वेदांगः ज्योतिष – वेदक आँखि
एखन धरि हम चारि गोट वेदांगक बारे मे बात कयलहुँ अछि, यानि शिक्षा, व्याकरण, छन्द आ निरुक्त । पाँचम अछि ज्योतिष ।
ज्योतिष वेद पुरुषक आँखि – देखबाक अंग जेकाँ काज करैत अछि । एहि विज्ञान (साइंस) या शास्त्र केर तीन टा हिस्से अथवा स्कन्ध अछि । तेँ, एकरा – “स्कंध त्रयात्मकम्” कहल जाइछ । ई थिक ‘सिद्धान्त स्कन्धम्’, ‘होरा स्कन्धम्’ और ‘संहिता स्कन्धम्’ । स्कन्ध शब्दक मतलब अछि गाछक मुख्य शरीर (तना) सँ निकलल मुख्य डार्हि (शाखा) ।
गर्ग, नारद, पराशर आ कतेको आर ऋषि लोकनि ज्योतिष पर कतेको ग्रन्थ लिखने छथि । एकटा किताब अछि जाहि मे सूर्य भगवानक उदाहरण देल गेल अछि, जाहि मे एहि विज्ञानक एकटा हिस्सा केँ लेल गेल अछि आर एहि मे दैविक वास्तुकार एवं निर्माणकर्त्ता ‘मय’ केँ शिक्षा देल गेल छन्हि । एकरा “सूर्य सिद्धान्त” कहल जाइत छैक । एहि तरहें, देवता लोकनि एवं ऋषि लोकनि द्वारा रचित पुस्तक सब अछि । मनुष्य लोकनि द्वारा सेहो लिखल गेल कतेको रास पुस्तक सब अछि । वराहमिहिर एहि विषय पर कतेको किताब सब लिखबाक लेल प्रसिद्ध छथि । आर्य भट्ट, भास्कराचार्य व अन्य लोक सब सेहो बहुमूल्य योगदान देलनि अछि । एखन हालहि के समय मे सुन्दरेश्वर श्रौति नामक एक गोट वैदिक विद्वान “ज्योतिष कौस्तुभम्” नामक एकटा पुस्तक लिखलनि अछि ।
बिना आँखिवला व्यक्ति आन्हर होइत अछि । जखन कि लग-पासक कोनो वस्तु केँ छूबिकय (स्पर्श सँ) चिन्हल जा सकैत छैक, दूरक वस्तु केँ मात्र आँखि सँ देखल जा सकैत छैक । जाहि तरहें मानवक आँखि दूर आ लगक वस्तु सभक पहिचान करय मे उपयोगी होइछ, तहिना ज्योतिष शास्त्र समय मे, यानि कतेको साल पहिने या भविष्य मे ग्रह सभक आ तारा सभक स्थिति केँ देखय मे उपयोगी होइत अछि । एखन (वर्तमान मे) ग्रह सभक स्थिति ज्योतिष (एस्ट्रोनॉमी) केर मदति के बिना देखिकय पता लगायल जा सकैत छैक । मुदा, मानि लिय ५० साल बाद मे ग्रह सभक स्थिति, त एहि लेल मात्र ज्योतिषक मदति टा सँ पता चलि सकैत अछि । कियैक तँ मात्र छुबय सँ रंगक पहिचान नहि भ’ सकैत छैक, तेहेन पहिचान लेल आँखिक जरूरत पड़ैत छैक । तहिना, अगर आइ कोनो ग्रह देखाइयो जाय, त हम ओकर जगह आ ओ हमरा सब पर केना असर डालैत अछि, एकर आधार पर ओकर असर नहि जानि सकब । मात्र ज्योतिष टा एहि विषय पर प्रकाश डालि सकैत अछि । यैह चलते एकरा वेद पुरुषक आँखि कहल जाइत छैक ।
ग्रह सभक स्थिति केर सन्दर्भ मे वैदिक अनुष्ठान सब केँ करबाक समय केर बारे मे निर्देश देल गेल अछि । विवाह व अन्य समारोहक तिथि सब तखनहि तय कयल जाइत छैक जखन ग्रह सभक स्थिति अनुकूल मानल जाइत छैक । ज्योतिष केँ ‘नयना’ जेकर अर्थ छैक आँखि सेहो कहल जाइत छैक । ‘नय’ केर अर्थ भेल नेतृत्व करब । एकटा आन्हर व्यक्ति केँ केकरो द्वारा नेतृत्व करय पड़ैत छैक । हम सब जे भाग्यशाली छी जे हमरा सब लग देखबाक लेल आँखि अछि, आँखि ‘नेता’क भूमिका निभबैत अछि । वैदिक कर्म सब केँ करबाक लेल शुभ समय निर्धारित कयलाक बाद, ज्योतिष हमरा सब केँ ओकर वास्तविक निष्पादन दिश लय जाय मे आँखिक भूमिका निभबैत अछि ।
एस्ट्रोनॉमी आ एस्ट्रोलॉजी (अन्तरिक्ष शास्त्र एवं ज्योतिष शास्त्र)
आइ-काल्हिक साइंस (विज्ञान) एस्ट्रोनॉमी (अन्तरिक्ष शास्त्र) टा पर रुकि जाइछ, जे मात्र अलग-अलग समय मे ग्रह सभक स्थिति केँ बतबैत अछि । ग्रह सामान्य तौर पर दुनिया पर केना असर पाड़ैत अछि ? ओ हमरा सब पर केना असर पाड़ैत अछि ? ओकर असर हमरा सब लेल नीक बनेबाक ले कि कयल जेबाक चाही ? अन्तरिक्ष शास्त्र (एस्ट्रोनॉमी) केर संगहि आ ओहि पर आधारित ज्योतिष शास्त्र (एस्ट्रोलॉजी) केर विज्ञान एहि सब सवालक जवाब तकैत अछि ।
ज्योतिष शास्त्र असल मे ई बतेबाक लेल बनायल गेल छल जे जखन वैदिक कर्म कोनो खास ग्रह, तारा या चंद्रमाक दिन शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष केर प्रभाव मे कयल जाइत अछि, त ओकर सफलता अधिक या एहि मे कतेक कमी हेतैक । दोसर शब्द मे, ज्योतिषक मुख्य उद्देश्य वैदिक कर्म करबाक लेल सब सँ उपयुक्त (सही) समय पर पहुँचय मे मदति करब छल आ एहि लेल एकरा वेदांगक एकटा अंगक रूप मे वेदक हिस्सा बनायल गेल । कियैक तँ एहि मे राशि सभक अलग-अलग ग्रह सब मे पहुँचबाक चक्रक बारे मे गणना शामिल अछि, जाहि लेल गणित एकर एकटा जरूरी हिस्सा बनि गेल ।
ओ जगह जेतय वैदिक यज्ञ कयल जाइत छैक, ओकरा ‘यज्ञ वेदी’ कहल जाइत छैक तथा ओहि जगह केर स्थिति कोन ठाम पर हेबाक चाही, ई सबटा तथ्य सभक सम्बन्ध मे सविस्तार वर्णन कयल गेल अछि ।
यज्ञ वेदी केर सही संरचना (बनावट) तथा निर्माणक बारे मे देल गेल आदेश केर आधार पर कयल गेल यज्ञ नीक फल दैछ । तेँ, एहि जरूरत सभक सही हिसाब लगेनाय जरूरी भ’ गेल, जाहि सँ कि ओ तय शर्त सभक मुताबिक यज्ञकार्य कयल जाय । यैह कारण सँ, वेदक एकटा सहायक अंग – उपांगक तौर पर गणित केँ विकसित कयल गेल छैक ।
प्राचीन गणितीय ग्रन्थ
हम पहिनहिं तीन टा स्कन्धक बारे मे कहने रही, सिद्धान्त स्कन्ध, होरा स्कन्ध तथा संहिता स्कन्ध । सिद्धान्त स्कन्ध मे अंकगणित, त्रिकोणमिति, ज्यामिति तथा बीजगणित जेहेन विषय शामिल अछि । पश्चिमी दुनिया केँ उच्चतर गणित मे विकसित होय मे जे सैकड़ों वर्ष लगलैक, से हमरा लोकनिक प्राचीन ज्योतिष मे पहिनहिं सँ मौजूद अछि ।
अंकगणित, संख्या सभक संग शुद्ध गणना थिक । साधारण संख्या सब देल जाइत छैक आ ओकर नतीजा निकालल जाइत छैक । सरल जोड़, घटाव, गुणा आ भाग, अंकगणितक काज छी । ‘अव्यक्त-गणित’ अज्ञात संख्या सब सँ सम्बन्धित अछि, अर्थात् १, २, ३ या ४ जेहेन अंक सभक बदले, ‘ए’ जेहेन प्रतीक सभक उपयोग कयल जाइत छैक । एकरा बीजगणित कहल जाइत छैक । अव्यक्त केर शाब्दिक अर्थ अछि जे निश्चित रूप सँ ज्ञात नहि हो । ‘क्षेत्र गणित’ ज्यामिति थिक । ‘ज्या’ या जियो पृथ्वी छी । ‘मिति’ केर अर्थ भेल मीटर या माप । तेँ, एकर नाम ज्यामिति अछि । यज्ञ स्थल, यज्ञ कुंड (यज्ञ भूमि व यज्ञ वेदी), एकर स्थान, आकार आर आयाम सब केँ सुनिश्चित करब एहि ज्यामिति मे कयल गेल छल । एकटा अंकगणित अछि जेकरा ‘समीकरण’ कहल जाइत छैक । ई ज्ञात केर माध्यम सँ अज्ञात केर खोजय सँ सम्बन्धित अछि । आंकड़ा सभक अज्ञात समूह अलग सँ देल गेल अछि आर ओकरा समीकरण सब मे परिवर्तित करबाक जरूरत होइत छैक । ई समीकरण थिक । एकर अर्थ अछि चीज सब केँ बराबर कयनाय । एकरा आब अंग्रेजी मे इक्वेशन कहैत छैक ।
आपस्तंब सूत्र मे एकटा समीकरण अछि । ई बहुत हाल धरि प्रमाण केँ चुनौती दैत छल । चूंकि एकरा पश्चिमी गणित केर माध्यम सँ हल नहि कयल जा सकैत छलैक, ताहि सँ ई कहल गेल छलैक जे एकरा साबित नहि कयल जा सकैछ । लेकिन, आगूक शोध साबित कय देलक जे सूत्र मे देल गेल समीकरण सही छल । ई स्वाभाविक रूप सँ पश्चिमी विद्वान लोकनि केँ चकित कय देलकनि । गणित मे दक्षताक उच्च डिग्री जे एतेक लम्बा समय धरि आधुनिक विज्ञान केँ चकित कय देने छल, ओ हजारों साल पहिनहिं सँ भारतीय विद्वान सब केँ ज्ञात रहनि । एहेन कतेको आर सूत्र सब अछि जेकरा एखनहुँ धरि साबित आ बुझल गेनाय बाकी अछि । एहि समीकरण केँ सेहो केवल समीकरणहि केर सहायता सँ मात्र साबित करय पड़त । हमरा लोकनिक शास्त्र सब मे गणितक कतेको जुड़ल शाखा सभक जिकिर अछि, जेना रेखा गणित, गुट्टक, अंग भाग, वगैरह । अव्यक्त गणित (अलजेब्रा) केँ बीज गणित सेहो कहल जाइत छैक ।
लगभग ८०० साल पहिने भास्कराचार्य नामक एकटा मशहूर गणितज्ञ रहथि । हुनकर जीवन मे एकटा घटना घटल छल जे ई देखबैत अछि जे हम सब अपन बुद्धि कतबो लगा ली, भाग्य मे लिखले बात घटित होइते टा छैक । हुनकर एकटा बेटी छलन्हि जेकर नाम लीलावती रहैक । भास्कराचार्य, जे एकटा महान एस्ट्रोलॉजर तथा एस्ट्रोनॉमर छलथि, हुनका अनुभूति भेल जे विवाहक तुरन्त बाद बेटी विधवा होयबाली अछि । ओ सोचलनि जे यदि ओ अपन बेटीक विवाह एहेन समय मे कय सकथि जखन ग्रह सभक हालत एतेक नीक हो जे विवाहित जीवन लम्बा भ’ सकय, त ओ अपन बेटीक भाग्य बदैल सकैत छथि । तेँ ओ एकटा समय आ तारी तय कयलनि जखन ग्रह एतेक नीक स्थिति (अनुकूल संयोजन) मे अवस्थित छल । ताहि दिन मे, आजुक उलटा, समय देखाबय लेल घड़ी नहि होइत छलैक । तहिया पानिक बर्तन केँ घटिका या आइ-काल्हिक घटिकारा (घड़ी) केर तौर पर प्रयोग कयल जाइत छलैक । बर्तन दुइ हिस्सा मे बंटल रहैत छलैक – ऊपरवला आ नीचाँवला । ऊपरवला हिस्सा सँ पानि एकटा छोट-सन छिद्र होइत नीचाँवला हिस्सा मे चुबैत छलैक । नीचाँवला हिस्सा पर दबाइक बोतल पर लगायल अंकक चिह्न जेकाँ अंशांकन चिह्न भेल करैक । पानिक स्तरक उपयोग समय गणना करबाक लेल कयल जाइत छलैक । एहि पर हरेक निशान एक दिनक साठिम भाग (१/६०) बराबरक समय देखबैत छलैक । समय केर एहि यूनिट केँ घटिका (घट या बर्तन शब्द सँ लेल गेल) कहैत छलैक । एकटा घटिका २४ मिनट के बराबर होइत रहैक । कियैक तँ पानि मौसमक हिसाब सँ वाष्पीकरण (इवैपोरेशन) केर अधीन होइत छैक आर एहि सँ गणना (कैलकुलेशन) मे गलती भ’ सकैत छैक, तेँ बाद मे पानिक स्थान पर रेत (बालू) प्रयोग कयल जाय लागल, जे भाफ बनयवला प्रक्रियाक अधीन नहि होइत छल आ घंटा-घड़ीक नाम सँ जानल जायवला औजार प्रयोग मे आबय लागल । जेना कि ताहि दिनक रिबाज रहैक, लीलावतीक विवाह तहिये तय भ’ गेलैक जहिया ओ एखनहुँ बच्चे रहय । ई बच्ची उपर बतायल गेल “पानिक घट” लग आयल आ किछु शरारत कयलक । ताहि दौरान, ओकर नाकक गहनाक एकटा छोट मोती ढील भ’ कय घटिका दुइ हिस्साक बीचक छिद्र मे खसि पड़लैक, जाहि सँ पानि टपकल लगलैक । परिणामतः, पानि चुबयवला छिद्रक आकार छोट भ’ गेलैक । तेँ, जखन सीमित पानिक सप्लाइ ओहि निशान धरि पहुँचल जे ग्रह सभक नीक स्थिति केँ देखेबाक लेल बनायल गेल छलैक, ताबत धरि ओ समय निकलि गेल छलैक, तेँ ओ बहुत कम उमेर मे अपन पति सँ बिछुड़ि गेल, आर ओकर कुंडली मे लिखल भविष्यवाणी सही सिद्ध भेलैक ।
ताहि समय बच्चा समेत कियो गोटे पानिक घट मे मोती गिरबाक विषय पर ध्यान नहि देने छलैक । लेकिन जखन बाद मे ई बात पता चललैक, ताबत धरि बहुत देरी भ’ चुकल छलैक आ ई मानि लेल गेल छलैक जे किस्मत बदलनाय मुश्किल छैक ।
बाद मे, भास्कराचार्य गणित पर एकटा किताब लिखय चाहैत छलथि । ओ ताहि किताबक टाइटल (शीर्षक) अपन बेटीक नाम चुनलनि । ओ अपन बेटी, जे बाल-विधवा भ’ गेल रहैक, केँ एकटा बड पैघ गणितज्ञक तौर पर काबिल बनौलनि आर अपन किताबक नाम ओकरहि नाम पर रखलनि । एहि किताब मे गणितक अलग-अलग पहलू जेना अरिथमेटिक, व्यक्त गणित, बीज गणित, वगैरह शामिल अछि । ग्रह सभक स्थिति आर ओकर चाइलक पता लगबय मे मदतिक लेल, ओ “सिद्धांत शिरोमणि” नामक एकटा किताब सेहो लिखलनि ।
“प्राचीन लेखा माला” नामक एकटा किताब अछि जाहि मे सबटा पुरान शिलालेख सभक संग्रह अछि । किताब सँ पता चलैछ जे गुजरातक ‘सिंगना’ नामक एकटा राजा भास्कराचार्यक लिखल बात सब केँ लोकप्रिय बनेबाक कोशिश कएने रहथि ।
हालांकि यूक्लिडक मॉडर्न ज्योमेट्री (आधुनिक ज्यामिति) केर किताबक बीच केर चैप्टर ७, ८, ९ और १० गायब बतायल जाइछ, लेकिन संस्कृतक सबटा बारह गोट किताब एखनहुँ धरि ओहिना यथावत स्थिति मे अछि । एना लगैत अछि जे हम सब बुनियादी (प्रारम्भिक) गणित सँ सेहो खुशीपूर्वक अनजाने छी । उदाहरणक लेल, गुणन केर मतलब बेर-बेर जोड़नाय अछि । तहिना भाग केर मतलब बेर-बेर घटेनाय होइछ ।
भास्कराचार्यक समय सँ बहुते पहिने, १५०० साल सँ सेहो पूर्वहि, वराहमिहिर नामक एकटा गणिगज्ञ भेल छलथि । ओ ‘बृहद् संहिता’ एवं ‘बृहद् जातक’ जेहेन कतेको किताब सभक लेखक रहथि । बृहद् संहिता सारा वैज्ञानिक विषय सभक ‘सार’ थिक । ई आइयो बहुत हैरानीक बात अछि जे हमरा सभक प्राचीन विद्वान् वैज्ञानिक विषय (साइंटिफिक सब्जेक्ट्स) सभक एकटा लम्बा सूची सँ अवगत रहथि । बृहद् जातक मे एस्ट्रोलॉजी सँ जुड़ल सब मामिलाक बारे मे कहल गेल अछि । आर्य भट्ट “आर्यभट्ट सिद्धांत” नामक किताब केर लेखक छथि । ओहो १५०० साल सँ बेसी पहिने भेल रहथि । आइ जे मॉडर्न अरिथमेटिक चलन मे अछि, ओ आर्य भट्ट केर बतायल सिद्धांत सब पर आधारित अछि । वराहमिहिर तथा आर्य भट्ट दुनू गोटे केँ मॉडर्न मैथमैटिशियन बहुते मानैत छथि । ई सब मैथमेटिकल साइंस सिर्फ़ तारा व नौ ग्रह सभक स्थान (स्थिति) एवं चाइल (चाल) सँ जुड़ल अछ । असल मे मात्र सात टा ग्रह अछि । राहु आ केतु छाया थिक । तेँ, ओकरा “छाया ग्रह” कहल जाइत छैक । ओ सूरज आ चन्दाक चलबाक (ट्रांज़िट) ठीक उलटा चलैत अछि । तेँ ओकरा कोनो गणना (कैलकुलेशन) केर ज़रूरत नहि पड़ैत छैक । ओकर खास बात सूरज व चन्दाक बात सब केँ उलटा कय केँ पता लगायला जा सकैत अछि ।
तारा आर ग्रह मे कि फ़र्क छैक ? जे अपन सूरज केर चक्कर लगबैत अछि, ओ ग्रह भेल । जे सोलर गैलेक्सी सँ जुड़ल अछि, से तारा भेल । ओकरा चिन्हबाक एक्के टा तरीका छैक जेकरा देखिकय चिन्हल जा सकैत अछि । जखन हीरा घुमैत रहैत छैक, त ओहि मे चमक-दमक भेल करैत छैक । तहिना तारा सेहो एनाही टिमटिमाइत छैक जेना कि ओ हिल रहल हुअय । ग्रह स्थिर रहिकय प्रकाश छोड़ैत अछि ।
सूरज आर तारा खुद-ब-खुद चमकैत अछि । तारा अलग-अलग रंग देखबिते चमकैत अछि, किछु-किछु नीक ढंग सँ तराशल हीरा सँ निकलयवाली नीला आ हरा रंगक रोशनी जेकाँ । गुरु (ज्यूपिटर) आ शुक्र (वीनस) ग्रह बड़का तारा जेहेन देखाय दैत अछि लेकिन ओहि मे कोनो चमक-दमक नहि होइत छैक । तारा मे चमक-दमक होइत छैक । सूरज सेहो एहने अचि । अगर ध्यान सँ देखब, त लग-पासक प्रभामंडल गायब भ’ जायत । फेर ओ पानि मे हेलैत चपटा शीशाक टुकड़ा जेकाँ देखायत । एहि मे चमक-दमक आ हलचल दुनू रहत । चाँद एना नहि अछि ।
हम अहाँ केँ कहैत छी जे सूरज मे प्रकाश आ हलचल (गति) दुनू केना होइत छैक । एकटा छोट सन छिद्र सँ अबैत धूपक किरण केँ लिय । सूरज केर किरण हिलैत रहत, लेकिन चाँदक किरण स्थिर रहत । दोसर ग्रह सेहो चाँदे जेकाँ अछि । तारा भले छोट देखाय, लेकिन ओहि मे चमक-दमक आ हलचल दुनू होइत छैक ।
अगर कोनो तारा काफी पैघ होइतय, त ओकर चमक मे सात रंग, VIBGYOR, देखाय दितय, जेना हीरा सँ रंग निकलैत अछि तहिना । सूरज केर एक नाम ‘सप्तस्वान’ अछि, जेकर मतलब अछि जे ओकर रथ मे सात (सप्त) घोड़ा (अश्व) अछि ।
एकर मतलब सात रंगवला एकटा घोड़ा सेहो भ’ सकैत अछि । ‘अश्व’ शब्द केर मतलब ‘किरण’ सेहो अछि । एकर मतलब सूरज केर किरण सँ निकलयवाली सात रंगीन किरण सँ अछि । एक्के टा किरण सँ सब सात रंग निकलैत अछि । VIBGYOR केर सेहो यैह मतलब अछि । वेदक तैत्तरीय आरण्यक मे कहल गेल अछि जे एक्के टा किरण केँ सात टा नाम सँ जानल जाइत अछि “एको अश्वः वहति सप्तनामा” यानी, एक्के टा रंग, सफेद, रिफ्रैक्शन पर सात रंग मे बंटि जाइत अछि ।
तारा पूरब मे उगैत अछि आर पश्चिम मे डूबैत अछि । ग्रह सेहो पश्चिम दिश चलैत अछि लेकिन हरेक दिन ओ कनेक पूब दिश घुसकैत रहैत अछि । सातो ग्रह कनेक पूब दिश चलैत रहैत अछि । ज्योतिष विज्ञान एहि हरकत सब सँ जुड़ल अछि ।
ग्रह लोकक जीवन पर केना असरि डालैत अछि
