वेदक उपांग – मीमांसा
उपांग मीमांसा
चारि टा वेद आ छह गोट वेदांगक बाद, १४ टा विद्या मे सँ शेष चारि टा केँ “उपांग” कहल जाइत छैक – यानि सहायक अथवा द्वितीयक अंग । ई थिक मीमांसा, न्याय, पुराण तथा धर्मशास्त्र ।
संयुक्त शब्द मीमांसा मे ‘मम्’ मूल अछि आर ‘सन्’ प्रत्यय अछि । एहि दुइ शब्दक अर्थ श्रद्धा योग्य विषय, यानि वेद, तेकर खोज (अन्वेषण) तथा गहन विश्लेषण अछि । वेदांग पर चर्चा करैत समय हम पहिनहिं देखि चुकल छी जे वेदक शाब्दिक अर्थ “निरुक्त” मे एकटा शब्दकोश जेकाँ देल गेल अछि । दोसर दिश, मीमांसा विभिन्न मंत्र सभक तात्पर्य तथा महत्व एवं वेद मंत्र सभक महत्वक बारे मे सही निष्कर्ष निकालबाक तरीका पर चर्चा करैत अछि ।
हम पहिने कहने रही जे वेदक दुइ गोट व्यापक वर्गीकरण अछि, कर्म कांड तथा ज्ञान कांड । चूँकि ई वेद शाखा केर प्रथम भाग मे अबैछ, तेँ कर्म कांड केँ पूर्व भाग या प्रारम्भिक भाग कहल जाइत छैक तथा ओकर बाद आबयवला दोसर भाग केँ उत्तर भाग या उत्तरार्द्ध कहल जाइत छैक । मीमांसा मे सेहो, पूर्व मीमांसा आ उत्तर मीमांसा नामक दुइ गोट एहने विभाग अछि ।
पूर्व मीमांसा वेदक कर्म कांड मे वर्णित यज्ञ व अनुष्ठान सभक महत्व पर बल दैत अछि, जखन कि उत्तर मीमांसा आत्म-साक्षात्कार केर महत्व पर बल दैत अछि, जे वेदक ज्ञान कांड केर मुख्य विषय थिक ।
उपनिषद आर ब्रह्म सूत्र केर चर्चा करैत समय हम पहिनहिं उत्तर मीमांसा पर चर्चा कएने छी । चूँकि उत्तर मीमांसा केँ सामान्यतः वेदांतक रूप मे जानल जाइत अछि, तेँ मीमांसा शब्द बिना कोनो उपसर्ग ‘पूर्व’ या ‘उत्तर’ केर केवल पूर्व मीमांसा टा केँ सन्दर्भित करैत अछि । हालाँकि, पूर्व मीमांसा पर चर्चा करिते हम सब एतय-ओतय उत्तर मीमांसा या वेदांत पर सेहो चर्चा करब ।
हम पहिने कहने रही जे प्रत्येक शास्त्रक लेल एकटा सूत्र, एकटा वार्तिक तथा एकटा भाष्य होइत अछि । पूर्व मीमांसाक सूत्र केर रचना या लेखन महर्षि जैमिनी कएने छथि । एकर भाष्य साबर द्वारा रचित छल तथा वार्तिक कुमारिल भट्ट द्वारा रचित छल । कुमारिल भट्ट केर “भट्ट दीपिका” पूर्व मीमांसा सूत्र सब पर सबसँ महत्वपूर्ण भाष्य अछि । कुमारिल भट्ट केँ भगवान सुब्रह्मण्यक अवतार मानल जाइत छन्हि । एकटा प्रभाकर द्वारा सेहो कुमारिल भट्ट सँ थोड़ेक भिन्न भाष्य लिखल गेल अछि । अतः पूर्व मीमांसाक मीमांसक या अनुयायी दुइ समूह मे अबैत छथिः एकटा कुमारिल भट्ट केर विचारक समर्थन करैत छथि आर दोसर प्रभाकरक विचार केँ । हमरा सब केँ एहि दुनू संस्करण मे निहित मतभेद सब पर अनावश्यक रूप सँ विचार करबाक आवश्यकता नहि अछि । आउ, पूर्व मीमांसाक सामान्य विषय-वस्तु पर एक नजरि दी ।
जैमिनीक पूर्वमीमांसा सूत्र बारह अध्यायवला एकटा विशाल ग्रन्थ छी । प्रत्येक अध्याय केर विभिन्न पाद सब मे तथा प्रत्येक पाद केँ विभिन्न अधिकरण सब मे विभाजित कयल गेल अछि । कुल १००० अधिकरण अछि, जाहि मे सँ प्रत्येक अधिकरण एकटा विषय सँ सम्बन्धित अछि । एहि प्रकार सँ १००० अधिकरण सब मे वर्णित विषय सभक संख्या सेहो एक हजार अछि । एहि अधिकरण सब मे, चयनित वैदिक वचन सभक विस्तार सँ परीक्षण कयल गेल अछि । वेद, जे सदा-सनातन आर अनादि अछि, ईश्वर द्वारा निर्धारित नियम थिक । हम सब प्रजा छी, ओ राजा छथि । ओ अनेकों अधिकारी नियुक्त कएने छथि । संपूर्ण सृष्टिक प्रशासन केर कार्य अनेकों देवता सब केँ सौंपल गेल अछि, जेना इंद्र, वायु, वरुण, अग्नि, यम, ईसान, कुबेर, निरुत्रि, आदि । चौदह लोकक सम्पूर्ण प्राणी पर शासन करबका लेल हुनका पास नियमक एकटा संहिता हेबाक चाही । यैह वेद मे निहित अछि । वेदक विश्लेषण कय केँ, हम सब ई निर्धारित कय सकैत छी जे हमरा सब केँ केना आचरण करबाक चाही आ देवता सब कोन तरहें नियम पालन करैत छथि । हमरा सभक दैनिक जीवन मे, सांसारिक विवाद सभक निपटारा न्यायाधी सब द्वारा कयल जाइछ । वकील सब देशक कानून मुताबिक सम्बन्धित मुद्दा केर विश्लेषण करैत छथि आ न्यायाधीश सब निर्णय दैत छथि । तहिना जैमिनी द्वारा वैदिक नियम सभक अर्थ आ निहितार्थ (उद्देश्य) सब निर्धारित कयल गेल अछि जे मनुष्य सभक कार्य केँ नियंत्रित करैत अछि । जखन कोनो विशेष स्थानक अदालत मे कोनो मामिला अबैत अछि, त लोक पूर्व (पहिलुका) उदाहरण सभक खोज करैत अछि – मानि लिय’, इलाहाबाद या बम्बइ आदि मे कोनो समान मामिला मे कि निर्णय भेल छल । न्यायाधीश विवादित बिन्दु सब पर निर्णय दैत समय पूर्व उदाहरण सब पर ध्यान दैत छथि तथा अधिकांश मामिला सब मे ओकरे अनुसरण करैत छथि । एहि प्रकारे, मीमांसा मे एक स्थान पर पाठ केर व्याख्या केँ दोसर स्थान सब पर सेहो समान रूप सँ लागू कयल जेबाक चाही । एहि प्रकार सँ, १००० अधिकरण सब मे एक हजार प्रकारक समस्या सब पर विचार कयल जाइछ आ कोनो स्पष्ट व्याख्याक विरूद्ध विभिन्न तर्क सब प्रस्तुत कयल जाइछ, तेकरा बादे कोनो निष्कर्ष पर पहुँचल जाइत अछि । विश्लेषणक यैह प्रक्रिया मीमांसा थिक । सबसँ पहिने एकटा वैदिक कथन लेल जाइत अछि – ई विषय वाक्य या विषयवस्तु होइछ । फेर प्रश्न उठैत अछि जे एकर अर्थ अमुक बात भेल; ई संशय (सन्देह) अछि, अर्थात सन्देह उठेनाय या समस्या प्रस्तुत कयनाय भेल । तेसर पक्ष एकरा विरूद्ध तर्क करब होइछ, जेकरा पूर्व पक्ष कहल जाइत छैक । चारिम पक्ष एहेन तर्क सभक खंडन करब अछि, जेकरा उत्तर पक्ष कहैत छैक । पाँचम आर अन्तिम चरण पक्ष-विपक्ष पर विचार कयलाक बाद एहि निष्कर्ष पर पहुँचब अछि जे अमुके बात वास्तविक अर्थ भेल । ई निर्णय भेल । कोनो विशेष विषय पर प्रत्येक निर्णय केँ अधिकरण मे वर्णन कयल जाइत छैक ।
जैमिनीक सूत्र संक्षिप्त अछि । ओहि मे निहित विचार सब केँ साबर केर भाष्य मे विस्तार सँ बतायल गेल अछि । ‘साबर’ शब्दक अर्थ ‘शिकारी-जनजाति’ सेहो होइछ । संन्यासिनी, शबरी (रामायण मे) केँ शिकारी-जनजाति सँ सम्बन्धित बतायल गेल अछि । एकटा पौराणिक कथाक अनुसार, जखन भगवान शिव अर्जुन केँ दिव्य अस्त्र, पाशुपतास्त्र, देबाक लेल एकटा शिकारीक रूप मे प्रकट भेलाह, त ओ एकटा ‘साबर’ या शिकारीक रूप धारण कयलनि आ तखन ई वार्तिक बनायल गेल ।
चूँकि एहि मे १००० अधिकरण अछि, तेँ पूर्व मीमांसा केँ “सहस्राधिकारणी” सेहो कहल जाइत छैक । ई अधिकरण वैदिक कथन सभक ओहि गलत व्याख्या सब केँ दूर करय मे मदति करैत अछि जे उद्देश्य व आशय पर आधारित वास्तविक अर्थक बजाय शब्दक शाब्दिक अर्थ पर आधारित भ’ सकैत अछि ।
जेना कि पहिनहिं उल्लेख कयल गेल अछि, जाहि प्रकारे पूर्व मीमांसा पूर्व काण्ड या कर्म काण्ड केर सटीक अर्थ निर्धारित करैत अछि, ताहि प्रकारे उत्तर मीमांसा उत्तर काण्ड या ज्ञान काण्ड केर अर्थ निर्धारित करैत अछि ।
उपनिषद परमात्मा या सर्वोच्च आत्मा आर अन्य सम्बन्धित विषय सब सँ सम्बन्धित अछि तथा ऋषि वेद व्यास टा ओ व्यक्ति रहथि जे अपन ब्रह्मसूत्र केर माध्यम सँ उपनिषद मे देल गेल कथन सभक अर्थ प्रतिपादित कएने रहथि । ई जननाय रोचक (दिलचस्प) अछि जे उत्तर मीमांसाक वार्तिक, जे ज्ञान काण्ड सँ सम्बन्धित अछि, लिखयवला लोक (व्यक्ति) सुरेश्वराचार्य छलथि । शंकराचार्यक शिष्य, जे अपन पूर्व आश्रम मे, अर्थात् संन्यासी बनय सँ पूर्व मे, जखन ओ “मंडन मिश्र” केर नाम सँ जानल जाइत छलथि, कर्मकाण्ड केर महानताक शपथ लयवला एकटा कट्टर पूर्व मीमांसक रहथि । यैह लोक बाद मे कर्म सँ ज्ञान केर दिशा मे अग्रसर भेलथि, आदि शंकराचार्यक शिष्य बनलथि आर ब्रह्मसूत्र पर शंकरभाष्य पर वार्तिक केर रचना कयलनि ।
सामान्यतः उत्तर मीमांसा सँ तात्पर्य वेदांत सँ अछि । वैदिक आस्था केँ ऊर्जावान बनाकय ओकरा सुदृढ़ करयवला शंकराचार्य केँ वेदक एकटा सहायक अंग मीमांसा (पूर्व मीमांसा) पर आपत्ति कियैक हेबाक चाहियनि ?
एहि प्रश्नक उत्तर दय सँ पहिने, हमरा सब केँ ई देखबाक चाही जे कोनो शास्त्रक उद्देश्य कि छैक, चाहे ओ मीमांसा हो या कोनो अन्य शास्त्र । परिभाषा अनुसार, एकटा शास्त्र केँ अन्ततः ईश्वर-साक्षात्कार दिश अग्रसर होयबाक चाही । हम पहिनहिं कहने रही जे हमरा सभक शास्त्र एहि दिशा मे उन्मुख अछि । एतय धरि कि व्याकरण, ध्वनिविज्ञान आदिक सेहो यैह लक्ष्य छैक । तेँ एकरा चौदह गोट विद्या मे शामिल कयल गेल अछि । आब आउ, देखी जे “पूर्व मीमांसा” कोन दर्शनक प्रतिपादन करैत अछि आर उत्तर मीमांसा या वेदान्त ईश्वर व ईश्वर-तत्वक बारे मे कि कहैत अछि तथा दुनू दृष्टिकोण मे केहेन अन्तर अछि ।
ईश्वर के छथि ? हुनकर गुण कि अछि ? हुनकर परिभाषा केना कयल जाइछ ? व्यास केर ब्रह्मसूत्र, जाहि पर शंकराचार्य अपन भाषा लिखलनि अछि, ईश्वर या भगवान केर बात करैत अछि । एहि मे कहल गेल अछि, “कर्ता शास्त्रार्थ तत्वात्” । एहि मे कहल गेल अछि जे ईश्वर समस्त प्रत्यक्ष अस्तित्वक कर्ता या रचयिता छथि । ई देखल जा सकैत छैक जे वैदिक धर्म सँ बाहरक धर्म सेहो ईश्वर केँ ‘कर्ता’ या रचयिता कहैत अछि । ईश्वर नहि केवल रचयिता छथि, बल्कि ओहो छथि जे हमरा सब केँ अपन नीक या बेजा कर्म सभक फल प्रदान करैत छथि ।
मीमांसक, अर्थात् ओ लोकनि जे पूर्व मीमांसा मत केर पालन करैत छथि आर जे मात्र वेदक कर्मकांड मे वर्णित कर्मकांडहि टा केँ महत्व व मान्यता दैत छथि, संसारक रचना मे ईश्वर या भगवानक भूमिका बारे मे मौन छथि । हुनका लेल ई कोनो वास्तविक महत्वक विषय नहि अछि । हुनका अनुसारे ईश्वर ‘फलदाता’ नहि छथि, जे कर्म सभक फल प्रदान करयवला आ नियामक छथि ।
एहि प्रकारे वेद आ ब्रह्मसूत्र मे वर्णित ईश्वर केर दुइ गोट गुण, अर्थात् प्रत्यक्ष ब्रह्मांड केर रचना तथा कर्मफल सभक नियमन, सांख्य द्वारा तथा मीमांसक सब द्वारा अस्वीकार कय देल गेल । मीमांसक लोकनिक ई मत रहनि जे ईश्वर फलदाता नहि छथि, कियैक तँ हुनका मुतािक, प्रत्येक कर्मक फल अवश्य होइत छैक, अर्थात ईश्वर चाहे जे कियो होइथ, प्रत्येक कर्मक फल अवश्य होइते टा छैक । हुनकर मानब रहनि जे वेद मे वर्णित कर्म सभक उचित पालन सँ पुण्य अवश्य प्राप्त होइत अछि आर खराब कर्म सभक फल अवश्ये टा खराब होइत अछि । एहि तरहें, हमरा सभक कर्म स्वतः फल प्रदान करैत अछि आर ईश्वर द्वारा कर्मफल सभक नियमन केर प्रश्ने नहि उठैत अछि । एहि तरहें, जाहि धर्म द्वारा वेदक पवित्रता केँ स्वीकार कयल गेल अछि, ताहि मे सांख्य द्वारा ईश्वर केँ सृष्टिकर्ता नहि मानल गेल अछि तथा मीमांसक लोकनि द्वारा एहि मान्यता केँ अस्वीकार कयल गेल अछि जे ईश्वर कर्मफल केर दाता छथि ।
मीमांसा सिद्धांत
मीमांसा सिद्धांतक बारे मे हम किछु कहय चाहब । मीमांसक लोकनिक तर्क एहि तरहक छन्हि । “हमरा सब केँ एहि बातक चिन्ता नहि करबाक चाही जे ईश्वर छथि या नहि । हुनका रहय दियौन या नहि रहय दियौन । हमरा सब केँ कि करबाक अछि, से वेद मे स्पष्ट रूप सँ बतायल गेल अछि । कोनो कार्य केँ करबाक अपन परिणाम होइत छैक कियैक तँ क्रियाक बाद हमेशा प्रतिक्रिया होइत छैक । तेँ कोनो मध्यस्थ ईश्वर केर कोनो आवश्यकता नहि अछि । हम सब केँ अपनहि बगीचा सँ अपन उपयोगक खातिर साग-सब्जी अनबाक लेल बाहर सँ कोनो सब्जी-विक्रेता केँ पैसा देबाक कोन जरूरत अछि ? ईश्वर केँ ओहि चीजक श्रेय देबाक कोनो जरूरी नहि अछि जे हुनकर सहायता या हस्तक्षेपक बिने कयल जाइत अछि । हम सब ज़मीन पर खेती करैत छी । परिणामस्वरूप फसल केर उपयोग भ’ जाइत अछि । ई सब सँ पैघ प्राप्य सुख थिक – जन्म-मरण सँ मुक्ति या मोक्ष द्वारा प्राप्त शाश्वत सुख थिक । लेकिन ‘अभ्युदय’ अपेक्षाकृत छोट स्तर केर सुख केँ सन्दर्भित करैत अछि । मीमांसा केवल एहि दोसर प्रकारक बात करैत अछि । मीमांसा ‘निश्रेयस’ या परम सुख केर बारे मे मौन अछि ।
