ध्वनि आ सृजन
ध्वनि कि अछि ? आधुनिक विज्ञान एकरा कम्पन रूप मे परिभाषित करैत छथि । परमाणु विज्ञान आर आइंस्टीनक सिद्धान्त यैह निष्कर्ष प्रस्तुत कयलनि अछि जे परमाणुक स्तर पर सब पदार्थ एक्कहि होइछ – (वेदांतक अद्वैत सिद्धान्त) । लेकिन वस्तु सब आँखि केँ अलग-अलग देखाय दैत अछि कियैक तँ ऊर्जा विभिन्न बिन्दु पर अलग-अलग आवृत्तिक कम्पन उत्पन्न करैत अछि ।
कम्पन ध्वनि उत्पन्न करैत अछि । एकर विपरीत, यदि ध्वनि उत्पन्न करबाक होइछ, त कम्पन उत्पन्न हेबाक चाही । चूँकि ऊर्जाक प्रवाह मे विभिन्न आवृत्तिक कम्पन उत्पन्न होइत अछि, तेँ संसारक रचना केर वैज्ञानिक व्याख्या आ ई वैदिक घोषणा जे सृष्टि परमात्माक प्राण-श्वास सँ उत्पन्न भेल, परस्पर सहमत अछि ।
मनुष्य आ पशुक स्वास्थ्य व भावनाक आधार कि छैक ? श्वास और श्वसन । विभिन्न नाड़ी (नाड़ी – तंत्रिका केन्द्र) सँ श्वास केर प्रवाह कम्पन उत्पन्न करैत अछि जे प्राणीक स्वास्थ्य; या ओकर अभाव लेल जिम्मेदार अछि । यदि योगिक अभ्यासक माध्यम सँ, एहि केन्द्र सब सँ श्वासक प्रवाह केँ नियंत्रित या नियमित कयल जाय, त अद्भुत स्वास्थ्य प्राप्त होइत अछि । एहेन अवस्था मे, यदि रक्त वाहिका कटियो जाय, तैयो रक्त प्रवाहित नहि होयत । योगी हृदय-स्पंदन और नाड़ी-स्पंदन केँ रोकिकय, निश्चल अवस्था मे भूमिगत (जमीनक नीचाँ) रहि सकैत अछि । साँप या बिच्छूक कटबाक विष सेहो ओकरा प्रभावित नहि करैछ । ई सब एहि द्वारे संभव छैक कियैक तँ ओ सामान्य श्वास-प्रश्वास सँ उत्पन्न कम्पन सब केँ नियंत्रित करय मे सक्षम होइत अछि ।
श्वास नहि केवल शरीर केँ जीवित रखबाक लेल आवश्यक छैक, बल्कि मन आ मानसिक स्वास्थ्य सेहो काफी हद तक एहि पर निर्भर करैत छैक । एना एहि लेल छैक, कियैक तँ मन जे सब विचार प्रक्रियाक कारण होइछ आ श्वास जे प्राणशक्तिक कारण होइछ, एक्के थिक । नाड़ी या तंत्रिका केन्द्र केर कम्पन स्वस्थ (नीक) या अस्वस्थ (खराब) विचार सब लेल उत्तरदायी होइत अछि । अहाँ स्वयं एकर अनुभव कयने होयब । जेतय ईश्वर केर उपस्थिति प्रत्यक्ष हो या कोनो सन्तक उपस्थिति मे, जखन मन शांत हो, श्वास-प्रश्वास केहेन व्यवहार करैत अछि ? जखन ओ काम या क्रोध केर दबाव मे हो, त श्वास-प्रश्वास केहेन व्यवहार करैत अछि ? यैह पता लागत जे प्रत्येक मामिला मे श्वास-प्रश्वासक पैटर्न व्यापक रूप सँ भिन्न रहैत छैक । आनन्द आ प्रसन्नताक विभिन्न अवस्था मे सेहो श्वास-प्रश्वास मे अन्तर होइत छैक ।
धार्मिक अनुष्ठान या भजन सँ उत्पन्न होयवला आनन्द, इन्द्रिय या इन्द्रिय सभक इच्छा केर पूर्ति सँ उत्पन्न होयवला आनन्द सँ भिन्न होइत छैक । सामान्यतः, उच्चतर प्रकारक आनन्द दाहिना नासिका सँ श्वास छोड़य मे परिणत होइत छैक । केवल इन्द्रिय सुख टा बायाँ नासिका सँ श्वास बाहर छोड़नाय केँ सक्रिय करैत छैक । जखन विचार कोनो महान उद्देश्य पर केन्द्रित होइत छैक, त सबटा संवेदना संश्लेषित भ’ जाइत छैक । तखन, दुनू नासिका सँ श्वास धीमा, नियमित आर समान भ’ जाइत छैक । जखन विचार चिन्तन केर विषय मे विलीन या एकाकार भ’ जाइत छैक, तखन श्वास पूरापूरी रुकि जाइत छैक आ मन सेहो सोचनाय बन्द कय दैत छैक, लेकिन जीवन चलिते रहैत छैक । आर अतिचेतन या ज्ञान व्यक्तिक अस्तित्व मे भरि जाइत छैक ।
तेँ, जीव केर स्थूल शरीर आर चेतना श्वास द्वारा उत्पन्न ऊर्जा द्वारा निर्मित होइत अछि आ ओहि पर विकसित होइत अछि या श्वास रुकला पर नष्ट भ’ जाइत अछि । ई श्वास हमरा लोकनिक भीतर केर स्पन्दन केर नियमनक अलावे आर किछु नहि थिक ।
सब पदार्थ, चाहे ओ सजीव हो या निर्जीव, परमात्मा सँ उत्पन्न होइत अछि आर स्वयं केँ गुणा करैत अछि, विभिन्न रूप मे प्रकट होइत अछि आर रूपान्तरित या लुप्त सेहो भ’ जाइत अछि । एहेन परिवर्तन लेल आवश्यक विभिन्न स्पन्दन स्वाभाविक रूप सँ “परमात्मा” नामक पदार्थ मे उत्पन्न हेबाक चाही ।
अद्वैतवादी सिद्धांत जे ब्रह्म निर्गुण, अपरिवर्तनीय, अपरिवर्तनशील, स्थिर आदि छथि तेकरा एखन हम सब छोड़ि दी ।
अद्वैत दर्शनक अनुसार सेहो, अपरिभाषित, अनिर्वचनीय मायाक संग मिलिकय ब्रह्म स्वयं केँ प्रत्यक्ष अस्तित्व केर विभिन्न वस्तु सभक रूप मे प्रकट करैत छथि । चाहे ओ अस्तित्व मे प्रतीत हो या अन्यथा, ई स्वीकार करय पड़त जे वैह आदिशक्ति जड़ जगत आ चेतन प्राणी सभक रूप मे भिन्न रूप सँ प्रकट होइत छथि । यदि एकरा माया सेहो कहल जाय, तैयो एकरा एकटा आधार (माया) पर स्थित होबहे पड़तैक जे ईश्वर केर अतिरिक्त आर किछु नहि अछि । तेँ, माया सेहो, अपन विभिन्न रूप मे, परब्रह्म मे स्पन्दनक रूप मे प्रकट होइत अछि । एना प्रकट स्पन्दन सभक रहितो, परब्रह्म स्पन्दन केर अवस्था मे नहि होइत छथि आर अपना भीतर गहींर मे निश्चल अवस्था मे रहैत छथि । तैयो, हमरा लोकनिक इन्द्रिय-बोध मुताबिक, ई स्पन्दन प्रकट होइत अछि । ई अव्यवस्थित नहि भ’ सकैछ । असंख्य सौरमंडलक परिक्रमा सँ लय केँ घासक एकटा छोट टा तिनका या मच्छर केर निर्माण धरि, एकटा व्यवस्थित व्यवहार-पद्धति, एकटा नियामक नियम विद्यमान अछि ।