धरती पर, मनुष्यक किस्मत सेहो ग्रह सभक चाइल जेकाँ बदलैत रहैछ । खराब समय, नीक समय, दुःख, सुख, ऊंच पद, ताहि सँ नीचाँ खसब – एहेन लोकक बदलैत किस्मत होइछ । एहेन बदलाव सिर्फ़ इंसानहि धरि सीमित नहि अछि । संस्था व देशहु सभक नीक आ खराब समय अबैत रहैत छैक । महान ऋषि लोकनि देखलनि जे ग्रह सभक चाइल आ धरती पर देखायवला नीक आ खराब परिणाम सभक बीच एक तरहक पक्का कनेक्शन (निश्चित जुड़ाव) छैक । असल मे, ओ लोकनि ग्रहक चाइल केँ हमरा सबपर ओकर असर सँ जोड़लनि अछि । जखन कोनो काज शुरू कयल जाइत अछि, त ओहि काज केँ शुरू करैत समय ग्रह सभक स्थितिक आधार पर ओकर नतीजाक अंदाजा लगायल जा सकैत अछि । एहि साइंस केँ होरा शास्त्र कहैत छैक । जन्मक समय केँ आधार मानिकय, कुंडली मे ग्रह सभक स्थिति तय कयल जा सकैछ आ केकरो पूरा जिन्दगी मे नीक आ खराब समय केर अन्दाजा लगायल जा सकैत अछि ।
नीक आ बेजा समय लेल कतेको रास कारण सब कहल जाइत अछि । ई ओहिना अछि जेना कोनो बीमारीक लेल अलग-अलग कारण सब कहल जाइत अछि । डॉक्टर एहि बीमारीक कारण “मानस” (psyche) मे बदलाव (मानसिकता मे परिवर्तन) केँ मानैत अछि । जादू-टोनावला (ओझा-गुणी जानयवला) एकरे सुपरनैचुरल ताकत (अदृश्य शक्ति सभक ताकतक असर) केर कारणे होयब मानैत अछि । ज्योतिषी एकरा ग्रह सभक स्थिति मे बदलाव केँ मानैत अछि । धर्मशास्त्र एहि बीमारी केँ पैछला जन्म मे कयल गेल कर्म सभक असर कहैत अछि । साइकोलॉजिस्ट कहैत अछि जे भावना सब मे बदलाव सँ सेहत मे बदलाव होइत छैक । एहि तरहें, एक्के असर लेल कतेको कारण बतायल जाइत अछि । असल मे, कारण कि अछि ? ग्रह, मानसिक अवस्था, मन के ताकत – या किछु आर ? एहि मे सँ कोनो गलत नहि अछि । सब केँ अपन भूमिका करबाक रहैत छैक । ओ सब एक्के चीजक अभिव्यक्ति सब रहैत अछि । हमरा सब केँ बुझय मे मदति करबाक लेल, अलग-अलग कारण सभक जिकिर कयल गेल अछि आर ओकर मिलल-जुलल असर सँ एना अनुभव होइत अछि । अलग-अलग लोक अलग-अलग कारण सब बतबैत अछि । अगर बरखा होइत अछि, त नमी होइत छैक, माछी सब झुंडक-झुंड मे भिनकैत अछि, बेंग सब टर्राइत रहैत अछि । ई बरखाक बाद होयवला असर थिक । तहिना, कतेको एहेन संकेत अछि जे हमरा सभक पैछला जन्म सभक कर्मक परिणाम दिश इशारा करैत अछि । हर कारण एकटा सबूत छी । ओ सब आपस मे जुड़ल अछि । ग्रह सभक स्वभाव पैछला कर्म सब सँ तय होइत छैक । बीमारी होइत अछि आ मोन परेशान भ’ जाइत अछि । मानसिक शक्ति सब सेहो हावी भ’ जाइत अछि । ई सब एक्के टा कर्मक नतीजा छी । ई बात हरेक दुर्घटनाक कारण सभक आधार पर साबित कयल जा सकैत अछि । लेकिन ग्रह सभक चाइल मे प्रयोग होयवला गणनाक तरीका सबसँ आसान अछि ।
“शकुन” – “निमित्त”
हम पहिनहिं कहने रही जे ज्योतिष विज्ञान केर एकटा हिस्सा “संहिता स्कंध” अछि । ज़मीनक नीचाँ पानि कतय रहैत अछि ? नदी आ जलधारा ज़मीनक नीचाँ कतय होइत अछि ? ज़मीनक नीचाँ पानि रहलापर उपर केहेन संकेत देखाइछ ? ई सब गोटेक एहेन विषय अछि जाहि सँ ई स्कन्ध जुड़ल अछि । परफ्यूम (इत्र) आ कॉस्मेटिक (शृंगार प्रसाधन) बनेबाक तरीका, घरक आकृति (डिज़ाइनिंग) तथा निर्माण (कन्सट्रक्शन), शकुन आ निमित्त केर विज्ञान सेहो एहि स्कन्ध मे भेटैत अछि ।
शकुन, निमित्त सँ अलग छैक, हालाँकि दुनू आम तौर पर “शगुन” केर तहत अबैत अछि । शकुन केर मतलब असल मे एकटा पक्षी होइत छैक । पक्षी सभक वजह सँ होयवला शकुन केँ शकुन कहैत छैक । धरती पर एहेन कोनो विषय या बात नहि अछि जे एक-दोसर सँ अलग हो । जे कोनो घटना सब घटित होइछ, ओ सब एतबे जुड़ल रहैछ । अगर सही गणनाक प्रयोग कयल जाय, त एकर आसानी सँ अन्दाज लगायल जा सकैत अछि आ एकरा बुझल जा सकैत अछि ।
धरती पर सबटा घटना सब एक्के टा ताकत केर राज मे होइत अछि । ओ सबटा एक गोट निर्धारित पद्धति (पैटर्न) केँ फॉलो (अनुकरण) करैत अछि । तेँ एकटा अवलोकनक उपयोग कयकेँ शेष केर गणना कयल जा सकैत अछि । केकरो हाथक रेखा सब, प्रश्न पूछल जेबाक समय ग्रह सभक स्थितिक आधार पर घटना सभक पूर्वानुमान (आरूढ़), ज्योतिष सेहो आपस मे जुड़ल अछि । ई सबटा सत्य अछि । एहि मे सँ एकटा अछि शकुन ।
शकुन शास्त्र एहेन विषय सब सँ सम्बन्धित अछि, जेना (१) कोनो चिड़िया केर हमरा सभक बायाँ सँ दायाँ जेबाक कि प्रभाव पड़ैत अछि ? (२) एक या दोसर चिड़ियाक कनबाक केहेन प्रभाव पड़ैत अछि ? आदि । एहि मे निमित्त – शगुन केर अर्थ सेहो शामिल अछि । “निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव” युद्ध शुरू होय सँ पहिने अर्जुन भगवान कृष्ण सँ कहैत छथि । ई हमरा सभक कहय समाने अछि जे खराब शगुन देखल जाइत अछि । ओ शकुन केर बजाय सही शब्द, निमित्त केर उपयोग करैत छथि, कियैक तँ ओ शगुन जे चिड़िया द्वारा प्रकट कयल जाइछ तेकरा शकुन कहल जाइछ । अगव एकटा बिलाड़ि रास्ता काटि देलक, त ई निमित्त भेल । अगर एकटा गिद्ध उड़िकय पार कय गेल, त ई शकुन थिक । बाद मे, भगवान अर्जुन सँ निमित्त केर बारे मे सेहो बात करैत छथि: “निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्”, ओ कहैत छथि । “हम पहिनहिं निर्णय कय लेलहुँ अछि जे ई सब एहि युद्ध मे नष्ट भ’ जायत । ताहि हेतु, एकरा सब केँ पहिने मृत मानल जा सकैत छैक । एकर वध करयवला कियो आर नहि बल्कि हमहीं छी । अहाँ मात्र निमित्त केर भूमिका निभाउ ।” भगवान कहलनि आर ओहि सन्दर्भ मे ओ कहलनि “निमित्तमात्रं भव” ।
तेँ शगुन अपने आप मे कोनो स्थिति केँ नहि बनबैत या बदलैत अछि । ई एकटा परिणाम केँ प्रकट करैत अछि जे सतह (जमीन) पर अयबाक लेल बाध्य अछि । एहि तरहें, शगुन केवल ओहि प्रतिक्रियाक घोषणा करैत अछि जे हमरा सभक पैछला जन्म सभक कर्म सँ उत्पन्न होइत अछि ।
संक्षेप मे कहल जाय त, तीन स्कन्ध या भाग सब मे सामान्य सिद्धांत सभक प्रकृति मे जे कहल गेल अछि, ओ गणित आ ग्रह सभक चाइल थिक । मनुष्यक नीक या बेजा समय केर अलग-अलग उच्चारण होरा या जातक कहाइत अछि । होरा सँ मात्र ‘होरोस्कोप’ (राशिफल) जेहेन शब्दक जन्म भेल अछि ।
पुरान ग्रन्थ सब मे आजुक खोज (आविष्कार)
हम पहिनहिं कहलहुँ जे वराहमिहिर ‘बृहद संहिता’ नाम केर एकटा किताब लिखने छथि । एहि किताब मे कतेको रास वैज्ञानिक खोज सभक बारे मे कहल गेल अछि ।
ग्रह बिना सहारा केर स्पेस मे केना लटकल रहैछ ? ओ नीचाँ कोना नहि खसैछ ? आम धारणा छैक जे न्यूटन एहि घटनाक कारण खोजने रहथि ।
सोलर सिस्टम (सौर्य मंडल) पर बहुत पुरान थ्योरी (सिद्धान्त) एकटा श्लोक सँ शुरू होइछ जाहि मे कहल गेल अछि जे पृथ्वी अन्तरिक्ष (स्पेस) मे कियैक नहि खसैछ, एकर कारण ग्रेविटी फोर्स (गुरुत्वाकर्षण बल) छी । आदि शंकराचार्य केर उपनिषद भाष्य मे सेहो कहल गेल अछि जे पृथ्वी मे आकर्षण शक्ति अछि । अगर हम कोनो चीज़ हवा मे फेकैत छी, त ओ पृथ्वी पर खसैत अछि । ई ओहि चीजक कोनो विशेष गुण-धर्म (खासियत) नहि थिक । एकर खसबाक कारण पृथ्वी द्वारा ओहि चीज केँ अपना दिश खिचबाक बल (आकर्षण बल) थिक । आकर्षण शक्ति ग्रेविटी (गुरुत्व) केर खिंचाव (pull) थिक । ‘प्राण’ ऊपर जाइछ, ‘अपान’ ओकरा नीचाँ खिंचैछ । तेँ, जे फोर्स (बल) एकरा नीचाँ खिंचैत अछि, ओकरा ‘अपान शक्ति’ कहैत छैक । शंकराचार्य कहलनि अछि जे पृथ्वी मे ‘अपान शक्ति’ या ‘ग्रेविटी केर शक्ति’ छैक । प्रश्नोपनिषद (३.८) कहैछ: “पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यन्तरा” ।
यैह ओ देवता छथि जे पृथ्वी केँ नियंत्रण करैत छथि आ लोकक शरीर मे अपान शक्ति निर्माण करैत छथि । एहि उपनिषद पर अपन भाष्य मे, आचार्य (आदि शंकराचार्य) कहैत छथि: “तथा पृथिव्यां अभिमानिनि या देवता प्रसिद्धा सैषा पुरुषस्य अयानं अपानवृत्तिं अवष्टभ्य आकृष्य वशीकृत्याध एवापकर्षणेनानुग्रहंकुर्वती वर्तत इत्यर्थः” । जेना हवा मे उपर फेकल गेल कोनो वस्तु पृथ्वी द्वारा नीचाँ खिचा जाइछ, तहिना उपर खिंचयवला “प्राण” केँ “अपान” द्वारा नीचाँ खिंचल जाइत अछि । एहि सँ ई बहुते साफ भ’ जाइत अछि जे उपनिषद गुरुत्वाकर्षण केर नियम केर बात करैत अछि । हमरा लोकनिक शास्त्र सब मे कतेको रास आरो एहेन अद्भुत आंकड़ा (डेटा) भेटैत अछि, जेकरा बारे मे हम सब जानय नहि चाहैत छी मुदा ई मानैत छी जे हरेक वैज्ञानिक खोज पश्चिम सँ आयल अछि ।
हमरा लोकनिक ज्योतिष ग्रंथ जे युगों पहिनहिं लिखल गेल छल, ओहि मे ओ सबटा गणितीय सिद्धान्त शामिल अछि जे आइ दुनिया भरि मे उपयोग मे अछि । सृष्टिक आरम्भ मे सबटा ग्रह एक सीध रेखा मे स्थित छल । समयक संग, ओ सब कनि-कनि कय स्थिति बदलय लागल । जखन ऐगला कल्प आरम्भ होयत, त फेर ओ सबटा एक्के सीध (रेखा) मे स्थित होयत ।
नहि केवल गुरुत्वाकर्षणक खिंचाव बल्कि पृथ्वीक घुमबाक सेहो उल्लेख आर्यभट्ट एवं वराहमिहिर कयने छथि । ११मा शताब्दी धरि पश्चिमी सिद्धान्त छल: “अकेले पृथ्वी ब्रह्मांडक केन्द्र मे दृढ़ता सँ स्थिर अछि । सूर्य पृथ्वीक चारू दिश घुमैत अछि । एहि तरहें पृथ्वी पर दिन आ राति होइत अछि ।” जँ कियो एहि सँ कनिकबो अलग सिद्धान्त प्रस्तुत कयलक, त धार्मिक प्रमुख (पश्चिमी सभ्यताक गुरु सब) ओहि व्यक्ति केँ विधर्मक लेल खम्भा पर टाँगि देलनि, यानि ओकरा जिबिते मारि देलनि । लेकिन हम सब आरम्भहि समय सँ एहि सच्चाइ केँ एकर विपरीत जनैत रही ।
आर्यभट्ट ई बात बुझेबाक लेल एकटा सुन्दर उदाहरण देलनि अछि जे केना पृथ्वी सूर्यक चारू दिश घुमैत अछि, नहि कि सूर्य पृथ्वीक चारू दिश घुमैत अछि । एकरा “लाघव-गौरव” न्याय कहल जाइत छैक । (हल्कापन केर सिद्धान्त) । अगर कोनो काज आसानी सँ आर हल्का मे कयल जाय त ओकरा ‘हस्त लाघव’ कहल जाइत छैक, जेकर मतलब भेल निपुणता या हाथ केर सफाइ । ‘लघु’ केर उल्टा ‘गुरु’ अछि । जे भारी या पैघ अछि से गुरु थिक । गुरुक मतलब भेल पैघ आदमी । ओ उपदेशक या आचार्य छी । अगर आचार्य गुरु अछि, तो शिष्य लघु अछि । आचार्य जे गुरु अछि, शिष्य द्वारा आदरणीय अछि । तेँ ओ प्रदक्षिणा मे आचार्यक परिक्रमा करैत अछि । आचार्य शिष्य केर परिक्रमा नहि करैत छथि । अपन सौरमंडल केर सबसँ पैघ ग्रह सूर्य अछि । पृथ्वी लघु अछि । लाघव-गौरव न्याय कहैत अछि जे छोट वस्तु पैघ वस्तुक चारू दिश घुमैत अछि । एहि तरहें, आर्यभट्ट रूपक रूप सँ पृथ्वीक सूर्य केर चारू दिश घुमबाक उल्लेख कयने छथि ।
आइ हमरा लोकनि ओहि लोक सब सँ हाथ मिला लेलहुँ अछि जे पहिने वैज्ञानिक सब केँ विधर्मी कहैत छल आर विज्ञान केँ प्रगति नहि करय दैत ओकरा जरा दैत छल, लेकिन हिन्दू धर्म पर ई आरोप लगबैत अछि आर कहैत अछि जे “भारत मे वैज्ञानिक प्रगतिक कमीक कारण हिन्दू धर्म थिक जे एहि दुनियाक चीज सब केँ नजरअंदाज कयकेँ आन-सांसारिकता (दुनिया सँ परे चीज सब) केँ बढ़ावा दैत अछि ।” वास्तव मे, सबटा विज्ञान हमरा लोकनिक प्राचीन विद्वान सब केँ ज्ञात छलन्हि ।
सूर्य ‘स्थिर’ रूप मे रहैछ । केवल पृथ्वी एकर चारू दिश घुमैछ । एना सिर्फ प्रतीत होइत अछि सूर्य प्रतिदिन पूरब मे उदय होइछ आ थोड़ेक उत्तर दिश बढ़िकय पश्चिम मे अस्त भ’ जाइत अछि । लेकिन वास्तव मे एना नहि छैक, ई एकटा एहेन बात अछि जेकर उल्लेख ऋग्वेदक ऐतरेय ब्राह्मण मे भेटैछ । एहि मे स्पष्ट रूप सँ कहल गेल अछि जे सूर्य नहि त उदय होइत अछि आ नहिये अस्त होइत अछि ।
ई स्पष्ट रूप सँ हमरा सब केँ देखबाक लेल अछि जे हवा कहियो कोनो स्थान पर स्थिर नहि रहैछ बल्कि चलैत रहैछ । ज्वाला स्थिर नहि रहैछ बल्कि लहलहाइत (चलायमान) रहैत अछि । आर पानि स्थिर नहि होइछ बल्कि आगू बढ़ैत रहैत अछि । जखन हम सब आकाश दिश देखैत छी, त हमरा सब केँ एना लगैत अछि मानू सूर्य आ चन्द्रमा चलि रहल हो (गति कय रहल हो) । आकाशे समस्त ध्वनियक कारणो छी । चूँकि वाइब्रेशन (कम्पन) टा आवाजक शुरुआत थिक, तेँ ई साफ अछि जे आवाज सेहो गतिशील (मूवमेंट करैत) अछि । लेकिन सतही तौर (उपराउपरी देखला) पर धरती एक जगह स्थिर आ बिना हिलल-डुलल (गतिहीन अवस्था मे) देखाय दैत अछि ।
पृथ्वीक गुरुत्वाकर्षण खिंचाव व घूर्णन (अपन धूरी पर चारू दिश घुमय) केँ एक तरफ रखैत, आउ पृथ्वीक स्वरूप पर एक नजरि डाली । पश्चिमी लोक कि कहैत अछि ? पहिने ओ सोचैत छल जे पृथ्वी एकटा ‘पैन केक’ जेकाँ चापट अछि । ओ सब फेर एहि खोजक श्रेय सेहो अपनहि लेलक जे एना नहि छैक बल्कि आकार मे गोलाकार अछि । ठीक छैक । हम सब जियोगरफी केर विज्ञान केँ कि कहैत छी ? “भूगोल शास्त्र” । एकरा ‘भू-शास्त्र’ कहनाय पर्याप्त अछि मुदा ई घोषित करबाक लेल जे ई गोलाकार अछि जे कि हमरा सब केँ प्राचीन कालहि सँ ज्ञात अछि, हम सब एकरा भूगोल शास्त्र कहैत छी । “गोला” केर अर्थ अछि स्फेयर । “भू” केर अर्थ अछि पृथ्वी ।
यूनिवर्स सबटा आकाशगंगा सहित समस्त दुनिया सभक सम्पूर्ण योग (समग्रता) थिक जेकरा “ब्रह्मांड” कहल जाइत छैक । एकर अर्थ भेल ब्रह्मा द्वारा निर्मित “अंडा” । “अंडा” केर अर्थ अछि एग (egg) । अंडा आकार मे गोलाकार नहि बल्कि अण्डाकार (ईलिप्टिकल) होइत छैक । आधुनिक विज्ञान सेहो यैह साबित कयलक अछि – ब्रह्मांड गोलाकार नहि बल्कि अंडाकार अछि ।
आधुनिक खगोल विज्ञान कहैत अछि जे पूरा ब्रह्मांड गति केर स्थिति मे अछि । लेकिन प्रारम्भिक वैदिक काल सँ पृथ्वी केँ देल गेल नामे एकरा प्रति हमरा लोकनिक जागरूकता केँ देखबैत अछि । “जगत” ब्रह्मांड केर नाम थिक आर एकर अर्थ अछि जे घुमैत रहैत अछि, स्थिर नहि रहैत अछि ।
प्राचीन भारत मे सेहो किछु लोक रहथि जे पृथ्वीक सूर्यक चारू दिश घुमबाक सिद्धान्तक विरोध करैत छलथि । हम अहाँ सब केँ एहि मे सँ एकटा वर्गक विचार बतबैत छी । पृथ्वीक परिधि लगभग २५,००० मील छैक । यदि पृथ्वी केँ एक बेर पूरा घूमय मे २४ घंटा लगैत छैक, त एकर मतलब भेल जे ई १००० मील प्रति घंटाक गति सँ घुमैत अछि । तेँ, एक मिनट मे ई १६ या १७ मील केर यात्रा करैत अछि । एकर अर्थ ई होइछ जे चूंकि पृथ्वी हमेशा घूर्णन मे रहैत अछि, यदि मद्रास एखन एतय (एकटा निश्चित बिन्दु पर) रहैत अछि, त ऐगला मिनट ओकरा जगह पर भूमि या समुद्र देखाय देबाक चाही जे १७ मील दूर छल ।
मानि लियह जे एहि समय मद्रास मे बैसल एकटा कौआ सीधा हवा मे उपर जाइत अछि आ एक मिनट बाद नीचाँ अबैत अछि । ओ वैह गाछ या घर पर बैसैत अछि जाहि पर सँ ओ उड़ल छल । यदि ई सच होइतैक जे पृथ्वी तेजी सँ घूमि रहल अछि, त ई केना सम्भव होइतैक जे ओ (कौआ) वापस वैह स्थान पर आबि जाय ? चूंकि पृथ्वी घुमैत अछि, तेँ १ मिनट मे जाहि स्थान पर मद्रास छल से १७ मील बाहर खिसकि जेबाक चाहैत छल आ इकटा आन स्थान जे १७ मील दूर रहय, ओतय मद्रास देखाय देबाक चाहैत छल । पृथ्वीक घुमबाक सिद्धान्त केर विरोधी सब एहि तरहक तर्क दैत छथि । हम ओहि उत्तर पर गौर नहि कयलहुँ अछि जे सिद्धान्तक समर्थक लोक सब दैत छथि । लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक सब सँ पुछला पर हमरा बतायल गेल जे पृथ्वीक चारू दिश लगभग २०० मील केर दूरी धरिक हवा सँ बनल एकटा वायुमंडलीय क्षेत्र अछि । एकरा बाद किछु आर क्षेत्र म्यान (खोलसा) जेकाँ अछि । ई सब पृथ्वीक संगहि घुमैत अछि । भ’ सकैत छैक जे हम हुनका सभक बात केँ ईमानदारी सँ नहि बुझि सकल होइ लेकिन एहि मे कोनो सन्देह नहि भ’ सकैछ जे नहि केवल पृथ्वी बल्कि ओकर चारू दिशका वायुमंडल सेहो घुमि रहल अछि ।