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“सांख्य दर्शन अनुसार, ईश्वर या ईश्वर ब्रह्मांडक रचयिता या कर्ता नहि छथि । ईश्वर शुद्ध चेतना छथि आर ब्रह्मांड केवल भौतिक पदार्थ अछि, एहि लेल ईश्वर ब्रह्मांडक रचयिता नहि भ’ सकैत छथि । एहि तर्कक उत्तर शंकराचार्य दैते ई कहलनि अछि जे निर्गुण ब्रह्म सेहो गुण सहित ईश्वर या सगुण ब्रह्म केर रूप मे कार्य करैत छथि आर एना प्रतीत होइत अछि जे ओ ब्रह्माण्डक सृजन करैत छथि ।
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कार्य या क्रियाकलाप सँ अनुरूप परिणाम प्राप्त होइत अछि । यैह कर्म-मार्ग या कर्म-पथ थिक । शुभ कर्म कयला पर सुख भेटैत अछि आर नहि कयला पर दुःख । जखन नित्यकर्म नहि कयल जाइछ, त दुःख अवश्यम्भावी अछि ।
सन्ध्या वन्दना एकटा नित्यकर्म थिक जे प्रतिदिन कयल जेबाक चाही । कतेको लोक कहैत छथि, “हमरा पास समय नहि अछि आर हम एकर लाभ केँ छोड़बाक लेल तैयार छी ।” एकर मीमांसा उचित उत्तर दैत अछि । सन्ध्या वन्दन केवल नीक परिणाम प्राप्त करबाक लेल कयल जायवला कर्म नहि थिक । ई कोनो वैकल्पिक कर्म नहि थिक । दोसर दिश, मीमांसा कहैत अछि जे कर्म नहि कयला सँ दुःख होइछ । ई बुझय मे अबैत अछि जे कर्म कयला पर लाभकारी परिणाम भेटैत अछि । लेकिन ई कहनाय कहाँ तक तर्कसंगत अछि जे कर्म नहि कयला सँ दुःख या खराबी होइत छैक ? जखन सन्ध्या वन्दना नहि कयल जाइछ, त एकर खराब परिणाम होइछ, हालाँकि एकरा कयला सँ कोनो विशेष लाभ नहि होइछ । एहि तरहक कर्म “करणे प्रत्यवाय” केर श्रेणी मे अबैत अछि ।
जखन कोनो मन्दिर मे कोनो देवताक पूजा कयल जाइछ या गरीब सब केँ भोजन करायल जाइछ, त निश्चित रूप सँ नीक परिणाम भेटैत अछि । ई दोसर श्रेणी मे अबैत अछि, अर्थात “करणे अभ्युदय” । ई काफी हद तक उचित लगैत अछि ।
कि “करणे प्रत्यवाय” न्यायोचित अछि ? कि एहि संसार मे एकर कोनो उदाहरण अछि ? हँ, अछि । हम सब कोनो भिखारी केँ दान दैत छी । हम सब कोनो धर्मार्थ संस्था केँ एहि विश्वासक संग नीक दान दैत छी जे जरूरतमन्द लोकक लेल कयल गेल कोनो मदति या सेवा हमरा सब केँ पुण्य या प्रसन्नता दियाओत । कहियो-कहियो, हम सब मदति करय सँ विमुख भ’ जाइत छी । तखन हम सब एहेन पुण्य आर ओहि सँ भेटयवला प्रसन्नता केँ त्यागि दैत छी । हालांकि जरूरतमन्द सब केँ मदति करहे टा पड़ैत अछि, लेकिन हम सब हमेशा ई नहि सोचैत छी जे दानक रूप मे किछु नहि कय पेनाय निन्दनीय अछि ।
मानि लेल जाउ जे हम केकरो सँ ५०० टका कर्जा लेने रही आर एकटा निश्चित समयक बाद ओकरा वापस करबाक वादा केने रही । जखन ओ समय आयल, त मानि लेल जाउ जे हम ओहि व्यक्ति सँ कहलहुँः “हम अहाँ केँ हमरा ५०० टका देबाक श्रेय या पुण्य सँ वंचित नहि करय चाहैत छी । तेँ हमरा ओ टका वापस करबाक कोनो इरादा नहि अछि ।” ऋणदाता निश्चित रूप सँ सन्तुष्ट नहि होयत । ओ कहत जे ओकरा एहि तरहक पुण्य कमाय मे कोनो रुचि नहि छैक, आर ओ अपन पैसा वापस पेबाक लेल बेसी उत्सुक अछि । जँ आवश्यक भेल, त ओ ई मामिला अदालत धरि लय जायत आ नहि केवल अपन मूलधन (पैसा) वापस पेबाक प्रयास करत, बल्कि अदालत सँ किछु ब्याज दियेबाक सेहो अनुरोध करत । ई घटना ‘अकरणे प्रत्यवाय’ केर उदाहरण छी, अर्थात नहि कयला पर खराब परिणाम भेटत, नहि करबाक अर्थ अछि कर्जा नहि चुकेनाय । यैह उपमा ‘सन्ध्या-वन्दना’ पर सेहो लागू होइत अछि । जे व्यक्ति कहैत अछि जे ओ अपन कर्मक फलस्वरूप भेटयवला पुण्य केँ छोड़ि देत, से उपरोक्त उदाहरणक ऋणदाते जेकाँ अछि ।
ऋण केर उदाहरण देनाय शायद पर्याप्त नहि हो । आरो प्रश्न उठैत अछि । आउ एहि विषयक आरो अधिक जाँच करी । ऋण के आ कहिया लेलक ? सन्ध्या-वन्दना केर ऋण केकरा सँ लेल गेल ?
वेद मे, तैत्तरीय संहिता (६-३) कहैत अछि: “ब्राह्मण जन्महि सँ तीन प्रकारक ऋणक संग जन्म लैत अछि: ऋषि लोकनिक, देवता लोकनिक आर पितर लोकनिक । वेदक अध्ययन आर पाठ (अध्ययन) द्वारा ओ ऋषि लोकनिक ऋण चुकबैत अछि । यज्ञ व पूजा कयकेँ ओ देवता लोकनिक ऋण चुकबैत अछि । तर्पण आर श्राद्ध कयकेँ ओ पितर लोकनिक ऋण चुकबैत अछि । हमरा सब केँ नहि पता जे हम सब ऋण लेने रही आर हमरा सब पर ई ऋण अछि । वेद हमरा सब केँ बतबैत अछि जे हम सब नहि जनैत छी । हम सब एहि ऋण केर सम्भावित स्पष्टीकरण पर विचार करबाक चाही । जे लोक आस्थावान अछि, ओकरा एकटा उचित स्पष्टीकरण स्वयं द्वारा सुझायल जा सकैछ ।
मानि लेल जाउ दुइ भाइ अछि । एकटा मजिस्ट्रेट रहैत अछि आर दोसर पुरहित, यानी वैदिक पेशाक पालन करयवला पुजारी । पहिल केर कर्तव्य अछि जे ओ प्रतिदिन न्यायालय जाय आर मामिला सभक सुनवाई व निर्णय करय । यदि ओ आपत्ति करय आ कहय, ‘जखन हमर भाइ ओतय नहि जा रहल अछि त हम न्यायालय कियैक जाउ’, त उत्तर सरल अछि । “अहाँ नौकरी लेल आवेदन कयलहुँ आ अहाँक नियुक्ति भ’ गेल । अहाँ सेवा करबाक लेल सहमत भेलहुँ । तेँङ अहाँ केँ न्यायालय जेबाक चाही । ई अहाँक काज छी । अहाँक भाइ केर काज अलग अछि ।” एहि तरहें, हम सब पूर्व जन्म केर अपन कर्म सब द्वारा एहि जन्म मे उच्चतर स्तर वास्ते आवेदन कएने रही । एहि द्वारे एहि जन्म मे किछु कर्तव्य सभक पालन आवश्यक अछि । ई निर्देश दयवला नियुक्तिकर्ता हमरा सब केँ देखाय नहि दैत छथि, लेकिन हमरा लोकनिक सब कर्मक साक्षी होइत छथि । यैह वेदान्ती सभक सिद्धान्त थिक ।
दोसर दिश, मीमांसक लोकनि सिद्धान्त ई अछि जे जाहि नौकरीक लेल हम सब आवेदन कएने छी, तेकर फल स्वतःस्फूर्ते (अपने-आप) भेट गेल करैत अछि ।
हमरा लोकनिक पूर्व कर्म द्वारा एहि जन्म मे हमरा सभक जाति निर्धारित कयलक अछि । तेँ, हमरा सब केँ अपन कर्म सब केँ ओकरहि अनुसार नियमित रूप सँ करबाक चाही । यदि हम एना नहि करैत छी, त असुविधा अवश्य होयत, भले खराब परिणाम नहियो हो । हम सब जाहि कोनो अवस्था मे पैदा भेल छी, हमरा सब केँ ताहि अनुसारे अपन कर्तव्य सभक पालन करबाक चाही । वैदिक रीति-रिवाज तथा आचरण सब केँ संरक्षित आर पालन कयल जेबाक चाही । ब्राह्मणक कर्तव्य अछि जे ओ स्वयं वैदिक आदेश सब केँ सिखय, संकट मे पड़ल आरो लोक सब केँ शिक्षा व सान्त्वना प्रदान करय आ ई सुनिश्चित करय जे ओकरा सब अपन कर्तव्यक बोध होइक तथा ओ सब अपन जीवन स्तर अनुसार ओकर पालन करय । एहि प्रकारे, प्रत्येक व्यक्ति केँ अपन जन्मक अनुरूप कार्य करबाक चाही । तेली केँ तेलक उत्पादन तथा वितरण करबाक चाही । मोची केँ जूता बनेबाक आर ओकर मरम्मत करबाक चाही । ब्राह्मण केँ अपन खान-पान मे अत्यधिक संयम बरतबाक चाही जाहि सँ ओ तन, मन एवं आत्मा सँ शुद्ध रहय आर एहि तरहें अपन ऊर्जा ईश्वर-प्राप्ति पर केन्द्रित करय । ओकरा दोसरहु सब केँ ईश्वर दिश अपन विचार मोड़बाक लेल प्रेरित करबाक चाही । तेँ सब व्यवसाय आ पेशा केर लोक केँ भूमि दान मे देल जाइत छलैक । प्राचीन काल मे यैह प्रथा प्रचलित छलैक । यदि पैतृक व्यवसाय केँ त्यागि देल जा, त किछु असन्तुल अवश्य उत्पन्न होइक । पहिल कदम होइक जे दान मे भेटल जमीनक नुकसान, जे कियो दोसर केँ भेटि जेतैक जे ओहि व्यवसाय केँ अपनाओत । आइ-काल्हि ओहि जमीन सब पर सेहो भूमि-कर लगैत छैक । तेँ, पैतृक व्यापार छोड़ला सँ नहि केवल शास्त्रक अनुसार ‘पाप’ या दोष लगतैक, बल्कि आर्थिक कष्ट सेहो हेतैक । अतीत मे आ आइयो, कोनो कर्तव्यक पालन, जे कि जन्मसिद्ध अधिकार छलैक, एकटा निश्चित सामाजिक मान्यता आ सम्मानक संग होइत छलैक ।
चूँकि हम सब जन्म सँ अपेक्षित कर्तव्य सभक पालन नहि करैत छी, ताहि सँ हम सब ई देखैत छी जे हमर समाज दिन-प्रतिदिन क्षीण भेल जा रहल अछि । जाबत धरि प्रत्येक व्यक्ति अपन नियत कर्तव्यक पालन नहि करत, सामाजिक सुविधा सब उपलब्ध नहि हेतैक आर गरीबीक बोलबाला रहतैक । आइ यैह स्थिति अछि ।
जाबत धरि सन्ध्या वन्दन जेहेन कर्तव्य या नित्यकर्म नहि कयल जाइछ, ताबत धरि खराब या अशुभ परिणाम प्राप्त होइत अछि । यदि कयल जाय, तँ ओहि सँ पापक अभाव रूप मे लाभ प्राप्त होइत अछि । यदि समय पर ऋण चुका देल जाय त लोक केँ ऋणक बोझ सँ मुक्तिक लाभ भेटैत छैक आर संगहि ओकरा एकटा ईमानदार व्यक्ति होयबाक सौभाग्य सेहो प्राप्त होइत छैक जे अपन ऋण समय पर चुका दैत अछि । ई शुभ नामे ओ सद्भावना अछि जे व्यवसाय केँ बढ़बैत अछि । एहि तरहें, नित्यकर्म कयला सँ ई सुनिश्चित होइत अछि जे हमरा सब केँ कोनो पाप या खराबी नहि भेटय आर ई हमरा लोकनिक कल्याण (श्रेयस) मे वृद्धि करैत अछि । एहि तरहें, दोब्बर लाभ होइत अछि ।
वेदान्ती “करणे प्रत्यवाय” आर “करणे अभ्युदय” दुनू केँ स्वीकार करैत छथि । हमरो लोकनि स्वाभाविक रूप सँ ओकर पालन करैत छी ।
अतः नित्यकर्म सभक पालन अनिवार्य अछि । अग्निहोत्र जेहेन वैदिक आदेश आर उपासना जेहेन शास्त्रीय कर्म अवश्य करबाक चाही । वेद कहैत अछि जे जाबत धरि जीवन अछि, अग्निहोत्र अवश्य करबाक चाही । मीमांसक लोकनिक कहब छन्हि, “ई अवश्य करबाक चाही; यदि ई कय लेल जाय त पर्याप्त अछि ।” तेँ संन्यास आश्रम हुनका लोकनि केँ प्रिय नहि लगैत छन्हि । संन्यास आश्रम मे अग्निहोत्र आर एहेन कर्म सब व अनुष्ठान सभक पालन करबाक कोनो आवश्यकता नहि होइछ । मीमांसक लोकनिक अनुसार कर्मक नहि कयनाय आलस्य छी । कर्मक त्याग करब आर संन्यासी बनब अपन कर्तव्यक परित्याग करबाक समान अछि । ओ उपनिषद (ईशावास्य – दोसर मंत्र) पर भरोसा करैत छथि, जाहि मे कहल गेल अछि जे ‘मनुष्य केँ अपन नियत कर्तव्य सभक पालन करिते सौ वर्ष धरि जीवित रहबाक चाही ।’ तैत्तरीय ब्राह्मण कहैत अछि जे यदि अग्निहोत्र केँ मिझा देल जाय तँ “वीर हति दोष” नामक जघन्य पाप लगैत अछि । तेँ, मीमांसा सिद्धान्त कहैत अछि: “जेना खराब कर्म करय सँ पाप लगैछ, तहिना नित्यकर्म नहि करय सँ सेहो पाप लगैत अछि ।” एकटा संन्यासी कर्म-भ्रष्ट होइत अछि, जे अपना कर्तव्य सँ लापरवाह रहैत अछि । तेँ, मीमांसक लोकनिक यैह मानब छन्हि जे संन्यासी केँ देखनाइयो पाप थिक आर एहि वास्ते प्रायश्चित करबाक चाही । “पापी केँ देखनाय, ओकरा सँ बात कयनाय, ओकरा छूनाय आर ओकरा संग भोजन कयनाय, ई सब पाप थिक । एहि प्रकारे, हम सब केँ संन्यासि सब सँ बचबाक चाही ।” मंडन मिश्र आर मीमांसाक अन्य प्रतिपादक लोकनिक विचार एहने छलन्हि ।
वेदक ज्ञानकाण्डे संन्यास, अनन्त, मोक्ष, ज्ञान आदिक बात करैछ । ओकर प्रामाणिकता स्वयं वेद पर आधारित छैक । जखन एना छैक, तखन ओकर उपहास कियैक कयल जाइत छैक ? आउ देखी जे मीमांससक सब एहि पर कि कहैत छथि । ओ कहैत छथिः
“ई सत्य छैक जे उपनिषद मे ज्ञान आर परब्रह्मक उल्लेख अछि । वेद कि थिक ? वेद ध्वनि थिक, वाणी थिक । एकर रचना कियैक कयल गेल ? हमरा सब केँ ओहि चीजक बारे मे बतेबाक लेल जे हम सब नहि जनैत छी । यैह शब्द-प्रमाण थिक । ई हमरा सब केँ ओहेन चीज सब सँ अवगत करेबाक लेल अछि जेकरा हम सब अपन आँखि अथवा एतय धरि जे मनहुँ सँ निगमन केर प्रक्रिया द्वारा नहि बुझि सकैत छी । एकरा कोनो एहेन चीजक वर्ण करबाक लेल नहि बनायल गेल छल जे बेकार अछि । सब सभ्दक दुइ तरहक महत्व होइत छैक । शब्दक उद्देश्य ई बतेनाय अछि जे कि करबाक अछि आ कि नहि करबाक अछि ।”
प्रवृत्तिर्वा निवृत्तिर्वा नित्येन कृतकेना वा
पुंसां यो नोपदिश्येत तत् शास्त्रं अभिधीयते ॥
अर्थात्, जे शब्द बिना कोनो उद्देश्यहि केर कोनो विषयक वर्णन करैत अछि, ओ गपशप थिक; ओ मात्र ध्वनि टा उत्पन्न करैत अछि । ओकर कोनो उपयोग नहि छैक । यदि कियो कहैत अछि जे कौआ उड़ैत अछि, त एहि सँ सुनयवला केँ कि लाभ होइत छैक ? ई कथन जे कौआ कारी अछि, कोनो उपयोगी उद्देश्य पूरा नहि करैछ । दोसर दिश, यदि कियो कहैछ जे काल्हि राति एतय धार्मिक प्रवचन होयत, त एकर एकटा उद्देश्य छैक, एकटा सन्देश देनाय छैक । ई लोक केँ ओहि मे शामिल हेबाक लेल एकटा निमंत्रण या अभिप्रेरण थिक । फेर, यदि ई कहल जाय जे काल्हि कोनो दूर स्थान पर प्रवचन होयत, त एकर कोनो विशेष उद्देश्य नहि छैक कियैक त दूरी उपस्थिति केँ रोकैत अछि । तेँ, जे शब्द कोनो निश्चित उद्देश्यक पूर्ति नहि करैछ, ओ उद्देश्यहीन होइछ आर तेँ परहेज टा सर्वोत्तम अछि । ई कहियो-कहियो किछु जानकारी भले दय सकैछ, लेकिन एहेन जानकारीक कोनो उपयोग नहि होइछ ।