एहि शासन-नियम केर संचालन सँ टा संसारक कल्याण सम्भव अछि । परमात्मा संसार केर निर्माण आर शासन वास्ते प्राकृतिक शक्ति सभक उपयोग कयलनि अछि । लेकिन कहियो-कहियो एना प्रतीत होइत अछि जे जखन व्यवस्थित अस्तित्व कनिकबो अनियंत्रित या अस्त-व्यस्त भ’ जाइत अछि, तखन ईश्वर ओकरा देखैत रहि जाइत छथि ।
एहि तरहें, हम सब कहियो-कहियो प्रकृतिक शक्ति सब केँ अपन सीमा सँ बाहर जाइत देखैत छी । वर्षा समय सँ (ऋतु) मे नहि पड़ैत अछि । या फेर, बाढ़ि या कोनो आन प्राकृतिक आपदा आबि जाइत अछि ।
सामान्य सँ प्रस्थान करबाक लेल (विचलन केर) मामिला मे, मानव मन जतेत गलत आन किछु नहि कय सकैछ । देहक मोह बहुत प्रबल छैक । यद्यपि प्रकृति मे आचरण, व्यवस्था आर अनुशासनक बहुते रास निश्चित नियम विद्यमान अछि, तखनहुँ मन अनुशासन आ संयम केर सब बन्धन केँ त्यागिकय पागल प्राणी जेकाँ दूर-दूर धरि भटकैत रहैत अछि ।
प्रश्न उठैत छैक जे कि प्रकृतिक शक्ति सब केँ तखन सुधारनाय संभव छैक जखन ओ मानव कल्याण केर विरुद्ध कार्य करैत अछि । एहि प्रकारे, कि मन केँ विक्षुब्ध भेलापर ओकरा नियंत्रित करबाक कोनो उपाय छैक ?
यदि प्रत्यक्ष अस्तित्वक उद्गम कम्पन आ ध्वनि मे निहित अछि, त ई तर्कसंगत छैक जे वैह कम्पन आर ध्वनि प्रकृति केर भटकैत शक्ति सब केँ सुधारि सकैत अछि आर मन केँ अनुचित विचार सब सँ मुक्त कय सकैत अछि । वेद यैह कम्पन आर ध्वनि मात्र थिक ।
योग द्वारा नियंत्रित श्वास द्वारा ब्रह्मांडीय श्वासक संग तालमेल स्थापित करब आर सामान्य तथा व्यक्तिगत कल्याण लेल लाभकारी कार्य करब सम्भव छैक । नाड़ी आ तंत्रिका केन्द्र केर कम्पन मानव कान केँ सुनाइ नहि दैत छैक । ई दृष्टिकोण आब कतेको लोक द्वारा स्वीकार कयल जा रहल अछि ।
एहि दृष्टिकोण सँ, विज्ञान धर्म केर सत्य अवधारणाक शत्रु नहि छी । दोसर दिश, ई समाज पर धर्म केर प्रभाव केँ बढ़ेबा मे काफ़ी मददगार साबित भ’ सकैत अछि । एक सदी पहिने, टेलीफ़ोन आर रेडियोक आगमन सँ पहिने, वेद आर श्वासक ध्वनि प्रभावक विश्वसनीयताक बारे मे अविश्वास राखयवलाक सन्देह सभक समाधान करनाय हमरा सब लेल कठिन होइत छल । आब, ई खोज (आविष्कार) सब हमरा सब केँ पूर्ण समर्थन प्रदान करैत अछि ।
अचेतन (बेसुध) रेडियो रिसीवर केर क्षमता चेतन प्राणी द्वारा सेहो प्राप्त कयल जा सकैत अछि । बल्कि, हम सब अहू सँ नीक कय सकैत छी । तप या तपस्या टा एहेन क्षमता प्रदान करैत अछि ।
तप केर अर्थ अछि मन व मानसिक शक्ति केँ निरन्तर एकटा लक्ष्य पर केन्द्रित करनाय, घर-गृहस्थीक सुख-सुविधा सब केँ त्यागिकय, भूख-प्यास, नीन्द आर विश्रामक माँग केर परवाह नहि करनाय । एहि पूरा अभ्यास मे, एहि बोध सँ बचनाय ज़रूरी अछि जे ‘हम ई सारा कष्ट उठा रहल छी आर सारा प्रयास कय रहल छी, तेँ हमरा सत्य धरि पहुँचबाके टा अछि ।’ विनम्रता एहि विश्वासक संग पूरा प्रयास मे व्याप्त होयबाक चाही जे, सब मानवीय प्रयासक बावजूद, ईश्वर केर कृपा कोनो कार्य केर सफलताक लिए एकटा अनिवार्य घटक थिक । ऋषी लोकनि एहने तपस्या कयलनि आर योगिक क्षमता सँ शिखर पर पहुँचलाह ।
ऋषि सब केँ ओहि समस्त स्पन्दन सभक ज्ञान भ’ गेलनि जेकर परिणामस्वरूप संसारक रचना भेलैक, अर्थात् ब्रह्माण्डीय श्वास केर ज्ञान ओ सब प्राप्त कय लेलनि । मात्र एतबा टा नहि । जाहि प्रकारे विद्युत चुम्बकीय तरंग सब ध्वनि तरंग मे परिवर्तित भ’ जाइत अछि, ताहि प्रकारे ब्रह्माण्डीय स्पन्दन हुनका लोकनिक कान केँ सुनाइ दियए लगलनि । एकरे ओ लोकनि वेद मंत्रक रूप मे संसार केँ देलनि ।
एकटा बात हमरा बड प्रभावित करैत अछि । वेद केँ ‘श्रुति’ या ओ जे सुनल जाइत अछि, कहल जाइत छैक । संस्कृत मे कान केँ ‘स्रोत्र’ कहल जाइत छैक । लिखित रूप मे दर्ज कएने बिना, वेद गुरु-शिष्य परम्परा मे कान द्वारा सीखबाक प्राचीन पद्धति सँ एकटा पीढ़ी सँ दोसर पीढ़ी धरि पहुँचैत रहल अछि । तेँ किछु लोक कहैत छथि जे “श्रुति” नाम निस्संदेह एहि पर आधारित अछि । वेद केर लिखित रूप मे कियैक नहि लिखल गेल जाहि सँ ओकरा पढ़ल आ सीखल जा सकय ? एकटा कारण यैह छल जे किछु ध्वनि सब ध्वन्यात्मक रूप सँ सटीक रूप सँ पुनरुत्पादित नहि भ’ पबैछ । दुइ अक्षर केर बीचक ध्वनि सब तथा वेद मे एहेन कतेको ध्वनि सब अछि । एकरा केवल मौखिक रूप टा सँ प्रसारित कयल जा सकैछ । एकर अतिरिक्त, वेद मंत्र सभक उच्चारण एकटा निश्चित लय या ताल मे कयल जेबाक चाही (आवश्यक कम्पन उत्पन्न करबाक लेल) । किछु ध्वनि सभक उच्चारण उच्च वर्णक्रमीय, किछु केर मध्यम और किछुक निम्न वर्णक्रमीय होयब आवश्यक अछि । हालाँकि तारांकन चिह्न सँ एहि मे कतबु सहायता भेटि जाय, सुलेखनक त्रुटि सहित, गलत आवाज, स्वर तथा उच्चारणक कारण बनि सकैत अछि । एहि सँ ओकर इच्छित प्रभाव मे कमी आओत । उच्च या निम्न स्वर मे उत्पन्न ध्वनि तथा ओहि स्वर मे उत्पन्न कोनो अन्य ध्वनि केर हमरा सब पर कि प्रभाव पड़ैत अछि, एकर कल्पना कयनाय आसान अछि । स्वर मे अन्तर केर संग हमरा सभक भावनात्मक प्रतिक्रिया आर एतय तक कि प्रकृतिक सुव्यवस्था केँ नियंत्रित करयवाली ब्रह्माण्डीय शक्ति सब सेहो बदलि जायत ।