पश्चिमी लोक सब आब ई पता लगा लेलनि अछि जे अरबी अंक – १, २, ३, ४ आदिक जन्मस्थान भारत थिक । आब विशेषज्ञ सब ई मानि लेलनिो अछि जे अंक ‘०’ पूरापूरी भारतीय मूल केर अछि । ओ सब कहैत छथि जे यैह बोधक कारण भारत मे गणित विज्ञान अपन पूर्ण कद प्राप्त कएने छल । एकर अलावे प्राचीन वैज्ञानिक लोकनि ‘सिफर’ (शून्य) केर खोज टा पर नहि रुकलाह । कोनो संख्या केँ सिफर सँ भाग देलापर अनन्त प्राप्त होयत, ई सूक्ष्म गणितीय सिद्धांत अछि जेकरा भास्कराचार्य द्वारा प्रतिपादित कयल गेल छल । ओ एहि सत्य केँ “दिव्य-अनन्त” (दैविक-अनन्त) केर सिद्धांत संग जोड़लनि आर एकरा अपन गणित ग्रन्थ केर आरम्भिक श्लोक बनौलनि ।
भाजक जतेक छोटा होयत भागफल ओतबहि पैघ होयत । यदि १६ केँ ८ सँ भाग देल जाय त भाजक ८ होयत आर भागफल २ होयत । यदि भाजक ४ हो, त भागफल ४ होयत । यदि भाजक २ हो, त भागफल ८ होयत । लेकिन यदि भाजक ‘०’ हो तँ ? तँ भागफल गणना सँ परे भ’ जाइछ, अर्थात अनन्त । चाहे कोनो संख्या हो, जेकरा विभाजित कयल जा रहल अचि आ भाजक ‘०’ अछि, तँ भागफल ‘अनन्त’ अछि । भास्कराचार्य एकरा ‘कमहरम’ नाम देलनि अछि । कम केर मतलब अछि अंक, हरम केर मतलब अछि बँटनाय ।
अंधविश्वास नहि, बल्कि सच जे साबित भ’ सकैछ
“हिंदू शास्त्र फालतू बात सब सँ भरल अछि । मेरु पर्वत केर चोटी पृथ्वीक उत्तर मे मानल जाइछ । ओतय रहयवला देवता सभक लेल हमरा लोकनिक एक वर्ष मात्र एक दिन मानल जाइछ । ओ मेरु सूर्यक चक्कर लगबैछ । पृथ्वीक चारू दिश मात्र नुनगर (खारा) समुद्रे टा नहि अछि, बल्कि सात टा आरो समुद्र अछि जेकर पानि कुशियारक रस, दूध आदिक समान अछि । पृथ्वी जाहि मे पाँच गोट महाद्वीप अछि, तेकरा सात द्वीप सँ बनल कहल जाइछ । ई सब बकवास थिक ।” यैह पश्चिम केर प्रतिक्रिया (रिएक्शन) अछि । चलू आब किछु सवाल पुछैत छी: अपन समुद्र एतेक नुनगर कियैक होयबाक चाही ? एहि मे एतेक नून के मिलेलक ? अग अहाँ ई मानि सकैत छी जे समुद्र नुनगर अछि त कि अहाँ मीठ आ दुधिया पानि वला समुद्रक कल्पना नहि सकैत छी ?
ठीक छैक । अगर अहाँ केँ लगैत अछि जे सात टा द्वीप आर सात टा समुद्र सही नहि छैक, त वैह शास्त्र पृथ्वीक स्थिति केर बारे मे कि कहैत अछि ? एहि मे कहल गेल अछि जे धरतीक उत्तरी सिरा पर मेरु पर्वत आ दक्षिणी सिरा पर ध्रुव तारा अवस्थित अछि ।
उत्तरी सिरा केँ उत्तरी ध्रुव (नौर्थ पोल) मानल जा सकैत अछि । अगर हम दक्षिणी ध्रुव केँ देखी, त ई बिल्कुल उल्टा दिशा मे नहि अछि । “ध्रुव” नाम “ध्रुव तारा” केर नाम सँ राखल गेल अछि । लेकिन आब ई सीधा ओहि केर संग एक्कहि रेखा (लाइन) मे नहि अछि । शुरुआत मे एना छल । लेकिन पैघ कॉस्मिक बदलाव (ब्रह्माण्डीय परिवर्तन) सभक कारण सँ, आजुक शोधकर्ता लोकनिक कहब छन्हि जे धरती एकटा सीधा चोटी जेकाँ घुमि रहल छल जे सीधा ध्रुव ताराक तरफ छल । ताहि समय, सात समुद्र छल जेकर जिकिर शास्त्र सब मे कयल गेल अछि – सात द्वीप आ सात समुद्र । घुमैत समय, चोटी सीधा सँ थोड़ेक झुकि गेल । हमरा लगैत अछि, सात समुद्र आपस मे मिलि गेल होयत जाहि सँ पानिक स्वाद नमकीन भ गेलैक । भ’ सकैत अछि ताहि समय, सात द्वीप पाँच महाद्वीप बनि गेल हो ।
अगर उत्तरी ध्रुव केर ऊपर कोनो जगह छैक, त ओ जगह मेरु थिकैक आ ओ स्वर्ग छी । अगर धरतीक तुलना नेबो सँ कयल जा सकैछ, त ओकर टौप पॉइंट (चोटी) मेरु थिक । ओहि पॉइंट तक या ओहि पॉइंट सँ, सब दिशा मात्र दक्षिण दिश इशारा करैत अछि । ओहि चोटी या चोटीक अन्तिम बिन्दु (पॉइंट) सँ हम सब पूरब, पश्चिम या उत्तर नहि जा सकैत छी । दक्षिण केर दिशा मे नीचाँ उतरबाक अलावे आर कोनो दोसर रास्ता नहि अछि । अगर हम नेबोक उपर एकटा पॉइंट राखी तँ ई साफ भ’ जायत । धरती पर सब चीज मे सबसँ उत्तरी पॉइंट मेरु थिक । “सर्वेषां अपि वर्षानां मेरु उत्तरस्थिता” केर यैह मतलब भेल ।
पोल (ध्रुव) पर क्लाइमेट (मौसमी वातावरण) केर स्थिति कि अछि ? लगातार छह महीना दिन होइत अछि आर ऐगला छह महीना राति होइत अछि । ई आब प्राइमरी क्लास मे सेहो पढ़ायल जा रहल छैक । जेना एक दिन आ एक राति मिलाकय पूरा दिन बनैत छैक, तहिना ध्रुवीय क्षेत्र (पोलर रीजन) मे छह महीनाक राति आर छह महीनाक दिन (कुल मिलाकर एक साल) केर एक दिन मानल जाइत छैक । एहि तरहें देवताक एक दिन हमरा सभक हिसाब सँ एक साल बनि जाइछ । जखन पृथ्वी घुमैत अछि, त भले ही ओकर किनारा (सर्कमफेरेंसक साथवला हिस्सा) बनबयवला सब हिस्सा घुमि जाय, साउथ पोल पर सबसँ उपरवला पॉइंट आर सबसँ नीचाँ वाला पॉइंट घुमैत रहैत नहि कहल जा सकैछ । एक पॉइंट एक बहुत छोट एरिया होइछ, अन्यथा ओकरा पॉइंट नहि कहल जा सकैत छलैक ।
कोनो खास दिन, सूरज आर चाँदक मुकाबले, घुमैत समय, ओकर पोजीशन केर आधार पर, पृथ्वीक किछु भाग मे १८ घंटा सूरज केर रोशनी पड़ैत छैक, आर ठीक ओकर उलट भाग मे मात्र ६ घंटा धूप रहैत छैक, जाहिठाम १८ घंटा अन्हार राति होइत छैक । दुनियाक कतेको हिस्सा (भाग सब) मे दिन आ रातिक समय मे बहुत पैघ फर्क होइत छैक । सूरज किछुए दिन मे टा ठीक पूरब मे उगैत अछि, किछुए दिन मे टा बिना कोनो बदलाव केर ठीक माथक उपर सँ गुजरैत अछि । दोसर दिन सब मे सूरज केर उगनाय उत्तर-पूर्व सँ दक्षिण-पूर्व दिश कतेको डिग्री धरि अलग-अलग भेल करैछ । नॉर्थ पोल मे एना नहि होइछ । ओतय, छह महीना लगातार दिन सँ छह महीना लगातार राति आर फेर छह महीना लगातार दिन केर शुरुआत धरि, जँ ई सफ़र केँ देखल जाय, त एना लागत जे ओहि जगह केर सूरज केर चक्कर लगेबाक बदला, सुरज ओहि जगह केर चक्कर लगबैत अछि । एहि बातक जिकिर ओहि बात मे कयल गेल छैक जे सूरज मेरु पर्वत केर चक्कर लगबैत अछि । नॉर्थ पोल मे छह महीना दिनक समय केँ उत्तरायण कहल जाइत छैक आर जखन ओतय अन्हार भ’ जाइत अछि त साउथ पोल पर दिन होइत अछि, ओकरा दक्षिणायन कहल जाइत अछि ।
उत्तरी ध्रुव केँ सुमेरु आर दक्षिणी ध्रुव केँ मेरु कहल जाइछ । सुमेरु सँ त सुमेरिया नामक देश केर नाम पड़ल अछि । कहल जाइछ जे ओतय वैदिक देवता सभक पूजा प्रचलित छल । जेना उत्तर मे देवता छथि, तेनाही दक्षिण मे पितृ लोकनि छथि आ नरक सेहो पड़ैछ । देवता, पितर या नरक मे रहयवला केँ देखबाक लेल दिव्य दृष्टिक आवश्यकता पड़ैत छैक । केवल एहि लेल हमरा सभक पास एहेन दिव्य दृष्टि नहि अछि, हम सब एहेन क्षेत्र सभक अस्तित्व केँ तर्क सँ नकारि नहि सकैत छी । रूस मे जन्मल, अमेरिका मे पलल-बढ़ल आर भारत मे बसल ब्लावट्स्की आर आनो लोक, जे सब थियोसोफिकल सोसाइटी केर स्थापना कयलनि, मुख्यतः आत्मा, महामानव या देवता लोकनिक दुनिया सँ सम्बन्धित अछि । आधुनिक काल केर सबसँ प्रसिद्ध वैज्ञानिक लोकनि मे सँ एक, सर ओलिवर लॉज आत्मा आ दिवंगत आत्मा सभक विशेष अध्ययन कयने रहथि । हुनकर निष्कर्ष अछि जे निश्चित रूप सँ आत्मा सभक अस्तित्व अछि तथा मनुष्य ओकर आह्वान कयकेँ बहुते लाभ प्राप्त कय सकैत अछि । यैह चलते, एहि मे कोनो आश्चर्यक बात नहि अछि जे ज्योतिष शास्त्र एक दिश खगोल विज्ञान आ एहने विज्ञान सब सँ सम्बन्धित अछि तथा फेर अध्यात्म दिश अग्रसर होइत अछि । मानू ई देखेबाक लेल जे एहि विषय सब मे कोनो विरोधाभास नहि अछि, एकटा आधुनिक वैज्ञानिक सेहो एहि तरहें अपन काज सब कयलनि अछि ।
हमरा सभक शास्त्र सुदूर अतीत मे अस्तित्व मे आयल जखन मनुष्य आ देवता सभक बीच सामाजिक सम्पर्क छल, जेना आइ हमरा सभग बीच मे अछि । ई कोनो अनुष्ठानिक समारोह केर वास्ते ‘संकल्प’ या प्रारम्भिक प्रार्थना पर बारीकी सँ विचार कयला पर स्पष्ट भ’ जायत । ई संकल्प समय केर सन्दर्भ मे वर्तमान केँ निर्धारित करैत अछि, जे अनगिनत युग-चक्र सब सँ पहिने, युगों-युगों तक जाइछ, तथा करोड़ों युगों केर बाद कतेको शून्य जोड़लाक बाद गणना योग्य समय तक जाइत अछि – संक्षेप मे, जहिया सँ दुनियाक निर्माण भेलैक तहिया तक जाइछ । युग केर आरम्भ मे, खगोल विज्ञान केर माध्यम सँ गणना योग्य ग्रह सभक स्थिति सँ पता चलैत अछि जे ओ सब ताहि समय एकटा सीधा रेखा मे स्थित छल ।
आइ किछु गणना सब अलग-अलग उत्तर दैत अछि । यदि भौतिक अवलोकन आर शास्त्र सब मे अन्तर अछि, तेँ हमरा लोकनि केँ ई निष्कर्ष निकालय मे जल्दबाजी नहि करबाक चाही जे शास्त्र झूठक पुलिन्दा थिक । शास्त्र ताहि समय प्रचलित छल जहिया ग्रह सब एकटा सीधा रेखा मे स्थित छल, ओहि समय जखन पृथ्वी केर उत्तरी ध्रुव ध्रुवताराक ठीक सामने रहय । तहिया सँ, कतेको युगों मे पृथ्वी मे प्रलयकारी परिवर्तन भेल अछि । पृथ्वी पर्वत बनि गेल, पर्वत समुद्र बनि गेल, समुद्र रेगिस्तान बनि गेल, इत्यादि । ई विवरण भूवैज्ञानिक सब सँ उपलब्ध अछि । एकर अतिरिक्त, खगोलशास्त्री लोकनिक कहब अछि जे ग्रह सभक गतिक कारण आकाशगंगा मे सेहो एहि प्रकारक परिवर्तन भेल अछि । निस्सन्देह यैह कारण अछि जे हमरा लोकनि शास्त्र मे कहल गेल बात सब मे परिवर्तन पबैत छी ।
खगोलीय गणना (ज्योतिष) केर माध्यम सँ सृष्टिक उत्पत्ति केर समय लगभग ओहेन समय बतायल गेल अछि जे आधुनिक शोध द्वारा ज्ञात अछि ।
कलियुग ४,३२,००० वर्ष केर अछि । द्वापरयुग एकर दुगुना अर्थात ८,६४,००० वर्ष केर होइछ, त्रेतायुग एकर तिगुना अर्थात १२,९६,००० वर्ष केर होइछ आ कृतयुग एकर चारि गुना अर्थात १७,२८,००० वर्ष केर होइत अछि । एहि चारू केँ मिलाकय एक महायुग कहल जाइत अछि, जेकर समय ४३,२०,००० वर्ष होइत अछि । एहेन एक हज़ार महायुग चौदह मनु लोकनिक शासनकाल केर बराबर होइत अछि । एकटा मनुक शासनकाल केर अवधि केँ “मन्वन्तर” कहल जाइत छैक ।
यद्यपि पृथ्वी पर शासन करबाक लेल हमरा सब लग अनेक राजा आ लोकतांत्रिक सरकार भ’ सकैत अछि, तैयो ईश्वर सब सरकारक एकमात्र प्रभारी ‘मनु’ केँ नियुक्त कयलनि अछि । एहि तरहें चौदह टा मनु छथि, जे सृष्टिक आरम्भ सँ लयकय अन्त धरिक पद धारण करता । चूँकि हम मनुक समय सँ उत्पन्न भेल छी, तेँ हमरा सब केँ मनुष्य (मनुज) आदि कहल जाइछ । ‘Man’ (अंग्रेजीक मैन) शब्द सेहो मनु शब्दहि सँ बनल अछि । संकल्प कहैत अछि जे हम सब विवस्वानक पुत्र वैवस्वत मनु नामक सातम मनुक शासनकाल केर अमुक वर्ष मे छी । ताहि समय सँ जखन प्रथम मनु, स्वायंभुव मनु, शासन कयने रहथि, शास्त्रीय गणना लगभग वैह समय केर अछि जखन पृथ्वी पर होमोसेपियन्स सभक उदय भेल छल ।
‘मन’ धातु केर अर्थ होइछ सोचनाय, जे मन केर एकटा कार्य थिक । एहि बात केँ ध्यान मे राखैत मनु केर नामकरण कयल गेल छन्हि । ओ ताहि समयक सत्व पुरुष सब मे प्रथम छलाह । “मनुष्य एकटा चिन्तनशील प्राणी अछि” एकटा उपयुक्त अभिव्यक्ति थिक । मनुष्य केँ पशु सब सँ उपर राखयवला चिन्तन शक्ति, जेकर उत्पत्ति ‘मनु’ सँ भेलैक, ‘मनुष्य’ (Man) नाम केँ उपयुक्त नाम देलक अछि ।
जेना कि पहिनहिं उल्लेख कयल गेल अछि, चौदह टा मनु सब द्वारा पूरा कयल गेल समय ब्रह्माक लेल एकटा दिन (जाहि मे राति शामिल नहि अछि) केर बराबर होइत अछि । एतबहि अवधि हुनकर रात्रिक बराबर होइत अछि । दोसर शब्द मे, ८६४ करोड़ वर्ष ब्रह्माक एकटा पूरा दिन होइत अछि । एहेन ३८५ दिन ब्रह्माक एक वर्ष होइत अछि । एहि आधार पर हुनकर जीवनकाल १०० वर्षक होइछ । एहि ब्रह्माण्ड केर अवधि सेहो यैह छी । जखन ब्रह्माक अस्तित्व समाप्त भ’ जाइत छन्हि, त कतहु आ कोनो अन्य सृष्टि (अस्तित्व) नहि रहैछ । एकरा ‘महाप्रलय’ कहैत छैक । एकर बाद, ब्रह्माक जीवनकाल धरि, कोनो सृष्टि नहि होयत आ केवल “ब्रह्म”, अकल्पनीय, अनन्त, टा विद्यमान रहताह । फेर एकटा नव ब्रह्माक सहायता सँ एकटा आर सृष्टि प्रारम्भ होइत अछि । धार्मिक अनुष्ठान सभक लेल ‘संकल्प’ मे हमरा सब द्वारा वर्णित अनुसार, ब्रह्माक जीवन आब उत्तरार्ध मे छन्हि ।
भू, भुवः, सुवः, महः, जनः, तपः आ सत्यः नामक सात टा लोक अछि । मनुष्य तथा देवता लोकनि सहित समस्त सृष्टि एहि मे सँ कोनो न कोनो लोक मे निवास करैत अछि । एहि मे सँ भू, भुवः आ सुवः लोक एक्के समूह केर होइछ । अनुष्ठान सब मे एकरा प्रायः भूर-भुवस्-सुवः कहल जाइत छैक । अन्य चारि टा एहि सँ उच्चतर अछि । जखन ब्रह्मा रात्रि मे शयन करैत छथि, त ई तीन टा लोक (केर अस्तित्व) समाप्त भ’ जाइछ । एकरा अवान्तर प्रलय कहल जाइत छैक । जखन हुनकर जीवन अवधि समाप्त होइछ, त अन्य चारि टा लोक सहित सबटा लोक सेहो समाप्त भ’ जाइत अछि ।
आधुनिक वैज्ञानिक सब पेलनि अछि जे समयक संग, अदृश्य रूप सँ, सूर्यक ऊष्मा कम होइत जा रहल अछि । सूर्यक ऊष्माक बिना जीवन कायम नहि रहि सकत । खाद्य पदार्थ सँ लय केँ, पृथ्वी पर जीवन निर्वाह वास्ते आवश्यक सब वस्तु, जेना वर्षा, सब किछु सूर्यहि केर ऊष्मा पर निर्भर अछि । अतः, ई गणना कयल गेल अछि जे बहुत लम्बा समयक बाद, करोड़ों वर्षक बाद, संसारक अस्तित्व समाप्त भ’ जायत । हमरा लोकनिक प्राचीन मान्यता सब तथा आधुनिक वैज्ञानिक लोकनि द्वारा संसार केर अन्तक गणना केर अनुसार, ऐगला अवान्तर प्रलय काल केर सन्दर्भ मे कमोबेश एक्के संयोग उद्धृत अछि ।
एहि गणना सभक मुताबिक, जखन हम सब एहि ब्रह्माण्डक रचनाक समय पर विचार करैत छी, तँ हम सब कमोबेश ओही समय पर पहुँचैत छी जेकरा वैज्ञानिक सृष्टि केर समय मानैत छथि ।
चूँकि ब्रह्माक एक दिन केर समय मे चौदह टा मनु अपन शासन पूरा करैत छथि, तेँ एकटा मन्वन्तर मे ७१ टा चतुर्युग होइत छैक । हमरा सभक वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर मे, हम सब एखन २८मा चतुर्युग आर तेकर कलियुग मे छी । हमरा लोकनिक संकल्प एहि सभक वर्णन करैत अछि । ई ओकर दिन आ मिनट धरि चलैत अछि । ई सब समय केर गणनाक सन्दर्भ मे अछि ।
संकल्प मे ओहि भूमिक सेहो वर्णन अछि जाहिठाम हम सब रहैत छी । ई सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड (जेकरा ब्रह्माण्ड कहल जाइत छैक) केर वर्णन करैत अछि आ ओहि गाम (ठाम) तक पहुँचैत अछि जेतय व्यक्ति रहि रहल अछि । जाहि तरहें हम सब अपन पत्र मे स्थान आ दिनाकं (तिथि) केर उल्लेख करैत छी, तहिना हम सब अपन संकल्प मे सेहो एकर उल्लेख करैत छी । ई सारा जटिल गणना सब ज्योतिष शास्त्र मे अछि ।
अनुभवजन्य प्रमाण
सूर्यक किरण कोनो झोपड़ीक छत केर एकटा छोट सन छेद सँ गुजरिकय फर्श पर देखाय दैत अछि । हमरा सब केँ नहि पता जे ऐगला वर्ष ओ किरण कतय पड़त (देखायत) । लेकिन ज्योतिष शास्त्र केर अनुसार कयल गेल गणना सब ओहि दिनक स्थान (किरण पड़यवला स्थान) तक निश्चित कय दैत अछि । प्राचीन काल मे, राजा ओहि लोक सब केँ पुरस्कृत करैत छलथि जे एकटा ताग (धागा) मे मोती लटकाकय जमीन पर ओ चिन्ह लगबैत रहथि जे सूर्यक किरण कोन समय निर्दिष्ट स्थान पर पड़त । आन विद्या सब मे, लोक (व्यक्ति) केँ मौखिक तर्क सब द्वारा अपन पुरस्कार अर्जित करय पड़ैत छलैक, लेकिन ज्योतिष शास्त्र मे लोक (व्यक्ति) केँ अपन कौशल केर भौतिक प्रदर्शन करय पड़ैत छलैक । तेँ, धोखाधड़ीक कोनो प्रश्ने नहि छलैक । सूर्य आर चन्द्रमा हुनकर ज्ञान केर साक्षी रहथि ।
हरिः हरः!!
The Vedangas ‘Jyotisha’ – Eyes of the Vedas
So far, I have dealt with four Vedangas, viz., Siksha, Vyaakarana, Chandas and Nirukta. The fifth is Jyotisha.
Jyotisha serves as the eye – the organ of sight of the Veda Purusha. The science or saastra has three parts or skandhas. Hence, it is called – “Skandha Trayaatmakam”. These are Siddhanta Skandam, Hora Skandham and Samhita Skandham. The word Skandha means the main branch from the trunk of a tree.
