वेदक उपांग “पुराण” – वेदक आवर्धक काँच (मैग्नीफाइंग ग्लास)
पुराण केँ वेदक ‘आवर्धक काँच’ (‘मैग्नीफाइंग ग्लास’) कहल जा सकैत अछि, कियैक तँ ओ छोट तस्वीर सब केँ पैघ बनाकय पैघ तस्वीर बनबैत अछि । वैदिक आदेश (निर्देश) जे सारगर्भित बात सभक रूप मे होइत अछि, तेकरा पुराण सब मे कहानी या खिस्साक रूप मे पैघ या विस्तार सँ बतायल गेल अछि ।
कोनो विचार केर छोट सन व्याख्या मोन पर स्थायी या गहींर असर नहि पाड़ि सकैत अछि । तेँ, एकर कोनो असरो नहि भ’ सकैत अछि । दोसर दिश, यदि एकरा एकटा रुचिगर कथा या खिस्सा रूप मे प्रस्तुत कयल जाय, त ई मोन मे बनल रहत । आउ एकटा उदाहरण लैत छीः वेद मात्र “सत्यं वद” कहैत अछि । सच बाजू । सत्य पर चलला सँ केना अमर महिमा भेटैत अछि, ई राजा हरिश्चंद्रक कहानी केर कतेको अध्याय मे विस्तार सँ बतायल गेल अछि । “धर्मं चर” – धर्म या नेकीक बाट पर चलू । वेद जे दुइ शब्द मे कहलक अछि, से महाभारत मे पांडव लोकनिक कथा सँ पता चलैत अछि । “मातृ देवो भव”, “पितृ देवो भव” – माँ केँ भगवान जेकाँ मानू । पिता केँ भगवान जेकाँ मानू । वेद एना कहैत अछि । वेदक यैह आदेश जखन मैग्नीफाइंग ग्लास सँ देखल जाइछ, तँ रामायण बनि जाइत अछि । वैदिक आदेश जेना संयम, धैर्य, दया, पवित्रता एवं आर-आर धर्म सब केँ पुरुष ओ महिला सब अपन जीवनक जरिये नीक सँ देखौलनि अछि । एकरा पुराण सभक जरिया सँ बतायल गेल अछि । हुनका सभक कथा सब पढ़ला या सुनलाक परिणाम स्वरूप, हमरा लोकनि ओहि धर्म सब मे गहिंराइ सँ जुड़ि जाइत छी जेकर ओ लोकनि नीक सँ पालन कयलनि अछि ।
हुनका सब केँ, बिना कोनो अपवादक, बहुते तरहक मुश्किल आ अनेकों दुःख सब भोगय पड़लनि । एहि नीक पात्र (किरदार) सब केँ ओहेन सामान्य लोक जे स्वभावहि सँ गलत काज करयवला होइत अछि, ओकर तुलना मे कतहु बेसी दुःख सहय पड़लनि । यदा-कदा, हुनका सब केँ बहुते बेसी कष्ट (दुःख) भोगय पड़ैत छन्हि । मुदा, हुनकर कहानी सब केँ पढ़ैत समय, ई कखनहुँ केकरो मोन मे नहि अबैत अछि जे, जखन धर्मक अनुसरण मे कष्टे-कष्ट अछि, तखन धर्महि केँ कियैक नहि त्यागि देल जाय । जे बात हमरा सब केँ सब सँ बेसी प्रभावित करैत अछि, ओ थिक कर्तव्यक भावना जे सर्वोपरि अछि आ बाधा सभक बावजूद धर्मक मार्ग पर ओकर अटूट विश्वास, जे हुनका आ हमरा सब केँ सेहो अपार मानसिक सांत्वना (शान्ति, सन्तोष) प्रदान करैत अछि । हुनका लोकनिक परीक्षण तथा क्लेश सब सँ परिचित भेलापर हमरा लोकनिक हृदय करुणा सँ पिघैल जाइत अछि आर हमरा सभक भीतर एकटा भावना उत्पन्न होइत अछि, मानू जेना हमरा सभक सन्देह दूर भ’ गेल हो आर अशुद्धि सब सेहो साफ भ’ गेल हो । हुनका लोकनिक अन्तिम सफलता आर प्रसिद्धि हमरा सभक मोन मे धर्मक एकटा गहींर छाप छोड़ैत अछि । पौराणिक कथा सब यैह काज करैत अछि ।
पुराण व इतिहास
सामान्य तौर पर कहल जाइछ जे अपना सभक देश मे घटना सभक कोनो लिखित इतिहास नहि अछि । पुराण वास्तव मे इतिहास थिक । लेकिन आजुक विद्वान कोनो चीज केँ ऐतिहासिक नहि मानैत छथि, जाबत धरि ओ ईसाई युग अयलाक बादक नहि हो । ई आधा-अधूरा मोन सँ मानल जाइत अछि जे ऐतिहासिक शोध केर आधार पर पुराण सब मे थोड़-बहुत सच्चाइ अछि, लेकिन ओ सब वैह हिस्सा टा केँ बेसी अहमियत (महत्व) दैत छथि जे हुनका सभक पसिनक सिद्धान्त (पेट थ्योरीज) आर निष्कर्ष (कन्क्लूजन) केँ बल दैत अछि । चमत्कार आर अलौकिक (सुपरनैचुरल) चीज सब केँ एकदमे बकवास (बिल्कुल झूठ आ काल्पनिक) कहिकय खारिज कय देल जाइत अछि । एकटा साधारण आदमीक साधारण ज्ञानेन्द्रिय केर सामान्य (नॉर्मल) अनुभव सँ हंटिकय कोनो भी चीज केँ सच्चाइ केर दायरा सँ बाहर मानिकय खारिज कय देल जाइत अछि । एहि तरहें, जाहि पुराण मे ‘रहस्य’ (मिस्ट्री) भरल रहैत अछि, तेकरा ‘इतिहास’ (हिस्ट्री) नहि मानिकय बदनाम (हास्यास्पद-झूठ आदि) कयल जाइत अछि ।
अगर हम पुराण सब केँ नजरन्दाज कय दी आर एकर बदले अपन धियापुता (सन्तति) सँ इतिहासक रूप मे लिखल गेल चीज सब मात्र पढ़य लेल कही त हम सब ओकरा सभक संग बड पैघ अन्याय करब ।
इतिहास मे पुराण जेहेन कोनो घटना नहि अछि, जे नहि सिर्फ बच्चा सभ मोन केँ पसिन आबय आ कि ओकरा सभक चरित्र केँ नैतिक आधार पर ढालि (निर्माण कय) सकय ।
हम ई नहि कहैत छी जे इतिहास सँ बचबाक चाही (ओकरा नहि पढ़बाक चाही) । पुराण सेहो इतिहास थिक आर ओकरा पढ़बाक चाही कियैक तँ पुराण एकटा नीक उद्देश्य सहितक इतिहास थिक । इतिहास पढ़बाक कतेको कारण सब मे सँ एकटा ई अछि जे ‘इतिहास स्वयं केँ दोहराबैत अछि’ । घटना सब मे बेर-बेर घटबाक आदति होइत छैक । तेँ, अगर हम अतीतक सम्बन्ध मे जानब तँ हम भविष्यक अन्दाज लगा सकब । हम सब अतीत सँ सबक सेहो सीखि सकैत छी ।
इतिहास देखबैत अछि जे कोनो खास स्थिति केँ, अगर बढ़य देल जाय, तँ (परिणाम मे) युद्ध, समाज मे गड़बड़ी या सभ्यताक विनाश केर कारण बनि सकैत अछि । तेँ द्वारे, अगर एखनहुँ एहेन स्थिति अबैत अछि, तँ हम सब पहिने सँ सावधान भ’ सकैत छी आर समस्या (महामारी, विनाश) केँ टालबाक लेल सावधानी बरैत सकैत छी । एकरा इतिहासक फायदा सब मे सँ एक कहल गेल अछि ।
हालांकि पुराण सभक कथ्य (कंटेंट) ऐतिहासिक अछि, लेकिन ओ केवल चुनल घटना सब केँ एहि ढंग सँ प्रस्तुत करैत अछि जाहि सँ लोक केँ सही आ गलत केर बारे मे पता लागय आर ओ सब नेकी (नीकक) बाट पर चलल । असल मे, एकर चयनता (सिलेक्टिविटी) मात्र ओहेन राजा सब धरि सीमित अछि जे धर्मक बाट पर चलबाक कारण सँ बहुते फायदा उठौलनि आर एकर उलटा, ओहेन राजा सब धरि जे अपन खराब काजक कारण सँ एहि जन्म मे खराब परिणाम धरि पहुँचलाह । अथवा (अन्यथा), ई हमरा सब केँ ओहेन पात्र (किरदार) सभक ऐगलो जीवन (जन्म) धरि लय जाइत अछि आ देखबैत अछि जे ओ (पात्र) जे पैछला जन्म सभक कर्मक परिणाम मे केना आनन्द उठौलनि या दुःख भोगलनि । एहेन कोनो पुराण नहि अछि जे कि हमरा सब केँ बादक समय मे (ऐगला जन्म मे) ओकर नीक आ खराब असर (परिणाम) केर बारे मे नहि बताबय । बीतल (विगत) इतिहास केर अध्ययन (स्टडी) सँ भेटयवला लाभ यैह कहल गेल अछिः (i) पैछला अनुभव हमरा सब केँ आजुक हालात (परिस्थिति) सभक सामना करबाक लेल मार्गदर्शन (गाइड) कय सकैत अछि, (ii) नीक लोकक जिन्दगीक अध्ययन जे नीक कर्म कयलनि आ नीक परिणाम धरि पहुँचलाह, हमरा सब लेल एकटा आदर्श (उदाहरण) बनि सकैत छथि, आर (iii) खराब लोकक जिन्दगी, जे बड पैघ स्तर पर दुःख आ तबाही मचौलनि, लेकिन अन्त मे अपना ताहू सँ बेसी दुःख झेललनि जतेक कि ओ पहुँचेने रहथि, हमरा सभक गलती सब केँ रोकबाक काज कय सकैत अछि । मुदा एहि मे सँ कोनो लाभ आजुक ऐतिहासिक किताब सभक अध्ययन सँ नहि भेटैत अछि । मात्र पुराण टा एहेन परिणाम दैत अछि ।
राजा सभक एकक बाद एक लड़ल गेल लड़ाइ सब या हुनका सब द्वारा शुरू कयल गेल सुधार आदिक विस्तार सँ वर्णन करबाक कोनो उद्देश्य नहि अछि, जखन तक कि हुनका सभक कार्यक सही या गलत केँ संकेत (देखबय) केर प्रयास नहि कयल जाय । एहेन इतिहासक कोनो लाभ नहि अछि जाहि मे हमरा सब केँ बेहतर जीवन जिबय केर वास्ते किछुओ सिखेबाक नहि हो । हालाँकि, पुराण सभक उद्देश्य मन केँ लाभ पहुंचेनाय आर मनुष्य एवं समाज केँ बेहतर जीवन जिबय लेल ढालनाय अछि ।
पुराण सूर्य वंश आर चंद्र वंश केर राजा लोकनिक सम्बन्ध मे विस्तार सँ बतबैत अछि । उत्तराधिकारीक रेखा केँ विस्तृत रूप सँ निर्धारित कयल गेल अछि । मुदा ओहि राजा सभक कोनो महत्व नहि छन्हि जिनकर जीवन सँ हमरा सब केँ किछुओ सिखबाक लेल नहि अछि (या तँ अनुकरण करबाक लेल अथवा कोनो निषिद्ध कार्य सँ बचबाक लेल हुनका सँ किछु प्राप्त नहि होयत), तेहेन राजा सब केँ मात्र एक या दुइ पाँति मे जिकिर (उल्लेख) कयल जेतनि । जे हमरा लोकनिक अनुसरणक लेल उदाहरण केर रूप मे काज करता, हुनका सभक बारे मे काफी विस्तार सँ आर गहिंराइ धरिक बात कयल जायत । उदाहरण लेल, उत्तानपाद, ध्रुवक पिता तथा ध्रुवक पुत्र, जे हुनका बाद शासन कयलनि, केर उल्लेख भागवत पुराण मे कयल गेल अछि, लेकिन केवल एक या दुइ वाक्य मे । लेकिन ध्रुव केर जिन्दगी, जे भक्ति, लगन आ दृढ़ता (मज़बूती) सँ भरल एकटा सबक अछि, हुनका बारे मे विस्तृत भाष्य देल गेल अछि (डिटेल मे बतायल गेल अछि) ।
भारतीय इतिहास लिखयवला अंग्रेज सब पुराण केँ पूरे तरह सँ मनगढ़ंत बतेलक । ओ सब एहि मे नस्लक सिद्धान्त (नस्लवाद) घुसा देलक, जे ओकरा सभक ‘बांटू आ राज करू’ केर नीति (पॉलिसी) केर हिसाब सँ रहैक, एना जेना कि ओ सब बिना कोनो निष्पक्ष अनुसन्धान (impartial research) केर परिणाम (नतीजा) हो । अगर, ओकरा सभक नजरि मे, पुराण सब मे मनगढ़ंत बात सब रहैक, तँ आजुक नजरि सँ (आधुनिक दृष्टि सँ), (खासकय आज़ाद भारतक मामिला मे), भारतीय इतिहासक अंग्रेज सभक संस्करण (वर्शन) सेहो किछु हिस्सा मे झूठे टा मानल जाइत अछि । एकरा आर बेसी ईमानदारी सँ फेर सँ लिखबाक कोशिश सब चलि रहल अछि । एतहु, कतेको घटना सब पर लेखक लोकनिक अपन नजरिया या फेर हुनको सँ पहिने सँ बनल कोनो पक्षपातपूर्ण राय भ’ सकैत अछि । तेँ, कियो एकरा कतबो भेदभाव बिना देखाबय, ई पक्का नहि कयल जा सकैत अछि जे पूरापूरी सच्चाइ टा लिखि देल जायत, खासकय अगर ओ पहिने सँ पश्चिमी लेखक सभक तथाकथित रिसर्च सँ पक्षपात कय रहल हो ।
ई सोचनाइयो सही नहि छैक जे इतिहास सिर्फ़ साम्राज्य सभक, युद्ध सभक, हमला सभक, राजवंश सभ वगैरह धरि टा सीमित अछि । हर चीजक एकटा इतिहास होइत छैक । दुर्भाग्य सँ, पश्चिमी इतिहासकार सभ द्वारा लिखल गेल राजनीतिक इतिहास (पॉलिटिकल हिस्ट्री) केँ मात्र गौरवपूर्ण इतिहासक रूप मे अहम स्थान देल गेल अछि । दोसर दिश, पुराण जे कि धर्म (नैतिकता) केँ मुख्य विषय मानैत अछि आर नहि केवल महान राजा सभक बल्कि महान उदाहरणीय मनुष्यहु केर, ऋषि लोकनि तथा आम लोकक जीवन आ कार्य सभक प्रयोग करैत एकटा स्वरूप (पैटर्न) बनबैत अछि । पुराण सभक अध्ययन सँ नहि केवल ओहि समय केर सरकार (शासन पद्धति) केर हालत पता चलैत अछि, बल्कि ओहि समयक सांस्कृतिक (कल्चरल) जीवन, कला एवं विज्ञान केर बारे मे सेहो जानकारी भेटैत अछि । बेशक, ओकर मुख्य विषय धर्म आर तत्त्वमीमांसा (मेटाफ़िज़िक्स) अछि ।
पुराण सच अछि या मनगढ़ंत ?
आधुनिक मान्यता ई अछि जे पुराण सब पर कोनो भरोसा नहि कयल जा सकैत अछि, कियैक तँ ओहि मे एहेन बात सब रहैत छैक जे जानल-पहिचान (देखल) प्राकृतिक घटना सभक दायरा सँ बाहरक रहैत छैक । ई बात जे देवता सब स्वतंत्र भ’ कय धरती पर घूमैत छलथि आर लोक सब केँ वरदान (आशीर्वाद) दैत छलथि, एकरा मनगढ़ंत बात मानल जाइत अछि कियैक तँ आइ-काल्हि एहेन बात सब नहि होइत छैक । “एकटा औरत केँ श्राप देल गेलैक आर ओ पाथरक बनि गेल, पाथर केँ आशीर्वाद देल गेलैक आर ओ वापस औरत बनि गेल” – ई सब आजुक हिसाब सँ कल्पनातीत बात थिक । सूरज के बारे मे प्रेस मे खबर आयल । हमरा लगैत अछि जे आइ-काल्हि एहेन खबरि सब बढ़ि रहल अछि । पुराण कहैत अछि जे “कश्यपक एकटा पत्नी रहथि जिनकर नाम कद्रू रहनि । ओ बच्चाक रूप मे सांपक जन्म देलखिन्ह ।” हम सब एकरा अजीब आ असम्भव आर तेँ झूठ मानिकय खारेज कय दैत छी । लेकिन कतेको पढ़यवला शायद एकटा प्रकाशित खबरि (न्यूज आइटम) (१९५८ मे) देखने होयब । “एकटा मारवाड़ी लड़की एकटा सांप केर जन्म देलक ।” जखन हम ई देखलहुँ, त हमरा एकटा आर बात साफ भ’ गेल ।
संन्यासी बनय सँ पहिने, हम एकटा एहेन परिवारक बारे मे सुनने रही जाहि मे नहि तँ ओहि परिवार मे जन्म लेनिहाइर अथवा ब्याह कय केँ अयनिहाइर कोनो लड़की “केवरा” (तमिल मे एकरा ताज़मपू कहैत छैक) केर प्रयोग करैत छल । जखन ओकरा सँ पूछल गेलैक जे कियैक, त ओ सब एकटा कहानी सुनौलक ।
“दस या पंद्रह पीढ़ी पहिने, हमरा सभक परिवार मे एकटा लड़की एकटा बच्चा केँ जन्म देलक जे कि एकटा बच्चाक बदला एक गोट सांप निकलल । ओकरा सब केँ ई कहय मे लाग लगैत छलैक आ तेँ ओ सब चुपचाप ओहि रेंगयवला बच्चा केँ पोसलक । ओ सब ओकरा एक गोट मनुष्यहि केर बच्चा जेकाँ दूध पियौलक । कहल जाइछ जे ओ बच्चा सेहो खुशी-खुशी पैघ भेल, घर मे बिना केकरो कोनो नुकसान पहुँचेने खेलाइत रहल । लेकिन एहि अजीब बच्चाक घर सँ बाहर, घूमय-फिरय नहि लय गेल जा सकैत छल । तेँ माय घर सँ बाहर नहि जाइत छलिह, जाबत कि बहुते जरूरी नहि भ’ गेल हो । एकटा पुरान तमिल कहावत अछि, “पत्थरे कियैक न हो, पति त पतिये होइत अछि ।” मतलब सम्बन्ध केवल देखबय सँ बेदाग रहैत अछि । तहिना, साँपक लेल मायक प्रेम पूरे बनल रहल । तेँ माय कहियो घर सँ बाहर नहि निकललिह । लेकिन एकटा समय एहेन आयल जे हुनका एक गोट करीबी सम्बन्धीक विवाह मे शामिल होयबाक लेल बाहर जाय पड़लनि । घर मे एकटा बूढ़िया औरत छलथि । आब ई नहि पता जे ओ साँपक बच्चाक दादी रहथि या नहि । ताहि समय, बेसहारा लोकक मदति करबाक नीक रेबाज रहय, भले ओ दूरहि केर सम्बन्धी कियैक न होइथ । आबे एना भेल अछि जे विवाहक बाद बेटा अपन माय-बापक संग नहि रहय चाहैत अछि, बल्कि असगरे रहनाय पसिन करैत अछि । पहिने आम तौर पर बिना बँटल परिवार – संयुक्त (जॉइंट) परिवार सभक स्थिति रहैत छल । ताहि मे दूरक विधवा चाची या दादाक एक या दुइ पीढ़ी दूरहु के चचेरा भाइ लेल जगह होइत छलैक । एहि तरहें, घर मे एकटा बूढ़ स्त्रीगण छलिह जेकरा बारे हम एखन बात कय रहल छी । हुनकर आँखिक रोशनी बड कमजोर रहनि । जखन माय अनिवार्य रूप सँ शहर सँ बाहर गेलिह त नाग शिशु केँ ओहि आन्हर वृद्ध महिलाक जिम्मे मे छोड़ि देल गेल छलन्हि । नाग केर रेख-देखक रूप मे कि चाही ? ओकरा नहेनाय, ओकर केशक जुट्टी गुहनाय या कपड़ा पहिरेनाय – एहि मे सँ किछुओ नहि । एकरा नियमित अन्तराल पर दूध पियेनाय टा रहैक । तेँ, माय ओहि वृद्ध महिला सँ कहलिह, “अहाँ गरम कय दूध, जाहि तापमान पर आंगुर सहन कय सकय, से जाँत (चक्की) केर पाथर भूर मे ढारि देबैक जेकरा स्पर्श सँ बुझल जा सकैक । जखन बच्चा केँ दूर पीबाक समय होयत त ओ एकरा स्वयं पी लेत” । एहि निर्देशक संग माय घर सँ चलि गेलिह । एना लगैत अछि जे नाग केँ दूध पियेबाक लेल प्रशिक्षित कयल गेल रहैक । वृद्ध महिला एहि निर्देश केर पालन कयलनि । आर मायक कहल अनुसार नाग सेहो आयल आ अपन चारा खा लेलक । किछु दिनक बाद एक बेर ई दिनचर्या बाधित भ’ गेलैक । नाग जे चक्कीक पाथरक भुरकी मे पैसि गेल, से ओकरा खाली पओलक । शायद वृद्ध महिला सुति रहल छलथि । नाग स्वभाव सँ वश मे छल आ किछु समय इन्तजार कयलाक बाद, ओहो वैह भुरकीक अन्दर सुति रहल । बाद मे बुढ़िया गरम खौलल दूध लय केँ चक्कीक पाथर पर अयलिह । हुनका पता नहि छलन्हि जे साँपक बच्चा सुति रहल अचि । ओ दूध केँ बिना देखनहि, कनेक लापरवाही सँ, भुरकी मे ढारि देलिह । खौलैत दूध बेचारा साँप केँ लागि गेलैक । ओ मरि गेल । साँपक माय, जे ताहि समय दोसर गाँव मे रहथि, से एकटा सपना देखलिह । साँपक बच्चा हुनकर सपना मे आयल आ कहलक, “हम मरि गेल छी । तूँ घर जो आ केवड़ाक झाड़ी मे हमर शरीरक दाह संस्कार कय दे । भविष्य मे तोहर परिवारक लड़की, चाहे ओ ओहि परिवार मे पैदा भेल हो या विवाह कय केँ आयल हो, अपन केश मे ई फूल (केवड़ा) नहि लगाबय ।” ताहि समय सँ, हमरा सभक परिवार मे कियो ओहि फूल केर प्रयोग नहि करैत अछि ।”