आवाज़ केर स्वर-परिवर्तन परिणाम सब पर प्रतिकूल प्रभाव केना दैत छैक, एकर उदाहरण स्वयं वेद (तैत्तरीय संहिता) मे एकटा कथा मार्फत भेटैत अछि । त्वष्टा नामक एकटा दिव्य शिल्पी इन्द्र केँ नष्ट करय मे सक्षम पुत्र केर प्राप्तिक उद्देश्य सँ एकटा मंत्र जप कयलनि । निर्धारित मंत्र केर जाप करैत समय, ओ किछु शब्द सभक स्वर तथा उच्चारण मे त्रुटि (गलती) कय देलनि । एकर परिणामस्वरूप हुनकर प्रार्थना सँ हुनका हुनकर इरादा (इच्छा-अपेक्षा) केर बिल्कुल विपरीत परिणाम प्राप्त भेलनि । इन्द्र केँ नष्ट करयवला पुत्रक माँग करबाक बदला, ओ इन्द्र द्वारा नष्ट कयल जायवला पुत्रक माँग कय बैसलाह । कथा आगू कहैत अछि जे अन्ततः ओहिना भेलनि ।
रेडियो मे, स्वर-संयोजन (ट्युनिंग) मे कनिकबे परिवर्तन हमरा सब केँ एकटा अलग स्टेशन प्रदान करैत अछि । एहि द्वारे, वांछित स्टेशन प्राप्त करबाक लेल, सही स्वर-संयोजन सुनिश्चित करब आवश्यक अछि । वैदिक मंत्रोच्चार मे सेहो यैह बात लागू होइत अछि । ध्वनिक स्वर या तारत्व तथा आयाम सही हेबाक चाही । जाहि प्रकारे तरंगदैर्घ्य (वेभ लेंग्थ) मे परिवर्तन सँ एकटा अलग स्टेशन उत्पन्न होइछ, ताहि प्रकारे वेद मंत्रोच्चार मे परिवर्तन सँ एकटा अलग प्रभाव उत्पन्न होइत अछि । यैह कारण सब सँ ई निर्धारित कयल गेल अछि जे वेद केँ गुरु सँ श्रवण कय केँ सीखबाक चाही ।
लेकिन वेद केँ ‘श्रुति’ कहबाक वास्तविक कारण ई अछि कि जे ध्वनि सब सामान्य मनुष्य लेल अश्रव्य छैक (सुननाय सम्भव नहि भ’ पबैत छैक), तेकरा ऋषि लोकनि सुनने रहथि आर फेर ओ सब शिष्य लोकनि केँ ताहि रूप मे प्रदान कएने रहथि जेना ओ सुनलनि । एहि तरहें, वैदिक ध्वनि सब ऋषि लोकनि केँ तखन प्रकट भेलनि जखन ओ सब अपन तप केर माध्यम सँ ओ ग्रहण करबाक लेल पूर्णतया तत्पर भेलाह । एहि लेल वेद केँ ‘श्रुति’ या जे सुनल गेल, कहल जाय लागल ।
पहिने हम कहने रही जे ऋषि लोकनि केँ मंत्र द्रष्टा या मंत्र सभक देखनिहार कहल जाइत छलथि । ‘मंत्र द्रष्टा’ वाक्यांश केर अर्थ ई लगायल जा सकैत अछि जे ओ सब मंत्र सब केँ आकाश मे समूह मे देखने रहथि ।
एहि मे सँ कोन सही अछि ? कि ओ लोकनि मंत्र सब केँ देखलनि या सुनलनि ? यदि ओ सब ओकरा देखने रहथि, त ओ कोन भाषा आ लिपि मे लिखल गेल छल, कियैक त ओ सब ओहि युगक छथि जहिया देवनागरी या आर-आर ग्रन्थ लिपि सब या ब्राह्मी लिपि, जाहि सँ ई दुनू उत्पन्न भेल अछि, से अस्तित्व मे नहि रहय । तैयो, वैदिक ग्रन्थ सभक ध्वन्यात्मक रूप सँ सटीक रूप मे पुन: प्रस्तुत नहि कयल जा सकैत छल । एहि भ्रम केर उत्तर यैह अछि । चाहे कियो कहय जे ओ सब ‘देखलनि’ या ‘सुनलनि’, वास्तव मे, ऋषि लोकनि ध्यानक उच्च अवस्था मे अपना भीतर मंत्र सब केँ चिन्हने रहथि । दोसर शब्द मे, मंत्र सभक समझ आर आन्तरिक अनुभूति केर एक झलक छल । जाहि उच्चतम एकाग्रताक स्तर पर ओ सब रहथि, ओतय आँखि शायद नहि देखने होयत या कान भौतिक रूप सँ नहि सुनने होयत । तैयो, हुनका भीतर गहिंराइ मे, वेद सभक ध्वनि सब अनुभूति कयल गेल आ ओ सब अपन प्रभाव (हुनका सभक मानसपटल पर) छोड़लक ।
‘देखनाय’ शब्द आवश्यक रूप सँ दृष्टिक अंग केर कार्यक वर्णन नहि करैछ । ई अभिव्यक्ति कोनो इन्द्रिय पर बाहरी वस्तु सब द्वारा उत्पन्न प्रभावक नीक ढंग सँ वर्णन कय सकैत अछि । जखन ई कहल जाइत अछि जे अमुक व्यक्ति जीवन मे उतार-चढ़ाव देखलनि, त एकर अर्थ ई नहि भेल जे हुनकर जीवनक सुख-दुःख मात्र दृश्यमान (देखब योग्य) छल । एकर अर्थ भेल जे हुनकर जीवनक उतार-चढ़ाव केर अनुभव कयलनि । अतः मंत्र दृष्टा शब्द केर अर्थ ऋषि लोकनिक आध्यात्मिक अनुभव सँ लेल जेबाक चाही ।
चूँकि वेद ध्वनि रूप मे अछि, ताहि हेतु ईहो मानल जा सकैछ जे “दिव्य स्रोत्र” या विशेष रूप सँ प्रशिक्षित ऋषि लोकनिक कान टा ओकरा सुनयवला छल ।
अर्जुन श्रीकृष्णक विश्वरूप केँ देखय चाहैत छलथि । “अहाँ अपन साधारण मानवीय आँखि सँ हमर वास्तविक रूप केँ नहि देखि सकैत छी । ताहि लेल हम अहाँ केँ दिव्य नेत्र प्रदान करब ।” गीता मे श्रीकृष्ण एना कहैत छथि (दिव्यं ददामि तय चक्षुः) । जाहि प्रकारे अर्जुन ‘दिव्य’ नेत्र प्राप्त कयलनि, ताहि प्रकारे ऋषि लोकनि ‘दिव्य’ कान विकसित कयलनि जे ओहि मंत्र सब केँ सुनय मे सक्षम छल, जे अन्तरिक्ष मे सदा विद्यमान छल ।
ई सब हम ई दर्शेबाक लेल कहलहुँ अछि जे वेद केकरहु रचनाक परिणाम नहि छी । ऋषि लोकनि ई नहि लिखलनि, नहिये परमात्मा बैसिकय ई लिखलनि ।
आगू अछिः वेद पर शोध (पढ़नाय जारी राखू)
Sound And Creation
What is sound? Modern science defines it as vibration. Atomic science and Einstein’s theory have projected the conclusion that, at the level of the atom, all matter is the same – (the Advaita of the Vedanta). But objects appear differently to the eyes because energy produces vibrations of different frequencies at various points.