बाजल गेल शब्द सँ या त सकारात्मक कर्म केँ प्रोत्साहित करबाक चाही या फेर किछु (नकारात्मक) कर्म करय सँ बचबाक पूर्वाभास देबाक चाही । यदि पाँच प्रमुख पाप केर वर्णन कयल गेल अछि आर वेद हमरा सब केँ ओहि सँ बचबाक आदेश दैत अछि, त एहि मे “निवृत्ति प्रयोजनम्” केर गुण अछि, अर्थात परहेजक लाभ । लाभ ई छैक जे हम सब कोनो पाप सँ बचि जाइत छी आर एहि तरहें जीवन मे नीचाँ नहि खसैत छी । जाहि शब्दक एहि सब मे सँ कोनो टा उपयोग नहि छैक, से केवल गपशप आर बेकार होइत अछि ।
वेदक एकटा भाग बतबैत अछि जे कि करबाक चाही आ कि नहि करबाक चाही । दोसर भाग कथापिहानी (कहानी) आ दन्तकथा आदि बतबैत अछि, जे अपना आप मे भले बेसी उपयोगी नहि हो, लेकिन वैदिक आदेश (निर्देशन) सब सँ जुड़िकय अत्यधिक सार्थक भ’ जाइत अछि । एकटा स्वास्थ्य विज्ञापनक उदाहरण लेल जाउ । एहि मे एकटा आदमीक चित्र छैक जे बाघ सँ लड़ि रहल अछि । एहि चित्र केर कि महत्व छैक ? बस एतबे जे अहाँ अपन नगदी टका खर्च कय केँ टॉनिक कीनय लेल लोभा जाय । वैदिक कथा सब सेहो एहि तरहक, मुदा महान उद्देश्य पूरा करैत छैक कियैक तँ ओ वैदिक सिद्धान्त सब केँ स्वीकार करय मे सहायक छैक । कथाक भूमिका केँ “अर्थवाद” या परिणाम-उन्मुख दृष्टिकोण कहल जाइछ । दबाइ केर विज्ञापन सब मे प्रतिष्ठित डॉक्टर लोकनिक प्रमाण पत्र कियैक संलग्न रहैत छैक ? ताकि दबाइ केर व्यापक बिक्री भ’ सकैक । एहेन उद्देश्यपूर्ण प्रचार मे, कहियो-कहियो सत्य केँ थोड़ेक बढ़ा-चढ़ाकय प्रस्तुत कयल जाइत छैक । एहेन असत्य केँ “गुणवाद” कहल जाइत छैक । एकटा आरो वाद अछि जेकरा “अनुवाद” कहल जाइत छैक । ई ज्ञात सत्य सब केँ बेर-बेर अनुसरण करनाय थिकैक । ई त पहिनहिं सँ ज्ञात अछि जे आइग जरत, लेकिन एकरा दोहराबैत रहनाय अनुवाद थिक । गुणार्थवाद वैदिक आदेश सब केँ स्पष्ट आर स्वीकार्य बनेबाक लेल (तथ्य सँ भिन्न) कल्पनाक सेहो सहारा लैत अछि । “मदिरा नहि पिबू” वैदिक आदेश छी । यदि कोनो एहेन कहानी अछि जेकर विषय शराबीक विनाश छैक, त ओ अर्थवाद थिक । एकर तात्पर्य ई अछि जे शराब पिबय सँ बचबाक चाही । “मदिरा पिनाय खराब छैक । एहि सँ नशा होइत अछि ।” ई “अनुवाद” थिक । संक्षेप मे, सबटा कहानी सब जेकरा अर्थवाद कहल जा सकैत अछि, हमरा लोकनि केँ वैदिक आदेश सभक पालन करबाक लेल प्रेरित करैत अछि जाहि सँ हम सब बेहतर जीवन जिबि सकी ।
ज्ञानकाण्ड केर आपत्ति सभक प्रतिकार करबाक लेल मीमांसक कहैत छथि: “वेद मे एकटा विशेष यज्ञ या बलिदान केर वर्णन अछि । कहल गेल अछि जे दक्षिणाक रूप मे सोने टा अर्पित कयल जेबाक चाही, चाँदी नहि । तैत्तरीय संहिता मे सेहो कहल गेल अछि जे यज्ञ मे चाँदी अर्पित नहि कयल जेबाक चाही, लेकिन एहि निषेधाज्ञा केँ स्पष्ट करबाक लेल एकटा लम्बा कथा देल गेल अछि । ई कथा चाँदी देबाक दुष्प्रभाव सब सँ सम्बन्धित अछि आर एहि तरहें चाँदी नहि देबाक सन्देश दैत अछि । एहि प्रतिबन्धित करबाक बात केँ “निषेध” कहल जाइत अछि । आर जे करबाक होइत अछि से “विधि” कहाइछ । एहि तरहें, एहेन उद्देश्यपूर्ण कथा सब, यद्यपि स्वयं मे कोनो अन्तर्निहित गुण नहि रखैछ, तैयो ओकर एकटा निश्चित उद्देश्य या उपलब्धि हासिल करब होइत छैक ।”
एकरा अपन विषय केर रूप मे प्रयोग करिते, मीमांसक, जेना कि पहिने कहल गेल अछि, ज्ञानकाण्डक आपत्ति सभक प्रतिकार करैत छथि । ओ सब कहैत छथि: “उपनिषद केवल ब्रह्म स्वरूप केर बात करैत अछि – यानि परमपिता परमात्माक छवि केर । ओ आर कोनो काज केँ श्रेय नहि दैत अछि, ओ विषय केँ कोनो प्रकारक पूर्वानुमानक तहत नहि आनैत अछि । एना कहल जाइत अछि जे ईश्वर-अनुभव एकटा एहेन स्थिति अछि जाहि मे आर कोनो क्रिया शामिल नहि अछि । वेद कखन आ केना प्रमाण या अधिकार बनि जाइत अछि ? एकरा अधिकार केर रूप मे स्वीकार कयल जेबाक वास्ते एकरा सकारात्मक परिणामक स्थिति धरि लय जाय पड़त । तेँ, उपनिषद केवल अर्थवाद अछि, ई एकटा विषय केर रूप मे बात करैत अछि जेना ओ मौजूद अछि । आब, हमरा सब केँ ओ कियैक जनबाक अछि जे पहिनहिं सँ ज्ञात अछि या हमरा सब केँ एहि बारे मे शिक्षित हेबाक अछि जे कि करबाक अछि ? वेद “ब्रह्म मौजूद छथि, आत्मा सेहो ब्रह्म थिक” जेहेन घोषणा सब कय केँ हमरा सभक समझ केँ आगू नहि बढ़बैछ या हमरा सभक भलाइ मे योगदान नहि करैत अछि । तेँ, हमरा सब केँ यज्ञ आ अन्य वैदिक कर्म सब अवश्य करबाक चाही आर वेदक मुख्य उद्देश्य हमरा सब केँ ओ सब करबाक आदेश दैत अछि । तेँ शब्द (वेद) केर अस्तित्व अछि । कोनो पहिने सँ विद्यमान सत्ताक अस्तित्व केँ जनबाक लेल कोनो वैदिक ग्रंथ केर आवश्यकता नहि अछि । कोनो न कोनो समय मे ई ज्ञात हेब्बे टा करत । यदि एहेन सैद्धांतिक ज्ञान ज्ञात नहियो होय तैयो कोनो विशेष बात नहि । ताहि सँ, वेदक ओ भाग जे केवल प्रत्यक्ष सत्ताक निरूपण टा धरि सीमित अछि, केवल अर्थवाद थिक । तेँ, उपनिषद सब केँ प्रमाण नहि मानल जा सकैत अछि । ओकर उद्देश्य केवल यज्ञकर्ताक पद केँ ऊँच उठेनाय छैक । स्वभावहि सँ जीव या व्यक्तिगत आत्मा कर्म केर प्यासा होइत अछि आर एहि तरहें व्यक्ति अधिकाधिक कर्म करबाक लेल प्रेरित होइत अछि । कर्म करय सँ बचनाय गलत अछि । (वैदिक कर्म सभक प्रति कोनो दायित्व निभेने बिना) भिक्षुक (संन्यासी) बननाय सेहो गलत अछि । उपनिषद सब मे जीवक पहिचान ब्रह्म केर अर्थ केवल कर्म करयवला व्यक्ति केर प्रशंसा करब, ओकरा आरो बेसी प्रयास करबाक लेल प्रेरित करब आर एहि तरहें अनेकों लोक सब द्वारा करबाक वास्ते प्रचार करब अछि । जाहि तरहें कोनो लोक, सर्वोत्तम शक्तिवर्धक औषधिक सहायता सँ सेहो, बाघ सँ सफलतापूर्वक कुश्ती नहि लड़ि सकैछ, तहिना जीव सेहो ब्रह्म केर स्तर धरि कहियो नहि पहुँचि सकैछ । एहि तरहें, उपनिषद सभक स्वरूप अर्थवाद अछि । ब्रह्म, ज्ञान, मोक्ष आर ईश्वर जेहेन शब्द हमरा सभक लेल अधिक उपयोगी नहि अछि । कर्मे टा सब किछु थिक ।”
ई मीमांसक लोकनिक सिद्धान्त थिक ।
शंकर केर उत्तर
शंकर उत्तर मे कि कहैत छथि ?
शब्द (वेद) केर कर्म-प्रधान होयब आवश्यक नहि अछि । मीमांसक शब्द (वेद) केर पवित्रता केँ केवल वैह सीमा धरि स्वीकार करैत छथि जेतय धरि ओ विषय केर निश्चित निर्धारण दिश लय जाइत अछि । दोसर शब्द मे, ओ कहैत छथि जे कर्म सँ उत्पन्न परिणाम टा शब्द (वेद) केर तात्पर्य अछि आर एकर लक्ष्य केवल स्वयं मे या स्वयं केर वास्ते कर्म करब टा नहि थिक । किन्तु, यदि लक्ष्य एहेन अवस्था अछि जेतय कोनो कर्म नहि होइत छैक, तखन ओहि अवस्थाक वर्णन करयवला ज्ञानकाण्ड केँ प्रमाणक रूप मे स्वीकार कयल जेबाक चाही । दोसर शब्द मे, यदि वैदिक ग्रन्थ (शब्द) केर उद्देश्य एहेन अवस्था धरि लय जेबाक अछि जेतय अन्तिम परिणाम ‘कर्महीनता’ हो, त ई वेद केर आवश्यकता (मीमांसक लोकनिक अनुसार स्वीकार्य) केँ पूरा करैत अछि । तेँ, शब्द केर तात्पर्य कोनो निष्कर्ष पर पहुँचब हेबाक चाही, नहि कि केवल कर्म-बद्ध हेबाक चाही । वेद मदिरापान केर निषेध करैत अछि । एकर परिणामस्वरूप केहेन कर्म करब आवश्यक अछि ? किछु नहि । कि एकर अर्थ ई अछि जे शब्दक कोनो परिणामोन्मुखीकरण नहि छैक ? एकर उद्देश्य मदिरापान केर दुष्परिणाम सब केँ रोकब अछि । परन्तु एहि प्रकारक कर्म नहि कयल गेनाय केँ “अभाव” या निष्क्रियता कहल जाइत छैक । सब संयम (निषेध) केर तात्पर्य अभाव या भोग-विलास (आसक्ति) मे कमी कयनाय होइछ । मीमांसक सब सेहो वेदक एहि ज्ञान केँ स्वीकार करैत छथि जे अनेकों कर्म सब केँ निषेध करैत अछि । ओ सब ताहि कार्य सब सँ सेहो विरत रहैत छथि जेकरा वेद ‘निषेध’ कहैत अछि । अतः, यदि किछु निषेध, जे वास्तव मे कर्म नहि करबाक आदेश अछि, मीमांसक लोकनि केँ स्वीकार्य छन्हि, त ओ सब तार्किक रूप सँ ब्रह्मत्व केर ओहि अवस्था पर आपत्ति केना कय सकैत छथि जेतय कोनो प्रकारक कर्म नहि होइछ । आत्म-साक्षात्कारे सर्वोच्च पुरस्कार थिक, जाहि सँ कोनो प्रकारक कर्म सँ पूर्ण संयम प्राप्त होइत अछि । अतः वैदिक शब्द सब अर्थपूर्ण अछि । ओकरा केवल अर्थवाद कहिकय अस्वीकार नहि कयल जा सकैछ ।
भगवद्गीता मे भगवान कृष्ण कहैत छथि, “सर्वं कर्मखिलं पार्थज्ञाने परिसमाप्यते” । एकर अर्थ भेल जे सबटा कर्म अन्ततः ज्ञानहि दिश लय जाइत अछि आ ओहि मे विश्राम पबैत अछि । सब कर्म केँ परम भगवान दिश निर्देशित कयल जेबाक चाही । कोनो प्रकारक कर्म सँ पूर्ण संयम मात्र परम लक्ष्य थिक । यैह परम आनन्द या ब्रह्मानन्द थिक । फलस्वरूप जन्म-मृत्यु केर चक्र रुकि जाइत अछि । यैह वेदक परम सन्देश आ उद्देश्य अछि । सम्पूर्ण कर्म काण्ड केँ ज्ञान काण्ड दिश लय जेबाक चाही आ ओहि मे विलीन भ’ जेबाक चाही । तखनहिं कर्म काण्ड सार्थक होइत अछि ।
“वेद मे ‘कर्म’ (वैदिक क्रिया सब) केर लेल केवल कर्म काण्ड टा मे आदेश अछि, कियैक तँ एहि सँ मोन केँ शुद्ध आ अनुशासित करबाक (चित्त शुद्धि) केर सीमित उद्देश्य प्राप्त होइत अछि । यदि सब कर्म सँ विरत रहला सँ कर्म सँ लाख गुना अधिक फल प्राप्त भ’ सकैत अछि, त यैह वेदक पूर्णतम् उद्देश्य होयत । यैह ज्ञान काण्ड केर सन्देश थिक । किन्तु, वेदक ओ अंश जे कर्म सँ सम्बन्धित अछि, मानसिक शुद्धता उत्पन्न करय मे सहायक अछि आर ओहि मार्ग दिश लय जाइत अछि जे अन्ततः ईश्वर मे समाहित होइत अछि । एहि कारण ओ सार्थक भ’ जाइत अछि । तेँ, केवल कर्म केर अपना आप मे कोनो उद्देश्य नहि छैक । वेद ‘संन्यास आश्रम’ (भिक्षावृत्तिक जीवन) केर सर्वोच्चताक गुणगान करैत अछि, कियैक तँ ई ओ अवस्था थिक जे परमात्माक प्राप्ति पर प्रबल होइत अछि आर जे वास्तव मे परमात्मे केर अवस्था अछि । हमरा सभक प्रयास एहि अवस्था धरि पहुँचय केर हेबाक चाही ।”
कर्म काण्ड मे सेहो, वेद किछु कर्म केँ खराब परिणाम दिश लय जायवला मानिकय अस्वीकार करैत अछि । किन्तु एहेन कर्म कयला सँ किछु लोक केँ सुख या लाभ अवश्य भेटैत छैक । एहि कारण किछु लोक खराब कर्म सब मे लिप्त भ’ जाइत अछि । जे व्यक्ति एहेन कर्म नहि करैछ, ओ स्वयं केँ परिणामी लाभ या सुख सँ वंचित रखैत अछि । तैयो, वेद एहेन कर्म करय केँ निषेध करैत अछि । कियैक ? यद्यपि प्रारम्भ मे पाप कर्म अधिकांशतः इन्द्रियजन्य सुख व सन्तुष्टि प्रदान करैत अछि, किन्तु दीर्घकाल मे ओ हमर उच्चतर आनन्द या सुख सँ वंचित कय दैत अछि । ताहि द्वारे वेद हमरा सब केँ पाप कर्म सब सँ दूर रहबाक उपदेश दैत अछि । यद्यपि एहि लोक मे भौतिक समृद्धि अछि आर तेकर बाद पितृलोक तथा देवलोक मे निवास अछि, जेतय जीवन सुखद अछि आर दुःख नहि अछि, कि ई स्थायी निवास थिक ? कि सुख अनन्त अछि ? नहि । जहिना नीक कर्म सब सँ प्राप्त संचित पुण्य क्षीण भ’ जाइत अछि, सुख समाप्त भ’ जाइत अछि । पुण्य क्षीण भेलापर, ओ फेर पृथ्वी पर खसि पड़ैछ । भगवद्गीता कहैछ, “क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति” । यदि कोनो स्थायी कल्याण या अपरिवर्तनीय एवं पूर्ण सुख अछि, त ओ ओहेन अवस्था अछि जेकरा धरि ज्ञानी अनन्त मे विलीन भ’ कय आ सब प्रकारक कर्म सब सँ मुक्त भ’ कय पहुँचैत छथि । व्यक्ति केँ ओहेन कर्म सब सँ उपर उठबाक प्रयास करबाक चाही जे सीमित आ तुच्छ अवधि केर लेल सुख प्रदान कय सकैत अछि आर उच्चतर कर्म सब धरि पहुँचबाक प्रयास करबाक चाही । दोसर शब्द मे, व्यक्ति केँ वैदिक कर्म सब करबाक लेल अथक परिश्रम करबाक चाही, लेकिन यदि ओहि सँ पूर्ण आर निरन्तर सुख प्राप्त नहि होबय तँ ओकर कि उपयोग होयत ? त कि कियो एहि कारण सँ ओहेन कर्म सब केर त्याग कय सकैत अछि ?