हमहुँ एहि कहानी पर हैरान होइत छलहुँ जे कि सच मे एना भ’ सकैत छैक ।
फेर, कतेको सालक बाद, ओहि परिवारक किछु सदस्य हमरा सँ भेटय आयल – से हमरा साँपक कहानी सम्बन्ध मे आर किछु बताबय लेल नहि, मुदा हमरा एकटा ताम्रपत्र (कॉपरप्लेट पर लिखल चीज़) दय सकय, जाहि मे हमर बहुत अधिक रुचि छल से ओकरा सब केँ पता रहैक ताहि लेल आयल । ई (ताम्रपत्र) एकटा शाही दानपत्र (रॉयल गिफ्ट डीड) रहैक जे ताँबाक पत्ता (कॉपरप्लेट) पर लिखल गेल छलैक । ई राजा अच्युत देव राय केर समय केर रहैक । एहि मे ई बतायल गेल रहैक जे एकटा ब्राह्मण १०८ दोसर ब्राह्मण केँ दान कएने रहथि । ई सब ओ राजा लेल कएने रहथि ।
हम अहाँ बतबैत छी जे ओ एना कियैक आ कथी लेल कयने रहथि । चूँकि एकटा ब्राह्मण केँ अपन सारा समय वेद सभक पाठ करबाक आर वैदिक आदेश सभक पालन करय मे लगाबय पड़ैत रहनि, ताहि द्वारा हुनका मुनाफा लेल कोनो नौकरी करय सँ रोकि देल गेल रहनि । लेकिन फेर हुनकर घर तँ चलेबाके छल । तेँ शास्त्र सब मे हुनका सब केँ उपहार या दान लेबाक इजाजत देल गेल छलन्हि । एहि तरहें राजा आर अमीर लोक सब हुनका सब केँ इनाम दैत रहथि आर हुनकर देखभाल करैत रहथि । चूँकि हुनका उपहार लेबाक इजाजत रहनि, ताहि द्वारे ई नहि बुझबाक चाही जे ओ सब बिना सोचने-समझने या बिना रुकने उपहार (दान) लैत छलथि । हुनका सब मे बहुत आत्मसम्मान छलन्हि आर ओ सब उपहार तखनहि लैत छलथि जखन जरूरत होइत रहनि आर जतबे जरूरी होइत रहनि ततबे लैत छलथि । ओ सब उपहार तखनहिं लैत छलथि जखन राजाक चाइल-चलन नीक आ नाम नीक होइत छलैक ।
एतबा नहि, किछु तँ अहु सँ आगू रहथि । (दान दयवला) राजाक खानदान मे सेहो कोनो दोष नहि हेबाक चाहैत छल । राजा सब केँ एहेन ब्राह्मण सभक लगातार मांग केर सामना नहि करय पड़न्हि । हुनका सभक तकलीफ ई रहनि जे ब्राह्मण हुनकर उपहार (दान) लेबाक लेल आगाँ नहि अबैत छलथि आ परिणामस्वरूप, नीक काज सभक लेल दान करय सँ भेटयवला पुण्य या क्रेडित हुनका सब केँ नहि भेटैत छलन्हि । एहेन स्थिति सब स निबटबाक लेल, राजा व अमीर लोक सब एकटा चाल चलैत छलथि । ओ सब कोनो तरहें कोनो ब्राह्मण केँ आम मुश्किल हालत सँ बेसी अपन उपहार (दान) लेबाक लेल मना लैत छलथि । कहियो-कहियो, दान पूरे गाम जतेक पैघ होइत छल । लेकिन ई मात्र एकटा मनुष्यक लाभ वास्ते नहि होइत छल । दान दयवला केँ उम्मीद रहल करनि जे हुनकर देल दान ओहि एक गोटे पेनिहारक मार्फत दोसरो ब्राह्मण धरि पहुँचत । एहि तरहें, एक्के टा लोक दान अपना नाम पर लेता, मुदा ओ अपना मात्र एक छोट टा हिस्सा रखता आ बाकी दोसर ब्राह्मण केँ दय देता । कियैक तँ एकटा ब्राह्मण दोसर सँ लैत छथि, तेँ तकनीकी रूप सँ ई लेन-देन प्रतिग्रह दोष (भिक्षा लेबाक दोष) केर श्रेणी मे नहि अबैत अछि । एहि तरहें राजा या शाही दान देनिहारक मकसद पूरा भ’ जायत ।
सवाल ई उठैत छैक जे कि मुख्य दान दयवला आर आखिरी लाभ पाबयवलाक बीच आबयवला बिचौलिया बदनाम नहि होइत छल । बेशक, अगर राजा-महाराजा विद्वान वैदिक ब्राह्मण सब केँ बचेबाक लेल ई चाल चलैत छलथि, तँ एहि मे किछुओ गलत नहि अछि । लेकिन ओहि बिचौलियाक कि जे एहि चाल केर हिस्सा छल ? खैर, ओकरहु पर कोनो इल्ज़ाम (आरोप) नहि लगायल जा सकैछ । कानूनक हिसाब सँ, दान कयल गेल उपहार ओकर अपन सम्पत्ति (प्रॉपर्टी) बनि जाइत छैक । दान पत्र (गिफ्ट डीड) ओकरहि नाम पर बनायल जाइत अछि । कियैक तँ ओ ज़्यादातर चीज सब पर मालिकाना हक नहि जतबैछ, बल्कि दोसर केँ दय दैछ, तेँ ओ स्वयं केँ दोष सँ मुक्त कय लैत अछि । अपनहिं सम्पत्ति (प्रॉपर्टी) दय मे कोनो पाप नहि होइत छैक ।
जाहि कॉपरप्लेट केर हम पहिने ज़िक्र कयने छलहुँ, ओहि मे एक ब्राह्मण केँ यैह तरहक उपहार भेटल रहनि जेकरा ओ १०८ आर लोक सब मे बाँटि देलनि । एहि १०८ लोकक नाम, संगहि ओ कोन स्तर धरि वेद पढ़ने रहथि आर हुनका कतेक जमीन देल गेल छलन्हि, ई सब ओहि ताम्रपत्र मे लिखल छलैक ।
पेनिहार मे एकटाक नाम ओएह परिवार सँ छैक जाहि मे साँपक बच्चा जन्म लेने छल । बाकी पाबयवलाक परिवार सभक बारे मे बहुत कम पता अछि । हमरा जे कॉपरप्लेट भेटल छल, से कतेको पीढ़ी सँ सम्हारिकय राखल गेल छलैक ।
ध्यान दयवाली बात ई अछि जे कॉपरप्लेट मे जे नाम लिखल छल ओ ‘नागेश्वर’ छल । जे व्यक्ति आब हमरा लग प्लेट अनलनि अछि, हुनकहु नाम नागेश्वर अछि । पूछला पर पता चलल जे नागेश्वर नाम हरेक पीढ़ी मे एकटा बच्चा केँ देल जाइत छलैक । तखन हम आसानी सँ ई बुझि पेलहुँ जे ई नाम साँपक बच्चाक कहानी सँ जुड़ल अछि । (संस्कृत मे नाग केर मतलब साँप होइत अछि) । एकर अलावे, कथाक समर्थन मे ई सबूत सेहो अछि जे अच्युत देव राय केर जमाना मे सेहो एहि नामक एकटा परिवार छल ।
एहि सँ हमर पहिलुका सन्देह केँ पक्का जवाब भेट गेल जे कि एहेन सच मे भ’ सकैत छैक । आर, जखन १९५८ मे, हम ई खबरि देखलहुँ जे एकटा औरत साँपक जन्म देलक अछि, त हमर शक आरो दूर भ’ गेल आ हमरा उपर भरोसा हावी भ’ गेल ।
ई बिल्कुल सही नहि अछि जे हम अहाँ सब पुराणक सच्चाइ पर भरोसा नहि करबाक आरोप लगाबी । हम अपनों खबर मानय लेल तैयार छलहुँ आर हमरा जे पारम्परिक कथा सुनायल गेल छल, से मानय मे जे हिचकिचाहट छल, से प्रकाशित समाचार दूर कय देलक । हम एहि मोड़ पर आबि गेल छी कि यदि कोनो खबर प्रेस मे छपैत अछि, चाहे ओ कतबो असम्भव कियैक न हो, हम ओकरा सच मानि लैत छी । लेकिन पुराणक ज़िक्र मात्र सँ हमरा सब केँ घृणा करय लेल मजबूर कय दैत अछि । “हुनका सब लग बहुते रास खाली समय लेल ताड़क पत्ता आ लिखबाक लेल कलम (स्टाइलोग्राफ) छलन्हि । ओ सब कथावला किताब बनौलनि । ताहि मे किछु त पक्का चालाक लोक रहथि मुदा बाकी बकवास छथि” ई आम राय छैक ।
हालांकि कल्पना सँ भरल अछि, मुदा ओहि मे एकटा सन्देश रहैत छैक
भ’ सकैत अछि जे पुराण मे कतहु-कतहु थोड़-बहुत कल्पनाक सहारा लेल गेल हो । ई एकटा प्रक्षेप (इंटरपोलेशन) केर रूप मे आयल भ’ सकैत अछि । लेकिन ई के कहि सकैछ जे कोन पूरे मनगढ़ंत छैक, कोन प्रक्षेप छैक आ कोन सच छैक ? जँ सब गोटे अपना नजरि मे जे प्रक्षेप छैक, तेकरा छोड़ि दियए, तँ बहुत कम बचि जायत कियैक तँ सबटा कथा गायब भ’ जायत । आधारभूत कथाक तौर पर किछुओ नहि रहि सकैत अछि । तेँ, भले एना लागय जे किछु कमी आ गलती सब छैक, तैयो ई हमरा सभक फर्ज थिक जे हम सब पुराण केँ वैह हालत मे बचाकय राखब जाहि हालत मे ओ हमरा सब केँ भेटैत अछि ।
किछु मनगढ़ंत बात रहय देल जाय । आखिर, पुराण हमरा सब केँ भगवानक समीप लय जाइत अछि आर मोन केँ शान्ति दैत अछि, अछि न ? हम सब खरिदारी करय जाइत छी आ बढ़ियाँ चीनी कीनि पबैत छी । कि हम सब एहि बात सँ खुश होइत छी जे हमरा सब केँ बढ़ियाँ चीनी भेटल या फेर हम सब एहि बात सँ तमसा जाइत छी कि दुकान मे सामान बढ़ियाँ जेकाँ नहि देखायल गेल छल या फेर दोकानकार केँ कम सुनाय पड़ैत छलैक ? भूगोल आर अन्तरिक्ष विज्ञान (एस्ट्रोनॉमी) केर ब्यौरा मे, मन्वंतर जेकाँ समय केर ब्यौरा मे, एक-दुइ टा गलती भ’ सकैत अछि । आजुक भूगोल, एस्ट्रोनॉमी आर इतिहास अछि जे कोनो गलती (गलत आकलन – इनएग्जैक्टीट्यूड्स) केँ ठीक कय सकैत अछि । लेकिन पुराण एकटा एहेन मकसद पूरा करैछ जे भूगोल, एस्ट्रोनॉमी या इतिहास नहि कय सकैछ – यानी परमात्मा तत्व, भक्ति आर धर्म केर शिक्षा सफलतापूर्वक देनाय ।
“राम त्रेता युग मे नहि रहि सकैत छलथि, एतेक लाखों वर्ष पहिने । रामायण मे देखायल गेल संस्कृति आ सभ्यता तहिया मौजूद नहि रहि सकैत छल” – ई किछु एहेन आलोचना (विरोध या खराबी) सब अछि जे हमरा लोकनिक कान मे पड़ैत रहैत अछि । मानि लैत छी जे राम त्रेता युग मे नहि रहल छलथि । एहि तरहें, विमर्श (चर्चा) लेल, मानि लैत छी जे कृत् युग मे पहिने भेल कहानी सब असल मे नहि भेल छल । मानि लैत छी जे ई सब भेल, मानि लियह कि, पिछला सात या आठ हजार वर्ष मे ई सब भेल । एहि बात पर, कि रामक कहानीक अहमियत (महत्व) कम भ’ जाइत छैक ? कि एहि सँ हम सब जे सबक सिखैत छी, ओ कोनो तरह सँ कम भ’ जाइत छैक ? जेना कहल जाइत अछि जे पुराण सभक उमेर पर विश्वास करब मुश्किल अछि, तहिना एकटा दोसर राय इहो छैक जे ओकर सही होबय पर सवाल उठेनाय गलत अछि ।
शास्त्र कहैत अछि जे ५००० साल पहिने, जखन कलियुग शुरू भेल, त व्यास हमरा सब केँ पुराण देलनि । लेकिन हुनकर समय सँ पहिने सेहो पुराण छल । छांदोग्य उपनिषद मे, जेतय नारदजी अपन सिखल विद्या सभक सूची बतौलनि अछि, ताहि मे पुराण केँ ओहि सब मे सँ एक बतौलनि अछि ।
तेँ, ई स्पष्ट अछि जे वेद आ उपनिषद सभक समय सेहो पुराण मौजूद छल । एना लगैत अछि जे जेना व्यास वेद सब केँ कतेको शाखा सब मे बाँटि देने छलथि कियैक तँ बादक पीढ़ी सब मे ओहि सब केँ याद करबाक कुब्बत (काबिलियत) नहि छलैक, तेनाही ओ पुराण सब केँ सेहो छोट-छोट हिस्सा सब मे फेर सँ लिखलनि ।
तैयो, पश्चिमी विद्वान पुराण सब केँ एतेक पुरान नहि मानैत अछि । त एहिना रहय देल जाय ।
आइ-काल्हिक अंधविश्वासक सबसँ पैघ उदाहरण, जेतय विश्वास लगभग पक्का भ’ जाइत अछि, ‘रिसर्च’ केर नतीजा सब सँ निकलैत अछि । लेकिन रिसर्च केर सब नतीजा ओतेक सही नहि होइत छैक । समय केर संग ओ सब पुरान आ गलत साबित भ’ जाइत छैक । लेकिन, भले रिसर्च मे कोनो गलती नहि हो आर पुराण मनगढ़ंत हो, पुराण एहि बात पर जोर दैत अछि जे नीक लोक सब केँ खुशहाल जीवन भेटैत छैक आ खराब लोक सब केँ तकलीफ होइत छैक – एतय धरि जे खराब लोक सब केँ भगवानक माफी आ कृपा भेटैत छैक । कियैक तँ ई बात पढ़यवलाक मोन मे नीक जेकाँ बैसि जाइत छैक, एकर मतलब अछि जे ओ अपन मकसद मे पूरे तरह सँ पूरा करैत अछि ।
व्यास द्वारा जे खजाना छोड़ल गेल
वैह व्यास जे वेद सब केँ (वेद शाखा सब मे) फेर सँ मिलेलनि-सजेलनि ताकि लोक ओ सब आसानी सँ बुझि सकय, वैह हमरा सब केँ अठारह टा पुराण देलनि । हम सोचैत छलहुँ जे व्यास पहिल पत्रकार छलथि आर आधुनिक (मॉडर्न) पत्रकारिताक लेल सबसँ पैघ उदाहरण छलथि । कहानी, इतिहास, भूगोल, दर्शन, ओ एहि सब पर आसान आ दिलचस्प तरीका सँ अनमोल किताब सब लिखलनि ताकि ओ नहि मात्र तेज आ समझदार लोक केँ बल्कि सामान्य (आम) आदमी केँ सेहो पसिन आबय । कि ई वैह काज नहि छी जे पत्रकार सब करैत छथि ? लेकिन पत्रकार सब मात्र लोकक रुचि आ सनसनी पसारय धरि सीमित रहैत छथि । लेकिन व्यास केर मकसद आम आदमी केँ सही राह पर अननाय रहनि आर ओ मानव रुचि केँ मात्र एकटा माध्यम (जरिया) बनौलनि । जौँ मात्र मानवीय रुचि केँ पत्रकारिताक लक्ष्य मानल जाइछ, त एकर परिणाम गल आ गैर-धार्मिक बात सब केँ बढ़ावा देनया होइत । अगर व्यास केँ आदर्श मानल जाइछ, त प्रेस बेसी स्वच्छ रहैत । एकर जनता पर नीक असरि पड़ैछ ।
एहि अठारह पुराणक योग चारि लाख ग्रन्थ सभक बराबर अछि । एक ग्रन्थ बत्तीस अक्षरवला एकटा श्लोक होइत अछि । एहि मे सँ लगभग एक चौथाई या एक लाख श्लोक स्कंद पुराण मे अछि । हमरा बुझाइत अछि जे ई शायद दुनियाक सब सँ पैघ एकल पुस्तक होतय । शेष सत्रह पुराण सब मे तीन लाख ग्रन्थ छैक । एकर अतिरिक्त, व्यास महाकाव्य “महाभार” केर रचना कयलनि जाहि मे एक लाख ग्रन्थ या छन्द छैक ।
प्रत्येक पुराण एक्के टा देवता केँ अपन मुख्य विषय मानैत अछि । पुराण सब केँ मोट हिसाब सँ तीन श्रेणी मे वर्गीकृत कयल जा सकैत छैकः (1) वैष्णव पंथ, (2) शिव पंथ, आर (3) शक्ति पंथ, एहि प्रकारे बड पैघ संख्या आर विभिन्न प्रकारक देवता सब केँ शामिल कयल गेल अछि । अठारह पुराण अछि: (1) ब्रह्म पुराण, (2) पद्म पुराण, (3) विष्णु पुराण, (4) शिव पुराण, (5) श्रीमद्भागवत, (6) नारद पुराण, (7) मार्कण्डेय पुराण, (8) अग्नि पुराण, (9) भविष्य पुराण, (10) ब्रह्म वैवर्त पुराण, (11) लिंग पुराण, (12) वराह पुराण, (13) स्कंद महापुराण, (14) वामन पुराण, (15) कूर्म पुराण, (16) मत्स्य पुराण, (17) गरुड़ पुराण, और (18) ब्रह्मांड पुराण ।
एहि अठारह मे सँ दस शैव कहल जाइत अछि । आइ हमरा सब केँ जे कोनो खिस्सा आ कथा बुझल अछि, से सब एहि मे शामिल अछि । इतिहास, कहानी, दर्शन सब एहि मे शामिल अछि ।
आदि शंकराचार्य विष्णु सहस्रनाम पर अपन टिप्पणी मे विष्णु पुराण सँ कतेको उदाहरण सभक हवाला देलनि अछि । एहि पुराण के लेखक ऋषि पराशर छलथि, जे महर्षि व्यास केर पिता रहथि । श्री रामानुज केर सिद्धांत अर्थात विशिष्टाद्वैत या योग्य अद्वैतवाद मे विष्णु पुराण प्रमुख प्रमाणक रूप मे अबैत अछि ।
रामानुज केर समय सँ पहिने, विशिष्टाद्वैत सिद्धांतक स्तंभ सब मे सँ एक आलवंदार छल । रामानुजक हुनका पास पहुंचय सँ पहिनहिं हुनकर मृत्यु भ’ गेलनि । आलवंदार द्वारा रामानुजक तीन काज सौंपल जेबाक इच्छा जतेने रहथि । एना कहल जाइत अछि जे, परिणामस्वरूप, हुनकर मृत्युक बाद, हुनकर हाथक तीन टा आंगुर मुड़ल छलन्हि आ बन्द पायल गेलन्हि । जखन रामानुज अपना गुरुक इच्छा (इरादा) केर सही अनुमान लगौलनि आर से बेरा-बेरी कय केँ घोषित कयलनि, तखन कहला जाइत अछि जे मृत व्यक्तिक प्रत्येक आंगुर सीधा भ’ गेल छलन्हि ।
