वेदक उपांगः धर्म शास्त्र – पौराणिक लक्ष्य केँ प्राप्त करबाक मार्ग
एहेन देखल गेल अछि जे पुराणक पात्र सब हमरा सभक आदर्श आ रास्ता देखबयवला होइत छथि । हुनकर कथा-कहानी सब पढ़िकय, हम सब हुनका लोकनिक नीक गुण सब केँ अपनाबय लेल बाध्य भ’ जाइत छी । हालांकि एहेन इच्छा उत्पन्न होइत अछि, मुदा हर हाल (हालात) मे ओहि पर टिकल रहब असम्भव लगैत अछि । मनुष्यक स्वभाव छैक जे ओ हरेक समय किछु न किछु करैत रहय । मोन केँ एक क्षणहु लेल शान्त राखब असम्भव अछि । गीता मे भगवान कहैत छथि, “स्वभाव मनुष्य केँ एकहु क्षण लेल पर्यन्त शान्त भेने बिना किछु करैत रहय लेल बाध्य करैत अछि । तेँ ओकरा का करबाक सही तरीका सिखबाक चाही, आर एना कय केँ, अपना मोन केँ साफ करबाक चाही, नीक चरित्र आ आदत सब बनेबाक चाही आर फेर आदत (गुण) सब सँ उपर उठिकय ज्ञानी बनबाक चाही तथा ब्रह्म मे मिलि जेबाक चाही ।”
अगर हमरा सब केँ अपन धर्मक सिद्धान्त सब सख्ती सँ पालन करब अछि, अपन पाप सब सँ छुटकारा पेबाक अछि, आर आत्मा केँ शुद्ध कय केँ दुनिया मे होयवला परेशानी सब सँ मुक्तिक सुख मोक्ष पेबाक अछि, त कि करबाक चाही ? हमरा सभक जन्म सेहो पापहि केर कारण सँ भेल अछि । एकरा धो देबाक चाही । हमरा सब केँ दोबारा पाप नहि करबाक चाही । हमरा लोकनि केँ अपन मोन आ गुण केँ उपर उठेबाक चाही जाहि सँ ओ पाप मे नहि पड़य । यैह धर्मक उद्देश्य अछि । तँ हमरा सब केँ अपन धर्मक हिसाब सँ कि करबाक चाही ?
सामान्य रूप सँ, आइ हम सब रामायण, भागवत आर गोटेक पुराण सब सँ परिचित छी । एहि सँ पता चलैत अछि जे ई पात्र सब अलग-अलग समय आ स्थान पर कोन तरहक धार्मिक आदेश सभक पालन कएने रहथि । ई आदेश स्पष्टतया अथवा तय तरीका सँ (सूचीबद्ध रूप मे) नहि भेटैछ; एहि सभक चर्चा जहाँ-तहाँ भेटैत अछि । एहि आदेश सभक पालन करबाक तरीका सेहो पुराण या इतिहास मे नहि बतायल गेल अछि । तेँ, मात्र एहि सब बारे मे पता भेला सँ हम सब एकर पालन नहि कय सकैत छी ।
पुराण आर इतिहास केर मुख्य विषय भक्ति अछि । लेकिन कि हम सब पूरे २४ घंटा भक्ति (पूजा) ध्यान आर भगवानक गुणगान (स्तोत्र) गबिते बिता सकैत छी ? नहि । हमरा सब केँ अपन कर्तव्य परिवारक वास्ते करय पड़ैछ । खेनाय, नहेनाय, इत्यादि करबाक रहैछ, संगहि व्यक्तिगत आ शारीरिक जरूरत लेल सेहो अपन काज करबाक रहैछ । बाकी बचल समय मे सेहो पूजा लेल देनाय सम्भव नहि अछि । बोरियत होबय लगैछ । तेँ हमरा सब केँ अपन नीक कार्य करबाक लेल दोसरक निर्देश आ मार्गदर्शन सभक जरूरत पड़ैत अछि । हमरा लोकनि ई सब कतय सँ सिखैत छी ? केवल धर्मशास्त्र सँ । १४ विद्या मे, पुराणक बाद जे सबसँ आखिर मे अबैत अछि, ओ धर्मशास्त्र थिक ।
पुराणक पात्र हमरा सब केँ उद्देश्य देखबैत छथि । ताहि धरि पहुँचबाक तरीका बतायल गेल कर्म (कर्म-अनुष्ठान) केर असली अभ्यास सँ शुरू करब होइछ । एहि तरहें धर्मशास्त्र बतबैत अछि जे अपन दैनिक जीवन मे कि सब आ केना करबाक चाही । वेद अलग-अलग जगत सब पर जे हमरा सभक कर्तव्य बतेलक अछि, तेकरा उपांग सब क्रमबद्ध ढंग सँ आ विस्तार मे बतेलक अछि ।
गृहस्थी कर्तव्य, व्यक्तिगत कार्य, नहेनाय, खेनाय, ई सब शास्त्र मे बतायल गेल तरीका सँ करय पड़ैछ ।
वैदिक धर्म अपन नियम एहि तरहें बनेने अछि जे मनुष्यक कर्तव्य केर सब पक्ष स्वयं केँ आगू बढ़ेबाक (सेल्फ-एडवान्समेन्ट) वास्ते तथा स्वयं केँ बुझबाक (सेल्फ-रियलाइजेशन) कार्य मे मदति करय । ई धर्मक संग अपन जीवनक सबटा पक्ष केँ जोड़ैत अछि – जँ कोनो विशेष तरीका सँ सुतैत अछि त ई ओकर व्यक्तित्व (पर्सनैलिटी) नीक करय मे मदति करैत अछि; जँ कियो एकटा निर्धारित तरीका सँ कपड़ा पहिरैत अछि त ई बेहतर ढंग सँ जीवन जिबय मे सहयोग करैछ; अगर घर बनेबाक योजना मे कोनो तय नक्शा अनुसार घर बनैछ त ई अलग-अलग वैदिक रीति केँ उचित ढंग सँ करय मे मदति करतैक । धर्मशास्त्र सब मे निरपेक्ष जीवन तथा धार्मिक जीवन केँ अलग नहि कयल गेल छैक । वैदिक धर्मक मुताबिक निरपेक्षता केँ सेहो धर्मक दिश लय जाय लेल बनायल गेल अछि । जेहो काज कयल जाइत अछि, से धर्म पर आधारित होइत अछि आ स्वयं केर विकास केर कोशिशक हिस्सा होइत अछि । जेना निरपेक्षता (सेक्युलरिज़्म) आ धर्म केँ ओहि कर्तव्य सब मे एक कय देल गेल अछि जे मनुष्य केँ अपन मुक्तिक लेल करबाक होइत छैक, तहिना समाजक भलाइ आर दुनियाक भलाइ लेल सेहो चीज सब धर्मशास्त्र मे शामिल अछि ।
भक्ति, जेकरा हम सब एखन धरि पुराण मे देखलहुँ, वेदहु मे अछि । लेकिन एकरा संग बहुते रास कर्म या कर्तव्य सेहो अछि । जखन भक्ति केँ कर्म मे बदलल जाइछ, तखन पूजा करबाक लेल विस्तृत निर्देश निर्धारित कयल गेल अछि । पूजाक अलावा, यज्ञ (अनुष्ठान सम्बन्धी बलिदान), श्राद्ध (मृत्यु सम्बन्धी वार्षिकी संस्कार), तर्पण (पूर्वज सब केँ श्रद्धांजलि) सबटा वैदिक धर्म केर अपरिहार्य सहायक मानल जाइत अछि ।
वेद मे निस्संदेह ई सबटा शामिल अछि । लेकिन, ई सब कोनो एकटा स्थान पर संहिताबद्ध या प्रस्तुत नहि कयल गेल अछि । नहिये कर्म करबाक प्रत्येक प्रक्रिया केँ विस्तार सँ कहल गेल अछि ।
‘वेदो अखिल धर्म मूलम्’ मनु कहैत छथि, वेद अकेले मात्र धर्म केर आधार या जैड़ थिक जे कि करबाक जरूरत अछि आ एकरा केना कयल जेबाक चाही से तय करैछ ।
हालांकि वेद एकर एहि ढंग सँ रूपरेखा तैयार कएने अछि (डिजाइन कएने अछि) जे व्यक्तिगत मोक्ष (इन्डीविजुअल साल्वेशन) केर लेल कयल जायवला कर्तव्य सेहो अप्रत्यक्ष रूप सँ सामान्य कल्याण उत्पन्न करैछ (सभक लेल कल्याणकारी होइछ), आर एहि दुनू उद्देश्यक पूर्ति जे करैछ से धर्म थिक, मुदा हमरा सब केँ क्रमबद्ध या साफ-साफ या विस्तृत प्रक्रियागत निर्देशन रूप मे ई कतहु प्राप्त नहि अछि । एकर अलावे, वैदिक भाषा केँ बुझनाय अक्सर मुश्किल होइछ तथा ओकर मतलब सेहो हमरा सब केँ पूरापूरी स्पष्ट नहि भ’ पबैछ ।
तहिना वेद मे सँ, छठम् वेदांग ‘कल्प’ द्वारा, सूत्र सभक रूप मे कर्तव्य या कर्म केर एकटा व्यवस्थित आर समेकित सूची प्रस्तुत कयल गेल अछि । मुदा ई अपन स्वभावहि सँ संछिप्त रूप मे छैक तथा एकरा द्वारा विस्तार रूप मे मार्गदर्शन सेहो नहि कयल गेल छैक । मात्र धर्मशास्त्र टा एहि सूत्र सब केँ बुझय लायब बनबैत अछि आर ओकरा बिना कोनो सन्देह केँ बुझबैत सेहो अछि ।
धर्म सूत्र (अपस्तंभ, गौतम आ दोसर सभक) सूत्र केर नियम अनुसार, छोट आ सारगर्भित अछि । असल मे एकटा सूत्र केँ एहने हेबाको चाही । दोसर दिश, धर्मशास्त्र जे स्मृति थिक (मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर तथा दोसरक) श्लोक सभक प्रकृति (रूप) मे अछि ।
मुदा एहि सभक लेल सामान्य प्राधिकारी (कॉमन अथॉरिटी) वेद थिक । हमरा सब केँ कि करबाक चाही आ केना करबाक चाही, ई सब वेद मे साफ-साफ कहल गेल अछि आर हमरा सब केँ एहि आदेश सभक पूर्णतया पालन करबाक चाही । धर्मशास्त्रक काज वैदिक आदेश सब केँ अत्यन्त विस्तार सँ विश्लेषण करब आर बुझेनाय अछि, जे किछु हद तक कल्प मे संहिताबद्ध (क्रमानुगत सूचीकृत) कयल गेल अछि । अगर कल्प मुख्य रूप सँ यज्ञक स्थान, घरक निर्माण योजना वगैरह केर बारे मे बात करैत अछि, त धर्मशास्त्र मनुष्यक लेल जीवनक सब पक्ष केँ समेटैत आदर्श आचार संहिता (कोड अफ कंडक्ट) तय करैत अछि ।
“हम ई काज करय चाहैत छी । लेकिन हमरा नहि पता जे वेद मे कतय देखी जे ई काज कयनाय सही अछि कि गलत । वेद सच मे अन्तहीन लगैत अछि । ताहि सँ हमरा पता जे ई काज केना करबाक अछि, एकरा लेल कतय देखू । हमरा कियो एहनो नहि भेटैत अछि जे सबटा वेद मे निपुणता हासिल कएने हो, तखन हम कि करू ?” – ई किछु सवाल अछि ।
वेदक विशाल सागर मे सँ हमरा सब केँ जे चाही से चुननाय सचमुच एकटा असम्भव काज थिक ।
“अगर हमरा पता रहितय जे वेद मे कहल गेल अछि जे ई काज केना करबाक अछि, तँ हम जरूर मानि लितहुँ । एकरा बिना हम कि करू ?”