कि कियो सीधे सीधे स्थायी सुख केर अवस्था धरि पहुँचि सकैत अछि ? नहि । एना नहि भ’ सकैछ । ज्ञानी या बुद्धिमान केर अवस्था तक एक्के बेर पहुँचनाय आसान नहि छैक । सबसँ पहिने, मोन केँ अशुद्धि सब सँ मुक्त करय पड़त । केवल कर्मे टा मोन केँ नियंत्रित राखि सकैत अछि, जे सदैव विचार सभक लहर सँ घेरायल रहैछ । ताहि द्वारे, कर्मकांडक निष्ठापूर्वक पालन करय पड़त । एना करैत समय, मोन केँ ओहि लाभ सब सँ विमुख करय पड़त जे एहेन कर्म प्रदान कय सकैत अछि, जेना सुख, स्वर्ग आदि । दोसर शब्द मे, कर्म करबाक अभ्यास कयलाक बाद, ओहि सँ उत्पन्न होयबला फल केँ जानि-बुझिकय परित्याग करबाक चाही । परिणामस्वरूप, मोनक स्वाभाविक अशुद्धि सब दूर भ’ जाइछ । यदि हम सचेतन आर सत्य मन सँ भगवान सँ प्रार्थना करी जे हम कर्म सब सँ भेटयवला फल नहि चाहैत छी आर स्वयं भगवाने केँ समर्पित करैत छी, त ओ हमरा मानसिक स्पष्टता आर पवित्रता, चित्त शुद्धि प्रदान करबाक लेल बाध्य हेता । तखनहि सँ, ज्ञान विचार – दार्शनिक अन्वेषण – केर यात्रा शुरू करब सम्भव होयत । ऐगला चरण कोनो प्रकारक गतिविधि सब सँ मुक्त भ’ कय, आनन्द केर शाश्वत अवस्था मे असगरे रहबाक अवस्था धरि पहुँचबाक होयत ।
वेदान्तिक सिद्धान्त व मीमांसा
जेतय धरि वैदिक कर्म सभक पूर्ण समर्थन कयल जाइत अछि, अद्वैत दर्शन नहि केवल मीमांसाक समर्थन करैत अछि, बल्कि मीमांसा सिद्धान्त द्वारा अपना समर्थन मे प्रस्तुत कयल गेल छह गोट प्रमाण (प्रमाण या प्रमाणक स्रोत) केँ सेहो अपना उपयोगक लेल स्वीकार करैत अछि ।
श्री शंकर केर अद्वैत, श्री रामानुज केर विशिष्टाद्वैत तथा श्री माधव केर द्वैत वस्तुतः वेदांतिक सिद्धान्त थिक । अद्वैत जेकाँ, आर दुइ गोट दर्शन सेहो वैदिक कर्म सभक पालन पर जोर दैत अछि । एहि द्वारे, एकटा सामान्य नियम केर रूप मे, एकटा सीमा तक, मीमांसाक सिद्धान्त तीनू वैदिक दर्शन केँ स्वीकार्य अछि ।
मीमांसक केर छह प्रमाण मे सँ, अद्वैतवादी सबटा केँ स्वीकार कयलनि अछि, आर विशिष्टाद्वैतवादी केवल तीनटा केँ स्वीकार कयलनि अछि, अर्थात् (१) प्रत्यक्ष, (२) अनुमान और (३) शब्द (वेद) । तैयो, ई तीनू मीमांसक लोकनिक छह प्रमाण मे सँ अछि । अम ऐगला उपांग, अर्थात् न्याय, पर विचार करैत समय प्रमाण केर भूमिका पर थोड़ेक विस्तार सँ चर्चा करब ।
सारांशतः, मीमांसा वेदान्तिक धर्म केर तीन मान्यता प्राप्त आचार्य लोकनि द्वारा पूरापूरी अस्वीकृत या अस्वीकार्य नहि अछि । मीमांसा केँ आधार मानिकय, व्यक्ति भक्ति केर अवस्था धरि पहुँचैत अछि, जे विशिष्टाद्वैत आर द्वैत केर आस्थाक साधन थिक, आर फेर अद्वैत ओकरा ज्ञान या परम सत्य ज्ञान केर अवस्था तक लय जाइत अछि ।
चूँकि कर्म केँ सर्वोच्च पुण्य मानल जाइत अछि, तेँ मीमांसा केँ सामान्यतः कर्म मार्ग या वैदिक कर्म केर मार्ग कहल जाइत अछि, लेकिन ई कर्म मार्ग ओहेन नहि अछि जेना वेदान्ती कर्म, भक्ति आ ज्ञान मार्गक उल्लेख करैत समय ध्यान मे रखैत छथि । कोनो वेदान्तिक सिद्धान्त कर्म केँ अपना आप मे एकटा साध्य या जेकरा आगाँ किछुओ करबाक आवश्यकता नहि अछि, नहि मानैत छथि । वेदान्ती सभक कर्म मार्ग या कर्म योग ई अछि जे कर्म वैदिक आदेश सभक अनुसार कयल जेबाक चाही, लेकिन बिना कोनो फल केर आशा केँ, आर कर्म भगवान केँ समर्पित हेबाक चाही ।
भगवान कृष्ण भगवद्गीता मे ई स्पष्ट रूप सँ कहने छथि । भगवानक भक्ति ओहि कर्तव्य या कर्म सँ अलग अछि जेकरा मीमांसा बिना कोनो समझौता केँ स्थापना करैत अछि । ई कर्म नहि केवल संसार मे समृद्धि व कल्याण अनैत अछि, बल्कि कर्ता केर मन (चित्त शुद्धि) केँ सेहो शुद्ध करैत अछि, जाहि सँ ओ भक्ति तथा ज्ञान केर उच्चतर अवस्था धरि पहुँच पबैत अछि । दोसर शब्द मे, मीमांसा जेकरा साध्य मानैत अछि, वेदान्त तेकरा साध्यक साधन मानैत अछि ।
हरिः हरः!!
THE UPAANGAS MEEMAAMSA
After the four Vedas and six Vedaangas, the remaining four out of the 14 Vidyas are called Upaangas – subsidiary or secondary limbs. These are Meemaamsa, Nyaaya, Puraana and Dharma Saastra.
In the compound word Meemaamsa, ‘Mam’ is the root, ‘San’ is the suffix. The meaning of these two words is an enquiry or deep analysis of a subject worthy of reverence namely the Vedas. We have already seen while dealing with Vedanga that the literal meaning of Vedas has been given as in a dictionary in “Nirukta”. Meemaamsa on the other hand deals with the purport and significance of the various mantras and how the correct conclusions have to be drawn regarding the significance of the Veda mantras.
I said earlier that the Vedas have two broad classifications, the Karma Kaanda and the Jnaana Kaanda. Since it appears in the first portion of a Veda Saakha, the Karma Kaanda is called the Poorva Bhaaga or the earlier portion and the other which appears thereafter is called the Uttara Bhaaga or the latter part. In Meemaamsa also, there are two such divisions namely, Poorva Meemaamsa and Uttara Meemaamsa.
Poorva Meemaamsa stresses the importance of sacrifices and rituals mentioned in the Karma Kaanda of the Vedas while Uttara Meemaamsa emphasises the importance of self-realisation, which is the main theme of the Jnaana Kaanda of the Vedas.
I have dealt with Uttara Meemaamsa earlier when talking of the Upanishads and the Brahma Sutras. Since Uttara Meemaamsa is usually known as Vedanta, the word Meemaamsa without any prefix ‘Poorva’ or ‘Uttara’ refers only to Poorva Meemaamsa. However, while dealing with Poorva Meemaamsa we will also be touching upon Uttara Meemaamsa or Vedanta here and there.
I had said earlier that, for every Saastra, there is a Sutra, a Vaartika and a Bhaashya. The Maharshi or sage who has written or composed the Sutra for the Poorva Meemaamsa is Jaimini. Its Bhaashya was authored by one Sabara and the Vaartika was written by Kumarila Bhatta. The Bhatta Dipika of Kumarila Bhatta is the most important commentary on the Poorva Meemaamsa Sutras. Kumarila Bhatta is believed to be an incarnation of Lord Subrahmanya. One Prabhaakara has also written a Bhaashya slightly differing from Kumarila. Hence the Meemaamsakas or followers of the Poorva Meemaamsa belong to two groups those supporting Kumarila Bhatt’s views and those supporting the views of Prabhaakara. We need not bother unduly with the differences involved in these two versions. Let us have a look at the general content of Poorva Meemaamsa.
The Poorva Meemaamsa sutra of Jaimini is a big book containing twelve chapters. Each chapter is further split into various padas and each paada into various Adhikaranas (अधिकरण). There are 1000 Adhikaranas in all each Adhikarana dealing with one subject. The number of subjects dealt with in the 1000 Adhikaranas thus number one thousand. In these Adhikaranas, selected Vedic utterances are examined in detail. Vedas which are eternal and without beginning and end are the laws laid down by God. We are the subjects, He is the king. He has appointed many officials. The task of administering the entire creation has been entrusted to many Devatas such as Indra, Vaayu, Varuna, Agni, Yama, Easaana, Kubera, Nirutri, etc. They must have a code of laws to govern all the beings in the fourteen worlds. This is contained in the Vedas. On analysing the Vedas, we can determine how we should conduct ourselves and how the Devatas enforce the rules. In our work-a-day world, the resolution of mundane disputes is done by judges. The lawyers analyse the issue involved as per the law of the land and the judges give the decision. Likewise Jaimini has determined the meaning and implications of the Vedic laws which govern the actions of men. When a case comes up before a court in a particular place, one looks for precedents – what was the judgement in a similar case in, say, Allahabad or in Bombay, etc. The judge takes note of and in most cases follows precedents while giving decisions on disputed points. Similarly, in Meemaamsa the interpretation of the text at one place should be consistently carried over to other places. Thus, in the 1000 Adhikaranas a thousand types of problems are taken up and various arguments against an apparent explanation are raised before coming to a conclusion. This process of analysis is meemaamsa. First a Vedic utterance is taken up – this is Vishaya Vaakya or subject matter. Then the question is raised whether its meaning is such and such; this is Samsaya (संशय) or raising of doubts or posing the problem. The third is to argue against it which is Poorva Paksha. The fourth is to rebut such arguments and that is called Uttara Paksha. The fifth and final step is to come to a conclusion after considering the pros and cons that such and such is the real meaning. This is Nirnaya or decision. Each Nirnaya on a particular subject is dealt with in an Adhikarana.
Jaimini’s sutras are concise. The ideas therein are elaborately spelt out in Sabara’s Bhaashya. The word ‘Sabara’ also means a hunter-tribe. The sanyaasini, Sabari (in Ramayana) was said to belong to the hunter-tribes. According to a legend, when Lord Siva appeared as a hunter to give the divine weapon, Paasupataastra, to Arjuna, he took the form of a ‘Sabara’ or hunter and made this Vaartika.
Since it contains 1000 adhikaranas the Poorva Meemaamsa is also called Sahasraadhikarani (सहस्राधिकरणी). These Adhikaranas help to resolve the wrong interpretations that may be given to the Vedic utterances based on the literal meaning of words instead of their real meaning based on the purpose and intention.
As mentioned earlier, just as Poorva Meemaamsa determines the exact meaning of the Poorva Kaanda or Karma Kaanda, the Uttara Meemaamsa determines the meaning of the Uttara Kaanda or Jnaana Kaanda.
The Upanishads deal with the Paramaatma or the Supreme self and other connected matters and Sage Veda Vyasa was the person who propounded the meaning of the pronouncements in the Upanishad through his Brahmasutra. It is interesting to know that the person who wrote the Vaartika to Uttara Meemaamsa which pertains to the Jnaana Kaanda was Sureshwaraachaarya. the disciple of Sankaracharya who in his earlier Aashrama, i.e.. before he became a Sanyaasi when he was known as Mandana Misra, was a staunch Poorva Meemaamsaka swearing by the greatness of Karma Kanda. The same person later shifted from karma to jnaana, became the disciple of Adi Sankaracharya and wrote the Vaartika on Sankara Bhaashya on the Brahmasutra.
Generally, by Uttara Meemaamsa is meant Vedanta. Why should Sankaracharya who energised the Vedic faith and put it firmly on its feet, object to Meemaamsa (Poorva Meemaamsa) which is one of the subsidiary limbs of the Vedas?
Before we answer this question, we should examine what the objective is of a discipline, be it Meemaamsa or any other Saastra. A Saastra by definition should ultimately lead one to progress in God-realisation. I said earlier that all our Saastras are so oriented. Even grammar, phonetics, etc. have the same goal. That is why they have been included in the fourteen vidyas. Now let us see what philosophy Poorva Meemaamsa propounds and what the Uttara Meemaamsa or Vedanta says about God and the God-principle and what is the difference between the two approaches.
Who is God? What are His attributes? How is He defined? The Brahmasutra of Vyasa on which Sankaracharya has written his Bhaasha or commentary talks of Isvara or God. It says “Karta Saastraartha Tatwaat” (कर्ता शास्त्रार्थ तत्वात्). It says that Isvara is the Karta or creator of all phenomenal existence. It may be seen that even religions that are outside the Vedic faith also refer to God as ‘Karta’ or Maker. Isvara is not only the creator but also the one who metes out to us the fruits of our actions, good and bad.
The Meemaamsakas, ie those who follow the Purva Meemaamsa school and who give credence and importance only to the ritualistic performance mentioned in the Karma Kaanda of the Vedas, are silent as to the role of Isvara or God in the creation of the world. For them this is not a matter of any real significance. According to them Isvara is NOT the ‘Phala Daata: (फल दाता) the bestower of the fruits of actions and the regulator.
Thus the two attributes of Isvara mentioned in the Vedas and Brahmasutra viz. creation of the phenomenal universe and the regulation of the results of one’s karma were negated, the former by the Saankhyas and the latter by Meemaamsakas. The reason why Meemaamsakas held the view that God was not the Phala Daata was that, in their opinion, every act carried its fruit with it, that any action had a corresponding reaction irrespective of Isvara. They believed that the proper performance of Karmas as prescribed in the Vedas are certain to yield Punya or merit and that bad deeds will certainly yield bad results. Thus, our actions would throw up the consequences automatically and the question of Isvara, regulating it does not arise. Thus, among those faiths which have accepted the sanctity of the Vedas, Sankhya has not accepted that God is the creator and Meemaamsa has rejected the assumption that He is the bestower of the just results of an action or karma.
The Meemaamsa Doctrines
Let me say something about the Meemaamsa doctrines. The arguments of the Meemaamsakas go like this. “Let us not worry whether God exists or not. Let him be or let him not be. What we are to do is clearly laid down in the Vedas. The very performance of an act carries its result as action is always followed by reaction. There is thus no need for an intermediary God. Why should we pay a vegetable monger from outside to collect the vegetable from our garden for our own use? There is no need to give credit to Isvara for something which is done without his help or interference. We cultivate the land. As a result the crop is used. This is the biggest attainable happiness eternal happiness brought about by liberation or Moksha from births and deaths. But Abhyudaya refers to happiness of a relatively minor order. Meemaamsa talks only of this latter type. Meemaamsa is silent about the Nisreyas or the happiness supreme.
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“According to the Sankhya School, God or Isvara is not the creator or Karta of the universe. Isvara being pure consciousness and the universe being only physical matter, Isvara cannot be the creator of the universe. This argument is met by Sankaracharya pointing out that the attributeless Brahman also functions as Isvara with attributes or Saguna Brahman and appears to create the universe.
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Work or activity yields commensurate results. This is the Kar-ma Maarga or the path of action. Good action when performed, leads to happiness and when not performed, leads to misery. When Nityakarma is not done, misery is bound to result.
Sandhya Vandana is a nityakarma which has to be performed daily. Many say, “we have no time and we are prepared to forgo its benefits.” To this, Meemaamsa gives a fitting reply. Sandyaavan-dana is not an act performed for the sake of merely getting good results. It is not an optional karma. On the other hand, non-performance will lead to misery, says Meemaamsa. It is understan-dable that an act when performed leads to beneficial results. But where is the logic in saying that misery or evil results from the non-performance of an act? When Sandhyaavandana is not done, there are bad results though its performance will not lead to special benefits. This type of karma belongs to the category of “akaranay prathyavaaya” (अकरणे प्रत्यवाय).
When Puja is performed for a deity in a temple or when food is served to the poor, definite good results are bound to follow. These belong to the other category, viz. “karanay abhyudhaya” (करणे अभ्युदय). This looks reasonable enough.