Garga, Naarada, Paraasara and many other sages have written many treatises on Jyotisha. There is a book which cites the case of the Sun God, taking up one section of this science and teaching the same to the divine architect and builder, Maya. It is called “Soorya Siddhanta’. Thus, there are many books authored by Devas as well as sages. There are books written by men. Varaahamihira is well known as having written many books on the subject. Aarya Bhatta, Bhaaskaracharya and others have also made valuable contributions. In the very recent past, one Vedic scholar by name Sundreswara Srouti has written a book called “Jyotisha Kaustubham”.
One without eyes is a blind man. While objects, which are near at hand, can be identified by touch, those at a distance can only be seen by the eyes. Just as the human eyes are useful in identifying objects far and near the Jyotisha Saastra is useful in seeing the disposition of planets and stars in time, i.e., many year ago or hereafter in the future. The planetary position at present may be determined visually without resort to Jyotisha (astronomy). But planetary disposition existing say 50 years hence can only be known with the help of Jyotisha. Since mere touch cannot identify colour, eyes are necessary to distinguish these. Likewise, even if a planet is sighted today, we would not know its effects based on its location and how it affects us. Jyotisha alone can throw light on the subject. That is why it is called the eye of the Veda Purusha.
There are injunctions as to the time of performing Vedic rituals with reference to planetary positions. The dates of marriage and other ceremonies are fixed when the planetary positions are considered favourable. Jyotisha is also known by the name of ‘Nayana’ meaning the eye. ‘Naya’ means to lead. A blind person has to be led by someone . For us who are fortunate in having the eyes which can see the eye performs the role of the ‘leader’. Having determined the auspicious time for doing Vedic karmas, Jyotisha plays the role of the eye in leading us to their actual performance.
Astronomy and Astrology
Modern sciences stops at astronomy which merely indicates the planetory positions at various points of time. How does the planetory affect the world in general? How does it affect us? What is to be done to make their influence favorable to us? The science of astrology in conjunction with and based on astronomy deals with these questions.
Jyotisha Saastra was originally designed to indicate the major of success or lack of it when Vedic karma are performed under the influence of the particular planet, a star or lunar day in the dark or bright fortnight. In other words, Jyotisha was mainly intended to help in arriving at the most favorable time for performing Vedic karmas and was, therefore, made part of the Vedas – as one of the Vedangas. Since this involves calculations regarding the transit of planets in various science of the zodiac, mathematics became an integral part of it.
The place where a Vedic sacrifice is performed called the ‘Yajna Vedi’ and the location of the site, all this have detailed specifications.
A sacrifice performed on the basis of the injunction in regard to the proper structure and constructions of the Yajna Vedi yields favourable results. So, it became necessary to accurately calculate these requirements to conform to specifications. On this account, mathematics or Ganita has been developed as an auxiliary organ – Upanga – of the Vedas.
Ancient Mathematical Treatises
I mentioned earlier about the three parts or Skandhas viz. Siddhanta Skandha, Hora Skandha and Samhita Skandha. The Siddhanta Skandha covers subjects like arithmetic, trigonometry, geometry and algebra. What has taken the Western world centuries to develop in higher mathematics is already found in our ancient Jyotisha.
Arithmetic is pure computation with numbers. Plain numbers are given and their resultant effect is obtained. Simple addition, subtraction, multiplication and division are the functions of the arithmetic. ‘Avyakta-Ganita’ deals with ‘unknown’ numbers, i.e., instead of numerals like 1, 2, 3 or 4, symbols like A, etc. are used. This is called Algebra. Avyakta literally means what is not known definitely. ‘Kshetra Ganita’ is geometry. ‘Gya’ or Geo is earth. ‘Miti’ means metre or measurement. Hence, the name geometry. The sacrificial site, the sacrificial Kunda (Yajna Bhoomi and Yajna Vedi), fixing their locations, shape and dimensions of these were dealt with in this geometry. There is an arithmetic called ‘Sameekarana’. This deals with finding the unkown through the knowns. Unknown groups of figures are seperately given and they are required to be reduced to equations. This is Sameekarana. It means making things equal. This is what is now called equation in English.
There is a Sameekarana or equation in Aapasthamba Sutra. It defied proof until very recently. Since it could not be solved by means of western mathematics, it was even said that it could not be proved. But, further research proved that the equation given in the Sutra was correct. This has naturally amazed the western scholars. The high degree of proficiency in mathematics which had baffled moder science for so long was already known to Indian scholars thousands of years ago. There are many more such Sutras which have yet to be proved and deciphered even. This equation will also have to be proved only with the aid of Sameekarana. Our Saastras mentioned many allied branches of mathematics, example Rekha Ganita, Guttaka, Anga Bhaaga, etc. Avyakta Ganita (algebra) is also called Beej Ganita.
Some 800 years ago there was a celebrated mathematician by the name of Bhaskaracharya. There was an incident in his life to illustrate the point that, however much we may use our intelligence, destiny will prevail. He had a daughter by the name of Leelavati. Bhaskaracharya, being a great astrologer and astronomer realised that the girl was destined to be a widow soon after her marriage. He thought that if he could marry his daughter at a time when the planetary position was so favourable as to ensure a long conjugal life, he could alter the fate of his daughter. He accordingly fixed a time and date when the planets were in such favourable conjunction. In those days, unlike now, there were no clocks to show the time. The waterpot was then used as Ghatika or the modern Ghatikaara (clock). The vessel was divided into two parts the upper and the lower. Water from the top portion would drip into the lower part through a small aperture. The lower part will have calibrations marked as on a medicine bottle. The level of water will be used to calculate time. Each mark thereon will indicate time equal to 1/60 of a day. This unit of time is called Ghatika (derived from the word Ghata or pot). A Ghatika is equal to 24 minutes. Since water is subject to evaporation depending on the weather conditions and as this may lead to inaccuracies in calculation, sand which is not subject to vapourisation came to be substituted for water later on and the instrument which came to be known as the hour-glass came to be in use. As was the custom in those days, the marriage of Leelavati was fixed when she was still a child. This child came near the aforesaid “water glass” and did some mischief. In the process, a small pearl from her nose ornament got loose and fell into the aperture between the two portions of the Ghatika, which let the water drip. As a result, the size of the drip became smaller. So, when the restricted water supply reached the mark which had been made to indicate the favourable planetary position, that time had long passed and the next ‘Lagna’ had come which was no auspicious. Since Leelavati was married at that Muhoorta or time, she lost her husband at a very tender age, and the prediction in her horoscope came true.
No one, including the child, had noted at that time the pearl dropping into the water glass. But when subsequently this was known, it was too late, the marriage had already taken place and it was accepted that destiny is difficult to change.
Later, Bhaskaracharya wanted to write a treatise on mathematics. He chose his daughter’s name as the title of that book. He made his daughter, who had became a child widow, qualify as a high-ranking mathematician and named his book after her. This book contains various aspects of mathematics such as arithmetic, Vyaktha Ganita, Beeja Ganita, etc. To assist in the determination of the planetary positions and heir movements, he also wrote a book called “Siddhaanta Siromanti”.
There is a book called “Praacheena Lekha Maala” which is a compilation of all the ancient edicts. It is seen from the book that a king of Gujarat called ‘Singana’ had made efforts to popularise the writings of Bhaskaracharya.
Though the intermediary Chapters 7, 8, 9 and 10 from the book on modern Geometry by Euclid are stated to be missing, all the twelve books in Sanskrit are still in tact. We seem to be blissfully ignorant of even elementary mathematics. For example, multiplication is nothing but addition over and over again. Similarly division is subtraction over and over.
Long before the time of Bhaskaracharya, over 1,500 years ago, there was a mathematician by the name of Varahamihira. He is the author of many treatises like ‘Brihad Samhita’ and ‘Brihad Jaataka’. Brihad Samhita is a ‘digest’ of all scientific disciplines. It is still a matter of great wonder that our ancient scholars were conversant with a long list of scientific subjects. The Brihad Jaataka deals with alll matters relating to Astrology. Aarya Bhatta is the author of a book entitled “Aaryabhatta Siddhaanta”. He also lived over 1500 years ago. The modern arithmetic now in vogue is based on the principles propounded by Aarya Bhatta. Both Varahamihira and Aarya Bhatta are held in high esteem by modern mathematicians. All these mathematical sciences only pertain to the location and movements of the stars and the nine planets. Actually there are only seven planets. Raahu and Kethu are shadows. Hence, they are called “Chhaayaa Graha”. They run exactly opposite to the transit of the Sun and the Moon. Hence they require no special calculations. Their particulars can be determined by reversing those of the Sun and the Moon.
What is the difference between a star and a planet? Those that orbit round our Sun are the planets. Those that belong to the solar galaxy are the stars. There is one visual means of identification. When diamond is kept moving around, there will scintillations. Likewise the stars will be twinkling as if in movement. The planets will emit light keeping still.
The Sun and the stars are self-luminous. The stars sparkle showing various colours, something like the blue and green lights emanating from well-cut diamonds. The planets Guru (Jupiter) and Sukra (Venus) would look like big stars but they have no scintillation. The stars have scintillation. The sun is also like this. If observed closely, the surrounding halo will disappear. Then it will look like a piece of flat mirror floating in water. It will have both scintillation and movement. The moon will not be so.
Let me illustrate how the sun has both light and movement. Take the rays of sunshine coming through a small hole. Whilst the sun’s rays will keep shaking, the moon’s rays will be still. The other planets are also like the moon. Although the stars may look small, they have both scintillation and movement.
If a star was big enough, in its sparkle, the seven colours, VIBGYOR, will appear, same as the emission of colour from a diamond. One of the names of the Sun is ‘Saptasvaan’ which means that his chariot has seven (sapta) horses (Asva).
It also can be taken to mean one horse with seven colours. The word ‘Asva’ also means ‘rays’. The reference is to the seven coloured rays which the Sun’s rays emit. A single ray emits all the seven colours. VIBGYOR also refers to this. Taittareeya Aaranyaka of the Vedas says that a single ray alone is known by seven names “Edo Asvah Vahati Saptanaama” that is to say, the single colour, white, splits on refraction into seven colours.