तीन टा अनकही आज्ञा सब मे सँ एक आज्ञा ई छलैक जे विशिष्ट अद्वैत सिद्धांत के अनुसार ब्रह्म सूत्र पर एकटा भाष्य (कमेंट्री) लिखल जाय । दोसर छलैक थिरुवोयमोझी – तमिल मे अलवार सभक सूक्ति पर एक कमेंट्री लिखबेनाय । तेसर रहनि व्यास आर पराशरक प्रतिष्ठित योगदान केँ मजबूती सँ स्थापित कयनाय आर दूर तक पसारनाय । पराशर केँ ई खास जगह एहि लेल देल गेलनि कियैक तँ ओ विष्णु पुराणक लेखक रहथि । एहि बात केँ ध्यान मे राखैत, रामानुज अपन मुख्य शिष्य कूराथलवानक दुइ गोट बेटाक नाम पराशर भट्ट आर व्यास भट्ट रखलनि । बाद मे पराशर भट्ट महत्वपूर्ण वैष्णव आचार्य सब मे सँ एक बनि गेलाह ।
हालांकि ऋषि पराशर विष्णु पुराण लिखने छलथि, लेकिन व्यासे जी अठारह पुराण केँ सम्पादित (एडिट) कय केँ ओहि रूप मे पेश कयलनि जाहि रूप मे ई सब आब हमरा लोकनि केँ भेटल अछि । हम पहिनहिं बतेने रही जे ओ वेद सब केँ सेहो व्यवस्थित आ संहिताबद्ध (कोडिफाइड) कयलनि तथा पुराण लिखलनि ताकि वैदिक आदेश लोकक दिमाग मे नीक ढंग सँ बैसि सकय ।
ओ पुराण कियैक लिखलनि, एकर एकटा आरो कारण बतायल गेल अछि । मात्र किछुए लोक टा केँ वेद पढ़बाक आ पाठ (वाचन) करबाक अधिकार छैक, सब केँ नहि । कहल जाइत अछि जे ओ पुराण एहि लेल लिखलनि ताकि आम लोक केँ वैदिक दर्शन आ आदेश सभक बारे पता लागि सकैक ।
अगर व्यासक पिता पराशर विष्णु पुराण केर असल मूलपाठ (ओरिजिनल टेक्स्ट) निकालबाक लेल जिम्मेदार रहथि, तँ व्यास केर श्रीमद् भागवत हुनकर बेटा शुकाचार्य जे राजा परीक्षित केँ सुनेने रहथि से जिम्मेदार रहथि ।
जखन भागवतक बात होइत छैक, त एहि बारे मे किछु मतभेद होइत अछि जे कि ई ओहि मूलपाठ केँ बतबैत अछि जाहि मे भगवान कृष्णक कहानी मुख्य विषय अछि लेकिन विष्णुक दोसरो अवतार सभक आर-आर कथा सभक जिकिर छैक, या ई देवी भागवत केँ बतबैत अछि जे देवी अम्बा केर ‘लीला’ या चरित्र सँ जुड़ल छैक । हमरा सब केँ, बेशक, दुनू हि पसन्द अछि । ई दुनू वास्तव मे बहुत नीक टेक्स्ट अछि । अपन-अपन सिद्धांत केर समर्थन मे चैतन्य, निम्बार्क, वल्लभाचार्य आदि विष्णु भागवत केँ वेदक समान स्थान देलनि अछि । ओतहि अद्वैतवादी, जे एहि सिद्धांत सभक विरोध करैत छथि, ओहो सब एहि (विष्णु भागवत) केँ स्वीकार करैत छथि आर एकर भूरि-भूरि प्रशंसा करैत छथि ।
शिव पुराण स्कंद पुराण सँ भिन्न अछि । स्कंद मे, एकर तीन-चौथाई भाग शिव सम्बन्धी घटना सब, उपाख्यान सब आ दर्शन केँ समर्पित अछि । एकर केवल एक चौथाई भाग स्कंद केँ समर्पित अछि । तैयो, एकरा स्कंद पुराण कहल जाइत छैक, कियैक तँ एहि मे स्कंद सँ सम्बन्धित सब बात सब शामिल अछि ।
मार्कंडेय पुराण मे दुर्गाक “दुर्गा सप्त सती” कथा अबैत छन्हि । “शांति होम”, “शत चंडी”, “सहस्र चंडी” – ई संस्कार एहि पुराण केर ७०० मंत्रक उपयोग कय केँ कयल जाइत अछि । एतय, हरेक मंत्र एकटा श्लोक मे अछि । तेँ हरेक ‘होम’ या अर्पण एकटा श्लोक पढ़िकय कयल जाइत अछि ।
भविष्य केर मतलब होइछ आबयवला आगाँक समय । भविष्यत पुराण मे कतेको बात अछि, जाहि मे आजुक कलियुग मे हम सब जे बुराइ सब देखि रहल छी, तेकरो ब्योरा सब अछि । एहि पुराण मे नहि सिर्फ़ पुरना मौर्य वंश केर राजा सभक जिकिर अछि, बल्कि यूरोपियन लोक सभक हालहि मे अयबाक जिकिर सेहो अछि । तैयो, आजुक समझदार लोक एहि पुराण केँ हल्का मे लैत छथि आ कहैत छथि जे एकरा कलियुगक शुरुआत मे व्यास नहि लिखने रहथि, बल्कि हालक समय मे कियो आर लोक व्यासक नाम उपयोग कय केँ लिखने रहथि । भ’ सकैत छैक जे एहि मे किछु जोड़-तोड़ हो, लेकिन पूरा चीज केँ हालहि केर लिखल गेल तथा गलत नहि मानल जा सकैत अछि । जिनका लग रहस्यमयी शक्ति सब रहैत छन्हि, ओ समय केर पार सेहो देखी सकैत छथि । हुनका दुनियाक दोसर हिस्सा मे भ’ रहल घटना सभक बारे मे सेहो पता चलि सकैत छन्हि । ई कोनो आसान बात नहि अछि जे किताब सब लोक लिखय आ ओहि महान लोकक नाम सँ सेहो स्वीकार कयल जाय ।
गरुड़ पुराण मुख्यतः मृत्युक बाद केर दुनिया (पितृ लोक) तथा दिवंगत आत्माक लेल कयल जायवला संस्कार सँ सम्बन्धित अछि । एहि द्वारे, “श्राद्ध” या पुण्यतिथि समारोह सभक दौरान एहि पुराण केँ पढ़बाक प्रथा अछि ।
“ललितोपाख्यान” (ललिताक कथा) आर “ललिता सहस्रनाम” ब्रह्मांड पुराण मे शामिल अछि । देवी पूजाक उपासक एहि तथ्य पर गर्व करैत छथि जे सबटा अठारह पुराण सब केँ पढ़लाक समापन पर, पढ़ल जायवला अन्तिम पुराण यैह थिकैक जाहि मे राज-राजेश्वरीक राज्याभिषेक होइत छन्हि । अष्टोत्तरनाम, सहस्रनाम आर कवच जेकर आब प्रत्येक देवता पर पाठ कयल जाइत अछि, सबटा कतेको पुराण सब सँ लेल गेल अछि । हालाँकि, विष्णु सहस्रनाम आर शिव सहस्रनाम महाभारत सँ अछि । लेकिन, “आदित्य हृदयम्” श्रीमद् रामायण मे अबैत अछि । प्रदोष स्तोत्र स्कंद पुराण मे अछि । आरो बहुत किछु ।
उप पुराण आ छोट पुराण
अठारह पुराणक अलावे, अठारह ‘उप’ पुराण या सहायक पुराण सेहो अछि । विनायक पुराण आर कल्कि पुराण उप पुराण मे सँ अछि । हालांकि कहल जाइत छैक जे एकर संख्या मुख्य रूप सँ अठारहे टा छैक, लेकिन वास्तव मे, आरो बहुत रास पुराण सब अछि ।
साल केर महीनाक महिमा केर वर्णन, जेना, तुला पुराण, नाग पुराण, वैशाख पुराण, ई सबटा अठारह मुख्य आर उप-पुराण मे सँ अछि । हर पवित्र जगह पर एकटा ‘स्थल’ पुराण होइत छैक । जेना कि उपर कहल गेल अछि, ई सब सेहो पुराणहि मे पड़ैछ । किछु अलग ग्रंथ सेहो अछि ।
इतिहास पुराण – अंतर
रामायण आर महाभारत बहुत प्राचीन समय सँ ज्ञानी आ आम लोकक दुइ आँखि जेकाँ काज करैत रहैत अछि आर हुनका सब केँ सेही रास्ता देखबैत रहल अछि । एहि दुनू केँ पुराण सभक सूची मे शामिल नहि कयल गेल अछि, लेकिन एकरा एकटा अलग वर्गीकरण अर्थात् “इतिहास” सँ सम्मानित कयल गेल अछि ।
‘पुरा’ केर अर्थ अछि अतीत मे । जे अतीत केर बात सभक वर्णन करैत अछि से पुराण थिक । बेशक ओ भविष्यहु केर बारे मे भविष्यणवाणी सब सब सँ निपटैत अछि ।
पुराण सब केँ नहि केवल अतीतक घटना सभक वर्णन करयवला मानल जा सकैत अछि, बल्कि एकर अर्थ ‘सुदूर अतीत मे ओकर उद्गम होयब’ सेहो मानल जा सकैत अछि । सुदूर अतीत मे, साहित्य कविता आ नाटक धरि मात्र सीमित रहय ।
गद्य मे कहानी सभक वर्णन बहुते बाद मे आयल । एकरा ‘उपन्यास’ नाम देल गेलैक, जेकर अर्थ अछि नव । चूंकि एहि मे कविता या नाटक केर रूप नहि छल आर चूंकि ई बहुते बाद मे आयल, तेँ एकरा ‘उपन्यास’ कहल गेलैक ।
परिभाषाक अनुसार, पुराण मे कि हेबाक चाही, एहि मामिला मे ओकरा पाँच आवश्यकता सब केँ पूरा करबाक होइत छैक, जेकरा ‘पंच लक्षण’ या विशिष्ट चिह्न कहल जाइत छैक । ओ थिक: (१) सर्ग (यानी) दुनिया केर असली रचना; (२) प्रतिसर्ग (बनलाक बाद, दुनिया समयक संग केना बढ़ल); (३) वंश यानी वंशावली, वंशज एक पीढ़ी सँ दोसर पीढ़ी मे केना आयल; (४) मन्वंतर (चौदह मनु लोकनिक इतिहास जाहि सँ सबटा इंसानियत निकलल, जाहि मे एक हज़ार ४-युग चक्र केर समय शामिल अछि) आर (५) वंशानुचरित (यानी देशक शासक सभक इतिहास, सूर्य वंश आर चंद्र वंश जेहेन राजवंश सभक जानकारी) । एकर अलावे, एहि मे अंतरिक्ष मे एहि दुनियाक ब्यौरा सेहो हेबाक चाही । एतय, पुराण नहि केवल इतिहास बल्कि भूगोलक सेहो काज करैत अछि ।
इतिहास इति-हा-असम् थिक । (इतिहासम्) । ‘इति-हा-असम्’ केर मतलब अछि ‘एना भेल’ । बीच मे ‘हा’ केर मतलब अछि सच मे, सचमुच, ज़रूर । एहि तरहें इतिहास बिना कोनो अन्दाजक तथ्या सभक दस्तावेज (रिकॉर्ड) थिक । ई ओहि समय भेल जखन एकरा लिखल गेल छल – या ई ओहि समय लिखल गेल छल जखन ई भेल छल । वाल्मीकि द्वारा रामायण तखन लिखल गेल जखन राम जिन्दा रहथि । पाँच पांडव लोकनिक संग, व्यास द्वारा असल मे महाभारत मे बतायल गेल अलग-अलग घटना सब केँ देखल गेल छल ।
हालांकि पुराण नाम केर हिसाब सँ, ओ बहुत पहिनेक घटना सभक बारे मे लिखलनि, ओ अपन रहस्यमयी शक्ति सब सँ घटना सब केँ ओहिना याद कएने हेताह जेना ओ असल मे भेल छल । तैयो, घटना सभक सच्चाई हुनका समय केर लोक सब, जे हुनका समय मे रहैत छलथि, से सब जाँच (वेरिफ़ाई) नहि कय सकलथि । लेकिन रामायण आर महाभारत एहि श्रेणी (कैटेगरी) मे नहि अबैछ । जखन एहि दुनू केँ पहिल बेर आनल गेल छल, तखनहुँ जे आर लोक सब जिन्दा छलथि, ओ सब एहि महावाक्य सब मे देखायल गेल अलग-अलग किरदार (पात्र) सब केँ तथा कहल गेल घटना सब सँ परिचित रहथि । तेँ, एहि दुनूक सच्चाइ केर बारे मे हमरा लोकनिक शक केँ पूरे तरह दूर करबाक लेल, दुनू केँ इतिहास कहल जाइत अछि, जाहि मे ‘हा’ ज़ोर देबाक लेल अछि ।
इतिहासक महिमा
जँ पुराण केँ वेदक उपांग मानल जाइछ, तँ इतिहास केँ वेदहि केर समान महान मानल जाइछ ।
महाभारत केँ ‘पंचमो वेद’, यानी पाँचम वेद कहल जाइत अछि । रामयणक बारे मे कहल जाइछ जे जखन ओ परमपुरुष जिनका मात्र वेद टा सँ जानल जा सकैत अछि, से दशरथ केर पुत्र रूप मे जन्म लेलनि, तखन वेद सेहो वाल्मीकि केर बच्चाक रूप मे ‘रामायण’ रूप मे प्रकट भेल ।
रामायण आर महाभारत केर कथा अपन देशक लोक केर रक्त मे अछि, एना कहल जा सकैछ ।
हरेक पैघ पुराण मे कतेको कथा सब होयत – किछु लंबा आ किछु छोट । हरेक कथा धर्मक किछु विशेष विन्दु पर जोर देत । दोसर दिश, इतिहास शुरू सँ अन्त धरि एकटा लगातार चलयवला कहानी होइत अछि । हालांकि महाकाव्य मे किछु बीचक बात (अन्तराल – इंटरल्यूड – बीचक मध्यान्तर जेकाँ) या दोसर विषयगत प्रस्तुति सेहो भ’ सकैत अछि, लेकिन ओ मुख्यहि विषय केर आस-पास टा रहत । अगर पुराण हरेक धर्म (कर्तव्य) केँ एकटा अलग कथाक माध्यम सँ बतबैत अछि, तँ इतिहास सब धर्म केँ एकटा मुख्य कथाक माध्यम सँ देखबैत अछि । उदाहरण लेल, हरिश्चंद्र पुराण मे सत्य केँ धर्मक तौर पर मानबाक वास्ते एकटा अलग कहानीक तौर पर देखायल गेल अछि । नलायिनी केर कहानी महिला सब मे पवित्रता (पतिव्रता) केर महानता केँ देखबैत अछि । रंति देव केर कहानी बहुत ज़्यादा त्याग आ दयाक नीक पक्ष सब केँ सिखबैत अछि । लेकिन, राम आ पाँच पांडव लोकनिक जीवनक आस-पास घुमयवला इतिहास हमरा सब केँ देखबैछ जे केना ओ लोकनि मुश्किलो हालत मे धर्मक सबटा अलग-अलग गुण सभक पालन कयलनि आर धर्म केर नियम केँ बनेने रखलाह ।
भगवान सब मे फर्क कियैक
जखन हम बतेलहुँ जे हरेक पुराण एकटा खास भगवानक बड़ाइ करैत अछि, तखन किछु सन्देह सेहो भ’ सकैत अछि । शैव पुराण मे कहल गेल अछिः “शिव मात्र परमात्मा तत्व छथि” या सबसँ उपरवला ‘सर्वोच्च’ छथि । ओ बनेनिहार, पोसनिहार आ संहार करयवला छथि । विष्णु हुनका सँ आदेश लैत छथि आर हुनकहि काज करैत छथि । विष्णु सुख भोगैत छथि – भोगी छथि – जे मायाक भ्रम केर जाल मे फंसल रहैत छथि । मात्र शिव टा तपस्वी योगी छथि । ओ शुद्ध ज्ञान केर अवतार छथि – ज्ञान स्वरूपी छथि । विष्णु, शिव केर अधीन छथि ।
विष्णु, शिव केर पूजा करैत छथि । एहेन घटना सब अछि जे देखबैत अछि जे विष्णु शिव केर विरोध कयलनि आ हुनका लड़ाइयो तक कयलनि, मुदा आखिर मे ओ हारि गेलाह आ हुनका अपमान तक झेलय पड़लन्हि, आदि । अगर कियो वैष्णव पुराण पढ़य, त प्रकरण बिल्कुल उल्टा भेटत आर शिव केँ विष्णुक अधीन हेबाक आर हुनका हाथे हारबाक प्रकरण मे कतेको घटना सब भेटत । वैष्णव प्रकरण (वर्जन) मे एना कहल गेल अछि, “शिव जे आत्मा सभक तथा राक्षस सभक संग रहैत छथि आर श्मासान मे रहैत छथि, ओ स्वयं केँ सब सँ पैघ भगवान केना कहि सकैत छथि ? ई त अछि जे राजा सभक राजा वैकुंठ केर भगवान (विष्णु) केर सेवक छथि ।”
ई विवाद (मतभेद) शिव आर विष्णु केर महानता या सबसँ पैघ होयबाक बात धरि सीमित नहि अछि । हरेक पुराण मे कोनो खास देवताक प्रशंसा कयल जायत । ओहि देवता केँ एकमात्र सब सँ पैघ आ सब सँ पैघ भगवान कहल जायत आ बाकी सब देवता लोकनि केँ कम महत्व देल जायत । कहल जायत जे बाकी सब वैह खास भगवान (ओहि खास पुराण केर जे छथि) केँ मानैत छथि आर जखन कियो विद्रोह कयलनि, त हुनका दब देल गेलनि आ अपमान सेहो कयल गेलनि, वगैरह-वगैरह ।
ई देखिकय, एहेन अलग-अलग खबरि सब पर हैरानी होइत अछि आर सन्देह सेहो भ’ सकैत अछि । कोन बात सच अछि आ कोन नहि ? स्पष्ट अछि, ई सब बात सच नहि भ’ सकैछ । यदि शिव केर बारे मे कहल जाय जे ओ विष्णुक पूजा करैत छथि, त एकर उल्टा बेतुका अछि आ एना भ’ए नहि सकैछ । यदि देवी अम्बाक तीनू मूर्ति (त्रिशक्ति) ब्रह्मा-विष्णु-महेश केर त्रिमूर्ति सँ बेहतर छथि, तँ हुनका शिव केर पत्नी मननाय गलत होयत, जे एकटा कर्तव्यनिष्ठ पत्नीक तौर पर अपन पतिक अधीन रहैत छथि । अतः, सब पुराण सच्च या असली नहि भ’ सकैछ । त कोन सही अछि ? या ई जे ओ सबटा झूठ अछि ? एहेन सन्देह हमरा सब केँ परेशान करैत अछि ।
हालांकि तार्किक तौर पर (लॉजिकली) एहि सब विवाद केँ सच नहि मानल जा सकैछ, असल मे, ओ एहिना अछि । एकटा भगवान एक समय हारि जाइत छथि, आर दोसर समय जीति जाइत छथि । जिनकर एक समय पूजा होइत छलन्हि, से दोसर समय पूजा करयवला बनि गेलाह ।
ई केना भ’ सकैत छैक ? एना कियैक हेबाक चाही ?
केवल एकटा परमात्मा छथि जे सृजन, पालन आर विनाश केर कारण बनैत छथि । वैह परमात्मा कतेको रूप सब मे प्रकट होइत छथि । कियैक ? सांसारिक अस्तित्व केँ रोचक आर सार्थक बनेबाक लेल । सब केँ एकटा रूढ़ प्रारूप (स्टीरियोटाइप) मे बनेबाक बदला, भगवान विभिन्नेन मानसिक क्षमता एवं दृष्टिकोण केर संग मनुष्य सब केँ बनौलनि । भगवान सम्बन्धित मानसिक प्रवृत्ति सभक अनुकूल विभिन्न रूप धारण करैत छथि, जाहि सँ कि प्रत्येक व्यक्ति अपना इच्छित देवता केर पूजा कय सकय आ नीक अन्त धरि पहुँचि सकय । तेँ सर्वोच्च परमात्मा विभिन्न देवता सभक रूप धारण करैत छथि ।
हर एक केँ अपन चुनल देवता पर अटूट विश्वास होयबाक चाही । ओकरा विश्वास होयबाक चाही जे ओकर देवता सर्वोच्च आर अन्तिम ईश्वर छथि आर हुनका सँ उपर किछुओ नहि भ’ सकैछ । तेँ प्रत्येक रूप मे, भगवान स्वयं केँ बाकी सब सँ श्रेष्ठ देखबैत छथि । बाकी देवता सब केँ कोनो विशेष पूजा करैत आर संघर्ष मे पराजित होइत देखायल गेल अछि । कि ई एहि बात केँ नहि बुझबैछ जे एकटा भगवान एक समय मे दोसरक पूजा करैत छथि आ दोसर समय मे सब हुनकर पूजा करैत अछि, एक समय मे ओ सब केँ हरा दैत छथि आ फेर हरेक सँ ओ स्वयं सेहो हारि जाइत छथि ?