Is “akaranay pratyavaaya” justifiable? Is there any example here in this world to illustrate it? Yes, there is. We give alms to a beggar. We give handsome donations to a charitable organisation in the faith that any help or service rendered to the needy would bring us merit or punya which will bring us happiness. Sometimes, we feel disinclined to help. Then we forgo such punya and the resultant happiness. Though one has to help the needy, one does not always think that failure to do more in the shape of charity is to be condemned.
Supposing we had taken a loan of Rs.500/- with a promise to return the amount after a specified time. When that time came, supposing we told the man: “I do not wish to deprive you of the credit or Punya of having given me Rs.500/-. And so I have no intention of returning it.” The lender will certainly be not satisfied. He would say that he is not interested in earning that type of Punya, and that he is very keen on getting back his money. He would take the matter to court if necessary and not only would he try to recover his money but in addition he would request that the court should award some interest too. This incident is illustrative of ‘akaranay prathyavaaya’ ie. non-performance will yield bad results, non-performance meaning non-repayment. This analogy applies to ‘Sandhyaa-Vandana’ also. The person who says he will forgo the punya which will accrue as a result of its performance is like the borrower in the above example.
It may not be enough to cite the example of a debt. Further questions arise. Let us examine the matter further. Who borrowed and when? From whom was the debt of Sandhyaa-Vandana incurred?
In the Vedas, Taittareeya Samhita (6-3) says: “By birth Brahmins are born with three types of debts, to the Rishis or sages, to the Gods and to the ancestors. By a study and recitation of the Vedas, Adhyayana, he repays the debt to Rishis. By performance of yajnas and poojas, he repays the debt to Gods. By performing “Tarpana’ and “Shraaddha”, he repays the debt to the Pitrus or the ancestors. We do not know that we had borrowed and that we owe these debts. Vedas tell us about what we do not know. We must think over the possible explanation for these debts. To those who have faith, a plausible explanation would suggest itself.
Let us say there are two brothers. One is a magistrate and the other a Purohit, i.e. a priest pursuing the Vedic profession. The former has a duty to go to the court every day and hear and decide cases. If he demurs and says, ‘why should I go to the court when my brother is not going there’, the answer is simple. “You applied for the job and you got appointed. You agreed to serve. Therefore, you should go to the court. That is your job. Your brother’s job is different.” Similarly, we had by our Karma in earlier births applied for a higher level of existence in this life. This entails the performance of certain duties in this birth. The appointing authority who gives these instructions is not visible to us but is a witness (Saakshi) to all our actions. This is the doctrine of the Vedantins.
The doctrine of the Meemamsakas on the other hand is that the job to which we applied gives the results automatically by itself.
Our earlier karmas have decided our caste in this birth. We should, therefore, regulate our actions in accordance therewith. If we do not do so, inconvenience, if not bad results, would follow. In whatever condition we were born, we should perform duties accordingly. The observance and practices (Vedic in origin) should be preserved and followed. It is the duty of the brahmin first to learn the Vedic injunctions himself, comfort and bring solace to others in distress and ensure that they are made aware of the duties and made to perform them as appropriate to their station in life. Likewise, everyone should do the jobs appropriate to his birth. The oil-monger should produce and purvey oil. The cobbler should make and mend shoes. The brahmin should observe great restraint in his food habits so as to be clean in body, mind and soul and thus concentrate his energies on God-realisation. He should influence others also to turn their thoughts towards God. That is why gifts of land were distributed to people of all trades and professions. This was the practice in the olden days. If the ancestral profession is abandoned, certain imbalances are bound to result. The first step would be the loss of the land gift which will go to somebody else who will be following the trade. These days even those lands are subject to land tax. Therefore, abandoning the ancestral trade would not only result in ‘Paapa’ or sin according to the Saastras but would cause material hardship too. In the past and until recent times, the performance of a duty which was one’s birthright also carried with it a certain social recognition and regard.
Since we do not perform the duties which are required of us by birth, we find our society deteriorating day by day. Unless each one performed his appointed duties, social amenities will not be available and poverty will rule. That is the position today.
Unless the duties or nityakarma like Sandhyaavandana are performed, bad or evil results follow. If performed, they result in gain in the form of absence of evil. If a debt is repaid in time, one has the benefit of being without the burden of the debt and, in addition, earn the good name of being an honest man who repays his debt promptly. This good name is the goodwill which builds up business. Likewise, the performance of nityakarma ensures that no paapa or evil accrues to us and it adds to our well-being (sreyas). Thus, there is twofold benefit.
The Vedantins accept both the “akaranay prathyavaaya” and “karanay abhyudhaya.” We also naturally abide by them.
Thus, the nityakarmas must necessarily be performed. The Vedic injunctions like Agni Hotra, and the Saastraic karmas like Oupasana must be performed without fail. The Vedas say that Agni Hotra must be performed so long as life lasts. “It should be done; it is enough if it is done,” say the Meemaamsakas. That is why the sanyaasa aashram finds no favour with them. In sanyaasa aashram, there is no requirement for performance of Agni Hotra and such karmas and rituals. According to the Meemaamsakas non-performance of karmas is a dereliction. Giving up karmas and becoming a sanyaasi is like abandoning one’s duties. They rely on the Upanishad (Isavaasya – 2nd Mantra) which says that ‘a man must live for a hundred years performing his appointed duties’ The Taittareeya Braahmana says that if the Agnihotra fire is allowed to be extinguished the heinous sin called “vira hatti dosha” results. The Meemaamsa doctrine, therefore, says: “Just like performance of a bad deed results in sin, the non-performance of a nityakarma also results in sin.” A sanyaasi is a karma-bhrashta (कर्म भ्रष्ट) one who is derelict in his duty. Hence, the Meemamsakas even considered that even to see a sanyasi is evil and one must atone for it. “To see a paapi, to talk to him, to touch him and to eat with him, all are paapa or evil. Likewise, we should avoid sanyaasis.” Such were the views of Mandana Mishra and other exponents of Meemaamsa.
The Jnaana Kaanda of the Vedas alone talk of Sanyaasa, the In-finite, Liberation (Moksha) Jnaana (Knowledge) etc. Their authenticity is based on the Veda itself. That being so, why are they derided? Let us see what the Meemaamsakas say to this. They say:
“It is true that jnaana and Para Brahman are mentioned in the Upanishads. What is the Veda? Veda is sound, speech. Why was it created? To tell us about things we do not know. That is the sabda-pramaana (शब्द प्रमाण). This is to make us aware of things not grasped through the eye or even the mind by process of deduction. It was not designed to describe something which is of no use. All words have a two-fold significance. The purport of words is to communicate what is to be done and what is not to be done.’
Pravrittirva nivrittirva nityena kritakena va
Pumsaam yo nopadisyeta tat saastram abhidheeyatay
प्रवत्तिर्वा निवृत्तिर्वा नित्येन कृतकेन वा।
पुंसां यो नोपदिश्येत तत् शास्त्रं अभिधीयते।।
That is, words that describe a subject without a purpose are gossip; they merely create sounds. They are of no use. If someone says that the crow flies, what good does it do to the hearer? The statement that the crow is black has no useful purpose to serve. On the other hand, if someone says that tomorrow night there will be religious discourse here, it has an end to serve, a message to convey. It is an invitation or an inducement for people to attend it. Again, if it is said that there will be a discourse tomorrow in a distant place, it does not serve much purpose as distance precludes attendance. Therefore, words which do not serve a definite end are purposeless and, therefore, are best avoided. They may convey sometimes information but such information has no use.
The spoken word should either promote positive action or presage avoidance of action. If the five cardinal sins are described and the Veda enjoins us to refrain therefrom, this has the merit of “nivritti prayojanam” ie. benefit of abstaining. The gain is avoidance of committing any sin and thereby going down in life. Words which have neither of these uses are mere gossip and are useless.
One part of the Vedas spells out what has to be done and what has to be avoided. The other part tells stories and fables etc. which though by themselves are not of much use, because they are juxtaposed with the Vedic injunctions become highly meaningful. Take the example of a health advertisement. There is a picture of a man grappling with a lion. What is the significance of this picture? No more than that you would be tempted to part with your cash and buy the tonic. The Vedic stories serve a similar but nobler purpose as they are conducive to the acceptance of the Vedic doctrines. The role of the story is known as “Artha Vaada” or result-oriented approach. Why do advertisements regarding medicines carry certificates of merit from reputed doctors? So that the medicine may have wide sales. In such purposeful campaigning. sometimes truth is stretched a little too far. Such untruth is called “guna vaada”. There is another vaada called “anuvaada”. This is following up the known truths repetitively. That fire will burn is already known, but to repeat it is anuvaada. Gunarthavada is resor-ting even to fiction (as distinct from fact) to illustrate and make acceptable the Vedic injunctions. “Do not drink liquor” is the Vedic injunction. If there is a story whose theme is the destruction of the drunkard, it is arthavaada. The purport is that drinking is to be avoided. “Drinking is bad. It produces intoxication” is “anuvaada”. In short, all stories which can be described as arthavaada are designed to make us follow Vedic injunctions so that we may lead better lives.
To counter the objections of Jnaana Kaanda the Meemaamsakas say: “The Vedas describe a certain yajna or sacrifice. It is said that gold should be offered as dakshina and not silver. The Taittareeya Samhita also says that silver should not be offered in sacrifice but it tells a long story to press home the injunction. This story deals with the evil effects of giving silver and thus carries the message of abstaining from giving silver. This prohibition is called “nishedha”. What has to be done is “vidhi” or injunction. Thus, such purposeful stories, although having no intrinsic merit in themselves, have a definite end to serve or purpose to achieve.”
Using this as their theme, the Meemaamsakas counter the objections of the Jnaana Kaanda, as earlier stated. They say: “The Upanishads talk only of the Brahma Swaroopa – the image of the ultimate. They do not attribute any function, they do not bring the subject under any type of predication. It is said that God-experience is a state where no action is involved. When and how does Veda become pramaana or authority? It has to lead to a state of positive result for it to be accepted as authority. Therefore, the Upanishad is only Arthavaada it talks of a subject as it exists. Now, why do we have to know what is already known or do we have to be educated on what has to be done? The Vedas do not advance our understanding or contribute to our well-being by making pronouncements such as “Brahman exists; the Aatma is also Brahman.” Therefore, we must perform sacrifices and other Vedic karmas and the prime object of the Vedas is to enjoin us to do them. That is why Sabda (Veda) exists. It does not require a Vedic text to know about the existence of a being which already exists. At some time or other it will come to be known. It does not even matter very much if such theoretical knowledge is not known. Therefore, that part of the Vedas which confines itself to the enunciation of phenomenal existence is mere Arthavaada. Therefore, the Upanishads do not qualify to be regarded as pramaana. Their aim is merely to exalt the stature of the performer of sacrifices. By nature, the Jiva or the individual soul is thirsting for action and thus the individual is spurred to the performance of more and more karma. To refrain from doing karma is wrong. To become a mendicant (without any obligation to the performance of Vedic karmas) is also wrong. The identification in the Upanishads of the Jiva with the Brahman is merely to extol the individual who performs the karma and to stimulate him to greater effort and thus propagate the performance of the action by many. Just as no man, even with the help of the best tonic, can wrestle successfully with a lion, the Jiva can never reach the level of the Brahma. Thus, the Upanishads are in the nature of Arthavaada. Words such as Brahman, knowledge, Moksha and Isvara have not much use for us. Karma is all in all.”
This is the doctrine of the Meemaamsakas.
Sankara’s reply
What does Sankara say in reply?
It is not necessary for Sabda (Veda) to be action-oriented. The Meemaamsakas accept the sanctity of Sabda (Veda), only to the extent that it leads to a definite predication of the subject. In other words, they say that the result flowing from action is the purport of the Sabda (Veda) and the goal is not merely action in itself or for itself. But, if the goal is a state where no action prevails, then the Jnaana Kaanda which describes that state should be accepted as pramaana. In other words, if the aim of the Vedic text (Sabda) is to lead to a stage where the end result is ‘no action’, it fulfills the requirement of Veda (as acceptable to Meemaamsakas). Therefore, the purport of sabda should be to lead to a conclusion and not merely be action-bound. The Vedas prohibit consumption of liquor. What is the action that is required to be done as a consequence? Nothing. Does this mean that the sabda has no result-orientation? Its purpose is to prevent the ill-effects following consumption of liquor. But this kind of inaction is termed as abhaava, or quiescence. The purport of all restraints (nishedha) is abhaava or lack of indulgence. Even the Meemaamsakas accept the wisdom of Vedas which puts a ban on a number of actions. They also refrain from doing things which the Vedas declaim as ‘nishedha. Therefore, if some of the prohibitions which in effect are injunctions not to act are acceptable to the Meemaamsakas, how can they logically object to the state of being Brahman where no kind of activity prevails. Realisation of the self is the highest reward, whereby there is total abstinence from any kind of activity. The Vedic sabdas are therefore all meaningful. They cannot be rejected as mere arthavaada.
“Sarvam Karmaakhilam Paartha jnanay parisamaapyathay” (सर्वकर्माखिलं पार्थज्ञाने परिसमाप्यते) says Lord Krishna in Bhagavad Gita. This means that all karmas ultimately lead to and find their rest in Jnaana or knowledge. All activity should be directed towards the supreme Lord. Total abstinence from any kind of activity is the ultimate goal. It is the supreme bliss or Brahmaananda. As a result, the birth-death cycle is stopped. This is the supreme message and purpose of the Vedas. The whole of Karma Kaanda should lead to and merge with the Jnaana Kaanda. Only then the former becomes meaningful.
“The Vedas contain injunctions for ‘Karma’, (Vedic activities) in the Karma Kaanda only, because the limited purpose of purifying and disciplining the mind (Chitta Suddhi) is obtainable thereby If abstinence from all activity could lead to a result a million times more than what karma could provide, then this would be the fullest objective of the Vedas. This is the message of the Jnaana Kaanda. But, those portions of the Vedas which deal with karma are helpful in creating mental purity and lead to the road which ultimately ends in Isvara. Because of this, they become meaningful. Mere karma in itself, therefore, has no purpose to it. The Vedas extol the ‘supremacy of the sanyaasa aashrama’ (life of mendicancy) as the stage which prevails on realisation of the Paramaatma and which indeed is the state of the Paramaatma. It should be our endeavour to reach this state.”
Even in the Karma Kaanda itself, the Vedas reject certain karmas as leading to bad ends. But by doing such act, there does appear to be some pleasure or profit for some. It is because of this some people indulge in bad acts. One who does not perform such acts denies himself the resultant profit or pleasure. Still, the Vedas prohibit their performance. Why? Although initially, sinful acts bestow pleasure and satisfaction mostly sensual, in the long run, they preclude us from partaking of the higher bliss or happiness. That is why the Vedas exhort us to eschew sinful karmas. Though there is material prosperity in this world and, thereafter, residence in Pitru Loka and Deva Loka, where life is pleasant and sorrows are absent, are these permanent abodes? Are the pleasures endless? No. As soon as the accumulated merit resulting from good acts is exhausted, the pleasures end. After exhausting the punya, they have to fall back to earth. “Ksheenay punyay martyalokam visanti” (क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति) says the Bhagavad Gita. If there is any lasting well-being or unchanging and complete happiness, it is the stage which the Jnaani reaches by merging with the Infinite and being free from any kind of activity. One must try to rise above the karmas which can bestow happiness for a limited and trifling period and try to reach up to the higher karmas. In other words, one must unflaggingly perform the Vedic karmas but then what use would they be if one cannot earn the total and continuous hap-piness thereby? Therefore, can one give up these karmas on this score?
Can one go direct to the stage of permanent happiness? No. One cannot. It is not easy to get to the stage of Jnaani or a wise one all at once. First, the mind should be cleansed of impurities. Kar-ma alone is able to hold the mind in line which is for ever beset by waves after waves of thoughts. Therefore, the ritualistic karmas have to be faithfully performed. In so doing, one must turn the mind away from the benefits which such karmas can bestow, e.g., pleasures, heaven, etc. In other words after practicising to do the karma, the reward arising therefrom should be deliberately eschewed. As a result, the impurities which are natural to the mind are removed. If we consciously and sincerely pray to the Lord that we do not want the reward normally flowing from the karmas and dedicate them to the Lord Himself, He is bound to bless us with mental clarity and purity Chitta Suddhi. From then on, it will be possible to begin the journey of Jnana Vichara – philosophical enquiry. The next stage would be to reach the state of being free from any kind of activity and be by oneself in a perpetual state of bliss.
Vedantic doctrines and Meemaamsa
To the extent that the Vedic karmas are totally favoured, the Ad-vaitic philosophy not only supports Meemaamsa but goes along with it further in accepting for its own use the six pramaanas (authorities or articles of proof) which the Meemaamsic doctrine posits in its own support.
Shri Sankara’s Advaita, Shri Ramanuja’s Vishistaadvaita and Shri Madhva’s Dvaita are verily Vedantic doctrines. Like the Ad-vaita, the other two philosophies also insist on the performance of Vedic karmas. Therefore, as a general rule, upto a point, the doctrine of Meemaamsa is acceptable to all the three Vedic philosophies.
Of the six pramaanas of the Meemaamsakas, the Advaitins have accepted all, and the Visishtaadhvaitins have accepted only three of them, viz. (1) Pratyaksha, (2) Anumaana and (3) Sabda (Vedas). Nevertheless these three are from the six of the Meemaamsakas. I will slightly elaborate the role of pramaanas when dealing with the next Upaanga, namely Nyaaya.