The stars rise in the east and set in the west. The planets also move westward but every day they shift a little to the east. The seven planets keep moving a little eastwards. The science of astrology deals with these movements.
Planets as They Affect Human Life
On earth, the fate of man changes in the same way as the movement of planets. Lean times, prosperous periods, misery, happiness, high positions, fall therefrom – such are the changing fortunes of man. Such changes are not confined only to man. Institutions and even countries have their run of good and bad times. The great sages found out that there was a definite connection between the planetary movements and the good and bad results which were noticed on earth. In fact, they have postulated the movement of a planet with its effect on us. When a job is undertaken, it is possible to predict the outcome, on the basis of the planetary position when it was begun. This science is called the Hora Saastra. Keeping the time of birth as the bases, the planetary position can be fixed in the horoscope and a forecast can be made of the good and bad periods throughout one’s whole life.
There are various reasons that are offered in explanation for good and bad times. It is like various causes being attributed to a disease. Doctors attribute the disease to the change in “psyche”. The necromancer attributes it to supernatural forces. The astrologer attributes it to the change in the planetary positions. Dharma Saastra would attribute the disease as due to the effect of karma (action) done in earlier births. Psychologists say that a change in feelings causes change in health. Thus many causes are attributed to the same effect. In actual fact, what is the cause? Planets, psyche, mind forces – or something else ? None of these is wrong. All have their part to play. They are the manifestations of the same. In order to help our understanding, various causes are mentioned and their combined effect results in the experience. Different people offer different explanations. If it rains, wetness results, flies swarm, frogs croak. These are consequential features after the rain. Likewise, there are many indications which point to the result of our actions in the earlier births. Each explanation is an attendant proof. They are all interconnected. The planetary disposition is determined by earlier karma. Disease appears and the mind is disturbed. Psychic forces also prevail. All these are the results of the single karma. This can be proved on the basis of each one of the causes attributed to the mishap. But the method of calculation used in planetary movements is the easiest.
Omens – “Sakuna” – “Nimitta”
I said earlier that there is a portion of the science of astrology “Samhita Skandha”. Where is underground water located? Where do rivers and streams exist underground? What are the signs seen on the ground where water is present under it? These are some of the subjects which this Skandha deals with. The method of making perfumes and cosmetics, the designing and building of houses, the science of Sakuna and Nimitta or omens and portents are also to be found in this Skandha.
Sakuna is different from Nimitta although both come under the general name of “omens”. Sakuna means literally a bird. Omens which are caused by birds are called Sakuna. On earth, there is no subject or matter which is unrelated to another. The event that occur are also so connected. If the proper calculations are used, these can be forecast and understood easily.
All phenomena on earth are subject to the rule of one supreme force. They follow a set pattern. Hence, using one observation, the remaining can be calculated. The lines on one’s palm, forecasting events on the basis of the planetary positions at the time a question is asked (Aaroodha), astrology are all inter-connected. All are true. One of these is Sakuna.
The Sakuna Saastra deals with such subjects as, (1) what is the effect of a bird going from our left to right ? (2) what is effect of the cry of one or the other bird ? etc.
This includes what are meant by Nimitta – portent. “Nimittanicha Pasyaami Vipareetani Kesava” says Arjuna to Lord Krishna before the battle begins. It is the same as our saying that evil omens are seen. He uses the right word, Nimitta, instead of Sakuna, as only those portents which are revealed by birds are called Sakuna. If a cat crossed the path, it is Nimitta. If a vulture flew across, it is Sakuna.
Later, the Lord also talks to Arjuna about Nimitta: “Nimitta Maatram Bhava Savyasaachin”, says He. “I have already decided that these will be annihilated in this war. Therefore, this can be already regarded as dead. Their slayer is none but Me. You merely act as the instrument.” Said the Lord and in that context He said “Nimitta Maatram Bhava”.
Therefore the portent does not by itself create or alter a situation. It reveals a result which is bound to come to surface. Likewise, the portents merely announce the mere reaction which actions of our earlier births throw up.
Stated briefly, in the three Skandhas or parts, what is stated in the nature of general principles is mathematics and planetary movements. Separate enunciation of good and bad periods of man is called Hora or Jaataka. It is from Hora that the word Horoscope has come.
Modern Discoveries in Ancient Texts
I said earlier that Varahamihira has written a book called Brihad Samhita. There are many scientific discoveries which are dealt with in this book.
How do the planets hang in space without support? How is it that they do not fall down? It is the popular belief that Newton discovered the cause of this phenomenon.
The very ancient theory on the solar system begins with a Sloka which says that the reason why the earth does not fall away in space is due to the force of gravity. The Upanishad Bhaashya by Adi Sankara also states that the earth has the power of attraction. If we throw a thing in the air, it falls to the earth. This is not a quality of the object. The reason why it falls is due to the attraction of the object by the earth. The power of attraction is the pull of gravity. Praana goes up, Apaana pulls it down. Therefore, the force that pulls it down is known as Apaana Sakti. Sankaracharya has stated that the earth has Apaana Sakti or the power of gravity. The Prasnopanishad (3.8) says: “Prithivyam Ya Devata Saisha Purushyapanmavashtabhyantra”.
That is the Devata controlling the earth which creates the Apaana Sakti in the human body. In his Bhaashya on this Upanishad, the Acharya says: “Tatha Prithivyam Abhimanini Ya Devata Prasiddha Saisha Purushasya Ayaanam Apaanvrittim Avashtabhya Aakrishya Vasikrityaadh Evapakarshanenanugrahamkuvarti Vartat Ityarthah”. Just like a body thrown up in the air, is pulled down by the earth, the Praana that pulls above is pulled down by Apaana. This makes it very clear that the Upanishad talks of the law of gravitation. Our Saastras contain many other such wonderful data, of which we do not care to know but consider that every scientific discovery has come from the West.
Our astrological texts which were written ages ago contain all the mathematical principles which are in use in the world today. At the beginning of the creation all the planets were in line. As time went by, they began changing little by little. When the next Kalpa begins, they will again be in line.
Not only the pull of gravity but also the rotation of the earth is mentioned by Aryabhatta and Varahmihira. The Western theory until the 11th century was: “The earth alone stands firm in the centre of the universe. The Sun rotates round the earth. That is how the day and night are caused on earth.” If anyone offered a theory slightly different to this, the religious heads caused the person to be burnt at the stake for heresy. But we had known the truths to be otherwise from early times.
Aryabhatta has given a beautiful name to illustrate that the earth rotates round the sun and not the sun round the earth. It is called the “Laaghava – Gaurava” Nyaaya. (The theory of lightness) If a thing is done easily and lightly it is called ‘Hasta Laaghava’, meaning dexterity or sleight of hand. The opposite of ‘Laghu’ is ‘Guru’. What is heavy or big is Guru. Guru means a big man. He is the preceptor or Acharya. If the Acharya is Guru, then the disciple is Laghu. The Acharya who is the Guru is respected by the disciple. Hence he goes round the Acharya in pradakshina. The Acharya does not go round the disciple. The biggest planet in our solar system is the Sun. Earth is Laghu. Laaghava-Gaurava Nyaaya says that the smaller object goes round the bigger object. Thus, Aryabhatta has allegorically referred to the movement of the earth round the sun.
Today, we have joined hands with those who earlier dubbed scientists as heretics and burnt them without allowing science to progress but level the following charge against Hinduism and say that “the reason for lack of scientific progress in India is the Hindu religion which embhasises other – worldliness ignoring the things of this world.” In actual fact, all the sciences were known to our ancient scholars.
The sun stage put. The earth alone rotates round it. It only seems that the sun daily rises in the east and moving slightly to the north sets in the west. But that in actual fact this is not so is a matter which finds mention in the Aitareya Braahmana of the Rig Veda. It is clearly stated therein that the sun neither rises nor sets.
It is clearly there for us to see that air does not stay put ever at any place but keeps moving. The flame does not keep steady but flickers. And water does not stagnate but moves on. When we look up at the sky, we observe as if the sun and moon are moving. The sky is also cause of all sound. Since vibration is the origin of sound, it is clear that sound is also movement. But superficially the earth appears to stay put and unmoving.
The gravitational pull and rotation of the earth apart, let us look at the appearance of the earth. What do the westerners say ? Earlier they thought that the earth was flat like a pancake. They claimed the credit themselves for the discovery that it is not so but is spherical in shape. Alright. What do we call the science of geography? “Bhoogola Saastra”? It is enough to call it Bhoo Saastra but in order to proclaim that it is spherical shape is well known to us since ancient times, we call it Bhoogola Saastra. “Gola” means sphere. “Bhoo” means earth.
Universe is the totality of all the worlds including all the galaxies which is called “Brahmaanda”. This means the “Anda” created by Brahma. “Anda” means an egg. The egg is not spherical in shape but elliptical. Modern science has proved the same – the universe is not spherical but oval.
Modern astronomy says that the whole universe is in a state of motion. But the very name given to the earth from early Vedic times indicates our awareness of it. “Jagat” is the name of the universe and it means that which keep moving and does not stand still.
There were some in ancient India also who opposed the theory of the earth moving round the sun. Let me tell you the views of one section of these. The circumference of the earth is approximately 25,000 miles. If the earth takes 24 hours to rotate once completely, it means that it rotates at the speed of 1000 miles per hour. Therefore, in a minute it travels 16 or 17 miles. This would imply that since the earth is always in rotation, if Madras were here (in a fixed point) now, the next minute in its place should appear land or sea which was 17 miles away.
Let us assume that a crow sitting in Madras this minute goes up straight in the air and comes down after 1 minute. It alights on the same tree or house which it flew. If it were true that the earth is rotating fast, how is it possible for it to alight back at the same place? Since the earth rotates, in 1 minute the spot at which Madras was should have shifted out 17 miles and another place which was 17 miles away should have appeared where Madras was. So argue the opponents to the theory of the earth’s rotation. I have not looked into the answer which the supporters of the theory offer. But on enquiry from modern scientists I am told that around the earth for a distance of about 200 miles is an atmospheric area comprising air. Thereafter some more regions are like sheaths. All of them rotate along with the earth. I may not have captured what they said faithfully but there can be no doubt that not only the earth but the atmosphere around it is also in rotation.
Westerners have now discovered that the birth place of what is called the Arabic numerals – 1, 2, 3, 4 etc. – is India. The concept that the numeral ‘o’ is totally of Indian origin is now accepted by the experts. Because of this realisation, they say, that the science of mathematics had attained its full stature in India. Further the ancient scientists did not stop at discovery of cypher. That any number divided by cypher will result in infinity is the subtle mathematical axiom which Bhashkaracharya propounded. He fused this truth with the theory of the “Divine-Infinite” and made this the opening Sloka of his treatise on Mathematics.
The smaller the divisor the bigger will be the quotient. If 16 is divided by 8 then the divisor is 8 and quotient is 2. If the divisor is 4, then the quotient is 4. If 2, then the quotient is 8. But if the divisor is ‘o’ ? Then the quotient becomes beyond reckoning, i.e. infinity. Whatever be the number, that is being divided if the divisor is ‘0’, then the quotient is ‘infinite’. Bhashkaracharya has named this as Kamharam. Kam means cypher, Haram means divide.
Not A Blind Faith, But Truths Which Are Provable
“The Hindu Saastras are full of nonsensical matter. The crest of mountain Meru is supposed to the North of the Earth. To the Devas living there, our year reckons only as a day. That Meru is being circled by the Sun. Not only is there the saline sea around the earth, but there are other seven seas whose waters are sugarcane juice, milk, etc. The earth which comprises five continents is said to be composed of seven islands. All this is poppycock.” This is the reaction of the West. Let us now pose some questions: Why should our sea be so saltish ? Who mixed so much salt in it ? If you can accept that there is saltish sea can you not imagine sea is with sweet and milky waters?
Alright. If you think the seven islands and seven seas are not correct, what does the same Saastra say about the position of the earth ? It says that at the northern end of the earth lies the Meru mountain and the (Dhruva) pole star at the southern end.
The Northern end can be assumed to be the North Pole. If we look at the South Pole, it is not exactly in the opposite direction. The “Pole” has been named after the “Pole Star”. But now it is not directly in the same line with it. It was so in the beginning. But due to big cosmic changes, the earth has tilted away, say modern researchers. The earth was spinning like a vertical top directly facing the Pole Star. At that time, there were seven seas which the Saastras mentioned – seven islands and seas. During the spin, the top became a little inclined from the vertical. I think, the seven seas may have got mixed together resulting in the salty taste of the waters. It is likely that, during that period, the seven islands became five continents.
If there is a place above the North Pole, that is the place where Meru is and that is Swarga – heaven. If the earth could be likened to a lemon than the point is Meru – pinnacle. To that point or from that point, all directions point to the south only. From the point of that crest or pinnacle we cannot go east, west or north. There is no alternative but to descend down to south. If we placed a point at the top of the lemon this will become evident. The northern most point of all things on earth is Meru. That is what is meant by “Sarveshaam Api Varshaanaam Meru Uttarasthita”.
What is the climatic position at the pole ? It is day for six months at a stretch and night for the next six months. This is now being taught even in the primary classes. Just as a single day and a single night together makes a full day, in the polar region the six months of night and six months of bright day (making a year in all) reckons as one day. This is how a single of the Devas becomes one year by our reckoning. When the earth rotates, even if all the parts constituting its sides (along the circumference) rotate the topmost point and the bottom most at the South Pole cannot be said to rotate. A point is a negligibly small area, otherwise it cannot be called a point.
Depending on its position, during rotation, in relation to the Sun and Moon, on a particular day, some regions on the earth received the Sun for 18 hours, and the region exactly opposite to it will only receive 6 hours of sunshine with 18 hours being the dark night. There are vast differences in the duration of the day and night in many parts of the world. The Sun rises in the exact east only on some days, comes exactly overhead without any deviation only on some days. On other days the sunrise varies from north-east to south-east by many degrees. In the North Pole, such is not the case. There, going from six months of continuous day to six months of continuous night and again back to the beginning of six months of continuous day, if this sojourn is observed, it would appear that instead of that place going round the Sun, the Sun goes round the place. This is what is referred to in the statement that the Sun goes round the Meru mountain. The six months of daytime in the North Pole is called Uttarayana and when it gets dark there at the South Pole gets the day, it is called Dakshinaayana.
The North Pole is called Sumeru and the South Pole Meru. The name of the country called Sumaria is derived from Sumeru. It is said that there the worship of the Vedic Devatas was in vogue. Just as in the north are the Devatas, in the South are the Pitrus or manes and Naraka (hell). One needs the gift of divine sight to be able to see the Devatas, the Pitrus or those in Hell. Merely because we do not have such a divine vision we cannot deny, with reason, the existence of such regions. Born in Russia, bred up in America and settled in India, Blavatsky and others who started the Theosophical Society, deal mainly with the world of spirits, of supermen or Devatas. One of the most renowned scientists of modern times, Sir Oliver Lodge, had made a special study of spirits and departed souls. His conclusion is that certainly spirits do exist and man can derive a lot of benefits through invocation to them. One need not wonder, therefore, that the Jyotisha Saastra deals with astronomy and such sciences on the one hand and then goes on to spiritualism. As though to point out that there is no conflict between these subjects, a modern scientist has gone about his business in the same way.
Our Saastras came into being in the distant past when men and Devatas (Gods) had social contacts as we now have with each other. This will be apparent from a close look at the ‘sankalpa’ or introductory prayer to a ritualistic ceremony. This sankalpa determines the present in terms of time, going back to aeons, before countless Yuga-cycles, to a time reckonable after adding so many zeros after 100 millions – in short, since the world was created. At the beginning of the Yuga, the disposition of the planets as calculable through astronomy showed that they were all in line then.
Some calculations lead to different answers today. If there is a difference between physical observation and what the Saastras say, we should not rush to the conclusion that the Saastras are a bundle of lies. The Saastras prevailed at a time when the planets were ranged in a straight line, the time when the North Pole of the earth was directly facing the Pole Star. Since then, there have been cataclysmic changes to the earth over many yugas. Earth had become mountain, mountain had become sea, sea had become a desert and so on. These details are available from the geologists. In addition, astronomers say that there have been similar changes in the galaxy due to the planetary movements. That is no doubt why we find changes from what the Saastras said.
The origin of creation timed through astronomical calculations (Jyotisha) is said to be near about the same time as what is arrived at by modern research.
The Kaliyuga has 4,32,000 years. The Dwaaparayuga has twice that, viz., 8,64,000 years, Tretaayuga has thrice, viz., 12,96,000 and Kritayuga has four times, viz., 17,28,000 years. All the four together called a Mahaayuga, has 43,20,000 years. One thousand such Mahaayugas make the period of the reign of the fourteen Manus. The duration of the reign of a Manu is called “Manvantaram”.
Although we may have many kings and democratic governments to govern on the earth God has kept ‘Manu’ in sole charge of all governments. Thus there are fourteen Manus, who will hold office fromt he beginning of creation to its end. Since we have sprung from the time of Manu, we are called Manushya (Manuja), etc. The word ‘Man’ has also been derived from the word Manu. The samkalpa says that we are in such a such year during the reign of the Seventh Manu, called Vaivaswata Manu – son of Vivaswaan. Working back to the time when the first of the Manus called Swayambhuva Manu ruled, the saastraic calculations approximate to the same time as homosapens appeared on earth.
The root ‘Man’ means to think, which is a function of the mind. Manu has been named to keeping this in view. He is the first of those sentient beings. “Man is a thinking animal” is an apt expression. The faculty of thinking which places man above animals and which originated with ‘Manu’ has led to the apt nomenclature, ‘Man’.
As mentioned earlier, the span of time covered by the fourteen Manus constitutes a day (which does not include night) for Brahma. A similar period constitutes his night. In other words, 8640 million years constitute one full day of Brahma. 385 such days constitute one year of Brahma. On this basis his life-span is 100 such years. The duration of this Universe is the same. When Brahma ceases to be, nothing else of creation exists anywhere else. This is called the ‘Maha Pralaya’. Thereafter, for the duration of a life-time of a Brahma, there will be no creation and “Brahman”, the inconceivable, the infinite, alone will subsist. Then another creation starts with the help of a new Brahma. According to our recitation in the ‘Samkalpa’ for religious ceremonies Brahma’s life is now in the latter half.
There are seven worlds called Bhoo, Bhuvah, Suvah, Mahah, Janah, Tapah and Satyah. All of creation including man and Devas live in one or the other of these worlds. Of these the Bhoo, Bhuvah and Suvah lokas belong to one group. These are often referred to as Bhoor-Bhvas-Suvah in rituals. The other four are higher than these. When Brahma goes to sleep at night, these three lokas, or worlds cease to exist. This is called the Avaanthara Pralaya. When his term of life ends, all the worlds including the other four also cease to exist.
Modern scientists have discovered that, imperceptibly, the heat of the sun is getting less as time passes. Life cannot be sustained without the Sun’s heat. Beginning with foodstuffs, all things necessary for the sustenance of life on earth, such as rainfall, are all dependent on the sun’s heat. So, it has been calculated that, after the passage of a very, very long period of time, after crores and crores of years, the world will cease to exist. The next Avaantara Pralaya as per our ancient beliefs and the calculations of modern scientists as to the end of the world is more or less coincidental in time.
Working back again as per these calculations, when we consider the time of creation of this universe, we more or less reach the same time as what the scientist ascribe as to the time of creation.
Since fourteen Manus complete their reign during one day-time of Brahma, a single manvantara has 71 Chatur Yugas. In our present Vaivasvata Manvantara, we are now in the 28th Chaturyuga and in the Kali Yuga thereof. Our Samkala describes all these.. It goes on to the day and minute thereof. All this is with reference to the computation of time.