मनु एहि सवालक जवाब दैत छथि । “ठीक छैक – हम अहाँ केँ बतबैत छी । जे महर्षि लोकनि वेद मे निपुण भेलाह, ओ सब ‘स्मृति’ लिखलनि अछि । देखू ओ सब एहि विषय पर कि कहैत छथि । ‘स्मृति’ धर्म शास्त्र थिक ।”
‘स्मृति’ केर मतलब स्मरण शक्ति मे बढ़ोत्तरी करब होइछ । ‘विस्मृति’ केर मतलब अछि स्मरण शक्तिक हरेनाय (क्षीण भेनाय) । स्मृति वेदक वास्ते सहायक स्मरण अछि । वेदक बारे मे पूरा जानकारी राखयवला महर्षि लोकनि वैदिक आदेश (धर्म) आर कर्म (ओकरा केना करबाक अछि, एकर पूरा जानकारी) केँ एकत्रित कयलनि अछि आर ओकरा सही तरीका सँ बतौलनि अछि । ई स्मृति सब एहेन भाषा मे लिखल गेल अछि जे आसानी सँ बुझय मे आबि जाइत अछि । एकरा देखू । मनु कहैत छथि जे अहाँ केँ कि करबाक चाही या कि नहि करबाक चाही, केना करबाक चाही, ई सब साफ-साफ आ सविस्तार बतायल गेल अछि ।
कल्प, जे छठम् ‘वेदांग’ थिक, बतबैत अछि जे वैदिक आज्ञा सब केँ केना करबाक अछि । गृह्य सूत्र घरेलू रिवाजक बारे मे बतबैत अछि । श्रौत सूत्र अश्वमेध जेहेन पैघ यज्ञ सभक बारे मे बतबैत अछि । धर्म सूत्र मनुष्य केँ ओकर वर्ण जाहि मे ओ जन्म लेने अछि तथा जीवनक ओहि पड़ाव केर हिसाब सँ जाहि मे स्वयं केँ पबैत अछि तेकर निजी आ सामाजिक कर्तव्य सब सँ जुड़ल अछि ।
जहिया सँ कोनो जीव मायक गर्भ मे अबैत अछि, तेकर बाद जन्म सँ पैघ होयबा धरि, विवाह, घर-गृहस्थी संचालन तथा अन्त मे दाह-संस्कार धरि – जे-जे करबाक अछि ओ सब किछु स्मृति सब मे काफी मेंही आ विस्तारपूर्वक कहल गेल अछि । एहि मे एकटा तालिका (चार्ट) देल गेल अछि जेकरा लोक केँ भोरे उठय सँ लय केँ राति सुतय धरि नित्य दिन अनुसरण करबाक चाही । उपर कहल गेल पक्ष सब सँ जुड़ल १६ संस्कार प्रमुख अछि ।
स्मृति तथा सम्बन्धित आलेख (सपोर्टिंग टेक्स्ट)
मनु, पराशर, याज्ञवल्क्य, गौतम, हरित, यम, विष्णु, शंक, लिखित, बृहस्पति, दक्ष, अंगिरस, प्राचेतस, संवर्त, आसन, अत्रि, आपस्तंब, शततप – ई १८ महर्षि लोकनि अपन अलौकिक शक्ति सँ सम्पूर्ण वेद केर बात सब बुझि लेने रहथि आर हमरा सब केँ धर्म शास्त्रक रूप मे ओकर संग्रह (कलेक्शन) देलनि अछि । एकरा मनु स्मृति, पराशर स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, वगैरह कहल जाइत छैक, ओहि ऋषि लोकनिक नाम पर जे एकरा एकत्रित कयने रहथि । एकर अध्ययन कयला सँ हम सब कर्म (अनुष्ठान) आर धर्म केँ जानि सकैत छी ।
१८ स्मृति सभक अलावा, १८ पूरक आलेख (सप्लीमेंट्री टेक्स्ट) सेहो छैक जेकरा “उप स्मृति” कहल जाइत छैक ।
ई आम बात अछि जे श्रीमद् भगवद् गीता केँ सेहो एकटा स्मृति मानल जाइत छैक, हालाँकि एकर कथ्य (कंटेंट) सीधा वेद सँ उद्धृत (कोट) नहि अछि । चूँकि ई हमरा सभक विश्वासक समर्थन मे एकटा प्रमाण (अथॉरिटी) अछि, तेँ एकरा स्मृति केर दर्जा भेटल छैक ।
चूँकि एहेन कतेको स्मृति सब अछि, तेँ भ’ सकैत छैक कि जे बात एकटा मे छैक से दोसर मे नहि हो । किछु मामिला मे ओहि मे कहल गेल कथन (बात सभक) बीच थोड़ेक अन्तर सेहो हो । तेँ किछु छोट-मोट शंका एखनहुँ धरि बनले अछि । एहेन शंका सब केँ दूर करबाक लेल धर्म शास्त्र निबंध नामक किछु ग्रन्थ अछि ।
किछु स्मृति सब किछु खास मामिला टा पर रुकि जाइत अछि; ओहि मे पूरा निर्देश नहि होइत छैक । किछु मे संध्या वंदना केर रिवाज नहि अछि, जेना कि जे ‘जरूरी’ अछि ओकरा दोहरेनाय फालतू या बेकार होयत, आर जे पारंपरिक रूप सँ एक पीढ़ी सँ दोसर पीढ़ी केँ देल जाइत रहल अछि तेकरा बेर-बेर लिखनाय कोनो जरूरी नहि छैक । गोटेक मे श्राद्धक निर्देश नहि अछि, गोटेक मे ‘शौच’ या सफाइ केर निर्देश नहि अछि । “एहि तरहें खाउ आ एहि तरहें साँस लियह” – ई जरूरी नहि जे लिखल निर्देश केर रूप मे हो । शायद स्मृति सभक लेखक एहि तरहें छूटल बात सब केँ मानने होइथ ।
“निबंध ग्रंथ” मे ओ सब किछु अछि जे कहल जेबाक अछि, बिना किछु छोड़ने, ई मानिकय जे ई एतेक बेसी जानल-बुझल छैक जे एकरा दोहरेनाय जरूरी नहि छैक । जखन स्मृति सब मे कनेक अन्तर होइत छैक, त ई ‘निबंधन’ मिलान (reconciliation) या संश्लेषण (synthesis) करैत अछि तथा स्पष्ट तौर पर जरूरत केँ पुष्टि करैत अछि ।
ई निबंधन ओहि महान लोक सभक मेहनत केर नतीजा अछि जे सबटा स्मृति केँ पढ़ने रहथि, बदलाव सब केँ मिलेने रहथि तथा बिना कोनो शंकाक जगह छोड़ने निष्कर्ष निकालने रहथि ।
एहि तरहे, अपन देश मे, हरेक इलाका एकटा खास निबंधन ग्रंथ केँ मानैत अछि । महाराष्ट्रक लोक काशी नाथ उपाध्याय केर लिखल निबंधन ग्रंथ केँ मानैत अछि, जेकरा ‘धर्म सिंधु’ कहैत छैक । मिताक्षरा याज्ञवल्क्य स्मृति पर लिखल गेल एकटा भाष्य (कमेंट्री) थिक । जखन कोनो हिन्दू कानून पर सन्देह होइत छैक त एकरा (मिताक्षरा केँ) कानूनक न्यायालय (कोर्ट) मे एकटा प्रमाण (अथॉरिटी) केर तौर पर स्वीकार कयल जाइत अछि । कानूनक न्यायालयों (कोर्ट) मे एकरा कानून बराबर दर्जा देल गेल अछि । दक्षिण (भारत) मे लोक वैद्यनाथ दीक्षित केर लिखल ‘वैद्यनाथ दीक्षितयम’ नामक किताब केर अनुसरण करैत अछि । ई गृहस्थधर्मी लेल बहुत जरूरी अछि । संन्यासी ‘विश्वेश्वर संहिता’ नामक किताब सँ सीखैत छथि जे हुनका कि करबाक चाही आ कि नहि । तमिलनाडु मे, धर्म शास्त्र ‘वैद्यनाथ दीक्षितयम’ केर दोसर नाम (पर्यायवाची) अछि । धर्म शास्त्र केँ पढ़य आ बुझय लेल भाषाक थोड़-बहुत जानकारी पर्याप्त होयत । ई वेद जेकाँ नहि जे पढ़य आ रटय के बादो मतलब स्पष्ट नहि होइत छैक । वैद्यनाथ दीक्षितयम केर बहुते रास अनुवाद (ट्रांसलेशन) सेहो भेल अछि ।
सभक लेल वेद केँ माननाय कोनो आसान काज नहि छैक, जे श्रुति अछि, आर बुझबयवला सूत्र जे पहिनहिं सँ कल्प सूत्र, धर्म सूत्र, श्रौत-गृह्य सूत्र तथा स्मृति सभक रूप मे मौजूद छल, आर कतेको रास निबन्ध ग्रन्थ जे बाद मे सोझाँ आयल । दीक्षितयम केर आधिकारिक पाठ (प्रमाण ग्रन्थ) केर जगह लेबाक यैह कारण छैक जे दीक्षित पूर्णतया निष्पक्ष रहल छथि तथा एकटा व्यापक दृष्टिकोणक संग, शब्द सभक अर्थ केँ निर्धारण करबाक लेल मीमांसा मे वर्णित पद्धति केँ अपनौलनि अछि । सब पूर्ववर्ती शास्त्र सब केँ ध्यानपूर्वक एकत्रित कयलाक बाद, ओ साहसपूर्वक विरोधाभास सब केँ सुलझौलनि अछि । जाहि स्थान पर स्मृति सब मे मतभेद छल, ओ उदार हृदय सँ ई कहिकय गतिरोधक हल कयलनि अछि, “प्रत्येक व्यक्ति केँ अपन क्षेत्र मे प्रचलित प्रथा केँ अपनेबाक चाही, ई सब ओहिना कयल जेबाक चाही जेना प्रत्येक परिवारक बुजुर्ग लोकनि कएने रहथि,” यानि शिष्टाचार मुताबिक सब काज करू ओ कहलनि ।
स्वतंत्रता बनाम अनुशासन
एहिठाम हमरा गोटेक सामान्य बात कहब जरूरी अछि । कियो कोनो विषय केर कतबो गहिंराइ सँ विश्लेषण कय लियए या कतबो विस्तार सँ बुझेबाक कोशिश कय लियए, ओहि अनगिनत परिस्थिति केँ समेट पेनाय असम्भव होयत जे मनुष्य अपन जीवन मे सामना करत (भोगत) तथा तखन हर समस्याक जवाब दय पायत । लिपि मे लिखल सिद्धान्त सभक पालन करब, विधान केर पुस्तक सब मे लिखल कानून जेकाँ कठिन होयत । ई सच छैक जे नियम सब सँ सख्त अनुशासन हेबाक चाही आर ओ सब मानय लायक हेबाक चाही, हमरा लोकनिक शास्त्र मे ई सब बहुते बेसी अछि । लेकिन हम सब (असल) व्यवहार मे देखैत छी जे ‘स्वतंत्रता’ आ ‘लोकतंत्र’ जेहेन बड़का-बड़का शब्द, वास्तव मे, अपन मर्जी सँ काज करबाबैत अछि, या मजबूत (बहुमत) लोक कमजोर (अल्पसंख्यक) केँ समस्या मे डालि दैत अछि । तेँ नियम बनाबय सँ लागयवला रोक (पाबन्दी) सब पर सेहो एकटा सीमा लगाकय कम कयल जेबाक चाही । दोसर शब्द मे, पाबन्दियो सभक एकटा सीमा हेबाक चाही, नहि तँ मनुष्य स्वाभावक हिसाब स, कड़ा रोक (पाबन्दी) विरूद्ध बगावत केर कारण बनि जायत । बहुत बेसी अनुशासनक नतीजा सिर्फ नियम तोड़ब होयत ।
तेँ यद्यपि अपन शास्त्र द्वारा सब मामिला मे दिशानिर्देश प्रदान कयल गेल अछि, धरि ओकरा ‘कानून’ वला बाध्यकारी शक्ति केँ ग्रहण नहि कयने अछि । बड़-बुजुर्गक उदाहरण केँ अनुसरण करिते आर स्वेच्छा सँ अनुसरण करबाक लेल लोक (व्यक्ति) पर छोड़ि देल गेल अछि जे ओ अपन स्वतंत्र इच्छाक प्रयोग करय । पैघ लोकक व्यक्तिगत उदाहरण, परम्परा, स्थानीय रीति-रिवाज, पारिवारिक रीति-रिवाज आदिक आधार पर व्यक्तिगत आचरण मे थोड़ेक निजी पसिन या स्वतंत्रता छोड़ल जेबाक चाही, जाहि सँ आर मामिला सब मे लोक सँ अनुशासनक कड़ा लिखित संहिता (कोड) केर पालन कयल जेबाक उम्मीद कयल जा सकय । दोसर केँ एहि सिद्धान्तक पालन करेबाक सब सँ नीक तरीका व्यक्तिगत उदाहरण स्थापित करब अछि । ऐगला सब सँ नीक तरीका बिना कोनो दबाव केर मात्र अनुनय (आग्रह) रूप मे मौखिक निर्देश होइछ । अन्तिम उपाय कानून बनेनाय आ ओकर अनुपालन लागू करेनाय अछि ।