Summing up, Meemaamsa is not totally discredited by or unac-ceptable to the three recognised Acharyas of the Vedantic faith. Using Meemaamsa as the base, one reaches the stage of bhakti (devotion) which is the instrument of faith of Visishtaadvaita and Dvaita, and then Advaita takes it up further to the stage of Jnaana or True knowledge absolute.
Since karma is regarded as the summum bonum, Meemaamsa is generally called the Karma Maarga or the path of Vedic activi-ty, but this Karma Maarga is not the same as the one which the Vedantists have in mind when they refer to the Karma, Bhakti, Jnaana Maargas. None of the Vedantic doctrines regard karma as an end in itself or beyond which nothing is required to be done. The karma maarga or the karma yoga of the Vedantins is that kar-ma should be done as per Vedic injunctions but without expecta-tions of any reward, which should be dedicated to the Lord
Lord Krishna has pointedly said this in the Bhagavad Gita. Devo-tion to the Lord is divorced from the duty or karma which Meemaamsa uncompromisingly postulates. These karmas not only bring prosperity and well-being to the world but also cleanses the mind of the performer (Chitta Suddhi), thereby enabling him to reach the higher stages of bhakti (devotion) and jnaana (true knowledge). In other words, what Meemaamsa regards as the end, the Vedanta regards as means to an end.
Harih Harah!!
उपांग मीमांसा
चार वेदों और छह वेदांगों के बाद, १४ विद्याओं में से शेष चार को उपांग कहा जाता है – सहायक अथवा द्वितीयक अंग । ये हैं मीमांसा, न्याय, पुराण और धर्मशास्त्र ।
संयुक्त शब्द मीमांसा में ‘मम्’ मूल है और ‘सं’ प्रत्यय है । इन दोनों शब्दों का अर्थ श्रद्धा के योग्य विषय, अर्थात् वेदों, का अन्वेषण या गहन विश्लेषण है । वेदांग पर चर्चा करते समय हम पहले ही देख चुके हैं कि वेदों का शाब्दिक अर्थ “निरुक्त” में एक शब्दकोश की तरह दिया गया है । दूसरी ओर, मीमांसा विभिन्न मंत्रों के तात्पर्य और महत्व तथा वेद मंत्रों के महत्व के बारे में सही निष्कर्ष निकालने के तरीके पर चर्चा करता है ।
मैंने पहले कहा था कि वेदों के दो व्यापक वर्गीकरण हैं, कर्म कांड और ज्ञान कांड । चूँकि यह वेद शाखा के प्रथम भाग में आता है, इसलिए कर्म कांड को पूर्व भाग या प्रारंभिक भाग कहा जाता है और उसके बाद आने वाले दूसरे भाग को उत्तर भाग या उत्तरार्द्ध कहा जाता है । मीमांसा में भी, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा नामक दो ऐसे विभाग हैं ।
पूर्व मीमांसा वेदों के कर्म कांड में वर्णित यज्ञों और अनुष्ठानों के महत्व पर बल देती है, जबकि उत्तर मीमांसा आत्म-साक्षात्कार के महत्व पर बल देती है, जो वेदों के ज्ञान कांड का मुख्य विषय है ।
उपनिषदों और ब्रह्म सूत्रों की चर्चा करते समय मैंने पहले उत्तर मीमांसा पर चर्चा की है । चूँकि उत्तर मीमांसा को सामान्यतः वेदांत के रूप में जाना जाता है, इसलिए मीमांसा शब्द बिना किसी उपसर्ग ‘पूर्व’ या ‘उत्तर’ के केवल पूर्व मीमांसा को ही संदर्भित करता है । हालाँकि, पूर्व मीमांसा पर चर्चा करते हुए हम यहाँ-वहाँ उत्तर मीमांसा या वेदांत पर भी चर्चा करेंगे ।
मैंने पहले कहा था कि प्रत्येक शास्त्र के लिए एक सूत्र, एक वार्तिक और एक भाष्य होता है । पूर्व मीमांसा के सूत्र की रचना या लेखन महर्षि जैमिनी ने किया है । इसका भाष्य सबर द्वारा रचित था और वार्तिक कुमारिल भट्ट द्वारा रचित था । कुमारिल भट्ट की भट्ट दीपिका पूर्व मीमांसा सूत्रों पर सबसे महत्वपूर्ण भाष्य है । कुमारिल भट्ट को भगवान सुब्रह्मण्य का अवतार माना जाता है । एक प्रभाकर ने भी कुमारिल से थोड़ा भिन्न एक भाष्य लिखा है । अतः पूर्व मीमांसा के मीमांसक या अनुयायी दो समूहों में आते हैं: एक कुमारिल भट्ट के विचारों का समर्थन करते हैं और दूसरे प्रभाकर के विचारों का । हमें इन दोनों संस्करणों में निहित मतभेदों पर अनावश्यक रूप से विचार करने की आवश्यकता नहीं है । आइये पूर्व मीमांसा की सामान्य विषय-वस्तु पर एक नजर डालें ।
जैमिनी का पूर्वमीमांसा सूत्र बारह अध्यायों वाला एक विशाल ग्रंथ है । प्रत्येक अध्याय को विभिन्न पादों में तथा प्रत्येक पाद को विभिन्न अधिकरणों में विभाजित किया गया है । कुल १००० अधिकरण हैं, जिनमें से प्रत्येक अधिकरण एक विषय से संबंधित है । इस प्रकार १००० अधिकरणों में वर्णित विषयों की संख्या एक हजार है । इन अधिकरणों में, चयनित वैदिक वचनों का विस्तार से परीक्षण किया गया है । वेद, जो सदा-सनातन और अनादि हैं, ईश्वर द्वारा निर्धारित नियम हैं । हम प्रजा हैं, वह राजा हैं । उन्होंने अनेक अधिकारी नियुक्त किए हैं । संपूर्ण सृष्टि के प्रशासन का कार्य अनेक देवताओं को सौंपा गया है, जैसे इंद्र, वायु, वरुण, अग्नि, यम, ईसान, कुबेर, निरुत्रि, आदि । चौदह लोकों के सभी प्राणियों पर शासन करने के लिए उनके पास नियमों की एक संहिता होनी चाहिए । यह वेदों में निहित है । वेदों का विश्लेषण करके, हम यह निर्धारित कर सकते हैं कि हमें कैसा आचरण करना चाहिए और देवता किस प्रकार नियमों का पालन करते हैं । हमारे दैनिक जीवन में, सांसारिक विवादों का निपटारा न्यायाधीशों द्वारा किया जाता है । वकील देश के कानून के अनुसार संबंधित मुद्दे का विश्लेषण करते हैं और न्यायाधीश निर्णय देते हैं । इसी प्रकार जैमिनी ने वैदिक नियमों के अर्थ और निहितार्थ निर्धारित किए हैं जो मनुष्यों के कार्यों को नियंत्रित करते हैं । जब किसी विशेष स्थान की अदालत में कोई मामला आता है, तो व्यक्ति पूर्व उदाहरणों की तलाश करता है – मान लीजिए, इलाहाबाद या बंबई आदि में किसी समान मामले में क्या निर्णय हुआ था । न्यायाधीश विवादित बिंदुओं पर निर्णय देते समय पूर्व उदाहरणों पर ध्यान देते हैं और अधिकांश मामलों में उनका अनुसरण करते हैं । इसी प्रकार, मीमांसा में एक स्थान पर पाठ की व्याख्या को अन्य स्थानों पर भी समान रूप से लागू किया जाना चाहिए । इस प्रकार, १००० अधिकरणों में एक हजार प्रकार की समस्याओं पर विचार किया जाता है और किसी स्पष्ट व्याख्या के विरुद्ध विभिन्न तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं, उसके बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है । विश्लेषण की यह प्रक्रिया मीमांसा है । सबसे पहले एक वैदिक कथन लिया जाता है – यह विषय वाक्य या विषयवस्तु है । फिर प्रश्न उठता है कि क्या इसका अर्थ अमुक है; यह संशय है, अर्थात संदेह उठाना या समस्या प्रस्तुत करना । तीसरा पक्ष इसके विरुद्ध तर्क करना है, जिसे पूर्व पक्ष कहते हैं । चौथा पक्ष ऐसे तर्कों का खंडन करना है, जिसे उत्तर पक्ष कहते हैं । पाँचवाँ और अंतिम चरण पक्ष-विपक्ष पर विचार करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचना है कि अमुक ही वास्तविक अर्थ है । यह निर्णय है । किसी विशेष विषय पर प्रत्येक निर्णय का अधिकरण में वर्णन किया जाता है ।
जैमिनी के सूत्र संक्षिप्त हैं । उनमें निहित विचारों को सबर के भाष्य में विस्तार से बताया गया है । ‘सबर’ शब्द का अर्थ शिकारी-जनजाति भी है । संन्यासिनी, सबरी (रामायण में) को शिकारी-जनजाति से संबंधित बताया गया है । एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान शिव अर्जुन को दिव्य अस्त्र, पाशुपतास्त्र, देने के लिए एक शिकारी के रूप में प्रकट हुए, तो उन्होंने एक ‘सबर’ या शिकारी का रूप धारण किया और यह वार्तिक बनाया ।
चूँकि इसमें १००० अधिकरण हैं, इसलिए पूर्व मीमांसा को सहस्राधिकारणी भी कहा जाता है । ये अधिकरण वैदिक कथनों की उन गलत व्याख्याओं को दूर करने में मदद करते हैं जो उद्देश्य और आशय पर आधारित वास्तविक अर्थ के बजाय शब्दों के शाब्दिक अर्थ पर आधारित हो सकती हैं ।
जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, जिस प्रकार पूर्व मीमांसा पूर्व काण्ड या कर्म काण्ड का सटीक अर्थ निर्धारित करती है, उसी प्रकार उत्तर मीमांसा उत्तर काण्ड या ज्ञान काण्ड का अर्थ निर्धारित करती है ।
उपनिषद परमात्मा या सर्वोच्च आत्मा और अन्य संबंधित विषयों से संबंधित हैं और ऋषि वेद व्यास ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने अपने ब्रह्मसूत्र के माध्यम से उपनिषद में दिए गए कथनों का अर्थ प्रतिपादित किया था । यह जानना दिलचस्प है कि उत्तर मीमांसा की वार्तिक, जो ज्ञान काण्ड से संबंधित है, लिखने वाले व्यक्ति सुरेश्वराचार्य थे । शंकराचार्य के शिष्य, जो अपने पूर्व आश्रम में, अर्थात् संन्यासी बनने से पहले, जब वे मंडन मिश्र के नाम से जाने जाते थे, कर्मकाण्ड की महानता की शपथ लेने वाले एक कट्टर पूर्व मीमांसक थे । यही व्यक्ति बाद में कर्म से ज्ञान की ओर अग्रसर हुए, आदि शंकराचार्य के शिष्य बने और ब्रह्मसूत्र पर शंकर भाष्य पर वार्तिक की रचना की ।
सामान्यतः उत्तर मीमांसा से तात्पर्य वेदांत से है । वैदिक आस्था को ऊर्जावान बनाकर उसे सुदृढ़ करने वाले शंकराचार्य को वेदों के एक सहायक अंग मीमांसा (पूर्व मीमांसा) पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए ?
इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले, हमें यह देखना चाहिए कि किसी भी शास्त्र का उद्देश्य क्या है, चाहे वह मीमांसा हो या कोई अन्य शास्त्र । परिभाषा के अनुसार, एक शास्त्र को अंततः ईश्वर-साक्षात्कार की ओर अग्रसर होना चाहिए । मैंने पहले कहा था कि हमारे सभी शास्त्र इसी दिशा में उन्मुख हैं । यहाँ तक कि व्याकरण, ध्वनिविज्ञान आदि का भी यही लक्ष्य है । इसीलिए इन्हें चौदह विद्याओं में शामिल किया गया है । अब आइए देखें कि पूर्व मीमांसा किस दर्शन का प्रतिपादन करती है और उत्तर मीमांसा या वेदांत ईश्वर और ईश्वर-तत्व के बारे में क्या कहता है और दोनों दृष्टिकोणों में क्या अंतर है ।
ईश्वर कौन है ? उसके गुण क्या हैं ? उसकी परिभाषा कैसे की जाती है ? व्यास का ब्रह्मसूत्र, जिस पर शंकराचार्य ने अपनी भाषा या भाष्य लिखा है, ईश्वर या भगवान की बात करता है । इसमें कहा गया है, “कर्ता शास्त्रार्थ तत्वात्” । इसमें कहा गया है कि ईश्वर समस्त प्रत्यक्ष अस्तित्व का कर्ता या रचयिता है । यह देखा जा सकता है कि वैदिक धर्म से बाहर के धर्म भी ईश्वर को ‘कर्ता’ या रचयिता कहते हैं । ईश्वर न केवल रचयिता है, बल्कि वह भी है जो हमें हमारे अच्छे और बुरे कर्मों का फल प्रदान करता है ।
मीमांसक, अर्थात् वे जो पूर्व मीमांसा मत का पालन करते हैं और जो केवल वेदों के कर्मकांड में वर्णित कर्मकांडों को ही महत्व और मान्यता देते हैं, संसार की रचना में ईश्वर या भगवान की भूमिका के बारे में मौन हैं । उनके लिए यह कोई वास्तविक महत्व का विषय नहीं है । उनके अनुसार ईश्वर ‘फलदाता’ नहीं है, जो कर्मों के फल प्रदान करने वाला और नियामक है ।
इस प्रकार वेदों और ब्रह्मसूत्र में वर्णित ईश्वर के दो गुण, अर्थात् प्रत्यक्ष ब्रह्मांड की रचना और कर्मफलों का नियमन, सांख्यों द्वारा और मीमांसकों द्वारा अस्वीकार कर दिए गए । मीमांसकों का यह मत था कि ईश्वर फलदाता नहीं है, क्योंकि उनके अनुसार, प्रत्येक कर्म का फल अवश्य होता है, अर्थात् ईश्वर चाहे जो भी हो, प्रत्येक कर्म का फल अवश्य होता है । उनका मानना था कि वेदों में वर्णित कर्मों के उचित पालन से पुण्य अवश्य प्राप्त होता है और बुरे कर्मों का फल अवश्य ही बुरा होता है । इस प्रकार, हमारे कर्म स्वतः ही फल प्रदान करते हैं और ईश्वर द्वारा कर्मफलों के नियमन का प्रश्न ही नहीं उठता । इस प्रकार, जिन धर्मों ने वेदों की पवित्रता को स्वीकार किया है, उनमें सांख्य ने ईश्वर को सृष्टिकर्ता नहीं माना है और मीमांसकों ने इस मान्यता को अस्वीकार किया है कि ईश्वर कर्मफलों का दाता है ।
मीमांसा सिद्धांत
मीमांसा सिद्धांतों के बारे में मैं कुछ कहना चाहूँगा । मीमांसकों के तर्क इस प्रकार हैं । “हमें इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि ईश्वर है या नहीं । उसे रहने दो या न रहने दो । हमें क्या करना है, यह वेदों में स्पष्ट रूप से बताया गया है । किसी भी कार्य के करने का अपना परिणाम होता है क्योंकि क्रिया के बाद हमेशा प्रतिक्रिया होती है । इसलिए किसी मध्यस्थ ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं है । हमें अपने बगीचे से अपने उपयोग के लिए सब्ज़ी लाने के लिए बाहर से किसी सब्ज़ी विक्रेता को पैसे क्यों देने चाहिए ? ईश्वर को उस चीज़ का श्रेय देने की कोई आवश्यकता नहीं है जो उसकी सहायता या हस्तक्षेप के बिना की जाती है । हम ज़मीन पर खेती करते हैं । परिणामस्वरूप फसल का उपयोग हो जाता है । यह सबसे बड़ा प्राप्य सुख है – जन्म-मरण से मुक्ति या मोक्ष द्वारा प्राप्त शाश्वत सुख । लेकिन अभ्युदय अपेक्षाकृत छोटे स्तर के सुख को संदर्भित करता है । मीमांसा केवल इसी दूसरे प्रकार की बात करती है । मीमांसा निश्रेयस या परम सुख के बारे में मौन है ।
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“सांख्य दर्शन के अनुसार, ईश्वर या ईश्वर ब्रह्मांड का रचयिता या कर्ता नहीं है । ईश्वर शुद्ध चेतना है और ब्रह्मांड केवल भौतिक पदार्थ है, इसलिए ईश्वर ब्रह्मांड का रचयिता नहीं हो सकता । इस तर्क का उत्तर शंकराचार्य ने देते हुए कहा कि निर्गुण ब्रह्म भी गुणों सहित ईश्वर या सगुण ब्रह्म के रूप में कार्य करता है और ऐसा प्रतीत होता है कि वह ब्रह्माण्ड का सृजन करता है ।
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कार्य या क्रियाकलाप से अनुरूप परिणाम प्राप्त होते हैं । यही कर्म-मार्ग या कर्म-पथ है । शुभ कर्म करने पर सुख मिलता है और न करने पर दुःख । जब नित्यकर्म नहीं किया जाता, तो दुःख अवश्यंभावी है ।
संध्या वंदना एक नित्यकर्म है जो प्रतिदिन किया जाना चाहिए । कई लोग कहते हैं, “हमारे पास समय नहीं है और हम इसके लाभों को छोड़ने को तैयार हैं ।” इसका मीमांसा उचित उत्तर देते हैं । संध्यावंदन केवल अच्छे परिणाम प्राप्त करने के लिए किया जाने वाला कर्म नहीं है । यह कोई वैकल्पिक कर्म नहीं है । दूसरी ओर, मीमांसा कहते हैं कि कर्म न करने से दुःख होता है । यह समझ में आता है कि कर्म करने पर लाभकारी परिणाम मिलते हैं । लेकिन यह कहना कहाँ तक तर्कसंगत है कि कर्म न करने से दुःख या बुराई होती है ? जब संध्या वंदना नहीं की जाती, तो इसके बुरे परिणाम होते हैं, हालाँकि इसके करने से कोई विशेष लाभ नहीं होता । इस प्रकार का कर्म “करणे प्रत्यवाय” की श्रेणी में आता है ।
जब किसी मंदिर में किसी देवता की पूजा की जाती है या गरीबों को भोजन कराया जाता है, तो निश्चित रूप से अच्छे परिणाम मिलते हैं । ये दूसरी श्रेणी में आते हैं, अर्थात् “करणे अभ्युदय” । यह काफी हद तक उचित लगता है ।
क्या “करणे प्रत्यवाय” न्यायोचित है ? क्या इस संसार में इसका कोई उदाहरण है ? हाँ, है । हम किसी भिखारी को दान देते हैं । हम किसी धर्मार्थ संस्था को इस विश्वास के साथ अच्छा दान देते हैं कि ज़रूरतमंदों के लिये की गई कोई भी मदद या सेवा हमें पुण्य या खुशी दिलाएगी । कभी-कभी, हम मदद करने से विमुख हो जाते हैं । तब हम ऐसे पुण्य और उससे मिलने वाली खुशी को त्याग देते हैं । हालाँकि ज़रूरतमंदों की मदद करनी ही होती है, लेकिन हम हमेशा यह नहीं सोचते कि दान के रूप में कुछ न कर पाना निंदनीय है ।
मान लीजिए हमने ५०० रुपये का ऋण लिया था और एक निश्चित समय के बाद उसे वापस करने का वादा किया था । जब वह समय आया, तो मान लीजिए हमने उस व्यक्ति से कहा: “मैं आपको ५०० रुपये देने के श्रेय या पुण्य से वंचित नहीं करना चाहता । इसलिए मेरा उसे वापस करने का कोई इरादा नहीं है ।” ऋणदाता निश्चित रूप से संतुष्ट नहीं होगा । वह कहेगा कि उसे उस प्रकार का पुण्य कमाने में कोई रुचि नहीं है, और वह अपना पैसा वापस पाने के लिए बहुत उत्सुक है । यदि आवश्यक हुआ, तो वह मामले को अदालत में ले जाएगा और न केवल अपना पैसा वापस पाने का प्रयास करेगा, बल्कि अदालत से कुछ ब्याज भी दिलाने का अनुरोध भी करेगा । यह घटना ‘अकरणे प्रत्यवाय’ का उदाहरण है, अर्थात न करने पर बुरे परिणाम मिलेंगे, न करने का अर्थ है न चुकाना । यही उपमा ‘संध्या-वंदना’ पर भी लागू होती है । जो व्यक्ति कहता है कि वह अपने कर्म के फलस्वरूप मिलने वाले पुण्य को छोड़ देगा, वह उपरोक्त उदाहरण के ऋणदाता जैसा ही है ।
ऋण का उदाहरण देना शायद पर्याप्त न हो । और भी प्रश्न उठते हैं । आइए इस विषय की और जाँच करें । ऋण किसने और कब लिया ? संध्या-वंदन का ऋण किससे लिया गया ?