There there is also in the Samkalpa the description of the land in which we live. It describes the whole of the Universe (called Brahmaanda) and comes down to the village where one lives. Just as we mention the place and date in our letters, we similarly mention these in our Samkalpa. All these complicated calculations are in the Jyotisha Saastra.
Empirical Proof
The rays of the sun appear on the floor of a hut coming through a small hole in the roof. We do not know where the same ray would fall the next year. But calculations made as per the Jyotisha Saastra would fix the location of that very day. In ancient times, Kings used to reward those who would hang a pearl by a thread and indicate by marking on the ground at what time the sun’s rays would fall on the specified spots. With other disciplines, one had to earn his reward by verbal arguments but in Jyotisha Saastra one had to physically demonstrate his skill. There was, thus, no question of cheating. The sun and moon were witnesses to their knowledge.
Harih Harah!!
वेदांग ‘ज्योतिष’ – वेदों की आंखें
अब तक, मैंने चार वेदांगों के बारे में बात की है, यानी शिक्षा, व्याकरण, छंद और निरुक्त । पांचवां है ज्योतिष ।
ज्योतिष वेद पुरुष की आँख – देखने के अंग की तरह काम करता है । इस विज्ञान (साइंस) या शास्त्र के तीन हिस्से या स्कंध हैं । इसलिए, इसे – “स्कंध त्रयात्मकम्” कहा जाता है । ये हैं ‘सिद्धांत स्कंधम्’, ‘होरा स्कंधम्’ और ‘संहिता स्कंधम्’ । स्कंध शब्द का मतलब है पेड़ के तने से निकली मुख्य शाखा ।
गर्ग, नारद, पराशर और कई दूसरे ऋषियों ने ज्योतिष पर कई ग्रंथ लिखे हैं । एक किताब है जिसमें सूर्य भगवान का उदाहरण दिया गया है, जिसमें इस विज्ञान के एक हिस्से को लिया गया है और इसे दिव्य (दैविक) वास्तुकार और निर्माणकर्त्ता ‘मय’ को सिखाया गया है । इसे “सूर्य सिद्धांत” कहा जाता है । इस प्रकार, देवताओं और ऋषियों द्वारा रचित कई पुस्तकें हैं । मनुष्यों द्वारा भी लिखी गई कई पुस्तकें हैं । वराहमिहिर इस विषय पर कई किताबें लिखने के लिए प्रसिद्ध हैं । आर्य भट्ट, भास्कराचार्य और अन्य लोगों ने भी बहुमूल्य योगदान दिया है । अभी हाल के दिनों में सुंदरेश्वर श्रौति नाम के एक वैदिक विद्वान ने “ज्योतिष कौस्तुभम्” नामक एक पुस्तक लिखी है ।
बिना आँखों वाला व्यक्ति अंधा होता है । जबकि पास की वस्तुओं को स्पर्श से पहचाना जा सकता है, दूर की वस्तुओं को केवल आँखों से देखा जा सकता है । जिस तरह मानव की आँखें दूर और पास की वस्तुओं की पहचान करने में उपयोगी होती हैं, उसी तरह ज्योतिष शास्त्र समय में, यानी कई साल पहले या भविष्य में ग्रहों और तारों की स्थिति देखने में उपयोगी है । अभी (वर्तमान में) ग्रहों की स्थिति ज्योतिष (एस्ट्रोनॉमी) की मदद के बिना देखकर पता लगाई जा सकती है । लेकिन, मान लीजिए ५० साल बाद में ग्रहों की स्थिति सिर्फ़ ज्योतिष की मदद से ही पता चल सकती है । क्योंकि सिर्फ़ छूने से रंगों की पहचान नहीं हो सकती, इसलिए इन्हें पहचानने के लिए आँखों की ज़रूरत होती है । इसी तरह, अगर आज कोई ग्रह दिख भी जाए, तो हम उसकी जगह और वह हम पर कैसे असर डालता है, इसके आधार पर उसके असर को नहीं जान पाएंगे । सिर्फ़ ज्योतिष ही इस विषय पर रोशनी डाल सकता है । इसीलिए इसे वेद पुरुष की आँख कहा जाता है ।
ग्रहों की स्थिति के संदर्भ में वैदिक अनुष्ठानों को करने के समय के बारे में निर्देश हैं । विवाह और अन्य समारोहों की तिथियां तब तय की जाती हैं जब ग्रहों की स्थिति अनुकूल मानी जाती है । ज्योतिष को ‘नयना’ जिसका अर्थ है आँख भी कहा जाता है । ‘नय’ का अर्थ है नेतृत्व करना । एक अंधे व्यक्ति को किसी के द्वारा नेतृत्व करना पड़ता है । हम जो भाग्यशाली हैं कि हमें देखने वाली आँखें हैं, आँख ‘नेता’ की भूमिका निभाती है । वैदिक कर्मों को करने के लिए शुभ समय निर्धारित करने के बाद, ज्योतिष हमें उनके वास्तविक निष्पादन की ओर ले जाने में आँख की भूमिका निभाता है ।
एस्ट्रोनॉमी और एस्ट्रोलॉजी
आजकल का साइंस एस्ट्रोनॉमी (अन्तरिक्ष शास्त्र) पर ही रुक जाता है, जो सिर्फ़ अलग-अलग समय पर ग्रहों की पोजीशन (स्थिति को) बताता है । ग्रह आम तौर पर दुनिया पर कैसे असर डालते हैं ? वे हम पर कैसे असर डालते हैं ? उनका असर हमारे लिए अच्छा बनाने के लिए क्या किया जाना चाहिए ? एस्ट्रोनॉमी के साथ और उस पर आधारित एस्ट्रोलॉजी (ज्योतिश शास्त्र) का साइंस इन सवालों से निपटता है ।
ज्योतिष शास्त्र असल में यह बताने के लिए बनाया गया था कि जब वैदिक कर्म किसी खास ग्रह, तारे या चंद्र दिन शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष के असर में किए जाते हैं, तो उनकी सफलता या इसमें कमी कितनी होगी । दूसरे शब्दों में, ज्योतिष का मुख्य मकसद वैदिक कर्म करने के लिए सबसे सही समय पर पहुँचने में मदद करना था और इसलिए इसे वेदांगों में एक अंग के तौर पर वेदों का हिस्सा बनाया गया । क्योंकि इसमें राशियों के अलग-अलग ग्रहों में पहुँचने का चक्र के बारे में गणना शामिल है, इसलिए गणित इसका एक ज़रूरी हिस्सा बन गया ।
वह जगह जहाँ वैदिक यज्ञ किया जाता है, उसे ‘यज्ञ वेदी’ कहा जाता है और उस जगह की स्थिति कहाँ पर होनी चाहिये, यही सभी तथ्यों के सम्बन्ध मे विस्तार से बताया गया है ।
यज्ञ वेदी की सही संरचना (बनावट) और निर्माण के बारे में दिए गए आदेश के आधार पर किया गया यज्ञ अच्छा फल देता है । इसलिए, इन ज़रूरतों का सही हिसाब लगाना ज़रूरी हो गया ताकि वे तय शर्तों के मुताबिक हों । इसी वजह से, वेदों के एक सहायक अंग – उपांग – के तौर पर गणित को विकसित किया गया है ।
प्राचीन गणितीय ग्रंथ
मैंने पहले तीन स्कंधों के बारे में बताया था, सिद्धांत स्कंध, होरा स्कंध और संहिता स्कंध । सिद्धांत स्कंध में अंकगणित, त्रिकोणमिति, ज्यामिति और बीजगणित जैसे विषय शामिल हैं । पश्चिमी दुनिया को उच्च गणित में विकसित होने में जो सदियों लगीं, वह हमारे प्राचीन ज्योतिष में पहले से ही मौजूद है ।
अंकगणित, संख्याओं के साथ शुद्ध गणना है । साधारण संख्याएँ दी जाती हैं और उनका नतीजा निकाला जाता है । सरल जोड़, घटाव, गुणा और भाग, अंकगणित के काम हैं । ‘अव्यक्त-गणित’ अज्ञात संख्याओं से संबंधित है, अर्थात १, २, ३ या ४ जैसे अंकों के बजाय, ‘ए’ जैसे प्रतीकों का उपयोग किया जाता है । इसे बीजगणित कहा जाता है । अव्यक्त का शाब्दिक अर्थ है जो निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है । ‘क्षेत्र गणित’ ज्यामिति है । ‘ज्या’ या जियो पृथ्वी है । ‘मिति’ का अर्थ है मीटर या माप । इसलिए, इसका नाम ज्यामिति है । यज्ञ स्थल, यज्ञ कुंड (यज्ञ भूमि और यज्ञ वेदी), इनके स्थान, आकार और आयामों को निश्चित करना इस ज्यामिति में किया गया था । एक अंकगणित है जिसे ‘समीकरण’ कहा जाता है । यह ज्ञात के माध्यम से अज्ञात को खोजने से संबंधित है । आंकड़ों के अज्ञात समूह अलग से दिए गए हैं और उन्हें समीकरणों में परिवर्तित करने की जरूरत है । यह समीकरण है । इसका अर्थ है चीजों को बराबर करना । इसे अब अंग्रेजी में ‘ईक्वेशन’ कहते हैं ।
आपस्तंब सूत्र में एक समीकरण है । यह बहुत हाल तक प्रमाण को चुनौती देता था । चूंकि इसे पश्चिमी गणित के माध्यम से हल नहीं किया जा सकता था, इसलिए यह भी कहा गया था कि इसे साबित नहीं किया जा सकता है । लेकिन, आगे के शोध ने साबित कर दिया कि सूत्र में दिया गया समीकरण सही था । इसने स्वाभाविक रूप से पश्चिमी विद्वानों को चकित कर दिया है । गणित में दक्षता की उच्च डिग्री जिसने इतने लंबे समय तक आधुनिक विज्ञान को चकित कर दिया था, वह हजारों साल पहले से ही भारतीय विद्वानों को ज्ञात थी । ऐसे कई और सूत्र हैं जिन्हें अभी भी साबित करना और समझा जाना बाकी है । इस समीकरण को भी केवल समीकरण की सहायता से ही साबित करना होगा । हमारे शास्त्रों में गणित की कई जुड़ी हुई शाखाओं का ज़िक्र है, जैसे रेखा गणित, गुट्टक, अंग भाग, वगैरह । अव्यक्त गणित (अलजेब्रा) को बीज गणित भी कहा जाता है ।
लगभग ८०० साल पहले भास्कराचार्य नाम के एक मशहूर गणितज्ञ थे । उनकी ज़िंदगी में एक घटना हुई थी जो यह दिखाती है कि हम अपनी अक्ल कितनी भी लगा लें, किस्मत ही जीतती है । उनकी एक बेटी थी जिसका नाम लीलावती था । भास्कराचार्य, जो एक महान एस्ट्रोलॉजर और एस्ट्रोनॉमर थे, उन्हें एहसास हुआ कि शादी के तुरंत बाद लड़की विधवा होने वाली है । उन्होंने सोचा कि अगर वह अपनी बेटी की शादी ऐसे समय में कर सकें जब ग्रहों की हालत इतनी अच्छी हो कि शादीशुदा ज़िंदगी लंबी हो, तो वह अपनी बेटी की किस्मत बदल सकते हैं । इसलिए उन्होंने एक समय और तारीख तय की जब ग्रह इतने अच्छे स्थिति (अनुकूल संयोजन) में अवस्थित थे । उन दिनों, आज के उलट, समय दिखाने के लिए घड़ियाँ नहीं होती थीं । तब पानी के बर्तन को घटिका या आज के घटिकारा (घड़ी) के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था । बर्तन दो हिस्सों में बंटा होता था – ऊपर वाला और नीचे वाला । ऊपर वाले हिस्से से पानी एक छोटे से छेद से नीचे वाले हिस्से में टपकता था । नीचे वाले हिस्से पर दवा की बोतल की तरह कैलिब्रेशन मार्क (अंशांकन चिह्न) किए होते थे । पानी के लेवल (स्तर) का इस्तेमाल समय गणना करने के लिए किया जाता था । इस पर हर निशान एक दिन के १/६०वें हिस्से के बराबर का समय दिखाता था । समय की इस यूनिट को घटिका (घट या बर्तन शब्द से लिया गया) कहते हैं । एक घटिका २४ मिनट के बराबर होती है । क्योंकि पानी मौसम के हिसाब से वाष्पीकरण (इवैपोरेशन) के अधीन होता है और इससे गणना (कैलकुलेशन) में गलतियाँ हो सकती हैं, इसलिए बाद में पानी की जगह रेत का इस्तेमाल किया जाने लगा, जो इवैपोरेशन के अधीन नहीं होती और घंटा-घड़ी के नाम से जाना जाने वाला औज़ार इस्तेमाल में आने लगा । जैसा कि उन दिनों का रिवाज था, लीलावती की शादी तब तय हो गई थी जब वह अभी बच्ची थी । यह बच्ची ऊपर बताए गए “पानी के गिलास” के पास आई और कुछ शरारत की । इस दौरान, उसकी नाक के गहने का एक छोटा मोती ढीला होकर घटिका के दो हिस्सों के बीच के छेद में गिर गया, जिससे पानी टपकने लगा । नतीजतन, टपकने का आकार छोटा हो गया। इसलिए, जब सीमित पानी की सप्लाई उस निशान तक पहुँची जो ग्रहों की अच्छी स्थिति को दिखाने के लिए बनाया गया था, तब तक वह समय बहुत पहले बीत चुका था और अगला ‘लग्न’ आ गया था जो शुभ नहीं था । क्योंकि लीलावती की शादी उस मुहूर्त या समय पर हुई थी, इसलिए उसने बहुत कम उम्र में अपने पति को खो दिया, और उसकी कुंडली में लिखी भविष्यवाणी सच हुई ।
उस समय बच्चे समेत किसी ने भी पानी के गिलास में मोती गिरने पर ध्यान नहीं दिया था । लेकिन जब बाद में यह बात पता चली, तब तक बहुत देर हो चुकी थी, शादी हो चुकी थी और यह मान लिया गया था कि किस्मत बदलना मुश्किल है ।
बाद में, भास्कराचार्य गणित पर एक किताब लिखना चाहते थे । उन्होंने उस किताब का टाइटल अपनी बेटी का नाम चुना । उन्होंने अपनी बेटी, जो बाल-विधवा हो गई थी, को एक बड़े गणितज्ञ के तौर पर काबिल बनाया और अपनी किताब का नाम उसके नाम पर रखा । इस किताब में गणित के अलग-अलग पहलू जैसे अरिथमेटिक, व्यक्त गणित, बीज गणित, वगैरह शामिल हैं । ग्रहों की स्थिति और उनकी चाल का पता लगाने में मदद के लिए, उन्होंने “सिद्धांत शिरोमणि” नाम की एक किताब भी लिखी ।
“प्राचीन लेख माला” नाम की एक किताब है जिसमें सभी पुराने शिलालेखों का संग्रह है । किताब से पता चलता है कि गुजरात के ‘सिंगना’ नाम के एक राजा ने भास्कराचार्य की लिखी बातों को लोकप्रिय बनाने की कोशिश की थी ।
हालांकि यूक्लिड की मॉडर्न ज्योमेट्री (आधुनिक ज्यामिति) की किताब के बीच के चैप्टर ७, ८, ९ और १० गायब बताए जाते हैं, लेकिन संस्कृत की सभी बारह किताबें अभी भी वैसी ही हैं । ऐसा लगता है कि हम बुनियादी (प्रारम्भिक) गणित से भी अनजान हैं । उदाहरण के लिए, गुणन का मतलब बार-बार जोड़ना है । इसी तरह भाग का मतलब बार-बार घटाना है ।
भास्कराचार्य के समय से बहुत पहले, १५०० साल से भी पहले, वराहमिहिर नाम के एक गणिगज्ञ हुए थे । वे ‘बृहद् संहिता’ और ‘बृहद् जातक’ जैसी कई किताबों के लेखक हैं । बृहद् संहिता सभी वैज्ञानिक विषयों का ‘सार’ है । यह आज भी बहुत हैरानी की बात है कि हमारे प्राचीन विद्वान् वैज्ञानिक विषयों (साइंटिफिक सब्जेक्ट्स) की एक लंबी सूची से अवगत थे । बृहद् जातक में एस्ट्रोलॉजी से जुड़े सभी मामलों के बारे में बताया गया है । आर्य भट्ट “आर्यभट्ट सिद्धांत” नाम की किताब के लेखक हैं । वे भी १५०० साल से ज़्यादा पहले हुए थे । आज जो मॉडर्न अरिथमेटिक चलन में है, वह आर्य भट्ट के बताए सिद्धांतों पर आधारित है । वराहमिहिर और आर्य भट्ट दोनों को मॉडर्न मैथमैटिशियन बहुत मानते हैं । ये सभी मैथमेटिकल साइंस सिर्फ़ तारों और नौ ग्रहों की जगह और चाल से जुड़े हैं । असल में सिर्फ़ सात ग्रह हैं । राहु और केतु छाया हैं । इसलिए, उन्हें “छाया ग्रह” कहा जाता है । वे सूरज और चांद के ट्रांज़िट के ठीक उलटे चलते हैं । इसलिए उन्हें किसी खास कैलकुलेशन की ज़रूरत नहीं होती । उनकी खास बातें सूरज और चांद की बातों को उलटकर पता लगाई जा सकती हैं ।
तारे और ग्रह में क्या फ़र्क है ? जो हमारे सूरज का चक्कर लगाते हैं, वे ग्रह हैं । जो सोलर गैलेक्सी से जुड़े हैं, वे तारे हैं । उन्हें पहचानने का एक तरीका है जिसे देखकर पहचाना जा सकता है । जब हीरा घूमता रहता है, तो उसमें चमक-दमक होती है । इसी तरह तारे भी ऐसे टिमटिमाते हैं जैसे वे हिल रहे हों । ग्रह स्थिर रहकर रोशनी छोड़ते हैं ।
सूरज और तारे खुद-ब-खुद चमकते हैं । तारे अलग-अलग रंग दिखाते हुए चमकते हैं, कुछ-कुछ अच्छी तरह से तराशे गए हीरों से निकलने वाली नीली और हरी रोशनी की तरह । गुरु (ज्यूपिटर) और शुक्र (वीनस) ग्रह बड़े तारों जैसे दिखते हैं लेकिन उनमें कोई चमक-दमक नहीं होती । तारों में चमक-दमक होती है । सूरज भी ऐसा ही है । अगर ध्यान से देखें, तो आस-पास का प्रभामंडल गायब हो जाएगा । फिर यह पानी में तैरते हुए चपटे शीशे के टुकड़े जैसा दिखेगा । इसमें चमक-दमक और हलचल दोनों होंगी । चांद ऐसा नहीं होगा ।
मैं आपको बताता हूँ कि सूरज में रोशनी और हलचल दोनों कैसे होती हैं । एक छोटे से छेद से आती धूप की किरणों को लें । सूरज की किरणें हिलती रहेंगी, लेकिन चांद की किरणें स्थिर रहेंगी । दूसरे ग्रह भी चांद जैसे ही हैं । तारे भले ही छोटे दिखें, लेकिन उनमें चमक और हलचल दोनों होती है ।
अगर कोई तारा काफी बड़ा होता, तो उसकी चमक में सात रंग, VIBGYOR, दिखाई देते, जैसे हीरे से रंग निकलते हैं । सूरज का एक नाम ‘सप्तस्वान’ है, जिसका मतलब है कि उसके रथ में सात (सप्त) घोड़े (अश्व) हैं ।
इसका मतलब सात रंगों वाला एक घोड़ा भी हो सकता है । ‘अश्व’ शब्द का मतलब ‘किरणें’ भी है । इसका मतलब सूरज की किरणों से निकलने वाली सात रंगीन किरणों से है । एक ही किरण से सभी सात रंग निकलते हैं । VIBGYOR का भी यही मतलब है । वेदों के तैत्तरीय आरण्यक में कहा गया है कि एक ही किरण को सात नामों से जाना जाता है “एको अश्वः वहति सप्तनामा” यानी, एक ही रंग, सफेद, रिफ्रैक्शन पर सात रंगों में बंट जाता है ।
तारे पूरब में उगते हैं और पश्चिम में डूबते हैं । ग्रह भी पश्चिम की ओर चलते हैं लेकिन हर दिन वे थोड़ा पूरब की ओर खिसक जाते हैं । सातों ग्रह थोड़ा पूरब की ओर चलते रहते हैं । ज्योतिष विज्ञान इन्हीं हरकतों से जुड़ा है ।
ग्रह इंसान की ज़िंदगी पर कैसे असर डालते हैं
धरती पर, इंसान की किस्मत भी ग्रहों की चाल की तरह ही बदलती है । बुरा समय, अच्छा समय, दुख, खुशी, ऊंचे पद, उससे गिरना – ऐसी इंसान की बदलती किस्मत है । ऐसे बदलाव सिर्फ़ इंसान तक ही सीमित नहीं हैं । संस्थाओं और देशों में भी अच्छे और बुरे समय आते रहते हैं । महान ऋषियों ने पाया कि ग्रहों की चाल और धरती पर दिखने वाले अच्छे और बुरे नतीजों के बीच एक पक्का कनेक्शन है । असल में, उन्होंने ग्रह की चाल को हम पर उसके असर से जोड़ा है । जब कोई काम शुरू किया जाता है, तो उस काम को शुरू करते समय ग्रहों की स्थिति के आधार पर उसके नतीजे का अंदाज़ा लगाया जा सकता है । इस साइंस को होरा शास्त्र कहते हैं । जन्म के समय को आधार मानकर, कुंडली में ग्रहों की स्थिति तय की जा सकती है और किसी की पूरी ज़िंदगी में अच्छे और बुरे समय का अंदाज़ा लगाया जा सकता है ।