“सहस्रं वद एकं मा लिखऽ” एकटा पुरान कहावत अछि । एकर मतलब अछि जे अहाँ कोनो व्यक्ति केँ बुझेबाक लेल १००० शब्दक उपयोग कय सकैत छी, लेकिन एकहु टा शब्द लिखित रूप मे नहि दी आ अनुपालनक वास्ते मजबूर नहि करी । वर्तमान समयक व्यवस्था प्रत्येक विषय पर (लिखित) कानून बनेनाय अछि । आर कोनो राय तुरन्त प्रकाशन लेल तैयार रहैत अछि ।
हालांकि धर्मशास्त्र सभक आलोचना एहि बात लेल कयल जाइछ जे ओ हजारों आदेश देने अछि आर मनुष्य केँ कोनो स्वतंत्रता नहि देने अछि, मुदा असल मे ओ एहि आजादी या स्वतंत्रताक हित मे बहुते रास बात अनकहे छोड़ि देने अछि (कहय सँ परहेज कएने अछि) । धर्मशास्त्र केर लेखक लोकनिक ई सोचल-बुझल नजरिया (दृष्टि) रहलनि अछि जे जँ कोनो लोक केँ स्वयं केँ आ समाज केँ बर्बाद नहि करय देबाक अछि, तँ ओकरा लेल पक्का मार्गदर्शन आर सख्त नियंत्रण हेबाके टा चाही । लेकिन अगर एहि सबकेँ ‘कानून’ केर रूप मे लिख देल जाय त जनता अपना केँ बहुते बेसी बन्धन मे बन्हायल अनुभव करत । तेँ, आदेश सभक मात्र एकटा हिस्से टा लिखल गेल अछि, बाकी केँ इलाका या परिवारक रीति-रिवाज आर परम्परा सभक आधार पर मानबाक लेल छोड़ि देल गेल अछि ।
शास्त्रीय आदेश सब सँ उत्पन्न होयवला ‘रोक’ (पाबन्दी) केर भावना तखन अनुभूति नहि होइछ जखन वैह चीज पैघ लोक (बड़-बुजुर्ग सब), परम्परा सब, उपदेश सब आदिक रूप मे होइछ । क्षेत्र विशेष (इलाका) आर परिवारक परम्परा केँ खुशी-खुशी मानि लेल जाइत अछि कियैक तँ ओ एक तरहक व्यक्तिगत समर्पण केर भावना जगबैत अछि ।
एहेन नहि छैक जे धर्म शास्त्र पर लिखल आखिरी किताब, यानी ‘वैद्यनाथ दीक्षितम’ टा एहेन पैघ हृदय वला नजरिया केँ मानने हो । पहिनेक सबटा पुस्तक सब मे सेहो एहेन विचार छलैक । आपस्तंब सूत्र मे, जेकरा बेसी प्रामाणिक मानैत अछि, महर्षि आपस्तंब आखिर मे कहैत छथि: ‘हम एहि शास्त्र मे सबटा धर्म केँ शामिल नहि कएने छी । आरो बहुते किछु बाकी (छूटल) अछि । कतेको रास एहेन धर्म अछि जे महिला समाज आ चतुर्थ वर्ण (शूद्र लोकनि) सँ सीखल जा सकैत अछि । अहाँ सब हुनका सब सँ ई सिखि सकैत छी ।’
एहि सँ पता चलैत अछि जे ई आरोप कतबा गतल अछि जे मर्द सब औरत सब केँ दबाकय रखलक अथवा ब्राह्मण सब गैर-ब्राह्मण केँ कमतर दर्जा देलाह । धर्म शास्त्र पर एकटा प्रमाणिक अधिकार (अथॉरिटी) वला एहि महान किताब मे, औरत व गैर-ब्राह्मण सभक समझदारी केँ एहि हद धरि ध्यान देल गेल अछि जे हुनके सब केँ धर्मक अधिकारी बनायल गेल अछि ।
आश्वलायण जेहेन मौलिक सूत्रकार लोकनि कहलनि अछि जे विवाहक दरम्यान, महिला लोकनिक ई निर्णय जे आरती कखन आ केना कयल जायत (खराब नजरि सँ बचेबाक लेल दूल्हा-दुल्हिन केर सोझाँ जरैत कपूर वला आरती लहरायल जाइछ) आर दुल्हिन केर अभिषेक कयल जाय, तेकर पालन करय पड़ैत छैक । हालांकि विवाहक पंडाल केर नींव रखबाक लेल एकटा खास मंत्र छैक, लेकिन परम्पराक आधार पर अनुभवी कारीगर (चतुर्थ वर्ण) केर एहि बारे मे कि कहब छैक, ताहि पर ध्यान देबाक चाही ।
एहि तरहें शास्त्र कोनो मनुष्य केँ रोकैत नहि अछि बल्कि ओकरा काफी हद तक लोकतांत्रिक स्वतंत्रता दैत अछि ।
धर्म शास्त्र ओहि रस्म आ रीति-रिवाज सभक बारे मे सेहो बतबैत अछि जे चारिम जातिक लोक केँ करबाक रहैत छैक; ओहि जाति केँ किन्नहुँ नहि नजरन्दाज कयल गेल अछि । दीक्षितिया मे, एकर चर्चा वर्णाश्रम कांड, आह्निका कांड तथा श्राद्ध कांड मे विस्तार मे भेटैत अछि ।
आमतौर पर, धर्म शास्त्र दुइ कांड मे बँटल रहैछ – यानी आचार कांड, और व्यवहार कांड । व्यक्तिगत व्यवहार आचार थिक । व्यवहार कानून सँ सम्बन्धित अछि ।
चिन्ह – पहिचानक निशान
अगर हम कोनो खास धर्म सँ जुड़ल छी, त से देखबैक वास्ते किछु बाहरी निशान (symbol) या ‘चिन्ह’ रखैत छी ।
स्काउट्स केर एकटा खास पहनावा (यूनिफॉर्म) होइत छैक । सेना (आर्मी), नेवी वला सभक पहिचानक अत्यन्त खास निशान होइत छैक । पुलिस मे सेहो, ओकरा भीतर आर कतेको उप-विभाग (सब-डिवीजन) सब होइत छैक । अगर ओ अपन ड्रेस या बैज बदैल लैत अछि, तैयो ओकरा सभक काज कोनो तरह सँ असर नहि पड़तैक । तैयो, बहुत पक्का नियम छैक जे (बिना ई विशेष पहिरावा) ओ सब ओहेन किछु नहि कय सकैछ । नाविक (सेलर) पुलिस वलाक ड्रेस नहि अपना सकैछ । हरेक सेवा (सर्विस) मे अनुशासन आर व्यवस्था हेबाक चाही । कि वैह अनुशासन आर व्यवस्था धर्म पर सेहो लागू नहि हेबाक चाही ? तेँ अलग-अलग काज (जाति-वर्ण) आर जीवनक अलग-अलग आश्रम (जीवनक विभिन्न चरण-अबस्था) मे रहयवला लोकक वास्ते अलग-अलग पहिचान केर निशान आर अलग-अलग काज तय कयल गेल अछि । स्थानीय रेबाज कहैत अछि जे अपन धोती एहि तरहें पहिरू; अपन साड़ी एहि तरहें पहिरू – अपन माथा पर एकटा निर्धारित ठोप-टिका (निशान) लगाउ, आदि ।
ई सिर्फ एकटा सामाजिक (सोशल) अनुशासन केर तौर पर नहि बनायल गेल छल । एहि मे सँ प्रत्येक केर अपन एकटा सूक्ष्म पक्ष रहैक, जे एकरा प्रशंसनीय बनबैत छैक, जेना कि लोक केँ शुद्ध करब आ आध्यात्मिक मार्ग पर आगू बढ़य मे ओकर सहायता करब ।
ऑफिस मे चपरासी केँ यूनिफॉर्म पहिरय पड़ैत छैक, ऑफिसर केँ नहि । हम सब सवाल नहि उठबैत छी जे एना कियैक, मुदा जखन शास्त्र हरेक काज आ जीवनक हर पड़ाव लेल अलग-अलग विशेषता बतबैत अछि, त हम सब बराबरी आ स्वतंत्रताक नाम पर एकर बेकारियत पर विरोध जतबैत छी । वर्ण केर पुरान अस्तित्व पर आधारित हमरा सभक खास व्यवस्था, जाहि मे सभक लेल कर्म (जातीय कर्म) निर्धारित कयल गेल अछि, तथा जे सभक भलाइ वास्ते अछि, से मात्र लोकक जिबय के तरीकाक हिसाब सँ अलग-अलग तरहक निजी व्यवहार (आचार) आर रीति-रिवाज (अनुष्ठान) सब निर्धारित (तय) कयल गेल अछि ।
एहि बात केँ नजरअन्दाज कय देल गेल अछि आर ऊंच-नीच (जाति) केर एकटा काल्पनिक वर्गीकरण (जाति आधारित विभाजन) निर्धारित कय देल गेल अछि, जेकर परिणामस्वरूप निन्दा आर विद्रोह भेल । आखिरकार आइ हम सब एहेन हालत मे पहुँचि गेलहुँ जेतय केकरो पास पहिचान कोनो धार्मिक निशान नहि बचल अछि ।
हम सब आन सामाजिक प्रतीक (दोसरक पहिचानक पहिरावा आदि) केँ बिना कोनो लाजक (खुलेआम) प्रदर्शित करबाक लेल तैयार रहैत छी । लेकिन हमरा ओहि धार्मिक निशान सब सँ लज्जाक अनुभूति होइत अछि जे आत्माक भलाइ करबाक लेल बनायल गेल अछि । हम सब एहि सब केँ सबटा अंधविश्वास अछि से कहल करैत छी । हम सब अपना मे सुधार (प्रगति) केर नाम पर एकरा छोड़ि दैत छी; लेकिन यैह देखेबाक लेल जे हम सुधारवादी छी, हम सब एकटा खास टोपी पहिरैत छी । अथवा हम सब एकटा खास रंगक कमीज आर गमछा ओढ़ैत छी । हम सब एकरा (ई सुधारवादी हेबाक देखाबा वला निशानी केँ) भगवानहु सँ बेसी महत्व दैत छी ।
स्मृति सब अपना मर्जी सँ नहि बनल अछि
जे लोक स्मृति, जे कि धर्मशास्त्र थिक, तेकर आदर करैत छथि, ओ लोक सेहो ओकर बारे मे एकटा गलत सोच रखैत छथि । यानी, ओ सब सोचैत छथि जे स्मृति सभक लिखयवला अपना मर्जी सँ ई सिद्धान्त बनौलनि अछि । स्मृति सब केँ कानून बनबयवला जेकाँ कहल जाइत अछि । अर्थात्, हुनका सब केँ अपन मर्जी आ खुशी सँ कानून बनबयवला मानल जाइत अछि, ठीक ओहिना जेना किछु वकील सब मिलिकय (भारतीय) संविधान बनौने रहथि, जे कि लोक प्रशासन (पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन) केर सिद्धान्त बतबैत अछि । स्मृति सब केँ अपन बनायल विचार केँ बताबयवला मानल जाइछ ।
एहि सँ एकटा आर निष्कर्ष निकलैत अछि । जखन संविधान केर कोनो खास विधान (नियम) केँ माननाय मोस्किल लगैत अछि, त फेर हम सब अपना पसिनक हिसाब सँ ओहि मे बदलाव अनैत छी । एहि तरहें, ई सवाल सेहो पूछल जाइछ जे हमरा सभक धर्मशास्त्र सब मे देल गेल पुरान कानून सब केँ वर्तमान परिस्थितिक हिसाब कियैक नहि बदैल सकैत छी ?