Vibration creates sound. Conversely stated, if sound is to result, vibrations should be created. Since vibrations of different frequencies occur in the flood-stream of energy, the scientific explanation for the creation of the world and the Vedic pronouncement that creation resulted from the life-breath of the Paramaatma, are mutually in agreement.
What is at the base of the health and feelings in man and beast? Breath and breathing. The passage of breath through the various Naadis (pulses – nerve centres) creates vibrations which are responsible for the health of beings; or lack of it. If, through Yogic practices, the passage of breath through these centres is controlled or regulated, wonderful health results. In such a state, even if the blood vessels are severed, blood would not flow out. Yogis are able to stop the heart-beat and pulse beat and remain buried underground in a state of quiescence. The venom of a snake or scorpion bite leaves them unaffected. All this is possible because they are able to discipline the vibrations caused by normal breathing.
Breathing is not only necessary for keeping the body alive but the mind and mental health also depend on it to a great extent. This is because the mind which is the cause of all thought processes and breathing which is the cause of the life force are one and the same. The vibrations of the pulses or nerve centres are responsible for healthy (good) or unhealthy (bad) thoughts. You might have experienced it yourself. How does breathing behave in places where God’s presence is palpable or in the presence of a holy man when the mind is peaceful? How is it when it is under the pressure of passion or anger? It will be found that the breathing pattern is widely different in each case. Even in the case of various states of joy and happiness, there is a difference in the breath-pattern.
Happiness arising as a result of religious practices or Bhajan is different from that caused by satisfaction of desires of the senses or Indriyas. Generally, the higher type of happiness results in exhalation through the right nostril. Mere sensory pleasure activates breathing out through the left nostril. All sensations are synthesised when thought is centred round a noble purpose. Then, breathing becomes slow, regular and equal through both nostrils. When thought merges or unifies with the object of thinking, breathing totally stops and the mind also stops thinking but life will continue to be sustained. And the super-consciousness or Jnana fills one’s being.
Therefore, the corporeal body of the Jeeva and the sense of awareness (consciousness) are created by the energy created by breathing and thrive on it or conversely get destroyed when breathing stops. This breathing is nothing but the regulation of the vibrations within us.
All matter, whether animate or inanimate, emanate from the Paramaatma and multiply themselves and manifest in various forms and also get transformed or disappear. The different vibrations necessary for such mutations should naturally be caused in the substance called “Paramaatma”.
Let us leave alone for the present the Advaitic theory that Brahman is without attributes, unchangeable, immutable, static, etc.
Even according to Advaita philosophy, in conjunction with the indefinable, indescribable (Anirvachaneeya) illusory force (maaya) the Brahman manifest itself as the various objects of phenomenal existence. Whether it appears to exist or otherwise, it has to be conceded that the same Primal Force appears differently as the inanimate world and the animate beings. Even if called illusion (Maaya), it has to subsist on a base (Maayin) which is none other than Iswara. Therefore, even Maaya, in its various forms, is manifest as vibrations in the Para Brahman. Notwithstanding such vibrations which are manifest, the Para Brahman is not in a state of vibration and deep inside it stays in a state of quiescence. Nevertheless, to our sense-perception, the vibrations are manifest. These cannot be chaotic. From the orbitting of the myriad solar systems down to the creation of a small blade of grass or mosquito, there is an orderly behavioural pattern, a governing law.