शैव पुराण मात्र ओहेन कहानी सभक संग्रह थिक जाहि मे मात्र शिव टाक दबदबा देखायल गेल अछि । वैष्णव पुराण ओहेन घटना सभक संग्रह थिक जे दोसरक अधीन विष्णुक बड़ाइ करैत अछि । दोसर पुराण सब मे सेहो एहिना छैक ।
तेनाही, एकर मकसद कोनो खास देवताक बुराइ करब नहि छैक । एकर मकसद अपन पसिनक भगवान केर बड़ाई करब अछि जाहि सँ भक्तक ध्यान दोसर सब केँ छोड़िकय भगवानक ओहि स्वरूप या अवतार पर टिकि जाइक । एकरा “अनन्य भक्ति” कहैत छैक – यानी पूरा भक्ति । एकर मकसद कोनो खास देवताक बड़ाई करब आर ओहि देवताक प्रति भक्ति केँ बढ़ेनाय छैक, नहि कि दोसरा सब केँ नीक-बेजा कहब । एकरा “नहि निन्दा न्याय” कहैत छैक ।
जे लोक सारा सृष्टि केँ एक्के टा परमात्माक अलग-अलग रूप मानैत अछि, ओकरा “अनन्य भक्ति” केर जरूरत नहि छैक । एकटा भगवान सँ दोसर भगवान दिश जाय केर सवाल तखनहि उठि सकैछ जखन ई मानि लेल जाय जे एकटा भगवान दोसर सँ अलग छथि । अगर ई बुझि लेल जाय जे कतेको रूप एक्के गोट सत्ताक रूप थिक, तखन सबटा पुराण अलग-अलग रूप धारण कय केँ वैह सत्ताक लीला विनोद बनि जाइत अछि । अगर ई बुझि लेल जाय जे एक्के टा सत्ता कतेको तरह सँ काज करैत अछि, ताकि अलग-अलग मानसिक बनावट केर लोक संतुष्टि पाबि सकय, त नहि केवल ओहि मे देखायवला विरोधाभासक आनन्द उठायब सम्भव होयत, बल्कि ओकर भक्ति सेहो विकसित होयत ।
एकटा आरो कारण अछि, यानी लोकक वास्ते एकटा उदाहरण स्थापित करब । दुनिया मे पवित्रता बढ़ेबाक चाही । तेँ, देवी अम्बा केँ अपन उदाहरण सँ रास्ता देखेबाक चाही । तेँ, हालांकि ओ निर्विवाद रूप सँ महाशक्ति छथि, हुनका अपन पतिक सम्बन्ध मे एकटा अधीनस्थ भूमिका स्वीकार करय पड़तन्हि । दुनिया मे भक्ति पसारबाक चाही, जेकरा लेल भगवान केँ एकटा आदर्श (उदाहरण) कायम करबाक चाही । तेँ किछु कथा मे विष्णु भक्त बनि जाइत छथि आ शिव केर पूजा करैत छथि । किछु दोसर मामिला मे, शिव विष्णुक पूजा करैत छथि । तेँ, पुराण सब मे जे स्पष्ट विरोधाभास अछि, जाहि मे कखनहुँ एकटा देवताक प्रशंसा होइत अछि त कखनहुँ दोसर केर, तेकरा हम सब कोनो खास देवताक महानता बुझेबाक कोशिशक तौर पर लेबाक चाही जाहि सँ हमरा सब पूरे सहृदयता सँ हुनकर भक्ति कय सकब । कोनो खास भगवान केर जिकिर एना कयनाय जेना ओ कोनो छोट देवता होइथ, असल मे बुराइ या अपमान नहि थिक । एना एहि लेल कयल जाइछ जाहि सँ कि मुख्य प्रकाश (स्पॉटलाइट) दोसर पर पड़य तथा भक्त ओहि पहलू केँ मजबूती सँ पकड़ि सकय ।
एक्के छथि अनेक
एक्के टा परमात्मा अलग-अलग देवी-देवताक रूप मे प्रकट होइत छथि । हरेक भक्त भगवानक कोनो खास रूप सँ खास लगाव रखैत अछि । हर भक्त केँ एहि लगाव केँ आर मजबूत बनेबाक लेल, परमात्मा कहियो-कहियो कोनो खास गुण केँ दोसर सँ कम कय केँ कोनो खास बात पर बेसी जोर दैत छथि ।
पुरना जमाना मे, स्ट्रीट लाइटिंग लेल लालटेन केर प्रयोग होइत छल (यानी) शीशा केर पिंजरा मे लैम्प राखल जाइत छल । लालटेन चारि तरफ वला होइत छल, किछु तीन तरफवला सेहो होइत छल । चलू तीन तरफवला लालटेन केँ लैत छी । रोशनी तीनू तरफ सँ पसरैत छल । कहियो-कहियो सजावटक वास्ते तीनू शीशाक खिड़की सब केँ अलग-अलग रंग सँ रांगल जाइत छल । परिणामस्वरूप, हरेक खिड़की सँ देखायवला रोशनीक रंग खिड़कीक रंग जेहेन होइत छलैक । वैह परमात्मा बनबैत छथि, पालैत छथि आर मेटाबैत छथि । एकर असली कारण वैह चैतन्य (ज्ञान केर प्रकाश) थिक । ओ चैतन्य मानू तीन तरफवला लालटेनक अन्दर छथि ।
तीन रंग मे सँ एकटा लाल अछि । ओ सृजन (क्रिएशन) थिक । वर्णक्रमदर्शी (स्पेक्ट्रोस्कोप) मे, अगर लाल रंग केँ साफ रोशनी सँ अलग कय देल जाय, त बाकी छह गोट रंग सेहो अलग भ’ जायत । यैह सृजन थिक जेतय एकटा (परमात्मा) कतेको बनि जाइत छथि । ताहि द्वारे ब्रह्मा, जे बनबयवला छथि, हुनका लाल रंगक कहल जाइत छन्हि । लालटेन मे एकटा आर रंग नीला अछि । ई स्पेक्ट्रम केर आखिर केर रंग थिक, वायलेट (बैगनी) । शुरुआत लाल (इन्फ्रा-रेड) छी, आर आखिर मे वायलेट (अल्ट्रा-वायलेट) छी । जखन बनायल गेल दुनिया बनल रहैत अछि, त महाविष्णु ‘ज्ञान’ सँ बतबैत छथि जे ‘एहि दुनियाक असल मे कोनो वजूद (अस्तित्व) नहि अछि, नहिये एकर पूरा (टोटल) आ निरपेक्ष सत्ता (एबसौल्यूट एन्टिटी) जेहेन सन्देह कयल जेबाक चाही । ई एकटा भ्रम छी आर परमात्माक खेल छी’ । एहि समझ केर रोशनी मे, पूरा अनोखा दुनिया छाउर (राख, ऐश) मे बदलि जाइत अछि । ई ओ स्टेज छी जखन कोनो चीज जरि जाइत अछि मुदा छाउर आ छाउरक बचल हिस्सा एखनहुँ धरि अपन असली (मूल) आकार बनौने रखैत अछि, जाहि सँ मूल (असल) चीज होयबाक भ्रम होइत छैक । (चीजक अस्तित्व) होयबाक दिखावा बनल रहैत अछि आर असली रंग हेरा जाइत अछि । दुनिया तँ अछि लेकिन एकर एकटा खास बात, यानी असलियत केर देखेनाय जरिकय छाउर (राख) भ’ गेल अछि आर बाकी छाउरहि जेकाँ कारी भ’ गेल अछि । “सर्वं विष्णु मायां जगत” – सब किछु विष्णु छथि जिनका श्यामला या नीला रंग केर मानल गेल छन्हि – “नील-मेघ-श्यामला” कहल गेल छन्हि । नीला, काला, बैंगनी ई सबटा रंग एक-दोसरक करीब अछि । परमात्मा एहि तीन जरूरी काज केँ कराबक लेल तीन तरफ शीशावला लालटेन जेहेन रूप लेलनि अछि । जखन रोशनी नीला रंग सँ राँगल दिश सँ निकलैत अछि, त हम सब ओकरा ‘विष्णु’ कहैत छी ।
रंगीन लालटेन केर तेसर हिस्सा सादा, बिना रांगल गेल शीशा अछि । जखन सब किछु ज्ञान केर अग्नि मे जरि जाइत अछि, त पहिने ई कोयला या छाउर जेहेन कारी भ’ जाइत अछि । अगर ई आरो आइग मे राखल जाय, त ई पूर्णतया छाउर बनि जाइत अछि आर ढांचा टा रहि जाइत छैक । फेर ढांचा सेहो टुटि जाइत छैक आर अपन रूप पूरापूरी समाप्त कय लैत अछि । एहि चरण मे, असली कारी रंग पूरे उज्जर बनि जाइत छैक ।
उज्जर रंग साफ रोशनीक करीब होइछ । प्रकाश सँ उत्पन्न सबटा रंग यानि, परमात्मा सँ उत्पन्न सब अभूतपूर्व अस्तित्व, अपन पहिचान आर व्यक्तित्व पूरापूरी समाप्त कय चुकल रहैछ आर फेर सँ परमात्मा बनि गेल रहैछ । पृथक अस्तित्व, भ्रामक अस्तित्व, सब किछु समाप्त भ’ गेलैक अछि आर ई महा-भस्म परमेश्वर थिक । जखन संहारक नाम पर सब किछु नष्ट भ’ जाइत छैक, हालांकि ई एकटा क्रूर कार्य प्रतीत भ’ सकैत अछि, शिव विनाश पर नहि रुकैत छथि बल्कि दुनिया केँ एकर मूल केर संग फेर सँ मिलेबाक अत्यन्त दयालु कार्य कय रहल छथि । जखन विष्णु अपन क्रीड़ा (लीला) केर माध्यम सँ ज्ञान (अभूतपूर्व दुनिया पर) प्रकट कयलनि, तो ‘सर्वम्’ (सारा) ‘जगत’ (दुनिया) देखयवला केँ छाउर-कोयलाक टुकड़ा जेकाँ देखाय देलक । तेँ सर्वम् विष्णु मायां जगत केर अभिव्यक्ति अस्तित्व मे आयल । जखन सब क्रीड़ा समाप्त भ’ जाइत छैक आर संहार या विनाशक अवस्था पर पहुँचि जाइत अछि, परम ज्ञान या सर्वोच्च ज्ञानक परिणामस्वरूप, नहि त सर्व आ नहिये जगत केर कोनो अस्तित्व होइत छैक । एहि द्वारे हम सब ‘शिव-मयम्’ कहैत छी, सिर्फ शिव ।
वैह दीया – ‘ब्रह्म चैतन्यम’ या कॉस्मिक एंटिटी, जखन लाल शीशा सँ देखल जाइछ, त ओकरा ब्रह्मा (क्रिएटर) कहल जाइत छैक; नीला पैनल सँ ओ विष्णु थिक आर, बिना रंगवला पारदर्शी (ट्रांसपेरेंट) तेसर हिस्सा सँ, ओ चीज शिव थिक ।
ज्ञानी सब परमात्मा केर तारीफ “एक रूप जे तीन रूप मे देखाइत अछि” केर तौर पर कयलनि अछि । सब महान कवि लोकनि जे कोनो खास दर्शन (फिलॉसफी) या सिद्धान्त केर पक्का नहि रहथि तथा जिनकर दिमाग खुजल छलन्हि, संगहि नजरिया पैघ रहनि, ओ सब एहि बात पर एकमत रहथि जे वैह सत्ता (एंटीटी) तीन मुर्ति बनि गेल अछि ।
अंग्रेज सब सेहो जेहोवा, जोव या लॉर्ड केर जिकिर ओहि समझौताक भावना सँ करैत अछि । जेहोवा हिब्रू आर सेमिटिक कबीला केर भगवान रहथि जे बाइबल केर जन्मक समय इज़राइल मे रहैत छलथि । जोव हेलेनिक धर्म केर भगवान रहथि, जे ग्रीस आर ओकरा आस-पासक दोसर जगह पर मान्य रहथि । लॉर्ड ओ सामान्य नाम थिक जेकर उपयोग सब धर्म मे भगवान केँ बतेबाक लेल कयल जाइत अछि । ईसाई धर्म केर ईश्वर सेवक सब सेहो कहलनि अछि जे नाम भले कतबो हो, लेकिन ओ सब एक्के व्यक्ति केर लेल अछि ।
यदि पुराण सभक अध्ययन विनम्रता आर सम्मानक संग तथा ओहि सँ लाभ उठेबाक दृष्टि सँ कयल जाय त कोनो भ्रम नहि रहत । हमरा सब केँ ई बुझबाक बुद्धि हेबाक चाही जे एकरा मात्र हमरा सभक भलाइ केर वास्ते बनायल गेल अछि । आउ हम सब ई मानि ली जे पूर्ण सत्य सँ थोड़-बहुत विचलन सेहो नीके भावना (इरादा) सँ कयल गेल छैक ।
काव्य – कविता
यदि कोनो नीक काज पूरा करबाक अछि तँ ओकरा तीन तरीका सब मे सँ कोनो एकटाक अनुसार व्यवस्थित कयल जा सकैछ । एकटा अछि सरकार द्वारा कानून बनेबाक जेकाँ आदेश पारित कयनाय । एकरा “प्रभु सम्मिति” कहल जाइत छैक, जाहि मे मालिक नौकर केँ आदेश दैत अछि । एतय, चाहे ओ एकरा पसन्द करय या नहि करय, नौकर केँ आदेश केँ ईमानदारी सँ पालक करय पड़ैत छैक अन्यथा ओकरा दंडित कयल जेतैक । दोसर दिश, अधिकार केर स्थिति सँ बाजय आ आदेश दय के बजाय, एकटा मित्र हमरा सब केँ काज करय लेल कहि सकैत अछि जेकरा हम सब तुरन्त करैत छी । एतय (दंड केर) कोनो डर नहि अछि । एतय सद्भावना आ स्नेह अछि । हम सब ई अपना विश्वासक कारण करैत छी जे एकटा मित्रक रूप मे ओ हमर नीके करत । एहि तरहें एकटा नीक दिलवला दोस्त केँ “सु-हृत” कहल जाइत छैक । तहि हेतु, एकटा संगीक हैसियत सँ हमरा सब सँ कोनो नीक काज करय लेल कहनाय सुहृत्सम्मिति कहाइत अछि । लेकिन उपर बतायय गेल दुनू तरीका सँ बेसी आसानी सँ नतीजा पाबयवला होइत अछि पत्नी जेकाँ प्रेम करयवला लोकक कहब । अगर मालिकक हुक्म भारी हो, त दोस्तक मुँह सँ वैह बात हल्का भ’ जाइत अछि । लेकिन, प्रेमिका सँ ई आर बेसी हल्का भ’ जाइत अछि आर एकरा कान्ता सम्मिति कहैत छैक – कान्ता केर मतलब पत्नी होइत अछि ।
वेद प्रभु सम्मितम् अछि । पुराण सुहृत सम्मितम् अछि । काव्य (कविता) कान्ता सम्मितम् अछि, एहेन स्थापित कथ्य अछि ।
वेद सिर्फ़ कहैत अछि “एहि तरहें करू आ ओहि तरहें करू ।” ई कारण नहि बतबैत अछि जे कियैक ? पुराण कि कहैत अछि, “ठीक छैक, जँ अहाँ एहि तरहें करब, तँ ई सब फायदा अछि । अगर अहाँ एकरा दोसर तरीका सँ करब, तँ ई सब नुकसान होयत ।” ई हमरा लोकनि केँ एकटा कहानी सुनाकय कारण बतबैत अछि जे कोनो काज केँ बतायल गेल तरीका सँ करबाक अछि । पुराण सभक विशेषता केवल कारण बतेनाय नहि छैक । एकर उद्देश्य रोचक कथाक रूप मे सन्देश प्रस्तुत कय केँ हमरा लोकनिक ध्यान आकर्षित करब छैक ।
काव्य कि करैत अछि ? कवि कि करैत अछि ? ओ अपन रचनात्मक बुद्धि केँ तथ्यात्मक कहानी सभक संग मिलबैत अछि । ओ अपन कल्पना सँ कहानी सब बनबैत अछि । गोटेक मामिला सब केँ ओ बेर-बेर दोहराबैत अछि । ई ओकर काव्यात्मक स्वतंत्रता थिकैक । ओ साधारण तथ्य केँ दिखावटीपन सँ सजबैत अछि आर सभक प्रशंसा व सब केँ अपनेबाक लेल एकटा शानदार कथ्य गढ़ैत (पैटर्न बुनैत) अछि । कोनो मामिला केँ एकटा दोस्त जेकाँ सीधा तरीका सँ प्रस्तुत करबाक बदले, कवि एकटा नीक पत्नी जेकाँ व्यवहार करैत अछि । एकटा अड़ियल पति केँ मनेबाक लेल, ओ चुटकुला सुनबैत अछि, मनबैत अछि, खुश करैत अछि, विनती करैत अछि आर अपन बात मनबेबाक लेल सब किछु करैत अछि । कविता पत्नीक भूमिका निभबैत अछि । वेद गुरुक भूमिका निभबैत अछि आर एहि दुनूक बीच मित्रक भूमिका अछि, पुराण, ई सब हमरा लोकनिक मोन मे धर्मक संचार करैत अछि ।
हरिः हरः!!
THE UPAANGAS – PURAANAS – Veda’s Magnifying Glass
The Puraanas can be called the ‘magnifying glass’ of the Vedas, as they magnify small images into big images. The Vedic injunctions which are contained in the form pithy statements are magnified or elaborated in the form of stories or anecdotes in the Puraanas.
A brief exposition of an idea may not make a lasting or deep impression on the mind. It may, thus, leave no impact. On the other hand, if the same is presented as an interesting story or anecdote, it will stay in the mind. Let us take an example: The Vedas merely say “Satyam Vada” (सत्यं वद). Speak the truth. How adherence to truth leads to undying glory is narrated elaborately through many chapters in the story of King Harischandra. “Dharmam Chara” (धर्मं चर) – follow the path of Dharma or righteousness. What the Vedas have stated in two words is illustrated by the story of the Paandavas in Mahabharata. “Matru Devo Bhava”, “Pitru Devo Bhava” – Revere mother as divine. Revere father as divine. So says the Veda. This command of the Vedas seen through the magnifying glass becomes Ramayana. The Vedic injunctions such as restraint, patience, compassion, chastity and other dharmas are ably illustrated by men and women through their own lives. These are made known through Puraanas. As a result of reading or listening to their stories, we develop a deep involvement in the dharmas which they so admirably followed.
All of them, without exception, have had to undergo trials and untold sufferings. These exemplary characters have had to suffer much more than the common people who are, by nature, prone to tresspasses and transgressions. Sometimes, they are exposed to frightful sufferings. But, when reading their stories, it never enters one’s mind that, since the pursuit of Dharma involves suffering, why not Dharma be forsaken. What impresses us most is the sense of duty that is uppermost and in spite of odds their unswerving faith in the righteous path which brings immeasurable mental solace to them and to us too. On getting acquainted with their trials and tribulations our hearts melt in compassion and a feeling is created within us as though our doubts are dispelled and impurities are cleaned. Their ultimate success and fame leave a deep imprint of Dharma in our minds. This is what the Puraanic stories do.
Puraanas and History
It is generally said that there is no recorded history of events in our country. Puraanas are indeed history. But modern scholars do not accept anything as historical unless it happened after the advent of the Christian era. It is conceded half-heartedly that, on the basis of historical research, a small element of truth does exist in the Puraanas, but they attribute greater credence to those portions which support their pet theories and conclusions. Miraculous and supernatural are summarily dismissed as utter nonsense. Anything beyond the normal experience of the ordinary senses of the ordinary man is rejected as outside the realm of truth. Thus, the Puraanas which abound in ‘mystery’ are discredited as not being ‘history’.
We will be doing a great disservice to the children if we bypassed the Puraanas and, instead, made them read what has been written as history.
History contains no incidents to match the Puraanas, which not only appeal to the juvenile hearts but mould their character on ethical lines.
I do not say that history is to be avoided. Puraanas are also history and they must also be read because Puraanas are history with an ennobling purpose. One of the many reasons why history has to be read is that ‘history repeats itself’. Events have a knack of happening again and again. Therefore, we can foresee the future if we learn about the past. We can learn lessons from the past too.
History shows how a particular situation, if allowed to develop, may lead to war, disruption of society or destruction of civilisation. Thus, if a similar situation were to be found now, we can be forewarned and take precautions to avert the calamity. This is stated to be one of the benefits of history.
Although Puraanas are historical in content, they present only selected events in such a way as to educate the people in right and wrong and make them tread the path of righteousness. In fact, its selectivity is confined to those kings who reaped immense benefits in this very life on account of following the path of Dharma and, conversely, those kings who came to a bad end in this very life on account of their evil ways. Otherwise, it takes us to the next birth of the respective characters and shows how they enjoyed or suffered as a consequence of their deeds in their earlier lives. There is no Puraana which does not present to us the effect of good and evil of persons in their after life. The benefits said to accrue from a study of past history are (i) past experience may guide us to face present situations, (ii) the study of the lives of good persons who did good deeds and came to a good end may serve as an example to us, and (iii) the lives of bad men, who caused misery and destruction on a large scale but who at the end themselves suffered more than the suffering they caused, may act as a deterrent to our transgressions. But none of these benefits result from a study of modern historical treatises. Puraanas alone give such results.
There is no purpose in elaborating the wars fought or the reforms introduced by a successive line of kings without at all attempting to indicate the right or wrong of their actions. There is no use of a history which has nothing to teach us to lead a better life. The object of Puraanas, however, is to benefit the mind and mould man and society to lead better life.
The Puraanas deal exhaustively with the Kings of the Surya Vamsa and Chandra Vamsa. The line of succession is elaborately laid down. But those kings of no importance and from whose lives we have nothing much to learn (either to emulate or avoid) will be merely mentioned in passing in one or two lines. Those who would serve as examples for us to follow would be dealt with at great length and in detail. For example, Uttanapaada, the father of Dhruva and Dhruva’s son, who ruled after him, are referred to in Bhaagavata Puraana, but only in a sentence or two. But the life of Dhruva, which serves as an object lesson, rich in devotion, perseverance and steadfastness, is given a detailed narration.
The Englishmen who wrote Indian history dubbed the Puraanas as pure fiction. They built into it the race theory which suited their policy of ‘divide and rule’ as though it were the result of impartial research. If, in their view, the Puraanas contained fiction, in the modern view, (especially of independent India), Englishman’s version of Indian history is also considered to be untrue in parts. Efforts are under way to rewrite it more faithfully. Here again, the writers may have their own points of view or prejudices on so many incidents. Therefore, however much one may make it appear impartial, it cannot be ensured that the whole of the truth will get recorded, especially if they are already biased by the so-called research of western writers.
It is not also right to think that history is confined to empires, wars, invasions, dynasties, etc. All things have a history. Political history has, unfortunately, been given pride of place as history by western historians. On the other hand, the Puraana keeps Dharma (ethics) as the central theme and weaves a pattern, using not only the lives and deeds of great kings but illustrious men, rishis and even commoners. A study of the Puraanas reveals not only the state of government then existing but gives an insight into the then cultural life, arts and sciences. Their main theme of course is Dharma and metaphysics.
Are Puraanas true or fabricated?
‘No credence can be given to Puraanas, because it contains matters beyond the realm of known natural phenomena, is the modern view. That the Devas freely roamed the earth and granted boons to men is dismissed as fantasy because such things do not happen today. “A woman was cursed and she turned into stone, the stone was blessed and it turned back into a woman – the sun was reported in the press. I feel that, in recent times, such news items are on the increase. The Puraanas say that “Kaasyapa had a wife called Kadru. She begot serpents as children.” We are inclined to dismiss this as unnatural and unlikely and hence untrue. But many of the readers might have seen from a news item (in 1958). “A Marwari girl gave birth to a serpent.” When I saw it, another matter became clear to me.
Before I became a Sannyasi, I had heard of a family in which none of the girls either born into that family or who came to that family by marriage, would use the “Kevra” (called Taazhampoo in Tamil). When asked why, they narrated a story.
“Ten or fifteen generations ago, a girl in our family gave birth to what turn out to be a snake instead of an infant. They were ashamed to disclose this and hence secretly nurtured the reptile baby. They fed milk to it like a human infant. It is said it grew up happily, playing about the house without causing any harm to anyone. But this strange child could not be taken out of the house, visiting. The mother therefore did not go out of the house unless it was absolutely unavoidable. An old Tamil proverb says, “Even if a stone, a husband is a husband.”, meaning that the relationship is unsullied by mere appearance. Likewise, the motherly love for the serpent remained in full measure. So the mother never left her home. But came a time when she had to go out to attend a near relative’s marriage. There was an old woman in the house. It is not now known if she was the grandmother of the serpent child. In those days, the good custom prevailed of supporting helpless individuals even if they were distant relatives. It is only recently that, on marriage, the sons do not wish to live with their parents but like to stay separately by themselves. Formerly the normal position was that of undivided families – joint families. There was room in it for a distant widowed aunt or once or twice removed cousin of the grandfather. Thus, there was an old woman in the house about whom we are now talking. Her eye sight was very bad. The serpent child was left in the custody of this blind old lady when the mother went out of station unavoidably. What is that the snake wants in the shape of attention? Not giving it a bath, plaiting its hair or dressing up. None of these. It had to be fed milk at regular intervals. Therefore, the mother told the old lady, “You pour boiled milk at the temperature which the finger can stand into the hole of the grinding stone which can be easily identified by touch. The child will drink it by itself when it is feeding time”. With these instructions the mother left home. It would seem that the serpent has been trained to feed so The old lady followed these instructions. And the serpent also came and took its feed as the mother said it would. Once after a few days, this routine got disturbed. The serpent which got into the hole in the grinding stone, found it empty. Perhaps the old lady had overslept. The serpent was tame by temperament and, after waiting for some time, it also curled itself into sleep inside the hole. The old lady came later to the grind-stone with fairly hot boiled milk. She did not know that the snake-child was sleeping. She poured the milk into the hole, a little careless, without checking how hot it was. The boiling milk was all over the poor snake. It died. The mother of the snake who was in another village at that time had a dream. The snake child appeared in her dream and said, ‘I am dead. You go home and cremate my body in the midst of ‘Kevra bushes. In future, girls of your family whether born in it or come into it by marriage, should not wear the flower in their hair’. From that time onwards, no one in our family uses the flower.”
I also used to wonder at this story whether it could have really happened.
Then, many years later, some members of that family came to see me not to tell me more about the story of the serpent but to give me a copperplate inscription in which they knew my great interest. It was a royal gift deed inscribed on copperplate. It belonged to the time of king Achuta Deva Raaya. It disclosed the fact that a certain brahmin gave gifts to 108 other brahmins. All this he did for the sake of the king.
Let me tell you why and what for, he did this. Since a brahmin was required to spend all his time in reciting the Vedas and performing the Vedic injunctions, he was precluded from accepting any employment for profit. But then his household had to be run.
That is why the Saastras permit him to accept gifts or donations. Kings and nobles thus rewarded and patronised them. Because they were permitted to accept gifts, it need not be construed that they accepted indiscriminately or without end. They had a lot of self-respect and accepted gifts only when required and only to the extent required. They accepted gifts only if a king was of righteous conduct and good reputation.
Nay, some went even further back. The king’s ancestry should have been blameless. The kings did not have to face the unceasing demands from such brahmins. Their woe was that the brahmins did not come forward sufficiently to accept their gifts and, as a result, the punya or credit accruing from donating to worthy causes was denied to them. To overcome such situations, the kings and nobles appeared to have adopted a ruse. They would somehow coax a brahmin in more than ordinary straitened circumstances to accept their gifts. Sometimes, the gifts were as large as a whole village. But it was not meant solely for one individual’s benefit. The donors hoped that their gift would reach other brahmins through the single recipient. Thus, a single individual would receive the gift in his name, but he would keep only a small part for himself and gift away the remainder to other brahmins. Since one brahmin receives from another, technically the transaction does not fall in the category of Prathigraha dosha the odium of receiving alms. Thus the object of the kingly or royal donor would be met.
The question arises whether the intermediary who comes between the prime donors and the ultimate beneficiaries, does not get sullied. Of course, there is nothing wrong in the lords and kings resorting to this ruse with the object of patronising the learned. Vedic brahmins. But what about the intermediary who was a part of this trick? Well, no blame can also be attached to him. By law, the donated gift, becomes his own property. The gift deed is made out in his name. Since he does not claim ownership rights on most of it but gives it away to others, he absolves himself of blame. No sin can be attached to giving away one’s own property.
In the copperplate, I referred to earlier a brahmin had thus received a gift which in turn he distributed to 108 others. The names of these 108, together with the stage up to which they had studied a Veda and the quantum of land given, were all recorded in the plate.
Amongst the recipients is the name of one belonging to the family in which the snake-child was born. Little is known of the remaining families of recipients. The copperplate I received had been preserved through generations.
What is noteworthy is that the name which was mentioned in the copperplate was ‘Naageswara’. The name of the person who brought the plate to me now is also Naageswara. On enquiry it transpired that the name Naageswara was given to a child in each generation. We were then able easily to deduce that the name is connected with the story of the snake-child. (Naaga in Sanskrit is snake). In addition, in support of the story, there is evidence to show that, even during the days of Achuta Deva Raaya, there was a family bearing this name.
This gave a firm reply to my earlier doubt whether such a thing could have really happened. And, when in 1958, I saw the news item that a woman delivered a snake, my doubts were further allayed and credulity took over.
It is not quite right that I should find fault with you all for lacking faith in the veracity of the Puraanas. I was myself prepared to accept the news item and the reservations in accepting the traditional story as narrated to me were removed by the news item. This is the stage to which we have come if an item appears in the press, however improbable it may seem, we are prone to accept it as true. But the very mention of Puraana makes us disdainful. “They had plenty of leisure palm leaves and stylograph. They turned out tomes containing fables. Some of it is unquestionably clever but the rest is poppycock” this is the general opinion.
