है कि वे कहते हैं कि एक ही सत्य को विविध मार्गों का अनुसरण करने वाले अनेक तरीकों से प्राप्त कर सकते हैं । यही वेदों की महानता है ।
ब्राह्मण और आरण्यक
अब तक, जब हम वेदों के बारे में बात कर रहे थे, तो हम ज़्यादातर वेद के संहिता भाग का ही ज़िक्र करते रहे हैं । किसी भी वेद का मुख्य पाठ उसका संहिता भाग होता है । इसके अलावा, प्रत्येक वेद का एक भाग ब्राह्मण और दूसरा आरण्यक होता है । ब्राह्मण नामक भाग, वैदिक कर्मों (करने योग्य अनुष्ठान) की सूची देता है और बताता है कि उन्हें कैसे किया जाना चाहिए । जब वेद संहिता में निहित मंत्रों को यज्ञ नामक क्रिया में परिवर्तित किया जाता है, तो ब्राह्मण एक मार्गदर्शक या उपयोगी पुस्तिका का काम करते हैं जो यह समझाते हैं कि प्रत्येक शब्द को कैसे समझा जाना चाहिए, या प्रत्येक शब्द का क्या अर्थ होना चाहिए, दूसरे शब्दों में मंत्र का उचित उपयोग ।
‘आरण्यक’ शब्द ‘अरण्य’ से बना है जिसका अर्थ है “वन” । हालाँकि, न तो संहिता और न ही ब्राह्मण इस बात की वकालत करते हैं कि व्यक्ति को शहर या गाँव छोड़कर जंगल में एकांतवास करना चाहिए । यज्ञ और अन्य अनुष्ठान केवल उन लोगों के लिए निर्धारित हैं जो गृहस्थ जीवन जीते हैं । लेकिन यह समझना होगा कि वैदिक अनुष्ठानों का उद्देश्य न केवल भौतिक लाभ प्रदान करना है, बल्कि निरंतर अनुशासन द्वारा मानसिक शुद्धता भी प्रदान करना है । मानसिक शुद्धता (चित्त शुद्धि) प्राप्त करने के बाद, व्यक्ति को आगे की एकाग्रता और ध्यान के लिए वनों के एकांत में जाना चाहिए । वेदों का उच्चारण, यज्ञ और अनुशासन के नियम, ये सभी आत्मा के वास्तविक स्वरूप और वास्तविकता के वास्तविक स्वरूप पर अंतिम ध्यान के लिए प्रारंभिक चरण हैं ।
वेदों के आरण्यक भाग आंतरिक अर्थ, संहिताओं में मंत्रों के रूप में और ब्राह्मणों में कर्म के रूप में निहित सिद्धांत या दर्शन की व्याख्या करने के लिए हैं । आरण्यक हमें वेदों में निहित अस्पष्ट और दूरदर्शी कल्पना के बारे में ज्ञान देते हैं । आरण्यकों के अनुसार, केवल उनके वास्तविक प्रदर्शन को ही नहीं, बल्कि यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि यज्ञ क्यों किए जाने चाहिए । आधुनिक शोधों का मानना है कि आरण्यक उन ऋषियों के ध्यान का परिणाम हैं जिन्होंने वनों की एकान्त का खोज किये थे । बृहदारण्यक उपनिषद, जो आरण्यक और उपनिषद का मिश्रण है, विश्लेषणात्मक दर्शन के ऐसे ही एक अंश पर अश्वमेध यज्ञ की व्याख्या से आरंभ होता है ।

1 Comment
Bahut sundar dhang san Ved ki chhiyai. Ekar mool Swaroop ki chhiyai. Aan dharma ki mool udeshya ki rahait chhai aa ved ki kahait chhai. Jao silsilebaar dhang san adhyanan aa manan kel jay t Jeevan ki chhiyai se okar mool udeshya ki hebak chahi se neek dhang san pta chail sakait chhi.
अनन्तावै वेदाः” – “वेद अनन्त अछि”,