The well-being of the world is possible only by the operation of this good law of governance. The natural forces have been harnessed by the Paramaatma for the creation and governance of the world. But it would sometimes appear that God looks on when orderly existence gets slightly out of hand or awry.
Thus, we sometimes see the forces of nature stepping out of bounds. The rains do not come in season. Or, there are floods or some other natural calamity.
In the matter of departure from the normal, nothing can go as far wrong as the human mind. The lure of the flesh is great. Although by and large, there exist in nature very definite rules of conduct, order and discipline, the mind discards all the bonds of discipline and restraint and strays far and wide like a mad creature.
The question arises whether it is possible to correct the forces of nature when they act counter to the well-being of men. Similarly, is there any method to control the mind when it runs amuck?
If the origin of phenomenal existence is traceable to vibrations and sound, then it stands to reason that the same vibrations and sound can correct the erring forces of nature and cleanse the mind of improper thoughts. The Vedas are merely such vibrations and sounds.
It is possible for controlled breathing through Yoga to establish rapport with the Cosmic Breath and perform beneficial acts for general, as well as individual well being. The vibrations of the pulses and nerve centres are not audible to the human ear. This view is now being accepted by many.
Thinking on these lines, science is no enemy to the true concept of religion. On the other hand, it can go a long way to help the impact of religion on society. A century ago, before the advent of the telephone and radio, we would have found it difficult to satisfy the doubts of those lacking in faith as to the credibility of the sonic effects of the Vedas and breathing. Now, these discoveries lend us full support.
The capability of the insentient radio receiver can well be acquired by sentient beings. Nay, we can do even better. Tapas or penance is what gives such ability.
Tapas is to focus the mind and mind force constantly on an objective, discarding the comforts of hearth and home, heedless to the demands of hunger and thirst, sleep and rest. In all this exercise, it is necessary to eschew the awareness that ‘I am taking all this trouble and making all the effort and, therefore, I am bound to arrive at the Truth.’ Humility should permeate through all the effort in the belief that, notwithstanding all human endeavour, the grace of God is a vital ingredient to the success of any mission. The Rishis did such penance and reached the summit of yogic capabilities.
The Rishis became aware of all the vibrations that resulted in the creation of the world, that is to say, of the cosmic breathing, at it were. Not only that. Just as electromagnetic waves are converted into sonic sound waves, cosmic vibrations became audible to their ears. These they gave to the world as Veda mantras.
One thing strikes me. The Vedas are called ‘Sruti’ or that which is heard. The ear is called Srotra in Sanskrit. Without being recorded in writing, the Vedas have been passed from one generation to another in the ancient method of learning by the ear in the Guru-Sishya (Master-Disciple) tradition. Therefore some say that the appellation “sruti” is no doubt based on this. Why was the Veda not written down so that it could be read and learnt? One reason was that some sounds do not lend themselves to be accurately reproduced phonetically. The fall in between two syllables and there are many such sounds in the Vedas. These can only transmitted orally. In addition, the Veda mantras have to be recited in a certain specified cadence or rhythm (to produce the necessary vibrations). Some sounds have to be in high chromatic scale, some in the medium and others in low scales. However much these may be aided by remarks in asterisk, errors including those of calligraphy, might lead to improper accent, intonation and pronunciation. This will lead to lessening of their intended effect. It is easy to imagine the effect on us of a sound produced in a high or low pitch and that of another sound in the same pattern. Our emotional response and even the cosmic forces which regulate the orderliness of nature will change with the differences in intonation.
How the modulation of voice affects results adversely is illustrated by a story in the Veda itself (Taittareeya Samhita). The celestial craftsman, named Tvashta, undertook a Mantra Japa or incantation with the object of getting a son capable of destroying Indra. In chanting the prescribed Mantra, he erred in the intonation and accenting of certain sounds of words. This resulted in his prayer fetching him results exactly contrary to his intention. Instead of asking for a son who would destroy Indra, he asked for a son who would be destroyed by Indra. The story goes on to say that eventually it turned out to be so.
In the radio, a slight change in tuning gets us a different station. So to get a desired station, it is necessary to ensure perfect tuning. So is the case in Vedic chanting. The swara or pitch and amplitude of sound should be perfect. Just as change in wave length brings on a different station, change in chanting of the Veda mantra produces a different effect. It is because of these reasons that it has been stipulated that Vedas should be learnt through the ear from a Guru.
But the real reason for calling the Vedas ‘Sruti’ is that sounds that are inaudible to ordinary men were indeed heard by the Rishis, and these were then passed on by them to the disciples as they were heard by them. Thus, the Vedic sound were revealed to the Rishis when they were properly attuned to receive them through their Tapas. Hence the Vedas came to be known as ‘Sruti’ or that which was heard.
Earlier I said the Rishis were called Mantra Drashtas, or Seers of the Mantras. The phrase ‘ Mantra Drashta’ might well be construed to mean that the mantras were seen by them in the sky in clusters.
Which of these is right? Did they see them or hear them? If they saw them, then, in what language and script were they written, because these date back to an age when the Devanagari and Grantha scripts and the Braahmi script from which these two are the descendants were not extant. Even so, the Vedic texts cannot be accurately reproduced phonetically. The answer to this confusion is this. Whether one says that they ‘saw’ or ‘heard’, in reality, the Rishis cognised the mantras within themselves whilst in a high state of Dhyaana. In other words, there was a flash of understanding and inner perception of the mantras. At the level of highest concentration in which they were, the eyes might not have seen or the ears heard in a physical sense. Nevertheless, deep inside them, the sounds of Vedas were felt and they left their impact.
The word ‘seeing’ does not necessarily describe the function of the organ of sight. The expression can well describe the effect created by external objects on any of the sense organs. When it is said that so and so saw the ups and downs in life, it does not mean that his life’s joys and sorrows were only visual. It means that he experienced the ups and downs in life. The word Mantra Drishta, or seer, therefore should be taken to refer to the spiritual experience of the Rishis.
Since the Vedas are in the form of sound, it can also be assumed that “Divya Srotras” or the gifted ears of the Rishis specially attuned, were the ones to hear them.
Arjuna wished to see the cosmic form of Sri Krishna. “You can not see my true form with your ordinary human eyes. Therefore I will give you divine eyes.” So says Sri Krishna, in the Gita (Divyam Dadami Tay Chashuh). Just as Arjuna acquired ‘divine’ eyes, the Rishis developed ‘divine’ ears capable of hearing the mantras which were eternally present in space.
All this I have mentioned to show that the Vedas are not the result of anybody’s composition. The Rishish did not compose them. Nor did the Paramaatma sit down and write out the Vedas.