हम सब धर्मशास्त्र सब केँ आजुक प्रचलन (ट्रेंड) केर हिसाब सँ कियैक नहि बदलैत छी ? एकर समर्थन मे सरकार द्वारा नियम सब मे बदलाव करैत रहबाक बातक उदाहरण देल जाइछ ।
लेकिन बहुते लोक केँ, जेकरा मे धर्मशास्त्र सभक बहुत सम्मान करयवला लोक सेहो शामिल छथि, ई नहि पता छन्हि जे, “एहि स्मृति सब मे ओकर लेखक लोकनिक निजी राय (विचार) नहि छैक । ओ सब मात्र वेद सब मे कहल गेल बात केँ निकाललनि आ एकत्रित कयलनि अछि । चूँकि वैदिक आदेश (निर्देश) कोनो हाल मे बदलल नहि सकैछ, तेँ धर्मशास्त्रक नियम सब केँ बदलबाक सवाले नहि उठैत अछि ।”
अगर स्मृति मात्र ऋषि लोकनिक सृजन होइतैक, तँ हमरा लोकनि केँ ई पूरापूरी मानय लेल बाध्य नहि होइतहुँ । जँ हमरा पसिन नहि अछि त हम ओ मानय सँ मना कय सकैत छी । हम ओकरा बिना सेहो काज सकैत रही यदि ओ लोकनि एहेन बात बतेने रहितथि जे वेद सब मे नहि भेटितय; अगर ओ सब अपना समझ सँ सोचने रहितथि जे मनुष्य लेल कि नीक अछ कि नहि । एहि तरहें, बहुते लोक अपना मोनक हिसाब सँ लिखलनि अछि; हमहुँ सब एहिना अपना लेल कानून बना सकैत छी ।
असल मे स्मृति सब वैदिक नियम सभक पूरा पालन करैत अछि आर तेँ हमरा सब केँ ई एखन आ हमेशाक लेल अपन प्राधिकारी (औथरिटी) मानबाक चाही ।
फेर सवाल ई उठैत अछि जे एहि दावा केर आधार या सबूत कि अछि जे स्मृति सब वेदहि केर आधार पर लिखल गेल अछि ।
मात्र वेदहि टा स्मृति सभक आधार अछि
सबसँ पैघ सबूत महाकवि सभक निर्णय (निष्कर्ष) मे भेटैत अछि । अपन धर्म केर संस्थापक शंकर, रामानुज आर माधव एहि बात केर पुष्टि कयलनि अछि जे धर्मशास्त्र वेद पर आधारित अछि ।
लेकिन फेर शायद एकरा बिना गलती के नहि मानल जा सकैछ कियैक तँ ओहो सब अपन-अपन सिद्धान्तक प्रति बहुत बेसी ईमानदार छलथि । ओ सब प्राचीन मूल्य सभक रक्षा लेल प्रतिबद्ध रहथि । ताहि सँ ओ लोकनि परम्पराक सीमा सँ बाहर कोनो उपदेश नहि दैत छलथि । मुदा कवि सब मे एहेन कोनो बाधा (रुकावट) नहि छैक । ओ सब कोनो सिद्धान्त केँ स्थापित (सत्य सिद्ध) करबाक लेल नहि तँ समर्पित छथि आर नहिये प्रतिबद्ध । ओ सब बिना कोनो पन्थ केर भेदभाव केँ, जेना हुनका देखाय दैत छन्हि, तेनाही ओ सत्य बजैत छथि ।
सब महाकवि लोकनि मे सर्वाधिक प्रसिद्ध, कालिदास अपन रघुवंश मे श्रुति सभक जिकिर एहि तरहें कएने छथिः “श्रुतेरिवार्थं स्मृतिरन्वगच्छत्” । सुदक्षिणा गाय केर पदचिन्ह पर चललिह, जेना स्मृति श्रुति केर अर्थक अनुसरण करैत अछि ।
एतय, जखन ई बतायल जाइछ जे जखन दिलीप गाय चरेबाक लेल गेलाह त सुदक्षिणा गाय केर खूरक चिन्ह पर केना चललिह, त कालिदास बतबैत छथि जे ऋषि लोकनि द्वारा स्मृति सब केना बनायल गेल । हुनकर उद्देश्य हमरा सब केँ ई बतेनाहि नहि रहनि जे ऋषि लोकनि कि कयलनि या स्मृति सब केना बनायल गेल ।
ई आम बात छैक जे उपमा (उपमान) केर विषय ओहि चीज (उपमेय) सँ बेहतर होइत छैक जाहि सँ ओकर तुलना कयल जाइत छैक । उदाहरण लेल, जखन केकरो चेहराक तुलना चाँद या कमल सँ कयल जाइत छैक, तखन चाँद या कमल असल मे देखय मे चेहरा सँ बेसी सुन्दर लागत । एतय उपमाक विषय अत्यन्त पवित्र (पतिव्रता) सुदक्षिणा छथि जे अपन पति दिलीप केर चलल बाट पर चलि रहल छथि । ई तार्किक स्तर पर यैह बतबैत अछि जे स्मृति श्रुतिक आरो बेसी नजदीक सँ अनुसरण करैत अछि । तेँ उपमा दय मे महारत हासिल कएने कालिदास, एहि तुलनाक सहारा लैत छथि । तेँ ई साबित करबाक लेल कोनो आर सबूतक जरूरत नहि होयत जे श्रुति पूरापूरी स्मृतिक अनुरूप टा चलैत अछि ।
आब ओ नियम (अनुष्ठान) जे वेद मे साफ-साफ नहि बतायल गेल अछि, लेकिन स्मृति सब मे साफ कयल गेल अछि, ओकरा स्मार्त-कर्म कहल जाइछ । जे वेद मे साफ तौर पर बतायल गेल अछि, ओकरा श्रौत-कर्म कहल जाइछ । एहि सँ ई निष्कर्ष नहि निकलबाक चाही जे स्मार्त कर्म कोनो भी तरह सँ श्रौत कर्म सँ कम अछि ।
गृहस्थक लेल सब सँ जरूरी उपासना, घर पर कयल जायवला कर्म जेकरा गृह्य-कर्म कहल जाइछ, वैदिक-कर्म मे सबसँ जरूरी, पितृ-श्राद्ध, पाँच यज्ञ – ई सबटा स्मार्त कर्म थिक । ई सब करय मे वेद मंत्रक प्रयोग होइत अछि । एहि द्वारे ई साफ अछि जे स्मृति सभक लेखक लोकनि एहि जिम्मेदारी सब केँ बतबैत समय श्रुति केर भावना केँ बुझने रहथि । तेँङ ई सोचबाक बदला जे स्मृति श्रुति सँ कम अछि अथवा पुराण स्मृति सँ कम अछि, एहि सबटा केँ एक संग, एकटा सम्मिश्रित पैकेट (कंपोजिट पैकेज – समग्र स्वरूप) केर तौर पर देखबाक चाही ।
पुराण वैदिक धर्म केँ कहानी रूप मे बतबैत अछि । वैदिक धर्म आर कर्म कहानीक रूप मे नहि, बल्कि स्मृति द्वारा सलाह आर निर्देश सभक रूप मे प्रस्तुत कयल गेल अछि । ई कर्म करबाक तरीका सेहो बतबैत अछि । वेद ऋषि लोकनिक समझ मे आसानी सँ आबि गेलनि । बाद मे, ऋषि सब केँ जे किछु ओ देखने रहथि, से याद अयलनि आर ओ स्मृति बनि गेल । पुराण वेद मे मौजूद सच्चाइ आर कहानी सभक सम्बन्ध मे बतबैत अछि । सबटा पूर्ण विश्वसनीय अछि ।
एहि तरहें श्रुति, स्मृति आर पुराण सबटा धर्मक बारे मे बतबैत अछि ।
आर हमरा सभक आचार्य आदि शंकराचार्य श्रुति, स्मृति एवं पुराण सब मे मौजूद धर्मक भंडार छलाह । तेँ हम हुनका एहि पुनीत अभिवादनक भाव-शब्दक संग नमन करैत छीः
श्रुति स्मृति पुराणानामालयं करुणालयं ।
नमामि भगवत्पादशंकरं लोकशंकरं ॥
हरिः हरः!!
THE UPAANGAS DHARMA SAASTRA THE ROAD TO REALISE THE PURAANIC GOAL
It is seen that the characters in the Puraanas are our ideals and pace-setters. On reading their stories, we are impelled to emulate their noble qualities. Although such desire is born, it is found impracticable to stick to them under all circumstances. It is the nature of man to keep doing something or the other at all times. It is impossible to keep the mind still even for a second. In the Gita, the Lord says “Nature impels man to keep doing something without keeping still even for a second. Therefore he should learn the proper method of doing things, and by so doing, cleanse his mind, acquire good character and habits and then transcend the habits (Gunas) and become a Jnaani and merge with the Brahiman.”
What should be done, if we are to strictly follow the tenets of our faith, rid ourselves of sins, and having purified the soul attain Moksha the happiness of release from worldly troubles. Our very birth has been due to sin. This should be washed off. We should not sin anew. We should elevate our minds and Gunas so that they do not indulge in sin. This is the purpose of religion. So what are we required to do as per our religion?
Generally speaking, in our present state, we are familiar with Ramayana, Bhagavata and a bit of some of the Puraanas. It is known from these as to what type of religious injunctions were practised by the characters in these at various times and places. These injunctions do not appear cogently or in a codified way; they find mention here and there. The procedure for practising these injunctions are not also mentioned in the Puraanas or Itihaasas. Therefore it is not possible for us to practise these injunctions by merely being made aware of them.
The Puraanas and the Itihaasaas have Bhakti as their central theme. But can we spend all the 24 hours doing Bhakti (Puja) meditation and singing God’s praise (stotra)? No. We have to do our duty to bodily needs. Even to devote the balance of time to Puja is also not possible. Boredom sets in. We require therefore other directions and guidance to perform our good deeds. From where do we learn these? From only the Dharma Saastras. Of the 14 disciplines (Vidyas), what comes as the last, after Puranas, is Dharma Saastra.
The characters from the Puraanas show us the goal. The way to reach it is to begin with the actual practice of prescribed Karmas (Karma-Anushtana). Thus Dharma Saastra tells us what and how we should do in our everyday life. What the Vedas have said at various places as to what our duties are have been arranged systematically and elaborated by the Upaangas.
Household duties, personal work, bathing, eating have all to be done in order and as laid down, in the Saastras.
The Vedic Dharma has devised its injunctions so that all aspects of human activity are conducive to self-advancement and self-realisation. It involves all aspects of our life with religion – if one sleeps in a particular way it helps the personality; if one dresses in a prescribed way it is conducive to good living; if the plan of the house is as laid down, it would help in the proper performance of various Vedic rites. Secular life and religious life are not separated by the Dharma Saastras. Secularism is also designed to lead to religion as per the Vedic Dharma. Whatever job is done, it is Dharma-oriented and is part of the exercise for the evolution of the self. Just as secularism and religion have been unified in the duties which the individual is required to do for his own salvation, the ingredients for social welfare as also the well-being of the world, are inbuilt in the Dharma Saastra.
The Bhakti, which we have so far seen as contained in the Puraanas, is also present in the Vedas. But along with it are so many karmas or duties. Elaborate directions are prescribed for performing Puja (worship), when Bhakti is translated into action. In addition to Puja, Yajnas (ritualistic sacrifices) Shraaddam (loath anniversary rites), Tarpanam (homage to ancestors) are all considered indispensable adjuncts to Vedic dharma.
The Vedas no doubt contain all these. But, they have not been codified or presented in any one place. Nor has each procedure, for doing the Karmas, been spelt out in detail.
‘Vedo Akhila Dharma Moolam’ says Manu, the Vedas alone are the basis or the root of Dharma of what are required to be done and how to do it.
Though Vedas have so designed it that the duties which are required to be done for individual salvation also indirectly produce commonweal, and what serves this dual purpose is Dharma, we do not find any orderly or clear-cut list or any detailed procedural instructions. Further the Vedic language is very often difficult to understand and their purport is not wholly clear to us.
From out of such Vedas, ‘Kalpa’, the sixth Vedaanga, has presented an orderly and consolidated list of duties or Karmas in the shape of sutras. But these are by their very nature brief nor do they offer detailed guidance. Dharma Saastras alone make these sutras understandable and explain them beyond doubt.
Dharma Sutras (of Apasthamba, Gautama and others) are, as per the rules of Sutra, brief and pithy. In fact a sutra should be so. On the other hand, the Dharma Saastras which are Smritis (of Manu, Yajnavalkya, Paraasara and others) are in the nature of slokas.
But the common authority for all these is the Vedas. What should we do and how should we do it are all clearly enunciated by the Vedas and we should follow these injunctions implicitly. The role of the Dharma Saastras is to analyse and explain in great detail the Vedic injunctions which are to some extent codified in the Kalpa. If Kalpa talks mainly of the area of the sacrificial site, house plan etc., the Dharma Saastra lays down the code of conduct for man covering all aspects of life.
“I wish to do this job. But I do not know where to look for in the Vedas to know if it is right or wrong to do the job. Vedas indeed appear endless. So I do not know where to look to see how this job should be done. I do not also find anyone who has mastered all the Vedas, what shall I do?” – these are some of the questions.
It is indeed an impossible task to pick out what we need from the vast ocean of the Vedas.
“If I knew that the Vedas had said how this job should be done, I will certainly comply. In its absence what shall I do?”
Manu replies to these questions. “All right – let me tell you. Maharishis who have mastered the Vedas have written what are called ‘Smritis’. See what they have to say on the subject. ‘Smriti’ is Dharma Saastra.”
‘Smriti’ nenas an aid to memory. ‘Vismriti’ means loss of memory. Smritiş are aide memoirs for the Vedas. The Maharishis who were perfectly informed about the Vedas have compiled the injunctions (Dharma) and Karmas (procedural details as to how to do them) and have presented them in an orderly manner. These Smritis are written in a language which is easily understandable. Look at them. What you should do or should not do, how to do it, are all clearly laid down in detail so says Manu.
Kalpa, which is the sixth ‘Vedaanga’, describes how to perform the Vedic injunctions. The Grihya Sutras describe domestic rites. The Srauta Sutras discuss the big sacrifices such as Asvamedha. The Dharma sutras are concerned with the personal and social duties of the persons according to the Varnas in which they are born and the stage of life in which they find themselves.
From the time a Jiva enters into the mother’s womb, on to birth, growth, marriage, running the household and at last to cremation – the Smritis lay down all that has to be done in minute detail. It gives a chart which man should follow daily from the time he wakes up in the morning till the time he goes to sleep at night. There are 16 main samskaaras dealing with the above aspects.
Smritis and their supporting texts
Manu, Paraasara, Yaajnavalkya, Gautama, Harita, Yama, Vishnu, Sanka, Likhita, Brihaspati, Daksha, Angiras, Prachetas, Samvarta, Asanas, Atri, Aapasthamba, Satatapa – these 18 Maharishis had grasped the contents of all the Vedas through their superhuman powers and have given us their compilation in the form of Dharma Saastra. These are called Manu Smriti, Paraasara Smriti, Yaajnavalyaka Smriti, etc., after the names of the Rishis who compiled them. It is enough to study them we can know all the Karmas (Anushtana) and Dharmas.
In addition to the 18 Smritis, there are 18 supplementary texts called “Upa Smritis”.
It is customary for Srimad Bhagavad Gita also to be regarded as a Smriti, although its contents are not direct quotations from the Vedas. Since it is an authority in support of our faith, it enjoys the status of a Smriti.