Although imaginative, they have a message
It is possible that the Puraanas may have resorted to a little fiction here and there. It might have come as an interpolation. But who can say which is totally fictitious, which is interpolation and which the truth? If each one discounted what in his view is an interpolation, there would be very little left as all the stories would disappear. Nothing may remain as the basic story. Therefore, although it may seem that there are some shortcomings and faults, it is our duty to preserve the Puraanas in the same state in which they are available to us.
Let there be some fictitious accounts. After all, the Puraana takes us nearer to God and brings peace of mind, is it not? We go shopping and are able to buy good sugar. Do we rejoice in having been lucky to have got good sugar or do we feel disgruntled because the goods in the shop were not well exhibited or the shopkeeper was hard of hearing? In the descriptions of geography and astronomy, description of time as in Manvantaras, let there be a fault or two. There is modern geography, astronomy and history which can correct any inexactitudes. But the Puraanas serve a purpose which geography, astronomy or history cannot provide – viz. of successfully imparting education on Paramaatma Tatva, Bhakti and Dharma.
“Rama could not have lived in Treta Yuga, so many hundreds of thousands of years ago. The culture and civlisation portrayed in the Ramayana could not have existed then” are some of the criticisms which assail our ears. Let us assume that Rama did not live in Treta Yuga. Similarly, let us, for the sake of argument, accept that the stories said to have happened earlier in the Krita Yuga did not actually take place. Let us assume that all these happened, say, during the last seven or eight thousand years. On this score, does the merit of Rama’s story get any the less? Does it in any way minimise the lessons we learn therefrom? Just as it is said that the age factor of the Puraanas is difficult to believe, there is a counter opinion that it is wrong to question their propriety.
The Saastras say that, 5000 years ago, when Kaliyuga started Vyasa gave us the Puraanas. But there were Puraanas before his time. In Chaandogya Upanishad, where Naarada mentions a list of Vidyas learnt by him, he mentions Puraana as one of them.
Therefore, it is clear that, even at the time of the Vedas and Upanishads, the Puraanas existed. It would appear that, just as Vyasa separated the Vedas into many Saakhas because the later generations had not the capacity to get all of them by heart, he also rewrote the Puraanas succinctly.
Nevertheless, western scholars do not accept the Puraanas to be so ancient. Let it be so.
The most glaring example of modern superstition, where belief almost becomes a certainty, stems from the results of ‘research’. But the results of research are all not that correct. They get outdated and disproved with the passage of time. But, even if research was infallible and Puraanas are fictitious, the Puraanas stress that the righteous are rewarded with a happy life and the unrighteous suffer – even the unrighteous receive God’s pardon and grace. Since this impression is firmly established in the reader’s mind, it means that they fulfil their purpose in its entirety.
The treasure that Vyasa left
The same Vyasa who rearranged the Vedas (into Veda Saakhas) so that people could understand them more easily, was responsible for giving us the eighteen Puraanas. I used to think that Vyasa was the first journalist and the foremost example for modern journalism. Fables, history, geography, philosophy, he has created treasured treatises on all these in a simple and interesting manner so that they may not only appeal to the intelligent but also to the common man. Is it not the same job that journalists do? But the latter stop with creating and producing human interest and sensationalism. But Vyasa’s objective, however, was to educate the common man in the path of righteousness and he used the human interest merely as a means to it. If human interest alone were regarded as the goal of journalism, it would result in the propagation of unethical and unrighteous matters also. If Vyasa were kept as the ideal, the press would be cleaner. This will have a salutary effect on the public.
These eighteen Puranas add up to four hundred thousand granthas. A grantha is a sloka with thirty-two syllables. Of these, nearly one fourth or a hundred thousand slokas are taken by Skanda Puraana (स्कान्द पुराण). I imagine it is perhaps the biggest single book in the world. The balance of the seventeen Puranas contain three hundred thousand granthas. In addition, Vyasa has produced the epic “Mahabhaarata” which contains a hundred thousand granthas or verses.
Each Puraana keeps a single deity as its main theme. The Puraanaas are broadly classifiable into three categories those which are prone to the (1) Vaishnava cult, (2) the Siva cult, and the (3) Sakti cult, thus covering a large number and variety of deities.
The eighteen Puranas are: (1) Brahma Puraana, (2) Padma Puraana, (3) Vishnu Puraana, (4) Siva Puraana, (5) Srimad Bhaagavata, (6) Naarada Puraana, (7) Maarkandeya Puraana, (8) Agni Puraana, (9) Bhavishyat Puraana, (10) Brahma Vaivartha Puraana, (11) Linga Puraana, (12) Varaaha Puraana, (13) Skanda Maha Puraana, (14) Vaamana Puraana, (15) Koorma Puraana, (16) Matsya Puraana, (17) Garuda Puraana, and (18) Brahmaanda Puraana.
Of these eighteen, ten are said to be Saivite. Many of the anecdotes and fables now known to us are contained in these. History, fable, philosophy are all contained in these.
Adi Sankara has cited many examples from the Vishnu Puraana in his commentary on Vishnu Sahasranaama. This Puraana’s author was Sage Paraasara, father of Vyaasa Maharshi. In Sri Ramanuja’s Siddhaanta viz. Visishtaadvaita or qualified non-dual-ism Vishnu Puraana figures as the chief authority.
Before Ramanuja’s time, one of the pillars of the Visishtaadvaitha doctrine was one Aalavandaar. Before Ramanuja could reach him, the former died. Aalavandaar had wished to entrust three jobs to Ramanuja. It is said that, as a result, after his death. three fingers of his hand were found bent and closed. When Ramanuja correctly guessed his master’s intentions and announced them each in turn, each of the dead man’s fingers are said to have straightened out.
Of the three unspoken commandments, one was to write a commentary on Brahma Sutra as per the Visishtaadvaita doctrine. The second was to cause a commentary to be written on Thiruvoymozhi – the Sooktis of the Alwars in Tamil. The third was to firmly establish and spread the fame of Vyaasa and Paraasara. Paraasara was given this pride of place because he was the author of Vishnu Puraana. Keeping this in mind, Ramanuja named the two sons of his chief disciple Koorathaalvaan as Paraasara Bhatta and Vyaasa Bhatta. Later Paraasara Bhatta became one of the important Vaishnavite Acharyas.
Although Sage Paraasara wrote the Vishnu Puraana, it was Vyaasa who edited and presented the eighteen Puraanas in the form in which we now find them. I had already mentioned that he also arranged and codified the Vedas and wrote the Puraanas in order that the Vedic injunctions may take firm root in men’s minds.
There is another reason given as to why he wrote the Puraanas. Only certain people are authorised to study and recite the Vedas, not all. It is said he wrote the Puraanas in order that the rank and file may come to know of the Vedic philosophy and injunctions.
If Vyaasa’s father Paraasara was responsible for bringing out the original text of Vishnu Purana, Vyaasa’s Srimad Bhaagavata was narrated by his son Sukaacharya to King Pareekshit.
When one talks of Bhaagavata, there is some difference of opinion as to whether it refers to the text which keeps the story of Lord Krishna as the main theme but also mentions the other incarnations and stories of Vishnu, or it refers to Devi Bhaagavata which deals with the ‘Lila’ or the sportive activities of Goddess Amba. We, of course, like both of them. These two are indeed exalted texts. In support of their respective doctrines (Siddhaanta) Chaitanya, Nimbarka, Vallabhaachaarya and others have assigned the same status to the Vishnu Bhaagavata as to the Vedas themselves. At the same time, the Advaitins, who oppose these doctrines, also accept this (Vishnu Bhaagavata) and extol it sky high.
Siva Puraana is different from Skanda Puraana. In the Skanda, three-fourths of it is devoted to incidents and anecdotes and philosophies about Siva. Only a quarter of it is devoted to Skanda. Nevertheless, it is called Skanda Puraana, because it also contains all matters regarding Skanda.
“Durga Saptha Sati” story of Durga appears in the Maarkandeya Puraana. “Shaanti Homa”, “Sata Chandi”, “Sahasra Chandi” – these rites are performed by using the 700 mantras in this Puraana. Here, each mantra is contained in one sloka. Hence each ‘Homa’ or offering is made by reciting one sloka.
Bhavishya means the future. The Bhavishyat Puraana contains many matters including an account of the mischief that we see in the present Kali Yuga. This Puraana not only mentions kings of the old Maurya dynasty but also the more recent arrival of the Europeans. Even so, present-day intelligentsia lightly dismiss the Puraana as never having been written by Vyaasa at the beginning of Kali Yuga but by someone else in recent times who had used Vyaasa’s name. There might be some interpolations, but the whole thing cannot be regarded as of recent origin and discredited. Those with occult powers, can see beyond time. They can also come to know of happenings in another part of the globe. It is no easy matter for books to be written by all and sundry with any hope of making them acceptable even by ascribing their authorship to great men.
Garuda Puraana deals mostly with the world after death (Pitru Loka) and the rites to be performed for the departed soul. Hence, during “Sraddha” or death anniversary ceremonies, it is customary to read this Puraana.
“Lalitopaakhyaana” (Story of Lalita) and “Lalita Sahasranaama” are contained in the Brahmaanda Puraana. The votaries of Devi worship take pride in the fact that, at the conclusion of reading all the eighteen puraanas, the last to be read is this Puraana in which appears the coronation of Raja-Rajeshwari. The Ashtotharanaama’, ‘Sahasranaama’ and ‘Kavacha’ which one now recites on every deity, are all taken out of the several Puraanas. Vishnu Sahasranaama and Siva Sahasranaama are, however, from the Mahaabharata.
Many stotras or hymns in use, are all taken from the Puraanas. “Aditya Hridayam” however, appears in Srimad Ramayana. The Pradosha Stotra is contained in the Skanda Purana. And so on.
Upa Puranas and small Puranas
In addition to the eighteen Puraanas, there are also eighteen ‘Upa’ Puraanas or auxiliary Puraanas. Vinaayaka Puraana and Kalki Puraana are among the Upa Puraanas. Although they are said to be mainly eighteen in number, in actual fact, many more exist.
Description of the glories of the months of the year, e.g., Tulaa Puraana, Naaga Puraana, Vaisaaka Puraana are all from the eighteen main and Upa Puraanas. Every holy place has what is called a ‘Sthala’ Puraana. These also figure in the Puraanas as stated above. There are also independent texts.
Itihasa Puraana – Distinctions
The Ramayana and Mahaabharatha have been serving as the two eyes of both the learned and lay men from time immemorial and showing them the path of righteousness. These two are not included in the list of Puraanas, but have been honoured with a separate classification viz. “Itihaasa”.
‘Pura’ means in the past. Those that narrate things of the past are Puraanas. Of course they also deal with predictions as to the future.
Puraanas can be considered not only as narrating the past incidents but also to mean ‘having their origin in the distant past. In the distant past, literature was confined to poetry and drama.
Narration of stories in prose came much later. It was named as a ‘novel’, meaning new. As it did not have the form of poetry or drama and as it came much later, it was called ‘Novel’.
By definition, a Puraana has to fulfil five requirements in the matter of what it should contain, called ‘Pancha Lakshana’ or distinguishing marks. They are: (1) Sarga (ie.) original creation of the world; (2) Prathisarga (how, after creation, the world grew with time); (3) Vamsa ie. genealogy, how the descendants came from one generation to the next; (4) Manvantara (the history of the fourteen Manus from whom all mankind descended, covering a period of one thousand 4-Yuga cycles) and (5) Vamsaanucharita (i.e. the history of the rulers of the country, dynastic details like Surya Vamsa and Chandra Vamsa). In addition, it should also contain a description of this world in space. Here, Puraana acts not only as history but as geography too.
Itihaasa is Iti-Ha-Asam. (इतिहासम्). ‘Iti-ha-asam’ means ‘it happened thus’. The ‘Ha’ in the middle denotes truly, verily, surely. Thus Itihaasa is a record of facts without any admixture of conjectural matters. It happened at the time it was written – or it was written at the same time as it happened. Valmiki wrote the Ramayana when Rama was living. With the five Paandavas, Vyasa actually witnessed the various incidents narrated in the Mahaabharata.
Although true to the name as Puraana, he wrote about incidents long past, he must have recalled the incidents as they actually took place through his mystic powers. Nevertheless, the veracity of the incidents could not have been verified by his contemporaries, those who lived in his time. But Raamaayana and Mahaabharata do not belong to this category. Even when they were first brought out, those who then lived were acquainted with the various characters portrayed and the incidents narrated in these epics. That is why, to totally dispel our doubts as to their veracity, they are called Itihaasas, the ‘ha’ standing for emphasis.
The glory of Itihaasas
If the Puraanas are regarded as the Upaangas of the Vedas, the Itihaasas are deemed to be as exalted as the Vedas themselves.
Mahaabharata is called the ‘Panchamo Veda, the fifth Veda. As regards Ramayana, it is said that when the Purusha who can be known only by the Vedas took birth as Dasaratha’s son, the Vedas also appeared as Valmikis’ child in the form of Ramayana.
The stories of Ramayana and Mahabharata can be said to be in the blood stream of the people of our country
Every big Puraana will contain many stories long as well as short. Each story will emphasise a particular aspect of Dharma. Itihaasa, on the other hand, is one continuous story from beginn-ing to end. Although there may appear some interludes or other thematic presentations in the epic, they will revolve around the central theme. If the Puraanas deal with each Dharma through the medium of a separate story, the Itihaasa illustrates all the Dharmas through one main story. For example, adherence to Truth as a Dharma is illustrated in the Harischandhra Puraana as a separate story. The story of Nalaayini highlights greatness of chastity in women. The story of Ranti Deva teaches the ennobling aspect of extreme sacrifice and compassion. The Itihaasas revolving around the lives of Rama and the five Paandavas, however, show us how they followed all the various traits of Dharma under trying condi-tions and upheld Dharma and the rule of Dharma.
Why the difference between Gods
When I mentioned that each Puraana glorifies one particular deity, some doubts may arise. In Saiva Puraanas, it would be stated : “Siva is the Paramaatma Tatva (परमात्म तत्व)” or Supreme Being. He is the controller of creation, maintenance and annihilation. Vishnu takes orders from Him and performs his functions. Vishnu enjoys pleasures – Bhogi – who is caught in the net of illusion of Maaya. Siva alone is the ascetic Yogi. He is the embodiment of pure knowledge – Jnaana Swaroopi. Vishnu is subordinate to Siva.
Vishnu worships Siva. There are incidents to illustrate that Vishnu defied Siva and even fought with him but ultimately he was defeated and suffered humiliation and so on. If one were to read the Vaishnava Puraanas, the version will be just the opposite and many incidents will be found in support of Siva’s subservience to and defeat at the hands of Vishnu. “How can Siva who consorts with spirits and demons and resides in the cremation ground claim to be the supreme God? He is obviously the servant of the king of kings Lord of Vaikunta” so runs the Vaishnava version.
This dispute is not confined to the greatness or superiority of Siva and Vishnu. Every Puraana will extol a particular deity. This deity will be described as the one and only highest immanent God and all other deities will be given lesser importance. It will be said that all others pay homage to that particular God (of the particular Puraana) and when they revolted, they were put down and suffered humiliation, and so on and so forth.
Looking at this, one wonders at such conflicting reports and may get confused. Which is true and which is not? Obviously all of them cannot be true. If Siva is said to worship Vishnu, the converse is absurd and just cannot be. If the Goddess Amba is superior to all three moortis or Trinity of Brahma-Vishnu-Siva, it would be wrong to treat her as Siva’s consort, who, as a dutiful wife, subordinates herself to her husband. Therefore, all the Puraanas cannot be true or authentic. So which is correct? Or is it that all of them are false? Such are the doubts that assail us.
Although logically all these conflicts cannot be taken as true, in fact, they are so. A God gets defeated at one time, and comes out victorious at another time. One who was worshipped at one time, became the worshipper at another time.
How can this be? Why should it be so?
There is only one Paramaatma who causes creation, maintenance and destruction. The same Paramaatma manifests in many forms. Why? In order to make mundane existence interesting and worthwhile. Instead of creating all in a stereotype, God has made men with different mental capacities and attitudes. God assumes various forms congenial to the respective mental predilections, in order that each may worship a desired deity and come to a good end. That is why the Supreme Paramaatma takes many forms as different deities.
Each one should have an unshakeable faith in his chosen deity. They should be convinced that his deity is the supreme and ultimate Godhead and nothing can be above it. That is why in each manifestation, God shows himself as superior to the rest. The others are shown as worshipping the particular one and getting defeated in a conflict.
Does this not reconcile the inconsistency of one God worshipping the others at one time and getting worshipped by all others some other time, of defeating all others at one time and getting defeated by each one of all too?
The Saiva Puraanas are merely a collection of those stories where Siva’s supremacy alone is shown. The Vaishnava Puraanas would be a compilation of incidents which glorify Vishnu to the subordination of others. So also in the other Puraanas.
Thus, the intention is not to run down any particular deity. The object is to glorify the God of one’s choice so that the devotee’s attention may converge on that aspect or manifestation of God to the exclusion of others. This is called “Ananya Bhakti” (अनन्य भक्ति) – undivided devotion. The aim is to glorify a particular deity and heighten the devotion to that deity and not to vilify the others. This is termed “Nahi Nindaa Nyaya”:
For those who regard all creation as varying manifestations of a single Paramaatma, there is no need to have “Ananya Bhakti”. The question of turning from one God to another can arise only if it is conceded that one God is different from another. If it is understood that the many forms are the manifestations of a single Entity, all the Puraanas become the sporting activities (Leela Vinoda) of that Entity assuming different diverting forms. If it is understood that a single entity play-acts as many, so that people with varying mental make-up could find satisfaction, then it would be possible not only to enjoy the apparent contradiction in them but also develop their devotion.
There is another reason too, i.e. setting an example to people. Chastity should thrive in the world. Therefore, the Goddess Amba must show the way by her own example. Therefore, although she is undisputedly the super Sakti, she has to accept a subordinate role in relation to her husband. Devotion should spread in the world for which the Lord should set an example. That is why in some stories Vishnu becomes the devotee and worships Siva. In some other cases, Siva worships Vishnu. Therefore, the apparent contradiction in the Puraanas, which contain stories now extolling one deity and now another should be taken as an attempt to impress on us the greatness of a particular deity so that we can whole-heartedly direct our devotion towards it. Reference to a particular God as though it were a minor deity is in fact not meant as a criticism or insult at all. It is done so that the spotlight may fall on the other one and the devotees may take a firm hold of that aspect.
One as Many
The same Paramaatma manifests as different deities. Each devotee develops a particular attachment to a particular form of God. In order to strengthen such attachment of each devotee, the Paramaatma subordinates a particular quality at some time in preference to another and emphasises a particular aspect.
In olden days, lanterns were used for street lighting (i.e.) lamps were placed inside glass cages. The lanterns were four-sided, some were three-sided also. Let us take the three-sided lantern. The light used to be dispersed from all the three sides. Sometimes decoratively the three glass windows used to be painted each in a different colour. As a result the light seen through each window would have the respective colour of the window. The same Paramaatma creates, sustains and annihilates. The root cause is the same Chaitanya (Light of Knowledge). That Chaitanya is inside the three-sided lantern, as it were.
Of the three colours, one is red. That is creation. In a spectroscope, if red is separated from clear light, the remaining six colours will also get separated. This is creation where one becomes many. That is why Brahma, the creator, is said to be red in colour. Another colour in the lantern is blue. It is the colour at the end of the spectrum, violet. The beginning is red (infra-red), the end is violet (ultra-violet). When the created world is being sustained, Mahavishnu indicates through ‘Knowledge’ that ‘this world has no existence in reality, nor is it to be confused with the total and absolute Entity. It is an illusion and the sport of Paramaatma’. In the effulgence of that understanding, the whole of the phenomenal world is reduced to cinder. This is the stage when an object is burnt out but the residue of ash and cinder still retains the original shape, giving the illusion of the existence of the original object. The appearance of existence remains and the original colour is lost. The world does exist but its peculiar property, namely, the appearance of reality is burnt out and it has become black, like the rest of the cinder. “Sarvam Vishnu Mayam Jagat” – all is Vishnu who is described as dark (Shyaamala) or bluish in colour – Neela-megha-shyaamala. Blue, black, violet are all colours which are close to each other. The Paramaatma has assumed a form like the three-sided lantern in order to perform these three important functions. When the light comes out of the side painted blue, we call it ‘Vishnu’
The third side of the coloured lantern, is plain unpainted glass. When everything is burnt out in the fire of knowledge, first it becomes coal, or cinder-black in colour. If it is further exposed to fire, it is reduced to ashes and the skeleton remains. Then the skeleton also crumbles and loses its form altogether. At this stage. the original black colour becomes all white.
White is close to clear light. All the colours that originated from light i.e., all phenomenal existence which sprung from the Paramaatma, had totally lost their identity and individuality and had become Paramaatma again. Separate existence, illusory existence, are all liquidated and it is this which is Mahaa-Bhasma the Parameswara. When everything is annihilated in the name of Samhaara, although it might appear to be a cruel deed, Siva does not stop at destruction but is performing the very merciful act of reuniting the world with its origin. When Vishnu through his sport brought knowledge to bear (on the phenomenal world), the ‘Sarvam’ (all of) ‘Jagat’ (the world) appeared like a piece of cinder to the onlooker. That is why the expression Sarvam Vishnu Mayam Jagat came into being. When all the sport is over and the stage of Samhaara or annihilation is reached, as a result of Parama Jnaana or Supreme knowledge, neither Sarvam nor Jagat has any existence. That is why we say ‘Siva-Mayam’ Nothing but Siva.
The same lamp – ‘Brahma Chaitanyam’ or Cosmic Entity, when it is seen through red glass, it is called Brahma (the creator); through the blue panel it is Vishnu and, through the colourless transparent third side, the same thing is Siva.
The seers have extolled Paramaatma as “one form appearing as three forms”. All great poets who were not committed to any particular philosophy of doctrine and who had an open mind and a broad outlook have been unanimous in saying that the same Entity has become the three Moortis.
The English men also refer to Jehovah, Jove or Lord in the same spirit of compromise. Jehovah was the God of the Hebrew and semitic tribes which lived in Israel when the Bible was born. Jove was the God of the Hellenic faith, prevailing in Greece and other places around it. Lord is the general name used by all faiths to denote God. Servants of God of the Christian faith have also averred that although the names may be many they refer to the same person.
If the Puraanas are studied with humility and respect and with a view to benefit from them, no confusion will arise. Let us have the wisdom to regard them as having been solely made to bring good to us. Let us take it that even the slight deviation from the absolute truth has been made with good intentions.
Kaavya – Poetry
If a good thing has to be accomplished it can be arranged in one of three ways. One is to pass an order like Government making a law. This is called “Prabhu Sammiti”, the master ordering a servant. Here, whether he likes it or not, the servant has to carry out the order faithfully as otherwise he will be punished. On the other hand, instead of speaking from a position of authority and giving an order, a friend may ask us to do a job which we do promptly. Here there is no fear (of punishment). There is good. will and affection. We do it because of our faith that as a friend he would only do us good. Thus a good-hearted friend is called “Su-Hrit. Therefore, to ask us to do a good thing from the position of a companion is called Suhritsammiti. But what will accomplish the result more easily than either of the above is the request of a loving person like the wife. If the master’s order is heavy, the same thing through a friends’ mouth becomes light. But, from the beloved it becomes lighter still and is called Kaantaa Sammiti – Kaantaa meaning wife.