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ध्वनि और सृजन
ध्वनि क्या है ? आधुनिक विज्ञान इसे कंपन के रूप में परिभाषित करता है । परमाणु विज्ञान और आइंस्टीन के सिद्धांत ने यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया है कि परमाणु के स्तर पर, सभी पदार्थ एक ही हैं – (वेदांत का अद्वैत) । लेकिन वस्तुएँ आँखों को अलग-अलग दिखाई देती हैं क्योंकि ऊर्जा विभिन्न बिंदुओं पर अलग-अलग आवृत्तियों के कंपन उत्पन्न करती है ।
कंपन ध्वनि उत्पन्न करता है । इसके विपरीत, यदि ध्वनि उत्पन्न करनी है, तो कंपन उत्पन्न होने चाहिए । चूँकि ऊर्जा के प्रवाह में विभिन्न आवृत्तियों के कंपन उत्पन्न होते हैं, इसलिए संसार की रचना की वैज्ञानिक व्याख्या और यह वैदिक घोषणा कि सृष्टि परमात्मा के प्राण-श्वास से उत्पन्न हुई, परस्पर सहमत हैं ।
मनुष्य और पशु के स्वास्थ्य और भावनाओं का आधार क्या है ? श्वास और श्वसन । विभिन्न नाड़ियों (नाड़ियों – तंत्रिका केंद्रों) से श्वास का प्रवाह कंपन उत्पन्न करता है जो प्राणियों के स्वास्थ्य; या उसके अभाव के लिए जिम्मेदार हैं । यदि योगिक अभ्यासों के माध्यम से, इन केंद्रों से श्वास के प्रवाह को नियंत्रित या नियमित किया जाए, तो अद्भुत स्वास्थ्य प्राप्त होता है । ऐसी अवस्था में, यदि रक्त वाहिकाएँ कट भी जाएँ, तो भी रक्त प्रवाहित नहीं होगा । योगी हृदय-स्पंदन और नाड़ी-स्पंदन को रोककर, निश्चल अवस्था में भूमिगत रह सकते हैं । साँप या बिच्छू के काटने का विष भी उन्हें प्रभावित नहीं करता । यह सब इसलिए संभव है क्योंकि वे सामान्य श्वास-प्रश्वास से उत्पन्न कंपनों को नियंत्रित करने में सक्षम होते हैं ।
श्वास न केवल शरीर को जीवित रखने के लिए आवश्यक है, बल्कि मन और मानसिक स्वास्थ्य भी काफी हद तक इस पर निर्भर करते हैं । ऐसा इसलिए है क्योंकि मन, जो सभी विचार प्रक्रियाओं का कारण है और श्वास, जो प्राणशक्ति का कारण है, एक ही हैं । नाड़ियों या तंत्रिका केंद्रों के कंपन स्वस्थ (अच्छे) या अस्वस्थ (बुरे) विचारों के लिए उत्तरदायी होते हैं । आपने स्वयं इसका अनुभव किया होगा । जहाँ ईश्वर की उपस्थिति प्रत्यक्ष हो या किसी संत की उपस्थिति में, जब मन शांत हो, श्वास-प्रश्वास कैसा व्यवहार करता है ? जब वह काम या क्रोध के दबाव में हो, तो श्वास-प्रश्वास कैसा व्यवहार करता है ? यह पाया जाएगा कि प्रत्येक मामले में श्वास-प्रश्वास का पैटर्न व्यापक रूप से भिन्न होता है । आनंद और प्रसन्नता की विभिन्न अवस्थाओं में भी श्वास-प्रश्वास में अंतर होता है ।
धार्मिक अनुष्ठानों या भजन से उत्पन्न होने वाला आनंद, इंद्रियों या इंद्रियों की इच्छाओं की पूर्ति से उत्पन्न होने वाले आनंद से भिन्न होता है । सामान्यतः, उच्चतर प्रकार का आनंद दाहिनी नासिका से श्वास छोड़ने में परिणत होता है । केवल इंद्रिय सुख ही बाईं नासिका से श्वास बाहर छोड़ने को सक्रिय करता है । जब विचार किसी महान उद्देश्य पर केंद्रित होता है, तो सभी संवेदनाएँ संश्लेषित हो जाती हैं । तब, दोनों नासिकाओं से श्वास धीमी, नियमित और समान हो जाती है । जब विचार चिंतन के विषय में विलीन या एकाकार हो जाता है, तो श्वास पूरी तरह रुक जाती है और मन भी सोचना बंद कर देता है, लेकिन जीवन चलता रहता है । और अतिचेतन या ज्ञान व्यक्ति के अस्तित्व को भर देता है ।
इसलिए, जीव का स्थूल शरीर और चेतना श्वास द्वारा उत्पन्न ऊर्जा द्वारा निर्मित होते हैं और उसी पर पनपते हैं या श्वास रुकने पर नष्ट हो जाते हैं । यह श्वास हमारे भीतर के स्पंदनों के नियमन के अलावा और कुछ नहीं है ।
सभी पदार्थ, चाहे वे सजीव हों या निर्जीव, परमात्मा से उत्पन्न होते हैं और स्वयं को गुणा करते हैं, विभिन्न रूपों में प्रकट होते हैं और रूपांतरित या लुप्त भी हो जाते हैं । ऐसे परिवर्तनों के लिए आवश्यक विभिन्न स्पंदन स्वाभाविक रूप से “परमात्मा” नामक पदार्थ में उत्पन्न होने चाहिए ।
आइए हम इस अद्वैतवादी सिद्धांत को फिलहाल छोड़ दें कि ब्रह्म निर्गुण, अपरिवर्तनीय, अपरिवर्तनशील, स्थिर आदि है ।
अद्वैत दर्शन के अनुसार भी, अपरिभाषित, अनिर्वचनीय माया के साथ मिलकर ब्रह्म स्वयं को प्रत्यक्ष अस्तित्व की विभिन्न वस्तुओं के रूप में प्रकट करता है । चाहे वह अस्तित्व में प्रतीत हो या अन्यथा, यह स्वीकार करना होगा कि वही आदि शक्ति जड़ जगत और चेतन प्राणियों के रूप में भिन्न रूप से प्रकट होती है । यदि इसे माया भी कहा जाए, तो भी इसे एक आधार (माया) पर स्थित होना ही है जो ईश्वर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । इसलिए, माया भी, अपने विभिन्न रूपों में, परब्रह्म में स्पंदनों के रूप में प्रकट होती है । ऐसे प्रकट स्पंदनों के होते हुए भी, परब्रह्म स्पंदन की अवस्था में नहीं होता और अपने भीतर गहरे में निश्चल अवस्था में रहता है । फिर भी, हमारी इंद्रिय-बोध के अनुसार, ये स्पंदन प्रकट होते हैं । ये अव्यवस्थित नहीं हो सकते । असंख्य सौरमंडलों की परिक्रमा से लेकर घास के एक छोटे से तिनके या मच्छर के निर्माण तक, एक व्यवस्थित व्यवहार-पद्धति, एक नियामक नियम विद्यमान है ।
इस शासन-नियम के संचालन से ही संसार का कल्याण संभव है । परमात्मा ने संसार के निर्माण और शासन के लिए प्राकृतिक शक्तियों का उपयोग किया है । लेकिन कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि जब व्यवस्थित अस्तित्व थोड़ा अनियंत्रित या अस्त-व्यस्त हो जाता है, तो ईश्वर उसे देखते रहते हैं ।
इस प्रकार, हम कभी-कभी प्रकृति की शक्तियों को अपनी सीमा से बाहर जाते हुए देखते हैं । वर्षा समय से (ऋतु) में नहीं होती । या फिर, बाढ़ या कोई अन्य प्राकृतिक आपदा आ जाती है ।
सामान्य से प्रस्थान करने के (विचलन के) मामले में, मानव मन जितना गलत अन्य कुछ भी नहीं कर सकता । देह का मोह बहुत प्रबल है । यद्यपि प्रकृति में आचरण, व्यवस्था और अनुशासन के बहुत ही निश्चित नियम विद्यमान हैं, फिर भी मन अनुशासन और संयम के सभी बंधनों को त्यागकर पागल प्राणी की तरह दूर-दूर तक भटकता रहता है ।
प्रश्न उठता है कि क्या प्रकृति की शक्तियों को तब सुधारना संभव है जब वे मानव कल्याण के विरुद्ध कार्य करती हैं । इसी प्रकार, क्या मन के विक्षुब्ध होने पर उसे नियंत्रित करने का कोई उपाय है ?