Since there are many such Smritis, it is likely that what appears in one may not be found in another. In some cases there might be slight differences also between them. Thus some small doubt still lingers. To remove such doubts there are some texts entitled Dharma Saastra Nibandhanas.
Some Smritis stop at certain matters; they do not carry the complete instructions. Some do not contain the practice of Sandhya Vandana as though it would be superfluous or redundant to repeat what is a ‘must’, and has been handed down traditionally from one generation to the other. Some do not contain the instructions for Sraaddha, some do not have instructions on ‘Soucha’ or cleanliness. “Eat thus and breathe thus” – these need not necessarily be in the form of written instructions. That is probably how the authors of Smritis regarded the omissions.
The “Nibandhana Grantha” contain all that there is to be said. without leaving out anything on the assumption that it is too familiar to be repeated. When the Smritis slightly differ, these ‘Nibandhanas’ effect the reconciliation or synthesis aed unequivocally affirm the requirement.
These Nibandhanas have appeared as a result of the labours of great men who had studied all the Smritis, reconciled the Variations and have formulated the conclusions without leaving any room for doubt.
Thus, in our land, each region follows a particular Nibandhana Grantha. The Maharashtrians follow the Nibandhana Grantha written by Kasi Natha Upadhyaya, called ‘Dharma Sindhu’. The Mitakshara is a commentary on Yajnavalkya Smriti. This is accepted as an authority in law courts, when doubts on Hindu law arises. This has been recognised by courts of law as having the same status as statutes. Those in the South follow the book called ‘Vaidyanatha Dikshitiyam” written by Vaidyanatha Dikshitar. These are very important for householders. Sannyasis learn what they should do or should not from a text called ‘Visweswara Samhita’. In Tamil Nadu, Dharma Saastra is synonymous with ‘Vaidyanatha Dikshitiyam’. A little proficiency in language would suffice to read and understand the Dharma Saastra. It is not like the Vedas where even after Adhyayana or learning them by rote, the meaning may not be apparent. The Vaidyanatha Dikshitiyam has been well translated also.
It is no easy task to make everyone accept the Vedas which are the Srutis, and the explanatory Sutras that already existed in the form of Kalpa Sutra, Dharma Sutra, Srouta-Grihya Sutras and Smritis, and the many Nibandhana Granthas that later appeared. The reason why Dikshitiyam has occupied the place of an authoritative text (Pramaana Grantha) is because Dikshitar has been totally impartial and, with a broad outlook, has adopted the method mentioned in the Meemaamsas for determining the meaning of words. Having carefully collected all the earlier Saastras, he has boldly reconciled the contradictions. In places where the Smritis were at variance, he has with a liberal heart solved the impasse by saying, “let each one adopt the practice prevalent in his region, let this be done as the elders in each family had done it,” ie. according to Sishaatachaara.
Liberty versus Discipline
Here I must say something in general. However deep one may analyse a subject or however much in detail one may attempt elaboration, it would be impossible to cover the myriad situations which a person would face in his life-time and provide an answer to each problem. Tenets laid down in script would be irksome to follow like laws in a statute hook. True that the rules should make for strict discipline and be binding and our Saastras do contain these in large numbers. But we see in practice that high-sounding words such as ‘liberty’ and ‘democracy’, in actual practice, result in action as one pleases, or the strong (majority) causing hardship to the weak (minority). Therefore the inevitable restrictions imposed by rule making should be tempered by placing a limit on such restrictions. In other words, there must be a limit to the limitations, otherwise true to human nature, severe restrictions would lead to revolt. Too much discipline would only result in rule-breaking.
That is why although our Saastras have provided guidelines on all matters, they have not assumed the compelling force of ‘law’. It has been left to the individual to exercise his free-will, following the example of elders and voluntarily following suit. A little choice or liberty should be left in personal conduct based on personal example of elders, tradition, local custom, family customs, etc. so that in other matters a person may be expected to follow a strict written code of discipline. The best way to make others follow these tenets is by setting a personal example. The next best way is verbal instruction in the nature of persuasion without any compulsion. The last resort is to make laws and enforce compliance.
“Sahasram Vada Ekam Ma Likha” is an old adage. It means you may use a 1000 words to convince a person but do not commit even one to writing and compel compliance. The order of the present day is to enact (written) laws on each and every subject. And any opinion finds ready publication.
Although the Dharma Saastras are criticised for laying down injunctions by the thousand without allowing any freedom to the individual, in actual fact it has left many things unsaid in the interests of this very freedom or liberty. It has been the considered view of the authors of Dharma Saastras that, if an individual is not to be allowed to ruin himself and society, there must be elaborate guidelines and rigid control. But if all these are written down in the form of ‘law’ the public would feel highly shackled. Therefore it is only part of the injunctions that has been committed to writing, the rest having been left to be followed on the basis of the regional or family custom and traditions.
The feelings of restraint created by Sastraic injunctions is not felt when the same thing is in the nature of the practice followed by great men, tradition, precept etc. Regional and family traditions are gladly accepted as they evoke a certain sense of personal loyalty.
It is not as though the last of the texts on Dharma Saastra, viz., ‘Vaidyanatha Dikshitiyam’, alone had accepted this large-hearted attitude. All the earlier texts held similar views. In the Aapasthamba Sutra which is accepted by the majority as authority, Maharishi Aapasthamba says at the end: ‘I have not covered all dharmas in this Saastra. Many more are left. There are many which can be learnt from women and those belonging to the fourth caste. You may learn these from them.
This will show how wrong is the charge that women were kept down by men or that the Brahmins had assigned an inferior position to non-brahmins. In the great book which is an authority on Dharma Saastra, due cognisance has been given to the wisdom of women and non-brahmins to the extent of making them authorities on Dharma.
Original Sutrakaras like Aaswalaayana have said that, during marriage celebrations, the decision of the women as to when and how the arati should be taken (lighted camphor is waved before the bride and groom to dispel evil influences) and the bride anointed has to be followed. Although there is a particular mantra for laying the foundation for the marriage pandal, one should take note of what the experienced workmen have to say on the subject, based on tradition.
Thus the Saastras do not hamstring a person but have given a fair amount of democratic freedom.
The Dharma Saastra also lays down the ceremonies and rituals which people of the fourth caste are required to do; that caste has not at all been ignored. In the Dikshitiya, these will be found mentioned in detail in the Varnaasrama Kaanda, Aahnika Kaanda and Shraaddha Kaanda.
Generally, Dharma Saastras are divided into two Kaandas – viz
Chinha (चिन्ह) distinguishing mark
If we belong to a certain faith, then there are certain external symbols or ‘chinhas’ to indicate it.
The scouts have a distinctive uniform. Those belonging to the army, navy, etc., have very distinctive marks of identification. In the police too, there are many sub-divisions thereunder. If they were to change their dresses or badges, their performance will not be affected in anyway. Even so, there are very definite regulations that they may not do any such thing. The sailor cannot adopt the policeman’s dress. There should be discipline and orderliness in each service. Should not the same discipline and order apply to religion? That is why different marks of identification and different duties have been prescribed for persons belonging to different occupations (Jaati-Varna) and for those in the various Ashram – stage of life. Local custom says wear your dhotis this way; your saree this way – wear a prescribed mark on your forehead etc.
This was not merely designed as a social discipline. Each one the person and helping him onwards, in the spiritual pursuit. of these has another subtle aspect to commend itself, viz., purifying.
In the offices, the peon is required to wear uniform, not the officers. We don’t question why but when the Saastras prescribe various distinguishing features for each occupation and stage in life, we protest at the futility of it in the name of equality and freedom. Our special order based on the immemorial existence of Varnas, with ordained duties, has, in the interest of universal well-being, prescribed different types of personal conduct (Aacharam) and observances (Anushtanam) solely to suit their way of life.
This has been lost sight of and a non-existent gradation of high and low (caste) has been predicated which has resulted in recrimination and revolt. Ultimately today we have reached a position where no one has any religious mark of identification.
We are prepared to sport other social symbols unabashedly. But we feel abashed at the religious symbols which are designed to do good to the soul. We call it all superstition. We abandon it in the name of reform; but in order to indicate that we are reformists we wear a special cap. Or we wear shirts and towels of a particular colour. We attach more importance to these than even to God.
Smritis are not the product of independent free-will
Even those who regard the Smritis which are the Dharma Saastras with a feeling of respect, have a mistaken notion about them. That is, they think that the authors of the Smritis have independently and of their own volition laid down these tenets. The authors of Smritis are dubbed as law-givers. That is, they are regarded as having laid down the law as per their own will and pleasure, just as a coserie of jurists had assembled and evolved the (Indian) Constitution, which lays down the principles of public administration. The Smritis are regarded as voicing views of their own making.
This leads to another corollary. When a particular provision in the Constitution is found irksome to follow, we resort to amending it suitably to our liking. Likewise, the question is asked, ‘why can’t we amend the old laws contained in the Dharma Saastras to suit modern conditions?
Why not we trim the Saastras according to the present-day trend? The example of Government amending the rules is cited in support.
But what is not known to many including those who have high regard for the Dharma Saastras is that, “These smritis do not contain the personal opinion of their authors. They have merely abstracted and compiled what is already said in the Vedas. Since the Vedic injunctions are never under any circumstances changeable, there is no question of changing the rules in Dharma Saastras.
If the Smritis were merely the handiwork of Rishis, there is no compulsion for us to accept them in toto. We can reject them if we do not like them. We can do without them if they had introduced matters not to be found in the Vedas; if they had thought by their intelligence as to what is good for man and what is not. That way, there are many who had written the way their minds traversed; we can similarly legislate for ourselves.
In actual fact the Smritis closely follow the Vedic dictums and therefore we must regard them as our authority for now and always.
Then the question arises as to the basis or proof of the claim that the Smritis are written solely on the basis of the Vedas.
Veda alone is the foundation of Smritis
The biggest proof is in the verdict of the Maha Kavis – great poets. The founders of our faiths Sankara, Ramanuja and Madhva – have affirmed that the Dharma Saastras are based on the Vedas.
But then this cannot perhaps be accepted as infallible as they had a certain overriding loyalty to their individual doctrines. They were committed to safeguarding the ancient values. Therefore they would not preach outside the limits of tradition. But the poet has no such inhibitions. He is neither dedicated nor committed to the establishment of any doctrine. He talks of truth as it appears to him without any bias towards a creed.
The most distinguished of all Maha Kavi’s, Kalidasa, has thus referred to Srutis in his Raghu Vamsa: He says “Sruterivartam smritiranvagacchat” (श्रुतेरिवार्थं स्मृतिरन्वगच्छत्). Sudakshina followed the footsteps of the cow, even as Smriti followed the meaning of Sruti.
Here, when describing how Sudakshina followed the footsteps of the cow when Dilipa took the cow to graze, Kalidasa mentions how the Rishis compiled the Smritis. His object was not to tell us what the Rishis did or how the Smritis were made.
It is customary for the subjects of the simile (Upamaana) to be superior to the object with which it is compared (Upameya). For example when one’s face is compared to the moon or lotus, the moon or lotus will in fact be better to look at than the face. Here the subject of the simile is the very chaste Sudakshina following her husband Dilipa. It is logically implied that the Smritis follow the Srutis still more closely. Therefore the master par excellence of similes, Kalidasa, resorts to this comparison. No further proof would therefore be required to prove that the Srutis totally follow the Smritis.
Now those observances (Anushtana) which are not clearly spelt out in the Vedas but which are made clear in the Smritis are called Smaarta-Karma. Those that are clearly laid down in the Vedas are referred as Srouta-Karma. This should not give room for the conclusion that Smarta Karma is in any way inferior to Srouta Karma.
The Upaasana which is most important for a householder (Grihastha), the Karmas which are required to be done domestically called Grihya-Karmas, the most important of the Vaidika-Karma, the Pitru-Sraadha, the five yajnas – are all Smaartha Karmas. Veda mantras are used in their performance. It is therefore clear that the authors of Smritis had understood the spirit of the Srutis in prescribing these obligations. Therefore, instead of thinking that Smritis are inferior to Sruti or that Puranas are inferior to Smritis, they should all be regarded in an integrated way, as a composite package.
The Puraanas narrate the Vedic dharmas in the form of stories. The Vedic dharmas and Karmas are presented not in the form of fables but advice and injunctions by the Smritis. They also indicate the procedure for doing the Karmas. The Vedas intuitively flashed into the comprehension of the Rishis. Later on, the Rishis recollected what they had seen and they became Smritis. Puraanas deal with the truth contained in the Vedas, with the recital of stories. All are authoritative.
Thus the Sruti, Smriti and Puraanas all deal with Dharma.
And our Acharya Adi Sankaracharya was a repository of the Dharma contained in the Srutis, Smritis and Puraanas. Hence we bow down to him with the following salutation:
श्रुति स्मृति पुराणानामालयं करुणालयं
नमामि भगवत्पादशंकरं लोकशंकरं
Sruti Smrti Puraanaanaam aalayam karunaalayam
Namaami Bhagavadpaada Sankaram lokasankaram.
Harih Harah!!