वेदों में, तैत्तरीय संहिता (६-३) कहती है: “ब्राह्मण जन्म से ही तीन प्रकार के ऋणों के साथ पैदा होते हैं: ऋषियों का, देवताओं का और पितरों का । वेदों के अध्ययन और पाठ (अध्ययन) द्वारा वह ऋषियों का ऋण चुकाता है । यज्ञ और पूजा करके वह देवताओं का ऋण चुकाता है । तर्पण और श्राद्ध करके वह पितरों का ऋण चुकाता है । हमें नहीं पता कि हमने ऋण लिया था और हम पर ये ऋण हैं । वेद हमें वह बताते हैं जो हम नहीं जानते । हमें इन ऋणों के संभावित स्पष्टीकरण पर विचार करना चाहिए । जो लोग आस्थावान हैं, उनके लिए एक उचित स्पष्टीकरण स्वयं ही सुझाया जा सकता है ।
मान लीजिए दो भाई हैं । एक मजिस्ट्रेट होता है और दूसरा पुरोहित, यानी वैदिक पेशे का पालन करने वाला पुजारी । पहले का कर्तव्य है कि वह प्रतिदिन न्यायालय जाए और मामलों की सुनवाई और निर्णय करे । यदि वह आपत्ति करे और कहे, ‘जब मेरा भाई वहाँ नहीं जा रहा है तो मैं न्यायालय क्यों जाऊँ’, तो उत्तर सरल है । “आपने नौकरी के लिए आवेदन किया और आपकी नियुक्ति हो गई । आप सेवा करने के लिए सहमत हुए । इसलिए, आपको न्यायालय जाना चाहिए । वह आपका काम है । आपके भाई का काम अलग है ।” इसी प्रकार, हमने पूर्व जन्मों के अपने कर्मों द्वारा इस जन्म में उच्चतर स्तर के लिए आवेदन किया था । इसके लिए इस जन्म में कुछ कर्तव्यों का पालन आवश्यक है । ये निर्देश देने वाला नियुक्तिकर्ता हमें दिखाई नहीं देता, बल्कि हमारे सभी कर्मों का साक्षी होता है । यही वेदांतियों का सिद्धांत है ।
दूसरी ओर, मीमांसकों का सिद्धांत यह है कि जिस नौकरी के लिए हमने आवेदन किया है, उसका फल स्वतः ही मिल जाता है ।
हमारे पूर्व कर्मों ने इस जन्म में हमारी जाति निर्धारित की है । इसलिए, हमें अपने कर्मों को उसी के अनुसार नियमित करना चाहिए । यदि हम ऐसा नहीं करते, तो असुविधा अवश्य होगी, भले बुरे परिणाम नहीं भी हो । हम जिस भी अवस्था में पैदा हुए हों, हमें उसके अनुसार ही अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए । वैदिक रीति-रिवाजों और आचरणों को संरक्षित और पालन किया जाना चाहिए । ब्राह्मण का कर्तव्य है कि वह स्वयं वैदिक आदेशों को सीखे, संकट में पड़े अन्य लोगों को शिक्षा और सांत्वना प्रदान करे और यह सुनिश्चित करे कि उन्हें अपने कर्तव्यों का बोध हो और वे अपने जीवन स्तर के अनुसार उनका पालन करें । इसी प्रकार, प्रत्येक व्यक्ति को अपने जन्म के अनुरूप कार्य करना चाहिए । तेली को तेल का उत्पादन और वितरण करना चाहिए । मोची को जूते बनाने और उनकी मरम्मत करनी चाहिए । ब्राह्मण को अपने खान-पान में अत्यधिक संयम बरतना चाहिए ताकि वह तन, मन और आत्मा से शुद्ध रहे और इस प्रकार अपनी ऊर्जा ईश्वर-प्राप्ति पर केंद्रित करे । उसे दूसरों को भी ईश्वर की ओर अपने विचार मोड़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए । इसीलिए सभी व्यवसायों और पेशों के लोगों को भूमि दान में दी जाती थी । प्राचीन काल में यही प्रथा थी । यदि पैतृक व्यवसाय को त्याग दिया जाए, तो कुछ असंतुलन अवश्य उत्पन्न होंगे । पहला कदम होगा दान में मिली ज़मीन का नुकसान, जो किसी और को मिल जाएगी जो उस व्यापार को अपनाएगा । आजकल उन ज़मीनों पर भी भूमि कर लगता है । इसलिए, पैतृक व्यापार छोड़ने से न केवल शास्त्रों के अनुसार ‘पाप’ या दोष लगेगा, बल्कि आर्थिक कष्ट भी होगा । अतीत में और आज भी, किसी कर्तव्य का पालन, जो जन्मसिद्ध अधिकार था, एक निश्चित सामाजिक मान्यता और सम्मान के साथ होता था ।
चूँकि हम जन्म से अपेक्षित कर्तव्यों का पालन नहीं करते, इसलिए हम देखते हैं कि हमारा समाज दिन-प्रतिदिन क्षीण होता जा रहा है । जब तक प्रत्येक व्यक्ति अपने नियत कर्तव्यों का पालन नहीं करेगा, सामाजिक सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होंगी और गरीबी का बोलबाला रहेगा । आज यही स्थिति है ।
जब तक संध्यावंदन जैसे कर्तव्य या नित्यकर्म नहीं किए जाते, तब तक बुरे या अशुभ परिणाम प्राप्त होते हैं । यदि किए जाएँ, तो उनसे पाप के अभाव के रूप में लाभ प्राप्त होता है । यदि समय पर ऋण चुका दिया जाए, तो व्यक्ति को ऋण के बोझ से मुक्ति का लाभ मिलता है और साथ ही, उसे एक ईमानदार व्यक्ति होने का भी सौभाग्य प्राप्त होता है जो अपना ऋण समय पर चुका देता है । यह शुभ नाम ही वह सद्भावना है जो व्यवसाय को बढ़ाती है । इसी प्रकार, नित्यकर्म करने से यह सुनिश्चित होता है कि हमें कोई पाप या बुराई न मिले और यह हमारे कल्याण (श्रेयस) में वृद्धि करता है । इस प्रकार, दोहरा लाभ होता है ।
वेदान्ती “अकरणे प्रत्यवाय” और “करणे अभ्युदय” दोनों को स्वीकार करते हैं । हम भी स्वाभाविक रूप से उनका पालन करते हैं ।
अतः नित्यकर्मों का पालन अनिवार्य है । अग्निहोत्र जैसे वैदिक आदेश और ऊपासना जैसे शास्त्रीय कर्म अवश्य करने चाहिए । वेद कहते हैं कि जब तक जीवन है, अग्निहोत्र अवश्य करना चाहिए । मीमांसकों का कहना है, “यह अवश्य करना चाहिए; यदि यह कर लिया जाए तो पर्याप्त है ।” इसीलिए संन्यास आश्रम उन्हें प्रिय नहीं लगता । संन्यास आश्रम में अग्निहोत्र और ऐसे कर्मों और अनुष्ठानों के पालन की कोई आवश्यकता नहीं है । मीमांसकों के अनुसार कर्मों का न करना आलस्य है । कर्मों का त्याग करना और संन्यासी बनना अपने कर्तव्यों का परित्याग करने के समान है । वे उपनिषद (ईशावास्य – दूसरा मंत्र) पर भरोसा करते हैं, जिसमें कहा गया है कि ‘मनुष्य को अपने नियत कर्तव्यों का पालन करते हुए सौ वर्ष तक जीवित रहना चाहिए ।’ तैत्तरीय ब्राह्मण कहता है कि यदि अग्निहोत्र को बुझा दिया जाए तो “वीर हति दोष” नामक जघन्य पाप लगता है । इसलिए, मीमांसा सिद्धांत कहता है: “जैसे बुरे कर्म करने से पाप लगता है, वैसे ही नित्यकर्म न करने से भी पाप लगता है ।” एक संन्यासी कर्म-भ्रष्ट होता है, जो अपने कर्तव्य में लापरवाह होता है । इसलिए, मीमांसकों का यह भी मानना था कि संन्यासी को देखना भी पाप है और इसके लिए प्रायश्चित करना चाहिए । “पापी को देखना, उससे बात करना, उसे छूना और उसके साथ भोजन करना, ये सब पाप हैं । इसी प्रकार, हमें संन्यासियों से बचना चाहिए ।” मंडन मिश्र और मीमांसा के अन्य प्रतिपादकों के विचार ऐसे ही थे ।
वेदों का ज्ञानकाण्ड ही संन्यास, अनंत, मोक्ष, ज्ञान आदि की बात करता है । उनकी प्रामाणिकता स्वयं वेद पर आधारित है । जब ऐसा है, फिर उनका उपहास क्यों किया जाता है ? आइए देखें कि मीमांसक इस पर क्या कहते हैं । वे कहते हैं:
“यह सत्य है कि उपनिषदों में ज्ञान और परब्रह्म का उल्लेख है । वेद क्या है ? वेद ध्वनि है, वाणी है । इसकी रचना क्यों की गई ? हमें उन चीज़ों के बारे में बताने के लिए जिन्हें हम नहीं जानते हैं । यही शब्द-प्रमाण है । यह हमें उन चीज़ों से अवगत कराने के लिए है जिन्हें आँखों या यहाँ तक कि मन से भी निगमन की प्रक्रिया द्वारा नहीं समझा जा सकता । इसे किसी ऐसी चीज़ का वर्णन करने के लिए नहीं बनाया गया था जो बेकार है । सभी शब्दों का दोहरा महत्व होता है । शब्दों का उद्देश्य यह बताना है कि क्या करना है और क्या नहीं करना है ।”
प्रवृत्तिर्वा निवृत्तिर्वा नित्येन कृतकेना वा
पुंसां यो नोपदिश्येत तत् शास्त्रं अभिधीयते ॥
अर्थात्, जो शब्द बिना किसी उद्देश्य के किसी विषय का वर्णन करते हैं, वे गपशप हैं; वे केवल ध्वनि उत्पन्न करते हैं । उनका कोई उपयोग नहीं है । यदि कोई कहता है कि कौआ उड़ता है, तो इससे सुनने वाले को क्या लाभ होता है ? यह कथन कि कौआ काला है, कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं करता । दूसरी ओर, यदि कोई कहता है कि कल रात यहाँ धार्मिक प्रवचन होगा, तो इसका एक उद्देश्य है, एक संदेश देना है । यह लोगों को इसमें शामिल होने के लिए एक निमंत्रण या अभिप्रेरण है । फिर, यदि यह कहा जाए कि कल किसी दूर स्थान पर प्रवचन होगा, तो इसका कोई विशेष उद्देश्य नहीं है क्योंकि दूरी उपस्थिति को रोकती है । इसलिए, जो शब्द किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति नहीं करते, वे उद्देश्यहीन होते हैं और इसलिए परहेज ही सर्वोत्तम हैं । ये कभी-कभी कुछ जानकारी भले दे सकते हैं, लेकिन ऐसी जानकारी का कोई उपयोग नहीं होता है ।
बोले गए शब्द या तो सकारात्मक कर्म को प्रोत्साहित करना चाहिये या फिर कुछ (नकारात्मक) कर्मों से बचने का पूर्वाभास देना चाहिये । यदि पाँच प्रमुख पापों का वर्णन किया गया है और वेद हमें उनसे बचने का आदेश देता है, तो इसमें “निवृत्ति प्रयोजनम्” का गुण है, अर्थात परहेज़ का लाभ । लाभ यह है कि हम किसी भी पाप से बच जाते हैं और इस प्रकार जीवन में नीचे नहीं गिरते । जिन शब्दों का इनमें से कोई भी उपयोग नहीं है, वे केवल गपशप और बेकार होते हैं ।
वेदों का एक भाग बताता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं । दूसरा भाग कहानियाँ और दंतकथाएँ आदि बताता है, जो अपने आप में भले ही ज़्यादा उपयोगी न हों, लेकिन वैदिक आदेशों के साथ जुड़कर अत्यधिक सार्थक हो जाती हैं । एक स्वास्थ्य विज्ञापन का उदाहरण लें । इसमें एक आदमी का चित्र है जो शेर से जूझ रहा है । इस चित्र का क्या महत्व है ? बस इतना ही कि आप अपनी नकदी खर्च करके टॉनिक खरीदने के लिए ललचा जाएँगे । वैदिक कथाएँ भी इसी तरह का, लेकिन अधिक महान उद्देश्य पूरा करती हैं क्योंकि वे वैदिक सिद्धांतों को स्वीकार करने में सहायक हैं । कथा की भूमिका को “अर्थवाद” या परिणाम-उन्मुख दृष्टिकोण कहा जाता है । दवाओं के विज्ञापनों में प्रतिष्ठित डॉक्टरों के प्रमाण पत्र क्यों होते हैं ? ताकि दवा की व्यापक बिक्री हो सके । ऐसे उद्देश्यपूर्ण प्रचार में, कभी-कभी सत्य को थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है । ऐसे असत्य को “गुणवाद” कहा जाता है । एक और वाद है जिसे “अनुवाद” कहा जाता है । यह ज्ञात सत्यों का बार-बार अनुसरण करना है । यह तो पहले से ही ज्ञात है कि अग्नि जलेगी, लेकिन इसे दोहराना ही अनुवाद है । गुणार्थवाद वैदिक आदेशों को स्पष्ट और स्वीकार्य बनाने के लिए (तथ्य से भिन्न) कल्पना का भी सहारा लेता है । “मदिरा न पिएँ” वैदिक आदेश है । यदि कोई ऐसी कहानी है जिसका विषय शराबी का विनाश है, तो वह अर्थवाद है । इसका तात्पर्य यह है कि शराब पीने से बचना चाहिए । “मदिरा पीना बुरा है । इससे नशा होता है ।” यह “अनुवाद” है । संक्षेप में, सभी कहानियाँ जिन्हें अर्थवाद कहा जा सकता है, हमें वैदिक आदेशों का पालन करने के लिए प्रेरित करती हैं ताकि हम बेहतर जीवन जी सकें ।
ज्ञानकाण्ड की आपत्तियों का प्रतिकार करने के लिए मीमांसक कहते हैं: “वेदों में एक विशेष यज्ञ या बलिदान का वर्णन है । कहा गया है कि दक्षिणा के रूप में सोना अर्पित किया जाना चाहिए, चाँदी नहीं । तैत्तरीय संहिता में भी कहा गया है कि यज्ञ में चाँदी अर्पित नहीं की जानी चाहिए, लेकिन इस निषेधाज्ञा को स्पष्ट करने के लिए एक लंबी कहानी दी गई है । यह कहानी चाँदी देने के दुष्प्रभावों से संबंधित है और इस प्रकार चाँदी न देने का संदेश देती है । इस प्रतिबन्धित को “निषेध” कहा जाता है । और जो करना होता है वह “विधि” या निषेधाज्ञा है । इस प्रकार, ऐसी उद्देश्यपूर्ण कहानियाँ, यद्यपि स्वयं में कोई अंतर्निहित गुण नहीं रखतीं, फिर भी उनका एक निश्चित उद्देश्य या उपलब्धि हासिल करना होता है ।”
इसे अपने विषय के रूप में प्रयोग करते हुए, मीमांसक, जैसा कि पहले कहा गया है, ज्ञानकाण्ड की आपत्तियों का प्रतिकार करते हैं । वे कहते हैं: “उपनिषद केवल ब्रह्म स्वरूप की बात करते हैं – यानि परमपिता की छवि का । वे किसी भी कार्य का श्रेय नहीं देते हैं, वे विषय को किसी भी प्रकार के पूर्वानुमान के तहत नहीं लाते हैं । ऐसा कहा जाता है कि ईश्वर-अनुभव एक ऐसी स्थिति है जहाँ कोई क्रिया शामिल नहीं है । वेद कब और कैसे प्रमाण या अधिकार बन जाता है ? इसे अधिकार के रूप में स्वीकार किए जाने के लिए इसे सकारात्मक परिणाम की स्थिति तक ले जाना होगा । इसलिए, उपनिषद केवल अर्थवाद है, यह एक विषय के रूप में बात करता है जैसा कि वह मौजूद है । अब, हमें वह क्यों जानना है जो पहले से ही ज्ञात है या हमें इस बारे में शिक्षित होना है कि क्या करना है ? वेद “ब्रह्म मौजूद है, आत्मा भी ब्रह्म है” जैसी घोषणाएं करके हमारी समझ को आगे नहीं बढ़ाते हैं या हमारी भलाई में योगदान नहीं करते हैं । इसलिए, हमें यज्ञ और अन्य वैदिक कर्म अवश्य करने चाहिए और वेदों का मुख्य उद्देश्य हमें उन्हें करने का आदेश देना है । इसीलिए शब्द (वेद) का अस्तित्व है । किसी पहले से विद्यमान सत्ता के अस्तित्व को जानने के लिए किसी वैदिक ग्रंथ की आवश्यकता नहीं है । किसी न किसी समय यह ज्ञात हो ही जाएगा । यदि ऐसा सैद्धांतिक ज्ञान ज्ञात न भी हो तो भी कोई विशेष बात नहीं है । इसलिए, वेदों का वह भाग जो केवल प्रत्यक्ष सत्ता के निरूपण तक ही सीमित है, केवल अर्थवाद है । इसलिए, उपनिषदों को प्रमाण नहीं माना जा सकता । उनका उद्देश्य केवल यज्ञकर्ता के पद को ऊँचा उठाना है । स्वभाव से ही जीव या व्यक्तिगत आत्मा कर्म की प्यासी होती है और इस प्रकार व्यक्ति अधिकाधिक कर्म करने के लिए प्रेरित होता है । कर्म करने से बचना गलत है । (वैदिक कर्मों के प्रति किसी दायित्व के बिना) भिक्षुक बनना भी गलत है । उपनिषदों में जीव की पहचान ब्रह्म का अर्थ केवल कर्म करने वाले व्यक्ति की प्रशंसा करना, उसे और अधिक प्रयास करने के लिए प्रेरित करना और इस प्रकार अनेक लोगों द्वारा कर्म करने का प्रचार करना है । जिस प्रकार कोई भी व्यक्ति, सर्वोत्तम शक्तिवर्धक औषधि की सहायता से भी, सिंह से सफलतापूर्वक कुश्ती नहीं लड़ सकता, उसी प्रकार जीव भी ब्रह्म के स्तर तक कभी नहीं पहुँच सकता । इस प्रकार, उपनिषदों का स्वरूप अर्थवाद है । ब्रह्म, ज्ञान, मोक्ष और ईश्वर जैसे शब्द हमारे लिए अधिक उपयोगी नहीं हैं । कर्म ही सब कुछ है ।”
यह मीमांसकों का सिद्धांत है ।
शंकर का उत्तर
शंकर उत्तर में क्या कहते हैं?