यदि प्रत्यक्ष अस्तित्व का उद्गम कंपनों और ध्वनि में निहित है, तो यह तर्कसंगत है कि वही कंपन और ध्वनि प्रकृति की भटकती शक्तियों को सुधार सकते हैं और मन को अनुचित विचारों से मुक्त कर सकते हैं । वेद ऐसे ही कंपन और ध्वनि मात्र हैं ।
योग द्वारा नियंत्रित श्वास द्वारा ब्रह्मांडीय श्वास के साथ तालमेल स्थापित करना और सामान्य तथा व्यक्तिगत कल्याण के लिए लाभकारी कार्य करना संभव है । नाड़ियों और तंत्रिका केंद्रों के कंपन मानव कान को सुनाई नहीं देते । यह दृष्टिकोण अब कई लोगों द्वारा स्वीकार किया जा रहा है ।
इस दृष्टिकोण से, विज्ञान धर्म की सच्ची अवधारणा का शत्रु नहीं है । दूसरी ओर, यह समाज पर धर्म के प्रभाव को बढ़ाने में काफ़ी मददगार साबित हो सकता है । एक सदी पहले, टेलीफ़ोन और रेडियो के आगमन से पहले, वेदों और श्वास के ध्वनि प्रभावों की विश्वसनीयता के बारे में अविश्वास रखने वालों के संदेहों का समाधान करना हमारे लिए कठिन होता था । अब, ये खोजें हमें पूर्ण समर्थन प्रदान करती हैं ।
अचेतन (बेसुध) रेडियो रिसीवर की क्षमता चेतन प्राणियों द्वारा भी प्राप्त की जा सकती है । बल्कि, हम इससे भी बेहतर कर सकते हैं । तप या तपस्या ही ऐसी क्षमता प्रदान करती है ।
तप का अर्थ है मन और मानसिक शक्ति को निरंतर एक लक्ष्य पर केंद्रित करना, घर-गृहस्थी के सुख-सुविधाओं को त्यागकर, भूख-प्यास, नींद और विश्राम की माँगों की परवाह न करना । इस पूरे अभ्यास में, इस बोध से बचना ज़रूरी है कि ‘मैं यह सारा कष्ट उठा रहा हूँ और सारा प्रयास कर रहा हूँ, इसलिए मुझे सत्य तक पहुँचना ही है ।’ विनम्रता इस विश्वास के साथ पूरे प्रयास में व्याप्त होनी चाहिए कि, सभी मानवीय प्रयासों के बावजूद, ईश्वर की कृपा किसी भी कार्य की सफलता के लिए एक अनिवार्य घटक है । ऋषियों ने ऐसी ही तपस्या की और योगिक क्षमताओं के शिखर पर पहुँचे ।
ऋषियों को उन सभी स्पंदनों का ज्ञान हो गया जिनके परिणामस्वरूप संसार की रचना हुई, अर्थात् ब्रह्मांडीय श्वास का । केवल इतना ही नहीं । जिस प्रकार विद्युत चुम्बकीय तरंगें ध्वनि तरंगों में परिवर्तित हो जाती हैं, उसी प्रकार ब्रह्मांडीय स्पंदन उनके कानों को सुनाई देने लगे । इन्हें उन्होंने वेद मंत्रों के रूप में संसार को दिया ।
एक बात मुझे प्रभावित करती है । वेदों को ‘श्रुति’ या वह जो सुना जाता है, कहा जाता है । संस्कृत में कान को ‘स्रोत’ कहा जाता है । लिखित रूप में दर्ज किए बिना, वेद गुरु-शिष्य परंपरा में कानों द्वारा सीखने की प्राचीन पद्धति से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचते रहे हैं । इसलिए कुछ लोग कहते हैं कि “श्रुति” नाम निस्संदेह इसी पर आधारित है । वेद को लिखित रूप में क्यों नहीं लिखा गया ताकि उसे पढ़ा और सीखा जा सके ? एक कारण यह था कि कुछ ध्वनियाँ ध्वन्यात्मक रूप से सटीक रूप से पुनरुत्पादित नहीं हो पातीं । दो अक्षरों के बीच की ध्वनियाँ और वेदों में ऐसी कई ध्वनियाँ हैं । इन्हें केवल मौखिक रूप से ही प्रसारित किया जा सकता है । इसके अतिरिक्त, वेद मंत्रों का उच्चारण एक निश्चित लय या ताल में किया जाना चाहिए (आवश्यक कंपन उत्पन्न करने के लिए) । कुछ ध्वनियों का उच्चारण उच्च वर्णक्रमीय, कुछ का मध्यम और कुछ का निम्न वर्णक्रमीय होना आवश्यक है । हालाँकि तारांकन चिह्नों से इनमें कितनी भी सहायता मिल जाए, सुलेखन की त्रुटियाँ सहित, गलत उच्चारण, स्वर और उच्चारण का कारण बन सकती हैं । इससे उनके इच्छित प्रभाव में कमी आएगी । उच्च या निम्न स्वर में उत्पन्न ध्वनि और उसी स्वर में उत्पन्न किसी अन्य ध्वनि का हम पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसकी कल्पना करना आसान है । स्वर में अंतर के साथ हमारी भावनात्मक प्रतिक्रिया और यहाँ तक कि प्रकृति की सुव्यवस्था को नियंत्रित करने वाली ब्रह्मांडीय शक्तियाँ भी बदल जाएँगी ।