वेदों का उपांगः धर्म शास्त्र
पौराणिक लक्ष्य को पाने का रास्ता
ऐसा देखा गया है कि पुराणों के किरदार हमारे आदर्श और हमें रास्ता दिखाने वाले होते हैं । उनकी कहानियाँ पढ़कर, हम उनके अच्छे गुणों को अपनाने के लिए मजबूर हो जाते हैं । हालाँकि ऐसी इच्छा पैदा होती है, लेकिन हर हाल में उन पर टिके रहना नामुमकिन लगता है । इंसान का स्वभाव है कि वह हर समय कुछ न कुछ करता रहे । मन को एक सेकंड के लिए भी शांत रखना नामुमकिन है । गीता में भगवान कहते हैं, “स्वभाव इंसान को एक सेकंड के लिए भी शांत हुए बिना कुछ करते रहने के लिए मजबूर करता है । इसलिए उसे काम करने का सही तरीका सीखना चाहिए, और ऐसा करके, अपने मन को साफ़ करना चाहिए, अच्छा चरित्र और आदतें बनानी चाहिए और फिर आदतों (गुणों) से ऊपर उठकर ज्ञानी बनना चाहिए और ब्रह्म में मिल जाना चाहिए ।”
अगर हमें अपने धर्म के सिद्धांतों का सख्ती से पालन करना है, अपने पापों से छुटकारा पाना है, और आत्मा को शुद्ध करके दुनियावी परेशानियों से मुक्ति का सुख मोक्ष पाना है, तो क्या करना चाहिए ? हमारा जन्म ही पाप की वजह से हुआ है । इसे धो देना चाहिए । हमें दोबारा पाप नहीं करना चाहिए । हमें अपने मन और गुणों को ऊपर उठाना चाहिए ताकि वे पाप में न पड़ें । यही धर्म का मकसद है । तो हमें अपने धर्म के हिसाब से क्या करना चाहिए ?
आम तौर पर, आज हम रामायण, भागवत और कुछ पुराणों से परिचित हैं । इनसे पता चलता है कि इनके किरदारों ने अलग-अलग समय और जगहों पर किस तरह के धार्मिक आदेशों का पालन किया था । ये आदेश साफ़ तौर पर या तय तरीके से (सूचीबद्ध रूप में) नहीं मिलते; इनका ज़िक्र यहाँ-वहाँ मिलता है । इन आदेशों का पालन करने का तरीका भी पुराणों या इतिहासों में नहीं बताया गया है । इसलिए, सिर्फ़ इनके बारे में पता होने से हम इनका पालन नहीं कर सकते ।
पुराणों और इतिहासों का मुख्य विषय भक्ति है । लेकिन क्या हम पूरे 24 घंटे भक्ति (पूजा) ध्यान और भगवान का गुणगान (स्तोत्र) गाते हुए बिता सकते हैं ? नहीं । हमें अपना कर्तव्य परिवार के लिये करना होता है । हमें खाना, नहाना, इत्यादि करना होता है, साथ ही व्यक्तिगत तथा शरीर की जरूरतों के लिए अपना काम करना होता है । बाकी बचा हुआ समय भी पूजा के लिये देना मुमकिन नहीं है । बोरियत होने लगती है । इसलिए हमें अपने अच्छे काम करने के लिए दूसरे निर्देशों और मार्गदर्शनों की ज़रूरत होती है । हम ये सब कहाँ से सीखते हैं ? सिर्फ़ धर्मशास्त्रों से । 14 विद्याओं में, पुराणों के बाद जो सबसे आखिर में आता है, वह धर्मशास्त्र है ।
पुराणों के किरदार हमें मकसद दिखाते हैं । उस तक पहुँचने का तरीका है बताए गए कर्मों (कर्म-अनुष्ठान) के असली अभ्यास से शुरू करना । इस तरह धर्मशास्त्र हमें बताता है कि हमें अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में क्या और कैसे करना चाहिए । वेदों ने अलग-अलग जगहों पर जो हमारे कर्तव्य बताए हैं, उन्हें उपांगों ने क्रमबद्ध तरीके से और विस्तार में बताया है ।
गृहस्थी कर्तव्य, व्यक्तिगत कार्य, नहाना, खाना, ये सब शास्त्रों में बताए गए तरीके से करने होते हैं ।
वैदिक धर्म ने अपने नियम इस तरह बनाए हैं कि इंसानी काम के सभी पहलू खुद को आगे बढ़ाने (सेल्फ-एडवान्समेन्ट) और खुद को समझने (सेल्फ-रियलाइजेशन) में मदद करें । यह धर्म के साथ हमारी ज़िंदगी के सभी पहलुओं को जोड़ता है – अगर कोई खास तरीके से सोता है तो यह उसकी व्यक्तित्व (पर्सनैलिटी) में मदद करता है; अगर कोई तय तरीके से कपड़े पहनता है तो यह बेहतर ढंग से जीने में सहयोग करता है; अगर घर बनाने की योजना तय किया गया नक्शा अनुरूप हो, तो यह अलग-अलग वैदिक रस्मों को ठीक से करने में मदद करेगा । धर्म शास्त्रों में निरपेक्ष जीवन तथा धार्मिक जीवन को अलग नहीं किया गया है । वैदिक धर्म के अनुसार निरपेक्षता को भी धर्म की ओर ले जाने के लिए बनाया गया है । जो भी काम किया जाता है, वह धर्म पर आधारित होता है और खुद के विकास की कोशिश का हिस्सा होता है । जैसे निरपेक्षता (सेक्युलरिज़्म) और धर्म को उन कर्तव्यों में एक कर दिया गया है जो इंसान को अपनी मुक्ति के लिए करने होते हैं, वैसे ही समाज की भलाई और दुनिया की भलाई के लिए भी चीज़ें धर्म शास्त्र में शामिल हैं ।
भक्ति, जिसे हमने अब तक पुराणों में देखा है, वेदों में भी है । लेकिन इसके साथ बहुत सारे कर्म या कर्तव्य भी हैं । जब भक्ति को कर्म में बदला जाता है, तो पूजा करने के लिए विस्तृत निर्देश निर्धारित किए गए हैं । पूजा के अलावा, यज्ञ (अनुष्ठान संबंधी बलिदान), श्राद्धम् (मृत्यु सम्बन्धी वार्षिकी संस्कार), तर्पणम् (पूर्वजों को श्रद्धांजलि) सभी वैदिक धर्म के अपरिहार्य सहायक माने जाते हैं ।
वेदों में निस्संदेह ये सभी शामिल हैं । लेकिन, उन्हें किसी एक स्थान पर संहिताबद्ध या प्रस्तुत नहीं किया गया है । न ही कर्म करने की प्रत्येक प्रक्रिया को विस्तार से बताया गया है ।
‘वेदो अखिल धर्म मूलम्’ मनु कहते हैं, वेद अकेले ही धर्म का आधार या जड़ हैं कि क्या करने की आवश्यकता है और इसे कैसे किया जाना चाहिए ।
हालांकि वेदों ने इसे इस तरह से डिज़ाइन किया है (रूपरेखा तैयार किया है) कि व्यक्तिगत मोक्ष (इन्डीविजुअल साल्वेशन) के लिए किए जाने वाले कर्तव्य भी अप्रत्यक्ष रूप से सामान्य कल्याण उत्पन्न करते हैं (सभी के लिये कल्याणकारी होते हैं), और इन दोनों उद्देश्यों की पूर्ति जो करता है वह धर्म है, पर हमें क्रमबद्ध या साफ-साफ या विस्तृत प्रक्रियागत निर्देशन प्राप्त नहीं है । इसके अलावा, वैदिक भाषा को समझना अक्सर मुश्किल होता है और उनका मतलब हमें पूरी तरह से साफ़ नहीं होता ।
ऐसे ही वेदों में से, छठे वेदांग ‘कल्प’ ने, सूत्रों के रूप में कर्तव्यों या कर्मों की एक व्यवस्थित और समेकित लिस्ट पेश की है । लेकिन ये अपने स्वभाव से ही संछिप्त रूप में हैं और न ही ये विस्तार में मार्गदर्शन करते हैं । सिर्फ़ धर्मशास्त्र ही इन सूत्रों को समझने लायक बनाते हैं और उन्हें बिना किसी शक के समझाते हैं ।
धर्म सूत्र (अपस्तंभ, गौतम और दूसरों के) सूत्र के नियमों के अनुसार, छोटे और सारगर्भित हैं । असल में एक सूत्र को ऐसा ही होना चाहिए । दूसरी ओर, धर्मशास्त्र जो स्मृतियाँ हैं (मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर और दूसरों के) श्लोकों के प्रकृति (रूप) में हैं ।
लेकिन इन सभी के लिए सामान्य प्राधिकारी (कॉमन अथॉरिटी) वेद हैं । हमें क्या करना चाहिए और कैसे करना चाहिए, यह सब वेदों में साफ़-साफ़ बताया गया है और हमें इन आदेशों का पूरी तरह से पालन करना चाहिए । धर्मशास्त्रों का काम वैदिक आदेशों का बहुत विस्तार में विश्लेषण करना और समझाना है, जो कुछ हद तक कल्प में संहिताबद्ध (क्रमानुगत सूचीकृत) किए गए हैं । अगर कल्प मुख्य रूप से यज्ञ की जगह, घर का योजना वगैरह के बारे में बात करता है, तो धर्मशास्त्र इंसान के लिए जीवन के सभी पहलुओं को समेटते हुए आदर्श आचार संहिता (कोड अफ कंडक्ट) तय करता है ।
“मैं यह काम करना चाहता हूँ । लेकिन मुझे नहीं पता कि वेदों में कहाँ देखूँ कि यह काम करना सही है या गलत । वेद सच में अंतहीन लगते हैं । इसलिए मुझे नहीं पता कि यह काम कैसे करना है, इसके लिए कहाँ देखूँ । मुझे कोई ऐसा भी नहीं मिला जिसने सभी वेदों में निपुणता हासिल किया हो, तो मैं क्या करूँ ?” – ये कुछ सवाल हैं ।
वेदों के विशाल सागर में से हमें जो चाहिए उसे चुनना वाकई एक नामुमकिन काम है ।
“अगर मुझे पता होता कि वेदों में बताया गया है कि यह काम कैसे करना है, तो मैं ज़रूर मान लेता । इसके बिना मैं क्या करूँ ?”