Vedas are Prabhu Sammitam. Puraanas are Suhrit Sammitam. Kaavya (poetry) is Kaantaa Sammitam such is the legend.
Veda merely says “do this way and that way. It does not say the reason why? What do the Puraanas say. “Well, if you do this way, this is the benefit. If you do it the other way, this will be the harm.” It gives us the reason why a thing has to be done in the prescribed way, through recounting a story. The characteristic of the Puraanas is not merely to give reasons. Its purpose is to attract our attention by presenting the message in the form of interesting stories.
What does poetry (Kaavya) do? What does the poet do? He mixes his creative intelligence with factual stories. He creates stories out of his imagination. Some matters, he repeats again and again. This is his poetic licence. He decks the simple fact with frippery and weaves a glittering pattern for all to admire and adopt. Instead of presenting the matter in a straightforward way like a friend. the poet behaves like a good wife. In order to bring round a recalcitrant husband, she quips, cajoles, humours, entreats and does everything to gain her point with him. Poetry plays the role of the wife. Vedas the role of the master and, in between, is the role of the friend, Puraanas, all of them inculcating Dharma into our minds.
Harih Harah!!
वेद का उपांग “पुराण” – वेद का आवर्धक काँच (मैग्नीफाइंग ग्लास)
पुराणों को वेदों का ‘आवर्धक काँच’ (‘मैग्नीफाइंग ग्लास’) कहा जा सकता है, क्योंकि वे छोटी तस्वीरों को बड़ा करके बड़ी तस्वीरें बनाते हैं । वैदिक आदेश (निर्देश) जो सारगर्भित बातों के रूप में होते हैं, उन्हें पुराणों में कहानियों या किस्सों के रूप में बड़ा या विस्तार से बताया गया है ।
किसी विचार की छोटी सी व्याख्या मन पर स्थायी या गहरा असर नहीं डाल सकती है । इसलिए, इसका कोई असर नहीं हो सकता है । दूसरी ओर, अगर इसे एक दिलचस्प कहानी या किस्से के रूप में पेश किया जाए, तो यह मन में रहेगा । आइए एक उदाहरण लेते हैं: वेद केवल “सत्यं वद” कहते हैं । सच बोलो । सत्य पर चलने से कैसे अमर महिमा मिलती है, यह राजा हरिश्चंद्र की कहानी के कई अध्यायों में विस्तार से बताया गया है । “धर्मं चर” – धर्म या नेकी के रास्ते पर चलो । वेदों ने जो दो शब्दों में कहा है, वह महाभारत में पांडवों की कहानी से पता चलता है । “मातृ देवो भव”, “पितृ देवो भव” – माँ को भगवान जैसा मानो । पिता को भगवान जैसा मानो । वेद ऐसा कहता है । वेदों का यह आदेश जब मैग्नीफाइंग ग्लास से देखा जाता है, तो रामायण बन जाता है । वैदिक आदेश जैसे संयम, धैर्य, दया, पवित्रता तथा और भी धर्मों को पुरुषों व महिलाओं ने अपने जीवन के ज़रिए अच्छे से दिखाया है । इन्हें पुराणों के ज़रिए बताया गया है । उनकी कहानियाँ पढ़ने या सुनने के नतीजे में, हम उन धर्मों में गहराई से जुड़ जाते हैं जिनका उन्होंने इतने अच्छे से पालन किया ।
उन सभी को, बिना किसी अपवाद के, मुश्किलों और अनगिनत दुःखों से गुज़रना पड़ा है । इन अच्छे किरदारों को उन आम लोगों, जो स्वभाव से ही गलत काम करनेवाले होते हैं, उनकी तुलना में कहीं ज़्यादा दुःख सहना पड़ा है । कभी-कभी, उन्हें बहुत ज़्यादा दुख भी सहना पड़ता है । लेकिन, उनकी कहानियों को पढ़ते समय, यह कभी किसी के मन में नहीं आता कि, जब धर्म के अनुसरण में कष्ट शामिल है, तो धर्म को त्याग क्यों न दिया जाए । जो बात हमें सबसे ज्यादा प्रभावित करती है, वह है कर्तव्य की भावना जो सबसे ऊपर है और बाधाओं के बावजूद धर्म के मार्ग पर उनका अटूट विश्वास, जो उन्हें और हमें भी अपार मानसिक सांत्वना देता है । उनके परीक्षणों और क्लेशों से परिचित होने पर हमारा दिल करुणा से पिघल जाता है और हमारे भीतर एक भावना पैदा होती है, जैसे कि हमारे संदेह दूर हो गए हैं और अशुद्धियाँ साफ हो गई हैं । उनकी अंतिम सफलता और प्रसिद्धि हमारे मन में धर्म की एक गहरी छाप छोड़ती है । पौराणिक कहानियाँ यही करती हैं ।
पुराण और इतिहास
आम तौर पर कहा जाता है कि हमारे देश में घटनाओं का कोई लिखित (रिकॉर्डेड) इतिहास नहीं है । पुराण वास्तव में इतिहास हैं । लेकिन आज के विद्वान किसी भी चीज़ को ऐतिहासिक नहीं मानते, जब तक कि वह ईसाई युग के आने के बाद न हुई हो । यह आधे-अधूरे मन से माना जाता है कि ऐतिहासिक रिसर्च के आधार पर पुराणों में थोड़ी सच्चाई है, लेकिन वे उन हिस्सों को ज़्यादा अहमियत देते हैं जो उनकी पसंदीदा सिद्धान्तों (पेट थ्योरीज) और नतीजों (कन्क्लूजन्स) को सपोर्ट करते हैं । चमत्कार और अलौकिक (सुपरनैचुरल) चीज़ों को एकदम बकवास कहकर खारिज कर दिया जाता है । एक साधारण आदमी के साधारण ज्ञानेन्द्रियों के सामान्य (नॉर्मल) अनुभव से परे किसी भी चीज़ को सच्चाई के दायरे से बाहर मानकर खारिज कर दिया जाता है । इस तरह, जिन पुराणों में ‘रहस्य’ (मिस्ट्री) भरा होता है, उन्हें ‘इतिहास’ (हिस्ट्री) न मानकर बदनाम कर दिया जाता है ।
अगर हम पुराणों को नज़रअंदाज़ कर दें और इसके बजाय उन्हें इतिहास के तौर पर लिखी गई चीज़ें पढ़ने को कहें, तो हम बच्चों के साथ बहुत बड़ा अन्याय करेंगे ।
इतिहास में पुराणों जैसी कोई घटना नहीं है, जो न सिर्फ़ बच्चों के दिलों को पसंद आती है बल्कि उनके चरित्र को नैतिक आधार पर ढालती है ।
मैं यह नहीं कहता कि इतिहास से बचना चाहिए । पुराण भी इतिहास हैं और उन्हें पढ़ना भी चाहिए क्योंकि पुराण एक अच्छे मकसद वाला इतिहास हैं । इतिहास पढ़ने के कई कारणों में से एक यह है कि ‘इतिहास खुद को दोहराता है’ । घटनाओं में बार-बार होने की आदत होती है । इसलिए, अगर हम अतीत के बारे में जानें तो हम भविष्य का अंदाज़ा लगा सकते हैं । हम अतीत से सबक भी सीख सकते हैं ।
इतिहास दिखाता है कि कैसे किसी खास स्थिति को, अगर बढ़ने दिया जाए, तो (परिणाम में) युद्ध, समाज में गड़बड़ी या सभ्यता के विनाश का कारण बन सकता है । इसलिए, अगर अभी भी ऐसी ही स्थिति आती है, तो हम पहले से सावधान हो सकते हैं और मुसीबत (महामारी, विनाश) को टालने के लिए सावधानी बरत सकते हैं । इसे इतिहास के फायदों में से एक बताया गया है ।
हालांकि पुराणों का कथ्य (कंटेंट) ऐतिहासिक है, लेकिन वे सिर्फ़ चुनिंदा घटनाओं को इस तरह से पेश करते हैं कि लोगों को सही और गलत के बारे में पता चले और वे नेकी के रास्ते पर चलें । असल में, इसकी सिलेक्टिविटी (चयन) सिर्फ़ उन राजाओं तक ही सीमित है जिन्होंने धर्म के रास्ते पर चलने की वजह से इसी जन्म में बहुत फ़ायदा उठाया और इसके उलट, उन राजाओं तक जो अपने बुरे कामों की वजह से इसी जन्म में बुरे अंजाम तक पहुँचे । या फिर (अन्यथा), यह हमें उन किरदारों के अगले जन्म में ले जाता है और दिखाता है कि उन्होंने अपने पिछले जन्मों के कर्मों के नतीजे में कैसे मज़े किए या दुःख झेले । ऐसा कोई पुराण नहीं है जो हमें लोगों के बाद के समय में (अगले जन्म में) उनके अच्छे और बुरे असर के बारे में न बताए । विगत इतिहास की अध्ययन (स्टडी) से मिलने वाले फ़ायदे ये कहे गये हैं: (i) पिछला अनुभव हमें आज के हालात का सामना करने के लिए मार्गदर्शन (गाइड) कर सकता है, (ii) अच्छे लोगों की ज़िंदगी की अध्ययन जिन्होंने अच्छे कर्म किए और अच्छे अंजाम तक पहुँचे, हमारे लिए एक मिसाल बन सकती है, और (iii) बुरे लोगों की ज़िंदगी, जिन्होंने बड़े पैमाने पर दुख और तबाही मचाई, लेकिन आखिर में खुद को उससे ज़्यादा दुःख झेलना पड़ा जो उन्होंने पहुँचाया था, हमारी गलतियों को रोकने का काम कर सकती है । लेकिन इनमें से कोई भी फ़ायदा आज की ऐतिहासिक किताबों की स्टडी से नहीं मिलता । सिर्फ़ पुराण ही ऐसे नतीजे देते हैं ।
राजाओं की एक के बाद एक लड़ी गई लड़ाइयों या उनके द्वारा शुरू किए गए सुधारों का विस्तार से वर्णन करने का कोई उद्देश्य नहीं है, जब तक कि उनके कार्यों के सही या गलत को इंगित करने का प्रयास न किया जाए । ऐसे इतिहास का कोई फायदा नहीं है जिसमें हमें बेहतर जीवन जीने के लिए कुछ भी सिखाने को न हो । हालाँकि, पुराणों का उद्देश्य मन को लाभ पहुंचाना और मनुष्य और समाज को बेहतर जीवन जीने के लिए ढालना है ।
पुराण सूर्य वंश और चंद्र वंश के राजाओं के बारे में विस्तार से बताते हैं । उत्तराधिकार की रेखा को विस्तृत रूप से निर्धारित किया गया है । लेकिन उन राजाओं का कोई महत्व नहीं है और जिनके जीवन से हमें कुछ भी सीखने को नहीं है (या तो अनुकरण करने के लिए या बचने के लिए) उनका केवल एक या दो पंक्तियों में उल्लेख किया जाएगा । जो हमारे अनुसरण के लिए उदाहरण के रूप में काम करेंगे, उनके बारे में बहुत विस्तार से और विस्तार से बात की जाएगी । उदाहरण के लिए, उत्तानपाद, ध्रुव के पिता और ध्रुव के पुत्र, जिन्होंने उनके बाद शासन किया, का उल्लेख भागवत पुराण में किया गया है, लेकिन केवल एक या दो वाक्यों में । लेकिन ध्रुव की ज़िंदगी, जो भक्ति, लगन और मज़बूती से भरी एक सबक है, उसके बारे में विस्तृत भाष्य (डिटेल में बताया गया) दिया गया है ।
भारतीय इतिहास लिखने वाले अंग्रेज़ों ने पुराणों को पूरी तरह से मनगढ़ंत बताया । उन्होंने इसमें नस्ल की थ्योरी (नस्लवाद) डाल दी, जो उनकी ‘बांटो और राज करो’ की नीति (पॉलिसी) के हिसाब से थी, ऐसे जैसे कि वह वगैर किसी निष्पक्ष अनुसन्धान (impartial research) का परिणाम (नतीजा) हो । अगर, उनकी नज़रों में, पुराणों में मनगढ़ंत बातें थीं, तो आज के नज़रिए से, (खासकर आज़ाद भारत के मामले में), भारतीय इतिहास का अंग्रेज़ों का संस्करण (वर्शन) भी कुछ हिस्सों में झूठा ही माना जाता है । इसे और ज़्यादा ईमानदारी से फिर से लिखने की कोशिशें चल रही हैं । यहाँ भी, कई घटनाओं पर लेखकों के अपने नज़रिए या फिर पहले से बनी कोई राय हो सकती है । इसलिए, कोई इसे कितना भी बिना भेदभाव के दिखाए, यह पक्का नहीं किया जा सकता कि पूरी सच्चाई रिकॉर्ड हो जाएगी, खासकर अगर वे पहले से ही पश्चिमी लेखकों की तथाकथित रिसर्च से पक्षपात कर रहे हों ।
यह सोचना भी सही नहीं है कि इतिहास सिर्फ़ साम्राज्यों, युद्धों, हमलों, राजवंशों वगैरह तक ही सीमित है । हर चीज़ का एक इतिहास होता है । बदकिस्मती से, पश्चिमी इतिहासकारों के द्वारा लिखी गई राजनीतिक इतिहास (पॉलिटिकल हिस्ट्री) को ही गौरवपूर्ण इतिहास के रूप में अहम स्थान दिया गया है । दूसरी ओर, पुराण जो कि धर्म (नैतिकता) को मुख्य विषय मानते हैं और न सिर्फ़ महान राजाओं बल्कि महान लोगों (उदाहरणीय मनुष्य), ऋषियों और आम लोगों के जीवन और कामों का इस्तेमाल करके एक पैटर्न बुनते हैं । पुराणों की स्टडी से न सिर्फ़ उस समय की सरकार की हालत का पता चलता है, बल्कि उस समय के सांस्कृतिक (कल्चरल) जीवन, कला और विज्ञान के बारे में भी जानकारी मिलती है । बेशक, उनका मुख्य विषय धर्म और तत्त्वमीमांसा (मेटाफ़िज़िक्स) है ।
पुराण सच हैं या मनगढ़ंत ?
आजकल का मानना है कि पुराणों पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनमें ऐसी बातें होती हैं जो जानी-पहचानी कुदरती घटनाओं के दायरे से बाहर होती हैं । यह कि देवता स्वतंत्रतापूर्वक धरती पर घूमते थे और इंसानों को वरदान देते थे, इसे मनगढ़ंत बात माना जाता है क्योंकि आज ऐसी चीज़ें नहीं होतीं । “एक औरत को श्राप दिया गया और वह पत्थर बन गई, पत्थर को आशीर्वाद दिया गया और वह वापस औरत बन गया” – सूरज के बारे में प्रेस में खबर आई । मुझे लगता है कि आजकल ऐसी खबरें बढ़ रही हैं । पुराण कहते हैं कि “कश्यप की एक पत्नी थी जिसका नाम कद्रू था । उसने बच्चों के रूप में सांपों को जन्म दिया ।” हम इसे अजीब और नामुमकिन और इसलिए झूठा मानकर खारिज कर देते हैं । लेकिन कई पढ़ने वालों ने शायद एक न्यूज़ आइटम (1958 में) में देखा होगा । “एक मारवाड़ी लड़की ने एक सांप को जन्म दिया ।” जब मैंने इसे देखा, तो मुझे एक और बात साफ़ हो गई ।
संन्यासी बनने से पहले, मैंने एक ऐसे परिवार के बारे में सुना था जिसमें न तो उस परिवार में पैदा हुई और न ही शादी करके उस परिवार में आई कोई भी लड़की “केवरा” (तमिल में इसे ताज़मपू कहते हैं) का इस्तेमाल करती थी । जब उनसे पूछा गया कि क्यों, तो उन्होंने एक कहानी सुनाई ।
“दस या पंद्रह पीढ़ी पहले, हमारे परिवार में एक लड़की ने एक बच्चे को जन्म दिया जो एक बच्चे के बजाय एक सांप निकला । उन्हें यह बताने में शर्म आ रही थी और इसलिए उन्होंने चुपके से उस रेंगने वाले बच्चे को पाला । उन्होंने उसे एक इंसानी बच्चे की तरह दूध पिलाया । कहा जाता है कि वह खुशी-खुशी बड़ा हुआ, घर में बिना किसी को कोई नुकसान पहुँचाए खेलता रहा । लेकिन इस अजीब बच्चे को घर से बाहर, घूमने-फिरने नहीं ले जाया जा सकता था । इसलिए माँ घर से बाहर नहीं जाती थी, जब तक कि बहुत ज़रूरी न हो । एक पुरानी तमिल कहावत है, “पत्थर भी हो, पति तो पति ही होता है ।” मतलब रिश्ता सिर्फ़ दिखावे से बेदाग़ होता है । इसी तरह, साँप के लिए माँ का प्यार पूरी तरह बना रहा । इसलिए माँ कभी घर से बाहर नहीं निकली । लेकिन एक समय ऐसा आया जब उसे एक करीबी रिश्तेदार की शादी में शामिल होने के लिए बाहर जाना पड़ा । घर में एक बूढ़ी औरत थी । अब यह पता नहीं है कि वह साँप के बच्चे की दादी थी या नहीं । उन दिनों, बेसहारा लोगों की मदद करने का अच्छा रिवाज़ था, भले ही वे दूर के रिश्तेदार हों । हाल ही में ऐसा हुआ है कि शादी के बाद बेटे अपने माता-पिता के साथ नहीं रहना चाहते, बल्कि अकेले अलग रहना पसंद करते हैं । पहले आम तौर पर बिना बँटे परिवारों – जॉइंट परिवारों की स्थिति होती थी । उसमें दूर की विधवा चाची या दादा के एक या दो बार दूर के चचेरे भाई के लिए जगह होती थी । इस तरह, घर में एक बूढ़ी औरत थी जिसके बारे में हम अभी बात कर रहे हैं । उसकी आँखों की रोशनी बहुत कमज़ोर थी । जब माँ अनिवार्य रूप से शहर से बाहर गई तो नाग शिशु को इस अंधी वृद्ध महिला की हिरासत में छोड़ दिया गया था । नाग को ध्यान के रूप में क्या चाहिए ? उसे नहलाना नहीं, उसके बालों में चोटी बनाना या कपड़े पहनाना – इनमें से कुछ भी नहीं । इसे नियमित अंतराल पर दूध पिलाना था । इसलिए, माँ ने वृद्ध महिला से कहा, “तुम उबला हुआ दूध, जिस तापमान पर उंगली सहन कर सके, उसे चक्की के पत्थर के छेद में डालो जिसे स्पर्श से आसानी से पहचाना जा सके । जब बच्चे को दूध पीने का समय होगा तो वह इसे स्वयं पी लेगा” । इन निर्देशों के साथ माँ घर से चली गई । ऐसा लगता है कि नाग को दूध पिलाने के लिए प्रशिक्षित किया गया है । वृद्ध महिला ने इन निर्देशों का पालन किया । और माँ के कहे अनुसार नाग भी आया और अपना चारा खा लिया । कुछ दिनों के बाद एक बार यह दिनचर्या बाधित हो गई । नाग जो चक्की के पत्थर के छेद में घुस गया, उसने उसे खाली पाया। शायद वृद्ध महिला सो गई थी । नाग स्वभाव से वश में था और कुछ समय इंतजार करने के बाद, वह भी छेद के अंदर सो गया । बाद में बुढ़िया गरम उबला हुआ दूध लेकर चक्की के पत्थर पर आई । उसे पता नहीं था कि साँप का बच्चा सो रहा है । उसने दूध को बिना देखे, थोड़ी लापरवाही से, छेद में डाल दिया । उबलता हुआ दूध बेचारे साँप पर लग गया । वह मर गया । साँप की माँ, जो उस समय दूसरे गाँव में थी, ने एक सपना देखा । साँप का बच्चा उसके सपने में आया और बोला, ‘मैं मर गया हूँ । तुम घर जाओ और केवड़ा की झाड़ियों के बीच मेरे शरीर का दाह संस्कार कर दो । भविष्य में तुम्हारे परिवार की लड़कियाँ, चाहे वे उस परिवार में पैदा हुई हों या शादी करके आई हों, अपने बालों में यह फूल नहीं लगाएँगी ।’ उस समय से, हमारे परिवार में कोई भी उस फूल का इस्तेमाल नहीं करता ।”
मैं भी इस कहानी पर हैरान होता था कि क्या सच में ऐसा हो सकता है ।
फिर, कई साल बाद, उस परिवार के कुछ सदस्य मुझसे मिलने आए – मुझे साँप की कहानी के बारे में और बताने के लिये नहीं, लेकिन मुझे एक ताम्रपत्र (कॉपरप्लेट पर लिखी हुई चीज़) दे सकें, जिसमें मेरी बहुत दिलचस्पी रहती थी यह उन्हें पता थी । यह एक शाही दान पत्र (रॉयल गिफ्ट डीड) थी जो ताँबे के पत्ते (कॉपरप्लेट) पर लिखी हुई थी । यह राजा अच्युत देव राय के समय की थी । इसमें यह बताया गया था कि एक ब्राह्मण ने 108 दूसरे ब्राह्मणों को गिफ्ट दिए थे । यह सब उसने राजा के खातिर किया था ।
मैं आपको बताता हूँ कि उसने ऐसा क्यों और किसलिए किया था । चूँकि एक ब्राह्मण को अपना सारा समय वेदों का पाठ करने और वैदिक आदेशों का पालन करने में लगाना होता था, इसलिए उसे मुनाफे के लिए कोई भी नौकरी करने से रोक दिया गया था । लेकिन फिर उसका घर तो चलाना ही था । इसीलिए शास्त्रों में उसे तोहफ़े या दान लेने की इजाज़त दी गई है । इस तरह राजा और अमीर लोग उन्हें इनाम देते थे और उनकी देखभाल करते थे । क्योंकि उन्हें तोहफ़े लेने की इजाज़त थी, इसलिए यह नहीं समझना चाहिए कि वे बिना सोचे-समझे या बिना रुके तोहफ़े लेते थे । उनमें बहुत आत्म-सम्मान था और वे तोहफ़े तभी लेते थे जब ज़रूरत होती थी और जितना ज़रूरी होता था । वे तोहफ़े तभी लेते थे जब राजा का चाल-चलन अच्छा और नाम अच्छा होता था ।