आवाज़ का स्वर-परिवर्तन परिणामों पर प्रतिकूल प्रभाव कैसे डालता है, इसका उदाहरण स्वयं वेद (तैत्तरीय संहिता) में एक कथा द्वारा मिलता है । त्वष्टा नामक एक दिव्य शिल्पी ने इंद्र को नष्ट करने में सक्षम पुत्र की प्राप्ति के उद्देश्य से एक मंत्र जप किया । निर्धारित मंत्र का जाप करते समय, उसने कुछ शब्दों के स्वर और उच्चारण में त्रुटि कर दी । इसके परिणामस्वरूप उसकी प्रार्थना से उसे उसके इरादे के बिल्कुल विपरीत परिणाम प्राप्त हुए । इंद्र को नष्ट करने वाले पुत्र की माँग करने के बजाय, उसने इंद्र द्वारा नष्ट किए जाने वाले पुत्र की माँग की । कथा आगे कहती है कि अंततः ऐसा ही हुआ ।
रेडियो में, स्वर-संयोजन में थोड़ा सा परिवर्तन हमें एक अलग स्टेशन प्रदान करता है । इसलिए, वांछित स्टेशन प्राप्त करने के लिए, सही स्वर-संयोजन सुनिश्चित करना आवश्यक है । वैदिक मंत्रोच्चार में भी यही बात लागू होती है । ध्वनि का स्वर या तारत्व और आयाम सही होना चाहिए । जिस प्रकार तरंगदैर्घ्य में परिवर्तन से एक अलग स्टेशन उत्पन्न होता है, उसी प्रकार वेद मंत्रोच्चार में परिवर्तन से एक अलग प्रभाव उत्पन्न होता है । इन्हीं कारणों से यह निर्धारित किया गया है कि वेदों को गुरु से श्रवण करके सीखना चाहिए ।
लेकिन वेदों को ‘श्रुति’ कहने का वास्तविक कारण यह है कि जो ध्वनियाँ सामान्य मनुष्यों के लिए अश्रव्य हैं, उन्हें ऋषियों ने सुना था और फिर उन्हें शिष्यों को उसी रूप में प्रदान किया था जैसा उन्होंने सुना था । इस प्रकार, वैदिक ध्वनियाँ ऋषियों को तब प्रकट हुईं जब वे अपने तप के माध्यम से उन्हें ग्रहण करने के लिए पूरी तरह से तत्पर हो गए । इसलिए वेदों को ‘श्रुति’ या जो सुना गया, कहा जाने लगा ।
पहले मैंने कहा था कि ऋषियों को मंत्र द्रष्टा या मंत्रों के द्रष्टा कहा जाता था । ‘मंत्र द्रष्टा’ वाक्यांश का अर्थ यह लगाया जा सकता है कि उन्होंने मंत्रों को आकाश में समूहों में देखा था ।
इनमें से कौन सा सही है ? क्या उन्होंने उन्हें देखा या सुना ? यदि उन्होंने उन्हें देखा था, तो वे किस भाषा और लिपि में लिखे गए थे, क्योंकि ये उस युग के हैं जब देवनागरी और ग्रंथ लिपियाँ और ब्राह्मी लिपि, जिनसे ये दोनों उत्पन्न हुई हैं, अस्तित्व में नहीं थीं । फिर भी, वैदिक ग्रंथों को ध्वन्यात्मक रूप से सटीक रूप से पुन: प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है । इस भ्रम का उत्तर यह है । चाहे कोई कहे कि उन्होंने ‘देखा’ या ‘सुना’, वास्तव में, ऋषियों ने ध्यान की उच्च अवस्था में अपने भीतर मंत्रों को पहचाना था । दूसरे शब्दों में, मंत्रों की समझ और आंतरिक अनुभूति की एक झलक थी । जिस उच्चतम एकाग्रता के स्तर पर वे थे, वहाँ आँखों ने शायद नहीं देखा होगा या कानों ने भौतिक रूप से नहीं सुना होगा । फिर भी, उनके भीतर गहरे में, वेदों की ध्वनियाँ महसूस की गईं और उन्होंने अपना प्रभाव छोड़ा ।
‘देखना’ शब्द आवश्यक रूप से दृष्टि के अंग के कार्य का वर्णन नहीं करता है । यह अभिव्यक्ति किसी भी इंद्रिय पर बाहरी वस्तुओं द्वारा उत्पन्न प्रभाव का अच्छी तरह से वर्णन कर सकती है । जब यह कहा जाता है कि अमुक व्यक्ति ने जीवन में उतार-चढ़ाव देखे, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके जीवन के सुख-दुख केवल दृश्य थे । इसका अर्थ है कि उसने जीवन के उतार-चढ़ाव का अनुभव किया । अतः मंत्र दृष्टा शब्द का अर्थ ऋषियों के आध्यात्मिक अनुभव से लिया जाना चाहिए ।
चूँकि वेद ध्वनि रूप में हैं, इसलिए यह भी माना जा सकता है कि “दिव्य स्रोत्र” या विशेष रूप से प्रशिक्षित ऋषियों के कान ही उन्हें सुनने वाले थे ।
अर्जुन श्रीकृष्ण के विश्वरूप को देखना चाहता था । “तुम अपनी साधारण मानवीय आँखों से मेरे वास्तविक रूप को नहीं देख सकते । इसलिए मैं तुम्हें दिव्य नेत्र प्रदान करूँगा ।” गीता में श्रीकृष्ण ऐसा कहते हैं (दिव्यं ददामि तय चक्षुः) । जिस प्रकार अर्जुन ने ‘दिव्य’ नेत्र प्राप्त किए, उसी प्रकार ऋषियों ने ‘दिव्य’ कान विकसित किए जो उन मंत्रों को सुनने में सक्षम थे जो अंतरिक्ष में सदा विद्यमान थे ।
यह सब मैंने यह दर्शाने के लिए कहा है कि वेद किसी की रचना का परिणाम नहीं हैं । ऋषियों ने इन्हें नहीं लिखा, न ही परमात्मा ने बैठकर इन्हें लिखा ।
आगे हैः वेद पर शोध (पढ़ना जारी रखें)

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