अच्छे और बुरे समय के लिए कई वजहें बताई जाती हैं । यह वैसा ही है जैसे किसी बीमारी के लिए अलग-अलग वजहें बताई जाती हैं । डॉक्टर इस बीमारी का कारण “मानस” (psyche) में बदलाव (मानसिकता में परिवर्तन) को मानते हैं । जादू-टोनावाले इसे सुपरनैचुरल ताकतों का नतीजा मानते हैं । ज्योतिषी इसे ग्रहों की स्थिति में बदलाव को मानते हैं । धर्मशास्त्र इस बीमारी को पिछले जन्मों में किए गए कर्मों का असर बताता है । साइकोलॉजिस्ट कहते हैं कि भावनाओं में बदलाव से सेहत में बदलाव होता है । इस तरह, एक ही असर के लिए कई कारण बताए जाते हैं । असल में, कारण क्या है ? ग्रह, मानसिक अवस्था, मन की ताकतें – या कुछ और ? इनमें से कुछ भी गलत नहीं है । सभी को अपनी भूमिका निभानी होती है । वे एक ही चीज़ की अभिव्यक्तिताँ होती हैं । हमारी समझ में मदद करने के लिए, अलग-अलग कारणों का ज़िक्र किया गया है और उनके मिले-जुले असर से यह अनुभव होता है । अलग-अलग लोग अलग-अलग वजहें बताते हैं । अगर बारिश होती है, तो नमी होती है, मक्खियां झुंड में आती हैं, मेंढक टर्राते हैं । ये बारिश के बाद होने वाले असर हैं । इसी तरह, कई ऐसे संकेत हैं जो हमारे पिछले जन्मों के कर्मों के नतीजे की ओर इशारा करते हैं । हर वजह एक सबूत है । वे सभी आपस में जुड़े हुए हैं । ग्रहों का स्वभाव पिछले कर्मों से तय होता है । बीमारी होती है और मन परेशान होता है । मानसिक शक्तियां भी हावी होती हैं । ये सब एक ही कर्म का नतीजा है । यह बात हर दुर्घटना के कारणों के आधार पर साबित की जा सकती है । लेकिन ग्रहों की चाल में इस्तेमाल होने वाला कैलकुलेशन का तरीका सबसे आसान है ।
“शकुन” – “निमित्त”
मैंने पहले कहा था कि ज्योतिष के विज्ञान का एक हिस्सा “संहिता स्कंध” है । ज़मीन के नीचे पानी कहाँ होता है ? नदियाँ और जलधाराएं ज़मीन के नीचे कहाँ होते हैं ? ज़मीन के नीचे पानी होने पर उपर कैसा संकेत दिखता है ? ये कुछ ऐसे विषय हैं जिनसे यह स्कंध जुड़ा है । परफ्यूम (इत्र) और कॉस्मेटिक (शृंगार प्रसाधन) बनाने का तरीका, घरों की डिज़ाइनिंग और बनाना, शकुन और निमित्त का विज्ञान भी इस स्कंध में मिलता है ।
शकुन, निमित्त से अलग है, हालाँकि दोनों आम तौर पर “शगुन” के तहत आते हैं । शकुन का मतलब असल में एक पक्षी होता है । पक्षियों की वजह से होने वाले शकुन को शकुन कहते हैं । धरती पर ऐसा कोई विषय या बात नहीं है जो किसी दूसरे से अलग हो । जो घटनाएँ होती हैं, वे भी इतनी ही जुड़ी होती हैं । अगर सही कैलकुलेशन का इस्तेमाल किया जाए, तो इनका आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है और इन्हें समझा जा सकता है ।
धरती पर सभी घटनाएँ एक ही ताकत के राज में होती हैं । वे एक तय पैटर्न को फॉलो करती हैं । अतः एक अवलोकन का उपयोग करके शेष की गणना की जा सकती है । किसी के हाथ की रेखाएं, प्रश्न पूछे जाने के समय ग्रहों की स्थिति के आधार पर घटनाओं का पूर्वानुमान (आरूढ़), ज्योतिष सभी आपस में जुड़े हुए हैं । ये सभी सत्य हैं । इनमें से एक है शकुन ।
शकुन शास्त्र ऐसे विषयों से संबंधित है, जैसे (१) किसी पक्षी के हमारे बाएं से दाएं जाने का क्या प्रभाव होता है ? (२) एक या दूसरे पक्षी के रोने का क्या प्रभाव होता है ? आदि । इसमें निमित्त – शगुन का अर्थ भी शामिल है । “निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव” युद्ध शुरू होने से पहले अर्जुन भगवान कृष्ण से कहते हैं । यह हमारे कहने के समान ही है कि बुरे शगुन देखे जाते हैं । वह शकुन के बजाय सही शब्द, निमित्त का उपयोग करता है, क्योंकि केवल वे शगुन जो पक्षियों द्वारा प्रकट किए जाते हैं उन्हें शकुन कहा जाता है । अगर एक बिल्ली रास्ता काट गई, तो यह निमित्त है । अगर एक गिद्ध उड़कर पार कर गया, तो यह शकुन है । बाद में, भगवान अर्जुन से निमित्त के बारे में भी बात करते हैं: “निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्”, वे कहते हैं । “मैंने पहले ही निर्णय कर लिया है कि ये इस युद्ध में नष्ट हो जायेंगे । इसलिए, इन्हें पहले से ही मृत माना जा सकता है । इनका वध करने वाला कोई और नहीं बल्कि मैं ही हूँ । तुम केवल निमित्त की भूमिका निभाओ ।” भगवान ने कहा और उस संदर्भ में उन्होंने कहा “निमित्तमात्रं भव” ।
इसलिए शगुन अपने आप में किसी स्थिति को नहीं बनाता या बदलता । यह एक परिणाम को प्रकट करता है जो सतह पर आने के लिए बाध्य है । इसी तरह, शगुन केवल उस प्रतिक्रिया की घोषणा करते हैं जो हमारे पिछले जन्मों के कर्म उत्पन्न करते हैं ।
संक्षेप में कहा जाए तो, तीन स्कंधों या भागों में सामान्य सिद्धांतों की प्रकृति में जो कहा गया है, वह गणित और ग्रहों की चाल है । मनुष्य की अच्छी और बुरी अवधियों का अलग-अलग उच्चारण होरा या जातक कहलाता है । होरा से ही होरोस्कोप (राशिफल) जैसे शब्द निकला है ।
पुराने ग्रंथों में आज की खोजें
मैंने पहले बताया कि वराहमिहिर ने ‘बृहद संहिता’ नाम की एक किताब लिखी है । इस किताब में कई वैज्ञानिक खोजों के बारे में बताया गया है ।
ग्रह बिना सहारे के स्पेस में कैसे लटके रहते हैं ? वे नीचे कैसे नहीं गिरते ? आम धारणा है कि न्यूटन ने इस घटना का कारण खोजा था ।
सोलर सिस्टम (सौर्य मंडल) पर बहुत पुरानी थ्योरी (सिद्धान्त) एक श्लोक से शुरू होती है जिसमें कहा गया है कि पृथ्वी स्पेस में क्यों नहीं गिरती, इसका कारण ग्रेविटी फोर्स (गुरुत्वाकर्षण बल) है । आदि शंकराचार्य के उपनिषद भाष्य में भी कहा गया है कि पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है । अगर हम कोई चीज़ हवा में फेंकते हैं, तो वह पृथ्वी पर गिरती है । यह उस चीज़ की कोई खासियत (गुण-धर्म) नहीं है । इसके गिरने का कारण पृथ्वी द्वारा उस चीज़ का आकर्षण बल है । आकर्षण शक्ति ग्रेविटी (गुरुत्व) का खिंचाव (pull) है। ‘प्राण’ ऊपर जाता है, ‘अपान’ उसे नीचे खींचता है । इसलिए, जो फोर्स (बल) इसे नीचे खींचती है, उसे ‘अपान शक्ति’ कहते हैं । शंकराचार्य ने कहा है कि पृथ्वी में ‘अपान शक्ति’ या ‘ग्रेविटी की शक्ति’ है । प्रश्नोपनिषद (३.८) कहता है: “पृथिव्यां या देवता सैशा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यन्तरा” ।
यही वह देवता है जो पृथ्वी को नियंत्रण करता है और इंसानों के शरीर में अपान शक्ति बनाता है । इस उपनिषद पर अपने भाष्य में, आचार्य (आदि शंकराचार्य) कहते हैं: “तथा पृथिव्यां अभिमानिनि या देवता प्रसिद्धा सैषा पुरुषस्य अयानं अपानवृत्तिं अवष्टभ्य आकृष्य वशीकृत्याध एवापकर्षणेनानुग्रहंकुर्वती वर्तत इत्यर्थः” । जैसे हवा में ऊपर फेंका गया कोई वस्तु पृथ्वी द्वारा नीचे खींचा जाता है, वैसे ही ऊपर खींचने वाले प्राण को अपान द्वारा नीचे खींचा जाता है । इससे यह बहुत साफ़ हो जाता है कि उपनिषद गुरुत्वाकर्षण के नियम की बात करता है । हमारे शास्त्रों में कई अन्य ऐसे अद्भुत आंकड़े हैं, जिनके बारे में हम जानना नहीं चाहते लेकिन मानते हैं कि हर वैज्ञानिक खोज पश्चिम से आई है ।
हमारे ज्योतिष ग्रंथ जो युगों पहले लिखे गए थे, उनमें वे सभी गणितीय सिद्धांत शामिल हैं जो आज दुनिया भर में उपयोग में हैं । सृष्टि की शुरुआत में सभी ग्रह एक सीध में थे । समय के साथ, वे थोड़ा-थोड़ा करके बदलने लगे । जब अगला कल्प शुरू होगा, तो वे फिर से एक सीध में होंगे ।
न केवल गुरुत्वाकर्षण के खिंचाव बल्कि पृथ्वी के घूमने का भी उल्लेख आर्यभट्ट और वराहमिहिर ने किया है । ११वीं शताब्दी तक पश्चिमी सिद्धांत था: “अकेले पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में दृढ़ता से खड़ी है । सूर्य पृथ्वी के चारों ओर घूमता है । इसी तरह पृथ्वी पर दिन और रात होते हैं ।” अगर किसी ने इससे थोड़ा अलग सिद्धांत पेश किया, तो धार्मिक प्रमुखों ने उस व्यक्ति को विधर्म के लिए खंभे पर लटका दिया । लेकिन हम शुरुआती समय से ही सच्चाई को इसके विपरीत जानते थे ।
आर्यभट्ट ने यह समझाने के लिए एक सुंदर नाम दिया है कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है, न कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर घूमता है । इसे “लाघव-गौरव” न्याय कहते हैं । (हल्केपन का सिद्धांत) । अगर कोई काम आसानी से और हल्के में किया जाए तो उसे ‘हस्त लाघव’ कहते हैं, जिसका मतलब है निपुणता या हाथ की सफाई । ‘लघु’ का उल्टा ‘गुरु’ है । जो भारी या बड़ा है वह गुरु है । गुरु का मतलब है बड़ा आदमी । वह उपदेशक या आचार्य है । अगर आचार्य गुरु है, तो शिष्य लघु है । आचार्य जो गुरु है, शिष्य द्वारा आदरणीय है । इसलिए वह प्रदक्षिणा में आचार्य की परिक्रमा करता है । आचार्य शिष्य की परिक्रमा नहीं करता । हमारे सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह सूर्य है । पृथ्वी लघु है । लाघव-गौरव न्याय कहता है कि छोटी वस्तु बड़ी वस्तु के चारों ओर घूमती है । इस प्रकार, आर्यभट्ट ने रूपक रूप से पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर घूमने का उल्लेख किया है ।
आज हमने उन लोगों से हाथ मिला लिया है जो पहले वैज्ञानिकों को विधर्मी कहते थे और विज्ञान को प्रगति न करने देकर उन्हें जला देते थे, लेकिन हिंदू धर्म पर यह आरोप लगाते हैं और कहते हैं कि “भारत में वैज्ञानिक प्रगति की कमी का कारण हिंदू धर्म है जो इस दुनिया की चीजों को नजरअंदाज करके अन्य-सांसारिकता (दुनिया से बाहर की चीजों) को बढ़ावा देता है ।” वास्तव में, सभी विज्ञान हमारे प्राचीन विद्वानों को ज्ञात थे ।
सूर्य ‘स्थिर’ रूप में रहता है । केवल पृथ्वी इसके चारों ओर घूमती है । ऐसा केवल प्रतीत होता है कि सूर्य प्रतिदिन पूर्व में उदय होता है और थोड़ा उत्तर की ओर बढ़ने पर पश्चिम में अस्त हो जाता है । लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है, यह एक ऐसी बात है जिसका उल्लेख ऋग्वेद के ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है । इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सूर्य न तो उदय होता है और न ही अस्त होता है ।
यह स्पष्ट रूप से हमारे देखने के लिए है कि हवा कभी किसी स्थान पर स्थिर नहीं रहती बल्कि चलती रहती है । ज्वाला स्थिर नहीं रहती बल्कि टिमटिमाती (लहलहाती) रहती है । और पानी स्थिर नहीं होता बल्कि आगे बढ़ता रहता है । जब हम आकाश की ओर देखते हैं, तो हमें ऐसा लगता है मानो सूर्य और चंद्रमा चल रहे हों (गति कर रहे हों) । आकाश ही समस्त ध्वनियों का कारण भी है । चूँकि वाइब्रेशन (कम्पन) ही आवाज़ की शुरुआत है, इसलिए यह साफ़ है कि आवाज़ भी गतिशील (मूवमेंट करती) है । लेकिन सतही तौर (ऊपर से देखने) पर धरती एक जगह स्थिर और बिना हिले-डुले (गतिहीन अवस्था में) दिखाई देती है ।
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव और घूर्णन (अपने धूरी पर चारों तरफ घूमने) को एक तरफ रखते हुए, आइये पृथ्वी के स्वरूप पर एक नज़र डालें । पश्चिमी लोग क्या कहते हैं ? पहले वे सोचते थे कि पृथ्वी एक ‘पैन केक’ की तरह चपटी है । उन्होंने इस खोज का श्रेय स्वयं लिया कि ऐसा नहीं है बल्कि आकार में गोलाकार है । ठीक है । हम जियोगरफी के विज्ञान को क्या कहते हैं ? “भूगोल शास्त्र” । इसे ‘भू-शास्त्र’ कहना पर्याप्त है लेकिन यह घोषित करने के लिए कि यह गोलाकार है जो हमें प्राचीन काल से ही ज्ञात है, हम इसे भूगोल शास्त्र कहते हैं । “गोला” का अर्थ है स्फेयर । “भू” का अर्थ है पृथ्वी ।
यूनिवर्स सभी आकाशगंगाओं सहित सभी दुनियाओं की समग्रता है जिसे “ब्रह्मांड” कहा जाता है । इसका अर्थ है ब्रह्मा द्वारा निर्मित “अंडा” । “अंडा” का अर्थ है एग । अंडा आकार में गोलाकार नहीं बल्कि अण्डाकार (ईलिप्टिकल) होता है । आधुनिक विज्ञान ने भी यही साबित किया है – ब्रह्मांड गोलाकार नहीं बल्कि अंडाकार है ।
आधुनिक खगोल विज्ञान कहता है कि पूरा ब्रह्मांड गति की स्थिति में है । लेकिन प्रारंभिक वैदिक काल से पृथ्वी को दिया गया नाम ही इसके प्रति हमारी जागरूकता को दर्शाता है । “जगत” ब्रह्मांड का नाम है और इसका अर्थ है जो घूमता रहता है और स्थिर नहीं रहता ।
प्राचीन भारत में भी कुछ लोग थे जो पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर घूमने के सिद्धांत का विरोध करते थे । मैं आपको इनमें से एक वर्ग के विचार बताता हूँ । पृथ्वी की परिधि लगभग २५,००० मील है । यदि पृथ्वी को एक बार पूरा घूमने में २४ घंटे लगते हैं, तो इसका मतलब है कि यह १००० मील प्रति घंटे की गति से घूमती है । इसलिए, एक मिनट में यह १६ या १७ मील की यात्रा करती है । इसका अर्थ यह होगा कि चूंकि पृथ्वी हमेशा घूर्णन में रहती है, यदि मद्रास अभी यहां (एक निश्चित बिंदु पर) होता, तो अगले मिनट उसकी जगह पर भूमि या समुद्र दिखाई देना चाहिए जो १७ मील दूर था ।
मान लीजिए कि इस समय मद्रास में बैठा एक कौआ सीधा हवा में ऊपर जाता है और एक मिनट बाद नीचे आता है । वह उसी पेड़ या घर पर बैठता है जिस पर से वह उड़ा था । यदि यह सच होता कि पृथ्वी तेजी से घूम रही है, तो यह कैसे संभव है कि वह वापस उसी स्थान पर आ जाए ? चूंकि पृथ्वी घूमती है, इसलिए १ मिनट में जिस स्थान पर मद्रास था उसे १७ मील बाहर खिसक जाना चाहिए था और एक अन्य स्थान जो १७ मील दूर था, वहां मद्रास दिखाई देना चाहिए था । पृथ्वी के घूमने के सिद्धांत के विरोधी इस प्रकार तर्क देते हैं । मैंने उस उत्तर पर गौर नहीं किया है जो सिद्धांत के समर्थक लोग देते हैं । लेकिन आधुनिक वैज्ञानिकों से पूछने पर मुझे बताया गया है कि पृथ्वी के चारों ओर लगभग २०० मील की दूरी तक हवा से बना एक वायुमंडलीय क्षेत्र है । इसके बाद कुछ और क्षेत्र म्यान (खोल) की तरह हैं । ये सभी पृथ्वी के साथ घूमते हैं । हो सकता है कि मैंने उनकी बातों को ईमानदारी से न समझा हो लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि न केवल पृथ्वी बल्कि उसके चारों ओर का वायुमंडल भी घूम रहा है ।
पश्चिमी लोगों ने अब यह पता लगा लिया है कि अरबी अंकों – १, २, ३, ४ आदि – का जन्मस्थान भारत है । अब विशेषज्ञों ने यह मान लिया है कि अंक ‘०’ पूरी तरह से भारतीय मूल का है । वे कहते हैं कि इस बोध के कारण ही भारत में गणित विज्ञान ने अपना पूर्ण कद प्राप्त किया था । इसके अलावा प्राचीन वैज्ञानिक ‘सिफर’ (शून्य) की खोज पर ही नहीं रुके । किसी भी संख्या को सिफर से भाग देने पर अनंत प्राप्त होगा, यह सूक्ष्म गणितीय सिद्धांत है जिसे भास्कराचार्य ने प्रतिपादित किया था । उन्होंने इस सत्य को “दिव्य-अनंत” (दैविक-अनंत) के सिद्धांत के साथ जोड़ा और इसे अपने गणित ग्रंथ का आरंभिक श्लोक बनाया ।
भाजक जितना छोटा होगा भागफल उतना ही बड़ा होगा । यदि १६ को ८ से भाग दिया जाए तो भाजक ८ होगा और भागफल २ होगा । यदि भाजक ४ है, तो भागफल ४ होगा । यदि भाजक २ है, तो भागफल ८ होगा । लेकिन यदि भाजक ‘०’ है तो ? तो भागफल गणना से परे हो जाता है, अर्थात अनंत । चाहे कोई भी संख्या हो, जिसे विभाजित किया जा रहा है यदि भाजक ‘०’ है, तो भागफल ‘अनंत’ है । भास्कराचार्य ने इसे कमहरम नाम दिया है । कम का मतलब है अंक, हरम का मतलब है बांटना ।
अंधविश्वास नहीं, बल्कि सच जो साबित हो सकते हैं
“हिंदू शास्त्र फालतू बातों से भरे हैं । मेरु पर्वत की चोटी पृथ्वी के उत्तर में मानी जाती है । वहां रहने वाले देवताओं के लिए, हमारा साल सिर्फ़ एक दिन माना जाता है । वह मेरु सूर्य का चक्कर लगाता है । पृथ्वी के चारों ओर सिर्फ़ खारा समुद्र ही नहीं है, बल्कि सात और समुद्र हैं जिनका पानी गन्ने का रस, दूध वगैरह है । पृथ्वी जिसमें पाँच महाद्वीप हैं, उसे सात द्वीपों से बना कहा जाता है । यह सब बकवास है ।” यह पश्चिम का प्रतिक्रिया (रिएक्शन) है । चलिए अब कुछ सवाल पूछते हैं: हमारा समुद्र इतना खारा क्यों होना चाहिए ? इसमें इतना नमक किसने मिलाया ? अगर आप यह मान सकते हैं कि समुद्र खारा है तो क्या आप मीठे और दूधिया पानी वाले समुद्र की कल्पना नहीं कर सकते ?