इतना ही नहीं, कुछ तो इससे और भी आगे थे । (दान देनेवाले) राजा के खानदान में भी कोई दोष नहीं होना चाहिए था । राजाओं को ऐसे ब्राह्मणों की लगातार मांगों का सामना नहीं करना पड़ता था । उनकी तकलीफ़ यह थी कि ब्राह्मण उनके तोहफ़े लेने के लिए आगे नहीं आते थे और नतीजतन, अच्छे कामों के लिए दान करने से मिलने वाला पुण्य या क्रेडिट उन्हें नहीं मिलता था । ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए, राजा और अमीर लोग एक चाल चलते थे । वे किसी भी तरह से किसी ब्राह्मण को आम मुश्किल हालात से ज़्यादा अपने तोहफ़े लेने के लिए मना लेते थे । कभी-कभी, तोहफ़े पूरे गाँव जितने बड़े होते थे । लेकिन यह सिर्फ़ एक इंसान के फ़ायदे के लिए नहीं था । दान देने वालों को उम्मीद थी कि उनका तोहफ़ा उस एक ही पाने वाले के ज़रिए दूसरे ब्राह्मणों तक पहुँचेगा । इस तरह, एक ही इंसान तोहफ़ा अपने नाम पर लेगा, लेकिन वह अपने लिए सिर्फ़ एक छोटा सा हिस्सा रखेगा और बाकी दूसरे ब्राह्मणों को दे देगा । क्योंकि एक ब्राह्मण दूसरे से लेता है, इसलिए टेक्निकली यह लेन-देन प्रतिग्रह दोष (भिक्षा लेने का दोष) की कैटेगरी में नहीं आता । इस तरह राजा या शाही दान देने वाले का मकसद पूरा हो जाएगा ।
सवाल यह उठता है कि क्या मुख्य दान देने वालों और आखिरी फ़ायदा पाने वालों के बीच आने वाला बिचौलिया बदनाम नहीं होता । बेशक, अगर राजा-महाराजा विद्वान वैदिक ब्राह्मणों को बचाने के लिए यह चाल चलते हैं, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है । लेकिन उस बिचौलिए का क्या जो इस चाल का हिस्सा था ? खैर, उस पर भी कोई इल्ज़ाम नहीं लगाया जा सकता । कानून के हिसाब से, दान किया गया तोहफ़ा उसकी अपनी प्रॉपर्टी बन जाता है । गिफ्ट डीड उसके नाम पर बनाई जाती है । क्योंकि वह ज़्यादातर चीज़ों पर मालिकाना हक नहीं जताता, बल्कि दूसरों को दे देता है, इसलिए वह खुद को दोष से मुक्त कर लेता है । अपनी ही प्रॉपर्टी देने में कोई पाप नहीं होता ।
जिस कॉपरप्लेट का मैंने पहले ज़िक्र किया था, उसमें एक ब्राह्मण को इस तरह तोहफ़ा मिला था जिसे उसने 108 और लोगों में बाँट दिया । इन 108 लोगों के नाम, साथ ही उन्होंने किस लेवल तक वेद पढ़ा था और उन्हें कितनी ज़मीन दी गई थी, यह सब प्लेट में लिखा था ।
पाने वालों में एक का नाम उस परिवार से है जिसमें साँप का बच्चा पैदा हुआ था । बाकी पाने वालों के परिवारों के बारे में बहुत कम पता है । मुझे जो कॉपरप्लेट मिला था, वह कई पीढ़ियों से संभालकर रखा गया था ।
ध्यान देने वाली बात यह है कि कॉपरप्लेट में जो नाम लिखा था वह ‘नागेश्वर’ था । जो व्यक्ति अब मेरे पास प्लेट लाया है, उसका नाम भी नागेश्वर है । पूछने पर पता चला कि नागेश्वर नाम हर पीढ़ी में एक बच्चे को दिया जाता था । तब हम आसानी से यह समझ पाए कि यह नाम साँप के बच्चे की कहानी से जुड़ा है । (संस्कृत में नाग का मतलब साँप होता है) । इसके अलावा, कहानी के सपोर्ट में यह सबूत भी है कि अच्युत देव राय के ज़माने में भी इस नाम का एक परिवार था ।
इससे मेरे पहले के शक का पक्का जवाब मिल गया कि क्या ऐसा सच में हो सकता है । और, जब 1958 में, मैंने यह खबर देखी कि एक औरत ने साँप को जन्म दिया है, तो मेरा शक और भी दूर हो गया और मुझ पर भरोसा हावी हो गया ।
यह बिल्कुल सही नहीं है कि मैं आप सब पर पुराणों की सच्चाई पर भरोसा न करने का इल्ज़ाम लगाऊँ । मैं खुद भी खबर मानने को तैयार था और मुझे जो पारंपरिक कहानी सुनाई गई थी, उसे मानने में जो हिचकिचाहट थी, वह खबर ने दूर कर दी । हम इस मोड़ पर आ गए हैं कि अगर कोई खबर प्रेस में छपती है, चाहे वह कितनी भी नामुमकिन क्यों न लगे, हम उसे सच मान लेते हैं । लेकिन पुराण का ज़िक्र ही हमें नफ़रत करने पर मजबूर कर देता है । “उनके पास बहुत सारे खाली समय के लिए ताड़ के पत्ते और स्टाइलोग्राफ थे । उन्होंने कहानियों वाली किताबें बनाईं । उनमें से कुछ तो पक्का चालाक हैं लेकिन बाकी बकवास हैं” यह आम राय है ।
हालांकि कल्पना से भरे हुए हैं, लेकिन उनमें एक मैसेज है
हो सकता है कि पुराणों में कहीं-कहीं थोड़ी-बहुत कल्पना का सहारा लिया गया हो । यह एक प्रक्षेप (इंटरपोलेशन) के तौर पर आया हो सकता है । लेकिन यह कौन कह सकता है कि कौन सी पूरी तरह से मनगढ़ंत है, कौन सी प्रक्षेप है और कौन सी सच ? अगर हर कोई अपनी नज़र में जो प्रक्षेप है, उसे छोड़ दे, तो बहुत कम बचेगा क्योंकि सारी कहानियाँ गायब हो जाएँगी । आधारभूत कथा के तौर पर कुछ भी नहीं रह सकता है । इसलिए, भले ही ऐसा लगे कि कुछ कमियाँ और गलतियाँ हैं, यह हमारा फ़र्ज़ है कि हम पुराणों को उसी हालत में बचाकर रखें जिस हालत में वे हमें मिलते हैं ।
कुछ मनगढ़ंत बातें रहने दें । आखिर, पुराण हमें भगवान के करीब ले जाता है और मन को शांति देता है, है ना ? हम खरिदारी करने (शॉपिंग करने) जाते हैं और अच्छी चीनी खरीद पाते हैं । क्या हम इस बात से खुश होते हैं कि हमें अच्छी चीनी मिली या हम इस बात से नाराज़ होते हैं कि दुकान में सामान ठीक से नहीं दिखाया गया था या दुकानदार को कम सुनाई देता था ? भूगोल और अन्तरिक्ष विज्ञान (एस्ट्रोनॉमी) के ब्यौरे में, मन्वंतरों की तरह समय के ब्यौरे में, एक-दो गलतियाँ हो सकती हैं । आज की भूगोल, एस्ट्रोनॉमी और इतिहास है जो किसी भी गलती (गलत आकलन – इनएग्जैक्टीट्यूड्स) को ठीक कर सकता है । लेकिन पुराण एक ऐसा मकसद पूरा करते हैं जो भूगोल, एस्ट्रोनॉमी या इतिहास नहीं दे सकते – यानी परमात्मा तत्व, भक्ति और धर्म की शिक्षा सफलतापूर्वक देना ।
“राम त्रेता युग में नहीं रह सकते थे, इतने लाखों साल पहले । रामायण में दिखाई गई संस्कृति और सभ्यता तब मौजूद नहीं हो सकती थी” ये कुछ ऐसी आलोचानएं हैं जो हमारे कानों में पड़ती हैं । मान लेते हैं कि राम त्रेता युग में नहीं रहे थे । इसी तरह, विमर्श (चर्चा) के लिए, मान लेते हैं कि कृत युग में पहले हुई कहानियाँ असल में नहीं हुईं । मान लेते हैं कि ये सब हुआ, मान लीजिये कि, पिछले सात या आठ हज़ार सालों में यह सब हुआ । इस बात पर, क्या राम की कहानी की अहमियत कम हो जाती है ? क्या इससे हम जो सबक सीखते हैं, वह किसी भी तरह से कम हो जाता है ? जैसे कहा जाता है कि पुराणों की उम्र पर यकीन करना मुश्किल है, वैसे ही एक दूसरी राय यह भी है कि उनकी सही होने पर सवाल उठाना गलत है ।
शास्त्र कहते हैं कि 5000 साल पहले, जब कलियुग शुरू हुआ, तो व्यास ने हमें पुराण दिए । लेकिन उनके समय से पहले भी पुराण थे । छांदोग्य उपनिषद में, जहाँ नारद ने अपनी सीखी हुई विद्याओं की सूची बताई है, उन्होंने पुराण को उनमें से एक बताया है ।
इसलिए, यह साफ़ है कि वेदों और उपनिषदों के समय भी पुराण मौजूद थे । ऐसा लगता है कि जैसे व्यास ने वेदों को कई शाखाओं में बाँट दिया था क्योंकि बाद की पीढ़ियों में उन सभी को याद करने की काबिलियत नहीं थी, वैसे ही उन्होंने पुराणों को भी छोटे-छोटे हिस्सों में फिर से लिखा ।
फिर भी, पश्चिमी विद्वान पुराणों को इतना पुराना नहीं मानते । ऐसा ही रहने दें ।
आजकल के अंधविश्वास का सबसे बड़ा उदाहरण, जहाँ विश्वास लगभग पक्का हो जाता है, ‘रिसर्च’ के नतीजों से आता है । लेकिन रिसर्च के सभी नतीजे उतने सही नहीं होते । समय के साथ वे पुराने और गलत साबित हो जाते हैं । लेकिन, भले ही रिसर्च में कोई गलती न हो और पुराण मनगढ़ंत हों, पुराण इस बात पर ज़ोर देते हैं कि अच्छे लोगों को खुशहाल ज़िंदगी मिलती है और बुरे लोगों को तकलीफ़ होती है – यहाँ तक कि बुरे लोगों को भी भगवान की माफ़ी और कृपा मिलती है । क्योंकि यह बात पढ़ने वाले के मन में अच्छी तरह बैठ जाती है, इसका मतलब है कि वे अपना मकसद पूरी तरह से पूरा करते हैं ।
व्यास ने जो खजाना छोड़ा
वही व्यास जिन्होंने वेदों को (वेद शाखाओं में) फिर से जमाया ताकि लोग उन्हें आसानी से समझ सकें, उन्होंने ही हमें अठारह पुराण दिए । मैं सोचता था कि व्यास पहले पत्रकार थे और मॉडर्न पत्रकारिता के लिए सबसे बड़ा उदाहरण थे । कहानियाँ, इतिहास, भूगोल, दर्शन, उन्होंने इन सभी पर आसान और दिलचस्प तरीके से अनमोल किताबें लिखीं ताकि वे न केवल समझदार लोगों को बल्कि आम आदमी को भी पसंद आएं । क्या यह वही काम नहीं है जो पत्रकार करते हैं ? लेकिन पत्रकार सिर्फ़ इंसानी दिलचस्पी और सनसनी पैदा करने तक ही सीमित रहते हैं । लेकिन व्यास का मकसद आम आदमी को सही रास्ते पर लाना था और उन्होंने इंसानी दिलचस्पी को सिर्फ़ एक ज़रिया बनाया । अगर सिर्फ़ इंसानी दिलचस्पी को पत्रकारिता का लक्ष्य माना जाता, तो इसका नतीजा गलत और गैर-धार्मिक बातों को भी बढ़ावा देना होता । अगर व्यास को आदर्श माना जाता, तो प्रेस ज़्यादा साफ़ होता । इसका जनता पर अच्छा असर पड़ता ।
इन अठारह पुराणों का योग चार लाख ग्रंथों के बराबर है । एक ग्रंथ बत्तीस अक्षरों वाला एक श्लोक होता है । इनमें से लगभग एक चौथाई या एक लाख श्लोक स्कंद पुराण में हैं । मुझे लगता है कि यह शायद दुनिया की सबसे बड़ी एकल पुस्तक है । शेष सत्रह पुराणों में तीन लाख ग्रंथ हैं । इसके अतिरिक्त, व्यास ने महाकाव्य “महाभारत” की रचना की जिसमें एक लाख ग्रंथ या छंद हैं ।
प्रत्येक पुराण एक ही देवता को अपना मुख्य विषय मानता है । पुराणों को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है: (1) वैष्णव पंथ, (2) शिव पंथ, और (3) शक्ति पंथ, इस प्रकार बड़ी संख्या और विभिन्न प्रकार के देवताओं को शामिल किया गया है । अठारह पुराण हैं: (1) ब्रह्म पुराण, (2) पद्म पुराण, (3) विष्णु पुराण, (4) शिव पुराण, (5) श्रीमद्भागवत, (6) नारद पुराण, (7) मार्कण्डेय पुराण, (8) अग्नि पुराण, (9) भविष्य पुराण, (10) ब्रह्म वैवर्त पुराण, (11) लिंग पुराण, (12) वराह पुराण, (13) स्कंद महापुराण, (14) वामन पुराण, (15) कूर्म पुराण, (16) मत्स्य पुराण, (17) गरुड़ पुराण, और (18) ब्रह्मांड पुराण ।
इन अठारह में से दस शैव कहे जाते हैं । आज हमें जो कई किस्से और कहानियाँ पता हैं, वे इनमें शामिल हैं । इतिहास, कहानी, दर्शन सब इनमें शामिल हैं ।
आदि शंकराचार्य ने विष्णु सहस्रनाम पर अपनी टिप्पणी में विष्णु पुराण से कई उदाहरणों का हवाला दिया है । इस पुराण के लेखक ऋषि पराशर थे, जो महर्षि व्यास के पिता थे । श्री रामानुज के सिद्धांत अर्थात विशिष्टाद्वैत या योग्य अद्वैतवाद में विष्णु पुराण प्रमुख प्रमाण के रूप में आता है ।
रामानुज के समय से पहले, विशिष्टाद्वैत सिद्धांत के स्तंभों में से एक आलवंदार थे । रामानुज के उनके पास पहुंचने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई । आलवंदार ने रामानुज को तीन काम सौंपने की इच्छा जताई थी । ऐसा कहा जाता है कि, परिणामस्वरूप, उनकी मृत्यु के बाद, उनके हाथ की तीन उंगलियां मुड़ी हुई और बंद पाई गईं । जब रामानुज ने अपने गुरु के इरादों का सही अनुमान लगाया और उन्हें बारी-बारी से घोषित किया, तो कहा जाता है कि मृत व्यक्ति की प्रत्येक उंगली सीधी हो गई थी ।
तीन अनकही आज्ञाओं में से एक आज्ञा यह थी कि विशिष्ट अद्वैत सिद्धांत के अनुसार ब्रह्म सूत्र पर एक भाष्य (कमेंट्री) लिखी जाए । दूसरा था थिरुवोयमोझी – तमिल में अलवारों की सूक्तियों पर एक कमेंट्री लिखवाना । तीसरा था व्यास और पराशर की शोहरत को मज़बूती से स्थापित करना और फैलाना । पराशर को यह खास जगह इसलिए दी गई क्योंकि वह विष्णु पुराण के लेखक थे । इसी बात को ध्यान में रखते हुए, रामानुज ने अपने मुख्य शिष्य कूराथलवान के दो बेटों का नाम पराशर भट्ट और व्यास भट्ट रखा । बाद में पराशर भट्ट महत्वपूर्ण वैष्णव आचार्यों में से एक बन गए ।
हालांकि ऋषि पराशर ने विष्णु पुराण लिखा था, लेकिन व्यास ने ही अठारह पुराणों को सम्पादित (एडिट) करके उस रूप में पेश किया जिस रूप में वे अब हमें मिलते हैं । मैंने पहले ही बताया था कि उन्होंने वेदों को भी व्यवस्थित और संहिताबद्ध (कोडिफाइड) किया और पुराण लिखे ताकि वैदिक आदेश लोगों के दिमाग में अच्छी तरह बैठ सकें ।
उन्होंने पुराण क्यों लिखे, इसका एक और कारण बताया गया है । केवल कुछ लोगों को ही वेदों का अध्ययन (पढ़ने) और पाठ (वाचन) करने का अधिकार है, सभी को नहीं । कहा जाता है कि उन्होंने पुराण इसलिए लिखे ताकि आम लोगों को वैदिक दर्शन और आदेशों का पता चल सके ।
अगर व्यास के पिता पराशर विष्णु पुराण का असल मूलपाठ (ओरिजिनल टेक्स्ट) निकालने के लिए ज़िम्मेदार थे, तो व्यास का श्रीमद् भागवत उनके बेटे शुकाचार्य जो राजा परीक्षित को सुनाये थे ।
जब भागवत की बात होती है, तो इस बारे में कुछ मतभेद होता है कि क्या यह उस टेक्स्ट को बताता है जिसमें भगवान कृष्ण की कहानी मुख्य विषय है लेकिन विष्णु के दूसरे अवतारों और कहानियों का भी ज़िक्र है, या यह देवी भागवत को बताता है जो देवी अंबा की ‘लीला’ या चरित्र से जुड़ा है । हमें, बेशक, दोनों ही पसंद हैं । ये दोनों वाकई बहुत अच्छे टेक्स्ट हैं । अपने-अपने सिद्धांतों के समर्थन में चैतन्य, निम्बार्क, वल्लभाचार्य आदि ने विष्णु भागवत को वेदों के समान ही स्थान दिया है । वहीं अद्वैतवादी, जो इन सिद्धांतों का विरोध करते हैं, वे भी इस (विष्णु भागवत) को स्वीकार करते हैं और इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं ।
शिव पुराण स्कंद पुराण से भिन्न है । स्कंद में, इसका तीन-चौथाई भाग शिव संबंधी घटनाओं, उपाख्यानों और दर्शन को समर्पित है । इसका केवल एक चौथाई भाग स्कंद को समर्पित है । फिर भी, इसे स्कंद पुराण कहा जाता है, क्योंकि इसमें स्कंद से संबंधित सभी बातें भी शामिल हैं ।
मार्कंडेय पुराण में दुर्गा की “दुर्गा सप्त सती” कथा आती है । “शांति होम”, “शत चंडी”, “सहस्र चंडी” – ये संस्कार इस पुराण के 700 मंत्रों का उपयोग करके किए जाते हैं । यहाँ, हर मंत्र एक श्लोक में है । इसलिए हर ‘होम’ या अर्पण एक श्लोक पढ़कर किया जाता है ।
भविष्य का मतलब है आनेवाला आगे का समय । भविष्यत पुराण में कई बातें हैं, जिसमें आज के कलियुग में हम जो बुराई देख रहे हैं, उनका ब्यौरा भी है । इस पुराण में न सिर्फ़ पुराने मौर्य वंश के राजाओं का ज़िक्र है, बल्कि यूरोपियन लोगों के हाल ही में आने का भी ज़िक्र है । फिर भी, आज के समझदार लोग इस पुराण को हल्के में लेते हैं और कहते हैं कि इसे कलियुग की शुरुआत में व्यास ने नहीं लिखा था, बल्कि हाल के समय में किसी और ने व्यास के नाम का इस्तेमाल करके लिखा था । हो सकता है कि इसमें कुछ जोड़-तोड़ हो, लेकिन पूरी चीज़ को हाल ही का लिखा हुआ और गलत नहीं माना जा सकता । जिनके पास रहस्यमयी शक्तियाँ होती हैं, वे समय के पार देख सकते हैं । उन्हें दुनिया के दूसरे हिस्से में हो रही घटनाओं के बारे में भी पता चल सकता है । यह कोई आसान बात नहीं है कि किताबें सभी लोग लिखें और उन्हें महान लोगों के नाम से भी स्वीकार किया जाए ।
गरुड़ पुराण मुख्यतः मृत्यु के बाद की दुनिया (पितृ लोक) और दिवंगत आत्मा के लिए किए जाने वाले संस्कारों से संबंधित है । इसलिए, “श्राद्ध” या पुण्यतिथि समारोहों के दौरान इस पुराण को पढ़ने का प्रथा है ।
“ललितोपाख्यान” (ललिता की कथा) और “ललिता सहस्रनाम” ब्रह्मांड पुराण में शामिल हैं । देवी पूजा के उपासक इस तथ्य पर गर्व करते हैं कि सभी अठारह पुराणों को पढ़ने के समापन पर, पढ़ा जाने वाला अंतिम पुराण यही है जिसमें राज-राजेश्वरी का राज्याभिषेक होता है । अष्टोत्तरनाम, सहस्रनाम और कवच जिसका अब प्रत्येक देवता पर पाठ किया जाता है, सभी कई पुराणों से लिए गए हैं । हालाँकि, विष्णु सहस्रनाम और शिव सहस्रनाम महाभारत से हैं । लेकिन, “आदित्य हृदयम” श्रीमद् रामायण में आता है । प्रदोष स्तोत्र स्कंद पुराण में है । और भी बहुत कुछ ।
उप पुराण और छोटे पुराण
अठारह पुराणों के अलावा, अठारह ‘उप’ पुराण या सहायक पुराण भी हैं । विनायक पुराण और कल्कि पुराण उप पुराणों में से हैं । हालांकि कहा जाता है कि इनकी संख्या मुख्य रूप से अठारह है, लेकिन असल में, और भी बहुत सारे पुराण हैं ।
साल के महीनों की महिमा का वर्णन, जैसे, तुला पुराण, नाग पुराण, वैशाख पुराण, ये सभी अठारह मुख्य और उप पुराणों में से हैं । हर पवित्र जगह पर एक ‘स्थल’ पुराण होता है । जैसा कि ऊपर बताया गया है, ये भी पुराणों में हैं । कुछ अलग ग्रंथ भी हैं ।
इतिहास पुराण – अंतर
रामायण और महाभारत बहुत पुराने समय से ज्ञानियों और आम लोगों की दो आँखों की तरह काम करते रहे हैं और उन्हें सही रास्ता दिखाते रहे हैं । इन दोनों को पुराणों की सूची में शामिल नहीं किया गया है, लेकिन उन्हें एक अलग वर्गीकरण अर्थात “इतिहास” से सम्मानित किया गया है ।
‘पुरा’ का अर्थ है अतीत में । जो अतीत की बातों का वर्णन करते हैं वे पुराण हैं । बेशक वे भविष्य के बारे में भविष्यवाणियों से भी निपटते हैं ।
पुराणों को न केवल अतीत की घटनाओं का वर्णन करने वाला माना जा सकता है, बल्कि इसका अर्थ ‘सुदूर अतीत में उनका उद्गम होना’ भी माना जा सकता है । सुदूर अतीत में, साहित्य कविता और नाटक तक ही सीमित था ।
गद्य में कहानियों का वर्णन बहुत बाद में आया । इसे ‘उपन्यास’ नाम दिया गया, जिसका अर्थ है नया । चूंकि इसमें कविता या नाटक का रूप नहीं था और चूंकि यह बहुत बाद में आया, इसलिए इसे ‘उपन्यास’ कहा गया ।
परिभाषा के अनुसार, पुराण में क्या होना चाहिए, इस मामले में उसे पाँच आवश्यकताओं को पूरा करना होता है, जिन्हें ‘पंच लक्षण’ या विशिष्ट चिह्न कहा जाता है । वे हैं: वे हैं: (1) सर्ग (यानी) दुनिया की असली रचना; (2) प्रतिसर्ग (बनने के बाद, दुनिया समय के साथ कैसे बढ़ी); (3) वंश यानी वंशावली, वंशज एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में कैसे आए; (4) मन्वंतर (चौदह मनुओं का इतिहास जिनसे सारी इंसानियत निकली, जिसमें एक हज़ार 4-युग चक्र का समय शामिल है) और (5) वंशानुचरित (यानी देश के शासकों का इतिहास, सूर्य वंश और चंद्र वंश जैसे राजवंशों की जानकारी) । इसके अलावा, इसमें अंतरिक्ष में इस दुनिया का ब्यौरा भी होना चाहिए । यहाँ, पुराण न केवल इतिहास बल्कि भूगोल का भी काम करता है ।