मनु इन सवालों का जवाब देते हैं । “ठीक है – मैं तुम्हें बताता हूँ । जिन महर्षियों ने वेदों में निपुण हुए, उन्होंने ‘स्मृतियाँ’ लिखी हैं । देखो वे इस विषय पर क्या कहते हैं । ‘स्मृति’ धर्म शास्त्र है ।”
‘स्मृति’ का मतलब याददाश्त में मदद करना है । ‘विस्मृति’ का मतलब है याददाश्त का जाना । स्मृतियाँ वेदों के लिए सहायक यादें हैं । वेदों के बारे में पूरी जानकारी रखने वाले महर्षियों ने वैदिक आदेशों (धर्म) और कर्म (उन्हें कैसे करना है, इसकी पूरी जानकारी) को इकट्ठा किया है और उन्हें सही तरीके से बताया है । ये स्मृतियाँ ऐसी भाषा में लिखी गई हैं जो आसानी से समझ में आती है । इन्हें देखिए । मनु कहते हैं कि आपको क्या करना चाहिए या क्या नहीं करना चाहिए, कैसे करना चाहिए, ये सब साफ़-साफ़ और सविस्तार बताया गया है ।
कल्प, जो छठा ‘वेदांग’ है, बताता है कि वैदिक आज्ञाओं को कैसे करना है । गृह्य सूत्र घरेलू रस्मों के बारे में बताते हैं । श्रौत सूत्र अश्वमेध जैसे बड़े यज्ञों के बारे में बताते हैं । धर्म सूत्र लोगों के उनके वर्ण जिसमें वे जन्म लिये हैं तथा जीवन के उस पड़ाव के हिसाब से जिममें वो खुद को पाते हैं उनके निजी और सामाजिक कामों से जुड़े हैं ।
जब से कोई जीव माँ के गर्भ में आता है, जन्म, बड़ा होना, शादी, घर चलाना और आखिर में दाह संस्कार तक – जो-जो करना है वह सब कुछ स्मृतियों में काफी बारीकी और विस्तार से बताया गया है । इसमें एक चार्ट दिया गया है जिसे इंसान को सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक रोज़ाना फॉलो करना चाहिए । ऊपर बताए गए पहलुओं से जुड़े 16 मुख्य संस्कार हैं ।
स्मृतियाँ और उनके सपोर्टिंग टेक्स्ट
मनु, पराशर, याज्ञवल्क्य, गौतम, हरित, यम, विष्णु, शंक, लिखित, बृहस्पति, दक्ष, अंगिरस, प्राचेतस, संवर्त, आसन, अत्रि, आपस्तंब, शततप – इन 18 महर्षियों ने अपनी अलौकिक शक्तियों से सभी वेदों की बातें समझ ली थीं और हमें धर्म शास्त्र के रूप में उनका संग्रह (कलेक्शन) दिया है । इन्हें मनु स्मृति, पराशर स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, वगैरह कहा जाता है, उन ऋषियों के नाम पर जिन्होंने इन्हें इकट्ठा किया था । इनकी पढ़ाई करने से ही हम सभी कर्म (अनुष्ठान) और धर्मों को जान सकते हैं ।
18 स्मृतियों के अलावा, 18 पूरक आलेख (सप्लीमेंट्री टेक्स्ट) भी हैं जिन्हें “उप स्मृतियाँ” कहा जाता है ।
यह आम बात है कि श्रीमद् भगवद् गीता को भी एक स्मृति माना जाता है, हालाँकि इसका कथ्य (कंटेंट) सीधे वेदों से उद्धृत (कोट) नहीं है । क्योंकि यह हमारे विश्वास के समर्थन (सपोर्ट) में एक प्रमाण (अथॉरिटी) है, इसलिए इसे स्मृति का दर्जा मिला हुआ है ।
क्योंकि ऐसी कई स्मृतियाँ हैं, इसलिए हो सकता है कि जो एक में है वह दूसरी में न हो । कुछ मामलों में उनके बीच थोड़ा अंतर भी हो सकता है । इसलिए कुछ छोटे-मोटे शक अभी भी बने हुए हैं । ऐसे शक को दूर करने के लिए धर्म शास्त्र निबंध नाम के कुछ ग्रंथ हैं ।
कुछ स्मृतियाँ कुछ खास मामलों पर ही रुक जाती हैं; उनमें पूरे निर्देश नहीं होते । कुछ में संध्या वंदना का रिवाज नहीं है, जैसे कि जो ‘ज़रूरी’ है उसे दोहराना फालतू या बेकार होगा, और जो पारंपरिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दिया जाता रहा है । कुछ में श्राद्ध के निर्देश नहीं हैं, कुछ में ‘शौच’ या सफाई के निर्देश नहीं हैं । “इस तरह खाओ और इस तरह साँस लो” – ये ज़रूरी नहीं कि लिखे हुए निर्देश के रूप में हों । शायद स्मृतियों के लेखकों ने इसी तरह छूटी हुई बातों को माना हो ।
“निबंध ग्रंथ” में वह सब कुछ है जो कहा जाना है, बिना कुछ छोड़े, यह मानकर कि यह इतना अधिक जाना-पहचाना है कि इसको दोहराया नहीं जा सकता । जब स्मृतियों में थोड़ा अंतर होता है, तो ये ‘निबंधन’ मिलान (reconciliation) या संश्लेषण (synthesis) करते हैं और साफ़ तौर पर ज़रूरत की पुष्टि करते हैं ।
ये निबंधन उन महान लोगों की मेहनत का नतीजा हैं जिन्होंने सभी स्मृतियों को पढ़ा था, बदलावों को मिलाया था और बिना किसी शक की गुंजाइश छोड़े नतीजे निकाले थे ।
इस तरह, हमारे देश में, हर इलाका एक खास निबंधन ग्रंथ को मानता है । महाराष्ट्र के लोग काशी नाथ उपाध्याय के लिखे निबंधन ग्रंथ को मानते हैं, जिसे ‘धर्म सिंधु’ कहते हैं । मिताक्षरा याज्ञवल्क्य स्मृति पर लिखा गया एक भाष्य (कमेंट्री) है । जब किसी भी हिंदू कानून पर सन्देह होता है, तो इसको (मिताक्षरा को) कानून के न्यायालय (कोर्ट) में एक प्रमाण (अथॉरिटी) के तौर पर स्वीकार किया जाता है । कानून के न्यायालयों (कोर्ट) में इसे कानूनों के बराबर ही दर्जा दिया गया है । दक्षिण (भारत) में लोग वैद्यनाथ दीक्षित की लिखी ‘वैद्यनाथ दीक्षितयम’ नाम की किताब का अनुसरण करते हैं । यह गृहस्थों के लिए बहुत ज़रूरी हैं । संन्यासी ‘विश्वेश्वर संहिता’ नाम की किताब से सीखते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं । तमिलनाडु में, धर्म शास्त्र ‘वैद्यनाथ दीक्षितयम’ का ही दूसरा नाम है । धर्म शास्त्र को पढ़ने और समझने के लिए भाषा की थोड़ी जानकारी काफ़ी होगी । यह वेदों की तरह नहीं है जहाँ पढ़ाई करने या रटने के बाद भी मतलब साफ़ नहीं होता । वैद्यनाथ दीक्षितयम का अच्छा अनुवाद (ट्रांसलेशन) भी हुआ है ।
सभी को वेदों को मानना कोई आसान काम नहीं है, जो श्रुतियाँ हैं, और समझाने वाले सूत्र जो पहले से ही कल्प सूत्र, धर्म सूत्र, श्रौत-गृह्य सूत्र और स्मृतियों के रूप में मौजूद थे, और कई निबंध ग्रंथ जो बाद में सामने आए । दीक्षितयम का आधिकारिक पाठ (प्रमाण ग्रन्थ) का जगह लेने का यही वजह है कि दीक्षित पूरी तरह निष्पक्ष रहे हैं और एक व्यापक दृष्टिकोण के साथ, शब्दों के अर्थ के निर्धारण के लिए मीमांसा में वर्णित पद्धति को अपनाया है । सभी पूर्ववर्ती शास्त्रों को ध्यानपूर्वक एकत्रित करने के बाद, उन्होंने साहसपूर्वक विरोधाभासों को सुलझाया है । जिन स्थानों पर स्मृतियों में मतभेद था, उन्होंने उदार हृदय से यह कहकर गतिरोध को हल किया है, “प्रत्येक व्यक्ति को अपने क्षेत्र में प्रचलित प्रथा को अपनाना चाहिए, इसे वैसे ही किया जाना चाहिए जैसा प्रत्येक परिवार के बुजुर्गों ने किया था,” अर्थात शिष्टाचार के अनुसार ।
स्वतंत्रता बनाम अनुशासन
यहां मुझे कुछ सामान्य बातें कहना आवश्यक है । कोई किसी विषय को कितना भी गहराई से विश्लेषण कर ले या कितना ही विस्तार से समझाने की कोशिश कर ले, उन अनगिनत हालात को समेट पाना नामुमकिन होगा जिनका सामना एक इंसान अपनी ज़िंदगी में करेगा और हर समस्या का जवाब दे पायेगा । लिपि में लिखे सिद्धांतों का पालन करना, विधान के पुस्तकों में लिखे कानून की तरह मुश्किल होगा । यह सच है कि नियमों से सख्त अनुशासन होना चाहिए और वे मानने लायक होने चाहिए और हमारे शास्त्रों में ये सब बहुत ज़्यादा हैं । लेकिन हम (असल) व्यवहार में देखते हैं कि ‘आज़ादी’ और ‘लोकतंत्र’ जैसे बड़े-बड़े शब्द, असल में, अपनी मर्ज़ी से काम करवाते हैं, या मज़बूत (बहुमत) कमज़ोर (अल्पसंख्यक) को मुश्किल में डालते हैं । इसलिए नियम बनाने से लगने वाली ज़रूरी पाबंदियों को ऐसी पाबंदियों पर एक सीमा लगाकर कम किया जाना चाहिए । दूसरे शब्दों में, पाबंदियों की भी एक सीमा होनी चाहिए, नहीं तो इंसानी फितरत (मानव स्वभाव) के हिसाब से, कड़ी पाबंदियां बगावत की वजह बनेंगी । बहुत ज़्यादा अनुशासन का नतीजा सिर्फ़ नियम तोड़ना होगा ।
इसीलिए यद्यपि हमारे शास्त्रों ने सभी मामलों पर दिशानिर्देश प्रदान किए हैं, लेकिन उन्होंने ‘कानून’ की बाध्यकारी शक्ति को ग्रहण नहीं किया है । बड़ों के उदाहरण का अनुसरण करते हुए और स्वेच्छा से अनुसरण करना व्यक्ति पर छोड़ दिया गया है कि वह अपनी स्वतंत्र इच्छा का प्रयोग करे । बड़ों के व्यक्तिगत उदाहरण, परंपरा, स्थानीय रीति-रिवाज, पारिवारिक रीति-रिवाज आदि के आधार पर व्यक्तिगत आचरण में थोड़ी पसंद या स्वतंत्रता छोड़ी जानी चाहिए, ताकि अन्य मामलों में व्यक्ति से अनुशासन के कड़े लिखित संहिता (कोड) का पालन करने की उम्मीद की जा सके । दूसरों को इन सिद्धांतों का पालन कराने का सबसे अच्छा तरीका व्यक्तिगत उदाहरण स्थापित करना है । अगला सबसे अच्छा तरीका बिना किसी दबाव के अनुनय के रूप में मौखिक निर्देश है । अंतिम उपाय कानून बनाना और अनुपालन लागू करना है ।
“सहस्रं वद एकम मा लिखऽ” एक पुरानी कहावत है । इसका मतलब है कि आप किसी व्यक्ति को समझाने के लिए 1000 शब्दों का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन एक भी लिखित रूप में न दें और अनुपालन के लिए मजबूर न करें । वर्तमान समय की व्यवस्था प्रत्येक विषय पर (लिखित) कानून बनाना है । और कोई भी राय तुरंत प्रकाशन को तैयार रहती है ।
हालांकि धर्मशास्त्रों की आलोचना इस बात के लिए की जाती है कि उन्होंने हज़ारों आदेश दिए हैं और इंसान को कोई आज़ादी नहीं दी है, लेकिन असल में उन्होंने इसी आज़ादी या स्वतंत्रता के हित में बहुत सी बातें अनकही छोड़ दी हैं । धर्मशास्त्रों के लेखकों का यह सोचा-समझा नज़रिया रहा है कि अगर किसी इंसान को खुद को और समाज को बर्बाद नहीं करने देना है, तो उसके लिए पक्की गाइडलाइंस (मार्गदर्शन) और सख्त कंट्रोल (नियंत्रण) होना चाहिए । लेकिन अगर इन सबको ‘कानून’ के रूप में लिख दिया जाए तो जनता खुद को बहुत ज़्यादा बंधा हुआ महसूस करेगी । इसलिए, आदेशों का सिर्फ़ एक हिस्सा ही लिखा गया है, बाकी को इलाके या परिवार के रीति-रिवाजों और परंपराओं के आधार पर मानने के लिए छोड़ दिया गया है ।
शास्त्रीय आदेशों से पैदा होने वाली रोक की भावना तब महसूस नहीं होती जब वही चीज़ बड़े लोगों, परंपराओं, उपदेशों वगैरह के तौर-तरीकों में होती है । इलाके और परिवार की परंपराओं को खुशी-खुशी मान लिया जाता है क्योंकि वे एक तरह की निजी वफ़ादारी की भावना जगाती हैं ।
ऐसा नहीं है कि धर्म शास्त्र पर लिखी आखिरी किताब, यानी ‘वैद्यनाथ दीक्षितम’ ने ही इस बड़े दिल वाले नज़रिए को माना हो । पहले की सभी किताबों में भी ऐसे ही विचार थे । आपस्तंब सूत्र में, जिसे ज़्यादातर लोग अधिकार मानते हैं, महर्षि आपस्तंब आखिर में कहते हैं: ‘मैंने इस शास्त्र में सभी धर्मों को शामिल नहीं किया है । और भी बहुत कुछ बाकी है । कई ऐसे धर्म हैं जो औरतों और चौथी जाति के लोगों से सीखे जा सकते हैं । आप उनसे ये सीख सकते हैं ।’
इससे पता चलेगा कि यह आरोप कितना गलत है कि मर्दों ने औरतों को दबाकर रखा या ब्राह्मणों ने गैर-ब्राह्मणों को कमतर दर्जा दिया । धर्म शास्त्र पर एक अथॉरिटी वाली इस महान किताब में, औरतों और गैर-ब्राह्मणों की समझदारी को इस हद तक ध्यान दिया गया है कि उन्हें धर्म का अधिकारी बनाया गया है ।