शब्द (वेद) का कर्म-प्रधान होना आवश्यक नहीं है । मीमांसक शब्द (वेद) की पवित्रता को केवल उसी सीमा तक स्वीकार करते हैं जहाँ तक वह विषय के निश्चित निर्धारण की ओर ले जाता है । दूसरे शब्दों में, वे कहते हैं कि कर्म से उत्पन्न परिणाम ही शब्द (वेद) का तात्पर्य है और इसका लक्ष्य केवल स्वयं में या स्वयं के लिए कर्म करना नहीं है । किन्तु, यदि लक्ष्य ऐसी अवस्था है जहाँ कोई कर्म नहीं होता, तो उस अवस्था का वर्णन करने वाले ज्ञानकाण्ड को प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए । दूसरे शब्दों में, यदि वैदिक ग्रन्थ (शब्द) का उद्देश्य ऐसी अवस्था तक ले जाना है जहाँ अंतिम परिणाम ‘कर्महीनता’ हो, तो यह वेद की आवश्यकता (मीमांसकों के अनुसार स्वीकार्य) को पूरा करता है । इसलिए, शब्द का तात्पर्य किसी निष्कर्ष पर पहुँचना होना चाहिए, न कि केवल कर्म-बद्ध होना । वेद मदिरापान का निषेध करते हैं । इसके परिणामस्वरूप कौन-सा कर्म करना आवश्यक है ? कुछ नहीं । क्या इसका अर्थ यह है कि शब्द का कोई परिणामोन्मुखीकरण नहीं है ? इसका उद्देश्य मदिरापान के दुष्परिणामों को रोकना है । परन्तु इस प्रकार की कर्म नहीं करने को “अभाव” या निष्क्रियता कहा जाता है । सभी संयमों (निषेध) का तात्पर्य अभाव या भोग-विलास (आसक्ति) में कमी करना है । मीमांसक भी वेदों के उस ज्ञान को स्वीकार करते हैं जो अनेक कर्मों का निषेध करता है । वे उन कार्यों से भी विरत रहते हैं जिन्हें वेद ‘निषेध’ कहते हैं । अतः, यदि कुछ निषेध, जो वास्तव में कर्म न करने के आदेश हैं, मीमांसकों को स्वीकार्य हैं, तो वे तार्किक रूप से ब्रह्मत्व की उस अवस्था पर आपत्ति कैसे कर सकते हैं जहाँ किसी भी प्रकार का कर्म नहीं होता । आत्म-साक्षात्कार ही सर्वोच्च पुरस्कार है, जिससे किसी भी प्रकार के कर्म से पूर्ण संयम प्राप्त होता है । अतः वैदिक शब्द सभी अर्थपूर्ण हैं । उन्हें केवल अर्थवाद कहकर अस्वीकार नहीं किया जा सकता ।
भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं, “सर्व कर्मखिलं पार्थज्ञाने परिसमाप्यते” । इसका अर्थ है कि सभी कर्म अंततः ज्ञान की ओर ले जाते हैं और उसी में विश्राम पाते हैं । सभी कर्मों को परम भगवान की ओर निर्देशित किया जाना चाहिए । किसी भी प्रकार के कर्म से पूर्ण संयम ही परम लक्ष्य है । यही परम आनंद या ब्रह्मानंद है । फलस्वरूप जन्म-मृत्यु का चक्र रुक जाता है । यही वेदों का परम संदेश और उद्देश्य है । संपूर्ण कर्म काण्ड को ज्ञान काण्ड की ओर ले जाना चाहिए और उसी में विलीन होना चाहिए । तभी कर्म काण्ड सार्थक होता है ।
“वेदों में ‘कर्म’ (वैदिक क्रियाएँ) के लिए केवल कर्म काण्ड में ही आदेश हैं, क्योंकि इससे मन को शुद्ध और अनुशासित करने (चित्त शुद्धि) का सीमित उद्देश्य प्राप्त होता है । यदि सभी कर्मों से विरत रहने से कर्म से लाख गुना अधिक फल प्राप्त हो सकता है, तो यही वेदों का पूर्णतम उद्देश्य होगा । यही ज्ञान काण्ड का संदेश है । किन्तु, वेदों के वे अंश जो कर्म से संबंधित हैं, मानसिक शुद्धता उत्पन्न करने में सहायक हैं और उस मार्ग की ओर ले जाते हैं जो अंततः ईश्वर में समाहित होता है । इसी कारण वे सार्थक हो जाते हैं । इसलिए, केवल कर्म का अपने आप में कोई उद्देश्य नहीं है । वेद ‘संन्यास आश्रम’ (भिक्षावृत्ति का जीवन) की सर्वोच्चता का गुणगान करते हैं, क्योंकि यह वह अवस्था है जो परमात्मा की प्राप्ति पर प्रबल होती है और जो वास्तव में परमात्मा की अवस्था है । हमारा प्रयास इसी अवस्था तक पहुँचने का होना चाहिए ।”
कर्म काण्ड में भी, वेद कुछ कर्मों को बुरे परिणामों की ओर ले जाने वाला मानकर अस्वीकार करते हैं । किन्तु ऐसे कर्म करने से कुछ लोगों को सुख या लाभ अवश्य मिलता है । इसी कारण कुछ लोग बुरे कर्मों में लिप्त हो जाते हैं । जो व्यक्ति ऐसे कर्म नहीं करता, वह स्वयं को परिणामी लाभ या सुख से वंचित रखता है । फिर भी, वेद ऐसे कर्म करने का निषेध करते हैं । क्यों ? यद्यपि प्रारम्भ में पाप कर्म अधिकांशतः इन्द्रियजन्य सुख और संतुष्टि प्रदान करते हैं, किन्तु दीर्घकाल में वे हमें उच्चतर आनंद या सुख से वंचित कर देते हैं । इसीलिए वेद हमें पाप कर्मों से दूर रहने का उपदेश देते हैं । यद्यपि इस लोक में भौतिक समृद्धि है और उसके बाद पितृलोक और देवलोक में निवास है, जहाँ जीवन सुखद है और दुःख नहीं हैं, क्या ये स्थायी निवास हैं ? क्या सुख अनंत हैं ? नहीं । जैसे ही अच्छे कर्मों से प्राप्त संचित पुण्य क्षीण हो जाता है, सुख समाप्त हो जाते हैं । पुण्य क्षीण होने पर, उन्हें पुनः पृथ्वी पर गिरना पड़ता है । भगवद्गीता कहती है, “क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति” । यदि कोई स्थायी कल्याण या अपरिवर्तनीय एवं पूर्ण सुख है, तो वह वह अवस्था है जिस तक ज्ञानी अनंत में विलीन होकर और सभी प्रकार के कर्मों से मुक्त होकर पहुँचता है । व्यक्ति को उन कर्मों से ऊपर उठने का प्रयास करना चाहिए जो सीमित और तुच्छ अवधि के लिए सुख प्रदान कर सकते हैं और उच्चतर कर्मों तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए । दूसरे शब्दों में, व्यक्ति को वैदिक कर्मों का अथक परिश्रम करना चाहिए, लेकिन यदि उनसे पूर्ण और निरंतर सुख प्राप्त न हो तो उनका क्या उपयोग होगा ? तो क्या इस कारण से कोई इन कर्मों का त्याग कर सकता है ?
क्या कोई सीधे स्थायी सुख की अवस्था तक पहुँच सकता है ? नहीं । ऐसा नहीं हो सकता । ज्ञानी या बुद्धिमान की अवस्था तक एक साथ पहुँचना आसान नहीं है । सबसे पहले, मन को अशुद्धियों से मुक्त करना होगा । केवल कर्म ही मन को नियंत्रित रख सकता है, जो सदैव विचारों की लहरों से घिरा रहता है । इसलिए, कर्मकांडों का निष्ठापूर्वक पालन करना होगा । ऐसा करते समय, मन को उन लाभों से विमुख करना होगा जो ऐसे कर्म प्रदान कर सकते हैं, जैसे सुख, स्वर्ग आदि । दूसरे शब्दों में, कर्म करने का अभ्यास करने के बाद, उनसे उत्पन्न होने वाले फल का जानबूझकर परित्याग करना चाहिए । परिणामस्वरूप, मन की स्वाभाविक अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं । यदि हम सचेतन और सच्चे मन से भगवान से प्रार्थना करें कि हम कर्मों से मिलने वाले फल को नहीं चाहते और उन्हें स्वयं भगवान को समर्पित करें, तो वे हमें मानसिक स्पष्टता और पवित्रता, चित्त शुद्धि प्रदान करने के लिए बाध्य हैं । तभी से, ज्ञान विचार – दार्शनिक अन्वेषण – की यात्रा शुरू करना संभव होगा । अगला चरण किसी भी प्रकार की गतिविधि से मुक्त होकर, आनंद की शाश्वत अवस्था में अकेले रहने की अवस्था तक पहुँचना होगा ।
वेदान्तिक सिद्धांत और मीमांसा
जहाँ तक वैदिक कर्मों का पूर्ण समर्थन किया जाता है, अद्वैत दर्शन न केवल मीमांसा का समर्थन करता है, बल्कि मीमांसा सिद्धांत द्वारा अपने समर्थन में प्रस्तुत किए गए छह प्रमाणों (प्रमाण या प्रमाण के स्रोत) को भी अपने उपयोग के लिए स्वीकार करता है ।
श्री शंकर का अद्वैत, श्री रामानुज का विशिष्टाद्वैत और श्री माधव का द्वैत वस्तुतः वेदांतिक सिद्धांत हैं । अद्वैत की तरह, अन्य दो दर्शन भी वैदिक कर्मों के पालन पर जोर देते हैं । इसलिए, एक सामान्य नियम के रूप में, एक सीमा तक, मीमांसा का सिद्धांत तीनों वैदिक दर्शनों को स्वीकार्य है ।
मीमांसकों के छह प्रमाणों में से, अद्वैतवादियों ने सभी को स्वीकार किया है, और विशिष्टाद्वैतवादियों ने केवल तीन को स्वीकार किया है, अर्थात् (१) प्रत्यक्ष, (२) अनुमान और (३) शब्द (वेद) । फिर भी, ये तीनों मीमांसकों के छह प्रमाणों में से हैं । मैं अगले उपांग, अर्थात् न्याय, पर विचार करते समय प्रमाणों की भूमिका पर थोड़ा विस्तार से चर्चा करूँगा ।
सारांशतः, मीमांसा वेदान्तिक धर्म के तीन मान्यता प्राप्त आचार्यों द्वारा पूरी तरह से अस्वीकृत या अस्वीकार्य नहीं है । मीमांसा को आधार मानकर, व्यक्ति भक्ति की अवस्था तक पहुँचता है, जो विशिष्टाद्वैत और द्वैत की आस्था का साधन है, और फिर अद्वैत उसे ज्ञान या परम सत्य ज्ञान की अवस्था तक ले जाता है ।
चूँकि कर्म को सर्वोच्च पुण्य माना जाता है, इसलिए मीमांसा को सामान्यतः कर्म मार्ग या वैदिक कर्म का मार्ग कहा जाता है, लेकिन यह कर्म मार्ग वैसा नहीं है जैसा वेदांती कर्म, भक्ति और ज्ञान मार्ग का उल्लेख करते समय ध्यान में रखते हैं । कोई भी वेदांतिक सिद्धांत कर्म को अपने आप में एक साध्य या जिसके आगे कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है, नहीं मानता । वेदांतियों का कर्म मार्ग या कर्म योग यह है कि कर्म वैदिक आदेशों के अनुसार किया जाना चाहिए, लेकिन बिना किसी फल की आशा के, और कर्म भगवान को समर्पित होना चाहिए ।
भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता में यह स्पष्ट रूप से कहा है । भगवान की भक्ति उस कर्तव्य या कर्म से अलग है जिसकी मीमांसा बिना किसी समझौते के स्थापना करती है । ये कर्म न केवल संसार में समृद्धि और कल्याण लाते हैं, बल्कि कर्ता के मन (चित्त शुद्धि) को भी शुद्ध करते हैं, जिससे वह भक्ति और ज्ञान की उच्चतर अवस्थाओं तक पहुँच पाता है । दूसरे शब्दों में, मीमांसा जिसे साध्य मानता है, वेदांत उसे साध्य का साधन मानता है ।
हरिः हरः!!

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Bahut sundar tarika san varnan Ved Vedang aa karma akarma sabhak bare man bujhayal gel aichh ehi lekh m. Varna vyabastha man karma k bare m batayal gel baat seho bad neek san bujhayal gel aichh. Brahman k karma aa okar fal sabhak bare m, Sange Sanyashi k karma, Jao o karma nai karait chhaith t hunka sampar m nahi rahbak baat seho sujhel gel chhai. 💐🚩🙏“कर्ता शास्त्रार्थ तत्वात्”