इतिहास इति-हा-असम् है । (इतिहासम्) । ‘इति-हा-असम्’ का मतलब है ‘ऐसा हुआ’ । बीच में ‘हा’ का मतलब है सच में, सचमुच, ज़रूर । इस तरह इतिहास बिना किसी अंदाज़े के तथ्यों का रिकॉर्ड है । यह उसी समय हुआ जब इसे लिखा गया था – या यह उसी समय लिखा गया था जब यह हुआ था । वाल्मीकि ने रामायण तब लिखी जब राम ज़िंदा थे । पाँच पांडवों के साथ, व्यास ने असल में महाभारत में बताई गई अलग-अलग घटनाओं को देखा था ।
हालांकि पुराण नाम के हिसाब से, उन्होंने बहुत पहले की घटनाओं के बारे में लिखा, उन्होंने अपनी रहस्यमयी शक्तियों से घटनाओं को वैसे ही याद किया होगा जैसे वे असल में हुई थीं । फिर भी, घटनाओं की सच्चाई उनके समय के लोगों, जो उनके समय में रहते थे, वे वेरिफ़ाई नहीं कर सके । लेकिन रामायण और महाभारत इस कैटेगरी में नहीं आते । जब उन्हें पहली बार लाया गया था, तब भी जो लोग उस समय ज़िंदा थे, वे इन महाकाव्यों में दिखाए गए अलग-अलग किरदारों और बताई गई घटनाओं से परिचित थे । इसीलिए, उनकी सच्चाई के बारे में हमारे शक को पूरी तरह दूर करने के लिए, उन्हें इतिहास कहा जाता है, जिसमें ‘हा’ ज़ोर देने के लिए है ।
इतिहास की महिमा
अगर पुराणों को वेदों का उपांग माना जाए, तो इतिहास को वेदों जितना ही महान माना जाता है ।
महाभारत को ‘पंचमो वेद’, यानी पाँचवाँ वेद कहा जाता है । रामायण के बारे में कहा जाता है कि जब वह पुरुष जिसे सिर्फ़ वेदों से जाना जा सकता है, दशरथ के बेटे के रूप में पैदा हुए, तो वेद भी वाल्मीकि के बच्चे के रूप में रामायण के रूप में प्रकट हुए ।
रामायण और महाभारत की कहानियाँ हमारे देश के लोगों के खून में हैं, ऐसा कहा जा सकता है ।
हर बड़े पुराण में कई लंबी और छोटी कहानियाँ होंगी । हर कहानी धर्म के किसी खास पहलू पर ज़ोर देगी । दूसरी ओर, इतिहास शुरू से आखिर तक एक लगातार चलने वाली कहानी है । हालाँकि महाकाव्य में कुछ बीच के हिस्से या दूसरी थीम वाली बातें हो सकती हैं, लेकिन वे मुख्य थीम के आस-पास ही घूमती रहेंगी । अगर पुराण हर धर्म को एक अलग कहानी के ज़रिए बताते हैं, तो इतिहास सभी धर्मों को एक मुख्य कहानी के ज़रिए दिखाता है । उदाहरण के लिए, हरिश्चंद्र पुराण में सत्य को धर्म के तौर पर मानने को एक अलग कहानी के तौर पर दिखाया गया है । नलायिनी की कहानी महिलाओं में पवित्रता (पतिव्रता) की महानता को दिखाती है । रंति देव की कहानी बहुत ज़्यादा त्याग और दया के अच्छे पहलू को सिखाती है । लेकिन, राम और पाँच पांडवों के जीवन के इर्द-गिर्द घूमने वाले इतिहास हमें दिखाते हैं कि कैसे उन्होंने मुश्किल हालात में भी धर्म के सभी अलग-अलग गुणों का पालन किया और धर्म तथा धर्म के नियम को बनाए रखा ।
भगवानों में फ़र्क क्यों
जब मैंने बताया कि हर पुराण एक खास भगवान की बड़ाई करता है, तो कुछ शक हो सकते हैं । शैव पुराणों में कहा गया है: “शिव ही परमात्मा तत्व हैं” या सबसे ऊपर वाले ‘सर्वोच्च’ हैं । वे बनाने, पालने और खत्म करने वाले हैं । विष्णु उनसे आदेश लेते हैं और उनके काम करते हैं । विष्णु सुख भोगते हैं – भोगी हैं – जो माया के भ्रम के जाल में फंसे होते हैं । सिर्फ़ शिव ही तपस्वी योगी हैं । वे शुद्ध ज्ञान के अवतार हैं – ज्ञान स्वरूपी हैं । विष्णु, शिव के अधीन हैं ।
विष्णु, शिव की पूजा करते हैं । ऐसी घटनाएँ हैं जो दिखाती हैं कि विष्णु ने शिव का विरोध किया और उनसे लड़ाई भी की, लेकिन आखिर में वे हार गए और उन्हें बेइज्जती झेलनी पड़ी वगैरह । अगर कोई वैष्णव पुराण पढ़े, तो वर्जन बिल्कुल उल्टा होगा और शिव के विष्णु के अधीन होने और उनके हाथों हारने के पक्ष में कई घटनाएँ मिलेंगी । वैष्णव प्रकरण (वर्जन) में ऐसा कहा गया है, “शिव जो आत्माओं और राक्षसों के साथ रहते हैं और श्मशान में रहते हैं, वे खुद को सबसे बड़ा भगवान कैसे कह सकते हैं ? वे तो ज़ाहिर है राजाओं के राजा वैकुंठ के भगवान के सेवक हैं ।”
यह विवाद शिव और विष्णु की महानता या सबसे बड़ा होने तक ही सीमित नहीं है । हर पुराण में किसी खास देवता की तारीफ़ की जाएगी । उस देवता को एकमात्र सबसे बड़ा और सबसे बड़ा भगवान बताया जाएगा और बाकी सभी देवताओं को कम अहमियत दी जाएगी । कहा जाएगा कि बाकी सभी उस खास भगवान (उस खास पुराण के) को मानते हैं और जब उन्होंने विद्रोह की, तो उन्हें दबा दिया गया और बेइज्जत किया गया, वगैरह-वगैरह ।
इसे देखकर, ऐसी अलग-अलग खबरों पर हैरानी होती है और सन्देह हो सकते हैं । कौन सी बात सच है और कौन सी नहीं ? ज़ाहिर है, ये सभी बातें सच नहीं हो सकतीं । अगर शिव के बारे में कहा जाए कि वे विष्णु की पूजा करते हैं, तो इसका उल्टा बेतुका है और ऐसा हो ही नहीं सकता । अगर देवी अम्बा तीनों मूर्तियों या ब्रह्मा-विष्णु-शिव की त्रिमूर्ति से बेहतर हैं, तो उन्हें शिव की पत्नी मानना गलत होगा, जो एक कर्तव्यनिष्ठ पत्नी के तौर पर अपने पति के अधीन रहती हैं । इसलिए, सभी पुराण सच्चे या असली नहीं हो सकते । तो कौन सा सही है ? या यह कि वे सभी झूठे हैं ? ऐसे शक हमें परेशान करते हैं ।
हालांकि तार्किक तौर पर (लॉजिकली) इन सभी विवादों को सच नहीं माना जा सकता, असल में, वे ऐसे हैं । एक भगवान एक समय हार जाता है, और दूसरे समय जीत जाता है । जिसकी एक समय पूजा होती थी, वह दूसरे समय पूजा करने वाला बन गया ।
यह कैसे हो सकता है? ऐसा क्यों होना चाहिए?
केवल एक परमात्मा हैं जो सृजन, पालन और विनाश का कारण बनते हैं । वही परमात्मा कई रूपों में प्रकट होते हैं । क्यों ? सांसारिक अस्तित्व को रोचक और सार्थक बनाने के लिए । सभी को एक रूढ़ प्रारूप (स्टीरियोटाइप) में बनाने के बजाय, भगवान ने विभिन्न मानसिक क्षमताओं और दृष्टिकोणों के साथ मनुष्यों को बनाया है । भगवान संबंधित मानसिक प्रवृत्तियों के अनुकूल विभिन्न रूप धारण करते हैं, ताकि प्रत्येक व्यक्ति अपने इच्छित देवता की पूजा कर सके और अच्छे अंत तक पहुँच सके । इसीलिए सर्वोच्च परमात्मा विभिन्न देवताओं के रूप में कई रूप धारण करते हैं ।
हर एक को अपने चुने हुए देवता पर अटूट विश्वास होना चाहिए । उन्हें विश्वास होना चाहिए कि उनका देवता सर्वोच्च और अंतिम ईश्वर है और उससे ऊपर कुछ भी नहीं हो सकता । इसीलिए प्रत्येक रूप में, भगवान खुद को बाकियों से श्रेष्ठ दिखाते हैं । बाकी लोगों को किसी विशेष की पूजा करते और संघर्ष में पराजित होते हुए दिखाया गया है । क्या यह इस बात को नहीं समझाता कि एक भगवान एक समय में दूसरों की पूजा करता है और दूसरे समय में सभी उसकी पूजा करते हैं, एक समय में सभी को हरा देता है और फिर हर एक से हार जाता है ?
शैव पुराण सिर्फ़ उन कहानियों का संग्रह है जिसमें सिर्फ़ शिव का ही दबदबा दिखाया गया है । वैष्णव पुराण उन घटनाओं का कलेक्शन होगा जो दूसरों के अधीन विष्णु की बड़ाई करते हैं । दूसरे पुराणों में भी ऐसा ही है ।
इस तरह, इसका मकसद किसी खास देवता की बुराई करना नहीं है । इसका मकसद अपनी पसंद के भगवान की बड़ाई करना है ताकि भक्त का ध्यान दूसरों को छोड़कर भगवान के उस स्वरूप या अवतार पर टिक जाए । इसे “अनन्य भक्ति” कहते हैं – यानी पूरी भक्ति । इसका मकसद किसी खास देवता की बड़ाई करना और उस देवता के प्रति भक्ति को बढ़ाना है, न कि दूसरों को बुरा-भला कहना । इसे “नहि निन्दा न्याय” कहते हैं ।
जो लोग सारी सृष्टि को एक ही परमात्मा के अलग-अलग रूप मानते हैं, उन्हें “अनन्य भक्ति” की ज़रूरत नहीं है । एक भगवान से दूसरे भगवान की ओर जाने का सवाल तभी उठ सकता है जब यह मान लिया जाए कि एक भगवान दूसरे से अलग है । अगर यह समझ लिया जाए कि कई रूप एक ही सत्ता के रूप हैं, तो सभी पुराण अलग-अलग रूप धारण करके उसी सत्ता की लीला विनोद बन जाते हैं । अगर यह समझ लिया जाए कि एक ही सत्ता कई तरह से काम करती है, ताकि अलग-अलग मानसिक बनावट वाले लोग संतुष्टि पा सकें, तो न केवल उनमें दिखने वाले विरोधाभास का आनंद लेना संभव होगा, बल्कि उनकी भक्ति भी विकसित होगी ।
एक और कारण भी है, यानी लोगों के लिए एक उदाहरण स्थापित करना । दुनिया में पवित्रता बढ़नी चाहिए । इसलिए, देवी अम्बा को अपने उदाहरण से रास्ता दिखाना चाहिए । इसलिए, हालांकि वह निर्विवाद रूप से महाशक्ति हैं, उन्हें अपने पति के संबंध में एक अधीनस्थ भूमिका स्वीकार करनी होगी । दुनिया में भक्ति फैलनी चाहिए, जिसके लिए भगवान को एक मिसाल कायम करनी चाहिए । इसीलिए कुछ कहानियों में विष्णु भक्त बन जाते हैं और शिव की पूजा करते हैं । कुछ दूसरे मामलों में, शिव विष्णु की पूजा करते हैं । इसलिए, पुराणों में जो साफ़ विरोधाभास है, जिसमें कभी एक देवता की तारीफ़ होती है तो कभी दूसरे की, उसे हमें किसी खास देवता की महानता समझाने की कोशिश के तौर पर लेना चाहिए ताकि हम पूरे दिल से उसकी भक्ति कर सकें । किसी खास भगवान का ज़िक्र ऐसे करना जैसे वह कोई छोटा देवता हो, असल में बुराई या बेइज्ज़ती बिल्कुल नहीं है । ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि मुख्य प्रकाश (स्पॉटलाइट) दूसरे पर पड़े और भक्त उस पहलू को मज़बूती से पकड़ सकें ।
एक ही अनेक
एक ही परमात्मा अलग-अलग देवी-देवताओं के रूप में प्रकट होते हैं । हर भक्त भगवान के किसी खास रूप से खास लगाव रखता है । हर भक्त के इस लगाव को और मज़बूत करने के लिए, परमात्मा कभी-कभी किसी खास गुण को दूसरे से कम करके किसी खास बात पर ज़ोर देते हैं ।
पुराने ज़माने में, स्ट्रीट लाइटिंग के लिए लालटेन का इस्तेमाल होता था (यानी) कांच के पिंजरों में लैंप रखे जाते थे । लालटेन चार तरफ़ वाली होती थीं, कुछ तीन तरफ़ वाली भी होती थीं । चलिए तीन तरफ़ वाली लालटेन को ही लेते हैं । रोशनी तीनों तरफ़ से फैलती थी । कभी-कभी सजावट के लिए तीनों कांच की खिड़कियों को अलग-अलग रंग से रंगा जाता था । नतीजतन, हर खिड़की से दिखने वाली रोशनी का रंग खिड़की के रंग जैसा होता था । वही परमात्मा बनाते हैं, पालते हैं और मिटाते हैं । इसका असली कारण वही चैतन्य (ज्ञान का प्रकाश) है । वह चैतन्य मानो तीन तरफ़ वाली लालटेन के अंदर हैं ।
तीन रंगों में से एक लाल है । वही सृजन (क्रिएशन) है । स्पेक्ट्रोस्कोप में, अगर लाल रंग को साफ़ रोशनी से अलग किया जाए, तो बाकी छह रंग भी अलग हो जाएँगे । यह सृजन है जहाँ एक (परमात्मा) कई बन जाते हैं । इसीलिए ब्रह्मा, जो बनाने वाले हैं, को लाल रंग का कहा जाता है । लालटेन में एक और रंग नीला है । यह स्पेक्ट्रम के आखिर का रंग है, वायलेट (बैगनी) । शुरुआत लाल (इन्फ्रा-रेड) है, और आखिर में वायलेट (अल्ट्रा-वायलेट) है । जब बनाई गई दुनिया बनी रहती है, तो महाविष्णु ‘ज्ञान’ से बताते हैं कि ‘इस दुनिया का असल में कोई वजूद नहीं है, न ही इसे पूरी और निरपेक्ष सत्ता जैसा सन्देह किया जाना चाहिए । यह एक भ्रम है और परमात्मा का खेल है’ । उस समझ की चमक में, पूरी अनोखी दुनिया राख में बदल जाती है । यह वह स्टेज है जब कोई चीज़ जल जाती है लेकिन राख और राख का बचा हुआ हिस्सा अभी भी अपना असली आकार बनाए रखता है, जिससे असली चीज़ के होने का भ्रम होता है । होने का दिखावा बना रहता है और असली रंग खो जाता है । दुनिया तो है लेकिन इसकी एक खास बात, यानी असलियत का दिखना जलकर राख हो गया है और बाकी राख की तरह काला हो गया है । “सर्वं विष्णु मायां जगत” – सब कुछ विष्णु है जिसे श्यामला या नीला रंग का माना गया है – “नील-मेघ-श्यामला” बताया गया है । नीला, काला, बैंगनी ये सभी रंग एक-दूसरे के करीब हैं । परमात्मा ने इन तीन ज़रूरी कामों को करने के लिए तीन तरफ वाली लालटेन जैसा रूप लिया है । जब रोशनी नीले रंग से रंगी हुई तरफ से निकलती है, तो हम उसे ‘विष्णु’ कहते हैं ।
रंगीन लालटेन का तीसरा हिस्सा सादा, बिना रंगा हुआ कांच है । जब सब कुछ ज्ञान की आग में जल जाता है, तो पहले यह कोयला या राख जैसा काला हो जाता है । अगर इसे और आग में रखा जाए, तो यह राख बन जाता है और ढांचा रह जाता है । फिर ढांचा भी टूट जाता है और अपना रूप पूरी तरह खो देता है । इस स्टेज पर, असली काला रंग पूरी तरह सफेद हो जाता है ।
सफेद रंग साफ रोशनी के करीब होता है । प्रकाश से उत्पन्न सभी रंग यानि, परमात्मा से उत्पन्न सभी अभूतपूर्व अस्तित्व, अपनी पहचान और व्यक्तित्व पूरी तरह खो चुके थे और फिर से परमात्मा बन गए थे । पृथक अस्तित्व, भ्रामक अस्तित्व, सभी समाप्त हो गए हैं और यह महा-भस्म परमेश्वर है । जब संहार के नाम पर सब कुछ नष्ट हो जाता है, हालांकि यह एक क्रूर कार्य प्रतीत हो सकता है, शिव विनाश पर नहीं रुकते बल्कि दुनिया को इसके मूल के साथ फिर से मिलाने का बहुत दयालु कार्य कर रहे हैं । जब विष्णु ने अपनी क्रीड़ा के माध्यम से ज्ञान को (अभूतपूर्व दुनिया पर) प्रकट किया, तो ‘सर्वम्’ (सभी) ‘जगत’ (दुनिया) देखने वाले को राख के टुकड़े की तरह दिखाई दिया । इसीलिए सर्वम् विष्णु मायां जगत की अभिव्यक्ति अस्तित्व में आई । जब सभी क्रीड़ा समाप्त हो जाती है और संहार या विनाश की अवस्था पर पहुँच जाता है, परम ज्ञान या सर्वोच्च ज्ञान के परिणामस्वरूप, न तो सर्व और न ही जगत का कोई अस्तित्व होता है । इसीलिए हम ‘शिव-मयम्’ कहते हैं, सिर्फ़ शिव ।
वही दीया – ‘ब्रह्म चैतन्यम’ या कॉस्मिक एंटिटी, जब लाल शीशे से देखा जाता है, तो उसे ब्रह्मा (क्रिएटर) कहा जाता है; नीले पैनल से वह विष्णु है और, बिना रंग वाले पारदर्शी (ट्रांसपेरेंट) तीसरे हिस्से से, वही चीज़ शिव है ।
ज्ञानियों ने परमात्मा की तारीफ़ “एक रूप जो तीन रूपों में दिखता है” के तौर पर की है । सभी महान कवि जो किसी खास फिलॉसफी या सिद्धांत के पक्के नहीं थे और जिनका दिमाग खुला और नज़रिया बड़ा था, वे इस बात पर एकमत थे कि वही एंटिटी तीन मूर्तियाँ बन गई हैं ।
अंग्रेज़ लोग भी जेहोवा, जोव या लॉर्ड का ज़िक्र उसी समझौते की भावना से करते हैं । जेहोवा हिब्रू और सेमिटिक कबीलों का भगवान थे जो बाइबल के जन्म के समय इज़राइल में रहते थे । जोव हेलेनिक धर्म का भगवान थे, जो ग्रीस और उसके आस-पास की दूसरी जगहों पर आम थे । लॉर्ड वह आम नाम है जिसका इस्तेमाल सभी धर्मों में भगवान को बताने के लिए किया जाता है । ईसाई धर्म के ईश्वर सेवकों ने भी कहा है कि नाम भले ही कई हों, लेकिन वे एक ही व्यक्ति के लिए हैं ।
यदि पुराणों का अध्ययन विनम्रता और सम्मान के साथ तथा उनसे लाभ उठाने की दृष्टि से किया जाए तो कोई भ्रम नहीं रहेगा । हमें यह समझने की बुद्धि होनी चाहिए कि इन्हें केवल हमारे भले के लिए बनाया गया है । आइए हम यह मान लें कि पूर्ण सत्य से थोड़ा सा विचलन भी अच्छे इरादे से किया गया है ।
काव्य – कविता
यदि कोई अच्छी चीज पूरी करनी है तो उसे तीन तरीकों में से एक से व्यवस्थित किया जा सकता है । एक है सरकार द्वारा कानून बनाने की तरह आदेश पारित करना । इसे “प्रभु सम्मिति” कहा जाता है, जिसमें मालिक नौकर को आदेश देता है । यहां, चाहे वह इसे पसंद करे या न करे, नौकर को आदेश का ईमानदारी से पालन करना होता है अन्यथा उसे दंडित किया जाएगा । दूसरी ओर, अधिकार की स्थिति से बोलने और आदेश देने के बजाय, एक मित्र हमें कोई काम करने के लिए कह सकता है जिसे हम तुरंत करते हैं । यहां (दंड का) कोई डर नहीं है । यहां सद्भावना और स्नेह है । हम यह अपने विश्वास के कारण करते हैं कि एक मित्र के रूप में वह हमारा केवल भला ही करेगा । इस तरह एक अच्छे दिल वाले दोस्त को “सु-हृत” कहा जाता है । इसलिए, एक साथी की हैसियत से हमसे कोई अच्छा काम करने के लिए कहना सुहृत्सम्मिति कहलाता है । लेकिन ऊपर बताए गए दोनों तरीकों से ज़्यादा आसानी से नतीजा पाने वाला है पत्नी जैसे प्यार करने वाले इंसान का कहना । अगर मालिक का हुक्म भारी हो, तो दोस्त के मुँह से वही बात हल्की हो जाती है । लेकिन, प्रेमिका से यह और भी हल्की हो जाती है और इसे कान्ता सम्मिति कहते हैं – कान्ता का मतलब पत्नी होता है ।
वेद प्रभु सम्मितम् हैं । पुराण सुहृत सम्मितम् हैं। काव्य (कविता) कान्ता सम्मितम् है, ऐसी स्थापित कहावत है ।
वेद सिर्फ़ कहता है “इस तरह करो और उस तरह करो । यह कारण नहीं बताता कि क्यों ?” पुराण क्या कहते हैं, “ठीक है, अगर तुम इस तरह करोगे, तो यह फ़ायदा है । अगर तुम इसे दूसरे तरीके से करोगे, तो यह नुकसान होगा ।” यह हमें एक कहानी सुनाकर कारण बताता है कि किसी काम को बताए गए तरीके से क्यों करना है । पुराणों की विशेषता केवल कारण बताना नहीं है । इसका उद्देश्य दिलचस्प कहानियों के रूप में संदेश प्रस्तुत करके हमारा ध्यान आकर्षित करना है ।
काव्य क्या करता है ? कवि क्या करता है ? वह अपनी रचनात्मक बुद्धि को तथ्यात्मक कहानियों के साथ मिलाता है । वह अपनी कल्पना से कहानियाँ बनाता है । कुछ मामलों को वह बार-बार दोहराता है । यह उसकी काव्यात्मक स्वतंत्रता है । वह साधारण तथ्य को दिखावटीपन से सजाता है और सभी की प्रशंसा और अपनाने के लिए एक शानदार पैटर्न बुनता है । मामले को एक दोस्त की तरह सीधे तरीके से प्रस्तुत करने के बजाय, कवि एक अच्छी पत्नी की तरह व्यवहार करता है । एक अड़ियल पति को मनाने के लिए, वह चुटकुले सुनाती है, मनाती है, खुश करती है, विनती करती है और अपनी बात मनवाने के लिए सब कुछ करती है । कविता पत्नी की भूमिका निभाती है । वेद गुरु की भूमिका निभाते हैं और इन दोनों के बीच मित्र की भूमिका है, पुराण, ये सभी हमारे मन में धर्म का संचार करते हैं ।
हरिः हरः!!