आश्वलायण जैसे मौलिक सूत्रकारों ने कहा है कि शादी के दौरान, औरतों का यह फैसला कि आरती कब और कैसे की जाए (बुरी नज़रों को दूर करने के लिए दूल्हा-दुल्हन के सामने जलता हुआ कपूर लहराया जाता है) और दुल्हन का अभिषेक किया जाए, उसका पालन करना होता है । हालांकि शादी के पंडाल की नींव रखने के लिए एक खास मंत्र है, लेकिन परंपरा के आधार पर अनुभवी कारीगरों का इस बारे में क्या कहना है, इस पर ध्यान देना चाहिए ।
इस तरह शास्त्र किसी इंसान को रोकते नहीं हैं बल्कि उसे काफी हद तक लोकतांत्रिक स्वतंत्रता देते हैं ।
धर्म शास्त्र उन रस्मों और रीति-रिवाजों के बारे में भी बताता है जो चौथी जाति के लोगों को करने होते हैं; उस जाति को बिल्कुल भी नज़रअंदाज़ नहीं किया गया है । दीक्षितिया में, इनका ज़िक्र वर्णाश्रम कांड, आह्निका कांड और श्राद्ध कांड में विस्तार में मिलेगा ।
आम तौर पर, धर्म शास्त्र दो कांडों में बंटे होते हैं – यानी आचार कांड, और व्यवहार । व्यक्तिगत व्यवहार आचार है । व्यवहार कानून से संबंधित है ।
चिन्ह – पहचान का निशान
अगर हम किसी खास धर्म से जुड़े हैं, तो उसे दिखाने के लिए कुछ बाहरी निशान (symbol) या ‘चिन्ह’ होते हैं ।
स्काउट्स की एक खास पहनावा (यूनिफॉर्म) होती है । सेना (आर्मी), नेवी वगैरह वालों की पहचान के बहुत खास निशान होते हैं । पुलिस में भी, उसके तहत कई उप-विभाग (सब-डिवीजन) होते हैं । अगर वे अपनी ड्रेस या बैज बदलते हैं, तो उनके काम पर किसी भी तरह से असर नहीं पड़ेगा । फिर भी, बहुत पक्के नियम हैं कि वे ऐसा कुछ नहीं कर सकते । नाविक पुलिस वाले की ड्रेस नहीं अपना सकता । हर सेवा (सर्विस) में अनुशासन और व्यवस्था होनी चाहिए । क्या वही अनुशासन और व्यवस्था धर्म पर भी लागू नहीं होनी चाहिए ? इसीलिए अलग-अलग काम (जाति-वर्ण) और जीवन के अलग-अलग आश्रमों (जीवन के चरणों) में रहने वालों के लिए अलग-अलग पहचान के निशान और अलग-अलग काम तय किए गए हैं । लोकल रिवाज कहते हैं कि अपनी धोती इस तरह पहनो; अपनी साड़ी इस तरह पहनो – अपने माथे पर एक तय निशान लगाओ वगैरह ।
यह सिर्फ एक सामाजिक (सोशल) अनुशासन के तौर पर नहीं बनाया गया था । इनमें से प्रत्येक का अपना एक सूक्ष्म पहलू है, जो इसे प्रशंसनीय बनाता है, जैसे कि व्यक्ति को शुद्ध करना और आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने में उसकी सहायता करना ।
ऑफिस में चपरासी को यूनिफॉर्म पहननी होती है, ऑफिसर को नहीं । हम सवाल नहीं करते कि क्यों, लेकिन जब शास्त्र हर काम और ज़िंदगी के हर पड़ाव के लिए अलग-अलग खासियतें बताते हैं, तो हम बराबरी और आज़ादी के नाम पर इसकी बेकारियत पर एतराज़ करते हैं । वर्णों के पुराने वजूद पर आधारित हमारी खास व्यवस्था, जिसमें तय काम हैं, ने सबकी भलाई के लिए, सिर्फ़ उनके जीने के तरीके के हिसाब से अलग-अलग तरह के निजी व्यवहार (आचारम्) और रीति-रिवाज (अनुष्ठानम्) तय किए हैं ।
इस बात को नजरअंदाज कर दिया गया है और ऊंच-नीच (जाति) का एक काल्पनिक वर्गीकरण निर्धारित कर दिया गया है, जिसके परिणामस्वरूप निंदा और विद्रोह हुआ है । आखिरकार आज हम ऐसी हालत में पहुँच गए हैं जहाँ किसी के पास पहचान का कोई धार्मिक निशान नहीं है ।
हम अन्य सामाजिक प्रतीकों को वगैर किसी शर्म के (खुलेआम) प्रदर्शित करने के लिए तैयार हैं । लेकिन हम उन धार्मिक निशानों से शर्मिंदा महसूस करते हैं जो आत्मा का भला करने के लिए बनाए गए हैं । हमलोग इसको सारा अंधविश्वास है कहते हैं। हम सुधार के नाम पर इसे छोड़ देते हैं; लेकिन यह दिखाने के लिए कि हम सुधारवादी हैं, हम एक खास टोपी पहनते हैं । या हम एक खास रंग की कमीज और तौलिए पहनते हैं । हम इन्हें भगवान से भी ज़्यादा अहमियत देते हैं ।
स्मृतियाँ अपनी मर्ज़ी से नहीं बनी हैं
जो लोग स्मृतियों, जो कि धर्मशास्त्र हैं, उनका आदर करते हैं, वे लोग भी उनके बारे में गलत सोच रखते हैं । यानी, वे सोचते हैं कि स्मृतियों को लिखने वालों ने अपनी मर्ज़ी से ये सिद्धांत बनाए हैं । स्मृतियों को कानून बनाने वाला (जैसा) कहा जाता है । यानी, उन्हें अपनी मर्ज़ी और खुशी से कानून बनाने वाला माना जाता है, ठीक वैसे ही जैसे कुछ वकीलों ने मिलकर (भारतीय) संविधान बनाया था, जो लोक प्रशासन (पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन) का सिद्धांत बताता है । स्मृतियों को अपने बनाए विचारों को बताने वाला माना जाता है ।
इससे एक और नतीजा निकलता है । जब संविधान के किसी खास नियम को मानना मुश्किल लगता है, तो हम अपनी पसंद के हिसाब से उसमें बदलाव करते हैं । इसी तरह, यह सवाल भी पूछा जाता है, हम धर्मशास्त्रों में दिए गए पुराने कानूनों को आज के हालात के हिसाब से क्यों नहीं बदल सकते ?
हम धर्मशास्त्रों को आज के प्रचलन (ट्रेंड) के हिसाब से क्यों नहीं बदलते ? इसके समर्थन में सरकार द्वारा नियमों में बदलाव करने का उदाहरण दिया जाता है ।
लेकिन बहुत से लोगों को, जिनमें धर्मशास्त्रों का बहुत सम्मान करने वाले लोग भी शामिल हैं, यह नहीं पता कि, “इन स्मृतियों में उनके लेखकों की निजी राय नहीं है । उन्होंने सिर्फ़ वेदों में कही गई बातों को निकाला और इकट्ठा किया है । चूँकि वैदिक आदेश किसी भी हालत में बदले नहीं जा सकते, इसलिए धर्मशास्त्रों के नियमों को बदलने का सवाल ही नहीं उठता ।”
अगर स्मृतियाँ सिर्फ़ ऋषियों की रचना होतीं, तो हमें उन्हें पूरी तरह मानने की कोई मजबूरी नहीं होती । अगर वे हमें पसंद नहीं हैं तो हम उन्हें मना कर सकते हैं । हम उनके बिना भी काम चला सकते थे अगर उन्होंने ऐसी बातें बताई होतीं जो वेदों में नहीं मिलतीं; अगर उन्होंने अपनी समझ से सोचा होता कि इंसान के लिए क्या अच्छा है और क्या नहीं । इस तरह, बहुत से लोगों ने अपने मन के हिसाब से लिखा है; हम भी इसी तरह अपने लिए कानून बना सकते हैं ।
असल में स्मृतियाँ वैदिक नियमों का पूरा पालन करती हैं और इसलिए हमें उन्हें अभी और हमेशा के लिए अपना प्राधिकारी मानना चाहिए ।
फिर सवाल यह उठता है कि इस दावे का आधार या सबूत क्या है कि स्मृतियाँ सिर्फ़ वेदों के आधार पर लिखा गया है ।
सिर्फ़ वेद ही स्मृतियों का आधार है
सबसे बड़ा सबूत महाकवियों के निर्णयों (निष्कर्षों) में है । हमारे धर्मों के संस्थापक शंकर, रामानुज और माधव ने इस बात की पुष्टि की है कि धर्मशास्त्र वेदों पर आधारित हैं ।
लेकिन फिर शायद इसे बिना गलती के नहीं माना जा सकता क्योंकि वे अपने-अपने सिद्धांतों के प्रति बहुत ज़्यादा वफ़ादार थे । वे पुराने मूल्यों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध थे । इसलिए वे परंपरा की सीमाओं के बाहर उपदेश नहीं देते थे । लेकिन कवि में ऐसी कोई रुकावट नहीं है । वह किसी सिद्धांत को स्थापित (सत्य सिद्ध करने) के लिए न तो समर्पित है और न ही प्रतिबद्ध । वह बिना किसी पंथ के भेदभाव के, जैसा उन्हें दिखाई देता है, वैसा ही सच बोलता है ।
सभी महाकवियों में सबसे मशहूर, कालिदास ने अपने रघुवंश में श्रुतियों का ज़िक्र इस तरह किया है: वह कहते हैं “श्रुतेरिवार्थं स्मृतिरन्वगच्छत्” । सुदक्षिणा गाय के नक्शेकदम पर चली, जैसे स्मृति श्रुति के अर्थ का अनुसरण करती है ।
यहाँ, जब यह बताया जाता है कि जब दिलीप गाय को चराने ले गए तो सुदक्षिणा गाय के नक्शेकदम पर कैसे चली, तो कालिदास बताते हैं कि ऋषियों ने स्मृतियाँ कैसे बनाईं । उनका मकसद हमें यह बताना नहीं था कि ऋषियों ने क्या किया या स्मृतियाँ कैसे बनाई गईं ।
यह आम बात है कि उपमा (उपमान) के विषय उस चीज़ (उपमेय) से बेहतर होते हैं जिससे उसकी तुलना की जाती है । उदाहरण के लिए, जब किसी के चेहरे की तुलना चाँद या कमल से की जाती है, तो चाँद या कमल असल में चेहरे से ज़्यादा देखने में बेहतर लगेगा । यहाँ उपमा का विषय अत्यन्त पवित्र (पतिव्रता) सुदक्षिणा है जो अपने पति दिलीप के चले राह पर चल रही है । यह तार्किक तौर पर यह बताती है कि स्मृतियाँ श्रुतियों को और भी नजदीक से अनुसरण करती हैं । इसलिए उपमा देने में महारत प्राप्त, कालिदास, इस तुलना का सहारा लेते हैं । इसलिए यह साबित करने के लिए किसी और सबूत की ज़रूरत नहीं होगी कि श्रुतियाँ पूरी तरह से स्मृतियों के अनुरूप ही चलती हैं ।
अब वे नियम (अनुष्ठान) जो वेदों में साफ़ तौर पर नहीं बताए गए हैं, लेकिन स्मृतियों में साफ़ किए गए हैं, उन्हें स्मार्त-कर्म कहा जाता है । जो वेदों में साफ़ तौर पर बताए गए हैं, उन्हें श्रौत-कर्म कहा जाता है । इससे यह नतीजा नहीं निकलना चाहिए कि स्मार्त कर्म किसी भी तरह से श्रौत कर्म से कम है ।
गृहस्थ के लिए सबसे ज़रूरी उपासना, घर पर किए जाने वाले कर्म जिन्हें गृह्य-कर्म कहते हैं, वैदिक-कर्म में सबसे ज़रूरी, पितृ-श्राद्ध, पाँच यज्ञ – ये सभी स्मार्त कर्म हैं । इन्हें करने में वेद मंत्रों का इस्तेमाल होता है । इसलिए यह साफ़ है कि स्मृतियों के लेखकों ने इन ज़िम्मेदारियों को बताते समय श्रुतियों की भावना को समझा था । इसलिए, यह सोचने के बजाय कि स्मृतियाँ श्रुति से कम हैं या पुराण स्मृतियों से कम हैं, इन सभी को एक साथ, एक सम्मिश्रित पैकेट (कंपोजिट पैकेज) के तौर पर देखना चाहिए ।
पुराण वैदिक धर्मों को कहानियों के रूप में बताते हैं । वैदिक धर्म और कर्म कहानियों के रूप में नहीं, बल्कि स्मृतियों द्वारा सलाह और निर्देशों के रूप में पेश किए गए हैं । वे कर्म करने का तरीका भी बताते हैं। वेद ऋषियों की समझ में आसानी से आ गए । बाद में, ऋषियों को जो कुछ उन्होंने देखा था, वह याद आया और वे स्मृतियाँ बन गईं । पुराण वेदों में मौजूद सच्चाई और कहानियों के बारे में बताते हैं । सभी भरोसेमंद हैं ।
इस तरह श्रुति, स्मृति और पुराण सभी धर्म के बारे में बताते हैं ।
और हमारे आचार्य आदि शंकराचार्य श्रुति, स्मृति और पुराणों में मौजूद धर्म के भंडार थे । इसलिए हम उन्हें इन पुनीत शब्दों के साथ नमन करते हैं:
श्रुति स्मृति पुराणानामालयं करुणालयं ।
नमामि भगवत्पादशंकरं लोकशंकरं ॥
हरिः हरः!!

1 Comment
Bahut neek lagal paidh k. Ekra sabke jate padhi aa manan kari ote aur asmriti m banal rahat. Bahut Bahut Dhanyabaad.
“स्वभाव मनुष्य केँ एकहु क्षण लेल पर्यन्त शान्त भेने बिना किछु करैत रहय लेल बाध्य करैत अछि । तेँ ओकरा का करबाक सही तरीका सिखबाक चाही, आर एना कय केँ, अपना मोन केँ साफ करबाक चाही, नीक चरित्र आ आदत सब बनेबाक चाही आर फेर आदत (गुण) सब सँ उपर उठिकय ज्ञानी बनबाक चाही तथा ब्रह्म मे मिलि जेबाक चाही ।”
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