ठीक है । अगर आपको लगता है कि सात द्वीप और सात समुद्र सही नहीं हैं, तो वही शास्त्र पृथ्वी की स्थिति के बारे में क्या कहता है ? इसमें कहा गया है कि धरती के उत्तरी सिरे पर मेरु पर्वत और दक्षिणी सिरे पर (ध्रुव तारा) पोल स्टार है ।
उत्तरी सिरे को उत्तरी ध्रुव (नौर्थ पोल) माना जा सकता है । अगर हम दक्षिणी ध्रुव को देखें, तो यह बिल्कुल उल्टी दिशा में नहीं है । “ध्रुव” का नाम “ध्रुव तारे” के नाम पर रखा गया है । लेकिन अब यह सीधे उसके साथ एक ही लाइन में नहीं है । शुरुआत में ऐसा था । लेकिन बड़े कॉस्मिक बदलावों (ब्रह्माण्डीय परिवर्तनों) की वजह से, आज के शोधकर्ताओं (रिसर्चर्स) का कहना है कि धरती एक सीधी चोटी की तरह घूम रही थी जो सीधे ध्रुव तारे की तरफ थी । उस समय, सात समुद्र थे जिनका ज़िक्र शास्त्रों में किया गया है – सात द्वीप और समुद्र । घूमते समय, चोटी सीधी से थोड़ी झुक गई । मुझे लगता है, सात समुद्र आपस में मिल गए होंगे जिससे पानी का स्वाद नमकीन हो गया । हो सकता है कि उस समय, सात द्वीप पांच महाद्वीप बन गए हों ।
अगर उत्तरी ध्रुव के ऊपर कोई जगह है, तो वह जगह मेरु है और वह स्वर्ग है । अगर धरती की तुलना नींबू से की जा सकती है, तो वह टौप पॉइंट (चोटी) मेरु है । उस पॉइंट तक या उस पॉइंट से, सभी दिशाएँ सिर्फ़ दक्षिण की ओर इशारा करती हैं । उस चोटी या चोटी के पॉइंट से हम पूरब, पश्चिम या उत्तर नहीं जा सकते । दक्षिण की ओर नीचे उतरने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है । अगर हम नींबू के ऊपर एक पॉइंट रखें तो यह साफ़ हो जाएगा । धरती पर सभी चीज़ों में सबसे उत्तरी पॉइंट मेरु है । “सर्वेषां अपि वर्षानां मेरु उत्तरस्थिता” का यही मतलब है ।
पोल (ध्रुव) पर क्लाइमेट (मौसमी वातावरण) की स्थिति क्या है ? लगातार छह महीने दिन होता है और अगले छह महीने रात होती है । यह अब प्राइमरी क्लास में भी पढ़ाया जा रहा है । जैसे एक दिन और एक रात मिलकर पूरा दिन बनाते हैं, वैसे ही पोलर रीजन में छह महीने की रात और छह महीने के दिन (कुल मिलाकर एक साल) को एक दिन माना जाता है । इस तरह देवता का एक दिन हमारे हिसाब से एक साल बन जाता है । जब पृथ्वी घूमती है, तो भले ही उसके किनारे (सर्कमफेरेंस के साथ) बनाने वाले सभी हिस्से घूम जाएं, साउथ पोल पर सबसे ऊपर वाला पॉइंट और सबसे नीचे वाला पॉइंट घूमता हुआ नहीं कहा जा सकता । एक पॉइंट एक बहुत छोटा एरिया होता है, वरना उसे पॉइंट नहीं कहा जा सकता था ।
किसी खास दिन, सूरज और चांद के मुकाबले, घूमते समय, उसकी पोजीशन के आधार पर, पृथ्वी के कुछ हिस्सों में १८ घंटे सूरज की रोशनी पड़ती है, और ठीक उसके उलटे हिस्से में सिर्फ़ ६ घंटे धूप रहती है, जिसमें १८ घंटे अंधेरी रात होती है । दुनिया के कई हिस्सों में दिन और रात के समय में बहुत बड़ा फ़र्क होता है । सूरज कुछ दिनों में ही ठीक पूरब में उगता है, कुछ दिनों में ही बिना किसी बदलाव के ठीक सिर के ऊपर से निकलता है । दूसरे दिनों में सूरज का उगना उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पूर्व की ओर कई डिग्री तक अलग-अलग होता है । नॉर्थ पोल में ऐसा नहीं होता । वहाँ, छह महीने लगातार दिन से छह महीने लगातार रात और फिर छह महीने लगातार दिन की शुरुआत तक, अगर इस सफ़र को देखा जाए, तो ऐसा लगेगा कि उस जगह के सूरज का चक्कर लगाने के बजाय, सूरज उस जगह का चक्कर लगाता है । इसी बात का ज़िक्र उस बात में किया गया है कि सूरज मेरु पर्वत का चक्कर लगाता है । नॉर्थ पोल में छह महीने दिन के समय को उत्तरायण कहते हैं और जब वहाँ अंधेरा हो जाता है तो साउथ पोल पर दिन होता है, उसे दक्षिणायन कहते हैं ।
उत्तरी ध्रुव को सुमेरु और दक्षिणी ध्रुव को मेरु कहा जाता है । सुमेरु से ही सुमेरिया नामक देश का नाम पड़ा । कहा जाता है कि वहाँ वैदिक देवताओं की पूजा प्रचलित थी । जैसे उत्तर में देवता हैं, वैसे ही दक्षिण में पितृ और नरक हैं । देवताओं, पितरों या नरक में रहने वालों को देखने के लिए दिव्य दृष्टि की आवश्यकता होती है । केवल इसलिए कि हमारे पास ऐसी दिव्य दृष्टि नहीं है, हम ऐसे क्षेत्रों के अस्तित्व को तर्क से नकार नहीं सकते । रूस में जन्मे, अमेरिका में पले-बढ़े और भारत में बसे ब्लावट्स्की और अन्य, जिन्होंने थियोसोफिकल सोसाइटी की स्थापना की, मुख्यतः आत्माओं, महामानवों या देवताओं की दुनिया से संबंधित हैं । आधुनिक काल के सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिकों में से एक, सर ओलिवर लॉज ने आत्माओं और दिवंगत आत्माओं का विशेष अध्ययन किया था । उनका निष्कर्ष है कि निश्चित रूप से आत्माओं का अस्तित्व है और मनुष्य उनका आह्वान करके बहुत लाभ प्राप्त कर सकता है । इसलिए, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि ज्योतिष शास्त्र एक ओर खगोल विज्ञान और ऐसे ही विज्ञानों से संबंधित है और फिर अध्यात्म की ओर अग्रसर होता है । मानो यह दर्शाने के लिए कि इन विषयों में कोई विरोधाभास नहीं है, एक आधुनिक वैज्ञानिक ने भी इसी तरह अपना काम किया है ।
हमारे शास्त्र सुदूर अतीत में अस्तित्व में आए जब मनुष्यों और देवताओं के बीच सामाजिक संपर्क थे, जैसे आज हमारे बीच हैं । यह किसी अनुष्ठानिक समारोह के लिए ‘संकल्प’ या प्रारंभिक प्रार्थना पर बारीकी से विचार करने से स्पष्ट हो जाएगा । यह संकल्प समय के संदर्भ में वर्तमान को निर्धारित करता है, जो अनगिनत युग-चक्रों से पहले, युगों-युगों तक जाता है, और करोड़ों युगों के बाद कई शून्य जोड़ने के बाद गणना योग्य समय तक जाता है – संक्षेप में, जब से दुनिया का निर्माण हुआ है । युग के आरंभ में, खगोल विज्ञान के माध्यम से गणना योग्य ग्रहों की स्थिति से पता चलता है कि वे सभी उस समय एक सीध में थे ।
आज कुछ गणनाएँ अलग-अलग उत्तर देती हैं । यदि भौतिक अवलोकन और शास्त्रों में अंतर है, तो हमें यह निष्कर्ष निकालने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए कि शास्त्र झूठ का पुलिंदा हैं । शास्त्र उस समय प्रचलित थे जब ग्रह एक सीधी रेखा में स्थित थे, वह समय जब पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव ध्रुव तारे के ठीक सामने था । तब से, कई युगों में पृथ्वी में प्रलयकारी परिवर्तन हुए हैं । पृथ्वी पर्वत बन गई, पर्वत समुद्र बन गया, समुद्र रेगिस्तान बन गया, इत्यादि । ये विवरण भूवैज्ञानिकों से उपलब्ध हैं । इसके अतिरिक्त, खगोलशास्त्रियों का कहना है कि ग्रहों की गति के कारण आकाशगंगा में भी इसी प्रकार के परिवर्तन हुए हैं । निस्संदेह यही कारण है कि हम शास्त्रों में कही गई बातों में परिवर्तन पाते हैं ।
खगोलीय गणनाओं (ज्योतिष) के माध्यम से सृष्टि की उत्पत्ति का समय लगभग उसी समय बताया गया है जो आधुनिक शोध द्वारा ज्ञात है ।
कलियुग ४,३२,००० वर्ष का है । द्वापरयुग इसके दुगुने अर्थात ८,६४,००० वर्ष का होता है, त्रेतायुग इसके तिगुने अर्थात १२,९६,००० वर्ष का होता है और कृतयुग इसके चार गुना अर्थात १७,२८,००० वर्ष का होता है । इन चारों को मिलाकर एक महायुग कहा जाता है, जिसका समय ४३,२०,००० वर्ष होता है । ऐसे एक हज़ार महायुग चौदह मनुओं के शासनकाल के बराबर होते हैं । एक मनु के शासनकाल की अवधि को “मन्वन्तर” कहते हैं ।
यद्यपि पृथ्वी पर शासन करने के लिए हमारे पास अनेक राजा और लोकतांत्रिक सरकारें हो सकती हैं, फिर भी ईश्वर ने सभी सरकारों का एकमात्र प्रभारी ‘मनु’ को नियुक्त किया है । इस प्रकार चौदह मनु हैं, जो सृष्टि के आरंभ से लेकर अंत तक पद धारण करेंगे । चूँकि हम मनु के समय से उत्पन्न हुए हैं, इसलिए हमें मनुष्य (मनुज) आदि कहा जाता है । ‘Man’ (अंग्रेजी का मैन) शब्द भी मनु शब्द से ही बना है । संकल्प कहता है कि हम विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु नामक सातवें मनु के शासनकाल के अमुक वर्ष में हैं । उस समय से जब प्रथम मनु, स्वायंभुव मनु, ने शासन किया था, शास्त्रीय गणना लगभग उसी समय की है जब पृथ्वी पर होमोसेपियन्स का उदय हुआ था ।
‘मन’ धातु का अर्थ है सोचना, जो मन का एक कार्य है । इसी को ध्यान में रखते हुए मनु का नामकरण किया गया है । वह उन सत्व पुरुषों में प्रथम हैं । “मनुष्य एक चिंतनशील प्राणी है” एक उपयुक्त अभिव्यक्ति है । मनुष्य को पशुओं से ऊपर रखने वाली चिंतन शक्ति, जिसकी उत्पत्ति ‘मनु’ से हुई, ने ‘मनुष्य’ (Man) नाम को उपयुक्त नाम दिया है ।
जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, चौदह मनुओं द्वारा पूरा किया गया समय ब्रह्मा के लिए एक दिन (जिसमें रात शामिल नहीं है) के बराबर होता है । इतनी ही अवधि उनकी रात्रि के बराबर होती है । दूसरे शब्दों में, ८६४ करोड़ वर्ष ब्रह्मा का एक पूरा दिन होते हैं । ऐसे ३८५ दिन ब्रह्मा का एक वर्ष होते हैं । इस आधार पर उनका जीवनकाल १०० वर्ष होता है । इस ब्रह्मांड की अवधि भी यही है । जब ब्रह्मा का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, तो कहीं और कोई अन्य सृष्टि नहीं रहती । इसे ‘महाप्रलय’ कहते हैं । इसके बाद, ब्रह्मा के जीवनकाल तक, कोई सृष्टि नहीं होगी और केवल “ब्रह्म”, अकल्पनीय, अनंत, ही विद्यमान रहेगा । फिर एक नए ब्रह्मा की सहायता से एक और सृष्टि प्रारंभ होती है । धार्मिक अनुष्ठानों के लिए ‘संकल्प’ में हमारे द्वारा वर्णित अनुसार, ब्रह्मा का जीवन अब उत्तरार्ध में है ।
भू, भुवः, सुवः, महः, जनः, तपः और सत्यः नामक सात लोक हैं । मनुष्य और देवताओं सहित समस्त सृष्टि इनमें से किसी न किसी लोक में निवास करती है । इनमें से भू, भुवः और सुवः लोक एक ही समूह के हैं । अनुष्ठानों में इन्हें प्रायः भूर-भुवस्-सुवः कहा जाता है । अन्य चार इनसे उच्चतर हैं । जब ब्रह्मा रात्रि में शयन करते हैं, तो ये तीन लोकों (के अस्तित्व) समाप्त हो जाते हैं । इसे अवान्तर प्रलय कहते हैं । जब उनकी जीवन अवधि समाप्त होती है, तो अन्य चार सहित सभी लोक भी समाप्त हो जाते हैं ।
आधुनिक वैज्ञानिकों ने पाया है कि समय के साथ, अदृश्य रूप से, सूर्य की ऊष्मा कम होती जा रही है । सूर्य की ऊष्मा के बिना जीवन कायम नहीं रह सकता । खाद्य पदार्थों से लेकर, पृथ्वी पर जीवन के निर्वाह के लिए आवश्यक सभी वस्तुएँ, जैसे वर्षा, सभी सूर्य की ऊष्मा पर निर्भर हैं । अतः, यह गणना की गई है कि बहुत लंबे समय के बाद, करोड़ों वर्षों के बाद, संसार का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा । हमारी प्राचीन मान्यताओं और आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा संसार के अंत की गणना के अनुसार, अगला अवान्तर प्रलय काल के संदर्भ में कमोबेश संयोगवश है ।
इन गणनाओं के अनुसार, जब हम इस ब्रह्मांड की रचना के समय पर विचार करते हैं, तो हम कमोबेश उसी समय पर पहुँचते हैं जिसे वैज्ञानिक सृष्टि का समय मानते हैं ।
चूँकि ब्रह्मा के एक दिन के समय में चौदह मनु अपना शासन पूरा करते हैं, इसलिए एक मन्वंतर में ७१ चतुर्युग होते हैं । हमारे वर्तमान वैवस्वत मन्वंतर में, हम अभी २८वें चतुर्युग और उसके कलियुग में हैं । हमारा संकल्प इन सबका वर्णन करता है । यह उसके दिन और मिनट तक चलता है । यह सब समय की गणना के संदर्भ में है ।
संकल्प में उस भूमि का भी वर्णन है जिसमें हम रहते हैं । यह संपूर्ण ब्रह्मांड (जिसे ब्रह्मांड कहा जाता है) का वर्णन करता है और उस गाँव तक पहुँचता है जहाँ व्यक्ति रहता है । जिस प्रकार हम अपने पत्रों में स्थान और तिथि का उल्लेख करते हैं, उसी प्रकार हम अपने संकल्प में भी इनका उल्लेख करते हैं । ये सभी जटिल गणनाएँ ज्योतिष शास्त्र में हैं ।
अनुभवजन्य प्रमाण
सूर्य की किरणें किसी झोपड़ी की छत के एक छोटे से छेद से होकर फर्श पर दिखाई देती हैं । हमें नहीं पता कि अगले वर्ष वही किरण कहाँ पड़ेगी । लेकिन ज्योतिष शास्त्र के अनुसार की गई गणनाएँ उसी दिन का स्थान निश्चित कर देती हैं । प्राचीन काल में, राजा उन लोगों को पुरस्कृत करते थे जो एक धागे से मोती लटकाकर ज़मीन पर यह चिन्ह लगाते थे कि सूर्य की किरणें किस समय निर्दिष्ट स्थानों पर पड़ेंगी । अन्य विद्याओं में, व्यक्ति को मौखिक तर्कों द्वारा अपना पुरस्कार अर्जित करना पड़ता था, लेकिन ज्योतिष शास्त्र में व्यक्ति को अपने कौशल का भौतिक प्रदर्शन करना पड़ता था । इसलिए, धोखाधड़ी का कोई प्रश्न ही नहीं था । सूर्य और चंद्रमा उनके ज्ञान के साक्षी थे ।
हरिः हरः!!

1 Comment
Bahut neek jankari milal. Sabsan paigh baat eh je jao ehan lekh poora paidh lel jay t bahut kichh je nai gyat auchh se bujhba m avasya aabi jayat.
Ego baat eho suin mon ascharj bhel je Brahma k ek din (684 karor Varsha) m 14 manu apan raaj kelah.
“एको अश्वः वहति सप्तनामा”